तालाब की बातें

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जल है तो जीवन है

शुक्रवार, 3 मार्च 2017

Young India needs a proper youth policy

चौराहे पर खड़े युवा 

 


देश के कुछ युवा भोपाल में समानांतर टेलीफोन एक्सचेंज चलाते हुए पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी के नेटवर्क से जुड़े हुए थे। दिल्ली में युवाओं का एक वर्ग अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की मांग पर आंदोलित है तो दूसरा वर्ग राष्ट्रवाद के नाम पर गाली-गलौज को अपना हक मानने पर अड़ा है। देशभर को गंभीरता से देखें तो पाएंगे कि एक-तिहाई युवा आबादी वाले इस देश में असल में युवाओं को बेहतर बनाने की कोई नीति ही नहीं है। एक तरफ महज बेहतर पैकेज या नौकरी के लिए मशीनों के मानिंद युवा गढ़े जाते हैं तो दूसरी ओर देश, खेती, लोग, सामरिक नीति जैसे मसलों पर अधकचरा ज्ञान से लैस लंपटों की सेना स्वयंभू रक्षक बन जाती है।
विभिन्न गंभीर अपराधों में किशोरों की बढ़ती संलिप्तता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिए हैं कि हर थानों में किशोरों के लिए विशेष अधिकारी हों। देश की सबसे बड़ी अदालत अपनी जगह ठीक है, लेकिन सवाल तो यह है कि किशोर या युवा अपराधों की तरफ जाएं ही न, इसके लिए हमारी सरकार के पास क्या कोई ठोस नीति है? असल में किसी भी नीति में उन युवाओं का विचार है ही नहीं। सरकारी मीडिया हो या स्वयंसेवी संस्थाएं, जिस ने भी युवा वर्ग का जिक्र किया तो, अक्सर इसका ताल्लुक शहर में पलने वाले कुुछ सुविधा-संपन्न लड़के-लड़कियों से ही रहा। जींस और रंगबिंरगी टोपियां लगाए, लबों पर फर्राटेदार हिंगरेजी और पश्चिमी सभ्यता का अधकचरा मुलम्मा चढ़ाए युवा। यह बात भुला ही दी जाती है कि इनसे कहीं पांच गुनी बड़ी और इनसे बिलकुल भिन्न युवा वर्ग की ऐसी भी दुनिया है, जो देश पांच लाख गांवों में है। तंगी, सुविधाहीनता व तमाम उपेक्षाओं की गिरफ्त में फंसी एक पूरी कुंठित पीढ़ी। गांव की माटी से उदासीन और शहर की मृग मरीचिका को छू लेने की ललक साधे युवा शक्ति।
भारतीय संस्कार, संस्कृति और सभ्यता की महक अभी कहीं शेष है तो वह है ग्रामीण युवा पीढ़ी। यथार्थता, जिंदादिली और अनुशासन सरीखे गुणों को शहरी सभ्यता लील चुकी है। वस्तुतया कुशल जन-बल के निर्माण के लिए ग्रामीण युवक वास्तव में ‘कच्चे माल’ की तरह है, जिसका मूल्यांकन कभी ठीक से किया ही नहीं गया।यह विडंबना ही है कि ऐसे कई मुद्दे पैदा हुए हैं, जो युवाओं को गांव की जिंदगी से काटते हैं और जिनके चलते उनका मानसिक धरातल जमीन छोड़ रहा है। गांव व शहर के बीच सुविधाओं की चौड़ी खाई बैरी हो गई है। अपने घर-गांव में न तो पारंपरिक रोजगार की गुंजाइश दिखती है और न ही जीवकोपार्जन के नए अवसर गांव तक आ रहे हैं। त्रिशंकु सी हालत है, एक तरफ हैं सहज ग्रामीण संस्कार और दूसरी ओर है शहरी रंगीनियों को पाने की ललक। ऐसे में भटकता हुआ ग्रामीण युवा ख्वाहिशों के घूंट पीकर अपनी राह की खोज में खुद खो जाता है। यह संकेत घातक हैं। कहीं भारतीय आत्मा अपनी जड़ें न छोड़ दें। लड़के तो फिर भी विषम हालातों से जूझकर अपने लिए कुछ पाने में सफल हो जाते हैं, परंतु किशोरियां तो घर की चहारदीवारी में ही कैद रह जाती हैं।
