तालाब की बातें

तालाब की बातें
जल है तो जीवन है

शनिवार, 28 मार्च 2015

Earth hour is only "elephant teath"

‘अर्थ अवर’ का अनर्थ

गांवो में अंधेरा कर, स्टेडियम में उजाला

दैनिक जागरण 2 मार्च 15
                                                        पंकज चतुर्वेदी

28 मार्च को ही पूरे देश में रात में एक घंटा बिजली बंद कर बिजली बचाने और उसके मार्फत पर्यावरण-संरक्षण का बड़ा हल्ला हुआ। आंकडों में बताया जा रहा है कि एक घंटे बिजली बंद रख कर हम पृथ्वी को कितना बचा लेते है। लेकिन उस कवायद की नौटंकी जगजाहिर होने में एक सप्ताह ही लगेगा - आई.पी.एल के नाम पर आने वाले आठ अप्रेल से 24 मई तक तक इतनी बिजली स्टेडियमों में फूंक दी जाएगी, जितनी कि कई-कई ‘अर्थ अवर’ में बचाई भी नहीं थी। बिजली की बढ़ती मांग और कम उत्पादन से सरकार हताश है। ज्यादा बिजली का उत्पादन यानी ज्यादा कार्बन उत्सर्जन, जिसका सीधा असर होता है धरती के पर्यावरण पर। एक तरफ तो हम एक घंटे बिजली बंद कर हिसाब लगा रहे हैं कि कितनी बिजली बची और दूसरी ओर चमकदार रेाशनी में विश्‍व कप के क्रिकेट-मैच का आयोजन कर रहे हैं। जब देश का बड़ा हिस्सा खेतों में सिंचाई या घरों में रोशनी के लिए बिजली आने का इंतजार कर रहा होगा, तब देश के किसी महानगर में हजारों लोग ऊंचे खंबों पर लगी हजारों फ्लड-लाईटों में मैच का लुत्फ उठा रहे होंगे। जनता के प्रति जवाबदेह कहलाने वाले स्थानीय अफसर, नेता रात्रि क्रिकेट का लुत्फ उठाते हैं । उन्हें इस बात की कतई परवाह नहीं रहती कि स्टेडियम को जगमगाने के लिए कई गांवों में अंधेरा किया गया होगा । सनद रहे कि आईपीएल के दौरान भारत के विभिन्न शहरों में कुल 60 मैच खेले जाएंग, जिनमें से 36 तो रात आठ बजे से ही हैं। बाकी मैच भी दिन में चार बजे से शुरू होंगे यानी इनके लिए भी स्टेडियम में बिजली से उजाला करना ही होगा। यानी इन मैचों में कम से कम आठ घंटे स्टेडियम को जगमगाने के लिए बिजली फूंकी जाएगी।
कहने को तो ‘असली भारत’ गांवों में बसता है, लेकिन बिजली के मामले में गांवों को अभी भी हिकारत की नजर से देखा जाता है । जहां एक ओर हफ्तों तक बिजली के लट्टू चमकने का इंतजार करती देश की तीन-चैथाई आबादी हैं, तो दूसरी ओर कुछ सैंकड़ाभर लोगों के कुछ घंटों के मनोरंजन के लिए बेशकीमती बिजली की बर्बादी की गई । क्रिकेट भारत का सर्वाधिक लोकप्रिय खेल है । पिछले एक दशक के दौरान यह एक खेल के बनिस्पत ग्लैमर, धंधे या फैशन के रूप में अधिक चर्चित हुआ हैं । सो इसके मूल रूप में बदलाव आना ही था - रंग बिरंगी पोशाकें, सफेद गंेद और घुप्प अंधियारी रात में भी दिन के उजाले की तरह दमकते स्टेडियम । अब हर साल आईपीएल और एक टीवी चैनल द्वारा शुरू किए गए प्रीमियर लीग के मैच तो कई महीनों तक रात में दिन का उजाला कर खेले जा रहे हैं। लेकिन क्या कभी किसी ने सोचा है कि आखिर किस कीमत पर रात को दिन बना कर क्रिकेट खेलने का जुनून पूरा किया जाता हैं ?
रात के क्रिकेट मैचों के दौरान आमतौर पर स्टेडियम के चारों कोनों पर एक-एक प्रकाशयुक्त टावर होता है । हरेक टावर में 140 मेटल हेडलाईड बल्ब लगे होते हैं  इस एक बल्ब की बिजली खपत क्षमता 180 वाट होती है । यानी एक टावर पर 2,52000 वाट या 252 किलो वाट बिजली फुंकती हैं । इस हिसाब से समूचे मैदान को जगमगाने के लिए चारों टावरों पर 1008 किलोवाट बिजली की आवश्यकता होती हैं । रात्रिकालीन मैच के दौरान कम से कम छह घंटे तक चारों टावर की सभी लाइटें जलती ही हैं । अर्थात एक मैंच के लिए 6048 किलो वाट प्रति घंटा की दर से बिजली की जरूरत होती हैं । इसके अलावा एक मैच के लिए दो दिन कुछ घंटे अभ्यास भी किया जाता हैं । इसमें भी 4000 किलो वाट प्रति घंटा (केवीएच) बिजली लगती हैं । अर्थात एक मैच के आयोजन में दस हजार केवीएच बिजली इसके अतिरिक्त हैं ।
