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गुरुवार, 15 जनवरी 2015

Mental disorder become threat for society Daily News activist, Lucknow 16-1-15

मन के विकार के निदान में बेमन
हमारे देश के मानसिक रोग अस्पताल सौ साल पुराने पागलखाने के खौफनाक रूप से ही जाने जाते हैं। ये जर्जर, डरावनी और संदिग्ध इमारतें मानसिक रोगियों की यंत्रणाओं, उनके प्रति समाज के उपेक्षित रवैए और सरकारी उदासीनता की मूक गवाह हैं। मानसिक विक्षिप्त लोगों को समाज से दूर ऊंची चहारदीवारियों में नारकीय जीवन जीने को मजबूर करना क्या मौलिक अधिकारों का हनन नहीं है? अदालत से सजायाफ्ता आजीवन कैदी तो कुछ साल बाद छूट भी जाता है, लेकिन पागलखानों से मुक्ति कतई संभव नहीं है...
Daily News activist, Lucknow, 16-1-15



बढ़ती जरूरतें, जिंदगी में बढ़ती भागदौड़, रिश्तों के बंधन ढीले होना- इस दौर की कुछ ऐसी त्रासदियां हैं, जो इंसान को भीतर ही भीतर खाए जा रही हैं। ये सब ऐसे विकारों को आमंत्रित कर रहा है, जिनके प्रारंभिक लक्षण नजर नहीं आते हैं, जब मर्ज बढ़ जाता है तो बहुत देर हो चुकी होती है। विडंबना है कि सरकार में बैठे नीति-निर्धारक मानसिक बीमारियों को अभी भी गंभीरता से नहीं ले रहे हैं। इसे हास्यास्पद कहें या शर्म कि ‘जय विज्ञान’ के युग में मनोविकारों को एक रोग के बनिस्पत ऊपरी व्याधा या नियति समझने वालों की संख्या बहुत अधिक है। तभी ऐसे रोगों के इलाज के लिए डाक्टरों के बजाय पीर-फकीरों, मजार-मंदिरों पर अधिक भीड़ होती है। सामान्य डाक्टर मानसिक रोगों को पहचानने और रोगियों को मनोचिकित्सक के पास भेजने में असमर्थ रहते हैं। इसके चलते ओझा, पुरोहित, मौलवी व तथाकथित यौन विशेषज्ञ अवैध रूप से मनोचिकित्सक बन दुष्कार्य कर रहे हैं ।नंग-धड़ंग, सिर पर कचरे का बोझ, जहां कहीं जगह मिली सो गए, कुछ भी खा लिया, किसी ने छेड़ा तो पत्थर चला दिए। भारत के हर शहर-कस्बे में ऐसे महिला या पुरुष चरित्र देखने को मिल जाते हैं। आम लोगों की निगाह में ये भूत-प्रेत के प्रकोपधारी, मजनू, बदमाश या फिर देशी-विदेशी जासूस होते हैं । यह विडंबना है कि वे जो हैं, उसे न तो उनके अपने स्वीकारते हैं और न ही पराए। शरीर के अन्य विकारों की तरह मस्तिष्क अव्यवस्थित होने के कारण बीमार ये मानसिक रोगी! इसी तरह महानगर की सड़कों पर आएदिन छोटी-छोटी बात पर खून-खराबा, गलत निर्णय- ये सब भी मानसिक असंतुलन का ही नतीजा होता है।यह सुखद है कि केंद्र की नई सरकार ने आजादी के बाद पहली बार राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य नीति की घोषणा की है। मानसिक रूप से बीमार लोगों की देखभाल के लिए बनाए गए पूर्व कानून जैसे भारतीय पागलखाना अधिनियम, 1858 और भारतीय पागलपन अधिनियम 1912 में मानवाधिकार के पहलू की उपेक्षा की गई थी और केवल पागलखाने में भर्ती मरीजों पर ही विचार किया गया था। पागलपन कानून 1912 के तहत अदालती प्रमाण पत्र के जरिए रोगियों को केवल पागलखानों में इलाज की सीमा तय की गई थी। लेकिन 1987 में इस कानून में बदलाव किया गया और मरीज को खुद की इच्छा पर भर्ती होने, सामान्य अस्पतालों में भी इलाज कराने जैसी सुविधाएं दी गई हैं। आजादी के बाद भारत में इस संबंध में पहला कानून बनाने में 31 वर्ष का समय लगा और उसके 9 वर्ष के उपरांत मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम, 1987 अस्तित्व में आया। परंतु इस अधिनियम में कई खामियां होने के कारण इसे कभी भी किसी राज्य एवं केंद्र शासित प्रदेश में लागू नहीं किया गया। विश्व स्वास्थ संगठन ने ‘स्वास्थ्य’ की परिभाषा में स्पष्ट किया है कि ‘शारीरिक, मानसिक और सामाजिक रूप से स्वास्थ्य की अनुकूल चेतना। न कि केवल बीमारी की गैर मौजूदगी।’ इस प्रकार मानसिक स्वास्थ्य, एक स्वस्थ शरीर का जरूरी हिस्सा है। यह हमारे देश की कागजी राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति में भी दर्ज है। वैसे 1982 में मानसिक स्वास्थ कार्यक्रम शुरू हुआ था । एक दस्तावेज के मुताबिक करीब तेरह करोड़ भारतीयों को किसी न किसी रूप में मानसिक चिकित्सा की जरूरत है। प्रत्येक हजार जनसंख्या में दस से बीस लोग जटिल मानसिक रोगों से ग्रस्त हैं। जबकि दुखदाई और आर्थिक अक्षमता पैदा करने वाले भावुक रोगों के शिकार लोगों की संख्या इसकी तीन से पांच गुना है। आम डाक्टर के पास आने वाले आधे मरीज उदासी, भूख, नींद, और सेक्स इच्छा में कमी आना, हस्त मैथुन, स्वप्न दोष जैसी शिकायतें ले कर आते हैं। वास्तव में वे किसी न किसी मानसिक रोग के शिकार होते हैं। इतने लोगों के इलाज के लिए कोई बत्तीस हजार मनोचिकित्सकों की जरूरत है, जबकि देशभर में इनकी संख्या बमुश्किल साढ़े तीन हजार है और इनमें भी तीन हजार तो चार महानगरों तक ही सिमटे हैं। सन 1795 में पाइनल नामक व्यक्ति ने पेरिस में मानसिक रोगियों का मानवीय संवेदनाओं के साथ इलाज करना शुरू किया था। इससे पहले ऐसे रोगियों को जंजीरों से जकड़ कर रखा जाता था। देखा गया कि ऐसे मरीज उत्तेजित होकर तोड़-फोड़ करते थे। पाइनल का प्रयोग सफल रहा। इसी सामाजिक सुधार से प्रेरित होकर अमेरिका में बेंजामिन रश और ब्रिटेन में कोनोली व ट्यूक ने मनोरोगियों की ‘सामाजिक मनोविकार चिकित्सा’ शुरू की।दिनोंदिन बढ़ रही भौतिक लिप्सा और उससे उपजे तनावों व भागमभाग की जिंदगी के चलते भारत में मानसिक रोगियों की संख्या पश्चिमी देशों से भी ऊपर जा रही है। विशेष रूप से महानगरों में ऐसे रोग कुछ अधिक ही गहराई से पैठ कर चुके हैं। दहशत और भय के इस रूप को फोबिया कहा जाता है। इसकी शुरुआत होती है चिड़चिडे़पन से। बात-बात पर बिगड़ना और फिर जल्द से लाल-पीला हो जाना, ऐसे रोगियों की आदत बन जाती हैं। काम से जी चुराना, बहस करना और खुद को सच्चा साबित करना- इनके प्रारंभिक लक्षण हैं। भय की कल्पनाएं इन लोगों को इतना जकड़ लेती हैं कि उनका व्यवहार बदल जाता है, जल्द ही दिमाग प्रभावित होता है और पनप उठते हैं मानसिक रोग। जहां एक ओर मर्ज बढ़ता जा रहा है, वहीं हमारे देश के मानसिक रोग अस्पताल सौ साल पुराने पागलखाने के खौफनाक रूप से ही जाने जाते हैं। ये जर्जर, डरावनी और संदिग्ध इमारतें मानसिक रोगियों की यंत्रणाओं, उनके प्रति समाज के उपेक्षित रवैए और सरकारी उदासीनता की मूक गवाह हैं। मानसिक विक्षिप्त लोगों को समाज से दूर ऊंची चहारदीवारियों में नारकीय जीवन जीने को मजबूर करना क्या मौलिक अधिकारों का हनन नहीं है? छोटे-छोटे दड़बेनुमा जेल की कोठरियां। वहां जानवरों से भी बदतर भरे मरीज, कहीं पेड़ या खंभों से बंधे महिला-पुरुष। उनकी देखभाल के लिए सरकार से मोटा वेतन पा रहे लोगों के अमानवीय अत्याचार। अधिकांश रोगियों के लिए तो यह ताजिंदगी सजा है। अदालत से सजायाफ्ता आजीवन कैदी तो कुछ साल बाद छूट भी जाता है, लेकिन पागलखानों से मुक्ति कतई संभव नहीं है। अलबत्ता तो वहां का माहौल उन्हें ठीक होने नहीं देता है, यदि कोई ठीक हो जाए समाज उन्हें स्वीकार नहीं करता है। फलस्वरूप एक बार सींखचों के पीछे जाना यानी मौत होने तक शेष दुनिया से कट जाना होता है। चाहे बिल्लोज पुरा, आगरा का पागलखाना हो या बरेली, रांची का या फिर शाहदरा, दिल्ली का मनोरोग अस्पताल- कोई भी अपने रोगियों के हितों व अधिकारों की रक्षा करने में सफल नहीं रहा है। यहां ऐसे रोगियों की संख्या सैंकड़ों में है, जो पिछले 35-40 सालों से कैद हैं। कहीं जमीन-जायदाद पर कब्जा करने के लिए अपने ही रिश्तेदारों को पागल ठहराने की साजिश है तो कहीं सामाजिक रुतबे में ‘पागलखाना रिटर्न’ का धब्बा लगने की हिचक। मरीज ठीक हो गया, लेकिन घर वालों ने अपने पते ही गलत लिखवाए। कई मरीज तो इस त्रासदी के कारण ठीक होने के बाद फिर से अपना मानसिक संतुलन खो देते हैं।