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बुधवार, 15 जनवरी 2014

केन- बेतवा के जोड़ से घाटे में बुन्देलखं दैनिक हिंदुस्‍तान 15 1 2014http://paper.hindustantimes.com/epaper/viewer.aspx, राज एक्सप्रेस ३१-१-१४ , नईदुनिया , ३१-१-१४

 नईदुनिया , भोपाल ३१-१-१४
राज एक्सप्रेस, भोपाल ३१-१-१४
नदियां जोडने से तो घाटे में रहेगा बुंदेलखंड
पंकज चतुर्वेदी
सुप्रीम कोर्ट ने कह दिया कि देषभर की नदियों को जोड़ने का काम जल्द ही पूरा किया जाए। इस तरह की पहली परियोजना तो बुंदेलखंड में ही षुरू होनी थी- जोड़ की पहली परियोजना जल्दी ही षुरू हांे सकती है। पूरे तेरह साल लग गए इसे अपने क्रियान्वयन के स्तर पर आने पर। जाहिर है कि जिस इलाके के जन प्रतिनिधि जनता के प्रति कुछ कम जवाबदेह होतेे हैैं, जहां की जनता में जागरूकता की कमी होती है, जो इलाके पहले से ही षोशित व पिछड़ा होते हंै, सरकार में बैठे लोग उस इलाके को नए-नए खतरनाक व चुनौतीपूर्ण प्रयोगोें के लिए चुन लेतेे हैं । सामाजिक-आर्थिक नीति का यही मूल मंत्र है । बुंदेलखंड का पिछड़ापन जगजाहिर है , वहां सूखा हर तीन साल में आता है । इलाका भूकंपप्रभावित क्षेत्र है । कारखाने हैं नहीं, । जीवकोपार्जन का मूल माध्यम खेती है और आधी जमीन उचित सिंचाई के अभाव में कराह रही है । नदियों को जोड़ने के प्रयोग के लिए इससे बेहतर षोशित इलाका कहां मिलता । सो देष के पहले नदी-जोड़ो अभियान का समझौता इसी क्षेत्र के लिए कर दिया गया । समझौते में जन प्रतिनिधियों, स्थानीय नागरिकों की सहमति लेेने  के बारे में सोचा ही नहींे गया, सो स्थानीय हितों पर आषंकाओं की तलवार लटकी रहना लाजिमी है । अब तो राहंल गांधी भी बोल चुके हैं कि  नदियों का जोड़ घाटे का सौदा है। इसके बावजूद बंुदेलखंड में केन-बेतवा को जोड़ने का काम चल रहा है। हालांकि हाल ही में कांग्रेस के राजकुमार राहुल गांधी भी नदी-जोड़ परियोजनाओं को पर्यावरण और समाज-हित के विपरीत करार दे चुके हैं।
देष की सूखी नदियों को सदानीरा नदियों से जोड़ने की बात लगभग आजादी के समय से ही षुरू हो गई थी । प्रख्यात वैज्ञानिक-इंजीनियर सर विष्वैसरैया ने इस पर बाकायदा षोध पत्र प्रस्तुत किया था । पर्यावरण को नुकसान, बेहद खर्चीली और अपेक्षित नतीजे ना मिलने के डर से ऐसी परियोजनाओं पर क्रियान्वयन नहीं हो पाया । जब देष में विकास के आंकड़ों का आकलन सीमेंट-लोहे की खपत और उत्पादन से आंकने का दौर आया तो अरबों-खरबों की परियोजनाओं के झिलमिलाते सपने दिखाने में सरकारें होड़ करने लगीं ।  केन-बेतवा नदी को जोड़ने की परियोजना को फौरी तौर पर देखें तो स्पश्ट हो जाता है कि इसकी लागत, समय और नुकसान की तुलना में इसके फायदे नगण्य ही हैं । विडंबना है कि उत्तर प्रदेष को इस योजना में बड़ी हानि उठानी पड़ेगी तो भी राजनैतिक षोषेबाजी के लिए वहां की सरकार इस आत्महत्या को अपनी उपलब्धि बताने से नहीं चूक रही है ।
‘‘नदियों का पानी समुद्र में ना जाए, बारिष  में लबालब होती नदियां गांवेंा -खेतों में घुसने के बनिस्पत ऐसे स्थानों की ओर मोड़ दी जाए जहां इसे बहाव मिले तथा समय- जरूरत पर इसके पानी को इस्तेमाल किया जा सके ’’ - इस मूल भावना को ले कर नदियों को जोड़ने के पक्ष में तर्क दिए जाते रहे हैं । लेकिन यह विडंबना है कि केन-बेतवा के मामले में तो ‘‘ नंगा नहाए निचोडै़ क्या’ की लोकोक्ति सटीक बैठती है । केन और बेतवा दोनों का ही उदगम स्थल मध्यप्रदेष में है । दोनो नदियां लगभग समानांतर एक ही इलाके से गुजरती हुई उत्तर प्रदेष में जा कर यमुना में मिल जाती हैं । जाहिर है कि जब केन के जल ग्रहण क्षेत्र में अल्प वर्शा या सूखे का प्रकोप होगा तो बेतवा की हालत भी ऐसी ही होगी । वैसे भी केन का इलाका पानी के भयंकर संकट से जूझ रहा है । सरकारी दस्तावजे दावा करते हैं कि केन में पानी का अफरात है । जबकि हकीकत इससे बेहद परे है ।
सन 1990 में केंद्र की एनडीए सरकार ने नदियों के जोड़ के लिए एक अध्ययन षुरू करवाया था और इसके लिए केन बेतवा को चुना गया था। सन 2005 में मध्यप्रदेष और उत्तरप्रदेष सरकार के बीच इस परियोजना व पानी के बंटवारे को ले कर एक समझौते पर दस्तखत हुए। सन 2007 में केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने इस परियोजना में पन्ना नेषनल पार्क के हिस्से को षामिल करने पर आपत्ति जताई। हालांकि इसमें कई और पर्यावरणीय संकट हैं लेकिन सन 2010 जाते-जाते सरकार में बैठे लोगों ने प्यासे बुंदेलखंड को एक चुनौतीपूर्ण प्रयोग के लिए चुन ही लिया।
