तालाब की बातें

तालाब की बातें
जल है तो जीवन है

शुक्रवार, 19 अगस्त 2016

scavengers needs get rid of cleaning by empty hand

                                                                       कैसे मिलेगी भंगी मुक्ति की राह


एक तरफ अंतरिक्ष को अपने कदमों से नापने के बुलंद हौसले हैं तो दूसरी तरफ दूसरों का मल सिर पर ढोते नरक कुंड की सफाई करती मानव जाति। संवेदनहीन मानसिकता और नृशंस अत्याचार की यह मौन मिसाल सरकारी कागजों में दंडनीय अपराध है। यह बात दीगर है कि सरकार के ही महकमे इस घृणित कृत्य को बाकायदा जायज रूप देते हैं। नृशंसता यहां से भी कहीं आगे तक है, समाज के सर्वाधिक उपेक्षित व कमजोर तबके के उत्थान के लिए बनाए गए महकमे खुद ही सरकारी उपेक्षा से आहत रहे हैं। वैसे तो चार साल पहले ही संसद में पारित सफाई कर्मचारी निषेध अधिनियम-2012 में सीवर और सैप्टिक टैंक को हाथों से साफ करवाने को भी अपराध घोषित किया गया है, लेकिन इसका पालन संसद की नाक के नीचे दिल्ली में भी नहीं हो रहा है। भंगी-मुक्ति के लिए बने ढेर सारे आयोग, कमेटियों, को बतौर बानगी देखें तो पाएंगे कि सरकार का इस मलिन कार्य से इंसान की मुक्ति की इच्छा शक्ति ही नहीं है। सुप्रीम कोर्ट सिर पर मैला ढोने की कुप्रथा समाप्त करने के लिए लगाई गई एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान इस कार्य को गंभीरता से न लेने पर पांच राज्यों को फटकार लगाते हुए जुर्माना भी ठोक चुकी हैं। देश की सबसे बड़ी अदालत बीते एक सालों के दौरान कोई 10 बार इस तरह के कड़े तेवर दिखा चुकी है। कई कानून भी हैं, इसके बावजूद सिर पर नरक कुंड ढोने की परंपरा समाप्त नहीं हो पा रही है। इसका कारण है कि सरकार इस सामाजिक समस्या को जातीय समस्या के तौर पर ले रही है। न तो इसके अतीत को समझा जा रहा है और न मानवीयता को, बस कुछ बजट फूंकने की जुगत से ज्यादा नहीं रह गया है भंगी-मुक्ति आंदोलन।
 मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के कोई एक दर्जन जिलों में विस्तारित भूखंड बुंदेलखंड में सफाई के काम में लगे लोगों की जाति ‘बसोर’ कहलाती है। बसोर यानि बांस का काम करने वाले। और वास्तव में अभी भी उनके घरों में बांस की टोकरियां, सूप आदि बनाने का काम होता है। अभी कुछ दशक पीछे ही जाएं तो पता चलता है कि बसोर बांस का बेहतरीन कारीगर हुआ करता था। आधुनिकता की आंधी में बांस की खपच्चियों की कला कहीं उड़ गई और उनके हाथ आ गए झाड़ू-पंजा। गुजरात की गाथा इससे अलग नहीं है, वहां भी बांस की टोकरी बनाने वालों को भंगी कहा जाता है। भंगी यानी जो बांस को भंग करे। गुजरात और महाराष्ट्र व सीमावर्ती मध्य प्रदेश में सफाई कर्मचारियों के उपनाम ‘वणकर’ हुआ करते हैं यानी बुनकर। गौरतलब है कि अंग्रेजों के आने के बाद भारत में बड़ी-बड़ी कपड़ा मिलें लगीं और इंग्लैंड से सस्ता कपड़ा आयात होने लगा। फलस्वरूप हथकरघे बंद होने लगे। जब कारखाने खुल रहे थे, तभी