तालाब की बातें

तालाब की बातें
जल है तो जीवन है

शुक्रवार, 8 अगस्त 2014

unplanned cities become pond in rainy days

पिछले कुछ सालों में जब से शहरीकरण बढा है, थाडी सी बारशि होने पर ही विकसित कहे जाने वाले शहर दरिया बन जाते हैं, इसका मुख्‍य कारण शहरों का अनियोजित विकास व वहां मास्‍टर प्‍लान का पालन ठीक से ना होना है , जयपुर से प्रकाशित 'डेली न्‍यूज' के संपादकीय पेज पर मेरा आलेख इसी वि षय पर है, इसे इस लिंक http://dailynewsnetwork.epapr.in/c/3291892?show=printया मेरे ब्‍लाग pankajbooks.blogspot.inपर पढ सकते हैं

क्यों  आ रही है शहरों में बाढ़
 पंकज चतुर्वेदी

बड़ी मन्नतों के बाद राजधानी दिल्ली में कुछ पानी बरसना षुरू हुआ। कोई देा घंटे की झड़ी लगी और दिल्ली दरिया बन गया। अकेले दिल्ली ही नहीं उसके आसपास के दोसौ किलोमीटर के सभी षहर-कस्बे गाजियाबाद, गुडगांव, नोएडा, बहादुरगढ़, फरीदाबाद लगभग जलमग्न थे। क्या सड़कें, क्या काॅलोनी हर जगह घुटने-घुटने पानी भर गया। सड़कों पर कई-कई किलोमीटर लंबा जाम हो गया। मुंबई में तो यह अब आम बात है कि बारिष का मतलब सडक पर दरिया व जाम।  सबसे उन्नत षहर कहे जानेवाले अहमदाबाद में आठ घंटे की बारिष के चलते  पूरा महानगर ही जलमग्न हो गया, विषेशरूप से अंडरपास व फ्लाई ओवर तो षहर को थामने का कारक बन गए। बंगलूरू मुजफ्फरनगर चंडीगढ़, देष के जिन उभरते नगरों पर नजर डालें एक बारिष में ही कराह रहे है।।यह क्या गरमी से निजात के आनंद की कल्पना करने वाले सड़कों पर जगह-जगह पानी भरने से ऐसे दो-चार हुए कि अब बारिष के नाम से ही डर रहे हैं।
यह हालत कमोबेष देष के हर षहर का थोड़ी सी बरसात के बाद ऐसा ही होता है - सड़कांे पर पानी के साथ वाहनों का सैलाब और दिन बीतते-बीतते पानी के लिए त्राहि-त्राहि करती जनता। कोलकता को तो पहली बारिष ने दरिया बना दिया है। पिछले कुछ सालों में देखा गया कि हरियाणा, पंजाब के कई तेजी से उभरते षहर- अंबाला, हिसार, कुरूक्षेत्र, लुधियाना आदि एक रात की बारिष में तैरने लगत हैंे । रेल, बसें सभी कुछ बंद! बडोदा, सूरत के हालत भी ठीक नहीें थे । जयपुर के चैडे चैडे रास्ते और बगीचों में बाढ़ आ जाना सामान्य बात है। पटना में गंगा तो नहीं उफनी पर शहर के वीआईपी इलाके घुटने-घुटने पानी में तर रहे । कोई भी षहर का नाम लें, कुछ ना कुछ ऐसे ही हालात देखने-सुनने को मिल ही जाते हैं।
विडंबना है कि शहर नियोजन के लिए गठित लंबे-चैडे़ सरकारी अमले पानी के बहाव में शहरों के ठहरने पर खुद को असहाय पाते हैं । सारा दोष नालों की सफाई ना होने ,बढ़ती आबादी, घटते संसाधनों और पर्यावरण से छेड़छाड़ पर थोप देते हैं । वैसे इस बात की जवाब कोई नहीं दे पाता है कि नालों की सफाई सालभर क्यों नहीं होती और इसके लिए मई-जून का इंतजार क्यों होता है । इसके हल के सपने, नेताओं के वादे और पीडि़त जनता की जिंदगी नए सिरे से शुरू करने की हड़बड़ाहट सब कुछ भुला देती है । यह सभी जानते हैं कि दिल्ली में बने ढेर सारे पुलों के निचले सिरे, अंडरपास और सबवे हलकी सी बरसात में जलभराव के स्थाई स्थल हैं,लेकिन कभी कोई यह जानने का प्रयास नहीं कर रहा है कि आखिर निर्माण की डिजाईन में कोई कमी है या फिर उसके रखरखाव में ।
हमारे देश में संस्कृति, मानवता और बसावट का विकास नदियों के किनारे ही हुआ है । सदियों से नदियों की अविरल धारा और उसके तट पर मानव-जीनव फलता-फूलता रहा है । बीते कुछ दशकों में विकास की ऐसी धारा बही कि नदी की धारा आबादी के बीच आ गई और आबादी की धारा को जहां जगह मिली वह बस गई । और यही कारण है कि हर साल कस्बे नगर बन रहे हैं और नगर महानगर । बेहतर रोजगार, आधुनिक जनसुविधाएं और, उज्जवल भविष्य की लालसा में अपने पुश्तैनी घर-बार छोड़ कर शहर की चकाचांैंध की ओर पलायन करने की बढ़ती प्रवृति का परिणाम है कि देश में षहरों में और षहरों की आबादी बढ़ती जा रही है।
