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रविवार, 10 मार्च 2024

To save ganga Yamuna small rivers to be saved

 

छोटी नदियों की सेहत सुधारे बगैर  नहीं बचेंगी  गंगा- यमुना

पंकज चतुर्वेदी


 

गंगा देश की संस्कृति की पहचान और मानव विकास की सहयात्री है । इसके संरक्षण के अभी तक किये गए सभी प्रयास अमूर्त ही रहे हैं । 2014 में सत्ता में आते ही मोदी सरकार ने गंगा को निर्मल और अविरल बनाने को खासा महत्व दिया था और इसके लिए नमामि गंगे योजना की घोषणा की थी. योजना पर काम अक्टूबर 2016 में आए आदेश के बाद से शुरु हो सका था। वित्त वर्ष 2014-15 से लेकर 2020-2021 तक इस नमामि गंगे योजना के तहत पहले 20 हजार करोड़ रुपए खर्च करने का रोडमैप तैयार किया गया था जो कि बाद में बढ़ाकर 30 हजार करोड़ रुपए कर दिया गया. वहीं 2022-23 में योजना मद में 2047 करोड़ आवंटित किए गए थे. वित्त वर्ष 2023-24 में 4000 करोड़ रूपए का बजट अनुमान रखा गया हालांकि आवंटन केवल 2400 करोड़ रूपए का ही किया गया. वहीं वित्तीय वर्ष 2024-25 में नमामि गंगे प्रोजेक्ट के फेज दो के लिए 3500 करोड़ रुपए का बजट रखा गया है। यदि यमुना को लें तो उसमें भी बीते चार दशकों में इतने हजार करोड़ बह गए कि नई यमुना खोद दी  जाती । यह हमारा तंत्र समझ नहीं रहा कि हर बड़ी नदी की शिराएं उनसे जुड़ी छोटी नदियां होती हैं और बढ़ते शहरीकरण ने इन नदियों को समेटना और शून्य करना शुरू आकर दिया है । हम नदियों को सुंदर बनाने का विचार करते हैं लेकिन स्वस्थ बनाने के लिए अनिवार्य उनकी सखा-सहेलियों को गप्प कर रहे हैं ।

वैसे तो हर दिन समाज, देश और धरती के लिए बहुत जरुरी है , लेकिन छोटी  नदियों  पर ध्यान देना अधिक  जरुरी है . गंगा, यमुना जैसी बड़ी नदियों को स्वच्छ रखने पर तो बहुत काम हो रहा है , पर ये नदियाँ बड़ी इसी लिए बनती है  क्योंकि इनमें बहुत सी छोटी नदियाँ आ कर मिलती हैं, यदि छोटी नदियों में पानी कम होगा तो बड़ी नदी भी सूखी रहेंगी , यदि छोटी नदी में गंदगी या प्रदूषण होगा तो वह बड़ी नदी को प्रभावित करेगा .

छोटी नदियां   अक्सर गाँव, कस्बों में बहुत कम दूरी में बहती हैं.  कई बार एक ही नदी के अलग अलग गाँव में अलग-अलग नाम होते हैं . बहुत नदियों का तो रिकार्ड भी नहीं है . हमारे लोक समाज  और प्राचीन मान्यता नदियों   और जल को ले कर बहुत अलग थी , बड़ी नदियों से दूर घर-बस्ती हो . बड़ी नदी को अविरल बहने दिया जाए . कोई बड़ा पर्व या त्यौहार हो तो बड़ी नदी के किनारे एकत्र हों, स्नान करें और पूजा करें . छोटी नदी , या तालाब या झील के आसपास बस्ती . यह जल संरचना दैनिक कार्य के लिए जैसे स्नान, कपडे धोने, मवेशी आदि के लिए . पीने की पानी के लिए घर- आँगन, मोहल्ले में कुआँ , जितना जल चाहिए, श्रम  करिए , उतना ही रस्सी से खिंच कर निकालिए . अब यदि बड़ी नदी बहती रहेगी तो छोटी नदी या तालाब में जल बना रहेगा , यदि तालाब और छोटी नदी में  पर्याप्त जल है तो घर के कुएं में कभी जल की कमी नहीं होगी .

एक मोटा अनुमान है कि आज भी देश में कोई 12 हज़ार छोटी ऐसी नदियाँ हैं , जो उपेक्षित है , उनके अस्तित्व पर खतरा है . उन्नीसवीं सदी तक बिहार(आज के झारखंड को मिला कर ) कोई छः हज़ार  नदियाँ हिमालय से उतर कर आती थी, आज  इनमें से महज 400  से 600 का ही अस्तित्व बचा है . मधुबनी, सुपौल  में बहने वाली  तिलयुगा नदी कभी  कौसी से भी विशाल हुआ करती  थी, आज उसकी जल धरा सिमट कर  कोसी की सहायक नदी के रूप में रह गई है . सीतामढ़ी की लखनदेई  नदी को तो सरकारी इमारतें ही चाट गई. नदियों के इस तरह रूठने और उससे बाढ़ और सुखाड के दर्द साथ –साथ चलने की कहानी  देश के हर जिले और कसबे की है . लोग पानी के लिए पाताल का सीना चीर रहे हैं और निराशा हाथ लगती है , उन्हें यह समझने में दिक्कत हो रही हैं कि धरती की कोख में जल भण्डार  तभी लबा-लब रहता है, जब पास बहने वाली नदिया हंसती खेलती हो .

