तालाब की बातें

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जल है तो जीवन है

शुक्रवार, 13 मार्च 2015

Agriculture land must be matter of faith

खेत को आस्था का विषय बनाएं

                                                                पंकज चतुर्वेदी
तमिलनाडु से श्रीलंका की दूरी कम कर सालाना हजारों करोड़ की बचत करने वाले सेतुसमुद्रम प्रोजेक्ट की घेाषण 10 साल पहले हुई थी। हालांकि वैज्ञानिकों की इस बात से सहमति नहीं है कि यह रामायण में उल्लिखित नल-नील द्वारा निर्मित वह पुल है जिसे पारकर रामचंद्रजी रावण को हराने लंका गए थे । चूंकि  मामला आस्था का है सो किसी ने परवाह नहीं की कि इस परियोजना के लटकने से हर साल पांच हजार करोड़ से अधिक का संभावित लाभ थम गया है। लेकिन विकास के
देश की अर्थ व्यवस्था का मूल आधार कृषि है । आंकड़े भी यही कुछ कहते हैं। देश की 67 फीसदी आबादी और काम करने वालों का 55 प्रतिषत परोक्ष-अपरोक्ष रूप से खेती से जुड़ा हुआ है। एक अनुमान है कि चालू वित्त वर्ष में पिछले साल की तुलना में कोई तीन प्रतिशत कम, लगभग 85 लाख टन अनाज कम पैदा होगा। पिछले दो दशक के दौरन तीन लाख से ज्यादा किसान इस लिए खुदकुशी कर चुके है क्योंकि देश का पेट भरने के चक्कर में उन पर कर्जा चए़ गया या फिर मौसम दगा दे गया या फिर मेहनत की फसल जब ले कर मंडी गया तो वाजिब दाम नहीं मिला।
इस बीच मकान, कारखानों, सड़कों के लिए जिन जमीनों का अधिग्रहण किया जा रहा है वे अधिकांश अन्नपूर्णा रही हैं। इस बात को भी नजरअंदाज किया जा रहा है कि कम होते खेत एक बार तो मुआवजा मिलने से प्रति व्यक्ति आय का आंकड़ा बढ़ा देते हैं, लेकिन उसके बाद बेरोजगारों की भीड़ में भी इजाफा करते हैं। यही नहीं मनरेगा भी खेत विरेाधी है। नरेगा में काम बढ़ने से खेतों में काम करने वाले मजदूर नहीं मिल रहे है और  मजदूर ना मिलने से हैरान-परेशान किसान खेत को तिलांजली दे रहे हैं। गंभीरता से देखें तो इस साजिश के पीछे कतिपय वित्त संस्थाएं हैं जोकि ग्रामीण भारत में अपना बाजार तलाश रही हैं । खेती की बढ़ती लागत को पूरा करने के लिए कर्जे का बाजार खोल दिया गया है और सरकार इसे किसानों के प्रति कल्याणकारी कदम के रूप में प्रचारित कर रही है ।
हकीकत में किसान कर्ज से बेहाल है । नेशनल सैंपल सर्वें के आंकड़े बताते हैं कि आंध्रप्रदेश के 82 फीसदी किसान कर्ज से दबे हैं । पंजाब और महाराष्‍ट्र जैसे कृषि प्रधान राज्यों में यह आंकड़ा औसतन 65 प्रतिषत है । यह भी तथ्य है कि इन राज्यों में ही किसानों की खुदकुषी की सबसे अधिक घटनाएं प्रकाश में आई हैं । यह आंकड़े जाहिर करते हंै कि कर्ज किसान की चिंता का निराकरण नहीं हैं ।  परेशान किसान खेती से मुंह मोड़ता है, फिर उसकी जमीन को जमीन के व्यापारी खरीद लेते हैं।। मामला केवल इतना सा नहीं है, इसका दूरगामी परिणाम होगा अन्न पर हमारी आत्मनिर्भरता समाप्त होना तथा, जमीन-विहीन बेराजगारों की संख्या बढ़ना।
किसान को सम्मान चाहिए और यह दर्जा चाहिए कि देश के चहुंमुखी विकास में वह महत्वपूर्ण अंग है।
किसान भारत का स्वाभिमान है और देष के सामाजिक व आर्थिक ताने-बाने का महत्वपूर्ण जोड़ भी इसके बावजूद उसका शोषण हर स्तर पर है। किसान को उसके उत्पाद का सही मूल्य मिले, उसे भंडारण, विपणन की माकूल सुविधा मिले, खेती का खर्च कम हो व इस व्यवसाय में पूंजीपतियों के प्रवेष पर प्रतिबंध -जैसे कदम देश का पेट भरने वाले किसानों का पेट भर सकते हैं । चीन में खेती की विकास की सालाना दर 7 से 9 प्रतिशत है ,जबकि भारत में यह गत 20 सालों से दो को पार नहीं कर पाई है। अब तो विकास के नाम पर खेत उजाड़ने के खिलाफ पूरे देश में हिंसक आंदोलन भी हो रहे हैं। यह वक्त है कि हम खेती का रकबा बढ़ाने पर काम करें, इसे लिए जरूरी है कि उत्पादक जमीन पर हर तरह के निर्माण पर पाबंदी हो।  किसान को फसल के सुनिश्चित दाम, उसके परिवार के लिए शिक्षा व  स्वास्थय की गारंटी हो और खेत व खेती को पावन कार्य घोषित किया जाए।


डेली न्‍यूज, जयपुर 14ञ3ञ15
लिए सड़क, औद्योगिक क्षेत्र, बांध, पुल बनाने जैसे कामों के लिए लहलहाती फसल वाले खेत को अधिसूचना जारी कर कब्जा करने पर ना तो किसी की श्रद्धा आहत हो रही है और ना ही संवेदना। केंद्र सरकार के भूमि अधिग्रहण संशोधन पर घमासान मचा है, लेकिन सभी उचित मुआवजे व जमीन पर कब्जे की शर्तों पर उलझें हैं, जबकि होना तो यह चाहिए कि फसल देने वाली किसी भी जमीन का भू-उपयोग बदलने  या खेत को उजाड़ने पर ही पूरी तरह पाबंदी लगना चाहिए। खेत , किसान, फसल हमारे  लोक व सामाजिक जीवन में कई पर्व, त्योहार, उत्सव का केंद्र हैं, लेकिन विडंबना है कि किसान के लिए खेती घाटे का सौदा बन गई है।  अब जमीन की कीमत देकर खेत उजाड़ने की गहरी साजिश को हम समझ नहीं पा रहे हैं। यह जान लें कि कार, भवन, जैसे उत्पादों की तरह पेट भरने के लिए अनिवार्य अन्न किसी कारखाने में नहीं उगाया जा सकता है और जब तक खेत है तभी तक हम खाद्यान के मामले में आत्मनिर्भर हैं । एक तरफ देष की आबादी बढ़ रही है, लोगों की आय बढ़ने से भोजन की मात्रा बढ़ रही है, दूसरी ओर ताजातरीन आंकड़ा बताता है कि बीते साल की तुलना में इस बार गेहुं की पैदावार ही 10 फीसदी कम हुई है।

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