यहां जानना जरूरी है कि 11 जनवरी 2005 को केंद्र के जल संसाधन विभाग के सचिव की अध्यक्षता में मध्य प्रदेष, उत्तर प्रदेष और राजस्थान के मुख्य सचिवों की बैठक हुई थी, जिसमें केन-बेतवा को जोड़ने पर विचार हुआ था । उस मीटिंग में उ.प्र. के अधिकारियों ने स्पश्ट कहा था कि केन में पानी की अधिकता नहीं है और इसका पानी बेतवा में मोड़ने से केन के जल क्षेत्र में भीशण जल संकट उत्पन्न हो जाएगा । केंद्रीय सचिव ने इसका गोल मोल जवाब देते हुए कह दिया कि इस विशय पर पहले ही चर्चा हो चुकी है, अतः अब इस पर विचार नहीं किया जाएगा । इस मीटिंग में उ.्रप्र. के अफसरों  ललितपुर के दक्षिणी व झांसी जिले के वर्तमान में बेहतरीन सिंचित खेतों का पानी इस परियोेजना के कारण बंद होने की संभावना भी जताई, जिस पर कोई माकूल उत्तर नहीं मिला ।
केन-बेतवा मिलन की सबसे बड़ी त्रासदी तो यह होगी कि राजघाट व माताटीला बांध पर खर्च अरबों रूपए  व्यर्थ हो जाएंगे । यहां बन रही बिजली से भी हाथ धोना पड़ेगा । केंद्र सरकार ने यह बात मानी तो लेकिन लगभग उसी धुन पर गा दिया कि ‘‘कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है ’’ यहां तो कुछ पाने के लिए बहुत कुछ खोने की नौबत है ।
उल्लेखनीय है कि राजघाट परियोजना का काम जापान सरकार से प्राप्त कर्जे से अभी भी चल रहा है,  इसके बांध की लागत 330 करेाड से अधिक तथा बिजली घर की लागत लगभग 140 करोड़ है  । राजघाट  से इस समय 953 लाख यूनिट बिजली भी मिल रही है । यह बात भारत सरकार स्वीकार कर रही है कि नदियों के जोड़ने पर यह पांच सौ करोड बेकार हो जाएगा । जनता की खून-पसीने की कमाई से निकले टैक्स के पैसे की इस बरबादी पर किसी को काई गम भी नहीं हो रहा है । यहां तो उत्सव का माहौल है - नया निर्माण, नए ठेके और नए सिरे से कमीषन !
उस मीटिंग में उ.्रप्र. सरकार जल के बंटवारे से भी सहमत नहीं थी । उ.प्र. की मांग ािी कि दौडत्रन बांध के लिए 60 टी.एम.सी. पानी के अलावा  उसे स्थानीय व औद्योगित जरूरतों की पूर्ति के लिए 12.5 टीएमसी पानी और मिले । इससे म.प्र. सरकार सहमत नहीं थी । मुख्यमंत्रियों द्वारा किए गए समझौते में वह बंटवारा अभी भी अनिर्णय की स्थिति में है ।
प्रख्यात चिंतक प्रो. योगेन्द्र कुमार अलघ का स्पश्ट कहना है कि केन-बेतवा को जोड़ना बेहद दूभर और संवेदनषील मसला है । इस इलाके में सामान्य बारिष होती है और यहां की मिट्टी कमजोर है , जबकि ऊंचे-ऊंचे उतार हैं जाहां से पानी तेजी से नीचे उतरता है । प्रो. अलघ ने कहा कि इस परियोजना को बनाते समय यह विचार ही नहीं किया गया कि बंुदेलखंड में जौ, दलहन, तिलहन, गेंहू जैसी फसलें होती हैं, जिन्हें सिंचाई के लिए अधिक पानी की जरूरत नहीं होती है । जबकि इस योजना में सिंचाई की जो तस्वीर बताई गई है, वह धान जैसे अधिक सिंचाई वाली फसल के लिए कारगर है ।
जाहिर है कि इस परियोजना को तैयार करने वालों को बंुदेलखंड की भूमि, उसके उपयोग, आदि की वास्तविक जानकारी नहीं है ।  महज नक्षों, टोपोषीट के सहारे  करीब 2000 करोड़ रुपए खर्च कर 231 किलोमीटर लंबी नहर के माध्यम से केन का पानी बेतवा में डालने की योजना बना ली गई है । यह भी एक दुर्भाग्य ही है कि इन दोनों नदियों को जोड़ने के बारे में नेषनल वाटर डेवलपमेंट एजेंसी ने जिस रिपोर्ट को प्रस्तुत किया है , उसे 20 साल पहले तैयार किया गया था । यह रिपोर्ट तकनीकी समिति द्वारा नकार दी गई थी । सरकार की वेबसाईट पर आज भी 20 साल पुराने आंकडों के साथ नदियों को जोड़ने से होने वाली खुषहाली के सपने दिखाए जा रहे हैं ।
इस परियोजना से कई लाख लोगों को विस्थापित करना होगा । इसकी चपेट में पन्ना के राश्ट्रीय पार्क का बड़ा हिस्सा भी होगा, जिसे बाघ का प्राकृतिक आवास माना जाता है ।  केन के घडियालों के पर्यावास पर इसका विशम प्रभाव होना तय है । इसके कारण कई हजार हैक्टर ऐसी भूमि नश्ट हो जाएगी, जिस पर आज बढिया सिंचाई हो रही है । परियोजना का कार्यकाल 9 साल बताया जा रहा है, लेकिन सरकार की अभी तक की सभी परियोजनाएं गवाह हैं कि इसका 15 सालों में भी पूरा होना संदेहास्पद ही रहेगा ।  यानी एक सुनहरे सपने की फिराक में एक पूरी पीढ़ी को कश्ट झेलने होंगे ।
हमारे देष में लेाकतंत्र है । लोकतंत्र में उम्मीद की जाती है कि जनता से जुड़े किसी मसले पर जनता की सहमति अवष्य ली जाए । अरबों रुपए बर्बाद किए जाएंगे, अरबों का नया खर्चा होगा, हजारों को उजाड़ा जाएगा ; लेकिन इस बारे में आम लोगों को न तो जानकारी दी जा रही है और न उनकी सहमति ली गई । क्षेत्र के पर्यावरणविदेां,, जन प्रतिनिधियों, सामाजिक संगठनों, प्रचार माध्यमों किसी को भी यह नहीं बताया जा रहा है कि इस परियोजना से फायदे व नुकसान क्या होंगे ।
बुंदेलखंड में लगभग 4000 तालाब हैं, इनमें से आधे कई किलोमीटर वर्ग क्षेत्रफल के हैं । ये तालाब हजार से अधिक वर्श पुराने हैं और स्थानीय तकनीक व षिल्प के अद्भ्ुात नमूने हैं । काष , सरकार कुछ करोड़ खर्च कर इन तालाबों को गहरा  करने व मरम्मत करने पर विाचार करती । काष बारिष में उफनती केन को उसकी ही उप नदियों - बन्ने, केल, उर्मिल, धसान आदि से जोड़ने की योजना बनाई होती । प्रो. अलघ का भी कहना है कि बंुदेलखंड में एक बड़ी परियोजना के बनिस्पत कई छोटी-छोटी योजनाओं पर काम किया जाए तो बेहतर होगा ।

