तालाब की बातें

तालाब की बातें
जल है तो जीवन है

सोमवार, 13 अक्तूबर 2014

WE HAVE BEEN ENHANCING GARBAGE

जीवन का यह कूड़ा तो हमने ही बढ़ाया है
पंकज चतुर्वेदी, वरिष्ठ पत्रकार


DAINIK HINDUSTAN 14-10-2014
http://paper.hindustantimes.com/epaper/viewer.aspx
भले ही हम कूड़े को अपने पास फटकने नहीं देना चाहते हों, लेकिन विडंबना है कि यह कूड़ा हमारी गलतियों या बदलती आदतों के कारण ही दिन-दोगुना, रात-चौगुना बढ़ रहा है। नेशनल एनवॉयर्नमेंट इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट, नागपुर के मुताबिक, देश में हर साल 44 लाख टन खतरनाक कचरा निकल रहा है। हमारे देश में औसतन प्रति व्यक्ति 20 से 60 ग्राम कचरा हर दिन पैदा करता है। इनमें से आधे से अधिक तो कागज, लकड़ी वगैरह होते हैं, जबकि 22 फीसदी कूड़ा-कबाड़ा घरेलू गंदगी होती है। इस कचरे का निपटान पूरे देश के लिए समस्या बनता जा रहा है।
दिल्ली नगर निगम कई-कई सौ किलोमीटर दूर दूसरे राज्यों में कचरे का डंपिंग ग्राउंड तलाश रहा है। जरा सोचें कि इतने कचरे को एकत्र करना, फिर उसे दूर तक ढोकर ले जाना कितना महंगा और जटिल काम है। यह सरकार भी मानती है कि देश के कुल कूड़े का महज पांच प्रतिशत का ईमानदारी से निपटान हो पाता है। राजधानी दिल्ली का तो 57 फीसदी कूड़ा परोक्ष-अपरोक्ष रूप से यमुना में बहा दिया जाता है। कागज, प्लास्टिक, धातु जैसा बहुत-सा कूड़ा तो कचरा बीनने वाले जमा करके रिसाइकिलिंग वालों को बेच देते हैं। सब्जी के छिलके, खाने-पीने की चीजें, मरे हुए जानवर आदि कुछ समय में सड़-गल जाते हैं। इसके बावजूद ऐसा बहुत कुछ बच जाता है, जो हमारे लिए बड़े संकट का रूप लेता जा रहा है।
कचरे को बढ़ाने का काम समाज ने ही किया है। अभी कुछ साल पहले तक स्याही वाला फाउंटेन पेन होता था, फिर ऐसे बॉल-पेन आए, जिनकी केवल रीफिल बदलती थी। आज बाजार में ऐसे पेनों का बोलबाला है, जो खतम होने पर फेंक दिए जाते हैं। बढ़ती साक्षरता के साथ ऐसे पेनों का इस्तेमाल और उसका कचरा बढ़ रहा है। तीन दशक पहले एक व्यक्ति साल भर में बमुश्किल एक पेन खरीदता था और आज औसतन हर साल एक दर्जन पेनों की प्लास्टिक प्रति व्यक्ति खपत है। बाजार से शेविंग किट, दूध और पानी की खरीद तक में यह कूड़ा बढ़ रहा है। अनुमान है कि पूरे देश में हर रोज चार करोड़ दूध की थैलियां व दो करोड़ पानी की बोतलें कूड़े में फेंकी जाती हैं। फेंकी गई पॉलीथिन की थैलियों की मात्रा का तो अनुमान ही मुश्किल है। इन्होंने हर इलाके को कूड़ेघर में बदल दिया है।
लेकिन सबसे खतरनाक कूड़ा तो बैटरियों, कंप्यूटरों, मोबाइलों का है। इनमें पारा, कोबाल्ट और न जाने कितने किस्म के जहरीले तत्व होते हैं। एक अलग तरह का बड़ा खतरा मेडिकल कचरे का है। इसमें से अधिकांश सामग्रियां गलती-सड़ती नहीं हैं और जमीन में जज्ब होकर मिट्टी की गुणवत्ता को प्रभावित करने और भूगर्भ जल को जहरीला बनाने का काम करती हैं। ठीक इसी तरह का जहर बैटरियों व बेकार मोबाइल से भी उपज रहा है। जब तक हम इस कचरे के निपटान की पक्की व्यवस्था नहीं करते, कोई भी सफाई अभियान अधूरा रहेगा।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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