My writings can be read here मेरे लेख मेरे विचार, Awarded By ABP News As best Blogger Award-2014 एबीपी न्‍यूज द्वारा हिंदी दिवस पर पर श्रेष्‍ठ ब्‍लाॅग के पुरस्‍कार से सम्‍मानित

बुधवार, 15 मार्च 2023

The climate change threat to agriculture of India

 

खेती को खतरा बनता बदलता मौसम

पंकज चतुर्वेदी



फरवरी-2023 का दूसरा हफ्ता  समूचे हिमाचल प्रदेश  के लिए तपती गर्मी ले आया । भले ही पर्यटन व्यवसाय से जुड़े लोग इसे घाटे का मौसम कह रहे हैं लेकिन असली खतरा तो खेती पर मंडरा रहा है।  हिंमाचल की अर्थ व्यवस्था का आधार  फल व सब्जियों की खेती है और अचानक गर्मी से फसल बहुत हद तक खराब हो रही है। सबसे अधिक असर तो गेहूं पर पड़ रहा है। इस समय गेंहू जैसी फसलं पकने को तैयार है। और ऐसे में अचानक इतनी गर्मी होने से  दाने  का सिकुड़ना तय है।  कमजोर दाना का अर्थ है, एक तो वजन में कमी और दूसरा पौश्टिकता का अब बहुत देर नहीं है जब किसान के सामने बदलते मौसम के कुप्रभाव उसकी मेहनत और प्रतिफल के बीच खलनायक की तरह खड़े दिखेंगें। खतरा यहीं तक ही नहीं है,  भारतीय गेहूं और जौ अनुसंधान केंद्र (आईसीएआर) ने चेतावनी दी है कि 15 मार्च के बाद बरसात होने की संभावना है और  यह तैयार फसल पर काल बनेगा। बीते कुछ सालों में मौसम का चरम होना-खासकर अचानक ही बहुत सारी बरसात एक साथ हो जाने से खड़ी फसल की बर्बादी किसान को कमजोर करती रही है।


धरती के तापनाम में लगातार हो रही बढ़ौतरी और उसके गर्भ से उपजे जलवायु परिवर्तन का भीषण खतरा अब दुनिया के साथ-साथ भारत के सिर पर मंडरा रहा है। यह केवल असामयिक मौसम बदलाव या ऐसी ही प्राकृतिक आपदाओं तक सीमित नहीं रहने वाला, यह इंसान के भोजन, जलाशयों में पानी की शुद्धता , खाद्य पदार्थों की पौष्टिकता, प्रजनन क्षमता से ले कर जीवन के उन सभी पहलुओं पर विषम प्रभाव डालने लगा है जिसके चलते प्रकृति का अस्तित्व और मानव का जीवन  सांसत में है।

कृशि मंत्रालय के  भारतीय कृशि अनुसंधान परिशद का एक षोध बताता है कि सन 2030 तक हमारे धरती के तापमान में 05 से 12 डिग्री सेल्सियस तक की वृद्धि अवष्यंभावी है। साल-दर-साल बढ़ते तापमान का प्रभाव सन 2050 में 080 से 316 और सन 2080 तक 156 से 544 डिग्री हो ॰सकता है। जान लेंकि तापमान में एक डिग्री बढ़ौतरी का अर्थ है कि खेत में 360 किलो फसल प्रति हैक्टेयर की कमी आ जाना। इस तरह जलवायु परिवर्तन के चलते खेती के लिहाज से 310 जिलों को संवेदनषील माना गया है।  इनमें से 109 जिले बेहद संवेदनषील हैं जहां आने वाले एक दशक  में ही उपज घटने, पशु  धन से ले कर मुर्गी पालन व मछली उत्पाद तक कमी आने की संभावना है। तापमान बढ़ने से बरसात के चक्र में बदलाव, बैमौसम व असामान्य बारि, तीखी गर्मी व लू, बाढ़ व सुखाड़ की सीधी मार किसान पर पड़ना है।  रकारी आंकड़े भी बताते हैं कि खेती पर निर्भर जीवकोपार्जन करने वालों की संख्या भले ही घटे, लेकिन उनकी आय का दायरा सिमटता जा रहा है। सनद रहे कभी सूखे तो कभी बरसात की भरमार से किसान दषको तक उधार में दबा रहता है और तभी वह खेती छोड़ने को मजबूर है। ।


भारत मौसम, भूमि-उपयोग, वनस्पति , जीव के मामले में व्यापक विविधता वाला देश  है और यहां जलवायु परिवर्तन का प्रभाव भी कुछ सौ किलोमीटर की दूरी पर अलग किस्म से हो रहा है।  लेकिन पानी बचाने और कुपोशण व भूख से निबटने की चिंता पूरे देश  में एकसमान है। हमारे देश  में उपलब्ध ताजे पानी का 75 फीसदी अभी भी खेती में खर्च हो रहा है। तापमान बढ़ने से जल-निधियों पर मंडरा रहे खतरे तो हमारा समाज गत दो दषकों से झेल ही रहा है। प्रोसिडिंग्स ऑफ नेशनल अकादमी ऑफ साइंस नामक जर्नल के नवीनतम अंक में प्रकाशित एक शोध पत्र के अनुसार भारत को जलवायु परिवर्तन के कृषि पर प्रभावों को कम करते हुए यदि पोषण के स्तर को कायम रखना है तब रागी, बाजरा और जई जैसे फसलों का उत्पादन बढ़ाना होगा। इस अध्ययन को कोलंबिया यूनिवर्सिटी के डाटा साइंस इंस्टीट्यूट ने किया है।कोलंबिया यूनिवर्सिटी के डाटा साइंस इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिक डॉ कैले डेविस ने भारत में जलवायु परिवर्तन के कृषि पर प्रभावों, पोषण स्तर, पानी की कमी, घटती कृषि उत्पादकता और कृषि विस्तार के लिए भूमि के अभाव पर गहन अध्ययन किया है और इस सन्दर्भ में । उनके अनुसार भारत में तापमान वृद्धि के कारण कृषि में उत्पादकता घट रही है और साथ ही पोषक तत्व भी कम होते जा रहे हैं। भारत को यदि तापमान वृद्धि के बाद भी भविष्य के लिए पानी बचाना है और साथ ही पोषण स्तर भी बढ़ाना है तो गेहूं और चावल पर निर्भरता कम करनी होगी। इन दोनों फसलों को पानी की बहुत अधिक आवश्यकता होती है और इनसे पूरा पोषण भी नहीं मिलता। डॉ कैले डेविस के अनुसार चावल और गेहूं पर अत्यधिक निर्भरता इसलिए भी कम करनी पड़ेगी क्योंकि भारत उन देशों में शुमार है जहां तापमान वृद्धि और जलवायु परिवर्तन का सबसे अधिक असर पड़ने की संभावना है और ऐसी स्थिति में इनकी उत्पादकता और पोषक तत्व दोनों पर प्रभाव पड़ेगा।