पंकज चतुर्वेदी
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सोमवार, 13 जनवरी 2014

दैनिक जागरण राष्‍ट्रीय संस्‍करण 13 जनवरी 2014 http://epaper.jagran.com/epaper/13-jan-2014-262-National-Page-1.html

विस्थापन से बड़ी कोई त्रासदी नहीं
पंकज चतुर्वेदी
विचित्र विडंबना है, कोठ्र अपने घर-गांव से बेदखल किया जाता है तो आज का अर्थषास्त्र, समाज षास्त्र को पैताने पर रख कर उसमें विकास के प्रतिमान तलाष रहा है। हकीकत तो यह है कि ‘आजादी के बाद भारत की सबसे बड़ी त्रासदी किसको कहा जा सकता है ?’ यदि इस सवाल का जवाब ईमानदारी से खोजा जाए तो वह होगा -कोई पचास करोड़ लोगों का अपने पुष्तैनी घर, गांव, रोजगार से पलायन। और ‘आने वाले दिनों की सबसे भीशण त्रासदी क्या होगी ?’ आर्थिक-सामाजिक ढ़ांचे में बदलाव का अध्ययन करें तो जवाब होगा- पलायन से उपजे षहरों का --अरबन-स्लम’ में बदलना सामजिक, आर्थिक, पर्यावरणीय और विकास की परिभाशाओं में केवल पूंजी की जयजयकार होना। पलायन विकास के नाम पर उजाड़े गए लेागों का, पलायन आतंकवाद के भय से उपजा, पलायन अपने पुष्तैनी घर पर माकूल रोजगार ना मिलने के कारण बेहतर भविश्य की कामना में षहरों का, पलायन पारंपरिक दक्षता या वृृत्ति के बाजारवाद की भेट चढ़कर अप्रासंगिक हो जाने का।
जब से मुल्क में विकास का ‘कंक्रीट माॅडल’’ परवान चढ़ा, तभी से पलायन सुरसामुख की तरह विस्तारित हुआ। सौ साल पहले बनी राजधानी दिल्ली को उगाने के लिए पहली बार इतने हजार लोगों को बुंदेलखड, राजस्थान से हाॅंक कर दिल्ली लाया गया था। उसके बाद देष की आजादी की पहली घटना ही रक्तरंजित विस्थापन की थी। इसी का परिणाम है कि देष की लगभग एक तिहाई आबादी  31.16 प्रतिषत अब षहरों में रह रही हैं। भारत में इस समय कोई 3600 बांध हैं, इनमें से 3300 आजादी के बाद ही बांधे गए। अनुमान है कि प्रत्येक बांध की चपेट में औसतन बीस हजार लोगों को घर-गांव, रोटी-रोजगार से उजाड़े गए।  यानी कोई पौक्ने सात करोड़ लोग तो षहरों  के लिए बिजली या खेतों के लिए पानी उगाहने के नाम पर विस्थापित हुए। यह भी साजिष है या  अनायास कि बांधों के अििधकांष प्रोजक्ट अनुसचित कही जाने वाली जातियां के इलाकों में ही रहे, तभी विस्थापित लोगों में 40 प्रतिषत आदिवासी और 20 प्रतिषत अनुसचित जाति के लोग हैं। जबरिया उजाड़े गए 36 फीसदी लोग ग्रामीण अंचल के गरीब परिवार के रहे हैं।  कहा जा सकता है कि देष की लगभग दस फीसदी आबदी महज बांध के नाम पर उजाड़ी जा चुकी है। अन्य कारणों से उजाड़ने के आंकड़े जोडे जाएं तो मुल्क की 35 फीसदी आबादी किसी ना किसी कारण से बीते साठ सालों में पलायित हुई हे। इनमें बांध, सड़क, कारखाने, संरक्षित वन , प्रकृतिक अपदाएं जैसेसहित ना जाने कितने कारक हैं। चलो पलयान को विकास की स्वाभाविक प्रक्रिया के आधुनिक सिद्धांत को एक बारगी मान भी लिया जाए तो पुनर्वास भी तो उसी नीति का दूसरा समान पहलु होना चाहिए ना ? यह सरकार स्वीकारती है कि उजाड़े गए लोगों का फिर से बसाने में संतुश्टि बामुष्किल पच्चीस फीसदी है, यानी तीन चैथाई उजाड़े गए लोग पुनर्वास नीति से हताष हैं।   पष्चिम बंगाल की फरक्का थर्मल पावर प्लंाअ के कारण 63,325 लोगों को घर-बार से उजाड़ने का आंकड़ा सन 1994 में विष्व बैंक ने दिया था और उनके पुनर्वास का आंकड़ा षून्य रहा। जाहिर है कि राज्य सरकार ने लोगों को अपने हाल पर छोड दिया था। तीन साल पहले का बंगाल का सिंगूर या उडीसा का पास्को विवाद जमीन से उजउ़ने से ज्यादा सही तरीके से तत्काल पुनर्वास को ले कर ही था और सरकार के पास इसकी कोई स्पश्ट नीति नहीं है। कर्नाटक के बागलकोट जिले में कृश्णा नदी पर बीते चालीस सालों से बन रहे अलमाटी बांध में सन 1969 की जनगणना के आधार पर  136 गांवों के एक लाख अस्सी हजार लोगों के विस्थापन का अंदाज था।  मामला कभी अदालत में तो कभी सियासत में उलझा रहा। सरकार का दावा था कि इस परियोजना का पुनर्वास देष के सामने मिसाल होगा, लेकिन समय के साथ बए़ती परियोजना व उसके साथ ही बढ़ती आबादी के चलते सब सपने हवा हो गए। अलमाटी बांध वहां के लोगों के लिए मुफिलिसी, सामाजिक बिखराव व बीमारियों की सौगात ले कर आया हे। नर्मदा बांध की कहानी भी इससे अलग नहीं है।
घर-गांव छोड़ कर अधर में लटकने का दर्द देखना हो तो बस्तर में देखें- सरकारी मिलिषय ‘सलवा जुड़ुम’ में फंस कर कई हजार लोग राहत षिविरों में आ गए। कई हजार करीबी आंध्र प्रदेष  या उड़ीसा में चले गए। अब वे ना तो घर के रहे ना घाट के। हर तरफ मौत है, गरीबी है और सबसे बड़ी विडंबना इन षिविरों में वे अपनी बोली, संस्कृति, नाच, भोजन,नाम, नाच सबकुछ बिसरा रहे हैं। एक तरफ नक्सली हैं तो दूसरी ओर खाकी वाले। ठीक इसी तरह का विस्थापन व पलायन आतंकवाद ग्रस्त कष्मीर का है। वहां के कष्मीरी पंडित जम्मू के राहत षिविरां में नारकीय जीवन जी रहे हैं। इसी तरह आतंकवाद के कारण पलायन के किस्से उत्तर-पूर्वी राज्यों में भी सामने आते हैं।  कर्नाटक का नागरहाले हो या फिर म.प्र. का पन्ना संरक्षित वन क्षेत्र, हर जगह कई हजार आदिवासियों को जंगल के नाम पर खदेड़ दिया गया। यही हनीं 19 राज्यों में 237 स्पेषल एकोनोमिक जोन यानी सेज के नाम पर एक लाख 14 हजार लोगों को जमीन से बेदखल करने का आंकड़ा सरकारी है। इन लोगों के खेतों में काम करने वाले 84 हजार लोगों के बेराजगार होने का दर्द तो मुआवजे के लायक भी नहीं माना गया।
पस या रोजगार के लिए घर छोड़ने के हर साल पांच लाख से ज्यादा मामले बंुदेलखंड, राजस्थान, बिहार और पूर्वी उ.्रप से आते हैं। इनके यहां या तो पर्याप्त खेती की जमीन नहीं है, या फिर सामंती तत्व पूरी मजदूरी नहीं देते या फिर मेहनत-मजदूरी करने से सामाजिक-षान को चोट पहुंचती हे। कई हजार पढ़े-लिखे लोग अपने इलाके-राज्य में ठीक-ठाक रोजगार का अवसर ना मिलने के कारण महानगरों की ओर आते हैं और इनमें से आधे कभी लौटते नहीं हैं। 2011 की जनगणना के आंकड़े गवाह हैं कि गांव छोड़ कर षहर की ओर जाने वालों की संख्या बढ़ रही है और अब 37 करोड 70 लाख लोग षहरों के बाषिंदे हैं । सन 2001 और 2011 के आंकड़ों की तुलना करें तो पाएंगे कि इस अवधि में षहरों की आबादी में नौ करोड़ दस लाख का इजाफा हुआ जबकि गावंो की आबादी नौ करोड़ पांच लाख ही बढ़ी।
देष के सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी में सेवा क्षेत्र का योगदान 60 फीसदी पहंुच गया है जबकि खेती की भूमिका दिनो-दिन घटते हुए 15 प्रतिषत रह गई है। जबकि गावोे की आबादी अभी भी कोई 68.84 करोड़ है यानी देष की कुल आबादी का दो-तिहाई। यदि आंकड़ों को गौर से देखें तो पाएंगे कि देष की अधिकांष आबादी अभी भी उस क्षेत्र में रह रही है जहां का जीडीपी षहरों की तुलना में छठा हिस्सा भी नहीं है। यही कारण है कि गांवों में जीवन-स्तर में गिरावट,  षिक्षा, स्वास्थ्य, मूलभूत सुविधाओं का अभाव, रोजगार की कमी  है और लोगों बेहतर जीवन की तलाष में षहरों की ओर आ रहे हैं।
वैसे तो अगस्त-2013 में संसद ने भूमि अणिग्रहण का पुनद्र्वार व पुनर्वास विधेयक को पास किया है जिसमें विकास के लिए जमीन अधिग्रहण के कानून को बेहद सख्त बनाया गया है। लेकिन आमतौर पर विकास या अन्य कारणों से जो लगा अपना पुष्तैनी बिरवा छोड़ते हैं वे जमीन के मालिक होते ही नहीं हे। मालिक को तो जमीन का मुआवजा मिला, लेकिन जमीन पर मजदूरी कर पेट पालने वाले के पल्ले तो कुछ पड़ा नहीं और उसे तो भूखे पेट ही पलायन करना पड़ता है। वैसे तो अंततराश्अªीय मानवाधिकर संधिक की धारा 11.0 में कहा गया है कि दुनिया के प्रत्येक नागरिक को आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक अस्मिता की रक्षा का अधिकार है। दुखद है कि इतनी बड़ी संख्ष्या में पलायन हो रही आबादी के पुनर्वास की भात में कोई योजना नहीं है, साथ ही पलायन रोकने, विस्थापित लोगों को न्यूनतम सुविधाएं उपलब्ध करवाने व उन्हें षोशण से बचाने के ना तो कोई कानून हें और ना ही इसके प्रति संवेदनषीलता।

राज एक्‍सपेस, भोपाल 13 जनवरी 2014 http://epaper.rajexpress.in/Details.aspx?id=185025&boxid=173233593

