आखिर क्यों टिकट मुक्त कर दिया विश्व पुस्तक मेला“विश्व” के नाम पर पटरी बाजार पंकज चतुर्वेदी
जब दिल्ली में कड़ाके की सर्दी, कोहरे और दमघोंटूँ स्माग की मार चरम पर हो गई तब 10 जनवरी से नौ दिन के लिए दुनिया के सबसे बड़े पुस्तक मेलों में गिने जाने वाले नई दिल्ली पुस्तक मेले का आयोजन हो रहा है । इस बार प्रगति मैदान, जो अब भारत मंडपम हो गया है, में प्रवेश के लिए टिकट नहीं लगेगा और इसे आयोजक नेशनल बुक ट्रस्ट बड़ी उपलब्धि के रूप में प्रचारित कर रहा है । नवंबर के ट्रेड फेयर एक बाद सबसे अधिक भीड़ भाड़ वाले आयोजन में निशुल्क आमद के पीछे का कारण जानने के लिए मेले की चल रही तैयारी को देखना होगा , जहां प्रगति मैदान के चप्पे चप्पे पर नरेंद्र मोदी और धर्मेन्द्र प्रधान के बड़े -बड़े होर्डिंग लगा दिए गए है। लगता है कि यह पुस्तक मेला न हो कर बीजेपी के सम्मेलन का स्थल है ।
भले ही इसे बड़े जोर शोर से प्रचारित किया जा रहा हो लेकिन असली पुस्तक
प्रेमियों के लिए निशुल्क प्रवेश व्यवधान ही होता है । इससे पहले भी एक बार निशुल्क प्रवेश किया गया तो बेशुमार भीड़ से व्यवस्थाएं चरमराई और किताबों से अधिक
खाने-पीने के स्टाल पर लोगों ने खर्चे किए।
शौचालय गंदे मिले तो सारे परिसर
में कूड़ा ही कूड़ा फैल गया । फिर लाल किले के पास हुए बम धमाके बाद दिल्ली पर बढ़
गई सुरक्षा कि चुनौतियाँ तो हैं ही । यह किसी से छुपा नहीं है कि भारत मंडपम के भीतर खाने-पीने के स्टाल भारी भरकम ठेके पर होते हैं , सो वहाँ के दाम भी आसमान पर
रहते हैं । बहुत से पुस्तक प्रेमियों का आकलन हैं कि निशुल्क होने से तफरीह करने
वालों की भीड़ बढ़ती है और इससे खाने -पीने
का समान बेचने वालों की चांदी होती हैं ।
यह एक विशुद्ध धोखा है , तीस रुपये
का टिकट हटा कर सौ रुपये एक चाय और पानी
कि बोतल पर लोगों की जेब से खींच लेना ।
यह समझना होगा कि किताबों को चाहने वालों के सामने आज असली समस्या
किताबों के बढ़ते दाम हैं – एक तो कागज की कीमत और ऊपर से कागज पर 12 प्रतिशत व मुद्रण पर 30 प्रतिशत जी
एस टी की मार । वैसे भी दुनिया के बड़े पुस्तक मेलों से तुलना करें तो नई दिल्ली
विश्व पुस्तक मेल भीड़ तो खींचता है लेकिन इसे अंतर्राष्ट्रीय कहे जाने वाले न तो
प्रकाशक होते हैं न ही लेखक ।
54 साल पहले 18
मार्च से 04 अप्रेल 1972 तक नई दिल्ली के
विंडसर पेलेस के मैदान में कोई 200 भागीदारों के साथ शुरू हुआ नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेला तब ‘वसंतोत्सव’ के रूप में शुरू हुआ था । वसंत के सुखद मौसम में , जब न ज्यादा ठंड , न
गर्मी, ज्ञान की देवी सरस्वती को समर्पित । तब दो साल में एक बार पुस्तक मेल लगता
था और देश-विदेश के प्रकाशक इसके लिए खासी तैयारी करते थे। सन 2016 में चीन अतिथि
देश के रूप में आमंत्रित किया गया था, चूंकि चीन में फरवरी के महीने में सालाना
जश्न होता है और वहाँ प्रायः सभी जगह
अवकाश होता है , सो उनके लिए वसंतोत्सव की परंपरा को तोड़ कर जनवरी में पुस्तक मेले
का आयोजन शुरू हुआ। हालांकि इस मौसम में