शहरीकरण हो रहा था। इन्हीं हालातों के चलते बुनकर को ‘वणकर’ बनने पर मजबूर होना पड़ा। यदि अंग्रेज समाजशास्त्री स्टीफन फ्यूकस के एक शोध को विश्वास के काबिल मानें तो जानकर आश्चर्य होगा कि मध्य प्रदेश के निमाड़ क्षेत्र में जाति-धर्म परिवर्तन की तरह भंगी बनाने की बाकायदा प्रक्रिया होती है। ऐसे ही कई उदाहरण देश के कोने-कोने में फैले हुए हैं, जो इंगित करते हैं कि समाज के सर्वाधिक उपेक्षित इस वर्ग को ‘जाति’ कहना न्यायोचित नहीं है। प्रागैतिहासिक काल या उससे भी पहले की पौराणिक कथाओं की बात करें या अंग्रेजों के आगमन तक के इतिहास की, कहीं भी सफाई कर्मचारी नामक समाज का उल्लेख नहीं मिलता है। विश्व की सर्वाधिक पुरानी सभ्यताओं में से एक मोहन-जोदड़ो में जब सीवर प्रणाली के प्रमाण मिले हैं तो स्पष्ट है कि भारत में पहले साफ-सफाई समाज की साझा जिम्मेदारी हुआ करती थी, न कि किसी समाज विशेष की। वैसे भी यह स्वीकार्य तथ्य है कि सामंतवाद, जातिवाद या शोषण का सर्वाधिक असर उन इलाकों में होता है, जहां अशिक्षा, संचार व परिवहन साधनों का अभाव होता है। तभी आज छोटी जातियों पर अत्याचार के अधिकांश मामले दूरस्थ गांवों में ही सुनाई देते हैं। लेकिन आंकड़े गवाह हैं कि सफाई कर्मचारियों की संख्या गांवों की तुलना में शहरों में कई गुना अधिक है। 
जाहिर है कि इस पेशे को पारंपरिकता से जोड़ना बेमानी होगा।आजादी के बाद से भंगी मुक्ति, सिर पर मैला ढोने पर पाबंदी सरीखे कई नारे सरकारी व गैरसरकारी संगठन लगाते रहे, लेकिन खुद केंद्र सरकार का यह आंकड़ा इन नारों की इच्छा शक्ति का खुलासा करता है कि देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश को केंद्र से इस मद में 175 करोड़ रुपए मिल चुके हैं, इसके बावजूद वहां अभी भी 48 हजार ऐसे सफाईकर्मी हैं, जो सिर पर मैला ढोते हैं। इनमें से अधिकांश राजधानी लखनऊ और शाहजहांपुर में हैं। सामाजिक न्याय के संघषोंर् के लिए चर्चित बिहार में ‘समाजवाद’ की तस्वीर और भी वीभत्स है। जनगणना में यह बात उभर कर आई कि अभी भी राज्य में दो लाख ‘कमाऊ’ शौचालय हैं। इनका मल अपने सिर पर ढोने वालों की सरकारी संख्या तो महज आठ हजार है, लेकिन हकीकत में यह ग्राफ साठ हजार से ऊपर जाकर टकराता है। केंद्र सरकार की एक ताजा रिपोर्ट में यह बात बड़ी निर्लज्जता से स्वीकारी गई है कि हरियाणा में अभी भी 11 कस्बे ऐसे हैं, जहां सिर पर मैला ढोने की प्रथा बरकरार है। महाराष्ट्र में ऐसे कस्बे 116, राजस्थान में 66, पंजाब में 40 और आंध्र प्रदेश में 157 हैं। ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर, जहां से मात्र 60 किमी दूर स्थित पर्यटन स्थल पुरी, कटक आदि में आज भी नरक सफाई का काम ‘हरिजनों’ के हाथों जारी है। यह बात दीगर है कि सिर पर मैला ढुलाई का काम करवाना कानून की नजर में जुर्म है। यह कोई अकेला कानून नहीं है, जिसके दम पर सरकार मल साफ करने के अपमान, लाचारी और गुलामी से उपजी कुंठा के निदान का दावा करती है। 