किनारों को खाते समुद्र
पंकज चतुर्वेदी
देष के दक्षिणी राज्यों कर्नाटक, केरल, और तमिलनाडु में समुद्र तट पर हजारों गांवों पर इन दिनों सागर की अथाह लहरों का आतंक मंडरा रहा है । समुद्र की तेज लहरें तट को काट देती हैं और देखते ही देखते आबादी के स्थान पर नीले समुद्र का कब्जा हो जाता है । किनारे की बस्तियों में रहने वाले मछुआरे अपनी झोपडि़यां और पीछे  कर लेते हैं। कुछ ही महीनों में वे कई किलोमीटर पीछे खिसक आए हैं । अब आगे समुद्र है और पीछे जाने को जगह नहीं बची है । कई जगह पर तो समुद्र में मिलने वाली छोटी-बड़ी नदियों को सागर का खारा पानी हड़प कर गया है, सो इलाके में पीने, खेती और अन्य उपयोग के लिए पानी का टोटा हो गया है ।
कर्नाटक में उल्लाल के पास स्थित मछुआरों का गांव काटेपुरा गत तीन-चार सालों में कोई एक किमी पीछे खिसक चुका है।वहां बहने वाली नेत्रवती नदी से सागर की दूरी बामुश्किल सौ मीटर बची है । मरावंथे गांव किसी भी दिन समुद्र के उदरस्थ हो जाएगा । यहां उमड़ते समुद्र और नदी के बीच की महज एक पतली सी सड़क बची है ।
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समुद्र की जल सीमा में हो रहे फैलाव का अभी तक कोई ठोस कारण नहीं खोजा जा सका है । कर्नाटक के सिंचाई विभाग द्वारा तैयार की गई ‘राष्ट्रीय समुद्र तट संरक्षण रिर्पोट’ में कहा गया है कि सागर-लहरों की दिशा बदलना कई बातों पर निर्भर करता है । लेकिन इसका सबसे बडा कारण समुद्र के किनारों पर बढ़ते औद्योगिकीकरण और शहरीकरण से तटों पर हरियाली का गायब होना है । इसके अलावा हवा का रुख, ज्वार-भाटे और नदियों के बहाव में आ रहे बदलाव भी समुद्र को प्रभावित कर रहे हैं । कई भौगोलिक परिस्थतियां जैसे- बहुत सारी नदियों के समुद्र में मिलन स्थल पर बनीं अलग-अलग कई खाडि़यों की मौजूदगी और नदी-मुख की स्थिति में लगातार बदलाव भी समुद्र के अस्थिर व्यवहार के लिए जिम्मेदार है । ओजोन पट्टी के नष्ट होने और वायुमंडल में कार्बन मोनो आक्साईड की मात्रा बढ़ने से पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है । इससे समुद्री जल का स्तर बढ़ना भी इस तबाही का एक कारक हो सकता है ।

राष्ट्रीय समुद्र तट संरक्षण रिर्पोट में भी चिंता जताई गई है कि समस्या को एक स्थान से दूसरे स्थान की ओर  मोड़ देने से दीर्घजीवी निदान की उम्मीद नहीं की जा सकती है । समुद्र के विस्तार की समस्या केवल कर्नाटक या दक्षिणी राज्यों तक सीमित नहीं है, इसका असर मुंबई, कलकत्ता, पुरी और द्वीप समूहों में भी देखा जा रहा है । वैसे ही बढ़ती आबादी के चलते जमीन की कमी विस्फोटक हालात पैदा कर रही है । ऐसे में बेशकीमती जमीन को समुद्र का शिकार होने से बचाने के लिए केंद्र सरकार को ही त्वरित सोचना होगा ।
पुरी के  समुद्र तट को देश के सबसे खूबसूरत समुद्र तटों में गिना जाता था। आज वहां की हरियाली गायब है, सारे कायदे-कानून तोड़ कर तट से सट कर बने होटलों व शहर की बढ़ती आबादी की नालियां सीधे समुद्र में गिर रही हैं । सरकार ने पानी के करीब सुलभ शौचालय बना दिया है तो कुछ आगे चल कर आंध्रप्रदेश से विस्थापित हुए हजारों मछुआरों ने अपनी बस्ती बना ली है । कुल मिला कर अब यहां बैठना मुश्किल होता जा रहा है । यह दुर्दशा अकेले पुरी की ही नहीं है, गोवा चले जाएं या फिर दक्षिणी राज्यों के किसी तट पर या फिर बंगाल में गंगा सागर ; अनियोजित विकास , अंधाधुंध पर्यटन और समुद्र तट संरक्षण के कानूनों के प्रति उदासीनता के चलते देश के समुद्र तटों पर गंभीर पर्यावरण खतरा मंडरा रहा है। गोवा तो पूरी तरह समुद्र के तट पर ही बसा है और यहां कई जगह समुद्र की लहरें जमीन के काट कर बस्ती में घुसती दिखती हैं।
समुद्र के किनारे रहने वालों ही नहीं , वहां के स्थानीय प्रशासन के बहुत कम अफसरान को यह जानकारी है कि सन 1991 में एक समुद्र तट बंदोबस्त क्षेत्र (कोस्टल रेगुलेशन जोन यानि सीआरजेड) कानून लागू किया गया था । तटों पर लगातार हो रहे निर्माण कार्यों के चलते वहां का पर्यावरण प्रभावित हो रहा है, इसी को ध्यान में रख कर इस कानून में प्रावधान रखा गया था कि समुद्र तट के 500 मीटर के भीतर किसी भी तरह के निर्माण पर रोक लगा दी गई थी । साथ ही समुद्र में शहरी या औद्योगिक कचरे को फैंकने पर पाबंदी का भी इसमें प्रावधान था । दुर्भाग्य है कि शायद ही कहीं इसका पालन हो रहा है।
समुद्र तटों का कटाव कई जगह गंभीर रूप ले चुका है। दक्षिण में तो कई स्थानों पर कई-कई किलोमीटर तक मिट्टी के कटाव के चलते जनजीवन प्रभावित हो रहा है। कानून में प्रावधान है कि समुद्र तटों की रेत में उगने वाले प्राकृतिक पेड़-पौघों को उगने का सही वातावरण उपलब्ध करवाने के लिए कदम उठाना चाहिए । पुरी में तो ठीक इसके विपरीत हुआ, कोई आठ साल पहले कुछ स्थानीय होटल मालिकों व पर्यटन विभाग ने मिल कर तट पर पुरी उत्सव शुरू किया । इसकेे लिए समुद्र तट पर लगे खजरी के सभी पेड़ काट दिए गए । वहां जिस तरह के सांस्कृतिक दूषित कार्यक्रम हो रहे हैं,वहा एक अलग मसला है, लेकिन तब से पुरी तट से हरियाली पूरी तरह गायब हो गई। मंुबई में भी समुद्र तट से हरियाली गायब हो कर वहां खाने-पीने के खाली पैकेट, मिनरल वाटर की बोतलों और पोलीथीन का भंडार समुद्र की खूबसूरती पर ग्रहण लगा रहा है।
पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम 1986 में तहत बनाए गए सीआरजेड में समुद्र में आए ज्वार की अधिकतम सीमा से 500 मीटर और भाटे के बीच के क्षेत्र को संरक्षित घोषित किया गया है। इसमें समुद्र, खाड़ी, उसमें मिलने आ रहे नदी के प्रवाह को भी शामिल किया गया है।  ज्वार यानि समुद्र की लहरों की अधिकतम सीमा के 500 मीटर क्षेत्र को पर्यावरणीय संवेदनशील घोषित कर इसे एनडीजेड यानि नो डेवलपमेंट जोन(किसी भी निर्माण के लिए प्रतिबंधित क्षेत्र) घोषित किया गया । इसे सीआरजेड-1 भी कहा गया । सीआरजेड-2 के तहत ऐसे नगरपालिका क्षेत्रों को रखा गया है, जो कि पहले से ही विकसित हैं । सीआरजेड-3 किस्म के क्षेत्र में वह समुद्र तट आता है जो कि सीआरजेड -1 या 2 के तहत नहीं आता है । यहां किसी भी तरह के निर्माण के लिए कंेद्रीय पर्यावरण मंत्रालय की अनुमति आवश्यक है । सीआरजेड-4 में अंडमान, निकोबार और लक्षद्वीप की पट्टी को रखा गया है। सन 1998 में  केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने राष्ट्रीय समुद्र तट क्षेत्र प्रबंधन प्राधिकरण और इसकी राज्य ईकाइयों का भी गठन किया, ताकि सीआरजेड कानून को लागू किया जा सके ।
सीआरजेड कानून लागू होने के बाद भी समुद्र तटों के गांवों में नए मकान बनना और जमीन की खरीद-बिक्री जारी है । कनार्टक और केरल में कुछ जगहों पर गांव वालों व प्राधिकरण के अधिकारियों के टकराव भी हुए । गांव वालों ने जब मकान बनाए तो उन्हें रोका गया । लोगों ने पंचायत से मिली अनुमति व उस पर चुकाए जाने वाले टैक्स की रसीदें दिखा दीं । पंचायत का कहना है कि  निर्माण कार्य नया नहीं है,वह तो पुराने मकानों की मरम्मत है। अधिकारियों के पास सैटेलाईट से तैयार नक्शे हैं । इस पर लोगों का कहना है कि सैटैलाईट से नारियल के पेड़ तो आ जाते हैं , लेकिन उसके बीच बने छोटे झोपड़ों की फोटो बनाना संभव नहीं होता है।
लेकिन विडंबना यह है कि समुद्र संरक्षण कानून की मार अकेले गांव वालों पर ही पड़ रही है । पर्यटन या व्यावसायिक दृष्टि से महंगे इलाकों में लोग धड़ल्ले से कानून तोड़ रहे हैं । पुरी में समुद्र तट संरक्षण समिति तो हाई कोर्ट तक गई, । अदालत ने समुद्र तट के करीब निर्माण करने वालों के खिलाफ आदेश भी सुनाए , लेकिन उनको लागू करवाने के लिए जिम्मेदार स्थानीय प्रशासन का रवैया निहायत संवेदनहीन रहा । ऐसा ही मुंबई और गोवा के समुद्र तटों का पर्यावरण सुरक्षित रखने के लिए संघर्षरत गैरसरकारी संगठनों के साथ भी हुआ ।
कनार्टक में एक स्वयंसेवी संस्था नागरिक सेवा ट्रस्ट ने दक्षिण कन्नड़ा, उडुपी और उत्तरी कन्नड़ा जिले के 320 किलोमीटर के समुद्र तट पर सीआरजेड क्षेत्र का विस्तृत अध्ययन किया । पाया गया कि राज्य सरकार ने ही इस कानून की खूब धज्जियां उड़ाई हैं । दक्षिण कन्नड़ा जिले में 10 स्थानों पर, उडिपी में 24 और उत्तरी कन्नड़ा में 11 मामलों में सरकार के निर्माण कार्य ही सीआरजेड के प्रावधानों का उल्लंघन थे । कई स्थानों पर सड़कें, होटल, मकानों को बनवाते समय सरकार ने ही कानून की परवाह नहीं की । हां, एक बात और जानना जरूरी है कि सीआरजेड कानून में पर्यटन को बढ़ावा देने के नाम पर इतनी गुंजाईश जरूर छोड़ी गई है, जिसका दुरूपयोग रूतबेदार लोगों के लिए किया जा सके ।यदि शहरी क्षेत्रों में सीआरजेड कानून को कड़ाई से लागू नहीं किया गया तो स्वच्छ निर्मल समुद्रों के तट भी कानपुर में गंगा या दिल्ली में यमुना की ही तरह हो जाएंगे ।

