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गुरुवार, 6 अक्टूबर 2022

Bru-Rehabilitation seems to be hanging in the balance

अधर में लटकता दिख रहा है ब्रू- पुनर्वास

पंकज चतुर्वेदी




पिछले साल सरकार के प्रयासों से अपने लिए जमीन के एक टुकड़े की आस के लिए आशान्वित अपने ही देश में तीन दशक से शरणार्थी “ब्रू” आदिवासियों के लिए त्रिपुरा में स्थानीय मिज़ो और बंगाली समुदाय के कारण संकट के नए बादल छाते दिख रहे हैं . अप्रैल 21 में त्रिपुरा सरकार ने संकल्प लिया था कि अगस्त 22 तक 37 हज़ार रियांग अर्थात ब्रू आदिवासियों का पुनर्वास कर दिया जायेगा. लेकिन अन्य समुदाय के प्रतिरोध, पुनर्वास के लिए निर्धारित स्थान और मूलभूत सुविधाओं जैसे कई अन्य मुद्दों के चलते यह काम अधुरा है , जान लें दिसम्बर 2020 में ब्रू आदिवासियों को बसाने को ले कर हिंसा हुई थी और उसमें दो लोग मारे भी गए थे . इस बार जे एम् सी अर्थात संयुक्त मोर्चा कमिटी , जिसमें नागरिक सुरक्षा मंच (एन एस एम् )सहित कई संगठन शामिल हैं , ब्रू लोगों के अनियोजित , उनके जीवन यापन , आर्थिक स्थिति आदि मुद्दों के साथ सड़कों पर हैं .


एन एस एम् का कहना है कि सरकार पहले से ही कंचनपुर उपखंड के गाँवों में 540 ब्रू निर्वासितों को बसा चुकी है और अब  किये गए समझौते के विपरीत 1250 और लोगों को बसाना चाहती है . चूँकि यह एक छोटा सा इलाका है और यहाँ पहले से मिज़ो और बंगाली जैसे  देशज समाज के लोग सदियों से सामंजस्य और सौहार्द के साथ रहते हैं . ऐसे में यहाँ  ब्रू लोगों को  बड़ी संख्या में बसाने से जनसंख्य का आंकड़ा गड़बड़ाएगा और नए तरीके के तनाव उभर सकते हैं . एन एस एम्  की मांग इन शरणार्थियों को अन्य किसी इलाके में बसाने की है .


जान लें  ब्रू आदिवासियों के कोई 7364 परिवार जिनमें 38072 सदस्य हैं पहले से ही कंचन पुर  और उसके करीबी पानिसागर उप मंडल  की शरणार्थी बस्ती में रह रहे हैं . जनवरी 2020 में केंद्र  सरकार, त्रिपुरा व मिजोरम सरकार व ब्रू आदिवासियों  के बीच हुए चतुष्पक्षीय समझौते से उनके स्थाई बसावट की जब बात शुरू हुई तो  त्रिपुरा में उन्हें ं स्थाई रूप से त्रिपुरा में बसाने की बात पर कुछ स्थानीय लोग सड़कों पर उतर कर हिंसक प्रदर्शन हुए थे. समझोते के तहत  त्रिपुरा में शेष रह गए 37136 ब्रू आदिवासियों को  त्रिपुरा के चार जिलों में अलग अलग स्थान पर बसाया जाना था . इसके लिए केंद्र  सरकार ने राज्य को 600 करोड़ की कार्ययोजना को भी मंजूरी दी थी .


इतिहास के मुताबिक तो उनका मूल घर मिजोरम में ही है। लेकिन मिजोरम के बाशिंदे  इन्हें म्यामार से आया विदेशी  कहते हैं। वे बीते पच्चीस सालों से जिस राज्य में रह रहे हैं वहां के लोग भी उन्हें अपने यहां बसाना नहीं चाहते। पूर्वात्तर के त्रिपुरा में इन्हें स्थाई रूप से बसाने की बात हुई तो हिंसा भड़क गई । यह आदिवासी समुदाय अनुसूचित जनजाति  परिपत्र में तो ये पीवीटीजी अर्थात लुप्त हो रहे समुदाय के रूप में दर्ज है। लेकिन ब्रू नामक जनजाति के इन लोगों का अपना कोई घर या गांव नहीं हैं। शरणार्थी के रूप में रहते हुए उनकी मूल परंपराओं, पर्यावास,कला, संस्कृति आदि पर संकट मंडरा रहा है.

किवदंतियों के अनुसार त्रिपुरा के एक राजकुमार को राज्य से बाहर निकाल दिया गया था और वह अपने समर्थकों के साथ मिज़ोरम में जाकर बस गया था। वहाँ उसने एक स्वतंत्र राज्य की स्थापना की। ब्रू खुद को उसी राजकुमार का वंशज  मानते हैं। अब इस कहानी की सत्यता के भले ही कोई प्रमाण ना हों लेकिन इसके चलते ये हजारों लोग घर विहीन हैं। इनके पास ना तो कोई स्थाई निवास का प्रमाण है ना ही आधार कार्ड। मतदाता सूची के ले कर भी भ्रम हैं। आंकड़े तो यही कहते हैं कि ब्रू या रियांग मिजोरम की सबसे कम जनसंख्या वाली जनजाति है।


मिजोरम के मामित, कोलासिब और लुंगलेई जिलों में ही इनकी आबादी थी। सन 1996 में ब्रू और बहुसंख्यक मिजो समुदाय के बीच सांप्रदायिक दंगा हो गया। मिजोरम में, मिजो समुदायों के लोग ब्रू जनजाति के लोगों को बाहरी अथवा विदेशी मानते हैं, तथा इन्हें जातीय हिंसा का शिकार बनाते हैं। पिछले कई वर्षो से केंद्र और राज्य सरकारें त्रिपुरा के राहत शिविरों में रहने वाले ब्रू शरणार्थियों की मिजोरम वापसी के लिए प्रयास कर रही थी। सरकार की ओर से सुरक्षा और रोजगार के तमाम आश्वासनों के बावजूद ज्यादातर ब्रू जनजाति मिजोरम लौटने को तैयार नहीं हैं।


