तालाब की बातें

तालाब की बातें
जल है तो जीवन है

गुरुवार, 1 मई 2014

exploitation of farmers


भरमार से बंटाधार

बस्तर में नक्सलियों और सुरक्षा बलों दोनो की बंदूकों ने आम लोगों का जीना दूभर कर दिया है, ऊपर से किसान इस बात से आहत है कि इस साल उसके खेत में मिर्च की केष क्राप बंपर हुई। हां, वह अब दुखी है कि इतनी अच्छी फसल हुई ही क्यों?  रू. 15 से 20 प्रति किलो वाली हरी मिर्च के दाम पांच-छह रूपण् भी नहीं मिल रहे हैं। हालात यह है कि अब तुड़ाई व परिवहन की कीमत भी नहीं मिल रही है। याद करे कुछ महीनों पहले बाजार में प्याज की कमी इन दिनों समाज से ज्यादा सियासत, लेखन का मसला बन गया था। जब-तब ऐसी दिक्कतें खड़ी होती हैं निर्यात पर रोक, आयात पर जोर, सरकार और विरोधी दलों द्वारा कम कीमत पर स्टाॅल लागने जैसे तदर्थ प्रयोग होते रहते हैं । इस बात को बेहद षातिर तरीके से छुपाया जाता है कि खेतों मेे पैदा होने वाली उपज की बाजार में कमी की असली वजह उचित भंडारण, बिचैलियों की अफरात और प्रसंस्करण उद्योगों की आंचलिक क्षेत्रों में गैर मौजूदगी है। अभी जब लोग प्याज की राखी बंध रहे हैं तब प्याज के साथ चोली-दामन का साथ निभाने वाले दो उत्पाद - लहसुन और आलू के दाम मंडी में इतने कम है कि किसान उन्हें ऐसे ही फैंक रहा है। उ.प्र के इटावा इलाके में कुछ दिनों पहले तक बीस हजार रूपए कुंटल बिकने वाला लहसुन हजार रूपए से नीचे आ गया है। ठीक यही हाल आलू का है। जिन किसानों ने बैंक से कर्ज ले कर उम्मीदों की फसल बोई थी, वह अब हताषा में बदल चुकी है। इसी साल जनवरी-फरवरी में मध्यप्रदेष के मालवा अंचल की पेटलावद इलाके में इस बार कोई पच्चीस सौ हैक्टेयर में टमाटर बोये गए थे, फसल भी बंपर हुई लेकिन जब किसान माल ले कर मंडी पहंुचा तो पया कि वहां मिल रहे दाम से तो उसकी लागत भी नहीं निकलेगी।  हालत यह रहे कि कई सौ एकड़ में पके टमाटरों को किसान तुड़वाया भी नहीं ।
राज एक्सप्रेस भोपाल ०३ मई २०१४ http://epaper.rajexpress.in/epapermain.aspx