अमेरिका के आरेजोन राज्य की सालाना जलवायु परिवर्तन रिपोर्ट 2017 में चेता दिया गया था कि मौसम में बदलाव के कारण पानी को सुरक्षित रखने वाले जलाशयों में ऐसे शैवाल विकासित हो रहे हैं जो पानी की गुणवत्ता को प्रभावित कर रहे हैं।  पिछले दिनो अमेरिका के कोई 60 हजार जलाशयों के जल का परीक्षण  वहां की नेशनल लेक असेसमेंट विभाग ने किया और पाया कि जब जलाशयों में मात्रा से कम पानी होता है तो उसका तापमान ज्यादा होता है और साथ ही उसकी अम्लीयता भी बढ़ जाती हे। जब बांध या जलाशय सूखते हैं तो उनकी तलहटी में कई किस्म के खनिज और अवांछित रसायन भी एकत्र हो जात हैं और जैसे ही उसमें पानी आता है तो वह उसकी गुणवत्ता पर विपरीत असर डालते हैं। सनद रहे ये दोनों ही हालात जल में जीवन यानी- मछली, वनस्पति आदि के लिए घातक हैं। भारत में तो यह हालात हर साल उभर रहे हैंा कभी भयंकर सूख तो जलाशय रीते और कभी अचानक बरसात तो लबालब।

यह तो सभी जानते हैं कि जलवायु परिवर्तन या तापमान बढ़ने का बड़ा कारण विकास की आधुनिक अवधारणा के चलते वातावरण में बढ़ रही कार्बन डाईआक्साइड की मात्रा है। हार्वर्ड टी.एच. चान स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ की ताजा रिपोर्ट में बताती है कि इससे हमारे भोजन में पोषक तत्वों की भी कमी हो रही है। रिपेर्ट चेतावनी देती है कि धरती के तापमान में बढ़ौतरी खाद्य सुरक्षा के लिए दोहरा खतरा है। आईपीसीसी समेत कई अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों में इससे कृषि उत्पादन घटने की आशंका जाहिर की गई है। इससे लोगों के समक्ष खाद्य संकट पैदा हो सकता है। लेकिन नई रिपोर्ट और बड़े खतरे की ओर आगाह कर रही है। दरअसल, कार्बन उत्सर्जन से भोजन में पोषक तत्वों की कमी हो रही है। रिपोर्ट के अनुसार कार्बन उत्सर्जन में बढ़ोतरी के कारण चावल समेत तमाम फसलों में पोषक तत्व घट रहे हैं। इससे 2050 तक दुनिया में 17.5 करोड़ लोगों में जिंक की कमी होगी

, 12.2 करोड़ लोग प्रोटीन की कमी से ग्रस्त होंगे।.दरअसल, 63 फीसदी प्रोटीन, 81 फीसदी लौह तत्व तथा 68 फीसदी जिंक की आपूर्ति पेड़-पौंधों से होती है। जबकि 1.4 अरब लोग लौह तत्व की कमी से जूझ रहे हैं जिनके लिए यह खतरा और बढ़ सकता है। .

शोध में पाया गया कि जहां अधिक कार्बन डाईऑक्साइड की मौजूदगी में उगाई गई फसलों में तीन तत्वों जिंक, आयरन एवं प्रोटीन की कमी पाई गई है। वैज्ञानिकों ने प्रयोगशाला में प्रयोग के जरिए इस बात की पुष्टि भी की है। .रिपोर्ट में कहा गया है कि कार्बन डाई आक्साइड पौंधों को बढ़ने में तो मदद करता है। लेकिन पौंधों में पोषक तत्वों की मात्रा को कम कर देता है।.यह रिपोर्ट भारत जैसे देशों के लिए अधिक डराती है क्योंकि हमारे यहां पहले से कुपोषण एक बड़ी समस्या है।

 




मंगलवार, 7 मार्च 2023

Attention ! Yamuna is drying up

  

 

सावधान ! सूख रही है यमुना

पंकज चतुर्वेदी



 

 

यह सच है कि इस बार गर्मी ने अपने तेवर जल्दी दिखा दिए लेकिन दिल्ली में अचानक यमुना का जल स्तर कम होना अलग ही खतरे की निशानी है, समझना होगा कि हमले से निकलने वाली नदियाँ तो ग्लेशियर के पिघलने से समृद्ध होती है, अर्थात यदि गर्मी जल्दी हुई तो बर्फ अधिक पिघलती है और नदी में जल का बहाव अधिक होना चाहिए . यमुना का जल स्‍तर घट गया है, इसकी वजह से दिल्‍ली के कई इलाकों में पेयजल सप्‍लाई प्रभावित हो रहा है। दिल्‍ली जल बोर्ड के अनुसार हरियाणा द्वारा यमुना में कम पानी छोड़ने की वजह से वजीराबाद तलाब का जलस्तर 674.50 फीट से घटकर 671.80 फीट पर पहुंच गया है। तालाब में पानी के कमी का असर वजीराबाद वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट पर पड़ रहा है। इसकी वजह से प्लांट की क्षमता में करीब 15 प्रतिशत तक की कमी आई है।