पंकज चतुर्वेदी

रविवार, 12 जनवरी 2014

जनसंदेश टाईम्‍स, उ प्र दिनांक 12 जनवरी 2014 रविवारी http://jansandeshtimes.com/Default.aspx?goto=home#


हिंदी में पुस्तकों की नहीं लेखकों की समीक्षा होती है
पंकज चतुर्वेदी

हिंदी की सर्वाधिक पाठक संख्या वाली पत्रिकाओं - इंडिया टुडे, षुक्रवार, कादंबिनी  आउटलुक आदि में पुस्तकों की समीक्षा पर नियमित दो-तीन पृश्ठ होते हैं । दैनिक पत्रों - जनसत्ता और हिंदुस्तान में प्रत्येक सप्ताह पुस्तकों पर आधा पृश्ठ होता है । प्रकाषन विभाग की पत्रिका ‘आजकल’, साहित्य अकादेमी की ‘‘ समकालीन ’’ व अन्य छोटी साहित्यिक पत्रिकाएं पुस्तकों की चर्चा केा पर्याप्त स्थान दे रही हैं । दैनिक जागरण और हिंदुस्तान के सभी संस्करणों में पुस्तक-समीक्षा को स्थान दिया जा रहा है । जनसंदेष(उ.प्र.)नईदुनिया(इंदौर), राजस्थान पत्रिका(जयपुर), लोकमत समाचार(नागपुर) के अलावा कई अन्य दैनिक पत्र साहित्य चर्चा में नई पुस्तकों को स्थान अवष्य देते हैं । हंस , कथादेष, साहित्य अमृत जैसी पत्रिकाएं तो पुस्तक चर्चा पर कई पृश्ठ प्रकाषित करती हैं । यदि इन सभी प्रकाषनेां के पाठकों की संख्या जोड़े ंतो करोड़ों में होगी । लिहाजा इस बात की चर्चा बेमानी हैं कि हिंदी पत्र-पत्रिकाओं में पुस्तकों के लिए स्थान घट रहा है । हां, इस बात की चिंता जरूर करना होगी कि करोड़ों की पाठक संख्या वाली समीक्षाओं की पुस्तकों की मुद्रण संख्या बामुष्किल 1000 होती है और लाखें की पाठक संख्या वाले अखबारों में उन पर कागद कारे होने के बावजूद हजार कापी का एक संस्करण बामुष्किल बिकता है ।
यह सर्वविदित है कि आज अखबार या पत्रिका छापना एक व्यवसाय है और किसी भी पत्र-पत्रिका को महज ग्राहकों से मिले बिक्री के पैसे के बल पर चलाया नहीं जा सकता है । इसमें छपने वाले विज्ञापन इसके जीवन का मूल आधार होते हैं । आम उपभोग की कई ऐसी वस्तुओं के विज्ञापन देखे जा सकते हंै, जिसकी कीमत एक या दो रुपए होती है । उत्पादक व विज्ञापनदाता को भरोसा होता है कि यह एक-दो रुपए कीमत की वस्तु इस विज्ञापन के माध्यम से इतनी लोकप्रिय होगी कि उससे लाखों कमाया जा सकता है । विडंबना है कि विज्ञापन से अटे पड़े अखबारों में साहित्यिक या पाठ्येत्तर पुसतकों के विज्ञापन लगभग न के बराबर होते हैं, जबकि पुस्तक की कीमत आमतौर पर दहाई अंक में तो होती ही है । विभिन्न व्यावसायिक व साहित्यिक पत्रिकाओं द्वारा पुस्तक-परिचय प्रकाषित करने की मंषा भी यही है कि साहित्य के प्रति अनुराग रखने वाले लोग पुस्तक को एक उपभोक्ता वस्तु न मान कर एक पूज्य, आदरणीय या निरीह सामग्री मानते हैं । जिस पृश्ठ पर विज्ञापन की दर दस हजार रूपए है, उस पर किसी पुस्तक की चर्चा निषुल्क होती है और फिर भी बिक्री का आंकड़ा सैंकड़ा तक पहुंचते हुए दम तोड़ देता है ।
यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि पुस्तक प्रकाषन के क्षेत्र में भारत विष्व में तीसरे स्थान पर है , यहां हर साल 50 से 60 हजार पुस्तकें छपती हैं । इनमें से लगभग 20 हजार हिंदी की होती हैं और इसका लगभग 40 प्रतिषत हिस्सा पाठ्येत्तर पुस्तकों का होता है । यानी हजारों-हजार पुस्तकें, जिनके उत्पादन पर करोड़ों खर्च हो रहे हैं । इसके बावजूद यह व्यवसाय से अधिक स्वान्तः सुखाय का माध्यम अधिक है ।
ऊपर दी जानकारी से स्पश्ट है कि पुस्तकें हैं, लेखक हैं, प्रकाषक हैं, इस पर पूंजीगत खर्चा भी है, लेकिन नहीं है तो खरीददार । हां, खरीददार ! पाठक तो हैं ही, तभी तो इतनी किताबों की खपत हो जाती है । पुस्तकों के लोकार्पण के समाचारों से छोटे-बड़े रिसाले आबाद रहते हैं । एक व्यवसाय, जिसमें पूंजी है, बाजार है, उपभोक्ता है  और इसके प्रति आम लोगों में पावनता का भाव है ; बावजूद इसके इसे गंभीरता से व्यवसाय के रूप में स्वीकार करने वालों की संख्या उंगलियों पर गिनने लायक है ।
क्या पत्र-पत्रिकाओं मंे प्रकाषित समीक्षाओं में वह बात नहीे होेती है जोकि ़एक विज्ञापन में होती है ? क्या समीक्षा लिखने वाले लोगों की लेखनी में वह दिषा नहीं होती है कि पाठक उस किताब को खरीदने के लिए प्रेरित हो ? या फिर किताब को लोग महत्व नहीं देते हैं । मैं सबसे पहले तीसरे प्रष्न को ही उठाउंगा । दस साल पहले गांधी षांति प्रतिश्ठान ‘‘ आज भी खरे हैं तालाब ’’ पर काम कर रहा था । उसके बाद ‘‘ राजस्थान की रजत बूंदें’’ पुस्तक भी आई । पुस्तक आने से पहले ही उसकी चर्चा पत्र-पत्रिकाओं में हुई और पुस्तक छपने से पहले ही गांधी षंाति प्रतिश्ठान के पास हजारों किताबों की खरीद की अग्रिम राषि पहुंच चुकी थी । यहां यह भी ध्यान देना होगा कि दोनों पुस्तकें कथेतर हैं तथा उनकी कीमत दो सौ रुपए है । जाहिर है कि पैसे दे कर किताब तभी खरीदी जाती है जब उसका परिचय इस तरह से दिया जाए जैसे अमिताभ बच्चन केडबरी चाकलेट बेच रहा हो । केडबरी के छद्म स्वाद को बेचने के लिए अमिताभ के फिल्मी लटके-झटके जरूरी हैं, लेकिन किताब के लिए लटकांे-झटकों की नहीं, बल्कि उसकी आत्मा को उभारने की आवष्यकता होती है । ऊपर उल्लेखित दोनों पुस्तकों के प्रकाषन-पूर्व परिचय में वह बात थी कि उसके लक्षित पाठक को तत्काल महसूस हुआ कि जिस तरह जीवन के लिए भोजन जरूरी है, उसी तरह उसके व्यक्तिगत संग्रह में ये किताबें ।
यह तय है कि प्रत्येक पुस्तक से इस तरह की विशय-वस्तु, प्रस्तुति और लेाकप्रियता की उम्मीद नहीं की जा सकती है, लेकिन यह तो उम्मीद की जा सकती है कि जब कागज का सीधा संबंध पर्यावरण से हो तथा कागज के रास्ते पेड़ों के संरक्षण का सूत्र अनिवार्यता है तब किताब के रूप में कागद कारे करते समय यह अवष्य ध्यान रखा जाए कि यह किस उद्देष्य से मुद्रित की जा रही है ।