उधर मिजो आदिवासी संगठन इस बात पर आमदा रहे कि ब्रू लोगों के नाम राज्य की मतदाता सूची से हटाए जाएं क्योंकि वे बाहरी हैं। ऐसे ही मसलों को ले कर हुई हिंसक झड़प के बाद 1997 में हजारों ब्रू लोग भाग कर पड़ोसी राज्य त्रिपुरा के कंचनपुरा ब्लाक के डोबुरी गांव में शरण ली थी। दो दशक से ज्यादा समय से यहां रहने और अधिकारों की लड़ाई लड़ने के बाद इन्हें यहीं बसाने पर समझौता हुआ था ।



वैसे तो ब्रू लोग झूम खेती के माध्यम से जीवकोपार्जन करते रहे हैं। उनकी महिलाएं बुनाई में कुषल होती थीं। शरणार्थी षिविर में आने के बाद उनके पारंपरिक कौशल लुप्त हो गए। वे केंद्र सरकार से प्राप्त राहत सामग्री एक वयस्क के लिए प्रतिदिन 5 रुपए व 600 ग्राम चावल तथा किसी अल्पवयस्क को 2.5 रुपए व 300 ग्राम चावल पर निर्भर है। इसके अलावा उन्हें दैनिक उपभोग का सामान भी मिलता है , जिसका बड़ा हिस्सा बेच कर वे कपड़ा, दवा आदि की जरूरतें पूरा करते हैं। घर, बिजली, स्वच्छ पानी, अस्पताल तथा बच्चों के लिये स्कूल जैसी कई बुनियादी सुविधाओं से वे वंचित है।


वैसे तो ब्रू लोगों ने नईसिंगपरा, आशापरा और हेजाचेरा के तीन मौजूदा राहत शिविरों को पुनर्वास गांवों में तब्दील करने की मांग की थी . इसके साथ ही जाम्पुई पहाड़ियों पर बैथलिंगचिप की चोटी के पास फूल्डुंगसेई गांव सहित पांच वैकल्पिक स्थानों पर विचार करने का भी आग्रह किया था .इस पर स्थानीय आदिवासी आशंकित हैं  कि इससे उनके लिए खेती व पशु  चराने का स्थान कम हो जाएगा.

आज जिस जगह पर ब्रू लोगों को बसाया गया है, वह उनके अभी तक के घर अर्थात षरणार्थी षिविर से कोई 100 किलोमीटर दूर है। बिल्कुल वीरान है और रोजगार, षिक्षा, स्वास्थय के साधन विकसित होने में वहां समय लगेगा। त्रिपुरा के जनजातीय संगठन इसी बात के लिए  राजी भी हुए कि आम बस्ती से दूर इस स्थान पर फिलहाल उनका दखल नहीं हैं। हालांकि जब यह पहला जत्था अपने घरके लिए बसों से रवाना हुआ था  तो उनकी आंखें नम थीं, एक तो उनकी दूसरी पीढ़ी इसी शिविर  में जवान हुई जिसे उन्हें छोड़ना पड़ रहा था, दूसरा पुनर्वास के अन्य 11 शिविर भी बहुत दूर-दूर बसने वालें हैं और संभव है कि उनसे कई ऐसे  लोग बिछुड़ जाएं जो दो दशकों से साथ रह रहे थे. सबसे बड़ा भय अन्य जनजातियों, खासकर मिज़ो की तरफ से हमले का भी है . तभी वे पास –पास रहना चाहते हैं और स्थानीय समाज का विरोध भी यही है .

यदि आंकड़ों में देखें तो पूर्वोत्तर राज्यों में जनसंख्या घनत्व इतना अधिक है नहीं, मीलों तक इक्का-दुक्का कबीले बसे हैं, लेकिन एक आदिवासी समुदाय के लिए बेहतर जीवन के लिए जमीन नहीं मिल रही है। हालांकि इस बार  सरकार के पुनर्वास प्रयासों पर शक नहीं किया जा सकता लेकिन यह भी कटु सत्य है कि अपने संसाधन-धरती- अधिकांरों का बंटवारा स्थानीय समाज को कबूल नहीं है। कुछ राजनीतिक दल भी इस आग को हवा दिए हैं और अब स्थाई निवास से ज्यादा शांति  और सामंजस्य की जरूरत अधिक है।

 


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सोमवार, 3 अक्टूबर 2022

If you want to save the forest, you have to save the elephant.

  

              जंगल बचाना है तो हाथी बचाना होगा

                                  पंकज चतुर्वेदी

 


 इन दिनों  झारखंड और छत्तीसगढ़ में हाथी के गांव में घुसने, तोड़फोड करने  की कई घटनांए हो रही हैं। 75 साल पहले देश  से लुप्त हो गए चीतों को फिर से बसाने पर सरकार ने जिस गंभीरता से काम किया, काश  हाथी पर समाज को सचेत करने पर   जमीनी योजना बनाई जाए। बीते तीन सालों के दौरान हाथियों के इंसान से टकराव की बढ़ती घटनाओं में 300 हाथी मारे गए तो 1401 इंसानों को भी अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। कहने को और भले ही हम कहें कि हाथी उनके गांव-घर में घुस रहा है, हकीकत यही है कि प्राकृतिक संसाधनों के सिमटने के चलते भूखा-प्यासा हाथी अपने ही पारंपरिक इलाकों में जाता है। दुखद है कि वहां अब बस्ती, सड़क  का जंजाल है। इंसान और  द क्रिटिकल नीड आफ एलिफेंटउब्लूडब्लूएफ-इंडिया की यह रिपोर्ट बताती है कि  दुनिया में इस समय कोई 50 हजार हाथी बचे हैं इनमें से साठ फीसदी का आसरा  भारत है।  देश  के 14राज्यों में 32 स्थान हाथियों के लिए संरक्षित हैं। यह समझना जरूरी है कि धरती पर इंसान का अस्तित्व तभी तक है जब तक जंगल हैं और जंगल में जितना जरूरी बाघ है उससे अधिक अनिवार्यता हाथी की है।


दुनियाभर में हाथियों को संरक्षित करने के लिए गठित आठ देशों के समूह में भारत शामिल हो गया है। भारत में इसे राष्ट्रीय धरोहर पशुघोषित किया गया है। इसके बावजूद भारत में बीते दो दशकों के दौरान हाथियों की संख्या स्थिर हो गई हे। जिस देश में हाथी के सिर वाले गणेश को प्रत्येक शुभ कार्य से पहले पूजने की परंपरा है , वहां की बड़ी आबादी हाथियों से छुटकारा चाहती है । 

