तालाब की बातें

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गुरुवार, 16 फ़रवरी 2017

Will muslim become in majority in India ?

क्या वास्तव में मुसलमान भारत में बहुसंख्यक हो जायेंगे ?

मुसलमानों की जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है और जल्दी ही वे हिंदुओं से अधिक हो जाएगी।’ यह एक ऐसा मिथक है, जिसका भय कई-पढ़े लिखे शहरियों को भी है। हाल ही में एक जिम्मेदार राजनेता ने भी ऐसा ही कुछ बयान दिया, हालांकि उनका इरादा पूर्वोत्तर राज्यों में, खासतौर पर अरुणाचल प्रदेश व मिजोरम में ईसाइयों की बढ़ती आबादी पर चिंता जताना था, लेकिन यदि उत्तर प्रदेश में चुनाव हों तो ऐसे बयान कहीं और मार करते दिखते हैं। यह एक बेहद प्रचारित जुमला है कि मुसलमान जानबूझ कर कई-कई शादी करते हैं और साजिशन देश की आबादी बढ़ाते हैं। यदि पिछली कुछ जनगणनाओं के अंाकड़ों पर नजर डालें तो हकीकत सामने आ जाती है। यही नहीं यदि इसके के मूल सिद्धांतों को ठीक से समझा-पढ़ा जाए तो स्पष्ट हो जाता है कि बच्चों की अनियंत्रित संख्या इसकी मूल भावना के विपरीत है। यह विडंबना है कि समाज को तोड़ने वाले लोग, जो दोनों फिरकों में हैं, ऐसे मिथकों को हवा देते हैं, जबकि कतिपय लोग इस्लाम के नाम पर ऐसी भ्रांतियों को हवा देते हैं।
आंकड़े बोलते हैं कि गत 50 वषोंर् के दौरान भारत में हिंदुओं की आबादी कुछ कम हुई है, जबकि मुसलमानों की कुछ बढ़ी है। यह भी तथ्य है कि बीते दस सालों के दौरान मुस्लिम और हिंदू आबादी का प्रतिशत स्थिर है। अगर जनसंख्या वृद्धि की यही रफ्तार रही तो मुसलमानों की आबादी को हिंदुओं के बराबर होने में 3626 साल लग जाएंगे। वैसे भी समाजविज्ञानी यह बता चुके हैं कि सन् 2050 तक भारत की आबादी स्थिर हो जाएगी और उसमें मुसलमानों का प्रतिशत 13-14 से अधिक नहीं बनेगा।भारत सरकार की जनगणना के आंकड़ों का विश्लेषण करें तो पाएंगे कि 1971 से 81 के बीच हिंदुओं की जन्मदर में वृद्धि का प्रतिशत 0.45 था, लेकिन मुसलमानों की जन्मदर में 0.64 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई। गत् 20 वषोंर् के दौरान मुसलमानों में परिवार नियोजन के लिए नसबंदी का प्रचलन लगभग 11.5 प्रतिशत बढ़ा है, जबकि हिंदुओं में यह 10 प्रतिशत के आसपास रहा है। यहां यह भी जानना जरूरी है कि जनसंख्या वृद्धि की दर को सामाजिक-आर्थिक परिस्थितयां सीधे-सीधे प्रभावित करती हैं। शिक्षित व संपन्न समाज में नियोजित परिवार की बानगी हमारे देश में ईसाई जनसंख्या के आंकड़े हैं।
सन् 1950 से 60 के बीच भारत में ईसाइयों की जनसंख्या अपेक्षाकृत तेज रफ्तार से बढ़ी थी। भले ही कतिपय लोग इसे धर्मांतरण के कारण कहें, लेकिन हकीकत यह है कि उस दशक में स्वास्थ्य और शिक्षाओं में सुधार होने के कारण ईसाइयों की मृत्यु दर कम हो गई थी। परंतु जन्म दर उतनी ही थी। 