तालाब की बातें

तालाब की बातें
जल है तो जीवन है

शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2016

why animals are not in agenda of bundelkhand drought relief

मवेशियों पर सूखे की मार 


भीषण सूखे से बेहाल बुंदेलखंड का एक जिला है छतरपुर। यहां सरकारी रिकार्ड में 10 लाख 32 हजार चैापाए दर्ज हैं, जिनमें से सात लाख से ज्यादा तो गाय-भैंस ही हैं। तीन लाख के लगभग बकरियां हैं। चूंकि बारिश न होने के कारण कहीं घास तो बची नहीं है, सो अनुमान है कि इन मवेशियों के लिए हर महीने 67 लाख टन भूसे की जरूरत है। इनके लिए पीने के पानी की व्यवस्था का गणित अलग ही है। यह केवल एक जिले का हाल नहीं है, विस्तारित समूचे बुंदेलखंड के 12 जिलों में दूध देने वाले चौपायों के हालात भूख-प्यास व कोताही के हैं। आए रोज गांव-गांव में कई-कई दिन से चारा न मिलने या पानी न मिलने या फिर इसके कारण भड़क कर हाईवे पर आने से होने वाली दुर्घटनाओं के चलते मवेशी मर रहे हैं। आने वाले गर्मी के दिन और भी बद्तर होंगे, क्योंकि तापमान भी बढ़ेगा। एक स्वयंसेवी संस्था ने पल्स पोलियो व कई ऐसी ही सरकारी संस्थाओं के आंकड़ों का विश्लेषण किया तो पाया कि बीते एक दशक में मध्य प्रदेश व उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड के 13 जिलों से 63 लाख से ज्यादा लोग रोजगार व पानी की कमी से हताश होकर अपने घर-गांव छोड़ कर सुदूर नगरों को पलायन कर चुके हैं। सूखे की वजह से लोग काम की तलाश में शहरों की ओर भाग रहे हैं व गांव के गांव खाली हो गए हैं। गांवों में रह गए हैं बुजुर्ग या कमजोर। यहां भी किसान आत्महत्याओं की खबरें लगातार आ रही हैं। मवेशी चारे और पानी के अभाव में दम तोड़ रहे हैं। ऐसे में कई गायंे व मवेशी मांस का अवैध व्यापार करने वालों के हत्थे भी चढ़ते हैं। कई बार वहां की लावारिस गायों के ट्रक मेरठ तक आते हैं। 
हाल ही में छतरपुर जिले के महाराजपुर में एक गाय प्यास के कारण कुएं में गिर गई। अन्ना प्रथा यानी लोगों ने अपने मवेशियों को खुला छोड़ दिया है, क्योंकि चारे व पानी की व्यवस्था वह नहीं कर सकते। सैकड़ों गायों ने अपना बसेरा सड़कों पर बना लिया। इनमें कई सड़क दुर्घटना में मारी जाती हैं और कई चारे और पानी के अभाव में कमजोर होकर मर रही हैं। किसानों के लिए यह परेशानी का सबब बनी हुई हैं, क्योंकि उनकी फसलों को मवेशियों का झुंड चट कर जाता है। वैसे तो बुंदेलखंड सदियों से तीन साल में एक बार अल्प वर्षा का शिकार रहा है। यहां से रोजगार के लिए पलायन की परंपरा भी एक सदी से ज्यादा पुरानी है, लेकिन दुधारू मवेशियों को मजबूरी में छुट्टा छोड़ देने का रोग अभी कुछ दशक से ही है। अन्ना प्रथा यानी दूध न देने वाले मवेशी को आवारा छोड़ देने के चलते यहां खेत व इंसान दोनों पर संकट है। उरई, झांसी आदि जिलों में कई ऐसे किसान हैं। जिनके पास अपने जल संसाधन हैं, लेकिन वे अन्न पशुओं के कारण बुवाई नहीं कर पाए। जब फसल कुछ हरी होती है तो अचानक ही हजारों अन्ना गायों का रेवड़ आता है व फसल चट कर जाता है। यदि गाय को मारो तो धर्म-रक्षक खड़े हो जाते हैं और खदेड़ों तो बगल के खेत वाला बंदूक निकाल लेता है। दोनों ही हालात में खून बहता है और कुछ पैसे के लिए खेत बोने वाले किसान को पुलिस-कोतवाली के चक्कर लगाने पड़ते हैं। यह बानगी है कि बुंदेलखंड में एक करोड़ से ज्यादा चौपाये किस तरह मुसीबत बन रहे हैं और साथ ही उनका पेट भरना भी मुसीबत बन गया है। पिछली सरकार के दौरान जारी किए गए विशेष बंुदेलखंड पैकेज में दो करोड़ रुपए का प्रावधान महज अन्ना प्रथा रोकने के लिए आम लोगों में जागरूकता फैलाने के लिए था।
