तालाब की बातें

तालाब की बातें
जल है तो जीवन है

शनिवार, 29 अगस्त 2015

Billionaires God of hungry worshipers

Prabhat, Meerut, 30-8-15

भूखे भक्तों ंके ‘कुबेर’ देवता

mp Jansandesh , Satna 29-8-15
                                                                      पंकज चतुर्वेदी

भारत आज भी सोने की चिडि़या है, लेकिन उसका सोना व धन भगवान के पास बंधेज रखा है। असलियत में यदि भारत के ‘‘भगवान’’ अपना खजाना खोल दे ंतो चुटकी बजाते ही भुखमरी, कर्ज, बेरोजगारी, अषिक्षा जैसी समयाएं दूर हो जाएंगी। संसाधन जुटने लगेंगे।  याद करें महाराश्ट्र का मेलघाट इलाका बीते कई सालों से कुपेाशण के कारण षिषुओं की मौत की त्रासदी से जूझ रहा है। देष की 43 फीसदी आबदी के कुपोशणग्रस्त होना वास्तव में राश्ट्रीय षर्म की  बात है। भरपेट भोजन के लिए तरस रहे मेलघाट से कुछ ही किलोमीटर दूर है साईंबाबा का स्थान षिरडी जिसकी सालाना आय 210 करोड़ रूपए है। मंदिर के पास 32 करोड़ के तो सोना-चांदी के वो आभूशण हैं जो भक्तों ने वहां चढ़ाए हैं। प्रदेष के सबसे अमीर मंदिर की कुल संपत्ति 450 करोड़ से अधिक है। यहां यह भी जानना जरूरी है कि जिस साईंबाबा को भक्त सोने-हीरे के मुकुठ व चांदी की पालकी में बैठाने पर तुले हैं, उन्होंने अपाना पूरा जीवन एक जीर्ण-षीर्ण इमारत में टाट के टुकड़े के साथ व्यतीत किया था। इसी प्रदेष की राजधानी मुंबई का सिद्धीविनायक मंदिर भी वीआईपी धार्मिकस्थल है, जिसकी सालाना आय 46 करोड़ के पार है। मंदिर के पास 125 करोड़ के तो फिक्स डिपोजिट ही हैं। ये तो वे मंदिर हैं जो बीते दो दषकों के दौरान ज्यादा चर्चा में आए और इन्हें मध्यवर्ग के पसंदीदा तीर्थ कहा जाता है। देष के यदि प्राचान मंदिरों की ओर देखें तो इतनी दौलत वहां अटी पड़ी है कि वह देष की दो पंचवर्शीय योजना में भी खर्च नहीं की जा सकती है। सुनने में आया है कि केंद्र सरकार अब स्वयंभु भगवानों की अकूत दौलत पर जांच करवाने जा रही है। कम से कम एक बार मंदिरों की कुल संपत्त् िका आकलन तो होना चाहिए ताकि यह धन भारत की समृद्धि का अंतरराश्ट्रीय मापदंड बन सके।
दक्षिण भारत के प्रसिद्ध तिरूमला मंदिर की कुल संपति, मुल्क के सबसे अमीर मुकेष अंबउानी के पूरे व्यापारकि साम्राज्य से भी ज्यादा है। भारत में 10 लाख से ज्यादा मंदिर हैं, तिस पर कतिपय लोग यह कहते नहीं अघाते हैं कि विदेषी-मुसलमान हमलावरों ने भारत के मंदिरों को खूब लूटा व नश्ट किया। देष के सौ मंदिर ऐसे हैं जिनके सालाना चढ़ावे में इताना धन आता है कि वह भारत सरकार के सालाना बजट की कुल योजना व्यय के बराबर होता है। देष के दस मंदिरों की कुल संपत्ति देष के सबसे अधिक धनवान 500 लोगों की कुल संपदा के बराबर हैै।  