दिल्ली में पानी का संकट गहराता जा रहा है। बीते एक हफ्ते में पानी की कम आपूर्ति के कारण कभी दिल्ली के जलसंयत्र को बंद करना पड़ता है तो कभी दिल्ली में रही-बची यमुना की धार सफेद झाग के रूप में उन दावों को मुह चिढ़ाती दिखती है जिसमें हर साल यमुना को प्रदूषण  मुक्त करने या इसके किनारों को पर्यटन स्थल बनाने के दावे होते हैं। दिल्ली हरियाण से पानी मांगता और हरियाणा सरकार ज्यादा पानी देने से हाथ खड़े करते हुए कहती है कि चूंकि उनके यहां ही यमुना सूख चुकी है सो वे दिल्ली को ज्यादा पानी नहीं दे सकते ।

टिहरी गढ़वाल के यमुनोत्री हिमनद से चल कर इलाहबाद के संगम तक कोई 1376 किमी सफर तय करने वाली यमुना की गति पर दिल्ली की सांस टिकी होती है । पानी कम हुआ तो हड़कंप मचा और षुरू हो गया दिल्ली व हरियाणा के बीच तू-तू, मैं-मैं । यदि सतही बयानबाजी को परे रखा जाए तो यमुना में पानी की कमी महज गरमी में पानी के टोटे तक सीमित नहीं है, हो सकता है कि भूगर्भ में ऐसे परिवर्तन हो रहे हों, जिसका खामियाजा यहां के करोड़ो बाशिंदों को जल्दी ही उठाना पड़े । यहां पर वाडिया इंस्टीट्श्ूट आफ हिमालयन जियोलाजी के जल विज्ञानी डा. एस.के. बरतरिया का यह शोध  गौरतलब है कि सन 1966 से आज तक यमुना-गंगा के उदगम पहाड़ों से जलप्रवाह में पचास फीसदी की कमी आई है। जाहिर है कि एक तरफ जहां पानी की मांग बढ़ रही है, उसके स्त्रोत सिकुड़ते जा रहे हैं।

यहां जानना जरूरी है कि 12 मई 1994 को केंद्र सरकार की पहल पर पांच राज्यों के बीच यमुना के पानी के बंटवारे पर एक समझौता हुआ था । माना गया था कि दिल्ली में ओखला बेराज तक यमुना में पानी का बहाव 11 अरब 70 करोड़ घनमीटर है । इसमें से हरियाणा को पांच अरब 73 करोड़ घनमीटर, उ.प्र. को चार अरब तीन लाख घमी, राजस्थान को एक अरब 11 करोड़ घमी, हिमाचल प्रदेश को 37 करोड़ घमी और दिल्ली को 72 करोड़ घनमीटर पानी मिलेगा । इस करार में मौसम और जल की उपलब्धता के आधार पर पानी के निस्तारण का उल्लेख है । इस साल जब फरवरी में अप्रत्याशित ढ़ंग से यमुना में कोई 30 फुट पानी कम हो गया तो दिल्ली वालों ने हरियाणा पर कम और गंदा पानी छोड़ने का आरोप मढ़ दिया । हरियाणा ने भी दिल्ली पर तयशुदा संख्या से अधिक पंप चला कर ज्यादा पानी खींचने को समस्या का कारण बता दिया । यह तय है कि जिस रफ्तार से पानी का स्तर नीचे हुआ, उतना पानी कहीं चुरा कर रखना या कहीं गुप्त तरीके से एकत्र करना संभव नहीं है ।

आरोप-प्रत्यारोप की इस कीचड़-उछाल में इस संकट के प्रमुख कारण तो गौण हो गए । असल में हमारे पहाड़ जलवायु परिवर्तन की भयंकर मार झेल रहे हैं इस बार ठंउ के मौसम में अक्तूबर से खूब बरफ गिरी, फिर डेढ महीने सूखा रहा। और फिर जब अप्रैल महीना लगा तो फिर भयानक बरफ गिरने लगी। बरफ के अनियमित गिरने और उसके गलने के काल में फिर से ठंड हो जाने से यमुना के उदगम से ही जल का आगम कम हुआ। गौरतलब है कि इसी बरफ के गलने से गंगा-यमुना में पानी का बहाव आता है ।

भूवैज्ञानिक अविनाश खरे की माने तो पानी के अचानक गायब होने के पीछे अंधाघुंध भूजल दोहन का भी हाथ हो सकता है। श्री खरे  बताते हैं कि हरियाणा और दिल्ली के आसपास  गहरे ट्यबवेलों की  संख्या में खतरनाक सीमा तक वृद्धि हुई है । आमतौर पर कई ट्यूबवेल बारिश या अन्य बाहरी माध्यमों के सीपेज-वाटर पर काम करते हैं ।  जब जमीन के भीतर यह सीपेज वाटर कम होता है तो वहां निर्मित निर्वात करीब के किसी भी जल स्त्रोत के पानी को तेजी से खींच लेता है । चूंकि यमुना के जल ग्रहण क्षेत्र में लाखों-लाख ट्यूबवेल रोपे गए हैं, संभव है कि इनमें से कुछ लाख के पानी का रिचार्ज अचानक यमुना से होने लगा है । यहां जानना जरूरी है कि यमुना यदि के इलाकों की भूगर्भ संरचना कठोर चट्टानों वाली नहीं है । यहां की मिट्टी सरंध्र्र है । नदी में प्रदुषण  के उच्च स्तर के कारण इसमें कई फुट गहराई तक गाद भरी है , जोकि नदी के जलग्रहण क्षमता को तो कम कर ही रही है , साथ ही पानी के रिसाव के रास्ते भी बना रही है । इसका परिणाम यमुना के तटों पर दलदली भूमि के विस्तार के तौर पर देखा जा सकता है ।

