तालाब की बातें

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जल है तो जीवन है

सोमवार, 22 अगस्त 2016

where to dispose atomic waste

समस्या बनता परमाणु कचरा
 हर साल बिजली की मांग बढ़ रही है। हालांकि अभी हम कुल 4780 मेगावाट बिजली ही परमाणु से पैदा कर पा रहे हैं, जो कि हमारे कुल बिजली उत्पादन का महज तीन फीसद ही है। अनुमान है कि हमारे परमाणु ऊर्जा घर 2020 तक 14600 मेगावाट बिजली बनाने लगेंगे और 2050 तक हमारे कुल उत्पादन का एक-चौथाई अणु-शक्ति से आएगा। भारत में परमाणु ऊर्जा के पक्ष में तीन बातें कही जाती हैं कि ये सस्ती है, सुरक्षित है और स्वछ यानी पर्यावरण हितैषी है। जबकि सचाई ये है कि इनमें से कोई एक भी बात सच नहीं है। यह भी बात सही नहीं है कि देश में बिजली की बेहद कमी है और उसे पूरा करने के लिए कार्बन पदार्थ जल्दी ही खत्म हो जाएंगे। यह किसी से छिपा नहीं है कि महज कुछ लोगों के मनोरंजन के लिए स्टेडियम में इतनी बिजली फूंक दी जाती है जिससे एक साल तक कई गांव रोशन हो सकते हैं। मुंबई में एक 28 मंजिला इमारत में रहने वालों की संख्या पांच भी नहीं है, लेकिन उसकी महीने की बिजली खपत एक गांव की चार साल की खपत से यादा है।
विकास के लिए एक महत्वपूर्ण घटक है बिजली। उसकी मांग व उत्पादन बढ़ना स्वाभाविक ही है, लेकिन जो सवाल दुनिया के सामने है, उस पर भारत को भी सोचना होगा-परमाणु घरों से निकले कचरे का निबटान कहां व कैसे हो। सनद रहे परमाणु विकिरण सालों-दशकांे तक सतत चलता है और एक सीमा से अधिक विकिरण मानव शरीर व पर्यावरण को कैसे नुकसान पहुंचाता है। उसकी नजीर जापान का हिरोशिमा व नागासाकी हैं। वैसे तो इस संवेदनशील मसले पर 14 मार्च, 2012 को एक प्रश्न के जवाब में प्रधानमंत्री कार्यालय ने लोकसभा में बताया था कि परमाणु कचरे का निबटना कैसे होता है? यह बात सालों पहले भी सुगबुगाई थी कि ऐसे कचरे को जमीन के भीतर गाड़ने के लिए उपेक्षित, वीरान और पथरीले इलाकों को चुना गया है और उसमें बुंदेलखंड का भी नाम था।
सरकार का लोकसभा में दिया गया जवाब बताता है कि परमाणु बिजली घर से निकले कचरे को पहले अति संवेदनशील, कम संवेदनशील तथा निष्क्रिय में छांटा जाता है। फिर खतरनाक कचरे को सीमेंट, पॉलीमर, कांच जैसे पदार्थो में मिला कर ठोस में बदलने को रखा जाता है। इनके ठोस में बदलने तक कचरा बिजली घरों में ही सुरक्षित रखा जाता है। इसे दोहरी परत वाले सुरक्षित स्टेनलेस स्टील के पात्रों में रखा जाता है। जब यह कचरा पूरी तरह ठोस में बदल जाता है और उसके रेडियोएक्टिव गुण क्षीण हो जाते हैं तो उसे जमीन की गहराई में दफनाने की तैयारी की जाती है। सनद रहे पश्चिमी देश ऐसे कचरे को अभी तक समुद्र में बहुत गहरे में दबाते रहे हैं। उधर जर्मनी के हादसे पर कम ही चर्चा होती है, जहां परमाणु कचरे को जमीन के भीतर गाड़ा गया, लेकिन वहां पानी रिसने के कारण हालात गंभीर हो गए व कचरे को खोद कर निकालने का काम करना पड़ा। अमेरिका में छह स्थानों पर भूमिगत कचरा घर हैं जिन्हें दुनिया की सबसे दूषित जगह माना जाता है। इनमें से हैनफोर्ड स्थित कचरे में रिसाव भी हो चुका है, जिसे संभालने में अमेरिका को पसीने आ गए थे।