मंदिरों का अभी तक उपलब्ध रिकार्ड के अनुसार कुल सात अरब डालर का सोना यहां धर्म के नाम पर जुड़ा हुआ है। केरल के पद्मनाभ मंदिर के केवल एक तहखाने से पांच लाख करोड़ के हीरे, जवाहरात, आभूशण मिले हैं। त्रावनकोर रियासत के इस मंदिर की सुरक्षा में अब ब्लेक कैट कमांडो तैनात हैं, मामला अदालतों में चल रहा है। कहा जा रहा है कि यदि सभी तहखाने खोल दिए जाएं तो उसमें इतनी दौलत है कि षायद रिजर्व बैंक के पास भी इतनी मुद्रा-क्षमता नहीं होगी। उड़ीसा के बड़ा हिस्सा लगातार भुखमरी और अकाल का षिकार रहता है। कालाहांडी से बामुष्किल 250 किलोमीटर दूर पुरी के जगन्नाथ मंदिर में भी कई ऐसे कमरे हैं जिनमें छिपी संपदा अकूत है। पिछले साल वहां के एक कमरे को अनजाने में खोला गया तो उसमें कई टन चांदी की सिल्लियां निकली थीं। फिर आस्थाओं का वास्ता दे कर वहां के खजाने को उजागर होने से रोक दिया गया। केरल के त्रिषूर जिले के सबरीमाला पहाडि़यों के बीच स्थित कृश्ण भगवान के गुरूवायूर मंदिर की सालाना आय कई करोड़ हे। मंदिर के नाम से बैंक में 125 करोड़ के फिक्स डिपोजिट हैं। आंध्रप्रदेष के तिरूपति बालाजी को विष्व का सबसे अमीर मंदिर माना जाता है। इसके खजाने में आठ टन जेवर हैं। इसकी सालाना आय 650 करोड़ हे। बैंकों में मंदिर की ओर से 3000 किलो सोना और 1000 करोड़ के फिक्स जमा किए गए हैं। यहां औसतन हर रोज साठ हजार से एक लोख लोग आते हैं। अकेले पैसों की गनती के लिए वहां 20 लोग काम करते हैं। यहां क संपत्ति भारत के कुल बजट का पचासवां हिस्सा है। यानी जितना पैसा देष के एक सौ बीस करोड़ लोगों के लिए मयस्सर है  उसके पचासवे हिस्से पर केवल एक किलोमीटर में फैले तिरूपति मंदिर का हक है। यहां यह बता दें कि कर्नाटक में येदुरप्पा की कुर्सी खाने वाले अवैध खनिज कांड के खलनायक रेड्डी बंधुओं ने पिछले ही साल यहां  16 किलो वजन का सोने का मुकुट चढ़या था, जिसकी कीमत उस समय पैंतालीस करोड़ आंकी गई थी। यह बानगी है कि इन मंदिरों का खजाना किस तरह की कमाई से भरा जाता है। 
प्रत्येक देष अपने पास सोने का एक आरक्षित भंडार रखता है जो उसके रसूख व आपात स्थिति में सहारा देता है। भारत के पास ऐसा रिजर्व गोल्ड 557.7 टन है, जबकि अमेरिका के पास यह रिजर्व स्टाक 8133.5 टन है। जान कर आंखे खुली रहा जाएंगी कि भारत के कुछ मंदिरों में जाहिरा तौर पर 22 हजार टन सोना है। यानि अमेरिका के रिजर्व स्टाक से ढाई गुणा व भारत के स्टाक से 4000 गुणा ज्यादा। अनुमान है कि इस सोने की कीमत पचास हजार करोड होगी। यदि इसे देष के हर इंसान में बांटा जाए तो प्रत्येक को 40 हजार मिलेंगे।वहीं इससे भारत का पूरा विदेषी कर्जा उतर सकता है।
तिरूपति के बाद सबसे अमीर मंदिरों में जम्मू के कटरा से उपर पहाड़ों पर स्थित वैश्णो देवी मंदिर का नाम आता है। यहां आने वाले श्रद्धांलुओं की संख्या तिरूपति के आसपास ही है।  यह मंदिर अपेक्षाकृत नया है, लेकिन इसकी आय सालाना पाचं सौ करोड़ को पार कर चुकी है।  ऐसा नहीं कि मंदिरों के धनवान होने में उनके पुरातन होने का केाई योगदान होता हे। दिल्ली के अक्षरधाम मदिर को ही लें, इसकी आय देखते ही देखते कई करोड़ सालाना हो गई हे। उज्जैन के महाकालेष्वर, गुजरात का द्वारिकाधीष व सोमनाथ मंदिर, मथुरा के द्वारिकाधीष व जन्मभूमि मंदिरों, बनारस के बाबा विष्वनाथ, गोहाटी की कामाख्या देवी जैसे कई ऐसे मंदिर हैं जहां की आय-व्यय पर सरकार का दखल बहुत कम है। ये धार्मिक स्थल घनघोर अव्यवस्थओं और नागरिक-सुविधाओं के नाम पर बेहद दीन-हीन हैं, लेकिन उनकी हर दिन की चढ़ौअत कई-कई गांवों के हजारों घरों का चूल्हा जलाने के बराबर है।