अंधाधुंध रेत खनन , जमीन  पर कब्जा, नदी के बाढ़ क्षेत्र में स्थाई निर्माण , ही  छोटी नदी के सबसे बड़े दुश्मन हैं – दुर्भाग्य से जिला स्तर पर कई छोटी नदियों का राजस्व रिकार्ड नहीं हैं, उनको  शातिर तरीके से  नाला बता दिया जाता है , जिस साहबी  नदी पर  शहर बसाने से हर साल गुरुग्राम डूबता है, उसका बहुत सा रिकार्ड ही नहीं हैं , झारखण्ड- बिहार में बीते चालीस साल के दौरान हज़ार से ज्यादा छोटी नदी गुम हो गई , हम यमुना में पैसा लगाते हैं लेकिन उसमें जहर ला रही हिंडन, काली को और गंदा करते हैं – कुल  मिला कर यह  नल खुला छोड़ कर पोंछा लगाने का श्रम करना जैसा है .

छोटी नदी केवल पानी के आवागमन का साधन नहीं होती . उसके चारों  तरफ समाज भी होता है और पर्यावरण भी . नदी किनारे  किसान भी है और कुम्हार भी, मछुआरा भी और  धीमर भी – नदी की सेहत बिगड़ी तो तालाब से ले कर कुएं तक में जल का संकट हुआ – सो परोक्ष और अपरोक्ष समाज का कोई ऐसा वर्ग नहीं है  जो  इससे प्रभावित नहीं हुआ हो . नदी- तालाब से जुड़ कर पेट पालने वालों का जब जल-निधियों से आसरा ख़त्म हुआ तो  मजबूरन उन्हें पलायन करना पड़ा. इससे एक तरफ  जल निधियां दूषित हुईं तो  दूसरी तरफ बेलगाम शहरीकरण के चलते महा नगर अरबन स्लम में बदल रहे हैं . स्वास्थ्य , परिवहन और शिक्षा के संसाधन महानगरों में केन्द्रित होने के कारण ग्रामीण सामाजिक- आर्थिक संतुलन भी इससे गड़बड़ा  रहा है . जाहिर है कि नदी- जीवी लोगों की निराशा ने समूचे समाज को समस्याओं की नई सौगात दी है .

सबसे पहले छोटी नदियों का एक सर्वे और उसके जल तन्त्र  का दस्तावेजीकरण हो , फिर छोटी नदियों कि अविरलता सुनिश्चित हो, फिर उससे रेत उत्खनन और  अतिक्रमण को मानव- द्रोह अर्थात हत्या की तरह गंभीर अपराध माना जाए .  नदी के सीधे इस्तेमाल से बचें . नदी में पानी रहेगा तो  तालाब, जोहड़,  सम्रद्ध रहेंगे  और इससे कुएं या भू जल . स्थानीय इस्तेमाल के लिए वर्षा जल को पारम्परिक तरीके जीला कर एक एक बूँद एकत्र किया जाए , नदी के किनारे  कीटनाशक के इस्तेमाल, साबुन  और शौच से परहेज के लिए जन जागरूकता और वैकल्पिक  तंत्र विकसित हो . सबसे बड़ी बात नदी को सहेजने का जिमा स्थानीय समाज, खासकर उससे सीधे जुड़े लोगों को दिया जाए , जैसे कि  मद्रास से पुदुचेरी तक ऐरी के रखरखाव के जल- पंचायत हैं .

बुंदेलखंड तो प्यास , पलायन के लिए बदनाम है . यहाँ के प्रमुख शहर छतरपुर में एक नदी की सेहत बिगड़ने से वेनिस की तरह जल से लबालब रहने वाला शहर भी प्यास हो गया . महाराजा छत्रसाल ने यह शहर बसाया था . यहाँ नदी के उतार चढाव की गुंजाईश कम ही है . तीन बरसाती नाले देखें– गठेवरा नाला, सटई रोड के नाला और चंदरपुरा गांव के बरसाती नाला  । इन तीनों का पानी अलग–अलग रास्तों से डेरा पहाड़ी पर आता और यह जल–धारा  एक नदी बन जाती ।  चूंकि इसमें खूब सिंघाड़े होते तो लोगों ने इसका नाम सिंघाड़ी नदी रख दिया । छतरपुर कभी वेनिस  तरह था– हर तरफ तालाब और उसके किनारे बस्तियां और इन तालाबों से पानी का लेन–देन चलता था -सिंघाड़ी नदी का । बरसात की हर बूंद तीन नालों में आती और फिर एकाकार हो कर सिंघाडी नदी के रूप में प्रवाहित होती । इस नदी से  तालाब जुड़े हुए थे, जो एक तो पानी को बहता हुआ निर्मल रखते, दूसरा यदि तालाब भर जाए तो उसका पानी नदी के जरिये  से दूसरे तालाबों में बह जाता । सिंघाड़ी नदी से शहर का संकट मोचन तालाब और ग्वाल मगरा तालाब भी भरता था । इन तालाबों से प्रताप सागर और किशोर सागर तथा रानी तलैया भी नालों और ओनों (तालाब में ज्यादा जल होने पर जिस रास्ते से बाहर बहता है, उसे ओना कहते हैं ।)से होकर जुड़े थे ।