पिछले एक दशक  के दौरान मध्य भारत में हाथी का प्राकृतिक पर्यावास कहलाने वाले झारखंड, छत्तीसगड़, उड़िया राज्यों में हाथियों के बेकाबू झुंड के हाथों एक हजार से ज्यादा लाग मारे जा चुके हैं। धीरे-धीरे इंसान और हाथी के बीच के रण का दायरा विस्तार पाता जा रहा है। कभी हाथियों का सुरक्षित क्षेत्र कहलाने वाले असम में पिछले सात सालों में हाथी व इंसान के टकराव में 467 लोग मारे जा चुके हैं। अकेले पिछले साल 43 लोगों की मौत हाथों के हाथों हुई। उससे पिछले साल 92 लोग मारे गए थे। झारखंड की ही तरह बंगाल व अन्य राज्यों में आए रोज हाथी को गुस्सा आ जाता है और वह खड़े खेत, घर, इंसान; जो भी रास्ते में आए कुचल कर रख देता है । दक्षिणी राज्यों  के जंगलों में गर्मी के मौसम में हर साल 20 से 30 हाथियों के निर्जीव शरीर संदिग्ध हालात में मिल रहे हैं ।


जानना जरूरी है कि हाथियों के 100 लीटर पानी और 200 किलो पत्ते, पेड़ की छाल आदि की खुराक जुटाने के लिए हर रोज 18 घंटें तक भटकना पड़ता है । गौरतलब है कि हाथी दिखने में भले ही भारीभरकम हैं, लेकिन उसका मिजाज नाजुक और संवेदनशील होता है । थोड़ी थकान या भूख उसे तोड़ कर रख देती है । ऐसे में थके जानवर के प्राकृतिक घर यानि जंगल को जब नुकसान पहुंचाया जाता है तो मनुष्य से उसकी भिडंत होती है ।



वन पारिस्थितिकी तंत्र और जैव विविधता को सहेज कर रखने में गजराज की  महत्वपूर्ण भूमिका हैं।  पयार्वरण-मित्र पर्यटन और और प्राकृतिक आपदाओं के बारे में पूर्वानुमान में भी हाथी बेजोड़ हैं। अधिकांश संरक्षित क्षेत्रों में, आबादी हाथियों के आवास के पास रहते हैं और वन संसाधनों पर निर्भर हैं। तभी जंगल में मानव अतिक्रमण और खेतों में हाथियों की आवाजाही ने संघर्ष की स्थिति बनाई और तभी यह विशाल जानवर  खतरे है।



एक बात जान लें किसी भी जंगल के विस्तार में हाथी सबसे बड़ा बीज-वाहक होता है। वह वनस्पति खाता है और उसकी लीद  भोजन करने के 60 किलोमीटर दूर तक जा कर करता है और उसकी लीद में उसके द्वारा खाई गई वनस्पति के बीज होते हैं।  हाथी की लीद  एक समृद्ध खाद होती है और उसमें  बीज भली-भांति  प्रस्फुटित होता है। जान लें जगल का विस्तार और ापारंपरिक वृक्षों का उन्नयन इसी तरह जीव-जंतुओं द्वारा  नैसर्गिक वाहन से ही होता हैं।

यही नहीं हाथी की लीद , कई तरह के पर्यावरण मित्र कीट-भृगों का भोजन भी होता है। ये कीट ना केवल  लीद को खाते हैं बल्कि उसे जमीन के नीचे दबा भी देते हैं जहां उनके लार्वा उसे खाते हैं। इस तरह से  कीट  कठोर जमीन को मुलायम कर देते है। और इस तरह वहां जंगल उपजने का अनुकूल परिवेष तैयार होता हैं।


घने जंगलों में जब हाथी ऊंचे पेड़ों से पत्ती तोड़ कर खाता है तो वह एक प्रकार से  सूरज की रोशनी नीचे तक आने का रास्ता भी बनाता है। फिर उसके चलने से जगह-जगह जमीन कोमल होती है और उस तरह जंगल की जैव विविधता को फलने-फूलने का मौका मिलता हैं।

हाथी भूमिगत या सूख चुके जल-साधनों को अपनी सूंड, भारीभरकम पैर व दांतों की मदद के खोदते हैं। इससे उन्हें तो पानी मिलता ही है, जंगल के अन्य जानवरों की भी प्यास बुझती हैं।

कहना गलत ना होगा कि हाथी जंगल का पारिस्थितिकी तंत्र इंजीनियर है। उसके पद चिन्हों से कई छोटे जानवरों को सुरक्षित रास्ता मिलता है। हाथी कि विशाल पद चिन्हों में यदि पानी भर जाता है तो वहां मेंढक सहित कई छोटे जल-जीवों को आसरा मिल जाता हैं।

यह वैज्ञानिक तथ्य है कि जिस जंगल में यह विशालकाय शाकाहारी जीव का वास होता है वहां आमतौर पर शिकारी या जंगल कटाई करने वाले घुसने का साहस नहीं करते और तभी वहां हरियाली सुरक्षित रहती है और साथ में बाघ, तेंदुए, भालू जैसे जानवर भी  निरापद रहते हैं।

कई-कई सदियों से यह हाथी अपनी जरूरत के अनुरूप अपना स्थान बदला करता था । गजराज के आवागमन के इन रास्तों को ‘‘एलीफेंट कॉरीडार’’ कहा गया । जब कभी पानी या भोजन का संकट होता है गजराज ऐसे रास्तों से दूसरे जंगलों की ओर जाता है जिनमें मानव बस्ती ना हो। देश  में हाथी के सुरक्षित कॉरीडोरों की संख्या 88 हैं, इसमें 22 पूर्वोत्तर राज्यों , 20 केंद्रीय भारत और 20 दक्षिणी भारत में हैं। दरअसल, गजराज की सबसे बड़ी खूबी है उनकी याददाश्त। आवागमन के लिए वे पीढ़ी-दर-पीढ़ी परंपरागत रास्तों का इस्तेमाल करते आए हैं।