यमुना के पानी के गायब होने का एक और भूगर्भीय कारण बेहद डरावना सच है । यह सभी जानते हैं कि पहाड़ों से दिल्ली तक यमुना के आने का रास्ता भूकंप प्रभावित संभावित इलाकों में अतिसंवेदनशील श्रेणी मे आता हैं । प्लेट टेक्टोनिज्म(विवर्तनीकी) के सिद्धांत के अनुसार भूगर्भ में स्थलमंडलीय प्लेटों में हलचल होने पर भूकंप आते हैं । भूकंप के झटकों के कई महीनों बाद तक धरती के भीतर 25 से 60 किलोमीटर नीचे हलचल मची रहती है । कई बार टेक्टोनिक प्लेटों के टकराव के बाद कई दरारें बन जाती हैं । परिणामस्वरूप कई बार भूजल स्त्रोतों का स्तर बढ़ जाता है या कई बार पानी दरारों से हो कर तेजी से पाताल में चला जाता है । कृत्रिम बांधों के कारण बने जलाशयों में एकत्र पानी के भार से भूतल पर दवाब बनने और इन दवाबों के कारण षैल परतों में हलचल होना भी एक भूवैज्ञानिक तथ्य है । सनद रहे दिल्ली तक आते-आते यमुना के प्राकृतिक बहाव पर कई जगह दरवाजे लगाए गए हैं । यह हालत भविश्य में भयंकर भूकंप की ओर इशारा भी है । अमेरिका की कोलेरिडा नदी पर बने बांध में एकत्र पानी के दवाब के चलते वहां भूकंप आना एक वैज्ञानिक तथ्य है ।

बहरहाल , यमुना नदी के जल स्तर में अचानक गिराव आना एक गंभीर समस्या है। इसके सभी संभावित कारण - अंधाधुंध भूजल दोहन, पानी का दवाब या फिर प्रदूषित  गाद ; सभी कुछ मानवजन्य ही है ।  इसके प्रति सरकार के साथ-साथ समाज का संवेदनशील होना ही दिल्ली के संभावित विस्फोटक हालात का एकमात्र बचाव है । दिल्ली में 48 किलोमीटर सफर करने के बाद यहां के पानी में इस महानगर की कितनी गंदगी जुड़ती है, इस पर तो इस शहर को ही सोचना होगा। यमुना के जल-ग्रहण क्षेत्र में हो रहे लगातार जायज-नाजायज निर्माण कार्य भी इसे उथली बना रहे हैं।

 

सोमवार, 6 मार्च 2023

Holi The festival of cleanness

 स्वच्छता का पर्व है होली

पंकज चतुर्वेदी



 

होली भारत में किसी एक जातिधर्म या क्षेत्र विशेष का पर्व नहीं है, इसकी पहचान देश की संस्कृति के रूप में होती है । वसंत ऋतु जनजीवन में नई चेतना का संचार कर रही होती हैफागुन की सुरमई हवाएं वातावरण को मस्त बनाती हैं, तभी होली के रंग लोकजीवन में घुल जाते हैं । इन्हीं दिनों नई फसल भी तैयार होती है और किसानों के लिए यह उल्लास का समय होता है । तभी होली के बहाने नए अन्न की पूजा पूरे देश में की जाती है । यही नहीं पूरी दुनिया में होली की ही तरह  अलग-अलग समय में त्योहार मनाये जाते हैं जिनका असल मकसद तनावों से दुर कुछ पल मौज-मस्ती के बिताना और अपने परिवेश  के गैरजरूरी सामान से मुक्ति पाना होता है। विडंबना है कि अब होली का स्वरूप भयावह हो गया है। वास्तव में होली का अर्थ है - हो ली, यानि जो बीत गई सो बीत गई , अब आगे की सुध है। गिले-शिकवे  मिटाओ, गलतियों को माफ करो और एक दूसरे का रंगों में सराबोर कर दो- रंग प्रेम के, अपनत्व के, प्रकृति के। विडंबना है कि भारतीय संस्कृति की पहचान कहलाने वाला यह पर्व पर्यावरण का दुश्मन . नशाखोरी, रंग की जगह त्वचा को नुकसान पहुंचाने, आनंद की जगह भोंडे उधम के लिए कुख्यात हो गया है। पानी की बर्बादी और पेड़ों के नुकसान ने असल में हमारी आस्था और  परंपरा की मूल आत्मा को ही नष्ट  कर दिया है।

कहानियां, किवदंतियां कुछ भी कहें, लेकिन इस पर्व का वास्तविक संदेश तो - स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण ही है। यह दुखद है कि अब इस त्योहार ने अपना पारंपरिक रूप और उद्देश्य  खो दिया है और इसकी छबि पेड़ व हानिकारण पदाथों को जला कर पर्यावरण को हानि पहुंचाने और रंगों के माध्यम से जहर बांटने की बनती जा रही है। हालांकि देश के कई शहरों और मुहल्लों में बीते एक दशक के दौरान होली को प्रकृति-मित्र के रूप में मनाने के अभिनव प्रयोग भी हो रहे हैं।  हमारा कोई भी संस्कार या उत्सव उल्लास की आड़ में पर्यावरण को क्षति की अनुमति नहीं देता। होलिका दहन के साथ सबसे बड़ी कुरीति हरे पेड़ों को काट कर जलाने की है। वास्तव में होली भी  दीपावली की ही तरह खलिहान से घर के कोठार में फसल आने की ख़ुशी   व्यक्त करने का पर्व है।  कुछ सदियों पहले तक ठंड के दिनों में भोज्य पदार्थमवेषियों के लिए चाराजैसी कई चीजें भंडार कर रखने की परंपरा थी। इसके अलावा ठंड के दिनों में कम रौशनी  के कारण कई तरह का कूड़ा भी घर में ही रहा जाता था। याद करें कि होली में गोबर के बने उपले की  माला अवश्य  डाली जाती है। असल में ठंड के दिनों में जंगल जा कर जलावन लाने में डर रहता था, सो ऐसे समय के लिए घरों में उपलों को भी एकत्र कर रखते थे। चूंकि अब घर में नया अनाज आने वाला है सोकंडे-उपले की जरूरत नहीं , तभी उसे होलिका दहन में इस्तेमाल किया जाता है। उपले की आंच धीमी होती है, लपटें ऊंची नहीं जातीं, इसमें नए अन्न - गेंहूं की बाली या चने के छोड़ को भूना भी जा सकता हैसो हमारे पूर्वजों ने होली में उपले के प्रयोग किए। दुर्भाग्य है कि अब लोग होली की लपटें आसमान से ऊंची दिखाने के लिए लकड़ी और कई बार प्लास्टिक जैसा जहरीला  कूड़ा इस्तेमाल करते हैं।  एक बात और आदिवासी समाज में प्रत्येक कृषि  उत्पाद के लिए “नवा खाई’ पर्व होता है - जो भी नई फसल आई , उसके लिए प्रकृति का धन्यवाद। होली भी किसानों के लिए कुछ ऐसा ही पर्व है।