देश के मानसिक स्वास्थ कार्यक्रम-1982 में रोगियों के पुनर्वास, इसके कारणों पर नियंत्रण, दूरस्थ अंचलों के डाक्टरों को विशेष ट्रेनिंग सहित न जाने क्या-क्या लुभावने कार्यक्रम दर्ज हैं। लेकिन वास्तविकता के धरातल पर मानसिक रोगी सरकार व समाज दोनों की हेयदृष्टि से आहत हैं। हमारे देश की एक अरब को पार कर गई आबादी के लिए केवल 43 सरकारी मानसिक रोग अस्पताल हैं, इनमें से मनोवैज्ञानिक इलाज की व्यवस्था महज तीन जगह ही है। इन अस्पतालों में 21,000 बिस्तर हैं जो जरूरत का एक फीसदी भी नहीं है। देशभर में महज 2219 मानसिक रोग चिकित्सक उपलब्ध हैं जबकि जरूरत है 9696 की। यहां तक कि जरूरत की पचास फीसदी नर्स भी उपलब्ध नहीं हैं। राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ कार्यक्रम की एक रिपोर्ट भी इस बात का प्रमाण है कि ऐसे रोगियों की बड़ी संख्या इलाज का खर्च उठाने में असमर्थ है। सरकारी अस्पतालों के नारकीय माहौल में जाना उनकी मजबूरी होता है। अनुमान है कि भारत में कोई सात करोड़ लोग छोटे-बड़े मानसिक रोग के शिकार हैं जबकि देश के स्वास्थ्य बजट का महज 0.06 फीसदी ही मानसिक रोग के मद में जाता है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग मानता रहा है कि देशभर के पागलखानों की हालत बदतर है। इसे सुधारने के लिए कुछ साल पहले बंगलौर के राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ और चेतना विज्ञान संस्थान में एक परियोजना शुरू की गई थी। लेकिन उसके किसी सकारात्मक परिणाम की जानकारी नहीं है। यह परियोजना भी नाकाफी संसाधनों का रोना रोते हुए फाइलों में ठंडी हो गई। वैसे तो 1987 में सुप्रीम कोर्ट भी मानसिक अस्पतालों में बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध करवाने के निर्देश दे चुका है। आदेश के बाद दो-चार दिन तो सरकार सक्रिय दिखी, पर स्थितियों में लेशमात्र सुधार नहीं हुआ। बानगी के तौर पर देश के सबसे पुराने आगरा के पागलखाने के हालात को देखें। 40 एकड़ में फैले इस पागलखाने के रखरखाव का सालाना बजट मात्र ढाई लाख है। यहां स्टाफ तो 500 का है, लेकिन डाक्टर व नर्स मिला कर 30 कर्मचारी भी नहीं हैं। अधिकांश डाक्टरों के वहीं पास में निजी क्लानिक हैं। वैसे यहां 400 से अधिक मरीज नहीं रखे जा सकते, पर इनकी संख्या कभी भी 700 से कम नहीं रही है। इतने मरीजों को साल भर खाना देने का बजट मात्र 14 लाख और कपड़ों पर व्यय की सीमा दो लाख रुपए है। साढ़े तीन सौ मुस्टंडे अटेंडेंट, जिनके आतंक से रोगी थर-थर कांपते हैं, की मौजूदगी में मरीजों के तन तक क्या पहुंचता होगा, इसकी कल्पना ही रोंगटे खड़े कर देती है। एक तो अभी तक ऐसा पाठ्यक्रम स्कूली शिक्षा में शामिल नहीं कर पाए हैं, जो कि मानसिक रोगों को अन्य बीमारियों की तरह सामान्य रोग बताने में सफल हो। दूसरा इसके प्रति जागरूकता के लिए सरकार व समाज की सुप्तावस्था भी है। हमारे देश में कुत्ते-बिल्लियों की ठीक तरह से देखभाल के लिए अखबारों में नियमित कालम छपते हैं। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर भी वे प्राथमिकता से हैं। लेकिन मानव योनि में जन्मे, किन्हीं हालातों के शिकार हो कर मानसिक संतुलन खोए लोगों के पशु से भी बदतर जीवन पर न तो सरकार गंभीर है और न ही समाज संवेदनशील!