बढ़ती आबादी के भोजन और आवास की कमी को पूरा करने के लिए जमकर जंगल काटे जा रहे हैं। उसे जब भूख लगती है और जंगल में कुछ मिलता नहीं या फिर स्रोत सूखे मिलते हैं तो वे खेत या बस्ती की ओर आ जाते हैं । नदी-तालाबों में शुद्ध पानी के लिए यदि मछलियों की मौजूदगी जरूरी है तो वनों के पर्यांवरण को बचाने के लिए वहां हाथी अत्यावश्यक हैं । मानव आबादी के विस्तार, हाथियों के प्राकृतिक वास में कमी, जंगलों की कटाई और बेशकीमती दांतों का लालच; कुछ ऐसे कारण हैं जिनके कारण हाथी को निर्ममता से मारा जा रहा है । हाथी का जंगल में रहना कई  लुप्त हो रहे पेड़-पौधों, सुक्ष्म जीव, जंगली जानवरों और पंक्षियों के संरक्षण को सुनिश्चित रता है।

 

रविवार, 25 सितंबर 2022

Such cities will surely drown!

 ऐसे शहर तो डूबेंगे ही !

 पंकज चतुर्वेदी

 

 


इस बार बरसात में बस दिल्ली ही बची थी , बाकी चेन्नई, हैदराबाद , बंगलुरु, लखनऊ, भोपाल, पटना , रांची – बहुत लम्बी  हो जाएगी सूची , मानसून के तनिक सी बौछार में डूब चुके थे . विदा होते मानसून में एक निचले स्तर पर चक्रवाती स्थिति क्या बनी , बादल जैम कर बरसे और फिर विज्ञापनों में यूरोप-अमेरिका को मात देते दिल्ली के विकास के दावे पानी-पानी हो गए.  अत्याधुनिक वास्तुकला का उदाहरण प्रगति मैदान की सुरंग में वाहन फंसे रहे तो तेज रफ़्तार ट्रेफिक के लिए खम्भों पर खड़े बारापुला पर वाहन थम गये, ईएमएस के बहु-मार्गी  पुल तो स्विमिंग पूल बन गए .  बस  शहर – सडक का नाम बदलते जाएँ कमोवेश यही स्थित सारे देश के उन नगरों की है जिनको हम स्मार्ट सिटी बनाना चाहते हैं . दुर्भाग्य है कि देश के शहरों में अब बरसात आनंद ले कर नहीं आती,  यहां बरसात का मतलब है अरबों रूपए की लागत से बने फ्लाईओवर हों या अंडर पास या फिर छह लेन वाली सडक़ेंहर जगह इतना पानी होता है कि जिंदगी ही ठिठक जाए। दुर्भाग्य है कि शहरों में हर इंसान येन-केन प्रकारेण भरे हुए पानी से बच कर बस अपने मुकाम पर पहुंचना चाहता है लेकिन वह सवाल नहीं करता कि आखिर ऐसा क्यों व कब तक ?

 

बात अकेले महानगरों की ही नहीं है यह तो अब गोरखपुर , बलिया, जबलपुर या बिलासपुर जैसे मध्यम शहरों की भी त्रासदी हो गई है कि थोड़ी सी बरसात या आंधी चले तो सारी मूलभूत सुविधांए जमीन पर आ जाती हैं। जब दिल्ली की सरकार हाई कोर्ट के आदेशों की परवाह नहीं करतीं और हाई कोर्ट भरी अपने आदेशों की नाफरमानी पर मौन रहता है तो जाहिर है कि आम आदमी क्यों आवाज उठाएगा। 22 अगस्त 2012 को दिल्ली हाई कोर्ट ने जल जमाव का स्थाई निदान खोजने के लिए  ओदश दिए थे।  31 अगस्त 2016 को दक्षिणी दिल्ली में जलजमाव से  सड़के जाम होने पर एक जनहित याचिका पर  कोर्ट ने कहा था - ‘‘जल जमाव को किसी भी तरह से न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता है। इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती ।’’  15 जुलाई 2019 को  दिल्ली हाई कोर्ट की श्री जीएस सिस्तानी व सुश्री ज्योति  सिंह की बैंच ने  दिल्ली सरकार को निर्देश दिया था कि  जल जमाव व यातायात बाधित होने की त्वरित निगरानी व निराकरण के लिए ड्रैन का इस्तेमाल किया जाए।  31 अगस्त 2020 को मुख्या न्यायाधीश डीएन पटले व जस्टिस प्रतीक जालान की बैंच ने जल जमाव बाबात एक जनहित याचिका को दिल्ली सरकार को प्रेशित  करते हुए  इसके अस्थाई समाधान खोजने का निर्देश दिया था । कई अन्य राज्यों से भी इस तरह के आदेश हैं लेकिन उसकी हकीकत 30 मई को दिल्ली में पहली एलीवेटेड रोड़- बारापुला पर देखने को मिली, जहां जगह-जगह पानी भरने से 10 किलोमीटर का रास्ता तीन घंटे में भी पूरा नहीं हो पाया। बारिकी से देखा तो उसका कारण महज  जल माव वाले स्थान पर बनी निकासी की कभी सफाई नहीं होना व उसमें मिट्टी, कीचड़, पॉलीथीन आदि का कूड़ा गहरे तक जमा होना ही था, और इस कार्य के लिए हर महीने हजारों वेतन वाले कर्मचारी व उनके सुपरवाईजर पहले से तैनात हैं।

विडंबना है कि शहर नियोजन के लिए गठित लंबे-चौडे़ सरकारी अमले पानी के बहाव में शहरों के ठहरने पर खुद को असहाय पाते हैं । सारा दोष  नालों की सफाई ना होने ,बढ़ती आबादी, घटते संसाधनों और पर्यावरण से छेड़छाड़ पर थोप देते हैं । वैसे इस बात की जवाब कोई नहीं दे पाता है कि नालों की सफाई सालभर क्यों नहीं होती और इसके लिए मई-जून का इंतजार क्यों होता है । इसके हल के सपने, नेताओं के वादे और पीड़ित जनता की जिंदगी नए सिरे से शुरू करने की हड़बड़ाहट सब कुछ भुला देती है । यह सभी जानते हैं कि दिल्ली में बने ढेर सारे पुलों के निचले सिरे, अंडरपास और सबवे हलकी सी बरसात में जलभराव के स्थाई स्थल हैं,लेकिन कभी कोई यह जानने का प्रयास नहीं कर रहा है कि आखिर निर्माण की डिजाईन में कोई कमी है या फिर उसके रखरखाव में ।

