तालाब की बातें

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जल है तो जीवन है

शुक्रवार, 24 जुलाई 2015

Kawadiya : terror on the road

आस्था पर भारी पड़ती अराजकता

                                                               पंकज चतुर्वेदी
देहरादून से ले कर दिल्ली और फरीदाबाद से करनाल तक और राजस्थान तक के पांच राज्यों के कोई 70 जिले आगामी एक अगस्त से 12 अगस्त तक कांवड़ यात्रा को ले कर भयभीत और आशंकित हैं। याद करें पिछले साल अकेले गाजियाबाद जिले में कांवडि़यों द्वारा रास्ता बंद करने, मारापीटी करने, वाहनों को तोड़ने की पचास से ज्यादा घटनाएं हुई थीं। हरिद्वार में तो कुछ विदेषी महिलाओं ने बाकायदा पुलिस में रपट की थी कि कांवडि़यों ने उनसे छेड़छाड़ की है। बीते एक दशक के दौरान देखा गया है कि कांवड़ यात्रा के दस दिनों में दिल्ली से ले कर हरियाणा-राजस्थान व उधर हरिद्वार को जाने वाली सड़कों पर अराजक बेसबाल, व अन्य शस्त्रधारी युवकों का अराजक कब्जा हो जाता है। इस बार मामला बेहद संवेदनशील है- कांवड़ यात्रा के प्रमुख मार्गों में पड़ने वाला पश्‍चिमी उत्तर प्रदेश, फरीदाबाद के आसपास के इलाके व राजस्थान के कुछ कस्बे बीते सालों में भयावह दंगों के दर्द से संवेदनशील हो गए है।
Prabhat 26-7-15
जैसा कि बीते पांच सालों से घोशणा की जाती है, इस बार भी डाक कांवड पर पाबंदी, डीजे बजाने पर रोक जैसे जुमले उछाले जा रहे हैं, लेकिन यह तय है कि इनका पालन होना मुष्किल ही होता है और यही अराजकता आम लोगों के लिए संकट के दस दिन बन कर आती है। बडे -बड़े वाहनों पर पूरी सड़क घेर कर, उद॰ंडों की तरह डंडा-लाठी-बेसबाल लहराते हुए, श्रद्धा से ज्यादा आतंक पैदा कर रहे कांवडि़ए सड़कों पर आ जाते हैं ।
याद करें पिछले साल का श्रावण का महीना और दिल्ली से हरिद्वार जाने वाला राजमार्ग - एक हत्या, डेढ़ सौ दुकानों में आगजनी व तोड़फोड़, कई बसों को नुकसान, सैंकडों लोगों की पिटाई, स्कूल-दफ्तर बंद, लाखेंा बच्चों की पढ़ाई का नुकसान, जनजीवन अस्त व्यस्त । वह भी तब जब दस हजार पुलिस वालों की दिन-रात ड्यूटी लगी हुई थी । यह कहानी किसी दंगे - फसाद की नहीं बल्कि ऐसी श्रद्धा की है जो कि  अराजकता का रूप लेती जा रही है । पिछले साल और इससे भी कई पिछले सालों के दौरान श्रावण की शिवरात्रि से पहलेे लगातार दस दिनों तक देश की राजधानी दिल्ली और उसके आसपास 200 किलोमीटर के दायरे में इस तरह का आतंक धर्म के कंधों पर सवार हो कर निर्बाध चलता है। इसमें कितना धर्म या श्रद्धा थी , इसका आकलन कोई नहीं कर पाया।
साल-दर-साल बढ़ रहे जुनून से स्पश्ट है कि आने वाले सालों में केसरिया कपड़े पहन कर सड़कों पर आतंक फैलाने वालों की बढ़ती संख्या समाज के लिए चिंता का विशय है। दिल्ली से हरिद्वार के व्यस्ततम राश्ट्रीय राजमार्ग को आगामी पांच अगस्त तक बंद किया जा रहा है । दिल्ली में यूपी बार्डर से ले कर आईएसबीटी और वहां से रोहतक व गुड़गांव और वहां से जयपुर  की ओर जाने वाले राष्‍ट्रीय राजमार्ग को जगह-जगह निर्ममता से खोद कर बड़े-बड़े पंडाल लगाए जा रहे हैं । राजधानी में भले ही बिजली की कमी हो, लेकिन