होलिका पर्व का वास्तविक समापन शीतला अष्टमी को होता है। पूर्णिमा की होली और उसके आठ दिन बाद अष्टमी  का यह अवसर! शक संवत का पहला महीना चैत्र और इसके कृष्ण  पक्ष पर  बासी खाना खाने का बसौड़ा। इस दिन घर में चूल्हा नहीं जलता और एक दिन पहले ही पक्क्ी रसोई यानि पूड़ी कचोडी , चने , दही बड़े आदि बन जाते हैं। सुबह सूरज उगने से पहले होलिका के दहन स्थल पर शीतला मैया को भोग लगाया जाता है।

स्कंद पुराण शीतलाष्टक  स्त्रोत  के अनुसार “वन्देहं शीतलां देवींरासभस्थां दिगम्बराम। मार्जनीकलशोपेतां शूर्पालड्कृतमस्तकाम।।“ ,अर्थात गर्दभ पर विराजमान दिगम्बरा, हाथ में झाड़ू तथा कलश धारण करने वाली, सूप से अलंकृत मस्तकवाली भगवती शीतला की मैं वंदना करता हूं।“

 शीतला माता के इस वंदना मंत्र से स्पष्ट है कि ये स्वच्छता की अधिष्ठात्री देवी हैं। हाथ में मार्जनी (झाड़ू) होने का अर्थ है कि समाज को भी सफाई के प्रति जागरूक होना चाहिए। कलश से तात्पर्य है कि स्वच्छता रहने पर ही स्वास्थ्य रूपी समृद्धि आती है। मान्यता के अनुसारइस व्रत को रखने से शीतला देवी प्रसन्न होती हैं और व्रती के कुल में चेचक, खसरा, दाह, ज्वर, पीतज्वर, दुर्गधयुक्त फोड़े और नेत्रों के रोग आदि दूर हो जाते हैं।  हकीकत में संदेश यही है कि यदि स्वच्छता रखेगे तो ये रोग नहीं हो सकते।

तनिक गौर करें, होली का प्रारंभ हुआ, घर-खलिहान से कूड़ा-कचरा बुहार कर होली में जलाने से, पर्व में शरीर  पर विभिन्न रंग लगाए और  फिर उन्हें छुड़ाने के लिए रगड़-रगड़ कर स्नान किया। पुराने कपड़े फटे व नए वस्त्र धारण किए और समापन पर स्वच्छता की देवी की पूजा-अर्चना की। लोगों को अपने परिवेश  व व्यक्तिगत सफाई का संदेश दिया। गली-मुहल्ले के चौराहे  पर होली दहन स्थल पर बसौड़ा का चढ़ावा चढ़ाया जिसे समाज के गरीब और ऐसे वर्ग के लेागों ने उठा कर भक्षण किया जिनकी आर्थिक स्थिति उन्हें पौष्टिक  आहार से वंचित रखती है। चूंकि भोजन ऐसा है जो कि दो-तीन दिन खराब नहीं होना , सो वे घर में संग्रह कर भी खा सकते है।। और फिर यही लोग नई उमंग-उत्साह के साथ फसल की कटाई से ले कर अगली फसल के लिए खेत को तैयार करने का कार्य तपती धूप में भी लगन से करेंगे।  इस तरह होली का उद्देश्य  समाज में समरसता बनाए रखना, अपने परिवेश  की रक्षा करना और जीवन में मनोविनोद बनाए रखना है,  यही इसका मूल दर्शन  है।

 

बुधवार, 1 मार्च 2023

Now KALI becomes killer

 काली बन गई काल

पंकज चतुर्वेदी



महज 153 किलोमीटर  का ही सफ़र है इसका , . कई करोड़ खर्च  करने के बाद भी दूषित बनी यमुना – उसकी सहयक नदी हिंडन जो सालों से पवित्र होने की वायदों की घुट्टी पी रही है और उसकी भी सहायक है यह- कृष्णा . जहां –जहाँ से गुजर रही है मौत बाँट रही है  और जाहिर है जिन नदियों में इसका मिलन हो रहा है वे भी इसके दंश से  हैरान-परेशान हैं।  जिले के गांव हसनपुर लुहारी में कैंसर से आधा दर्जन से अधिक लोग पीड़ित हैं। करीब एक दर्जन लोग दम तोड़ चुके हैं। यहां हेपेटाइटिस बी व सी और लीवर, त्वचा, हृदय, किडनी के कैंसर के मरीजों की काफी संख्या है। गांव दखौड़ी, जमालपुर, चंदेनामाल समेत कई गांवों के हालात भयावह हैं। फिलहाल भी कैंसर से पीड़ित मरीज जिदगी मौत से लड़ रहे है।



जनवरी-23  के पहले हफ्ते में शामली जिले के स्वास्थ्य विभाग की रिपोर्ट बताती है कि जिले में कृष्णा नदी के किनारे बसे गाँवों में 22 लोग केंसर-ग्रस्त मिले  हैं . इसके अलावा ६३ को श्वांस की दिक्कत, 20 को लीवर की परेशानी , 55 को त्वचा रोग और 12 को पेट के गंभीर रोग पाये गए . समझना होगा कि  कृष्णा नदी तो बस एक बानगी है, देश की अधिकाँश छोटी नदियाँ स्थानीय नगरीय या औद्योगिक कचरों की मार से बेदम हैं और जब सरकारें बड़ी नदियों को स्वच्छ रखने पर धन खर्च करती हैं और अपेक्षित परिणाम नहीं निकलते, तो उसका मुख्या कारण कृष्णा जैसी छोटी नदियों  के प्रति उपेक्षा ही होता हैं .