लोगों द्वारा आस्था से चढ़ाए गए चंदे के इस्तेमाल की हकीकत  उनके आॅडिट द्वारा सामने आती है।, हालांकि मंदिर कभी भी अपना आय-व्यय सार्वजनिक नहीं करते और समय-समय पर वहां के धन का राजनीतिक कार्यों में दुरूप्योग की खबरें भी आती हैं।  देष के चुनिंदा कुछ मंदिरों का आर्थिक लेखा-जोखा बताता है कि करोड़ों करोड़ की कमाई का बामुष्किल 1.40 प्रतिषत पैसा मंदिर के रखरखाव पर व्यय होता है।  भक्तों की भगवान को समर्पित निधि में से 28 टका तो वहां काम कर रहे कर्मचारियों के वेतन पर जाता है, जबकि दान या सार्वजनिक काम पर कोई सात फीसदी व्यय होता है। सबसे ज्यादा व्यय 33 प्रतिषत ‘‘अन्य’’ मद में होता है जो सबसे ज्यदा संदेह पैदा करता है।
धन जुटाने में ‘‘जिंदा भगवान’’ भी पीछे नहीं हैं।  पिछले सालों पुट्टापर्थी के सत्य साईं बाबा के निधन के बाद खुलासा हुआ था कि अकेले उनके कमरे से ही 40 करोड़ नगद और 77 लाख के जेवरात मिले थे। सत्य साइं्र बाबा की विरासत कई हजार करोड़ की है। विदेषों से काला धन लाने के नाम पर आंदोलनरत बाबा रामदेव के पास कई हजार एकड़ जमीन है और उन्हांेने महज दस सालों में 1100 करोड़ का साम्राज्य खड़ा कर लिया है। राधा स्वामी, व्यास की पूरे देष में सत्संग के नाम पर इतनी जमीन है कि उसकी कुल कीमत कई हजार करोड़ होगी। हाल ही में चर्चा में रहे हरियाणा के रामपाल की व्यापारिक साम्राज्य चैंकाने वाला है। महर्शि महेष योगी का वित्तीय-साम्राज्य की तो गणना ही नहीं हो सकी। राधे मां का  धन-संसार एक हजार करोड़ का है तो आषुमल यानि आषाराम के पास अरबों की तो केवल जमीने ही है।।
ऐसा नहीं है कि केवल हिंदु मत के भगवान ही संपत्ति जोड़ने मे ंयकीन रखते हैं, सिखों के गुरूद्वारे , विषेश रूप से अमृतसर का हरिमिंदर साहेब या स्वर्ण मंदिर, दिल्ली का बंगला सोहब व षीषगंज भी भक्तों की चढ़ौत से मालामाल रहते हैं। बोधगया के मंदिर में भी अकूत दौलत है। जैनियो ंके मंदिर तो वैभव का भंडार होते हैं।  देष की मस्जिदों की बीते साल में  अचानक सूरत बदलना भी गौरतलब है। वैसे अजमेर षरीफ, मुंबई की हाजी मलंग  व दिल्ली की निजामुद्दीन दरगाह पर अच्छी-खासी चढ़ौत आती है।
क्या कभी कोई यह कहने की हिम्मत जुटा पाएगा कि देष के सामने भगवान के कारण खडे हुए इतने बड़े संकट से जूझने के लिए मंदिरों में बंद अकूत खजानों के इस्तेमाल का रास्ता खोले ? क्या कभी र्काइे इन अरबपति मंदिरों को उनके सामाजिक सरोकारों का ध्यान दिलवा कर वहां आ रह कमाई को षिक्षा, स्वास्थय, भ्ूाख जैसे  कार्यों पर खर्च करने के लिए प्रेरित करेगा? यह सही है कि कुछ धार्मिक संस्थाएंव बाबा-बैरागी इस दिषा में कुछ ऐसे काम करते हैं, लेकिन उनका योगदान उनकी कमाई की तुलना में राई बराबर ही होता है। और क्या कभी कोई यह कर पाएगा कि मंदिरों व अन्य धार्मिक स्थलों पर चढ़ौत चढ़ाने वाले से यह सुनिष्चित करने को कहा जाएगा कि उसके द्वारा चढ़ाई गई रकम दो-नंबरे की आय का हिस्सा नहीं है?ें
पंकज चतुर्वेदी
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