My writings can be read here मेरे लेख मेरे विचार, Awarded By ABP News As best Blogger Award-2014 एबीपी न्‍यूज द्वारा हिंदी दिवस पर पर श्रेष्‍ठ ब्‍लाॅग के पुरस्‍कार से सम्‍मानित

मंगलवार, 2 दिसंबर 2014

children needs scientific temper


विज्ञान से विमुख क्यों हो रहे हमारे बच्चे
                                                                                                                                                             पंकज चतुर्वेदी, वरिष्ठ                                                                                                                                                                                                                         पत्रकार





HINDUSTAN 3-12-14
http://epaper.livehindustan.com/epaper/03-12-2014-1-edition-Delhi-Page-1.html
बाल मन और जिज्ञासा एक-दूसरे के पूरक शब्द हैं। उम्र बढ़ने के साथ अपने परिवेश की हर गुत्थी को सुलझाने की जुगत लगाना बाल्यावस्था की मूल-प्रवृत्ति है। लेकिन हमारे नीति-निर्धारक लगातार चेता रहे हैं कि बच्चे विज्ञान से विमुख हो रहे हैं। कंप्यूटर,  सूचना-तकनीक,  अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में दुनिया के विकसित देशों को टक्कर देने वाले भारत में ज्योतिषियों,  कॉरपोरेट बाबाओं और फकीरों के जलवे चरम पर हैं। जाहिर है,  यह एक अजीब विरोधाभास है और शायद चेतावनी का बिंदु भी। देश में छह से 17 वर्ष के स्कूल जाने वाले बच्चों की संख्या लगभग 16 करोड़ है। इनके अलावा अनगिनत ऐसी बच्चियां और लड़के भी हैं,  जो स्कूल नहीं जा पा रहे,  लेकिन वे भी सांस लेते हैं, भोजन-पानी उनकी भी आवश्यकता है,  फिर उन्हें विज्ञान के ज्ञान से वंचित कैसे रखा जा सकता है?  इतना बड़ा बाजार और पुस्तकें नहीं के बराबर। अनुमान है कि देश में सभी भाषाओं में मिलाकर पाठ्यक्रमों से इतर विज्ञान पुस्तकों का सालाना आंकड़ा बमुश्किल पांच सौ को पार कर पाता है। यह एक कटु सत्य है कि दिल्ली जैसे महानगर में एक फीसदी बच्चों के पास उनके पाठ्यक्रम के अलावा कोई विज्ञान-पुस्तक पहुंच ही नहीं पाती। उन बच्चों के लिए विज्ञान के मायने एक उबासी देने वाला,  कठिन परिभाषाओं वाला विषय मात्र है। लेकिन इन बच्चों को जब कुछ प्रयोग करने को कहा जाता है या फिर यूं ही अपनी प्रकृति में विचरण के लिए कहा जाता है,  तो वे उसमें डूब जाते हैं। पुस्तक मेलों में ही देख लें। जहां जादू,  मनोरंजक खेल,  कंप्यूटर पर नए प्रयोग सिखाने वाली सीडी बिक रही होती है,  वहां बच्चों की भीड़ होती है।
इन दिनों विज्ञान-गल्प के नाम पर विज्ञान के चमत्कारों पर ठीक उसी तरह की कहानियों का प्रचलन भी बढ़ा है, जिनमें अंधविश्वास या अविश्वसनीयता की हद तक के प्रयोग होते हैं। किसी अन्य ग्रह से आए अजीब जीव या एलियन या फिर रोबोट के नाम पर विज्ञान को हास्यास्पद बना दिया जाता है। समय से बहुत आगे या फिर बहुत पीछे जाकर कुछ कल्पनाएं की जाती हैं। यह विडंबना है कि आज बाजार पौराणिक,  लोक और परी कथाओं से पटा हुआ है। हमारे देश के लेखक ऐसा विज्ञान-गल्प तैयार करने में असफल रहे हैं, जिसके गर्भ में नव-सृजन के कुछ अंश हों। बच्चों के बीच विज्ञान की पुस्तकों को लोकप्रिय बनाने और उनके ज्ञान के माध्यम से समाज में जागरूकता लाने का यदि ईमानदार प्रयास करना है,  तो किताबें तैयार करते समय उनकी भाषा,  स्थानीय परिवेश के विज्ञान,  वे जो कुछ पढ़ रहे हैं,  उसका उनके जीवन में उपयोग कहां व कैसे होगा,  पुस्तकों के मुद्रण की गुणवत्ता और उनके वाजिब दाम आदि पर ध्यान देना होगा। हर बच्चा नैसर्गिक रूप से वैज्ञानिक नजरिये वाला होता है। जरूरत है बस उसे अच्छी किताबों व प्रयोगों के जरिये तार्किक बनाने की।

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