यातायात साधनों में विलंब और व्यवधान से बाहरी पुस्तक प्रेमियों को आने में दिक्कत होती
है लेकिन इस मौसम में आयोजकों का प्रगति मैदान को
वातानुकूलित तंत्र चलाने का खर्च काम हो जाता है , शायद इसी लिए जनवरी के
कड़ाके की ठंड में पुस्तक मेल जारी रहा । सन 2013 तक यह हर दो साल में लगता था , फिर यह सालाना जलसा हो गया ।
लेखकों, प्रकाशकों,
पाठकों को बड़ी
बेसब्री से इंतजार होता है नई दिल्ली विश्व पुस्तक
मेला का। हालांकि फेडरेशन आफ इंडियन पब्लिशर्स(एफआईपी) भी हर साल अगस्त में दिल्ली के प्रगति मैदान में ही पुस्तक मेला लगा रहा है और
इसमें लगभग सभी ख्यातिलब्ध प्रकाशक आते हैं, बावजूद इसके नेशनल बुक ट्रस्ट के पुस्तक मेले की मान्यता अधिक है। हमारे यहाँ केवल किताब खरीदने के लिए तो दर्जनों वेबसाईट उपलब्ध हैं जिस पर घर बैठे
आदेश दो और घर बैठे डिलेवरी लो, इसके बावजूद इसके बावजूद यहाँ 1200 से 1400 प्रतिभागी होते हैं और कई चाह कर भी हिस्सेदारी
नहीं कर पाते क्योंकि जगह नहीं होती या फिर यहाँ भागीदारी का खर्च बहुत अधिक होता
है, एक स्टाल लगाने का कम से कम एक लाख रुपये । असल में पुस्तक भी इंसानी प्यार की तरह होती है
जिससे जब तक बात ना करो, रूबरू ना हो, हाथ से स्पर्ष ना करो, अपनत्व का अहसास
देती नहीं हे। फिर तुलना के लिए एक ही स्थान पर एक साथ इनते सजीव उत्पाद मिलना एक
बेहतर विपणन विकल्प व मनोवृति भी है।
यह बात भी तेजी से
चर्चा में है कि इस पुस्तक मेले में विदेशी भागीदारी
लगभग ना के बराबर होती जा रही है। यदि श्रीलंका और नेपाल को छोड़ दें तो विश्व बैंक, संयुक्त राष्ट्र श्रम संगठन, स्वास्थ्य, यूनीसेफ आदि के स्टाल विदेशी मंडप में अपनी प्रचार सामग्री प्रदर्शित करते दिखते
हैं। फेंकफ़र्ट और अबुधाबी पुस्तक मेला के
स्टाल भागीदारों को आकर्षित करने के लिए होते हैं। दो-तीन देश के भारत दूतावास
किताबें प्रदर्शित कर देते हैं । इक्का-दुक्का स्टालों पर विदेशी पुस्तकों के नाम पर केवल ‘रिमेंडर्स’ यानी अन्य देशों
की फालतू या पुरानी पुस्तकें होती हैं। ऐसी पुस्तकों को प्रत्येक रविवार को
दरियागंज में लगने वाले पटरी-बाजार से आसानी से खरीदा जा सकता है। पहले पाकिस्तान
से दस प्रकाशक आते थे लेकिन बीते 15 सालों से पाकिस्तान के साथ बाकी तिजारत तो
जारी है लेकिन एक दूसरे के पुस्तक मेलों
में भागीदारी बंद हो गई। हर बार किसी देश को
“ विशेष अतिथि देश “ का सम्मान दिया
जाता है , वहाँ से लेखक, कलाकार भी आते हैं लेकिन उनके आयोजनों में बीस लोग भी
नहीं होते। एक तो उनका प्रचार कम होता है , फिर प्रगति मैदान में घूमना और किसी
सेमीनार में भी बैठना किसी के लिए शायद ही संभव हो। हालांकि विदेशी तो बहुत दूर है
, हमारे मेले में संविधान में अधिसूचित सभी 22 भारतीय भाषाओं के प्रकाशक भी नहीं
होते। पहले राज्यों के प्रकाशक संघों को निशुल्क स्टाल और आवास की व्यवस्था की
जाती थी तो ढेर सारे भाषाई प्रकाशक यहाँ आते थे, जो अब बंद कर दिया गया । यहाँ अब
अधिकांश वे विक्रेता होते हैं जो हर हफ्ते दरियागंज के पटरी बाजार में किताबें