70 के दशक में ईसाइयों की जनसंख्या में बढ़ोतरी का आंकड़ा लगभग स्थिर हो गया, क्योंकि उस समाज को परिवार नियोजन का महत्व समझ में आ गया था। यह प्रक्रिया हिंदुओं में, ईसाइयों की तुलना में थोड़ी देर से शुरू हुई। मुसलमानों में इसे और भी देर से शुरू होना ही था, क्योंकि आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से मुसलमान समाज बेहद पिछड़ा हुआ है। एक बात और गौर करने लायक है कि बांग्लादेश की सीमा से लगे पश्चिम बंगाल के छह, बिहार के चार और असम के 10 जिलों की आबादी के आंकड़ों पर निगाह डालें तो पाएंगे कि गत 30 वषोंर् में यहां मुसलमानों की आबादी बहुत तेजी से बढ़ी। और, इतनी तेजी से कि वहां के बहुसंख्यक हिंदू, अब अल्पसंख्यक हो गए। असम और बंगाल के कुछ जिलों में तो मुस्लिम आबादी का उफान 100 फीसदी से अधिक है। असल में ये अवैध विदेशी घुसपैठिए हैं। जाहिर है कि ये आबादी भी देश की जनगणना में जुड़ी है और यह बात सरकार में बैठे सभी लोग जानते हैं कि इस बढ़ोतरी का कारण गैरकानूनी रूप से हमारे यहां घुस आए बांग्लादेशी हैं। महज वोट की राजनीति और सस्ते श्रम के लिए इस घुसपैठ पर रोक नहीं लग पा रही है, और इस बढ़ती आबादी के लिए इस देश के मुसलमानों को कोसा जा रहा है।
एक यह भी खूब हल्ला होता है कि मुसलमान परिवार नियोजन का विरोध करता है। बच्चे तो अल्लाह की नियामत हैं, उन्हें पैदा होने से रोकना अल्लाह की हुक्म उदूली होता है, यह बात इस्लाम कहता है और तभी मुसलमान खूब-खूब बच्चे पैदा करते हैं, इस तरह की धारणा या यकीन देश में बहुत से लोगों को है और वे तथ्यों के बनिस्पत भावनात्मक नारों पर ज्यादा यकीन करने लगते हैं। वैसे तो जनगणना के आंकड़ों का विश्लेषण साक्षी है कि मुसलमानों की आबादी में अप्रत्याशित वृद्धि या उनकी जन्म दर अधिक होने की बात तथ्यों से परे है। साथ ही मुसलमान केवल भारत में तो रहते नहीं है या भारत के मुसलमानों की ‘शरीयत’ या ‘हदीस’ अलग से नहीं है। इंडोनेशिया, इराक, टर्की, पूर्वी यूरोप आदि के मुसलमान नसबंदी और परिवार नियोजन के सभी तरीके अपनाते हैं। भारत में अगर कुछ लोग इसके खिलाफ है तो इसका कारण धार्मिक नहीं, बल्कि अज्ञानता और अशिक्षा है। गांवों में ऐसे हिंदुओं की बड़ी संख्या है, जो परिवार नियोजन के पक्ष में नहीं हैं।यह बात सही है कि इस्लाम में गर्भपात यानी एबॉर्शन पर सख्त मनाही है। कुरआन में कहा गया है कि मुफलिसी के डर से अपने बच्चे का कत्ल न करो। इस्लाम के अनुसार, शादी अपने से बेहतर औलाद छोड़कर जाने के लिए है, न कि अपने से ज्यादा संतान छोड़ कर जाने के लिए। ईरान ने परिवार नियोजन के जरिए ही अपनी आबादी में वृद्धि को एकदम नियंत्रित कर दिया है, अगर इस्लाम में परिवार नियोजन की अनुमति न होती तो ईरान जैसे देश में ये कैसे हो पाता? पाकिस्तान सरकार अपने यहां पूरा परिवार नियोजन विभाग चलाती है। स्वास्थ्य मंत्रालय के तहत कार्यक्रम बराए बहबूदे परिवार नामक एक विभाग का गठन किया गया है, जिसके लिए सरकार हर वर्ष करोड़ों रुपए का बजट स्वीकार करती है। पाकिस्तान के महिला संगठनों का कहना है कि पाकिस्तान का मध्यम वर्ग इस