तालाब की बातें

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जल है तो जीवन है

गुरुवार, 21 अप्रैल 2016

US- ARAb tension ; Only pressure tectic

अमेरिका-सउदी अरब  तनाव तो है लेकिन टकराव नहीं होगा

संदर्भ बराक ओबामा का अरब दौरा व 9/11 की गोपनीय रिपोर्ट में अरब की भूमिका 

                                                                पंकज चतुर्वेदी
जिस सउदी अरब के सहयोग, शह से अमेरिका बीते तीन दशकों से मध्य पूर्वी और पश्चिम एशिया के अरब जगत में रंगदारी करता रहा है, आज उसी देश से अमेरिका के संबंधों में खटास आती दिख रही है। भले ही मसला लगभग 15 साल पुराने 9/11 हमले के कथत आरोपी पर मुकदमा चलाने का हो, लेकिन हकीकत तो यह है कि एक तो अमेरिका की सउदी अरब पर तेल की निर्भरता कम हो गई है,  दूसरा राष्ट्रपति चुनाव के दौर से गुजर रहे अमेरिका में बराक हुसैन ओबामा की अरब-नीति की जम कर आलेाचना हो रही है। यह भी नहीं भूलना चाहिए कि अब अरब बदल रहा है, वह महज तेल का व्यापार करने वाले शेखों का देश नहीं रह गया है, अरब अमीरात के नए राजकुमार तकनीक, शिक्षा, संस्कृति के माध्यम से देश की तस्वीर बदलने में लगे हैं।  श्री ओबामा इस समय अपने राष्ट्रपति काल के अंतिम दिनों में अरब के दौरे पर हैं और सउदी अरबने चेतावनी दे दी है कि यदि अमेरिका ने  सन 1976 के फारेन सोवरजिन इम्यूनिटी एक्ट(एफएसआईए) में बदलाव करने का प्रयास किया तो वे भी चुप नहीं बैठेंगंे।
इस विवाद को समझने के लिए जरा पीछे जाना होगा, सन 2001 के नौ सितंबर को अमेरिका के मेनहट्टन की गगनचुुंबी दो इमारतों में हवाई जहाज घुसते व उनको ढहते पूरी दुनिया ने देखा था। विश्व व्यापार केंद्र की इन मीनारों का गिरना असल में अमेरिका के दंभ, सुरक्षा व दुनिया पर बादशाहत की इरादों का ढहना था। उस कांड में अलकायदा का षडयंत्र उजागर हुआ था। हाल ही में अमेरिका में एक ऐसी 28 पेज की गोपनीय रिपोर्ट को लेकर हंगामा मचा हुआ है , जिसमें दावा किया गया है कि उस हमले में शामिल लेागों को सउदी अरबसे मदद मिली थी। सनद रहे ओसामा बिन लादेन अरब से था और आज भी उसका वहां बड़ा व्यापार है। अमेरिका के दोनों बड़े दलों-डेमोक्रेट्स व रिपब्लिकन के सांसदों ने एक ऐसा बिल पेश किया है जिसेमं अमेरिकी जमीन पर हुए आतंकवादी हमले में शामिल देशों पर अमेरिका में कानूनी कार्यवाही की छुट होगी। जोकि  फारेन सोवरजिन इम्यूनिटी एक्ट(एफएसआईए) के तहत अरब को मिली छूट को समाप्त करता है। सउदी अरबको डर है कि अमेरिका उस कथित रिपोर्ट के आघार पर सउदी अरब को नथना चाहता है और यदि ऐसा हुआ तो अमेरिका में स्थित अरब की 750 करोड़ अमेरिकी डालर यानि 2.75 अरब डिरहम की संपत्ति राजसात करने का रास्ता खुल जाएगा। वैसे ओबामा ने आश्वासन दिया है कि उक्त रिर्पोअ की जांच आला खुफिया अफसर कर रहे हैं व उस पर निर्णय जल्दबाजी में नहीं होगा, लेकिन सउदी अरबके शासकों को अमेरिका की नियत पर शक है।
हालांकि अरब यानि सउदी अरब और अमेरिका के बीच तनाव के और भी कई कारण हैं। इसमें सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण ईरान पर से परमाणु पांबदी उठाने का मसला है। सउदी अरब सुन्नी देश है, जबकि ईरान को शियाओं का गढ़ कहा जाता है और दोनों एकदूसरे के कट्टर दुश्मन हैं।  ईरान के साथ पश्चिमी देशों का परमाणु समझौता सऊदी अरब को कतई रास नहीं आया है और वह इस समझौते से नाराज है। खाड़ी के दूसरे सुन्नी देश अमेरिका की सीरिया व ईरान से संबंधित नीति की आलेचना करते रहे हैं। इस मसले पर समझाने की अमेरिकी सभी कोशिशें असफल रही हैं। अमेरिका की सउदी अरब से नाराजगी एक वजह मानवाधिकारों का हनन भी है। अमेरिका के लाख चेतावनी देने के बावजूद रइफ बदावी जैसे ब्लॉगरों को कोड़ों और कैद की सजा देकर सऊदी सल्तनत पश्चिमी अनुरोधों की अनदेखी करता रहा है।
हालांकि अब अरब की दुनिया बदलने को बेकरार है। यहां की 70 फीसदी आबादी 30 साल से कम की है। यहां यूट्यूब व ट्वीटर इस्तेमाल करने वालों की संख्या पूरे मध्य-पूर्व एशिया में सबसे ज्यादा है। हालांकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों के लगातार गिरने से सउदी अरब की आर्थिक स्थिति पर प्रभाव पड़ा है, लेकिन नए शहजादे व भावी राजा मुहम्मद बिन कासिम ने देश की अर्थ व्यवसथा को विदेशी निवेश के लिए खोल दिया हे। वहां अब कई विभागों में निजी कंपनियां आ रही हैं। देश में तेल पर निर्भरता कम हो रही है। युवा सामाजिक व लोकतांत्रिक सुधार पर जोर दे रहे हैं। ऐसे में इस बात की संभावना कम होती जा रही है कि देश को सुरक्षा व अन्य मसलों पर अमेरिका की ओर मुंह बाए रहना होगा।
गौरतलब है कि अमेरिका की तेल के मामले में अब सऊदी अरब निर्भरता कम हो गई हे। 2015 में अमेरिका ने 82 देशों से प्रतिदिन 94 लाख बैरल तेल का आयात किया। इसमें सिर्फ 11 प्रतिशत तेल का आयात सऊदी अरब से किया गया। फिर भी सउदी अरब को नाराज कर अमेरिका का इस क्षेत्र से अपनी शतों। पर मनमाना तेल लेना संभव नहीं होगा।
कुल मिला कर यह एक-दूसरे पर दवाब बनाने का मानसिक गेम है। अमेरिका को यदि पश्चिमी एशिया में अपना वर्चस्व कायम करना है तो उसे सउदी अरब का सहयोग चाहिए ही होगा। खाड़ी सहयेाग परिषद के देशों पर भी सउदी अरब का वर्चस्व है। ऐसे में अमेरिका कुछ घुड़की देकर अरब को झुकाना चाहता है जबकि अरब के शासक बताना चाह रहे हैं कि हालात बदल रहे हैं  अभी तक चली दादागिरी चलने वाली नहीं है।

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