अणु ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में बदलने के लिए यूरेनियम नामक रेडियोएक्टिव को बतौर ईंधन प्रयोग में लाया जाता है। न्यूट्रॉन की बम वर्षा पर रेडियोएक्टिव तत्व में भयंकर विखंडन होता है। इस धमाके पर 10 लाख डिग्री सेल्सियस की गर्मी और लाखों वायुमंडलीय दवाब उत्पन्न होता है। इसीलिए मंदक के रूप में साधारण जल, भारी जल, ग्रेफाइट और बेरेलियम ऑक्साइड का प्रयोग होता है। शीतलक के रूप में हीलियम गैस संयंत्र में प्रवाहित की जाती है। विखंडन प्रक्रिया को नियंत्रित करने के लिए कैडमियाम या बोरोन स्टील की छड़ें उसमें लगाई जाती हैं। बिजली पैदा करने लायक ऊर्जा मिलने के बाद यूरेनियम, प्लूटोनियम में बदल जाता है, जिसका उपयोग परमाणु बम बनाने में होता है। इसके नाभिकीय विखंडन पर ऊर्जा के साथ-साथ क्रिप्टॉन, जिनान, सीजियम आदि तत्व बनते जाते हैं। एक बार विखंडन शुरू होने पर यह प्रक्रिया लगभग अनंत काल तक चलती रहती है। इस तरह यहां से निकला कचरा बहेद विध्वंसकारी होता है। इसका निबटान सारी दुनिया के लिए समस्या है।
भारत में हर साल भारी मात्र में निकलने वाले ऐसे कचरे को हिमालय पर्वत, गंगा-सिंधु के कछार या रेगिस्तान में तो डाला नहीं जा सकता, क्योंकि कहीं भूकंप की आशंका है तो कहीं बाढ़ का खतरा। कहीं भूजल स्तर काफी ऊंचा है तो कहीं घनी आबादी। कहा जाता है कि परमाणु ऊर्जा आयोग के वैज्ञानिकों को बुंदेलखंड, कर्नाटक व आंध्र प्रदेश का कुछ पथरीला इलाका इस कचरे को दफनाने के लिए सर्वाधिक मुफीद लगा और अभी तक कई बार यहां गहराई में स्टील के ड्रम दबाए जा चुके हैं।
परमाणु कचरे को बुंदेलखंड में दबाने का सबसे बड़ा कारण यहां की विशिष्ठ ग्रेनाइट संरचना है। यहां 50 फीट गहराई तक ही मिट्टी है और उसके बाद 250 फीट गहराई तक ग्रेनाइट पत्थर है। भूगर्भ वैज्ञानिक अविनाश खरे बताते हैं कि बुंदेलखंड ग्रेनाइट का निर्माण कोई 250 करोड़ साल पहले तरल मेग्मा से हुआ था। तबसे विभिन्न मौसमों के प्रभाव ने इस पत्थर को अन्य किसी प्रभाव का रोधी बना दिया है। यहां गहराई में बगैर किसी टूट या दरार के चट्टाने हैं और इसीलिए इसे कचरा दबाने का सुरक्षित स्थान मना गया।
अणु कचरे से निकलने वाली किरणों ना तो दिखती हैं और ना ही इसका कोई स्वाद या गंध होता है, लेकिन ये किरणंे मनुष्य के शरीर के प्रोटिन, एंजाइम, अनुवांशिक अवयवों में बदलाव ला देती हैं। यदि एक बार रेडियोएक्टिव तत्व मात्र से अधिक शरीर में प्रवेश कर जाए तो उसके दुष्प्रभाव से बचना संभव नहीं है। विभिन्न अणु बिजली घरों के करीबी गांव-बस्तियों के बाशिंदों के शरीर में गांठ बनना, गर्भपात, कैंसर, अविकसित बचे पैदा होना जैसे हादसे आम हैं, क्योंकि जैव कोशिकाओं पर रेडियोएक्टिव असर पड़ते ही उनका विकृत होना शुरू हो जाता है। खून के प्रतिरोधी तत्व भी विकिरण के चलते कमजोर हो जाते हैं। इससे एलर्जी, दिल की बीमारी, डायबीटिज जैसे रोग होते हैं। पानी में विकिरण रिसाव होने की दशा में नाइट्रेट की मात्र बढ़ जाती है। यह जानलेवा होता है।
ऐसे कचरे को बुंदेलखंड में दफनाने से पहले वैज्ञानिकों ने यहां बाढ़, भूचाल, युद्ध और जनता की भूजल पर निर्भरता जैसे मसलों पर शायद गंभीरता से विचार ही नहीं किया। इस इलाके में पांच साल में दो बर कम वर्षा व एक बार अति वर्षा के कारण बाढ़ आना मौसम चक्र बन चुका है। अविनाश खरे बताते हैं कि बुंदेलखंड का जल-स्तर शून्य से सौ फीट तक है। बुंदेलखंड ग्रेनाइट में बेसीन, सब बेसीन और माइक्रो बेसीन, यहां की नदियों, नालों के बहाव के आधार पर बंटे हुए हैं, लेकिन ये किसी ना किसी तरीके से आपस में जुड़े हुए हैं। यानी पानी के माध्यम से यदि रेडियोएक्टिव रिसाव हो गया तो उसे रोक पाना संभव नहीं होगा। नदियों के प्रभाव से पैदा टैक्टोनिक फोर्स के कारण चट्टानों में टूटफूट होती रहती है, जिससे विकिरण फैलने की संभावना बनी रहती है।

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