यह सच र्है कि अचानक तेजी से बहुत सारी बरसात हो जाना एक प्राकृतिक आपदा है और जलवायु  परिवर्तन की मार के दौर पर यह स्वाभाविक भी है लेकिन  ऐसी विषम परिस्थिति  उत्पन्न ना हों इसके लिए मूलभूत  कारण पर सभी आँख मूंदे रहते है . दिल्ली, कोलकाता, पटना जैसे महानगरों में बरसात का जल गंगा-जमुना तक जाने के रास्ते छेंक दिए गए. मुंबई में मीठी नदी के उथले होने और सीवर की 50 साल पुरानी सीवर व्यवस्था के जर्जर होने के कारण बाढ़ के हालात बनना सरकारें स्वीकार करती रही है। बंगलौर में पारंपरिक तालाबों के मूल स्वरूप में अवांछित छेड़छाड़ को बाढ़ का कारक माना जाता है । दिल्ली में सैंकड़ो तालाब व यमुना नदी तक पानी जाने के रास्ते पर खेल गाँव से ले कर ओखला तक बसा दिए गए । 

शहरों में बाढ़ रोकने के लिए सबसे पहला काम तो वहां के पारंपरिक जल स्त्रोतों में पानी की आवक और निकासी के पुराने रास्तों में बन गए स्थाई निर्माणों को हटाने का करना होगा । यदि किसी पहाड़ी से पानी नीचे बह कर आ रहा है तो उसका संकलन किसी तालाब में ही होगा । विडंबना है कि ऐसे जोहड़-तालाब कंक्रीट की नदियों में खो गए हैं । परिणामतः थोड़ी ही बारिश में पानी कहीं बहने को बहकने लगता है ।

महानगरों में भूमिगत सीवर जल भराव का सबसे बड़ा कारण हैं । जब हम भूमिगत सीवर के लायक संस्कार नहीं सीख पा रहे हैं तो फिर खुले नालों से अपना काम क्यों नहीं चला पा रहे हैं ? पोलीथीन, घर से निकलने वाले रसायन और नष्ट न होने वाले कचरे की बढ़ती मात्रा, कुछ ऐसे कारण हैं, जोकि गहरे सीवरों के दुश्मन हैं । महानगरों में सीवरों और नालों की सफाई भ्रष्टाचार का बड़ा माध्यम है । यह कार्य किसी जिम्मेदार एजेंसी को सौंपना आवश्यक है, वरना आने वाले दिनों में महानगरों में कई-कई दिनों तक पानी भरने की समस्या उपजेगी, जो यातायात के साथ-साथ स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा होगा । 

महानगरों में बाढ़ का मतलब है परिवहन और लोगों का आवागमन ठप होना। इस जाम के ईंधन की बर्बादी, प्रदुषण स्तर में वृद्धि और मानवीय स्वभाव में उग्रता जैसे कई दीघ्रगामी दुश्परिणाम होते हैं। इसका स्थाई निदान तलाशने के विपरीत जब कहीं शहरों में बाढ़ आती है तो सरकार का पहला और अंतिम कदम राहत कार्य लगाना होता है, जोकि तात्कालिक सहानुभूतिदायक तो होता है, लेकिन बाढ़ के कारणों पर स्थाई रूप से रोक लगाने में अक्षम होता है । जल भराव और बाढ़ मानवजन्य समस्याएं हैं और इसका निदान दूरगामी योजनाओं से संभव है ; यह बात शहरी नियोजनकर्ताओं को भलींभांति जान लेना चाहिए और इसी सिद्धांत पर भविष्य की योजनाएं बनाना चाहिए ।

 

पंकज चतुर्वेदी

साहिबाबाद, गाजियाबाद

201005

 

बुधवार, 21 सितंबर 2022

when our missing soldiers will return!

  

ना जाने कब लौटेंगे हमारे लापता फौजी!

 

                    ... पंकज चतुर्वेदी

 


हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने भारत सरकार को आदेश दिया है कि अप्रैल 1997 में कच्छ की खाड़ी से लापता कैप्टन संजीत भट्टाचार्जी की 83 वर्शीय मां को  भारत सरकार हर तीन महीने में यह अवगत कराए कि 25 साल से पाकिस्तान की जेल में बंद उनके बेटे को लाने के लिए क्या प्रयास किए गए। हालांकि पाकिस्तान इंकार करता है कि संजीत उनकी कैद में हैं लेकिन कई प्रमाण मिले हैं कि गोरखा रायफल के जांबाज कैप्टन कोट लखपत जेल, लाहौर में है। इसी सुनवाई के दौरान एडीशनर सालिसिटर जनरल केएम नटराज ने कोर्ट को यह भी बताया कि भारत सरकार ने पाकिस्तान सरकार को अपने 83 लापता बंदियों की खेज का नोट दिया है ,जिनमें सन 19651971 के युद्ध में पाक सेना द्वारा पकड़े गए जांबांज हैं। ऐसा  नहीं है कि भारत की सरकारें इस दिशा में कुछ कर नहीं रहीं, कई बार प्रतिनिधि मंडल सीमा पार गए, जेलों को दिखाया गया, लेकिन यह किसी से छुपा नहीं है कि यह सब कवायतें महज औपचारिकता होती हैं। इससे पहले एक सितंबर 2015 को सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश  आरएस लोढ़ा ने भी उन सैनिकों के मामले को अंतर्राष्ट्रीय  अदालत में ले जाने के निर्देश दिए थे लेकिन अभी तक उस पर अमल हुआ नहीं।

लगभग हर साल संसद में विदेश मंत्री बयान भी देते हैं कि पाकिस्तानी जेलों में आज भी सन 1971 के 54 युद्धबंदी सैनिक हैं, लेकिन कभी लोकसभा में प्रस्ताव या संकल्प पारित नहीं हुआ कि हमारे जाबांजों की सुरक्षित वापिसी के लिए सरकार कुछ करेगी। देश की नई पीढ़ी को तो शायद यह भी याद नहीं होगा कि 1971 में पाकिस्तान युद्ध में देश का इतिहास व विश्व का भूगोल बदलने वाले कई रणबांकुरे अभी भी पाकिस्तान की जेलों में नारकीय जीवन बिता रहे हैं । उन जवानों के परिवारजन अपने लेगों के जिंदा होने के सबूत देते हैं, लेकिन भारत सरकार महज औपचारिकता निभाने से अधिक कुछ नहीं करती है । इस बीच ऐसे फौजियों की जिंदगी पर बालीवुड में कई फिल्में बन गई हैं और उन्हें दर्शकों ने सराहा भी । लेकिन वे नाम अभी भी गुमनामी के अंधेरे में हैं।