1963 में मलकानी समिति ने सिफारिश की थी कि जो सफाई कामगार अन्य कोई नौकरी करना चाहे तो उन्हें चौकीदार, चपरासी आदि पद दे दिए जाएं। लेकिन उन सिफारिशों को सरकारी सिस्टम हजम कर चुका है। आज भी रोजगार कार्यालयों से महज जाति देख कर ग्रेजुएट बच्चों को सफाई कर्मचारी की नौकरी का परवाना भेज दिया जाता है। क्या यह एक सुनियोजित साजिश सा नहीं दिखता है कि समाज की सफाई के लिए अपना वर्तमान ही नहीं, भविष्य भी दांव पर लगाने वालों की खुद की बस्तियां गंदी, बदबूदार और कुप्रबंध की शिकार होती हैं। राजधानी दिल्ली से ले कर सुदूर कस्बे तक की वाल्मीकी बस्तियों पर निगाह डालें, वहां न तो पक्की सड़क होगी, न ही बिजली व पानी का माकूल इंतजाम। हां, बस्ती के बीचोंबीच या ईद-गिर्द देशी शराब की दुकान अवश्य मिल जाएगी । हरेक नगर पालिका स्तर पर सफाई कर्मचारियों के लिए ‘ट्रांजिट होम’ बनाने का खर्चा केंद्र सरकार देती है, ताकि सफाई कर्मचारी अपने पेशे से निवृत्त होकर वहां हाथ-पैर धो कर स्वच्छ हो सकें। लेकिन पूरे देश में ऐसे ट्रांजिट होम पर पालिका के वरिष्ठ अधिकारियों का कब्जा होता है। यहां तक कि सफाई कर्मचारियों को यह मालूम ही नहीं होता है कि सरकार ने उनके लिए ऐसी कोई व्यवस्था भी की है।
एक बात बहुत साफतौर पर जान लेना चाहिए कि खुली अर्थव्यवस्था के इस युग में भंगी मुक्ति और समाजवाद दोनों ही सिक्कों की खनक से ही संभव है। जब तक भंगी महंगा नहीं होगा, दशकों से पीड़ित इस वर्ग की मुक्ति नहीं होगी। उदाहरण सामने है कि अच्छी कमाई होती देख कर उच्च वर्ग के लोग बेहिचक चमार की रोजी-रोटी मार रहे हैं। वे न केवल जूतों की दुकान खोल रहे हैं, बल्कि इसके कारखाने भी लगा रहे हैं। इसी तरह खटीक के मांस व्यापार या मछुआरों की मछलियां अब सभी तथाकथित ऊंची जात के रोजगार का साधन बन गई हैं। ठीक इसी तर्ज पर यदि सफाई कर्मचारियों के वेतन और सुविधाएं बढ़ने दें तो अन्य जाति-वर्ग के लोग भी इस ओर आकर्षित होंगे। वैसे भी ऐसा करना आज समय की मांग है, क्योंकि सफाई कर्मियों में इन दिनों एकाधिकार की भावना आ गई है। फलस्वरूप वे काम को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं व लापरवाह हो गए हैं।वैसे यह कटु सत्य है कि भंगी मुक्ति न तो सरकार के हाथों संभव है और न ही स्वयंसेवी संस्थाओं के बदौलत। इसके लिए पहल स्वयं सफाई कर्मियों को ही करनी होगी और इसका प्रारंभिक कदम होगा आत्मसम्मान को पहचानना। अपने कर्तव्य की महत्ता को समझना। जागरूकता की कुंजी साक्षरता है। अतएव समाज के शिक्षित वर्ग को शिक्षा ऋण उतारने के लिए कटिबद्ध रहना चाहिए। आज हर व्यवसाय के अत्याधुनिक तरीकों को विदेश से आयात किया जा रहा है। सफाई के क्षेत्र में ऐसे अनुसंधानों को खोजने का काम खुद समाज के जागरूक लोगों को करना होगा। एक बार फिर याद रखें, यह अर्थ-प्रधान युग है और अर्थ का मूल कर्म होता है।

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