यह तो तय है कि छपने वाली पुस्तकों की विशयवस्तु और लिखी जा रही समीक्षाओं में कहीं न कहीं कमी जरूर है, तभी वह उपभोक्ता यानी पाठक को आकर्शित नहीं कर पा रही है । प्रत्येक लेखक की रचना उसकी निगाह में सर्वश्रेश्ठ हेाती है, लेकिन जब समालोचक भी उसका चेहरा देख कर रचना को नहीें, बल्कि लेखक को जयषंकरप्रसाद सिद्ध करने पर तुल जाता है तो पत्रिका, आलोचक व पुस्तक तीनों की विष्वनीयता पर संकट आना लाजिमी है । किसी पुस्तक की समीक्षा के लिए टी.एस. इलियट की धारणा को उल्लेख करना चाहूंगा - श् प्ज पे ंिजनवने जव ेंल जींज बतपजपबपेउ पे वित जीम ेंाम व िबतमंजपवद वत बतमंजपवद वित जीम ेंाम व िबतपजपबपेउण्श्
यानी ‘‘ यह कहना अविवेकपूर्ण होगा कि आलोचना रचना के लिए होती है और रचना आलोचना के लिए ।’’
अज्ञेय ने भारत में पुस्तको की समीक्षा के संदर्भ में लिखा है - ‘‘ मैं अध्यापक नहीं रहा, पर साहित्य के मूल्यों की चिंता से, और उन मूल्यों के आध्धर पर समकालीन साहित्य की परख के सवाल से, हमेषा परेषान रहा ।’’
आज आम पाठक भी ऐसी ही परेषानियों से जूझ रहा है । पुस्तक की समीक्षा के मूल मानदंड - मौलिकता, प्रासंगिकता, भाव, प्रस्तुति, भाशा आदि गौण हो गए हैं । हिंदी में छप रही समीक्षाओं में रचना से अधिक लेखक के व्यक्तित्व की चर्चा होती है । अमुक पुस्तक किस पाठक वर्ग के लिए उपयोगी हो सकती है, इसका उल्लेख षायद ही कोई समीक्षक करता है । यह समीक्षा का आम तरीका है कि रचना की तुलना किसी महान लेखक की रचना से कर दी जाए । आमतौर पर देखा गया है कि पुस्तक का समीक्षा लेखक यदि बड़ा लेखक है तो उसकी समीक्षा की प्रस्तुति इतनी ऊंचे स्तर की होती है कि आम पाठक के लिए उबाऊ हो जाती है । समीक्षक यह मान कर लिखता है उसके पाठक उसी की तरह आलोचक हैं । जबकि इंडिया टुडे या जनसत्ता पढ़ने वाला आम पाठक होता है, हो सकता है कि उसका साहित्य या किसी तकनीकी विशय से कोई सरोकार हो ही नहीं । ऐसे में यदि समीक्षक विशय वस्तु को यह सोच कर सरल करता है कि उसका पाठक कुछ नया जानना चाहता है तो समीक्षा रोचक भी होती है औ उसका पाठक आगे चल कर किताब खरीदता भी है ।
कविता की पुस्तक है तो भाव, बिंब, भाशा, का सपाटपन जैसे षब्द और कथा साहित्य हो तो संवेदना, विदू्रूपता, समाज जैसे षब्दों का प्रयोग कर समीक्षा की इतिश्री मान ली जाती है । कुछ समीक्षक अपना ज्ञान बघाारने के लिए जटिल संस्कृतनिश्ठ हिंदी तथा विदेषी लेखकों की उक्तियों से समीक्षा को बोज्ञिल बना देते हैं । वे यह भूल जाते हैं कि उनका लेखन किसी अन्य कृति की विषेशता, विविधता या उसकी कमियों को उजागर करने के लिए है न कि स्वयं के ज्ञान के स्खलन के लिए ।  यह विडंबना है कि अधिकांष पुस्तकों की समीक्षा, पुस्तक के चतुर्थ आवरण सामग्री या भूमिका की सामग्री का पुनर्लेखन मात्र होती हैं । बहुत से लेखक तो अपनी पुस्तक की समीक्षा स्वयं या अन्य किसी मित्र से लिखवा कर पुस्तक के साथ ही भेज देते हैं ।
‘‘चैथा सप्तक’’ की भूमिका में अज्ञेय लिखते हैं - ‘‘समकालीन आलोचना की त्रुटियों और उसकी एकांगिता को भी अनदेखा न करना होगा । इस एकांगिता ने नई रचना का बहुत अहित किया है । उसने रचनाकारों को दिग्भ्रमित किया है और पाठक को भी इसलिए पथभ्रश्ट किया है कि उसने पाठक के सामने जो कसौटियां दी हैं वे स्वयं झूठी हैं । ’’ यह वक्तव्य कविता के संदर्भ में है । लेकिन यह टिप्पणी आज प्रकाषित हो रही सभी तरह की पुस्तक-समीक्षाओं पर सटीक प्रतीत होती है ।
यह आवष्यकता महसूस की जाने लगी है कि राश्ट्रीय हित को ध्यान में रखते हुए पुस्तकों के प्रकाषन पर कहीं न कहीं नियंत्रण अवष्य होना चाहिए, गोया, प्रकाषकोें का पंजीकरण ही अनिवार्य कर दिया जाए तो स्वान्तः सुखय के लिए अपने धन से पुस्तकों के प्रकाषन के लोभ संभ्भरण पर कहीं अंकुष लगेगा । जब कम पुस्तकें आएंगी तो तुलनात्मक रूप से उनकी गुणवत्ता सुधरेगी ।  ऐसे में पुस्तकों की समीक्षा या फिर परिचय के स्तंभ में भी सुधार आएगा ।
पुस्तकों की समीक्षा लेखन की एक महत्वपूर्ण विधा है। दुर्भाग्य है कि स्कूली स्तर के पाठ्यक्रम में इसका कोई स्थान नहीं है । किसी कहानी पर प्रष्न-उत्तर या उसमें छिपा संदेष तलाषने जैसे प्रयोग तो पाठ्यक्रम में हैं, लेकिन पुस्तक की समीक्षा पाठ्यक्रमों में अछूती ही है ।
पुस्तक की समीक्षा किस आधार पर हो, पुस्तक का परिचय अन्य पाठकों से करवाने के मानदंड क्या हों, किसी पुस्तक की तुलना अन्य पुस्तकों से करने पर किस सावधानी की आवष्यकता होती है ; इन विशयों को बच्चों के प्रारंभिक पाठ्यक्रम में ही षामिल करना आवष्यक है । यह आने वाली पीढ़ी को पुस्तकों के प्रति संवेदनषील बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है । तब पुस्तकों की समीक्षा उसकी खरीद के लिए ललक व आकर्शण पैदा करेगी । जब पाठकों के बीच समीक्षओं व समीक्षकों की विष्वनीयता स्थापित होगी, तब पुस्तक परिचय की चार पंक्तियां एक सषक्त विज्ञापन का काम करेंगी ।
इस दिषा में एक सुझाव और है - पुस्तकों की समीक्षा के लिए नवोदित लोगों को अधिक अवसर देना चाहिए । नए लिखने वाले पुस्तकों को पूरा व उत्साह से पढ़ेंगे, फिर उनके मन में वरिश्ठ लेखकों की तरह अन्य लेखकों के प्रति पूर्वाग्रह कम होगा । हिंदी लेखन जगत में अलग-अलग अखाड़ों, खेमों में बंटा हुआ है और पुस्तकों की समीक्षा में ये ‘‘वर्गवाद’’ कई बार उभर आता है । नए लेखकों को अवसर देने से निश्पक्षता की संभावना अधिक होगी ।
हिंदी बाजार की भाशा बन गई है अतः उसका भवष्‍य उज्जवल है । हिंदी में पाठक बढ़ रहे हैं, लेखक बढ़ रहे हैं और पुस्तकें भी बढ़ रही हैं । आवष्यकता है तो पाठक की पठन रुचि को श्रेष्‍ठ पुस्तकों की ओर मोड़ने के कुछ सषक्त प्रयास किए जाएं । इसमें पुस्तकों की समीक्षा एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है ।