अभी दो दशक पहले तक संकट मोचन पहाड़िया के पास सिंघाड़ी नदी चोड़े पाट के साथ सालभर बहती थी । उसके किनारे घने जंगल थे , जिनमे हिरन, खरगोश , अजगर , तेंदुआ लोमड़ी जैसे  पर्याप्त जानवर भी थे . नदी किनारे श्मसान  घाट हुआ करता था .  कई खेत इससे सींचे जाते और कुछ लोग  ईंट के भट्टे लगाते थे । 

बीते दो दशक में ही नदी पर घाट, पुलिया  और सौन्द्रयीकरण के नाम पर जम कर सीमेंट तो लगाया गया  लेकिन उसमें पानी की आवक की रास्ते  बंद कर दिए गए. आज नदी के नाम पर नाला रह गया है । इसकी धारा  पूरी तरह सूख गई है । जहाँ कभी पानी था, अब वहां बालू-रेत उत्खनन वालों ने बहाव मार्ग को उबड़-खाबड़ और  दलदली बना दिया .  छतरपुर शहरी सीमा में  एक तो जगह जगह जमीन के लोभ में जो कब्जे हुए उससे नदी का तालाब से जोड़-घटाव की रास्तों पर विराम लग गया , फिर संकट मोचन पहाड़िया पर अब हरियाली की जगह कच्चे-पक्के मकान दिखने लगे , कभी बरसात की हर बूंद इस पहाड  पर रूकती थी और धीरे-धीरे रिस कर नदी को  पोषित करती थी . आज  यहाँ बन गए हजारों मकानों का अमल-मूत्र और गंदा पानी सीधे सिंघाड़ी नदी में गिर कर उसे नाला बना  रहा है  .

जब यह नदी अपने पूरे स्वरूप में थी तो  छतरपुर शहर से निकल कर  कोई 22 किलोमीटर का सफर तय कर हमा, पिड़पा, कलानी गांव होते हुए उर्मिल नदी में मिल जाती थी । उर्मिल भी यमुना तंत्र की नदी है । नदी जिंदा थी तो शहर के सभी तालाब, कुएं भी लबालब रहते थे । दो दशक पहले तक यह नदी 12 महीने कल कल बहती रहती थी । इसमें पानी रहता था । शहर के सभी तालाबों को भरने में कभी सिंघाड़ी नदी की बहुत बड़ी भूमिका होती थी. तालाबों के कारण कुओं में अच्छा पानी रहता था , लेकिन आज वह खुद अपना ही असतित्व से जूझ रही है ।

नदी की मुख्य धारा के मार्ग में अतिक्रमण होता जा रहा है । नदी के कछार ही नहीं प्रवाह मार्ग में ही लोगों ने मकान बना लिए हैं । कई जगह धारा को तोड़ दिया गया है । पूरे नदी में कहीं भी एक बूंद पानी नहीं है । नदी के मार्ग में जो छोटे–छोटे रिपटा ओर बंधान बने थे वे भी खत्म हो गए हैं । पूरी नदी एक पगडंडी और ऊबड़–खाबड़ मैदान के रूप में तब्दील होकर रह गई है । जबकि दो दशक पहले तक इस नदी में हर समय पानी रहता था । नदी के घाट पर शहर के कई लोग हर दिन बड़ी संख्या में नहाने जाते थे । यहां पर पहुंचकर लोग योग–व्यायाम करते थे, कुश्ती लडऩे के लिए यहां पर अखाड़ा भी था । भूतेश्वर भगवान का मंदिर भी यहां प्राचीन समय से है । यह पूरा क्षेत्र हरे–भरे पेड़–पौधों और प्राकृतिक सौंदर्य से आच्छादित था, लेकिन समय के साथ–साथ यहां का नैसर्गिक सौंदर्य नष्ट होता चला गया ।  नदी अब त्रासदी बन गई है । आज नदी के आसपास रहने वाले लोग  मानसून के दिनों में भी एक से दो किलोमीटर दूर से  सार्वजानिक हैण्ड पंप  से  पानी लाने को मजबूर है, जब-तब जल संकट का हल्ला होता है तो या तो  भूजल उलीचने के लिए  पम्प रोप जाते है या फिर मुहल्लों में पाइप बिछाए जाने लगते है, लेकिन इसका जवाब किसी के पास नहीं होता कि जमीन की कोख या पाइप में पानी कहाँ से आएगा ?

जलवायु परिवर्तन के दुष्परिणाम अब सामने आ रहे हैं . ऐसे में  छोटी नदियाँ धरती  के तापमान को नियंत्रित रखने , मिटटी की नमी बनाए रखने और हरियाली के संरक्षण के लिए अनिवार्य हैं . नदिउओन के किनारे से अतिक्रमण हटाने, उसमें से  बालू-रेत उत्खनन को  नियंत्रित करने , नदी की गहराई के लिए उसकी समय समय पर सफाई से इन नदियों को बचाया जा सकता है , सबसे बड़ी बात समाज यदि इन नदियों को अपना मान कर सहेजने लगे तो इससे  समाज का ही भविष्य उज्जवल होगा .