बिजली को चुरा कर सडकों को कई-कई किलोमीटर तक जगमगाने की तैयारियां अपने अंतिम दौर में है । हरिद्वार से ले कर दिल्ली तक के करोड़ों लोगों की जान सांसत में है कि इस बार ये क्या गुल खिलाएंगे । इस बार भी ये शिव भक्त 10 दिनों तक लाखों बच्चों की पढ़ाई और कई षहरों के जनजीवन को अस्त व्यस्त रखने की अपनी परंपरा को दोहराएंगे। अनुमान है कि इस बार कांवड़ यात्रा पहले से अधिक भव्य होी, इसके कुछ राजनीतिक कारण भी हैं।
अपने मन की मुराद पूरी होने या देष-समाज की सुख-समृद्धि की मनोकामना के लिए श्रावण के महीने में हरिद्वार, देवघर(झारंखंड), काषी जैसे प्रसिद्ध षिवालयों से पैदल कांवड़ में जल ले कर अपने गांवों को शिवालयों तक आने की परंपरा सैंकड़ों साल पुरानी है । अभी कुछ साल पहले तक ये सात्विक कांवडिये अनुशासन व श्रद्धा में इस तरह डूबे रहते थे कि राह चलते लोग स्वयं ही उनको रास्ते दे दिया करते थे । बावरी मस्जिद विध्वंस के बाद देष में धर्म की राजनीति व हिंदु धर्म के तालीबानीकरण का जो दौर शुरू हुआ, उसका असर कांवड़ यात्रा पर साल-दर-साल दिखने लगा ।  पहले संख्या में बढ़ौतरी हुई, फिर उनकी सेवा के नाम पर लगने वाले टेंटों-शिविरों की संख्या बढ़ी । गौरतलब है कि इस तरह के शिविर व कांवड़ ले कर आ रहे ‘‘भोलों’’ की ‘‘सेवा’’ के सर्वाधिक शिविर दिल्ली में लगते हैं , जबकि कांवडि़यों में दिल्ली वालों की संख्या बामुष्किल 10 फीसदी होती है ।
अब कांवडियों का आतंक है । किसी का जल छलक गया, किसी को सड़क के बीच में चलने के दौरान माूमली टक्कर लग गई , तो खैर नहीं है । हाकी, बेसबाल के बल्ले, भाले, त्रिषूल और ऐसे ही हथियारों से लैस ये ‘भोले’ तत्काल ‘‘भाले’’ बन जाते हैं और कानून-व्यवस्था, मानवता और आस्था सभी को छेद देते हैं ।
इन कांवडियों के कारण राश्ट्रीय राजमार्ग पर एक सप्ताह तक पूरी तरह चक्का जाम रहना देश के लिए अरबों रुपए का नुकसान करता है । इस रास्ते में पड़ने वाले 74 कस्बों, शहरों का जनजीवन भी थम जाता है । बच्चों के स्कूलों की छुट्टी करनी पड़ती है और सरकारी दफ्तरों में काम-काज लगभग ना के बराबर होता है । गाजियाबाद महानगर में तो लोगों का घर से निकलना दुष्वार हो जाता है । षहर में फल, सब्जी, दूध की आपूर्ति  बुरी तरह प्रभावित होती है ।
दिल्ली की एक तिहाई आबादी यमुना-पार रहती है । राजधानी की विभिन्न संस्थाओं में काम करने वाले कोई सात लाख लोग जी.टी.रोड के दोनो तरफ बसी गाजियाबाद जिले की विभिन्न कालोनियों में रहते हैं । इन सभी लोगों के लिए कांवडियों के दिनों में कार्यालय जाना त्रासदी से कम नहीं होता । इस बार दिल्ली एनसीआर में कावंड़ यात्रा के दौरान जबरदस्त अराजकता होगी, क्योंकि गाजियाबाद में नये बस अड्डे से दिलषाद गार्डन तक मेट्रो के काम के चलते जीटी रोड बेहद संकरी व गहरे गढडों वाली हो गई है।। जाहिर है कि इस पर कांवड़ वालों का ही रोज होगा व इसके दोनेा तरफ बसी कालोनियों के लाखों लेाग ‘‘हाउस अरेस्ट’ होंगे। गाजियाबाद-दिल्ली सीमा पर अप्सरा बार्डर पूरी तरह कांवडियों की मनमानी की गिरफ्त में रहता है, जबकि इस रास्ते से गुरूतेग बहादुर अस्पताल जाने वाले गंभीर रोगियों की संख्या प्रति दिन हजारों में होती है । ये लोग सड़क पर तड़पते हुए देखे जाते हैंे । चूंकि मामला धर्म से जुडा होता है, सो कोई विरोध की सोच भी नहीं सकता । फिर कांवड़ सेवा केंद्रों की देखरेख में लगे स्वंयसेवकों के हाथों में चमकते त्रिषूल, हाकियां, बेसबाल के बल्ले व लाठियां किसी की भी जुबान खुलने ही नहीं देती है ।
