My writings can be read here मेरे लेख मेरे विचार, Awarded By ABP News As best Blogger Award-2014 एबीपी न्‍यूज द्वारा हिंदी दिवस पर पर श्रेष्‍ठ ब्‍लाॅग के पुरस्‍कार से सम्‍मानित

शनिवार, 25 अक्टूबर 2014

Diwari Garbage has proved that we only through slogans

तो क्या हम केवल नारे लगाना जानते हैं ?

द सी एक्‍सप्रेस, आगरा, http://theseaexpress.com/epapermain.aspx
                                                                 पंकज चतुर्वेदी
दीवाली के कोई दो सप्ताह पहले प्रधानमंत्री ने एक पहल की, निहायत एक सामाजिक पहल, अनिवार्य पहल और देष की छबि दुनिया में सुधारने की ऐसी पहल जिसमें एक आम आदमी भी भारत-निर्माण में अपनी सहभागिता बगैर किसी जमा-पूंजी खर्च किए दे सकता था- स्वच्छ भारत अभियान। पूरे देश में झाडू लेकर सड़कों पर आने की मुहीम सी छिड़ गई - नेता, अफसर, गैरसरकारी संगठन, स्कूल, हर जगह सफाई अभियान की ऐसी धूम रही कि बाजार में झाड़ुओं के दाम आसमान पर पहुंच गए। और फिर आ गई दीपावली, हर घर में साफा-सफाई का पर्व, कहते हैं कि जहां गंदगी होती है वहां लक्ष्मीजी जाती नहीं हैं, सो घरों का कूड़ा सड़कों पर डालने का दौर चला। हद तो दीपावली की रात को हो गई, बीते पांच सालों के दौरान सबसे ज्यादा आतिषबाजी इस रात चली, ना कायदेां की चिंता रही , ना नियमों की परवाह। सुबह सारी सड़कें जिस तरह गंदगी, कूड़े से पटीं थीं, उससे साफ हो गया कि हमारा सफाई अभियान अभी दिल-दिमाग से नहीं केवल मुंह जबानी खर्च पर ही चल रहा है।
देश के स्वास्थ्य मंत्री व गत तीस सालों से हर रोज सैंकड़ों मरीजों को देख रहे वरिष्‍ठ चिकित्सक डा. हर्षवर्धन ने तो साफ-साफ अपील की कि आतिशबाजी से लोगों के सुनने की क्षमता प्रभावित होती है, उससे निकले धुएं से हजारों लोग सांस लेने की दिक्कतों के स्थाई मरीज बन जाते हैं, पटाखों का धुआं कई महीनों का प्रदूषण बढ़ा जाता है। डाक्टर हर्षवर्धन ने आतिशबाजी रहित दीपावली मनाने की अपील की, जिसे मीडिया ने भी बहुत तवज्जों नहीं दिया। इसके बावजूद उन्हीं की पार्टी के लोगों ने दो राज्यों में चुनाव जीत से लेकर दीपावली के तीन दिनों में सबसे ज्यादा गंदगी सड़कों व वायुमंडल में घोल दी। गौरतलब है कि प्रधानमंत्री ने कहीं भी किसी तरह की आतिशबाजी नहीं चलाई। इससे भी अधिक दुखद बात यह है कि झाड़ू ले कर सफाई करने के फोटो अखबार में छपवाने वाले बगैर आतिशबाजी के दीपावली मनाने की मुहिम पर आक्रामक हो कर उसे ‘‘धर्म-विरोधी’’ निरूपित कर रहे हैं। कुछ लोग इदउलजुआ पर मांसाहार का विरोध व दीपावली पर पटाकों के विरोध करने को फैशन बता कर मखौल उडा रहे हैं। कुछ लोग इसे निजी व देश की खुशी बढ़ने से जोड़ रहे हैं। हकीकत तो यह है कि कई साल पहले सुप्रीम कोर्ट भी आदेश दे चुकी है कि रात में 10 बजे के बाद आतिशबाजी ना हो क्योंकि इससे बीमार, अशक्त लोगों को असीम दिक्कतें होती हैं। धमाकेां की आवाज को ले कर भी 80 से 100 डेसीमल की सीमा है, लेकिन दस हजार पटाकों की लड़ी या दस सुतली बम एकसाथ जला कर अपनी आस्था या खुशी का इजहार करने वालों के लिए कानून-कायदे कोई मायने नहीं रखते।