 

River crisis deepens due to silt

 

गाद से गहराता नदियों का संकट

पंकज चतुर्वेदी





पिछले महीने सम्पन्न सतलुज- यमुना जोड़ की बैठक में पंजाब सरकार ने स्पष्ट किया कि उनके राज्य में सतलुज नदी अभी से सूख रही है । दिल्ली में यमुना हो या फिर गाजियाबाद-शामली में हिंडन, सभ की दर सिकुड़ रही है । अभी दो महीने पहले बरसात में तबाही मचाने वाली बिहार के गोपालगंज जिले से गुजरने वाली घोघारी, धमई व स्याही नदियों ने सूखने के लिए गर्मी का इंतजार नहीं किया ।  

गत 12 जुलाई-22  को सी-गंगा यानी सेंटर फार गंगा रिवर बेसिन मेनेजमेंट एंड स्टडीज ने जल शक्ति मंत्रालय को सौंपी गई रिपोर्ट बताती है कि उप्र, बिहार, उत्तराखंड, झारखंड की 65 नदियां बढ़ते गाद से हाँफ रही हैं. हालांकि गाद नदियों के प्रवाह का नैसर्गिक उत्पाद है और देश के कई बड़े तीर्थ और प्राचीन शहर इसी गाद पर विकसित हुए है , लेकिन जब नदी के साथ बह कर आई गाद को जब किनारों पर माकूल जगह नहीं मिलती तो वह  जल-धारा  के मार्ग में व्यवधान बन जाता है . गाद नदी के प्रवाह मार्ग में जमती रहती है और इसे नदियों उथली होती है , अकेले उत्तरप्रदेश में ऐसी  36 नदियाँ  हैं जिनकी कोख में इतनी गाद है कि न केवल उनकी गति मंथर हो गिया बल्कि कुछ ने अपना मार्ग बदला और उनका पाट संकरा हो गया, रही बची कसार अंधाधुंध बालू उत्खनन ने पूरी कर दी . इनमें से कई का अस्त्तत्व खतरे में है .

उत्तर प्रदेश के कानपुर से  बिठूर तक , उन्नाव के बक्सर – शुक्लागंज तक  गंगा की धार बारिश के बाद घाटों से दूर हो जाती है. वाराणसी, मिर्जापुर और बलिया में गंगा नदी के बीच  टापू बन जाते हो. बनारस के पक्के घाट अंदर से मिट्टी खिसकने से दरकने लगे हो. गाजीपुर, मिर्जापुर, चंदौली में नदी का  प्रवाह कई छोटी-छोटी धाराओं में विभक्त हो जाता है .

 

प्रयाग का खिसकता संगम

प्रयागराज के फाफामऊ, दारागंज, संगम, छतनाग और लीलापुर के पास टापू बनते हो. संगम के आसपास गंगा नदी में चार मिलीमीटर की दर से हर साल गाद जमा हो रहा है। पिछले कई सालों से यह सिलसिला जारी है। गंगा की गहराई कम होने से उसकी धारा में भी परिवर्तन हो रहा है। आगे आने वाले दिनों में गंगा नदी की धारा और तेजी से परिवर्तित होगी, क्योंकि जब नदी की गहराई कम हो जाएगी तो नदी का स्वाभाविक बहाव रुक जाएगा। ऐसे में बाढ़ का खतरा स्‍वाभाविक है।गंगा में प्राकृतिक और आबादी  दोनों ओर से गाद पहुंच रही है। तभी  गंगा का पाट छिछला होता जा रहा है। यह बात सरकारी रिकार्ड में हैं कि आज जहां पर संगम है, वहां यमुना की गहराई करीब 80 फीट है। वहीं, गंगा की गहराई इतनी कम है कि संगम के किनारे नदी में खड़ा होकर कोई भी स्नान कर सकता है, जबकि सहायक नदी यमुना की गहराई कम होनी चाहिए। यमुना की अधिक गहराई के चलते असंतुलन उत्पन्न हो रहा है। तभी संगम पूरब की तरफ बढ़ रहा है। आज संगम का झुकाव अकबर के किले  तक खिसक चुका है . कभी संगम सरस्वती घाट के पास हुआ करता था, लेकिन गंगा की गहराई लगातार कम होने से संगम पूरब की तरफ खिसकते हुए किला के पास आ गया है। यदि यही क्रम जारी रहा तो आने वाले दिनों में संगम और भी पूरब की तरफ खिसक जाएगा।

 

आज़ादी के बाद तक गढ़ मुक्तेश्वर  से कोल्कता तक जहाज चला करते थे . गाद के चलते बीते पांच दशक में यहाँ गंगा की धारा  आठ किमी दूर खिसक गई है. बिजनौर के गंगा बैराज पर गाद की आठ मीटर मोटी परत है. आगरा व मथुरा में यमुना गाद से भर गई है. आजमगढ़ में  घाघरा और तमसा के बीच गाद के कारण कई मीटर ऊँचे टापू बन गए हैं घाघरा, कर्मनाशा, बेसो, मंगई, चंद्रप्रभा, गरई, तमसा, वरुणा और असि नदियां गाद  से बेहाल हैं.