कृष्णा नदी का प्रवाह हिंडन की पूर्वी दिशा में  सहारनपुर जिले के दरारी गांव से एक झरने से प्रारंभ होता है . यहाँ से यह शामली व बागपत जनपदों से होते हुए करीब 153 किलोमीटर की दूरी नापकर बागपत जनपद के ही बरनावा कस्बे के जंगल में हिंडन में समाहित हो जाती है। इस नदी में ननौता, सिक्का, थानाभवन, चरथावल, शामली व बागपत  के कई कारखानों का गैर-शोधित रासायनिक तरल कचरा और घरेलु नालियों का पानी  गिरता है . कृष्णा नदी सहारनपुर से शामली जनपद की सीमा के गांव चंदेनामाल से प्रवेश करती है। सहारनपुर से ही इसमें कई फैक्टरियों का गंदा पानी गिर रहा है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड स्वीकार करता है कि शामली जिले में दो पेपर मिलों तथा एक डिस्टलरी का पानी नालों के जरिए नदी तक पहुंचता है। हालाँकि अफसरान का दावा यह भी है कि फैक्टरियों में वाटर ट्रीटमेंट प्लांट लगे हैं तथा इनके संचालन की नियमित निगरानी होती है। केवल कारखानों को दोष क्यों दें , अकेले शामली जिले की सीमा में करीब 47 नाले भी कृष्णा नदी में गिरकर इसे दूषित कर रहे हैं।बागपत जिले का गंग्रौली गाँव तो कैंसर –गाँव के नाम से बदनाम है . यहाँ सन 2013 से अभी तक कोई 86 लोग कैंसर से मरे हैं.


करीब 30 साल पहले कृष्णा नदी पूरी तरह से साफ स्वच्छ थी। इसके पानी से खेत भी सींचे जाते थे और घरेलु काम में भी आता था . शहरों –कस्बों की गंदगी को तो यह झेलता रहा लेकिन एक तो कारखानों ने जहर उगला फिर इस इलाके में खेतों में अधिक लाभ कमाए के लोभ में गन्ने के साथ सताह धान की खेती शुरू हुई और उसने नदी ही नहीं भूजल को भी जहरीला बना दिया, चार साल पहले एन जी टी  ने कृष्णा के साथ - साथ काली और हिंडन के किनारे बसे गाँवों के कोई तीन हज़ार हेंडपंप बंद करवा दिए थे क्योंकि वे जल नहीं मौत उगल रहे थे . चूँकि इन इलाकों में पानी की वैकल्पिक व्यवस्था तकाल हो नहीं पाई टी कागजों में बंद हेंडपंप का इस्तेमाल होता रहा .


जहर बन चुका काली नदी का जल मेरठ के जयभीमनगर, आढ़, कुढ़ला, धंजू, देदवा, उलासपुर, बिचौला, मैथना, रसूलपुर, गेसपुर, मुरादपुर, बढ़ौला, कौल व यादनगर समेत मुजफ्फरनगर, गाजियाबाद, अलीगढ़, बुलंदशहर, कन्नौज के 112 गांवों के सैकड़ों लोगों की जान ले चुका है। यमुना प्रदूषण नियंत्रण प्रोजेक्ट के अन्तर्गत इस नदी से प्रदूषण दूर करने को करीब 480 करोड़ स्वाहा हो चुके हैं पर बढ़ते प्रदूषण से जीवनदायी जल अब जहर बन चुका है।

कृष्णा के जल के जहर होने पर विधानसभा में भी चर्चा हुई और संसद में भी. कृष्णा को प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए गांव दखौड़ी व चंदेनामाल के लोग सालों से आन्दोलन भी करते रहे . वर्ष 2006-07 में इसकी शुरुआत जलालाबाद क्षेत्र के गांव चंदेनामाल आंदोलन शुरू किया था। लगातार पल्स पोलियो अभियान का बहिष्कार, विस चुनाव का बहिष्कार, गांव में चूल्हे न फूंककर, बाइक रैली निकालते रहे, लेकिन जिला प्रशासन नहीं चेता। 2009 में दखौड़ी के ग्रामीणों ने चंदेनामाल की साथ आंदोलन किया। चैकडेम को तुड़वाने की मांग को लेकर धरने, प्रदर्शन, भूख हड़ताल हुए। इस बार चेकडेम तोड़ा गया, लेकिन कृष्णा साफ नहीं हुई। 2012 में जलालाबाद के युवाओं ने बीड़ा उठाया। कैंडल मार्च निकाले गए। धरना-प्रदर्शन हुए। इस बार 15 दिन के लिए गंगनहर का पानी इसमें छोड़ा गया, लेकिन नदी को स्वच्छ करने का सपना पूरा नहीं हुआ।


अनुसंधान एवं नियोजन (जल संसाधन) विभाग खंड मेरठ, सेंटर फॉर साइंस एंड एन्वायरमेंट (सीएसई) व जनहित फाउंडेशन की रिपोर्ट व व‌र्ल्ड वाइड फंड की रिपोर्ट से स्पष्ट है कि 2035 तक यह नदी लुप्त हो जाएगी। इसमें पानी की रफ्तार लगातार घटती जा रही है। गेज स्थान बुलंदशहर में जल स्तर 35 क्यूसेक है जो 25 साल पहले 600 क्यूसेक रहता था। इनमें लेड 1.15 से 1.15, क्रोमियम 3.18 से 6.13 व केडमियम 0.003 से 0.014 मिलीग्राम/लीटर पाए गये हैं। बीएचसी व हेप्टाक्लोर जैसे पॉप्स भी इसमें मिले हैं। 2-3 हजार किलो लीटर गैर-शोधित तरल कचरा रोजाना इसमें डाला जाता है।


