तालाब की बातें

तालाब की बातें
जल है तो जीवन है

शुक्रवार, 6 अक्तूबर 2017

collapsing Mathura , A men made tragedy

सावधान ! ढह रहा है मथुरा ?

                                                               पंकज चतुर्वेदी


देश के प्राचीन नगरों में से एक मथुरा की पुरानी बस्ती बीते कई सालों से एक अजीब समस्या से जूढ रही है- यहां अचानक ही मकान फट जाते हैं। मकानों की दरारें इतनी गहरी हैं कि उनको भरने का कोई भी प्रयास सफल नहीं होता। राश्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान ने उत्तर प्रदेश के 26 जिलों को भूकंप के प्रति संवेदनशील जोन-4 में रखा है। जोन 4 का अर्थ है कि पांच क्षमता के भूकंप आने की प्रबल संभावना व उससे कमजोर संरचनाओं की पूरी तरह तबाही। इसमें से एक मथुरा भी है, जो बीते दो दशकों से पल-पल दरक रहा है। लोग चिंता में हैं और प्रशासन किसी बड़े हादसे के इंतजार में है। द्वारिकाधीश मंदिर के पीेछे की सघन बस्ती चौबिया पाड़ा, मथुरा की पहचान है। पहाड़ी  के ढलान पर स्थित इस बसावट में गजापायसा लगभग चोटी पर है। अभी एक दशक पहले तक यहां बने मकान एक दूसरे से सटे हुए थे, आज इनके बीच तीन से छह फुट की दूरी है। कोई भी घर ऐसा नहीं है जिसकी दीवारें चटक नहीं गई हों। जब कहीं से गड़गड़ाहट की आवाज आती है तो लोग जान जाते हैं कि किसी का आशियाना उजड़ गया है। किसी का संकल्प है तो किसी की आस्था व बहुत से लोगों की मजबूरी, वे जानते हैं कि यह मकान किसी भी दिन अर्रा कर जमींदोज हो सकता है, लेकिन वे अपने पुश्तैनी घरों को छोड़ने को राजी नहीं हैं। आए रोज मकान ढह रहे हैं व सरकारी कागजी घोड़े अपनी रफ्तार से बेदिशा दौड़ रहे हैं।

कृश्ण की नगरी के नाम से विश्व प्रसिद्ध मथुरा असल में यमुना के साथ बह कर आई रेत-मिट्टी के टीलों पर बसी हुई हैं। जन्मभूमि से लेकर होली गेट तक की मथुरा की आबादी लगभग नदी के तट पर ही हैं।  नगर के बसने का इतिहास सात सौ साल पहले का है, लेकिन अभी दो षतक पहले तक यहां टीलों पर केवल अस्थाई झुग्गियां हुआ करती थीं। वैसे तो मथुरा ब्रज में कंकाली टीला, भूतेश्वर टीला, सोंख टीला, सतोहा टीला, गनेशरा टीला कीकी नगला, गौसना, मदनमोहन मंदिर टीला जैसे कई बस्तियां हैं। लेकिन सबसे घनी बस्ती वाले हैं - चौबों का टीला, उसके बगल में गोसाईयों की बस्ती व पीछे का कसाई पाड़ा। जब चौबों के यहां जजमान आने लगे, परिवहन के साधन बढ़े तो असकुंडा घाट के सामने द्वारिकाधीश मंदिर के पीछे चौबों ने टिकाने बना लिए। देखते ही देखते पूरी पहाड़ी पर बहुमंजिला भवन बन गए। फिर उनमें षौचालय, सीवर, बिजली, एसी लगे।
कोई दो दशक पहले इप बस्तियों में मकान में दरार आना षुरू हुईं, पहले तो इसे निर्माण के दौरान कोई कमी मान लिया गया, लेकिन जब मकानों के बीच की दूरियां बढ़ीं और उसके बाद मकान का ढह कर बिखर जाने का सिलसिला षुरू हुआ तो लोगों की चिंताएं बढ़ने लगीं। अभी तक चौबच्चा, काला महल, सतघड़ा, ताजपुरा, महौली की पौर, घाटी बहालराय, सरवरपुरा, काजी पाड़ा, रतन कुंड, नीम वाली गली सहित 35 मुहल्लों में हजार से ज्यादा मकान ताश के पत्तों की तरह बिखर चुके हैं। नगर पालिका ने जब इसी प्रारंभिक जाच की तो पता चला कि लगभग 90 साल पहले पड़ी पानी सप्लाई की भूमिगत लाईन जगह-जगह से लीक कर रही थी व उससे जमीन दलदल बन कर कमजोर हुई। लगातार लीकेज ठीक करने का काम भी हुआ, लेकिन मर्ज काबू में नहीं आया। आठ साल पहले आईआईटी रूड़की का एक दल भी यहां जांच के लिए आया। उन्होंने जमीन के ढहने के कई कारण बताए- जमीन की सहने की क्षमता से अधिक वजन के पक्के निर्माण, अंधाधुंध बोरिंग करने से भूगर्भ जल की रीता होना व उससे निर्वात का निर्माण तथा, जल निकासी की माकूल व्यवस्था ना होना।  शहर का ये प्राचीन हिस्सा यमुना के किनारे टीलों पर बसा है। जानकारों का कहना है कि ये टीले अब धंस रहे हैं, जिससे ये समस्या पैदा हो रही है। यहां पानी के लिए बेहिसाब हो रहीं बोरिंग भी हैं। इन बोरिंग से भू-गर्भ जल की कमजोर होती स्थिति भी इन टीलों के धंसने का कारण बन रही है और मकान फट रहे हैं।

