तालाब की बातें

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शुक्रवार, 9 सितंबर 2016

Why Malaria combat is going difficult


मुश्किल होता मलेरिया उन्मूलन 

मलेरिया उपचार की सर्वाधिक प्रचलित दवा ‘क्लोरोक्वीन’’है । आज यह पूरी तरह निष्प्रभावी है, उलटे इसके विषम असर हो रहे हैं। इसके बावजूद इसकी बिक्री और वितरण धड़े से हो रहा है। वर्ष 2000 में तो देश के 14 रायों के कई जिलों में बाकायदा इस पर रिसर्च हुआ था, जिसमें पाया गया था कि मछरों में पाया जाने वाला पी.फाल्सीपेरम परजीवी इस दवा का आदी हो चुका है


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बीते एक महीने के दौरान बड़ा अजीब सा मौसम रहा है। तेज गरमी होती है, कभी ठंड हो जाती है; फिर तेज बारिश। जाहिर है कि यह सीलनभरा गर्म मौसम मछरों के लिए उत्प्रेरक की तरह है और मछर है तो मलेरिया होना भी लाजिमी है। मलेरिया, डेंगू, जापानी बुखार और चिकनगुनिया जैसी बीमरियां जनता के लिए आफत बनती जा रही हैं। वहीं सरकारी महकमे पुराने नुस्खों को अपना कर अपने असफल होने का रोना रोते रहते हैं। यही नहीं हाथी पांव यानी फाईलेरिया के मरीजों की संख्या भी बढ़ रही है। विशेष रूप से राजस्थान के रेगिस्तानी इलाकों (जहां हाल के वर्षो में अप्रत्याशित रूप से पानी बरसा है), बिहार के बाढ़ग्रस्त जिलों, मध्य प्रदेश, पूवोर्ंत्तर के रायें व नगरीय-स्लम में बदल रहे दिी, कोलकाता जैसे महानगरों में जिस तरह मलेरिया का आतंक बढ़ा है, वह आधुनिक चिकित्या विज्ञान के लिए चुनौती है। सरकारी तंत्र पश्चिमी-प्रायोजित एड्स की काली छाया के पीछे भाग रहा है, जबकि मछरों की मार से फैले रोग को डॉक्टर लाइलाज मानने लगे हैं। उनका कहना है कि आज के मचछर मलेरिया की प्रचलित दवाओं को आसानी से हजम कर जाते हैं। दूसरी ओर घर-घर में इस्तेमाल हो रही मछर-मार दवाओं के बढ़ते प्रभाव के कारण मछर अब और जहरीला हो गया है। देश के पहाड़ी इलाकों में अभी कुछ साल पहले तक मछर देखने को नहीं मिलता था, लेकिन अब वहां रात में खुले में साने की कल्पना भी नहीं की जा सकती है।
सन् 1958 में अंतरराष्ट्रीय मानदंडों के अनुरूप शुरू हुए राष्ट्रीय मलेरिया उन्मूलन कार्यक्रम के शुरुआती दौर में खासी सफलता मिली थी। 1965 में तो मलेरियाग्रस्त रोगियों की सालाना संख्या महज एक लाख थी। सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक उस साल देशभर में कोई भी मलेरिया के कारण मरा नहीं । सनद रहे कि आजादी के समय हर साल साढ़े सात करोड़ लोगों के मलेरिया की चपेट में आने व आठ लाख लोगों की इससे मौत होने के सरकारी आंकड़े दर्ज हुए थे। साठ के दशक में ‘‘ना मछर रहेगा और ना ही मलेरिया’’ का नारा काफी हद तक सफल रहा । लेकिन सत्तर का दशक आते-आते इस नारे में कुछ बदलाव आ गया, ‘‘मछर तो रहेगा, लेकिन मलेरिया नहीं’’। देश के स्वास्थ्य विभाग के रजिस्टर बताते हैं कि 1976 में मलेरिया ने फिर रिकॉर्ड तोड़ दी थी। इस साल 64 लाख से अधिक लोग मलेरिया की चपेट में आए। सरकार एक बार फिर चेती और 1983 में मलेरियाग्रस्त लोगों की संख्या 16 लाख 65 हजार हो गई। 1992 में मलेरिया के 21.26 लाख मामले प्रकाश में आए। 1997 में यह संख्या बढ़ कर 25.53 लाख हो गई। यही नहीं, इस दौरान मलेरिया से मरने वालों की संख्या 422 से बढ़ कर 711 हो गई । 1998 में मरने वालों की संख्या 1010 और उसके आगे के सालों में इसमें सतत बढ़ोतरी होती रही है। अनुमान है कि इस साल (31 मार्च को समाप्त हुए वित्तीय वर्ष में) यह संख्या दो हजार के पार है। हालांकि पिछले दिनों इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च द्वारा पदम सिंह प्रधान की अध्यक्षता में गठित 16 सदस्यांे की कमेटी ने बेहद गंभीर चेतावनी देते हुए बताया है कि भारात में मलेरिया से मरने वालों की असल संख्या , सरकारी आंकड़ों के चालीस गुना अधिक होती है। इस समिति ने पाया कि भारत में हर साल औसतन चालीस हजार लोग मछर के कारण काल के गाल में समा जाते हैं। इन दिनों पश्चिम बंगाल में मलेरिया का आतंक यादा पसरा हुआ है। सन 2006 में वहां मलेरिया के 18 हजार से अधिक मामले और 55 मौतें दर्ज की गईं। 2015 में हमारे यहां चिकनगुनया के 27,553 अैर डेंगू के 99,913 मामले दर्ज हुए थे। इस साल तो जुलाई तक ही मलेरिया के 4,71,083 मरीज आए जिनमें से 119 की मौत हो गई। 31 अगस्त तक चिकनगुनया के 12,555 और डेंगेू के 27,889 मामले सामने आए, जबकि डेंगू से मरने वालों की संख्या 60 रही। 90 के दशक में भारत में औद्योगिकीकरण का विकास हुआ। नए कारखाने लगाने के लिए ऐसे इलाकों के जंगल काटे गए, जिन्हें मलेरिया-प्रभावित वन कहा जाता था। ऐसे जंगलों पर बसे शहरों में मछरों को बना-बनाया घर मिल गया।