दुर्भाग्य है कि पर्यावरण संरक्षण के लिए गठित सबसे बड़ी अदालत नेशनल ग्रीन  ट्रिब्यूनल(एन जी टी) भी कृष्णा के प्रदूषण के सामने बेबस है . फरवरी-15  में एन जी टी ने  इस असफलता के लिए छः जिलों के कलेक्टर्स  पर पांच पांच हज़ार का जुरमाना लगा दिया था . फरवरी -21  में एन जी टी ने कृष्णा की जिम्मेदारी  राज्य के सचिव को सौंपी थी . मामला केवल कृष्णा का नहीं , छोटे कस्बो, गाँव से बहने वाली सभी अल्प ज्ञात  या गुमनाम  नदियों की हैं , जिनके किनारे  खेतों में बेशुमार रसायन के इस्तेमाल, जंगल- कटाई , नदी के मार्ग पर कब्जे, रेत  उत्खनन ने सदियों से अविरल बह रही “जीवन-धाराओं” के असित्व पर ही संकट खड़ा कर दिया है . नदी केवल जल-वहन का मार्ग नहीं है , यह सैंकड़ों जीवो का आश्रय स्थल, समाज के अब्दे वर्ग की जीवकोपार्जन और भोजन का माध्यम  और  धरती के बढ़ते तापमान को नियंत्रित करने का नैसर्गिक तंत्र भी है . जितनी जरूरत बड़ी नदियों को बचाने की है , उससे कहीं अधिक  अनिवार्यता  कृष्णा अजैसी छोटी नदियों को सहेजने की है .

 

मंगलवार, 28 फ़रवरी 2023

climate change poses a threat to agriculture

 खेती को खतरा बनता बदलता मौसम 
पंकज चतुर्वेदी


फरवरी-2023 का दूसरा हफ्ता  समूचे हिमाचल प्रदेश के लिए तपती गर्मी ले आया हे। भले ही पर्यटन व्यवसाय से जुड़े लोग  इसे घाटे का मौसम कह रहे हैं लेकिन असली खतरा तो खेती पर मंडरा रहा है। जान लें  इस समय गेंहू जैसी फसलं पकने को तैयार है। और ऐसे में अचानक इतनी गर्मी होने से  दाने  का सिकुड़ना तय है।  कमजोर दाना का अर्थ है, एक तो वजन में कमी और दूसरा पौष्टिकता .  का अब बहुत देर नहीं है जब किसान के सामने बदलते मौसम के कुप्रभाव उसकी मेहनत और प्रतिफल के बीच खलनायक की तरह खड़े दिखेंगें। हालांकि बीते कुछ सालों में मौसम का चरम होना-खासकर अचानक ही बहुत सारी बरसात एक साथ हो जाने से खड़ी फसल की बर्बादी किसान को कमजोर करती रही है। 

धरती के तापमान में लगातार हो रही बढ़ौतरी और उसके गर्भ से उपजे जलवायु परिवर्तन का भीषण खतरा अब दुनिया के साथ-साथ भारत के सिर पर मंडरा रहा है। यह केवल असामयिक मौसम बदलाव या ऐसी ही प्राकृतिक आपदाओं तक सीमित नहीं रहने वाला, यह इंसान के भोजन, जलाशयों में पानी की शुद्धता, खाद्य पदार्थों की पौष्टिकता, प्रजनन क्षमता से ले कर जीवन के उन सभी पहलुओं पर विषम प्रभाव डालने लगा है जिसके चलते प्रकृति का अस्तित्व और मानव का जीवन  सांसत में है। 

कृषि मंत्रालय के  भारतीय  कृषि  अनुसंधान परिशद का एक षोध बताता है कि सन 2030 तक हमारे धरती के तापमान में 0.5 से 1.2 डिग्री सेल्सियस तक की वृद्धि अवश्यंभावी है। साल-दर-साल बढ़ते तापमान का प्रभाव सन 2050 में 0.80 से 3.16 और सन 2080 तक 1.56 से 5.44 डिग्री हो सकता है। जान लेकिन तापमान में एक डिग्री बढ़ौतरी का अर्थ है कि खेत में 360 किलो फसल प्रति हैक्टेयर की कमी आ जाना। इस तरह जलवायु परिवर्तन के चलते खेती के लिहाज से 310 जिलों को संवेदनशील माना गया है।  इनमें से 109 जिले बेहद संवेदनशील हैं जहां आने वाले एक दशक में ही उपज घटने, पशु धन से ले कर मुर्गी पालन व मछली उत्पाद तक कमी आने की संभावना है। तापमान बढ़ने से बरसात के चक्र में बदलाव, बैमौसम व असामान्य बारिश, तीखी गर्मी व लू, बाढ़ व सुखाड़ की सीधी मार किसान पर पड़ना है।  तक अभी तक गौण हैं। सरकारी आंकड़े भी बताते हैं कि खेती पर निर्भर जीवकोपार्जन करने वालों की संख्या भले ही घटे, लेकिन उनकी आय का दायरा सिमटता जा रहा है। सनद रहे कभी सूखे तो कभी बरसात की भरमार से किसान दशकों तक उधार में दबा रहता है और तभी वह खेती छोड़ने को मजबूर है। । 