कुछ को दर्जा-दो दर्जा तक पढ़ने स्कूल भेजा गया तो ठीक वरना, रंगीन युवावस्था बर्तन मांजने या गोबर-चारा करने में गुम हो जाती है। 18 साल की होते-होते तीन चौथाई ग्रामीण युवतियां मां बन जाती हैं। कुछ मेले-ठेले, शादी या पवोंर् को छोड़कर उनके सांस्कृतिक विकास का जरिया नदारद है। तीन दशक पहले नेहरू युवा केंद्र के नाम पर एक सार्थक पहल तो हुई थी। लेकिन अन्य सरकारी योजनाओं की ही तरह यह युक्तिपूर्ण कार्यक्रम भी शहरी युवाओं को सिफारिशी नौकरी देने और फिर स्थानीय नेताओं की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं पर बलि चढ़ गया।ग्रामीण क्षेत्रों में युवा वर्ग की दुर्दशा के मूल कारण मौजूदा शिक्षा प्रणाली, उद्योगों की गैर मौजूदगी और केवल कृषि पर आधारित अर्थव्यवस्था है। विषमताओं के इस देश में एक तरफ उच्च शिक्षित इंजीनियर, डॉक्टर, वैज्ञानिक वगैरह बड़े पैमाने पर विदेश जाने में गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं। वहीं दूसरी ओर देश की आधी आबादी अक्षरों से अपरिचित हैं। अधिकांश लोग बाबू, मास्टर या सिपाही की नौकरी हथियाने के लिए मारा-मारी करते हैं। साफ तौर पर दिखता है कि मौजूदा शिक्षा प्रणाली पूरी तरह शहरी रोजगार के मुताबिक है। इसका कुटीर उद्योगों या कृषि से कोई वास्ता नहीं है। जब गांवों में कहीं आलू तो कहीं टमाटर की भारी फसल होने पर किसान को मेहनताना भी नहीं मिल पाता है और मजबूरी में वह अपनी फसल अपने ही हाथों कचरे में फेंक देता है, ऐसे में खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों की अच्छी गुंजाइश गांवों में है। विडंबना है कि ऐसे उद्योगों के लिए भी शहर और भारी पूंजी को बढ़ावा दिया जा रहा है। काश इस पर ग्रामीण अंचलों में रहने वालों का एकाधिकार हो जाए।गांवों में आज ग्रेजुएट या पोस्ट ग्रेजुएट डिग्रीधारी युवकों के बजाय मध्यम स्तर तक पढ़े-लिखे और कृषि-तकनीक में पारंगत श्रमशील युवाओं की भारी जरूरत है। अत: आंचलिक क्षेत्रों में डिग्री कॉलेज खोलने के बनिस्पत वहां खेती-पशुपालन-ग्रामीण प्रबंधन के प्रायोगिक प्रशिक्षण संस्थान खोलना ही उपयोगी होगा। ऐसे संस्थानों में माध्यमिक स्तर की शिक्षा के बाद एक साल के कोर्स रखे जा सकते हैं, साथ ही वहां आए युवकों को रोजगार की गारंटी देना होगा। इस तरह प्रशिक्षित युवकों का गांव में रहने व ग्रामीण अर्थव्यवस्था की ओर रुझान खुद-ब-खुद आएगा। इससे एक तो गांवों में आधुनिकता की परिभाषा खुद की तय होगी, साथ ही ग्रामीण युवाओं को शहर भागने या अज्ञात भविष्य के लिए शून्य में भटकने की नौबत नहीं आएगी। वे नई तकनीक पर आधारित कृषि का सकुशल संचालन कर सकेंगे और भविष्य में ‘कृषि पंडित’ होंगे। ऐसे प्रशिक्षण संस्थानों में कुटीर उद्योग, लघु उद्योग, दस्तकारी, खादी-ग्रामोद्योग के