दिल्ली, कोलकाता, पटना जैसे महानगरों में जल निकासी की माकूल व्यवस्था न होना शहर में जल भराव का स्थाई कारण कहा जाता है । मुंबई में मीठी नदी के उथले होने और सीवर की 50 साल पुरानी सीवर व्यवस्था के जर्जर होने के कारण बाढ़ के हालात बनना सरकारें स्वीकार करती रही है। बंगलौर में पारंपरिक तालाबों के मूल स्वरूप में अवांछित छेड़छाड़ को बाढ़ का कारक माना जाता है । शहरों में बाढ़ रोकने के लिए सबसे पहला काम तो वहां के पारंपरिक जल स्त्रोतों में पानी की आवक और निकासी के पुराने रास्तों में बन गए स्थाई निर्माणों को हटाने का करना होगा । यदि किसी पहाड़ी से पानी नीचे बह कर आ रहा है तो उसका संकलन किसी तालाब में ही होगा । विडंबना है कि ऐसे जोहड़-तालाब कंक्रीट की नदियों में खो गए हैं । परिणामतः थोड़ी ही बारिश में पानी कहीं बहने को बहकने लगता है ।
महानगरों में भूमिगत सीवर जल भराव का सबसे बड़ा कारण हैं । जब हम भूमिगत सीवर के लायक संस्कार नहीं सीख पा रहे हैं तो फिर खुले नालों से अपना काम क्यों नहीं चला पा रहे हैं ? पोलीथीन, घर से निकलने वाले रसायन और नष्ट न होने वाले कचरे की बढ़ती मात्रा, कुछ ऐसे कारण हैं, जोकि गहरे सीवरों के दुश्मन हैं । महानगरों में सीवरों और नालों की सफाई भ्रष्टाचार का बड़ा माध्यम है । यह कार्य किसी जिम्मेदार एजेंसी को सौंपना आवश्यक है, वरना आने वाले दिनों में महानगरों में कई-कई दिनों तक पानी भरने की समस्या उपजेगी, जो यातायात के साथ-साथ स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा होगा ।
नदियों या समु्रद के किनारे बसे नगरों में तटीय क्षेत्रों में निर्माण कार्य पर पांबदी की सीमा का कड़ाई से पालन करना समय की मांग है । तटीय क्षेत्रों में अंधाधुंध निर्माण जल बहाव के मार्ग में बाधा होते हैं, जिससे बाढ़ की स्थिति बन जाती है । सीआरजेड कानून में तटों पर निर्माण, गंदगी आदि पर कड़े प्रावधान हैं, लेकिन सरकार अमले कभी भी इन पर क्रियान्वयन की सोचते तक नहीं हैं ।
विभिन्न नदियों पर बांधे जा रहे बड़े बांधों के बारे में नए सिरे से विचार करना जरूरी है । गत वर्श सूरत में आई बाढ़ हो या फिर उससे पिछले साल सूखाग्रस्त बुंदेलखंड के कई जिलों का जलप्लावन, यह स्पष्ट होता है कि कुछ अधिक बारिश होने पर बांधों में क्षमता से अधिक पानी भर जाता है । ऐसे में बांधेंा का पानी दरवाजे खोल कर छोड़ना पड़़ता है । अचानक छोड़े गए इस पानी से नदी का संतुलन गड़बड़ाता है और वह बस्ती की ओर दौड़ पड़ती है । सनद रहे ठीक यही हाल दिल्ली में भी यमुना के साथ होता है । हरियाणा के बांधों में पानी अधिक होने पर जैसे ही पानी छोड़ा जाता है राजधानी के पुश्तों के पास बनी बस्तियां जलमग्न हो जाती हैं । बांध बनाते समय उसकी अधिकतम क्षमता, अतिरिक्त पानी आने पर उसके अनयंत्र भंडारण के प्रावधान रखना शहरों को बाढ़ के खतरे से बचा सकता है ।
महानगरों में बाढ़ का मतलब है परिवहन और लोगों का आवागमन ठप होना। इस जाम के ईंधन की बर्बादी, प्रदूशण स्तर में वृद्धि और मानवीय स्वभाव में उग्रता जैसे कई दीघ्रगामी दुश्परिणाम होते हैं। इसका स्थाई निदान तलाषने के विपरीत जब कहीं शहरों में बाढ़ आती है तो सरकार का पहला और अंतिम कदम राहत कार्य लगाना होता है, जोकि तात्कालिक सहानुभूतिदायक तो होता है, लेकिन बाढ़ के कारणों पर स्थाई रूप से रोक लगाने में अक्षम होता है । जल भराव और बाढ़ मानवजन्य समस्याएं हैं और इसका निदान दूरगामी योजनाओं से संभव है ; यह बात शहरी नियोजनकर्ताओं को भलींभांति जान लेना चाहिए और इसी सिद्धांत पर भविष्य की योजनाएं बनाना चाहिए ।

पंकज चतुर्वेदी
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