पंकज चतुर्वेदी


शनिवार, 11 जनवरी 2014

सी एक्‍सप्रेस, आगरा 12 जनवरी 2014

मुसलमानों को मस्जिद से बहलाएं मुलायमजी
पंकज चतुर्वेदी
मुजफ्फरनगर दंगे के बाद केवल मुसलमानों को सरकारी इमदाद देने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश  की सरकार को जिस तरह से लताड़ा है , उससे साफ होता जा रहा है कि राज्य सरकार भले ही मुसलमानों का मसीहा होने के बड़े बड़े दावे करे, हकीकत यह है कि वह महज दिखावा ही है। अब पीछे पलट करे देखें तो साफ हो जाता है कि पिछले साल रमजान के महीने में ग्रेटर नोएडा के कादलपुर में एक निर्माणाधीन मस्जिद की दीवार की आड़ में एक महिला आईएएस अधिकारी की कुर्सी लुढका कर मुलायम सिंह यादव ने उत्तर  प्रदेश   में सांप्रदायकि आधार पर मत-विभाजन का जो दांव खेला था, वह एक लंबी साजिश   ही था।  उसके बाद पश्चिमी  उ.प्र में जम कर दंगे हुए। दंगे में षामिल भाजपा विधायकों पर रा सू का का मुकदमा यदि अदालत में टिका नहीं तो जाहिर है कि यह राज्य सरकार की ही नाकामी थी। दुर्गा शक्ति नागपाल वाले मामले में भले ही मुलायम सिंह यह संदेश   दिया था कि एक मस्जिद के लिए वे एक वरिष्‍ठ  अधिकारी की बलि चढ़ा सकते हैं, लेकिन यह बात छिपाए नहीं छिप रही है कि मुसलमानेां को भले ही मस्जिद ना मिले, लेकिन उनके साथ धोखा तो ना किया जाए। मुजफ्रनगर दंगे के पीडि़तों के राहत षिविर की बेहद खराब हालत, कडकडाती ठंड में राहत षिविरों को बुलडोजर से उजाड़ना, उसी समय कई करोड खर्च कर सैफई में फिल्मी सितारों के ठुमके लगवाना, दंगे के आरोपियों की जमानत व छोटे-मोटे पत्थरबाजी के मुकदमें में जेल गए मुसलमानों की जमानत ना होना, दंगे में भडकाउ भाशण देने के आरोपी मुसलमान नेताओं पर कथित तौर पर से मुकदमें हटाने की अवफाह फैलान.ा..... अनगिनत घटनाएं बानगी हैं कि अब मुलायम सिंह का समाजवाद ‘लाल‘ टोपी’ के बनिस्पत ‘भगवा’ पर ज्यादा झुक चुका है।
मुलायम सिंह यादव जी भले ही कोषिश   कर रहे हों कि उनकी पार्टी को समाजवादी की जगह ‘नमाजवादी पार्टी’ के तौर पर पहचान मिल जाए, लेकिन उनकी नियत ‘निमेश   कमेटी’ की रपट पर उनके रुख से साफ हो जाती है। सनद रहे नवंबर-2007 में राज्य के कचहरी बम धमाकों के आरोप में गिरफ्तार तारिक काजमी और खालिद मुजाहिद(जिसकी तीन महीने पहले संदिग्ध हालत में पुलिस अभिरक्षा में मौत भी हो गई) के फर्जीवाडे की जांच के लिए सन 2008 में तत्कालीन बसपा सरकार ने सेवानिव्त सत्र व जिला न्यायाधीश   आर.डी. निमेश   की अगुआई में एक आयोग बनाया था। आयोग की रपट साफ इषारा करती रही कि किस तरह निर्दोश   मुसलमानों को एसटीएफ ने झूठे तरीके से फंसाया। जांच आयोग की रपट लगभग एक साल पहले 31 अगस्त 2012 को अखिलेश   यादव को सौंपी गई, लेकिन अभीतक सरकार ने उस पर कोई कार्यवाही नहीं की है। यही नहीं लखनऊ में चल रहे रिहाई मंच के शांति  पूर्ण धरने के मंच, टैंट आदि को बाकायदा पुलिस से तुड़वा दिया गया।
दो महीने पहले राज्य सरकार को उच्च न्यायालय ने तब झटका दिया था, जब आतंकवाद के आरोप में जेल में बंद कुछ मुसलमान सुवकों पर से मुकदमें हटाने की घोशणा की गई थी। अखिलेश   यादव और उनके सरकारी व सियासी सिपाहसलार इतने मासूम भी नहीं थे कि उन्हें पता नहीं था कि आतंकवादी आरोपों में विचाराधीन मुसलमानों पर से मुकदमें वापिस लेना वैधानिक तौर पर संभव नहीं होगा, लेकिन खुद को मुसलमानों का सबसे बड़ा हितेशी जताने के लिए पूरा ड्रामा रचा गया। यह मंचन उस समय भी किया गया , जब आतंकवाद के आरोप में बंद एक युवक खालिद मुजाहिद की बाराबंकी से अदालत से लौटते समय मौत हो गई और राज्य सरकार के कुछ महकमों ने चटपट उसे दिल का दौरा कह कर स्वाभाविक मौत बता दिया, हालंाकि लाश   देख कर साफ दिख रहा था कि यह मौत इतनी स्वाभाविक भी नहीं है, जितनी बताई जा रही है।  कभी वे आडवाणी की तारीफ करते है तो कभी प्रतापगढ़ के करीबी इलाकों में हुए दंगो ंमे अपनी ही पार्टी के लोगों की भूमिका पर लीपापोती करते हैं। वे अयोध्या में गोली चलवाने पर अफसोस जाहिर करते हैं। जब नेपाल से सटी सीमा के एक मठाधीश   हिंदू सेना के नाम पर लोगों को सश  स्त्र कर रहे होते हैं तब उ.प्र. की पुलिस आत्मसमर्पण करने आ रहे कष्मीरियों को आतंकवादी बना कर फंसाने की साजिश   में षामिल हो जाती है। जब असंतोश होता है तो उर्दू और मदरसों का झुनझुना बजाया जाता है।
उत्तर  प्रदेश  , जो लोकसभा में सबसे ज्यादा सदस्य देता है, की राजनीति वोटों के धार्मिक आधार पर घ्रुवीकरण के लिए सब कुछ कर गुजरने के लिए  बदनाम रही है, इसमें बलवे, हत्या, समानांतर सेना, सियसती धोखाधड़ी के कई-कई दौर आते-जाते रहे हैं। अब दो दलों की राजनीति का जमाना लग गया है और दो कथित राश्ट्रीय दल उ.प्र. में तीसरे-चैथे स्थान के लिए दावेदारी करते रहते हैं। दोनो क्षेत्रीय दल अपने अपने जातीय गणितों के बल पर केवल राज्य ही नहीं केंद्र सरकार में भी मजबूरी को अपनी सौश्ठवता के लिए इस्तेमाल करते रहे हैं। ऐसे में साढ़े तीन करोड से ज्यादा आबादी वाला यानी राज्य की आबादी की कोई उन्नीस फीसदी आबादी वाला अल्पसंख्यक तबका सभी दलों को एकमुष्त लालच में रिझाता रहता है।  ‘‘मुल्ला मुलायम’ कहलाने पर गौरवान्वित महसूस करने वाले  यादव-दल(इसे समाजवादी पार्टी कहना उचित नहीं है, क्योंकि अब यह घर-परिवार की पार्टी बन कर रह गई है) को जितना बड़ा बहुमत राज्य विधानसभा में मिला, उससे मुसलमानों की उम्मीदें भी बढ़ी थीं, लेकिन हुआ इसके विपरीत।