बिहार में तो उथली हो रही नदी में गंगा सहित 29 नदियों का दर्द है .जो नदियाँ तेज बहाव  से  आ  ही हैं , उनके साथ आये मलवे से भूमि कटाव भी हो रहा है, कई एक जगह नदी के बीच टापू बन गए हैं . अकेले फरक्का से होकर गंगा नदी पर हर साल 73.6 करोड़ टन गाद आती है जिसमें से 32.8 करोड़ टन गाद इस बराज के प्रतिप्रवाह में ठहर जाती है। झारखंड के साहिबगंज में गंगा, अपने पारंपरिक घाट से पांच किमी दूर चली गई है.  19वीं सदी में बिहार में (जिसमें आज का झारखण्ड भी है ) 6000 से अधिक नदियां बहती थीं, जो आज सिमट कर  600 रह गई है. बिहार का शोक कहलाने वाली कई नदियाँ जैसे गंडक, कोसी, बागमति, कमला, बलान, आदि नेपाल के उंचाई वाले क्षेत्रों से तेजी से लुढक कर राज्य के समतल पर लपकती हैं और इन सभी नदियों के दोनों किनारों पर बाढ़ से बचने के लिए हज़ारों किलोमीटर के पक्के तटबंध हैं . जाहिर है कि पहाड़ झड़ने से उपजा गाद  किनारे जगह पाता और नदियों की तलहटी में बैठ कर उनकी धीमी मौत की इबादत लिखती हैं. झारखंड के साहिबगंज में फरक्का बराज गंगा में गाद का बड़ा कारक है और इसे नदी प्रवाह कई   ठप्प है. साहिबगंज के रामपुर के पास कोसी का गंगा से मिलन होता है . कोसी वैसे ही अपने साथ ढेर मलवा लाती है और उसके आगे ही फरक्का बराज आ जाता है. तभी यहाँ गंगा गाद से सुस्त हो जाती है. राजमहल पहाड़ी पर धड़üे से चल रहे सैकड़ों खदानें और गंगा किनारे पत्थरों गैरकानूनी भंडारण करने से गाद से उथलेपन की स्थिति उत्पन्न हुई है.

विदित हो सन 2016 में केंद्र सरकार द्वारा गठित चितले कमेटी ने साफ कहा था कि नदी में बढती गाद गाद का एकमात्र निराकरण यही है कि  नदी के पानी को फैलने का पर्याप्त स्थान मिले. गाद को बहने का रास्ता मिलना चाहिए. तटबंध और नदी के बहाव क्षेत्रा में अतिक्रमण न हो और अत्यधिक गाद वाली नदियों के संगम क्षेत्र से नियमित गाद निकालने का काम हो. जाहिर है कि ये सिफारिशे किसी ठंडे बस्ते में बंद हो गई और अब नदियों पर रिवर फ्रंट बनाये जा रहे हैं जो न केवल नदी की चौड़ी को कम अक्र्ते हैं, बल्कि जल विस्तार को सीमेंट कंक्रीट से रोक भी देते हैं . परिणाम सामने है थोड़ी सी बरसात में इस साल गुजरात में जम कर शहर- खेतों में पानी भरा

गाद के कारण नदियों पर  खड़े हो रहे संकट से उत्तरांचल भी अछूता नहीं हैं . यहाँ तीन नदियाँ गाद से बेहाल हैं . गंगा को बढ़ती गाद ने बहुत नुकसान पहुंचाया है. हिमालय जैसे युवा व जिंदा पहाड़ से निकलने वाली  गंगा के साथ  गाद आना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है. लेकिन जिस तरह उत्तराखंड में नदी प्रवाह क्षेत्र में बाँध, पनबिजली परियोजनाएं और सड़कें बनीं, उससे एक तो गाद  की मात्रा बढ़ी, दूसरा उसका प्रवाह-मार्ग भी अवरुद्ध हुआ . गाद के चलते ही इस राज्य के कई सौ झरने और सरिताएं  बंद हो गए  और इनसे कई नदियों का उद्गम ही खतरे में है .

 

गौर करना होगा कि इस बार मानसून के बिदा होते ही दक्षिण बिहार की अधिकांश नदियाँ असमय सूखने लगीं . यह सच है कि झारखण्ड से सटे बिहार के इलाकों में इस साल बरसात  कुछ कम हुई लेकिन सदियों से सदा नीरा रहीं नदियों का इस तरह  बेपानी हो जाना साधारण घटना कहा नहीं जा सकता. बांका में चिरुगेरुआ , भागलपुर में खल्खालिया , गया में जमुने और मोरहर  , नालंदा में नोनाई और मोहाने ,पूरी तरह सूख गई, , जबकि सीतामढ़ी की मोराहा हो या कटिहार की कारी कोसी व् दरभंगा में जीवछ, गोपाल गंज के झरही – सभी का जल स्तर  तेजी से घट रहा है . थोडी सी बरसात में उफन जाना और  बरसात थमते ही तलहटी दिखने लगना, गोबर पट्टी कहलाने वाले मैदानी भारत की स्थाई त्रासदी बन गया है. यहां बाढ़ और सुखाड़ एकसाथ डेरा जमाते हैं. बारीकी से देखे तो पायेंगे कि असल में गाद एकत्र होने के कारण नदियों की जल ग्राह क्षमता कम हो रही है , बरसात होते ही उफान जाना और फिर सूख जाने का असल कारण तो नदियों में बढ़ रहा मलवा और गाद है .