यह भी सामने आया है कि सीवर व पानी की लाईन में अवैध कनेक्शन लीकेज का सबसे बड़ा कारण हैं। मामला विधान सभा में भी उठा, लेकिन सरकार में बैठे लोगों को ना तो समस्या की सटीक जानकारी रही और ना ही उसके समाधान का सलीका। अब हर दिन समस्या पर विमर्श तो होता है, लेकिन समाधान के प्रयास नहीं।
जवाहरलाल नेहरू षहरी परियोजना के तहत यहां सीवर व ड्रेनेज के अलावा पेयजल लाईनें नए सिरे से बिछाने का बजट भी कें्रद को भेजा गया, लेकिन स्वीकृत नहीं हुआ। चौबच्चा, काला महल, गजापाइस, गोलपाड़ा, नगला पाइसा, नीम वाली गली, मानिक चौक, काजी पाड़ा, रतनकुंड, छौंकापाड़ा, सरवरपुरा, सतघड़ा, ताजपुरा, महोली की पोर, तुलसी चबूतरा, घाटी बहालराय आदि कुछ ऐसे मुहल्ले हें जहां हर घर दहशत के साये में है।

असल में इस समस्या को बुलाया तो बाशिंदों ने ही है। रेत व पीली मिट्टी के टीलों पर मनमाने ढंग से मकान तान दिए गए। फिर सन साठ के बाद मकानों में ही षौचालय बने व उसकी माकूल तकनीकी निकासी का जरिया बना नहीं। जब बढ़ी आबादी के लिए पानी की मांग हुई तो जमीन का सीना चीर कर नलकूप रोपे गए। दो से पांच फुट चौड़ी गलियो ंमें जम कर एयरकंडीशनर लगे। यही नहीं बस्ती से सट कर बह रही यमुना को होली गेट के करीब बैराज बना कर बांधा गया। इनका मिला-जुला परिणाम है कि जमीन भीतर से खोखली, दलदली व कमजोर हो गई। एसी व अन्य कारकों से तापमान बढ़ने ने इस समस्या को और विकराल बनाया। सरकार में बैठे लोग समस्या को समझते हैं लेकिन ऐसा कोई फैसला लेने से बचते हैं जिसमें  जनता को कोई नसीहत हो। परिणाम सामने हैं आए दिन मकान ढहते हैं, बयानबाजी होती है और हालात जस के तस रह जाते हैं।

एक आशंका यह भी है कि पूरा मथुरा शहर बीस किमी दायरे वाली सुरंग के उपर है और अब सुरग ढह रही है।यह सुरग मधुवन से श्रीकृष्ण जन्मभूमि के नीचे होकर कंस किला व कंस टीला तक फैली है। किवदंति है कि लवणासुर ने मधुवन में सुरंग बनाई थी। जो मंशा टीला, श्रीकृष्ण जन्मभूमि, कंस टीले के नीचे होते कंस किले के समीप यमुना तक बनी है। उन्होंने बताया कि चार दशक पहले लोग लवाणसुर की बनाई सुरंग में काफी अंदर तक घुस जाते थे। इसमें एक कुआं भी था। कच्ची सुरंग जगह-जगह से ढह गई, तो इसको बंद कर दिया है। अब सिर्फ इसके अवशेष ही रह हैं। कुछ साल पहले दिल्ली-आगरा रेलवे ट्रैक के काम के दौरान लक्ष्मीनगर के समीप गुफा के सबूत मिले थे। रेलवे ने मिट्टी भरवाकर सुरंग को बंद करा दिया।
हालांकि अभी तक किसी भी भूकंप के दौरान मथुरा में कभी कोई नुकसान नहीं हुआ है लेकिन अब पुरानी बस्ती में मकानों के बच बढ़ती दरारें किसी अनहोनी की आशंका से डरा रही हैं। यदि मथुरा की पुरानी बस्ती को बचाना है तो सबसे पहले वहां हर तरीके के नए निर्माण पर रोक लगनी चाहिए। फिर बैराज के बनने से  बढ़े दलदल व जमीन के कमजोर होने का अध्ययन होना चाहिए। भूजल पर पाबंदी तो है लेकिन उस पर अमल नहीं। यह जान लें कि पहाड़ पर बनी बस्तिययों में नीचे की ओर जल निकासी निर्बाध होना चाहिए व कहीं भी लीकेज बेहद खतरनाक हो सकता हे। यदि इन ंिबदुओं के साथ पुराने मथुरा के पुनर्वासन पर काम किया जाए तो मकानों के ढहने की समस्या का निराकरण करना कठिन नहीं है।

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