दूसरी तरफ एक गांव का घर जहां दो लाईटें, दो पंखे, एक टीवी और अन्य उपकरण हैं, में दैनिक बिजली खपत दशमलव पांच केवीएच हैं । एक मैच के आयोजन में खर्च 10 हजार केवीएच बिजली को यदि इस घर की जरूरत पर खर्च किया जाए तो वह बीस हजार दिन यानी 54 वर्ष से अधिक चलेगी । यदि किसी गांव में सौ घर हैं और प्रति घर में औसतन 0.5 केवीएच बिजली खर्च होती है, तो वहां 50 केवीएच प्रतिदिन की बिजली मांग होगी । जाहिर है कि यदि एक क्रिकेट मैच दिन की रोशनी मेें खेल लिया जाए तो उससे बची बिजली से एक गांव में 200 दिन तक निर्बाध बिजली सप्लाई की जा सकती हैं । काश ये सभी मैच सूर्य के प्रकाश में आयोजित किए जाते तो कई गांवों को गरमी के तीन महीने बिजली की किल्लत से निजात मिल सकती थी । और यह तथ्य सभी खेल विशेषज्ञ भी स्वीकारते हैं कि प्राकृतिक प्रकाश में खेल का मजा ही कुछ और होता हैं ।
हमारे देश के कुल 5,79,00 आबाद गांवों में से 82,800 गांवों तक बिजली की लाईन ना पहुंचने की बात स्वयं सरकारी रिकार्ड कबूल करता हैं । जरूरत की तुलना में 16.5 प्रतिशत बिजली का उत्पादन कम हो पा रहा है, यह अलग से है । चोरी, बिजली सप्लाई में तारों द्धारा अवशोषण व अन्य कारणों के चलते उपभोक्ताओं की आवश्यकता से लगभग 40 फीसदी बिजली की कमी हैं ।  एक सर्वेक्षण के मुताबिक भारत में कुल उत्पादित बिजली के मात्र 35 फीसदी का ही वास्तविक उपभोग हो पाता हैं । वरना देश में कभी बिजली की कमी ही नहीं रहे । हर साल देश के कोने-कोने में खेतों को बिजली की बाधित आपूर्ति के कारण माकूल सिंचाई नहीं हो पाने से हजारों एकड़ फसल नष्ट होने के किस्से सुनाई देते हैं । इस अत्यावश्यक मांग से बेखबर तथाकथित खेल प्रेमी बिजली मांग के पीक-आवर यानी शाम छह बजे से रात साढ़े नौ के बीच सैंकडों गांवों में अंधेरा कर एक स्टेडियम को रोशन करते हैं । यह कहां तक न्यायोचित है ? इसके अलावा देर रात तक मैच देख कर अगले दिन अपने दफ्तरों में देर से पहुंचने या सोने के कारण होने वाले काम के हर्जे से हुए सरकारी नुकसान का तो कोई आकलन नहीं हैं ।
जनता की मूलभूत जरूरतों में जबरिया कटौती कर कतिपय लोगांे के ऐशो-आराम के लिए रात में क्रिकेट मैच आयोजित करना कुछ यूरोपीय देशों की नकल से अधिक कुछ नहीं हैं । यूरोपीय देशों में साफ आसमान नहीं रहने और जल्दी सूर्यास्त होने की समस्या रहती है । साथ ही वहां बिजली का उत्पादन मांग से बहुत अधिक है । चूंकि उन देशों में लोग दिन के समय अपने जीविकोपार्जन के कार्यों में व्यस्त रहते हैं ,अतएव वहां कृत्रिम प्रकाश में रात में क्रिकेट खेलना लाजिमी व तर्कसंगत है । लेकिन भारत में जहां एक तरफ बिजली की त्राहि-त्राहि मची है, वहीं सूर्य देवता यहां भरपूर मेहरबान है । फिर यहां का क्रिकेट प्रेमी जगत अपनी शान बघारने के लिए जरूरी काम छोड़ कर मैच देखने के लिए स्टेडियम में दिन भर बैठने को तत्पर रहता हैं । फिर भी रात्रि मैच की अंधी नकल करना क्या खुद के पैरों पर कुल्हाड़ी मारना नहीं है ?

पंकज चतुर्वेदी
साहिबाबाद, गाजियाबाद 201005

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