कार्यक्रम में गहरी आस्था रखता है। सिंध में जमींदार इसके विरोधी हैं, क्योंकि उन्हें अपने खेतों में मजदूरी के लिए अधिक बच्चे चाहिए। पाकिस्तान में कृषि अधिकतर बच्चों की मजदूरी पर अवलंबित है, इसलिए वे परिवार नियोजन को इस्लाम विरोधी प्रचारित करते हैं। पाकिस्तान सरकार के मंत्री भी अब इस अभियान के पक्ष में बोलने लगे हैं। गर्भ निरोधक सामग्री बड़े पैमाने पर जनता में वितरित की जाती है। पिछले दिनों एक चीनी कंपनी के साथ प्रतिमाह गर्भ निरोधक आयात करने का समझौता भी किया गया है। पाकिस्तान सरकार के परिवार नियोजन के सलाहकारों में चीनी चिकित्सकों व सहायकों का अधिक समावेश किया गया है। पाकिस्तान का एक अध्ययन दल इस संबंध में और अधिक जानकारी के लिए चीन गया था, ताकि चीनी सरकार द्वारा किए गए जनसंख्या नियंत्रण उपायों का अध्ययन किया जा सके। इस संबंध में अनेक चीनी पद्धतियों को पाकिस्तान के अस्पतालों और परिवार नियोजन केंद्रों पर प्रचारित भी किया गया है।इस्लाम के धार्मिक ग्रंथ आजाल में जनसंख्या नियंत्रण के तौर तरीकों का उल्लेख है। इसमें कहा गया है कि मां का दूध पर केवल बच्चे का हक है और जब तक बच्चा 30 से 36 महीने का नहीं हो जाता, उससे यह हक नहीं छीना जाना चाहिए। स्पष्ट है कि जब तक बच्चा तीन वर्ष का नहीं हो जाता दूसरे बच्चे के जन्म के बारे नहीं सोचना चाहिए।यदि धार्मिक आधार पर देखें तो इस्लाम का परिवार नियोजन विरोधी होने की बात महज तथ्यों के साथ हेराफेरी है। फातिमा इमाम गजाली की मशहूर पुस्तक ‘इहया अल उलूम’ में पैगंबर के उस कथन की व्याख्या की है, जिसमें वे छोटे परिवार का संदेश देते हैं। हजरत मुहम्मद की नसीहत है -छोटा परिवार सुगमता है। उसके बड़े हो जाने का नतीजा है गरीबी। दसवीं सदी में रजी की किताब ‘हवी’ में गर्भ रोकने के 176 तरीकों का जिक्र है। ये सभी तरीके कोई जादू-टोना नहीं, बल्कि वैज्ञानिक हैं। भारत में सूफियों के चारों इमाम-हनफी, शाफी, मालिकी और हमबाली समय-समय पर छोटे परिवार की हिमायत पर तकरीर करते रहे हैं। विडंबना है कि हर फिजूल बातों में फतवे जारी करने वाले मुल्ले-मौलवी धर्म की सही व्याख्या कर आम मुसलमान को छोटे परिवार की सही जानकारी देते नहीं हैं। वैसे तो आज मुसलमानों का बड़ा तबका इस हकीकत को समझने लगा है, लेकिन दुनियाभर में इस्लामिक आतंकवाद के नाम पर खड़े किए गए हौए ने अल्पसंख्यकों में असुरक्षा की भावना और उसके कारण संगठत होने को मजबूर किया है। इसका फायदा कट्टरपंथी जमातें उठा रही हैं और इस्लाम की गलत तरीके से व्याख्या कर सीमित परिवार की सामाजिक व धार्मिक व्याख्या विपरीत तरीके से कर रही हैं। यह तय है कि सीमित परिवार, स्वस्थ्य परिवार और शिक्षित परिवार की नीति को अपनाए बगैर भारत में मुसलमानों की व्यापक हालत में सुधार होने से रहा। लेकिन यह भी तय है कि न तो मुसलमान कभी बहुसंख्यक हो पाएगा और न ही इस्लाम सीमित परिवार का विरोध करता है।

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