तालाब की बातें

तालाब की बातें
जल है तो जीवन है

शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2016

Traditional knowledge of agriculture can turn farms in gold



उन्‍न्‍त बनाम पारंपरिक खेती 


हरित क्रांति के चलते खेती में उन्नत बीजों, रासायनिक खादों और कीटनाशकों के अंधाधुंध इस्तेमाल को बढ़ावा मिला। अनेक विदेशी कंपनियों ने इस दिशा में शोध शुरू किया और उपज बढ़ाने के दावे के साथ अनाज, सब्जियों और फलों की नई-नई नई किस्में बाजार में उतारनी शुरू कर दीं। इन्हें सरकारों का भरपूर सहयोग मिला। अनेक विदेशी कंपनियों ने भारत में रासायनिक खादों और कीटनाशकों के बड़े-बड़े कारखाने लगाए। इस उपक्रम से खेती में उपज तो बढ़ी, पर किसानों की दशा में अपेक्षित सुधार नहीं आया। कारण कि खेती निरंतर महंगा सौदा होती गई। उन्नत किस्म के कहे जाने वाले बीजों के लिए खाद-पानी-कीटनाशकों की जरूरत पारंपरिक बीजों की तुलना में कई गुना अधिक होती है।
समय के साथ-साथ नतीजे आने शुरू हुए और उन्नत बीजों के चलते मृदा और मनुष्य के जीवन पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों के तथ्य प्रकट होने लगे। लोगों में तरह-तरह की बीमारियां पनपनी शुरू हो गई हैं। कैंसर जैसी असाध्य बीमारी बढ़ रही है। खेतों की उर्वरा शक्ति कम हो गई है। अतार्किक भूजल दोहन के कारण जमीन के नीचे पानी का स्तर गिर कर काफी गहरे पहुंच गया है। ऐसे में फिर से पारंपरिक खेती की बात होने लगी है। जैविक खेती को बढ़ावा देने पर जोर दिया जा रहा है। इस दिशा में सरकारें भी सहयोग को तत्पर दिखने लगी हैं। जब से सिक्किम देश का पहला जैविक खेती वाला राज्य बना है, दूसरे राज्यों की सरकारें भी किसानों को इसके लिए प्रोत्साहित करने लगी हैं। अनेक स्वयंसेवी संगठन इस क्षेत्र में सक्रिय हो गए हैं।
अपने देश में पारंपरिक खेती की तरफ आकर्षण बढ़ने की वजह यह भी है कि अब यह मिथ टूटने लगा है कि पारंपरिक खेती से उपज माकूल नहीं मिल सकती। आज भी देश के विभिन्न इलाकों में पारंपरिक खेती करने वाले लोग बिना किसी प्रशिक्षण के इसका लाभ उठा रहे हैं।
मध्यप्रदेश का निमाड़ अंचल मिर्ची की खेती के लिए मशहूर है। पिछले साल वहां कई हजार एकड़ की फसल कीड़ा लगने के कारण नष्ट हो गई, लेकिन कुछ खेत ऐसे भी थे, जहां बेहतरीन फसल उगी। पता चला कि उन खेतों के किसानों ने किसी तरह की रासायनिक खाद या कीटनाशक का इस्तेमाल नहीं किया था। वे खेतों में दूध, हल्दी और गुड़ का छिड़काव करते थे। हर सुबह खेतों के बीच खड़े होकर घंटी बजाते थे। राज्य के कृषि विभाग के अफसर भी वहां गए और पुष्टि हुई कि किसानों की देशज, पारंपरिक तरकीब काम कर रही है। एक बात और कि फसल की मात्रा भी कम नहीं हुई।