यह दुर्भाग्य है कि विकास के नाम पर नदियों के कछार  को सर्वाधिक हडपा गया . असल में कछार नदी का विस्तार होता , ताकि  अधिकतम भी बरसात हो तो नदी के दोनों किनारों पर पानी विस्तार के साथ अविरल बहता रहे. आमतौर पर कचार में केवल मानसून में जल होता है, बाकी समय वहां की नर्म, नम भूमि पर नदी के साथ बह कर आये लावन, जीवाणु का डेरा होता है . फले  इस जमीन पर मौसमी फसल-सब्जी लगाए जाते थे और शायद तभी ऐसे किसानों को “काछी कहा  गया—कछार का रखवाला. काछी, को फ़र्ज़ था कि वह कछार में जमा गाद को आसपास के किसानों को खेत में डालने के लिए दे , जोकि शानदार खाद हुआ करती थी . भूमि के लालच में कछार और उसकी गाद भी लुप्त हो गए और काछी भी और कछार में  आसरा पाने वाले गाद को मज़बूरी में नदी के उदर में ही डेरा ज़माना पड़ता है

 

समझना होगा कि गाद हर एक नदी का स्वाभाविक उत्पाद है  लेकिन  उसका भली भांति प्रबंधन अनिवार्य है . गाद जैसे ही नदी के बीच जमती है तो नदी का प्रवाह बदल जाता है । इससे नदी कई धाराओं में बंटे जाती है , किनारें कटते हैं . यदि गाद किनारे से बाहर नहीं फैली, तो नदी के मैदान का उपजाऊपन और ऊंचाई, दोनों घटने लग जाते हैं । ऊंचाई घटने से किनारों पर बाढ़ का दुष्प्रभाव अधिक होता है. 


 

चितले  कमिटी की रिपोर्ट का सारांश 

  • एम.ए. चितले की अध्यक्षता में एक्सपर्ट कमिटी ने मई, 2017 में ‘भीमगौड़ा (उत्तराखंड) से फरक्का (पश्चिम बंगाल) तक गंगा नदी की डीसिल्टेशन (गाद निकालने के काम) के लिए दिशानिर्देशों की तैयारी’ पर अपनी रिपोर्ट जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय को सौंपी।
     
  • कमिटी के संदर्भ की शर्तों में निम्नलिखित शामिल हैं: (i) गंगा नदी की इकोलॉजी और प्रवाह के लिए डीसिल्टेशन की जरूरत साबित करना, और (ii) गंगा नदी के डीसिल्टेशन के लिए दिशानिर्देश तैयार करना। कमिटी के मुख्य निष्कर्ष और सुझाव निम्नलिखित हैं:
     
  • डीसिल्टेशन और इकोलॉजी: कमिटी ने टिप्पणी की कि नदियों में सिल्टेशन (गाद जमा होना) एक प्राकृतिक प्रक्रिया है। फिर भी भारी वर्षा, जंगलों के कटान, जलाशयों के जल में संरचनागत हस्तक्षेप और बाड़ बनाने से नदियों में सिल्टेशन बढ़ता है। इसका नतीजा यह होता है कि नदियों की बहाव क्षमता कम होती है और बाढ़ की स्थिति पैदा होती है। साथ ही नदियों में जल भंडारण के उपायों को भी नुकसान पहुंचता है। जब नदी को चौड़ा या गहरा किए बिना उसकी प्राकृतिक क्षमता को बरकरार रखने के लिए महीन गाद और तलछट को निकाला जाता है तो उस प्रक्रिया को डीसिल्टेशन कहा जाता है। डिसिल्टेशन से नदी के हाइड्रॉलिक प्रदर्शन में सुधार होता है। फिर भी अंधाधुंध गाद निकालने से नदी की इकोलॉजी और प्रवाह पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
     
  • डीसिल्टिंग के सिद्धांत: कमिटी ने नदियों में डीसिल्टिंग की योजना बनाने और उसे अमल में लाने के सिद्धांतों को प्रस्तावित किया। इनमें निम्नलिखित शामिल हैं:
     
  • नदियों में गाद के प्रवाह को कम करने के लिए कृषि की बेहतर पद्धतियों और नदी तट के सुरक्षा संबंधी कार्यों/कटाव रोधी कार्यों के साथ यह भी जरूरी है कि कैचमेंट क्षेत्र का प्रबंधन और वॉटरशेड विकास का कार्य व्यापक तरीके से किया जाए;
     
  • कटाव, प्रवाह और तलछट का जमाव नदी में प्राकृतिक रूप से होता है। ऐसी व्यवस्था की जानी चाहिए कि बांध/बैराज से नदी में गाद का बहाव कुछ प्रकार हो कि नदी में तलछट का संतुलन बना रहे;

 

  • ड्रेजिंग (डीसिल्टिंग) से सामान्य तौर पर बचना चाहिए। डीसिल्टिंग की मात्रा डिपोजीशन की दर से अधिक नहीं होनी चाहिए। डिपोजीशन वह प्रक्रिया है जिसमें गोला पत्थर, कंकड़ और रेत नदी के तल में जमा होते हैं। यानी हर वर्ष इन वस्तुओं की नदी तल में जमा होने वाली मात्रा को इनके नदी के वेग के साथ बहने की मात्रा से ज्यादा होना चाहिए;
     