मुल्क का मुसलमान इस बात के लिए बदनाम रहा है कि राजनीतिक दल उसकी तुष्टिकरण करते हैं, हालांकि आंकड़े गवाह हैं कि यदि तुष्टिकरण के बाद विकास की य हकीकत है तो इससे बेहतर तो तिरस्कृतीकरण ही होता। याद करें कुंडा में मारे गए डीएसपी जियाउल हक कोई पैंतीस साल बाद उ.प्र. की पीएससी से सीधे चयन किए गए पहले पुलिस अफसर थे। उ.्रप पुलिस में महज साढे चार फीसदी पुलिस वाले ही मुसलमान हैं और उनमें भी एसएचओ या जिम्मेदार पद पर तो नाम गिनती के ही मिलेंगे। इसके विपरीत उ.प्र की जेलो ंमें कुल 5877 सजायाफ्ता मुसलमान हैं व कोई पंद्रह हजार अंडर ट्रायल। राज्य की कुल 64 जेलों में बंदियों की कुल संख्या 82 हजार से ज्यादा है और इनमें 22 प्रतिश  त मुसलमान हैं। अखिलेश   यादव खुद कहते रहे हैं कि उनके पास ऐसे चार सौ मुसलमानों की सूची है जिन्हें  आतंकवाद के आरोप में झुठा फंसाया गया है।
यादव पार्टी का मुस्लिम प्रेम इस बात से उजागर हो जाता है कि बीते डेढ साल के दौरान राज्य में 32 से ज्यादा  सांप्रदायिक दंगे हुए, जिनमें असल बलवाईयों को पकड़ कर कड़ी कार्यवाही का एक भी उदाहरण सामने नहीं आया है। मुजफ्फरनगर के दंगों ने तो  पचास हजार लोगों को अपने घर-गांव से ही विस्थापित कर दिया। पांच लाख मुआवजे की फैसला हो या फिर गांवों में मुसलमानों को ना घुसने देने की जाटों की जिद ; हर कदम पर अखिलेश   की सरकार मुसलमानों को भरोसा दिलाने में असफल रही है। यह दुखद है कि उ.प्र. अधिकांश   दंगे उन छोटे कस्बों और गांवों में हुउ जिन्हें कभी गंगा-जमनी तहजीब की मिसाल कहा जाता था। इन दंगों में मुसलमानेां के साथ कितनी नाइंसाफी हुई, यह बात बानगी है सरकार की असली मंषा की। अधिकांश   जगह दंगों में हिंदु पक्ष की ओर से गुंडई करने वाले समाजवादी पार्टी के पदाधिकारी रहे हैं। यदि हकीकत में अखिलेश   यादव उन मुसलमानों का भला चाहते तो वे पिछले साल अगस्त में प्रस्तुत की गई जस्टिस आरडी निमेश   जांच आयोग की रपट को तत्काल स्वीकार करते व श्री निमेश   की सिफारिषों पर अमल की पुख्ता व्यवस्था करते। सनद रहे श्री निमेश   ने अपने निश्कर्श में सुझााव दिया था कि आतंकवाद जैसे मसले पर अलग से सेल बना कर दो साल में प्रोसिक्युश  न की कार्यवाही पूरी करना चाहिए। अभी गाजियाबाद से ही आतंकवाद के आरोप में फंसा एक युवक 14 साल बाद अदालत से निर्दोश छूटा, जरा सोचिवए कि अ बवह जिंदगी किस सिरे से षुरू करे।  पीडित पक्ष को उचित मुआवजा, झूठा फंसाने के दोशी कर्मचारियों पर कड़ी कार्यवाही जैसेी निमेश   कमीश  न की रपट को इस सरकार ने कचरे के डिब्बे में डाल रखा था, वह तो बाराबंकी में खालिद मुजाहिद की मौत के बाद बने दवाब के बाद सरकार ने रपट को स्वीकार तो कर लिया, लेकिन उसके क्रियान्वयन के कोई कदम नहीं उठे हैं।
राज्य सरकार दावा कर रही है वह अब कुल बजट के अठारह फीसदी को मुसलमानेां के विकास पर खर्च करेगी- गौर से देखें तो यह महज झलावा ही है , यह किसी भी विभाग के लिए संभव नहीं होगा कि जाति-धर्म विषेश के नाम पर अलग से योजना बनाए। फिर यादव परिवार जाति के आधार पर आरक्षण की मांग कर मुसलमानों को मुख्य धारा से काटने का काम कर रहा है। यह भी हास्यास्पद है कि राज्य सरकार ने मान लिया है कि उर्दू केवल मुसलमानों की भाशा है और उर्दू के विकास के नाम पर खर्च करने से मुसलमानों का भला होगा। अलबत्ता तो मुल्क के जितने भी बडे उर्दू के लेखक हुए वे मुसलमान नहीं थे, फिर जब उर्दू रोजगार से जुड़ी भाशा ही नहीं है तो उसे पढ़ने के बाद मुसलमानों के लिए जीवकोपार्जन का कौन सा रास्ता खुलेगा ? इस पर चुप्पी ही रहती है। उर्दू हिंदुस्तान की भाशा है और उसे सरंक्षित करना जरूरी है लेकिन भाशा का सांप्रदायिककरण कर राज्य सरकार ना तो भाशा का भला कर रही है और ना ही मुसलमान का। काश   मुसलमानेां की हस्तकला के माहिर इलाकों में बेहतरीन व्यापार केंद्र खोलने, नई तकनीक की षिक्षा देने की बात होती - अलीगढ का ताला उद्योग, मुरादाबाद की पीतल कारीगरी, रामपुर की कैंची-छुरी, लखनऊ की चिकनकारी, बुंदेलखंड के पाॅटरी, गाजियाबाद पिलखुआ की वस्त्र कला के साथ-साथ राज्य की चीनी मिलों को समृद्ध करने की दूरगामी योजना यह सरकार बनाती, इससे मुसलमान युवाकों को अपने पुष्तैनी धंधे व हुनर में अपना भविश्य संवारने की संभावना दिखती। बिजली, पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा जैसी मूलभूत सुविधाओं को ठीक करने की योजनाएं बनाई जातीं, जिससे राज्य की 19 फीसदी मुस्लिम आबादी सबसे ज्यादा लाभान्वित होती, उच्च शिक्षा की गुणवत्ता पर काम होता, ताकि पलायन रूकता षिक्षित युवक काम के बाजार में निराश   ना होते। दुख है कि ऐसी कोई सोच सरकार की नहीं है- वह केवल षिगूफे छोड़ने, नारे लगाने में भरोसा रखती है, उसके राज्य में योगी आदित्यनाथ मजबूत होते हैं, पुलिस वाले एक जाति विषेश के लोगों द्वारा दौड़ा-दौडा कर पीटे जाते हैं। एक बात जानना जरूरी है कि मुसलमान भी इस देश   और समाज का अभिन्न हिस्सा हैं और उनका समग्र विकास उन्हें अलग कर संभव नहीं है। जब राज्य में बिजली की आपूर्ति सही होगी, या फिर दिल्ली से गाजियाबाद को जोड़ने वाली मेट्रो साकार होगी या फिर लघु उद्योंगों के लिए सार्थक नीति बनेगी तो उससे पूरा  प्रदेश   व उसके साथ मुसलमान भी हितग्राही होंगे। उन्हें अलग करने की बात करने वाला कम से कम उनका हितैशी तो नहीं हो सकता।




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