उम्मीद के हर कतरे की आस में तिल-दर-तिल घुलते इन जवानों के परिवारजन, अब लिखा-पढ़ी करके थक गए हैं । दिल मानता नहीं हैं कि उनके अपने भारत की रक्षा वेदी पर शहीद हो गए हैं । 1971 के युद्ध के दौरान जिन 54 फौजियों के पाकिस्तानी गुनाहखानों में होने के दावे हमारे देशवासी करते रहे हैं ,उनमें से 40 का पुख्ता विवरण उपलब्ध हैं । इनमें 6-मेजर, 1-कमाडंर, 2-फ्लाईंग आफिसर, 5-कैप्टन, 15-फ्लाईट लेफ्टिनेंट, 1-सेकंड फ्ला.लेफ्टि, 3-स्कावर्डन लीडर, 1-नेवी पालयट कमांडर, 3-लांसनायक, और 3-सिपाही हैं ।

एक लापता फौजी मेजर अशोक कुमार सूरी के पिता डा. आरएलएस सूरी के पास तो कई पक्के प्रमाण हैं, जो उनके बेटे के पाकिस्तानी जेल में होने की कहानी कहते हैं । डा. सूरी को 19741975 में  उनके बेटे के दो पत्र मिले, जिसमें उसने 20 अन्य भारतीय फौजी अफसरों के साथ, पाकिस्तान जेल में होने की बात लिखी थी । पत्रों का बाकायदा ‘‘हस्तलिपि परीक्षण’’ करवाया गया और यह सिद्ध भी हुआ कि यह लेखनी मेजर सूरी की ही है।1979 में डा. सूरी को किसी अंजान ने फोन करके बताया कि उनके पुत्र को पाकिस्तान में उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रदेश की किसी भूमिगत जेल में भेज दिया गया है । मेजर सूरी सिर्फ 25 साल की उम्र में ही गुम होने का किस्सा बन गए ।


पाकिस्तान जेल में कई महीनों तक रहने के बाद लौटे एक भारतीय जासूस मोहन लाल भास्कर ने, लापता विंग कमाडंर एचएस गिल को एक पाक जेल में देखने का दावा किया था । लापता फ्लाईट लैफ्टिनेंट वीवी तांबे को पाकिस्तानी फौज द्वारा जिंदा पकड़ने की खबर, ‘संडे पाकिस्तान आब़जर्वरके पांच दिसंबर 1971 के अंक में छपी थी । वीर तांबे का विवाह बेडमिंटन की राष्ट्ीय चेंपियन रहीं दमयंती से हुआ था । शादी के मात्र डेढ़ साल बाद ही लड़ाई छिड़ गई थी । सेकंड लेफ्टिनेंट सुधीर मोहन सब्बरवाल जब लड़ाई के लिए घर से निकले थे, तब मात्र 23 साल उम्र के थे । केप्टर रवीन्द्र कौरा को अदभ्य शौर्य प्रदर्शन के लिए सरकार ने वीर चक्रसे सम्मानित किया था, लेकिन वे अब किस हाल में और कहां हैं, इसका जवाब देने में सरकार असफल रही है । ।


पाकिस्तान के मरहूम प्रधानमंत्री जुल्फकार अली भुट्टो को फांसी दिए जाने के तथ्यों पर छपी एक किताब भारतीय युद्धवीरों के पाक जेल में होने का पुख्ता सबूत मानी जा सकती है । बीबीसी संवाददाता विक्टोरिया शोफील्ड की किताब भुट्टो : ट्रायल एंड एक्सीक्यूशनके पेज 59 पर भुट्टो को फांसी पर लटकाने से पहले कोट लखपतराय जेल लाहौर में रखे जाने का जिक्र है । किताब में लिखा है कि भुट्टो को पास की बैरक से हृदयविदारक चीख पुकार सुनने को मिलती थीं । भुट्टो के एक वकील ने पता किया था कि वहां 1971 के भारतीय युद्ध बंदी है । जो लगातार उत्पीड़न के कारण मानसिक  विक्षिप्त हो गए थे ।

कई बार लगता है कि इन युद्धवीरों की वापिसी के मसले किसी भी सरकार के लिए प्राथमिकता नहीं रहे।यहां पता चलता है कि युद्ध बाबत संयुक्त राष्ट् संघ के निर्धारित कायदे कानून महज कागजी दस्तावेज हैं । संयुक्त राष्ट्र के विएना समझौते में साफ जिक्र है कि युद्ध के पश्चात, रेड़क्रास की देखरेख में तत्काल सैनिक अपने-अपने देश भेज दिए जाएंगे । दोनों देश आपसी सहमति से किसी तीसरे देश को इस निगरानी के लिए नियुक्त कर सकते हैं । इस समझौते में सैनिक बंदियों पर क्रूरता बरतने पर कड़ी पाबंदी है । लेकिन भारत-पाक के मसले में यह कायदा-कानून कहीं दूर-दूर तक नहीं दिखा । 1972 में अतंर्राष्ट्ीय रेडक्रास ने भारतीय युद्ध बंदियों की तीन लिस्ट जारी करने की बात कही थी । लेकिन सिर्फ दो सूची ही जारी की गइंर् । एक गुमशुदा फ्लाईग आफ्सिर सुधीर त्यागी के पिता आरएस त्यागी का दावा है कि उन्हें खबर मिली थी कि तीसरी सूची में उनके बेटे का नाम था । लेकिन वो सूची अचानक नदारत हो गई ।