  • नदियों के घुमाव के लिए पर्याप्त कॉरिडोर दिए जाने चाहिए जिससे उनके प्रवाह में बाधा न पड़े; और
     
  • नदी के भीतर तलछट को जमा होने से रोका जाना चाहिए, और इसकी बजाय भूमि पर इसे जमा किया जाना चाहिए।
     
  • डीसिल्टेशन के काम के लिए दिशानिर्देश: डीसिल्टेशन के बेहतर आकलन और प्रबंधन के लिए कमिटी ने निम्नलिखित उपाय सुझाए हैं:
     
  • डीसिल्टेशन के लिए वार्षिक तलछट बजट बनाने के अतिरिक्त तलछट के बहाव (नदी क्षेत्र से तलछट के बहाव) की प्रक्रिया का अध्ययन किया जाना चाहिए; और
     
  • तलछट बजट को तैयार करने और डीसिल्टिंग की जरूरत को पुष्टि देने के लिए बाढ़ के मार्ग का अध्ययन करने का काम एक तकनीकी संस्थान को सौंपा जाना चाहिए।
     
  • गंगा नदी में डीसिल्टिंग का काम: गंगा नदी के संबंध में कमिटी ने जिन दिशानिर्देशों का सुझाव दिया है, उनमें से कुछ निम्नलिखित हैं :
     
  • बाढ़ के मैदानों और नदी किनारे की झीलों के लिए नदियों के आस-पास के क्षेत्रों को खाली रखा जाना चाहिए जिससे बाढ़ की तीव्रता को कम किया जा सके। बाढ़ के मैदानों में अतिक्रमण और झीलों के पुनरुद्धार (रीक्लेमेशन) से बचना चाहिए। इसकी बजाय आस-पास की झीलों को डीसिल्ट किया जाना चाहिए ताकि उनकी भंडारण क्षमता को बढ़ाया जा सके।
     
  • जहां निर्माण कार्यों (जैसे बैराज/पुल) की वजह से बड़े पैमाने पर सिल्टेशन हुआ है, वहां नदी को गहरा करने के लिए प्री सिलेक्टेड चैनल के साथ डीसिल्टेशन किया जाना चाहिए। इससे नदी के प्रवाह को मार्ग मिल सकेगा। नदी तल से निकाली गई गाद को किसी दूसरे स्थान पर डंप किया जा सकता है।

 

मंगलवार, 5 मार्च 2024

After all, how can black money be controlled in politics?

 

आखिर कैसे नियंत्रित  हो सियासत में काला धन

 

पंकज चतुर्वेदी



बीते कुछ दिनों में देश की सियासत में जो कुछ हो रहा है , उससे भले ही सरकार बन और बिगड़ रही हों लेकिन इससे लोकतंत्र की मूल आत्मा पर कुठाराघात तो हुआ ही है ।  एक तो सुप्रीम कोर्ट ने एलेक्शन बॉन्ड से राजनीतिक दलों की चन्दा लेने की प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी पाई और उसे अवैध घोषित कर दिया । फिर चुनाव आयोग की वेबसाईट पर उपलब्ध आंकड़ों के विश्लेषण के बाद एक समाचार पोर्टल ने बताया कि किस तरह  राजनैतिक चंदे- सरकार और सरकार की जांच  एजेंसियों के बीच मिलीभगत होती है ।


 उसी दौरान  चंडीगढ़ नगरनिगम चुनाव में  महज 36 में से आठ वोट लूट गए , वह भी कैमरे के सामने और सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव परिणाम में दखल दिया । हाल ही में सम्पन्न राज्यसभा चुनावों के दौरान भले ही बात कर्णाटक की हो या फिर बिहार, उप्र या हिमाचल प्रदेश की -- एक बात स्पष्ट है कि सुनियोजित तरीके से आम लोगों को भरोसा दिलवाया जा रहा  है कि नैतिकता और वैचारिकता का चरम पतन बहुत बढ़िया बात है , क्योंकि मीडिया में पीड़ित या जिसके लोगों ने पाला बदला,  उसे निकम्मा और वहीं अनैतिकता को बढ़ावा देने वाले को विजेता के रूप में पेश किया जा रहा है ।  दूसरी बात स्पष्ट है कि संविधान निहित दलबदल कानून अब रद्दी का टुकड़ा है और यह केवल ताकतवर को और शक्ति देने के लिए ही दुरुपयोग का है ।  तीसरा अब मान लो कि लोकतंत्र का अर्थ है - जिसकी लाठी- उसकी भैंस ---जिस राज्य में जिसकी ताकत है वह वोट लूट लेगा ।  आम लोग जो मत या वोट देते हैं वह नेता के लिए लाखों की कमी का जरिया मात्र है।