अब कहा जा रहा है कि उत्तर प्रदेष में आलू की इतनी अधिक पैदावार हो गई है कि बामुष्किल तीन सौ रूपए कुंटल का रेट किसान को मिल पा रहा है। राज्य के सभी कोल्ड स्टोरेज ठसा-ठस भर गए हैं। जाहिर है कि आने वाले दिनों में आलू मिट्टी के मोल मिलेगा।यह पहली बार नहीं हुआ है कि जब किसान की हताषा आम आदमी पर भारी पड़ी है। पूरे देष की खेती-किसानी अनियोजित ,षोशण की षिकार व किसान विरोधी है। तभी हर साल देष के कई हिस्सों में अफरात फसल को सड़क पर फैंकने और कुछ ही महीनों बाद उसी फसल की त्राहि-त्राहि होने की घटनाएं होती रहती हैं। किसान मेहनत कर सकता है, अच्छी फसल दे सकता है, लेकिन सरकार में बैठे लोगों को भी उसके परिश्रम के माकूल दाम , अधिक माल के सुरक्षित भंडारण के बारे में सोचना चाहिए। षायद इस छोटी सी जरूरत को मुनाफाखोरों और बिचैलियों के हितों के लिए दरकिनार किया जाता है। तभी रिटेल में विदेषी निवेष की योजना में  सब्जी-फलों के संरक्षण के लिए ज्यादा जगह बनाने का उल्लेख किसानों को  लुभावना लग रहा है।
भारत के सकल घरेलू उत्पाद का 31.8 प्रतिशत खेती-बाड़ी में तल्लीन कोई 64 फीसदी लोगों के पसीने से पैदा होता है । यह विडंबना ही है कि देश की अर्थ व्यवस्था की रीढ़ कहलाने वाली खेती के विकास के नाम पर बुनियादी सामाजिक सुधारों को लगातार नजरअंदाज किया जाता रहा है । पूरी तरह प्रकृति की कृपा पर निर्भर किसान के श्रम की सुरक्षा पर कभी गंभीरता से सोचा ही नहीं गया । फसल बीमा की कई योजनाएं बनीं, उनका प्रचार हुआ, पर हकीकत में किसान यथावत ठगा जाता रहा- कभी नकली दवा या खाद के फेर में तो कभी मौसम के हाथों । किसान जब ‘‘केष क्राप’’ यानी फल-सब्जी आदि की ओर जाता है तो आढ़तियों और बिचैलियों के हाथों उसे लुटना पड़ता है। पिछले साल उत्तर प्रदेष में 88 लाख मीट्रिक टन आलू हुआ था तो आधे साल में ही मध्यभारत में आलू के दाम बढ़ गए थे। इस बार किसानों ने उत्पादन बढ़ा दिया, अनुमान है कि इस बार 125 मीट्रिक टन आलू पैदा हो गया है। कोल्ड स्टोरेज की क्षमता बामुष्किल 97 लाख मीट्रिक टन की है। जाहिर है कि आलू या तो सस्ते- मंदे दामों में बिकेगा या फिर फिर किसान उसे खेत में ही सड़ा देगा- आखिर आलू उखाड़ने, मंडी तक ले जाने के दाम भी तो निकलने चाहिए।
हर दूसरे-तीसरे साल कर्नाटक कंे कई जिलों के किसान अपने तीखे स्वाद के लिए मषहूर हरी मिर्चों को सड़क पर लावारिस फैंक कर अपनी हताषा का प्रदर्षन करते हैंे। तीन महीने तक दिन-रात खेत में खटने के बाद लहलहाती फसल को देख कर उपजी खुषी किसान के ओठों पर ज्यादा देर ना रह पाती है। बाजार में मिर्ची की इतनी अधिक आवक होती है कि खरीदार ही नहीं होते। उम्मीद से अधिक हुई फसल सुनहरे कल की उम्मीदों पर पानी फेर देती है- घर की नई छप्पर, बहन की षादी, माता-पिता की तीर्थ-यात्रा; ना जाने ऐसे कितने ही सपने वे किसान सड़क पर मिर्चियों के साथ फैंक आते हैं। साथ होती है तो केवल एक चिंता-- मिर्ची की खेती के लिए बीज,खाद के लिए लिए गए कर्जे को कैसे उतारा जाए? सियासतदां हजारेंा किसानों की इस बर्बादी से बेखबर हैं, दुख की बात यह नहीं है कि वे बेखबर हैं, विडंबना यह है कि कर्नाटक में ऐसा लगभग हर साल किसी ना किसी फसल के साथ होता है। सरकारी और निजी कंपनियां सपने दिखा कर ज्यादा फसल देने वाले बीजों को बेचती हैं, जब फसल बेहतरीन होती है तो दाम इतने कम मिलते हैं कि लागत भी ना निकले।
देष के अलग-अलग हिस्सों में कभी टमाटर तो कभी अंगूर, कभी मूंगफली तो कभी गोभी किसानों को ऐसे ही हताष करती है। राजस्थान के सिरोही जिले में जब टमाटर मारा-मारा घूमता है तभी वहां से कुछ किलोमीटर दूर गुजरात में लाल टमाटर के दाम ग्राहकों को लाल किए रहते हैं। दिल्ली से सटे पष्चिमी उत्तर प्रदेष के कई जिलों में आए साल आलू की टनों फसल बगैर उखाड़े, मवेषियों को चराने की घटनाएं सुनाई देती हैं। आष्चर्य इस बात का होता है कि जब हताष किसान अपने ही हाथों अपनी मेहनत को चैपट करता होता है, ऐसे में गाजियाबाद, नोएडा, या दिल्ली में आलू के दाम पहले की ही तरह तने दिखते हैं। राजस्थान, मध्यप्रदेष, महाराश्ट्र, और उप्र के कोई दर्जनभर जिलों में गन्ने की खड़ी फसल जलाने की घटनांए हर दूसरे-तीसरे साल होती रहती है। जब गन्ने की पैदावार उम्दा होती है तो तब षुगर मिलें या तो गन्ना खरीद पर रोक लगा देती हैं या फिर दाम बहुत नीचा देती हैं, वह भी उधारी पर। ऐसे में गन्ना काट कर खरीदी केंद्र तक ढो कर ले जाना, फिर घूस दे कर पर्चा बनवाना और उसके बाद भुगतान के लिए दो-तीन साल चक्कर लगाना; किसान को घाटे का सौदा दिखता है। अतः वह खड़ी फसल जला कर अपने अरमानों की दुनिया खुद ही फूंक लेता है। आज उसी गन्ने की कमी के कारण देष में चीनी के दाम आम लोगों के मुंह का स्वाद कड़वा कर रहे हैं।
कृशि प्रधान अर्थव्यवस्था वाले देष में कृशि उत्पाद के न्यूनतम मूल्य, उत्पाद खरीदी, बिचैलियों की भूमिका, किसान को भंडारण का हक, फसल-प्रबंधन जैसे मुद्दे, गौण दिखते हैं और यह हमारे लोकतंत्र की आम आदमी के प्रति संवेदनहीनता की प्रमाण है। सब्जी, फल और दूसरी कैष-क्राप को बगैर सोचे-समझे प्रोत्साहित करने के दुश्परिणाम दाल, तेल-बीजों(तिलहनों) और अन्य खाद्य पदार्थों के उत्पादन में संकट की सीमा तक कमी के रूप में सामने आ रहे हैं। आज जरूरत है कि खेतों में कौन सी फॅसल और कितनी उगाई जाए, पैदा फसल का एक-एक कतरा श्रम का सही मूल्यांकन करे; इसकी नीतियां तालुका या जनपद स्तर पर ही बनें। कोल्ड स्टोरेज या वेअर हाउस पर किसान का कब्जा हो, साथ ही प्रसंस्करण के कारखाने छोटी-छोटी जगहों पर लगें। यदि किसान रूठ गया तो ध्यान रहे, कारें तो विदेष से मंगवाई जा सकती हैं, एक अरब की आबादी का पेट भरना संभव नहीं होगा।

पंकज चतुवैदी
साहिबाबाद, गाजियाबाद
201005
9891928376

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