इस बार पूरे देश में आतिशबाजी के कारण छोटे-बड़े हजार से ज्यादा अग्निकांड हो चुके हैं, जिसमें दिल्ली से सटे फरीदाबाद में आतिशबाजी बाजार का पूरा फुंकना तथा गाजियाबाद के इंदिरापुरम में पटाके की चिंगारी से पूरे फर्नीचर बाजार का धुआं होना भी शामिल है, कई करोड़ की राख बना चुका है।  चीन से आए गैरकानूनी पटाकों को चलाने में ना तो देशप्रेम आड़े आया और ना ही वैचारिक प्रतिबद्धता। कुछ लोग सफाई कर्मचारियों को कोस रहे हैं कि सड़कों पर आतिशबाजी का मलवा साफ करने वे सुबह जल्दी आए नहीं, यह सोचे बगैर कि वे भी इंसान हैं और उन्होंने भी बीती रात दीवाली मनाई होगी। यह बात लोग, विषेशरूप से झाड़ू हाथ में ले कर दुनिया बदलने के नारे देने वाले राजनीतिक कार्यकर्ता, यह नहीं समझ लेते कि हमारे देष में सफाई से बड़ी समस्या अनियंत्रित कूड़ा है। पहले कूड़ा कम करने के प्रयास होना चाहिए, साथ में उसके निस्तारण के। दीवाली के धुएं व कूड़े ने यह बात तो सिद्ध कर दी है कि अभी हम मानसिक तौर पर प्रधानमंत्रीजी की अपील के क्रियान्वयन व अमल के लिए तैयार नहीं हुए हैं। जिस घर में छोटे बच्चे, पालतु जानवर या बूढ़े व दिल के रोग के मरीज हैं जरा उनसे जा कर पूछें कि परंपरा के नाम पर वातावरण में जहर घोलना कितना पौराणिक, अनिवार्य तथा धार्मिक है। एक बात और भारत में दीवाली पर पटाके चलाने की परंपरा भी डेढ सौ साल से ज्यादा पुरानी नहीं है और इस दौर में कुरीतियां भंग भी हुई व नई बनी भीं, परंपरा तो उसे कहा नहीं जा सकता ।
शायद यह भारत की रीति ही है कि हम नारेां के साथ आवाज तो जोर से लगाते हैं लेकिन उनके जमीनी धरातल पर लाने में ‘किंतु-परंतु’ उगलने लगते हैं। कहा गया कि भातर को आजादी अहिंसा से मिली, लेकिन जैसे ही आजादी मिली, दुनिया के सबसे बड़े नरसंहारों में से एक विभाजन के दौरान घटित हो गया और बाद में अहिंसा का पुजारी हिंसा के द्वारा ही गौलोक गया। ‘‘यहां शराब नहीं बेची जाती है’’ या ‘‘देखो गधा मूत रहा है’’ से लेकर ‘दूरदृष्‍िट- पक्का इरादा’, ‘‘अनुशासन ही देश को महान बनाता है’’ या फिर छुआछूत, आतंकवाद, सांप्रदायिक सौहार्द या पर्यावरण या फिर ‘बेटी बचाओ’- सभी पर अच्छे सेमीनार होते हैं, नारे व पोस्ट गढ़े जाते हैं, रैली व जलसे होते हैं, लेकिन उनकी असलियत दीवाली पर हुई हरकतों पर उजागर होती है। हर इंसान चाहता है कि देश मे बहुत से शहीद भगत सिंह पैदा हों, लेकिन उनके घर तो अंबानी या धोनी ही आए, पड़ोस में ही भगत सिंह जनम्ें, जिसके घर हम कुछ आंसु बहाने, नारे लगाने या स्मारक बनाने जा सकें। जब तक खुद दीप बन कर जलने की क्षमता विकसित नहीं होगी, तब तक दीया-बाती के बल पर अंधेरा जाने से रहा। अब तो लगता है कि सामुदायिक व स्कूली स्तर पर इस बात के लिए नारे गढ़ने होंगे कि नारों को नारे ना रहने दो, उन्हें ‘नर-नारी’ का धर्म बना दो।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

Terrorist Doctors: Concerns of Society and Education ...Pankaj Chaturvedi

  आतंकवादी डॉक्टर्स : समाज और   शिक्षा के सरोकार ... पंकज चतुर्वेदी   एक-दो नहीं कोई आधे दर्जन  डॉक्टर्स एक ऐसे गिरोह में शामिल थे जो ...