जर्जर जल निकासी व्यवस्था, बारिश के पानी के जमा होने के आधिक्य और कम क्षेत्रफल में अधिक जनसंख्या के बसने के कारण नगरों में मलेरिया के जीवाणु तेजी से फल-फूल रहे हैं । प्रोटोजोआ परजीवियों से उत्पन्न संक्रामक रोगों में मलेरिया मानव जाति के लिए सर्वाधिक विनाशकारी रहा है। मलेरिया वास्तव में इतालवी शब्द है। ‘मले’ का अर्थ गंदी और ‘आरिया’ के मायने ‘हवा’ होता है । पहले यही धारणा थी कि यह रोग नम और दूषित हवाओं से होता है। सन् 1887 में डॉ. रोनाल्ड रास ने कबूतरों पर प्रयोग कर के पता लगाया था कि मलेरिया का कारण मछर है। साधारण मलेरिया ‘प्लाजमोडियम वाईवेक्स’ नामक परजीवी से होता है। मादा एनिफीलिज मछर जब किसी इंसान को काटता है तो उसकी लार मानव रक्त कोशिकाओं में आ जाती है। इसी लार में ‘‘स्पोरोवाईट’’ होते हैं, जो चक्र पूरा करने पर मलेरिया बुखार पैदा करते हैं ।
भारत में मलेरिया से बचाव के लिए सन् 1953 में राष्ट्रीय मलेरिया नियंत्रण कार्यक्रम शुरू किया गया था। गांव-गांव में डी.डी.टी. का छिड़काव और क्लोरोक्वीन की गोलियां बांटने के र्ढे में सरकारी महकमे भूल गए कि समय के साथ कार्यक्रम में भी बदलाव जरूरी है। धीरे-धीरे इन दवाओं की प्रतिरोधक क्षमता मछरों में आ गई। तभी यह छोटा सा जीव अब ताकतवर हो कर निरंकुश बन गया है । पिछले कुछ सालों से देश में कोहराम मचाने वाला मलेरिया सबटर्मियम या पर्निसियम मलेरिया कहलाता है । इसमें तेज बुखार के साथ लकवा, या बेहोशी छा जाती है। हैजानुमा दस्त, पेचिश की तरह शौच में खून आने लगता है। रक्त-प्रवाह रुक जाने से शरीर ठंडा पड़ जाती है। गांवों में फैले नीम-हकीम ही नहीं , बड़े-बड़े डिग्री से लैसे डॉक्टर भी भ्रमित हो जाते हैं कि दवा किस मर्ज की दी जाए। डॉक्टर लेबोरेट्री- जांच व दवाएं बदलने में लीन रहते हैं और मरीज की तड़प-तड़प कर मौत हो जाती है । इसे समझना बड़ा मुश्किल रहता है कि यह नए जमाने का मलेरिया है। मध्य प्रदेश में घर-घर में लोगों को चलने-फिरने से लाचार बनाने वाले चिकनगुनिया के इलाज में भी डॉक्टरों के साथ ऐसे ही संशय की स्थिति रहती है।
हालांकि ब्रिटिश गवर्नमेंट पब्लिक हेल्थ लेबोरेट्री सर्विस(पीएचएलसी) की एक अप्रकाशित रिपोर्ट में बीस साल पहले ही चेता दिया गया था कि दुनिया के गर्म होने के कारण मलेरिया प्रचंड रूप ले सकता है । गर्मी और उमस में हो रहा इजाफा खतरनाक बीमारियों को फैलाने वाले कीटाणुाओं व विषाणुओं के लिए संवाहक के माकूल हालात बना रहा है। कहा तो यह भी जाता है कि घरों के भीतर अंधाधुंध शौचालयों के निर्माण व शैाचालयों के लिए घर के नीचे ही टैंक खोदने के कारण मछरों की आबादी उन इलाकों में भी ताबड़तोड़ हो गई है, जहां अभी एक दशक पहले तक मछर होते ही नहीं थे ।
मलेरिया उपचार की सर्वाधिक प्रचलित दवा ‘‘क्लोरोक्वीन’’ है । आज यह पूरी तरह निष्प्रभावी है, उलटे इसके विषम असर हो रहे हैं। इसके बावजूद इसकी बिक्री और वितरण धड़े से हो रहा है। सन 2000 में तो देश के 14 रायों के कई जिलों में बाकायदा इस पर रिसर्च हुआ था, जिसमें पाया गया था कि मछरों में पाया जाने वाला पी.फाल्सीपेरम परजीवी इस दवा का आदी हो चुका है। धरती का गरम होता मिजाज जहां मलेरिया के माकूल है, वहीं एंटीबायोटिक दवाओं के मनमाने इस्तेमाल से लोगों की रोग-प्रतिरोधक क्षमता घट रही है । नीम व ऐसी ही वनोषधियों से मलेरिया व मछर उन्मूलन की दवाओं को तैयार करना हमारी प्राथमिकता होना चाहिए ।

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