भारत सरकार के वरिष्ठ अधिकारी मानते हैं कि हमारी फौज के कई जवान पाक जेलों में नारकीय जीवन भोग रहे हैं । उन्हें शारीरिक यातनाएं दी जा रही हैं । करनाल के करीम बख्श और पंजाब के जागीर सिंह का पाक जेलों में लंबी बीमारी व पागलपन के कारण निधन हो गया । 1971 की लड़ाई में पाकिस्तान द्वारा युद्ध बंदी बनाया गया सिपाही धर्मवीर 1981 में जब वापिस आया तो पता लगा कि यातनाओं के कारण उसका मानसिक संतुलन पूरी तरह बिगड़ गया है । सरकार का दावा है कि कुछ युद्ध बंदी कोट लखपतराय लाहौर, फैसलाबाद, मुलतान, मियांवाली और बहावलपुर जेल में है ।

भारत की सरकार लापता फौजियों के परिवारजनों को सिर्फ आस दिए हैं कि उनके बेटे-भाई जीवित हैं । लेकिन कहां है किस हाल में हैं ? कब व कैसे वापिस आएंगे ? इसकी चिंता ना तो हमारे राजनेताओं को है और ना ही आला फौजी अफसरों को । काश 1971 की लड़ाई जीतने के बाद भारत ने पाकिस्तान के 93,000 बंदियों को रिहा करने से पहले अपने एक-एक आदमी को वापिस लिया होता । पूरे पांच साल तक प्रधानमंत्री रहे पीवी नरसिंहराव भी भूल चुके थे कि उन्होंने जून 90 में बतौर विदेश मंत्री एक वादा किया था कि सरकार अपने बहादुर सैनिक अधिकारियों को वापिस लाने के लिए कोई भी कीमत चुकाने को तैयार हैं । लेकिन देश के सर्वोच्च पद पर रहने के दौरान अपनी कुर्सी बचाने के लिए हर कीमत चुकाने की व्यस्तता में उन्हें सैनिक परिवारों के आंसूओं की नमी का एहसास तक नहीं हुआ।

 

  पंकज चतुर्वेदी


 

 

 

 

शनिवार, 17 सितंबर 2022

Angry sea due to oil spill

                                                        तेल रिसाव से गुस्साते समुद्र

पंकज चतुर्वेदी



इसी साल  मई में गोवा के  कई समुद्र तटों पर  तेलीय “कार्सिनोजेनिक टारबॉल  के कारण चिपचिपा रहे थे . गोवा में सन  2015  के बाद 33 ऐसी घटनाएँ हो चुकी हैं . टारबॉल  काले-भूरे रंग के ऐसे चिपचिपे गोले होते हैं जिनका आकार फुटबॉल से ले कर सिक्के तक होता है . ये समुद्र तटों की रेत को भी चिपचिपा बना देते हैं और इनसे बदबू तो आती ही है .गोवा में सिन्कुरिम से ले कर मोराजिम तक, बाघा , अरम्बोल. वारका, केवेलोसिन , बेनेलिम सहित 105 किलोमीटर के अधिकाँश समुद्र तट पर इस तरह की गंदगी आना  बहुत आम बात है . इससे  पर्यटन तो प्रभावित होता ही है , मछली पालन से जुड़े लोगों के लिए यह रोजो-रोटी का सवाल बना जाता है .  इसका कारण है समुद्र में तेल या क्रुद आयल का रिसाव . कई बार यह  रास्तों से गुजरने वाले जहाजों से होता है तो इसका बड़ा कारण विभिन्न स्थानों पर समुद्र की गहराई से कच्चा तेल निकालने वाले संयत्र भी हैं . वैसे भी अत्यधिक पर्यटन और  अनियंत्रित  मछली पकड़ने के ट्रोलर समुद्र की साथ को लगातार तेलिय बना ही रहे हैं .


हाल ही में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओशनोग्राफी (एनआईओ) ने एक अध्ययन में देश के पश्चिमी तट पर तेल रिसाव के लिए दोषी तीन मुख्य स्थानों की पहचान कर ली है . इनसे निकलने वाला तेल पश्चिमी और दक्षिण पश्चिमी भारत के गोवा के अलावा  महाराष्ट्र, कर्नाटका के समुद्र तटों को प्रदूषित करने के लिए जिम्मेदार हो सकते हैं. इस शोध में सिफारिश की गई है कि 'मैनुअल क्लस्टरिंग' पद्धति  अपना कर इन अज्ञात तेल रिसाव कारकों का पता लगाया जा सकता है .

गुजरात के प्राचीन समुद्र तट, महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक मोड़ और गुजरात पश्चिमी तट पर सबसे व्यस्त अंतरराष्ट्रीय समुद्र  जलीय मार्ग हैं जो तेल रिसाव के कारण खतरनाक टारबॉल के चलते गंभीर पारिस्थिकीय  संकट के शिकार हो रहे हैं हैं।

एनआईओ गोवा के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक अध्ययन में - वीटी राव, वी सुनील, राजवंशी, एमजे एलेक्स और पीटी एंटोनियालॉन्ग द ईस्टर्न अरब सी (ईएएस) नामक जहाजों से सम्म्वेदंशील इलाकों में तेल रिसाव होना पाया गया . यहाँ तक कि कोविद के दौरान लॉक डाउन  में भी ये जहाज तेल की खोज और अंतरराष्ट्रीय टैंकर के संचालन के कारण समुद्र में तेल छोड़ते रहे हैं. सबसे चिंता की बात यह है कि तेल रिसाव की मार समुद्र के संवेदनशील  हिस्से में  ज्यादा है . संवेदनशील क्षेत्र अर्थात कछुआ प्रजनन स्थल, मैंग्रोव, कोरल रीफ्स (प्रवाल भित्तियां) शामिल स्थान मनोहर पर्रीकर के मुख्य्मंत्रितव काल में गोवा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (जीपीसीबी) की ओर से तैयार गोवा राज्य तेल रिसाव आपदा आपात योजना में कहा गया था कि गोवा के तटीय क्षेत्रों में अनूठी वनस्पतियों और जीवों का ठिकाना है। इस रिपोर्ट में तेल के बाहव के कारण प्रवासी पक्षियों पर विषम असर की भी चर्चा थी . पता नहीं  दो खण्डों की इतनी महत्वपूर्ण रिपोर्ट किस लाल बसते में  गूम गई और  तेल की मार से बेहाल समुद्र तटों का दायरा बढ़ता गया .