सजाए रहते हैं । यह किसी भी स्तर पर विश्व स्तरीय आयोजन तो लगता नहीं ।
नई दिल्ली पुस्तक
मेला की छवि पर एक दाग वहाँ हर हाल
में बजने वाले प्रवचन और हल्ला-गुल है । बाबा-बैरागियों और कई तरह के
धार्मिक संस्थाओं के स्टालों में हो रही अप्रत्याशित बढ़ौतरी भी गंभीर पुस्तक
प्रेमियों के लिए चिंता का विषय है। इन स्टालों पर कथित संतों के
प्रवचनों की पुस्तकें, आडियों कैसेट व सीडी बिकती हैं। कुरान शरीफ और बाईबिल से जुड़ी
संस्थाएं भी अपने प्रचार-प्रसार के लिए विश्व पुस्तक मेला का सहारा लेने लगी हैं। बीते कुछ सालों
से हर बार वहाँ कुछ संगठन उधम करते हैं और सारा साहित्यिक जगत सांप्रदायिक विवाद
में धूमिल हो जाता है । समझना होगा कि किताबें लोकतंत्र की तरह हैं – आपको अपनी
पसंद का विषय, लेखक, भाषा चुनने का हक देती हैं । यह मेला ही है तो है जहां गांधी-
और सावरकर, चे-गोवएरा और भागवत गीता साथ- साथ रहते हैं और पाठक निर्णय लेता है कि
वह किसे पसंद करे। या तो इस तरह के धार्मिक स्टालस को लगाने ही नहीं देना चाहिए या
फिर उन्हे किसी एक जगह एक साथ कर देना चाहिए ।
पुस्तक मेला के
दौरान बगैर किसी गंभीर योजना के सेमिनारों, पुस्तक लोकार्पण आयोजनों का
भी अंबार होता है। कई बार तो ऐसे
कार्यक्रमों में वक्ता कम और श्रोता अधिक होते है। यह बात भी अब किसी से छिपी नहीं
है कि अब एक ही तरह की विचारधारा के लोगों को आयोजक द्वारा निर्धारित “लेखक मंच” में समय दिया
जाता है । पिछले सालों में कठुआ में नाबालिग बाछी के बलात्कार और हत्या को जायज
ठहराने वाले सेमीनार तक होते रही । असल में यह स्थान भागीदार प्रकाशकों के लिए बना
था कि वे अपने स्टाल पर लोकार्पण आदि न करें
और इससे वहाँ भीड़ न जमा हो । लेकिन
लेखक मंच राजनीतिक मंच बन गया और प्रकाशक यथावत अपने स्टाल पर आयोजन करते
हैं । बाल मंडप में भी बच्चे स्कूल्स से बुलाए जाते हैं जबकि यह स्थान इस तरह का होना चाहिए कि मेले में आए बच्चे स्वतः यहाँ
कि गतिविधियों में शामिल हों। आबूधाबी पुस्तक मेले में ऐसी ही गतिविधियाँ सारे दिन
चलती हैं ।
पुस्तक मेला के
दौरान प्रकाशकों, धार्मिक संतों, विभिन्न संस्थाओं द्वारा
वितरित की जाने वाली निशुल्क सामग्री भी एक आफत है। पूरा प्रगति मैदान रद्दी से
पटा दिखता है। कुछ सौ लोग तो हर रोज ऐसा ‘‘कचरा’’ एकत्र कर बेचने के लिए ही पुस्तक
मेला को याद करते हैं। छुट्टी के दिन मध्यवर्गीय परिवारों का समय काटने का स्थान, मुहल्ले व समाज में
अपनी बौद्धिक ताबेदारी सिद्ध करने का अवसर और बच्चों को छुट्टी काटने का नया
डेस्टीनेशन भी होता है-
पुस्तक मेला। यह बात दीगर है कि इस दौरान प्रगति मैदान के खाने-पीने के स्टालों पर
पुस्तक की दुकानों से अधिक बिक्री होती है।
पार्किंग , मैदान के भीतर खाने-पीने की चीजों के बेतहाशा दाम, हाल के भीतर
मोबाईल का नेटवर्क कमजोर होने , भीड़ के आने और जाने के रास्ते एक ही होने जैसी कई
ऐसी दुविधाएं हैं जिनसे यदि निजात पा ले तो सही मायने में नई दिल्ली विश्व पुस्तक
मेल “विश्व” स्तर का होगा । पाठक को प्रवेश शुल्क से कोई परहेज नहीं बस किताबें
उसकी सीमा में हों !