वैसे तो नोएडा की पहचान एक उभरते हुए विकसित इलाके के तौर पर है, लेकिन यहां के कई गांव वहां रच-बस चुकी कैंसर की बीमारी के कारण जाने जाते हैं। अच्छेजा गांव में बीते पांच साल में दस लोग इस असाध्य बीमारी से असामयिक काल के गाल में समा चुके हैं। अब अच्छेजा और ऐसे ही कई गांवों में लोग अपना रोटी-बेटी का नाता भी नहीं रखते हैं। दिल्ली से सटे पश्चिमी उत्तर प्रदेश का दोआब इलाका, गंगा-यमुना नदी द्वारा सदियों से बहा कर लाई मिट्टी से विकसित हुआ था। यहां की मिट््टी इतनी उपजाऊ थी कि पूरे देश का पेट भरने लायक अन्न उगाने की क्षमता थी इसमें। अब प्रकृति इंसान की जरूरत तो पूरा कर सकती है, लेकिन लालच को नहीं। और ज्यादा फसल के लालच में यहां अंधाधुंध खाद और कीटनाशकों का जो प्रयोग शुरू हुआ कि अब यहां पाताल से, नदी, से जोहड़ से, खेत से, हवा से हवा-पानी नहीं मौत बरसती है।
बागपत से लेकर ग्रेटर नोएडा तक के कोई एक सौ साठ गांवों में हर साल सैकड़ों लोग कैंसर से मर रहे हैं। सबसे ज्यादा लोगों को लीवर और आंत का कैंसर हुआ है। बाल गिरना, किडनी खराब होना, भूख कम लगना, जैसे रोग तो यहां हर घर में हैं। सरकार कुछ कर रही है, राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण भी कुछ नोटिस ले रहा है, लेकिन इलाके में खेतों में छिड़के जाने वाले जहर की बिक्री की मात्रा हर दिन बढ़ रही है। दुखद है कि अब नदियों के किनारे विष-मानवपनप रहे हैं, जो कथित विकास की कीमत चुकाते हुए असमय काल के गाल में समा रहे हैं। हमारे देश में हर साल कोई दस हजार करोड़ रुपए के कृषि-उत्पाद खेत या भंडार-गृहों में कीड़ों के कारण नष्ट हो जाते हैं। इस बर्बादी से बचने के लिए कीटनाशकों का इस्तेमाल बढ़ा है। जहां सन 1950 में इसकी खपत दो हजार टन थी, आज कोई नब्बे हजार टन जहरीली दवाएं देश के पर्यावरण में घुल-मिल रही हैं। इसका कोई एक तिहाई हिस्सा विभिन्न सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों के अंतर्गत छिड़का जा रहा है। सन 1960-61 में केवल 6.4 लाख हेक्टेयर खेती में कीटनाशकों का छिड़काव होता था। 1988-89 में यह रकबा बढ़ कर अस्सी लाख हो गया और आज इसके कोई डेढ़ करोड़ हेक्टेयर होने की संभावना है।
ये कीटनाशक जाने-अनजाने पानी, मिट््टी, हवा, जन-स्वास्थ्य और जैव विविधता को बुरी तरह प्रभावित कर रहे हैं। इनके अंधाधुंध इस्तेमाल से पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ रहा है, सो अनेक कीट व्याधियां फिर से सिर उठा रही हैं। कई कीटों की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ गई है और वे दवाओं को हजम कर रहे हैं। इसका असर खाद्य शृंखला पर पड़ रहा है और उनमें दवाओं और रसायनों की मात्रा खतरनाक स्तर पर आ गई है। एक बात और, इस्तेमाल की जा रही दवाइयों का महज दस से पंद्रह फीसद असरकारक होता है, बकाया जहर मिट््टी, भूगर्भ जल, नदी-नालों का हिस्सा बन जाता है। यह दुर्दशा अकेले नोएडा की नहीं, बल्कि देश के अधिकांश खेतों की हो गई है।
कुछ साल पहले थियोसोफिकल सोसायटी, चेन्नई में कोई पचास से अधिक आम के पेड़ रोगग्रस्त हो गए थे। आधुनिक कृषि-वैज्ञानिकों को कुछ समझ नहीं आ रहा था। तभी समय की आंधी में कहीं गुम हो गया सदियों पुराना वृक्षायुर्वेदका ज्ञान काम आया। सेंटर फॉर इंडियन नॉलेज सिस्टम (सीआइकेएस) की देखरेख में नीम और कुछ दूसरी जड़ी-बूटियों का इस्तेमाल किया गया। देखते ही देखते बीमार पेड़ों में एक बार फिर हरियाली छा गई। ठीक इसी तरह चेन्नई के स्टेला मेरी कॉलेज में बॉटनी के छात्रों ने जब गुलमेंहदी के पेड़ में वृक्षायुर्वेदमें सुझाए गए नुस्खों का प्रयोग किया तो पता चला कि पेड़ में न सिर्फ फूलों के घने गुच्छे लगे, बल्कि उनका आकार भी पहले से बहुत बड़ा था।