लगातार चार वर्षों 2017 से 2020 (मार्च-मई) तक हासिल किए गए आंकड़ों के अध्ययन से पता चला कि तेल फैलाव के तीन हॉट स्पॉट ज़ोन है। जहाज से होने वाला तेल रिसाव जोन -1 (गुजरात से आगे ) और 3 (कर्नाटक और केरल से आगे) तीसरा ,जोन -2  जो महाराष्ट्र से आगे है, यह तेल उत्खनन के कारण हैं . कोविड-19 महामारी के कारण लॉकडाउन के दौरान जोन-1 में केवल 14.30 वर्ग किलोमीटर  (1.2 प्रतिशत) तेल रिसाव दर्ज किया गया जो काफी काफी कम था। "जबकि, ज़ोन 2 और 3 में साल-दर-साल तेल रिसाव में कोई बदलाव नहीं आया है  और यह 170.29 वर्ग किमी  से  195.01 वर्ग किमी  के बीच ही रहा है . जाहिर है कि लॉक डाउन  के दौरान भी तेल उत्खनन और अंतरराष्ट्रीय टैंकर यातायात पर कोई असर हुआ नहीं , जिससे तेल रिसाव यथावत रहा .

समुद्र में तेल रिसाव की सबसे बड़ी मार उसके जीव जगत पर पड़ती है, व्हेल, डोल्फिन जैसे जीव अपना पारम्परिक स्थान छोड़ कर दुसरे इलाकों में पलायन करते हैं तो  जल निधि की गहराई में पाए जाने वाले छोटे पौधे, नन्ही मछलियाँ मूंगा जैसे संरचनाओं को स्थाई नुक्सान होता है . कई समुद्री पक्षी मछली पकड़ें नीची आते है और उनके पंखों में तेल चिपक जाता है और वे फिर उड़ नहीं पाते और तड़प –तड़प कर उनके प्राण निकल जाते हैं . यदि चक्रवात प्रभावित इलाकोएँ में तेल रिसाव होता है तो यह तेल लहरों के साथ धरती पर जाता है, बस्तियों में फैलता है और यहाँ उपजी मछलिया खाने से ९इन्सान कई गंभीर रोगों का शिकार होता है .

तेल रिसाव का सबसे प्रतिकूल  प्रभाव तो समुद्र के जल तापमान में वृद्धि है जो की जलवायु परिवर्तन के दौर में धरती के अस्तित्व को बड़ा खतरा है . पृथ्वी-विज्ञान मंत्रालय की एक रिपोर्ट के अनुसार, जलवायु परिवर्तन के कारण समुद्र बहुत अधिक प्रभावित हो रहे हैं. सनद रहे ग्लोबल वार्मिंग से उपजी गर्मी का 93 फीसदी हिस्सा समुद्र पहले तो उदरस्थ कर लेते हैं फिर जब उन्हें उगलते हैं तो ढेर सारी व्याधियां पैदा होती हैं। हम जानते ही हैं कि बहुत सी चरम प्राकृतिक आपदाओं जैसे कि बरसात, लू , चक्रवात, जल स्तर में वृद्धि आदि का उद्गम स्थल महासागर या समुद्र  ही होते हैं । जब परिवेश की गर्मी के कारण समुद्र का तापमान बढ़ता है तो अधिक बादल पैदा होने से भयंकर बरसात, गर्मी के केन्द्रित होने से चक्रवात , समुद्र की गर्म भाप के कारण तटीय इलाकों में बेहद गर्मी बढ़ना जैसी घटनाएँ होती हैं ।

असेसमेंट ऑफ क्लाइमेट चेंज ओवर द इंडियन रीजनशीर्षक की यह रिपोर्ट भारत द्वारा तैयार आपने तरह का पहला दस्तावेज हैं जो देश को जलवायु परिवर्तन के संभावित खतरों के प्रति आगाह करता है व सुझाव भी देता है. यह समझना आसान है कि जब सनुद्र की उपरी साथ पर ज्वलनशील तेल की परत दूर तक होगी तो ऐसे जल का तापमान निश्चित ही बढेगा . समुद्र के बढ़ते तापमान के प्रति आगाह करते हुए रिपोर्ट बताती है कि हिंद महासागर की समुद्री सतह पर तापमान में 1951-2015 के दौरान औसतन एक डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी हुई है, जो कि इसी अवधि में वैश्विक औसत एसएसटी वार्मिंग से 0.7 डिग्री सेल्सियस अधिक है। समुद्री सतह के अधक गर्म होने के चलते उत्तरी हिंद महासागर में समुद्र का जल-स्तर 1874-2004 के दौरान प्रति वर्ष 1.06-1.75 मिलीमीटर की दर से बढ़ गया है और पिछले ढाई दशकों (1993-2017) में 3.3 मिलीमीटर प्रति वर्ष तक बढ़ गया है, जो वैश्विक माध्य समुद्र तल वृद्धि की वर्तमान दर के बराबर है.

सागर की विशालता व निर्मलता मानव जीवन को काफी हद तक प्रभावित करती है , हालांकि आम आदमी इस तथ्य से लगभग अनभिज्ञ है । जिस गृह ‘‘पृथ्वी  ’’ पर हम रहते हैं, उसके मौसम और वातावरण में नियमित बदलाव का काफी कुछ दारोमदार समुद्र पर ही होता है । जान लें समुद्र के पर्यावरणीय चक्र मे  जल के साथ-साथ उसका प्रवाह, गहराई में एल्गी की जमावट, तापमान , जलचर जैसे कई बातें शामिल हैं व एक के भी गड़बड़ होने पर समुद्र के कोप से मानव्  जाति बच नहीं पाएगी। समुद्र का विशाल मन वैसे तो हर तरीके के पर्यावरणीय संकट से जूझ लेता है लेकिन यदि एक बार यह ठिठक गया तो उसका कोई निदान हमारे पास नहीं हैं .   समुद्र से तेल निकलना और परिवहन भले ही आज बहुत  आकर्षित कर रहा है लेकिन इससे समुद्र के कोप को बढना  धरती के अस्तित्व के लिए चुनौती है .

The right to a dignified farewell and a new standard in medical world

  गरिमापूर्ण विदाई का अधिकार और चिकित्सा की नई मर्यादा पंकज चतुर्वेदी लगभग  12 साल असीम और अव्यक्त पीड़ा के साथ  जीवन जी रहे हरीश राणा अं...