कोर्स भी हों। सवा सौ करोड़ की आबादी वाले देश को ओलंपिक या अन्य अंतरराष्ट्रीय खेलों में पदक न या कम मिलने पर सड़क से संसद तक चर्चा होती रही है। लेकिन क्या कभी किसी ने खयाल किया कि खेलनीति के सरकारी बजट का कितना हिस्सा जन्मजात खिलाड़ी यानी ग्रामीण युवकों पर खर्च होता है। ग्रामीण खेलों की सरकारी उपेक्षा का दर्दनाक पहलू हरियाणा में देखा जा सकता है, वहां गांव-गांव में अखाड़ों की परंपरा रही है। इनमें बेहतरीन पहलवान छोटी उम्र में तैयार किए जाते थे। उन्हें कभी सरकारी प्रश्रय मिला नहीं। सो धीरे-धीरे से अखाड़े अपराधियों के अड्डे बन गए। अब ठेका हथियाने, जमीन कब्जाने या चुनावों में वोट लूटने सरीखे कायोंर् में इन अखाड़ों व पहलवानों का उपयोग आम बात है। गौरतलब है कि तीरदांजी, कुश्ती, भारोत्तोलन, तैराकी, दौड़ सरीखे खेलों के खिलाड़ी हर गांव में हैं। जरूरत है तो बस उन्हें थोड़े से प्रशिक्षण और प्रतियोगिताओं के कानून-कायदें सिखाने की। काश गांवों में खेल-कूद प्रशिक्षण का सही जरिया बन पाए। ग्रामीण युवकों का सामान्य ज्ञान बढ़ाने व विकास कायोंर् से परिचित रखने के लिए गांवों में अखबारों, पत्रिकाओं व संबंधित प्रकाशनों की उपलब्धता बहुत जरूरी है। यदि ब्लाक स्तर पर एक चलती-फिरती लाईब्रेरी की योजना चलाई जाए, तो समस्या का युक्तिपूर्ण समाधान हो सकता है। लड़कियों के लिए युवा मनोरंजन शिविरों व युवा मेलों के आयोजन विधायिका में एक-तिहाई आरक्षण की दावेदार ‘आधी आबादी’ की जागरूकता के लिए परिणामदायी रहेंगे।एक बात और, इस समय देश का लेाकतंत्र गांवों की ओर जा रहा है, लाखों पंच, सरपंच, पार्षद नेतृत्व की नई कतार तैयार कर रहे हैं। इन लोगों को सही प्रशिक्षण मिले व योजना बनाने, क्रियान्वयन और वित्तीय प्रबंधन का, इन लोगों को अवसर मिले, नए भारत के निर्माण में इन लोगों को प्रसिद्धी मिले दूरस्थ गांवों, मजरों में पसीना बहाने पर, क्या कोई ऐसी योजना सरकार तैयार कर पाएगी?गांवों में बसने वाले तीन चौथाई नवयुवकों की उपेक्षा से कई राष्ट्रीय स्तर पर कई समस्याएं भी खड़ी हो रही हैं। कश्मीर हो या उत्तर-पूर्व, जहां भी सशस्त्र अलगाववाद की हवा बह रही है, वहां हथियार थामने वाले हाथों में ग्रामीण युवाओं की संख्या ही अधिक हैं। खेती को अलाभकारी कार्य मान कर कृषि भूमि का उपयोग अन्य कायोंर् में करने की घटनाएं बढ़ रही हैं। इससे सालों-साल दलहन, तेल-बीज आदि खाद्य पदाथोंर् के उत्पादन में कमी आ रही है। फलस्वरूप इसकी आपूर्ति के लिए विदेशों की ओर देखना पड़ रहा है। जबकि कुछ साल पहले तक भारत इनका निर्यात किया करता था।गांवों में विकास के नाम पर उसे कस्बाई या शहरी स्वरूप प्रदान करने की प्रवृति पर नियंत्रण करना होगा। ‘असली भारत’ की प्रगति के मानदंड स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप तय करने व नवचेतना जाग्रत करने से युवाओं को उनकी मिट्टी से जुड़े रहने के आत्मिक सुख व गर्व से रूबरू करवाया जा सकेगा।

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