वृक्षायुर्वेद के रचयिता सुरपाल कोई एक हजार साल पहले दक्षिण भारत के शासक भीमपाल के राज दरबारी थे। वे वैद्य के साथ-साथ अच्छे कवि भी थे। तभी चिकित्सा सरीखे गूढ़ विषय पर लिखे गए उनके ग्रंथ वृक्षायुर्वेद को समझने में आम ग्रामीण को भी कोई दिक्कत नहीं आती है। उनका मानना था कि जवानी, आकर्षक व्यक्तित्व, खूबसूरत स्त्री, बुद्धिमान मित्र, कर्णप्रिय संगीत, सभी कुछ एक राजा के लिए अर्थहीन हैं, अगर उसके यहां चित्ताकर्षक बगीचे नहीं हैं। सुरपाल के कई नुस्खे अजीब हैं- जैसे, अशोक के पेड़ को अगर कोई महिला पैर से ठोकर मारे तो वह अच्छी तरह फलता-फूलता है, अगर कोई सुंदर महिला मकरंद के पेड़ को नाखूनों से नोच ले तो वह कलियों से लद जाता है।
सुरपाल के कई नुस्खे आसानी से उपलब्ध जड़ी-बूटियों पर आधारित हैं। महाराष्ट्र में धोबी कपड़े पर निशान लगाने के लिए जिस जड़ी का इस्तेमाल करते हैं, उसे वृक्षायुर्वेद में असरदार कीटनाशक निरुपित किया गया है। भल्लाटका यानी सेमीकार्पस एनाकार्डियम का छोटा-सा टुकड़ा अगर भंडार गृह में रख दिया जाए, तो अनाज में कीड़े नहीं लगते हैं। अब इस साधारण-सी जड़ी के उपयोग से कैंसर सरीखी बीमारियों के इलाज की संभावनाओं पर शोध चल रहे हैं।
पंचामृत यानी गाय के पांच उत्पाद- दूध, दही, घी, गोबर और गोमूत्र के उपयोग से पेड़-पौधों के कई रोग जड़ से दूर किए जा सकते हैं। वृक्षायुर्वेद में दी गई इस सलाह को वैज्ञानिक रामचंद्र रेड्डी और एएल सिद्धारामैया ने आजमाया। टमाटर के मुरझाने और केले के पनामा रोग में पंचामृत की सस्ती दवा ने सटीक असर किया। इस परीक्षण के लिए टमाटर की पूसा-रूबी किस्म को लिया गया और सुरपाल के सुझाए गए नुस्खे में थोड़ा-सा संशोधन कर उसमें यीस्ट और नमक भी मिला दिया गया। दो प्रतिशत घी, पांच प्रतिशत दही और दूध, अड़तालीस फीसद ताजा गोबर, चालीस प्रतिशत गोमूत्र के साथ-साथ 0.25 ग्राम नमक और इतना ही यीस्ट मिलाया गया। ठीक यही फार्मूला केले के पेड़ के साथ भी आजमाया गया, जो कारगर रहा।
सीआइकेएस में बीते कई सालों से वृक्षायुर्वेद और ऐसे ही पुराने ग्रंथों पर शोध चल रहे हैं। यहां बीजों के संकलन, चयन, और उन्हें सहेज कर रखने से लेकर पौधों को रोपने, सिंचाई, बीमारियों से मुक्ति आदि की सरल पारंपरिक प्रक्रियाओं को लोकप्रिय बनाने के लिए आधुनिक डिग्रियों से लैस कई वैज्ञानिक प्रयासरत हैं। पशु आयुर्वेद, सारंगधर कृत उपवन विनोद और वराहमिहिर की वृहत संहिता में सुझाए गए चमत्कारी नुस्खों पर भी यहां काम चल रहा है।
खेती-किसानी के ऐसे ही कई हैरतंगेज नुस्खे भारत के गांव-गांव में पुराने, बेकार या महज भावनात्मक साहित्य के रूप में बेकार पड़े हुए हैं। ये हमारे समृद्ध हरित अतीत का प्रमाण तो हैं ही, प्रासंगिक और कारगर भी हैं। अब यह बात सारी दुनिया मान रही है कि प्राचीन भारतीय ज्ञान के इस्तेमाल से कृषि की लागत घटाई जा सकती है। यह खेती का सुरक्षित तरीका है, साथ ही इससे उत्पादन भी बढ़ेगा।

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