अल्प वर्षा के कारण खेती न होने से हताश किसानों को दुधारू मवेशी पालने के लिए प्रोत्साहत करने के लिए भी सौ करोड़ का प्रावधान था। यहां जानना जरूरी है कि अभी चार दशक पहले तक बुंदेलखंड के हर गांव में चारागाह की जमीन होती थी। शायद ही कोई ऐसा गांव या मजरा होगा, जहां कम से कम एक तालाब और कई कुएं नहीं हों। जंगल का फैलाव पचास फीसदी तक था। आधुनिकता की आंधी में बह कर लोगों ने चारागाह को अपना ‘चारागाह’ बना लिया व हड़प गए। तालाबों की जमीन समतल कर या फिर घर की नाली व गंदगी उसमें गिरा कर उनका अस्तित्व खत्म कर दिया। हैंड पंप या ट्यूबवेल की मृगमरीचिका में कुओं को बिसरा दिया। जंगलों की ऐसी कटाई हुई कि अब बुंदेलखंड में अंतिम संस्कार के लिए लकड़ी नहीं बची है व वन विभाग के डिपो तीन सौ किलोमीटर दूर से लकड़ी मंगवा रहे हैं। जो कुछ जंगल बचे हैं, वहां मवेशी के चरने पर रोक है। कुल मिला कर देखें तो बंुदेलखंड के बाशिंदों ने खुद ही अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारी और अब इसका खामियाजा इंसान ही नहीं, मवेशी भी भुगत रहे हैं। कुछ स्थानों पर समाज ने गौशालाएं भी खोली हैं, लेकिन एक जिले में दो हजार से ज्यादा गाय पालने की क्षमता इन गौशालाओं में नहीं है। तभी इन दिनों बंुदेलखंड के किसी भी हाईवे पर चले जाएं हजारों गायें सड़क पर बैठी मिलेंगी। यदि किसी वाहन की इन गायों से टक्कर हो जाए तो हर गांव में कुछ धर्म के ठेकेदार भी मिलेंगे जो तोड़-फोड़ व वसूली करते हैं, लेकिन इन गाय के मालिकों को इन्हें अपने ही घर में रखने के लिए प्रेरित करने वाले एक भी नहीं मिलेंगे। यह मामला अकेले गांव-कस्बे में रहने वाले मवेशियों तक ही नहीं है, जंगल में रहने वाले जानवरों पर इसका प्रभाव बहुत ही खतरनाक होगा। हालांकि अब बुंदेलखंड में जंगल बहुत कम बचे हैं, लेकिन पन्ना राष्ट्रीय पार्क जैसे जंगल जहां शेर, हिरण सहित कई जानवर पर्याप्त संख्या में हैं, इस सूखे के कारण आने वाले दिनों में वहां जंगल राज होना तय है। पानी व चारे के लिए हिरण जैसे जानवर बस्ती की ओर आएंगे व मारे जाएंगे, वहीं खाने की कमी के चलते शेर बस्ती की ओर मवेशियों पर घात लगाएगा। नील गाय रहे-बचे खेतों को उजाडें़गी तो बंदर जैसे जानवर शहरों की ओर रुख करेंगे। विडंबना है कि सरकार के पास इन हालातों से निबटने की कोई योजना है ही नहीं। सनद रहे कुछ साल पहले खजुराहो के एक तालाब में पानी के लिए परेशान मगरमच्छ भटक कर पहुंच गया था। मौसम में बदलाव के साथ बुंदेलखंड में अभी सूखे की आग और भड़केगी। लोगों को मुआवजा, राहत कार्य या ऐसे ही नाम पर राशि बांटी जाएगी, लेकिन देश व समाज के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले पशु-धन को सहेजने के प्रति शायद ही किसी का ध्यान जाए। अभी तो ओस या अल्प बारिश के चलते जमीन पर थोड़ी हरियाली है और कहीं-कहीं पानी भी, लेकिन अगली बारिश होने में अभी कम से कम छह महीने हैं और इतने लंबे समय तक आधे पेट व प्यासे रह कर मवेशियों का जी पाना संभव नहीं होगा। यह जान लें कि एक करोड़ से ज्यादा संख्या का पशु धन तैयार करने में कई साल व कई अरब की रकम लगेगी, लेकिन उनके चारा-पानी की व्यवस्था के लिए कुछ करोड़ ही काफी होंगे। हो सकता है कि इस पर भी कुछ कागजी घोड़े दौड़े, लेकिन जब तक ऐसी योजनाओं की क्रियान्वयन एजेंसी में संवेदनशील लोग नहीं होंगे, मवेशी का चारा इंसान के उदरस्थ ही होगा।

मेरे बारे में