धर्म, आस्था, पर्व, संकल्प, व्रत, ये सभी भारतीय संस्कृति व लोकजीवन के अभिन्न अंग हैं, लेकिन जब यह लोकजीवन के लिए ही अहितकर और धर्म के लिए अरुचिकर हो जाए तो इसकी प्रक्रिया पर विचार करना , इसकी मूल मंषा को अक्षुण्ण रखने के लिए अत्यावष्यक है । धर्म दूसरों के प्रति संवेदनषील हो, धर्म का पालन करने वाला स्वयं को तकलीफ दे कर जन कल्याण की सोचे; यह हिंदु धर्म की मूल भावना है । कांवडि़यों की यात्रा में यह सभी तत्व नदारद हैं ।
फिल्मी पेरोडियों की धुन पर नाचना, जगह-जगह रास्ता जाम करना, आम जन जीवन को अस्त-व्यस्त कर देना, सड़कों पर हंगामा करना और जबरिया वसूले गए चंदों से चल रहे षिविरों में आहार लेना; किसी भी तरह धार्मिक नहीं कहा जा सकता है । जिस तरह कांवडियों की संख्या बढ़ रही है, उसको देखते हुए सरकार व समाज दोनों को ही इस पावन पर्व को दूशित होने से बचाने की जिम्मेदारी है । कांवडियों का पंजीयन, उनके मार्ग पर पैदल चलने लायक पतली पगडंडी बनाना, महानगरों में कार्यालय व स्कूल के समय में कांवडियों के आवागमन पर रोक, कांवड लाने की मूल धार्मिक प्रक्रिया का प्रचार-प्रसार, सड़क घेर कर षिविर लगाने पर पाबंदी जैसे कदम लागू करने के लिए अभी से कार्यवाही प्रारंभ करना जरूरी है । सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस धार्मिक अनुश्ठान में सांप्रदायिक संगठनों की घुसपैठ को रोका नहीं गया तो देष को जो नुकसान होगा, उससे बड़ा नुकसान हिंदु धर्म को ही होगा ।
आस्था के नाम पर अराजकता पर अंकुष आखिर कौन लगाएगा ? स्वयं समाज या सरकार ? कावंडियों के नाम पर दुकानदारी कर रहे लोग क्या कभी सड़क, सफाई, षिक्षा, भ्रश्टाचार जैसे मूलभूत मसलों पर अपने घर- गांव छोड़ कर डंडे ले कर सड़क पर आने की हिम्मत करते हैं ? कभी नहीं । जाहिर है कि इस भगवा बटालियन को तैयार करने में कतिपय लोगों के व्यावसायिक हित हैं तो कुछ के राजनैतिक । जरूरत इस बात की है कि धर्म के नाम पर लेागों को भ्रमित करने के इन कुत्सित प्रयासों का खुल कर विरोध हो और चैहरे बेनकाब किए जाएं । यह जानने का प्रयास कतई नहीं होता है कि इन कावंडियों के कारण कितने लेाग अस्पताल नहीं पहुंच पा रहे हैं और कितनों के नौकरी के इंटरव्यू छूट गए । कितनों को मजबूरी में महंगी सब्जी व दूध खरीदना पड़ रहा है और कितनी कालोनियां इनकी बिजली चोरी के कारण अंधेरे में हैं ।  आज जब कांवड मार्ग पर सांप्रदायिक तनाव और आतंकवाद दोनो का खतरा है, ऐसे में यह कानून-व्यवस्था से कहीं ज्यादा सामाजिक जिम्मेदारी है कि धर्म के नाम पर ऐसी अराजकताओं से परहेज किया जाए।
पंकज चतुर्वेदी
यू जी -1 ए 3/186, राजेन्द्र नगर सेक्टर-2 साहिबाबाद, गाजियाबाद 201005



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