भारत में लोकतंत्रात्मक गणराज्य का सपना देखने वाले सेनानियों का मत था कि “वोट के लिए निजी अपील करना संसदीय लोकतंत्र और सामूहिक हित की भावना के प्रतिकूल है । वोट मांगने का काम केवल सार्वजनिक सभाओं के जरिए होना चाहिए ।’’ यदि कोई भी  सरकार लोकतंत्र की इस मूल भावना को जीवित रखने के लिए निर्वाचन प्रक्रिया में आमूल-चूल परिवर्तन करती है तो आम आदमी खुद को लोकतंत्र के करीब समझेगा। असल में यह किसी से छिपा नहीं है कि चुनाव बहुत खर्चीले  हो गए हैं । किसी भी दल से टिकट पाना हो या प्रचार के लिए समर्थकों को मैदान में भेजना या फिर मतदाताओं को रिझाना-लुभाना , सभी कुछ केवल धन पर आश्रित है और चुनाव आयोग द्वारा निर्धारित सीमा में ये सब खर्च संभव नहीं होता । ऊपर के खर्चों के लिए ऊपर से ही  कमाई होती है और इस राह में अनाचार, भ्रष्टाचार और दुराचार को विजेता की नैतिकता का जामा पहना दिया जाता है ।


यह समय की मांग है कि एक जंकल्याणकारी और लोकतंत्रात्मक शासन के लिए चुनावी तंत्र में आमूल चूल परिवर्तन अनिवार्य है और इसकी शुरुआत  वित्तीय तंत्र से ही करना होगा।  ऐसा नहीं कि चुनाव सुधार के कोई प्रयास किए गए नहीं, लेकिन विडंबना है कि सभी सियासती पार्टियों ने उनमें रूचि नहीं दिखाई। वीपी सिंह वाली राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार में कानून मंत्री दिनेश गोस्वामी की अगुआई में सं 1990 में गठित चुनाव सुधारों की कमेटी का सुझाव था कि राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त दलों को सरकार की ओर से वाहन, ईंधन, मतदाता सूचियां, लाउड-स्पीकर आदि मुहैया करवाए जाने चाहिए ।  इसमें यह भी कहा गया था कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों को न केवल सरकार के अंतर्गत किसी नियुक्ति बल्कि राज्यपाल के पद सहित किसी अन्य पद के लिए अयोग्य घोषित किया जाना चाहिए। साथ ही किसी भी व्यक्ति को दो से अधिक निर्वाचन क्षेत्रों पर चुनाव लड़ने की अनुमति न देने, निर्दलीय चुनाव लड़ने पर जमानत राशि बढ़ाने की बात भी इस रिपोर्ट में थी ।


इन  सिफारिशों में  से केवल एए वी एम से चुनाव को लागू किया गया, शेष सुझाव  कहीं ठंडे बस्ते में पड़े हैं । वैसे भी आज के भ्रष्ट राजनैतिक माहौल में समिति की आदर्श सिफारिशें कतई प्रासंगिक नहीं हैं । इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि नेता महज सरकारी खर्चे पर ही चुनाव लड़ लेंगे या फिर सरकारी पैसे को ईमानदारी से खर्च करेंगे । 1984 में भी चुनाव खर्च संशोधन के लिए एक गैर सरकारी विधेयक लोकसभा में रखा गया था, पर नतीजा वही ‘ढ़ाक के तीन पात’ रहा ।




सन 1962 में सांसद के. संथानम की अध्यक्षता में चार सांसद और दो आल अफसरों की एक कमेटी भ्रष्टाचार के विभिन्न  पहलुओं के जांच के लिए गठित की गई थी । हालांकि इस कमेटी के दायरे में राजनीतिक लोग नहीं थे, फिर भी सं 1964 में आई इसकी रिपोर्ट में कहा गया था कि  राजनैतिक दलों का चंदा एकत्र करने का तरीका चुनाव के दौरान और बाद में भ्रष्टाचार को बेहिसाब बढ़ावा देता है । 1970  में प्रत्यक्ष कर जान के लिए गठित वांचू कमेटी की  रपट में कहा था कि चुनावों में अंधाधुंध खर्चा काले धन को प्रोत्साहित करता है । इस रपट में हरैक दल को चुनाव लड़ने के लिए सरकारी अनुदान देने और प्रत्येक पार्टी के एकाउंट का नियमित ऑडिट करवाने के सुझाव थे । 1980 में राजाचलैया समिती ने भी लगभग यही सिफारिशें की थीं । ये सभी दस्तावेज अब भूली हुई कहानी बन चुके है ।



अगस्त-98 में एक जनहित याचिका पर फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिए थे कि उम्मीदवारों के खर्च में उसकी पार्टी के खर्च को भी शामिल किया जाए । आदेश में इस बात पर खेद जताया गया था कि सियासती पार्टियां अपने लेन-देन खातों का नियमित ऑडिट नहीं कराती हैं । अदालत ने ऐसे दलों के खिलाफ कानूनी कार्यवाही के भी निर्देश दिए थे । लेकिन हुआ कुछ भी नहीं।

असल बात तो यह है कि अब चुनाव आम आदमी की पहुंच से दूर होता जा रहा है, उसी का परिणाम है कि उससे उपजा प्रतिनिधि भी जनता से बहुत दूर है। तभी उसके समाज से सरोकार नहीं है और जनता भी वोट देने के बावजूद उसे अपना ‘प्रतिनिधि’ नहीं मानती। दिनों दिन बढ़ती यही दूरी लोकतंत्र को नए किस्म की राजशाही में परिवर्तित कर रही है । चुनाव प्रक्रिया में शुचिता, पारदर्शिता और खर्च काम करना आज लोकतंत्र के सशक्तिकरण की अनिवार्य जरूरत है ।

 

The right to a dignified farewell and a new standard in medical world

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