भारत मौसम, भूमि-उपयोग, वनस्पति , जीव के मामले में व्यापक विविधता वाला देश है और यहां जलवायु परिवर्तन का प्रभाव भी कुछ सौ किलोमीटर की दूरी पर अलग किस्म से हो रहा है।  लेकिन पानी बचाने और कुपोषण व भूख से निबटने की चिंता पूरे देश में एकसमान है। हमारे देश में उपलब्ध ताजे पानी का 75 फीसदी अभी भी खेती में खर्च हो रहा है। तापमान बढ़ने से जल-निधियों पर मंडरा रहे खतरे तो हमारा समाज गत दो दशकों से झेल ही रहा है। प्रोसिडिंग्स ऑफ नेशनल अकादमी ऑफ साइंस नामक जर्नल के नवीनतम अंक में प्रकाशित एक शोध पत्र के अनुसार भारत को जलवायु परिवर्तन के कृषि पर प्रभावों को कम करते हुए यदि पोषण के स्तर को कायम रखना है तब रागी, बाजरा और जई जैसे फसलों का उत्पादन बढ़ाना होगा। इस अध्ययन को कोलंबिया यूनिवर्सिटी के डाटा साइंस इंस्टीट्यूट ने किया है।कोलंबिया यूनिवर्सिटी के डाटा साइंस इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिक डॉ कैले डेविस ने भारत में जलवायु परिवर्तन के कृषि पर प्रभावों, पोषण स्तर, पानी की कमी, घटती कृषि उत्पादकता और कृषि विस्तार के लिए भूमि के अभाव पर गहन अध्ययन किया है और इस सन्दर्भ में । उनके अनुसार भारत में तापमान वृद्धि के कारण कृषि में उत्पादकता घट रही है और साथ ही पोषक तत्व भी कम होते जा रहे हैं। भारत को यदि तापमान वृद्धि के बाद भी भविष्य के लिए पानी बचाना है और साथ ही पोषण स्तर भी बढ़ाना है तो गेहूं और चावल पर निर्भरता कम करनी होगी। इन दोनों फसलों को पानी की बहुत अधिक आवश्यकता होती है और इनसे पूरा पोषण भी नहीं मिलता। डॉ कैले डेविस के अनुसार चावल और गेहूं पर अत्यधिक निर्भरता इसलिए भी कम करनी पड़ेगी क्योंकि भारत उन देशों में शुमार है जहां तापमान वृद्धि और जलवायु परिवर्तन का सबसे अधिक असर पड़ने की संभावना है और ऐसी स्थिति में इनकी उत्पादकता और पोषक तत्व दोनों पर प्रभाव पड़ेगा।

अमेरिका के आरेजोन राज्य की सालाना जलवायु परिवर्तन रिपोर्ट 2017 में चेता दिया गया था कि मौसम में बदलाव के कारण पानी को सुरक्षित रखने वाले जलाशयों में ऐसे शैवाल विकासित हो रहे हैं जो पानी की गुणवत्ता को प्रभावित कर रहे हैं।  पिछले दिनो अमेरिका के कोई 60 हजार जलाशयों के जल का परीक्षण  वहां की नेशनल लेक असेसमेंट विभाग ने किया और पाया कि जब जलाशयों में मात्रा से कम पानी होता है तो उसका तापमान ज्यादा होता है और साथ ही उसकी अम्लीयता भी बढ़ जाती हे। जब बांध या जलाशय सूखते हैं तो उनकी तलहटी में कई किस्म के खनिज और अवांछित रसायन भी एकत्र हो जात हैं और जैसे ही उसमें पानी आता है तो वह उसकी गुणवत्ता पर विपरीत असर डालते हैं। सनद रहे ये दोनों ही हालात जल में जीवन यानी- मछली, वनस्पति आदि के लिए घातक हैं। भारत में तो यह हालात हर साल उभर रहे हैं कभी भयंकर सूख तो जलाशय रीते और कभी अचानक बरसात तो लबालब। 

यह तो सभी जानते हैं कि जलवायु परिवर्तन या तापमान बढ़ने का बड़ा कारण विकास की आधुनिक अवधारणा के चलते वातावरण में बढ़ रही कार्बन डाईआक्साइड की मात्रा है। हार्वर्ड टी.एच. चान स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ की ताजा रिपोर्ट में बताती है कि इससे हमारे भोजन में पोषक तत्वों की भी कमी हो रही है। रिपेर्ट चेतावनी देती है कि धरती के तापमान में बढ़ौतरी खाद्य सुरक्षा के लिए दोहरा खतरा है। आईपीसीसी समेत कई अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों में इससे कृषि उत्पादन घटने की आशंका जाहिर की गई है। इससे लोगों के समक्ष खाद्य संकट पैदा हो सकता है। लेकिन नई रिपोर्ट और बड़े खतरे की ओर आगाह कर रही है। दरअसल, कार्बन उत्सर्जन से भोजन में पोषक तत्वों की कमी हो रही है। रिपोर्ट के अनुसार कार्बन उत्सर्जन में बढ़ोतरी के कारण चावल समेत तमाम फसलों में पोषक तत्व घट रहे हैं। इससे 2050 तक दुनिया में 17.5 करोड़ लोगों में जिंक की कमी होगी, 12.2 करोड़ लोग प्रोटीन की कमी से ग्रस्त होंगे।.दरअसल, 63 फीसदी प्रोटीन, 81 फीसदी लौह तत्व तथा 68 फीसदी जिंक की आपूर्ति पेड़-पौंधों से होती है। जबकि 1.4 अरब लोग लौह तत्व की कमी से जूझ रहे हैं जिनके लिए यह खतरा और बढ़ सकता है। .

शोध में पाया गया कि जहां अधिक कार्बन डाईऑक्साइड की मौजूदगी में उगाई गई फसलों में तीन तत्वों जिंक, आयरन एवं प्रोटीन की कमी पाई गई है। वैज्ञानिकों ने प्रयोगशाला में प्रयोग के जरिए इस बात की पुष्टि भी की है। .रिपोर्ट में कहा गया है कि कार्बन डाई आक्साइड पौधों को बढ़ने में तो मदद करता है। लेकिन पौधों में पोषक तत्वों की मात्रा को कम कर देता है।.यह रिपोर्ट भारत जैसे देशों के लिए अधिक डराती है क्योंकि हमारे यहां पहले से कुपोषण एक बड़ी समस्या है। 


The right to a dignified farewell and a new standard in medical world

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