रविवार, 11 जनवरी 2015

use waste land for industries not agriculture land

RASHTRIYA SAHARA 12-1-15http://www.rashtriyasahara.com/epapermain.aspx?queryed=9

उपजाऊ पर नजर, बंजर की अनदेखी



 पंकज चतुव्रेदी
केंद्र सरकार ने अध्यादेश लाकर भूमि अधिग्रहण कानून में कई बड़े बदलाव कर दिए हैं। सबसे बडी विडंबना है कि अध्यादेश के बाद बहुफसली जमीन के अधिग्रहण का रास्ता भी साफ हो गया है। सरकार का तर्क है कि देश के व्यापक और तीव्र विकास के लिए जमीन चाहिए, लेकिन मौजूदा कानून के कई प्रावधान इसके आड़े आ रहे थे। ऐसे तकरे को सुनकर एकबारगी लगता है कि क्या हमारे देश में अब जमीन की कमी हो गई है, जो आधुनिकीकरण की योजनाओं के लिए देश की अर्थव्यवस्था का मूल आधार रहे खेतों को उजाड़ने पर मजबूर होना पड़ रहा है? इस बात को लोग लगातार नजरअंदाज कर रहे हैं या फिर लापरवाह हैं कि जमीन को बरबाद करने में इंसान कहीं कोई कसर नहीं छोड़ रहा है। जबकि जमीन को सहेजने का काम कर रहे किसान के खेत पर सभी की नजर लगी हुई है। विकास के लिए सड़कें, हवाई अड्डे बन रहे हैं। महानगरों की बढ़ती संख्या और उसमें रहने वालों की जरूरतों से अधिक निवेश के नाम पर बनाई जा रही बहुमंजिली इमारतों का ठिकाना भी उर्वर जमीन ही है। हजारों घटनाएं गवाह हैं कि कारखानों के लिए जमीन जुटाने की फिराक में खेतों को ही उजाड़ा जाता है तो लोगों का गुस्सा भड़कता है। यदि नक्शे और आंकड़ों को सामने रखें तो तस्वीर कुछ और ही कहती है। देश में लाखों-लाख हेक्टेयर ऐसी जमीन है जिसे विकास का इंतजार है। अब पका-पकाया खाने का लालच तो सभी को होता है, सो बेकार पड़ी जमीन को लायक बनाने की मेहनत से बचते हुए उपजाऊ जमीन को बेकार बनाना ज्यादा सरल व फायदेमंद लगता है। विदित हो कि देश में कुछ 32 करोड़ 90 लाख हेक्टेयर भूमि में से 12 करोड़ 95 लाख 70 हजार हेक्टेयर भूमि बंजर है। भारत में बंजर भूमि के ठीक- ठीक आकलन के लिए अभी तक कोई विस्तृत सव्रेक्षण तो हुआ नहीं है, फिर भी केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय का फौरी अनुमान है कि देश में सर्वाधिक बंजर जमीन मध्य प्रदेश में है, जो दो करोड़ एक लाख 42 हेक्टेयर है। उसके बाद राजस्थान का नंबर आता है। सर्वाधिक बंजर भूमि वाले मध्य प्रदेश में भूमि के नष्ट होने की रफ्तार भी सर्वाधिक है। यहां गत दो दशकों में बीहड़-बंजर दो गुने होकर 13 हजार हेक्टेयर हो गए हैं। धरती पर जब पेड़-पौधों की पकड़ कमजोर होती है तब बरसात का पानी सीधा नंगी धरती पर पड़ता है और वहां की मिट्टी बहने लगती है। जमीन के समतल न होने के कारण पानी को जहां भी जगह मिलती है, मिट्टी काटते हुए वह बहता है। इस प्रक्रिया में नालियां बनती हैं जो आगे चलकर गहरी होते हुए बीहड़ का रूप ले लेती हैं। एक बार बीहड़ बन जाए तो हर बारिश में वह और गहरा होता जाता है। इस तरह के भू-क्षरण से हर साल लगभग चार लाख हेक्टेयर जमीन उजड़ रही है। इससे सर्वाधिक प्रभावित चंबल, यमुना, साबरमती, माही और उनकी सहायक नदियों के किनारे के उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, राजस्थान और गुजरात के हिस्से हैं। बीहड़ रोकने का काम जिस गति से चल रहा है उसके अनुसार बंजर खत्म होने में 200 वर्ष लगेंगे, तब तक ये बीहड़ ढाई गुना अधिक हो चुके होंगे। बीहड़ों के बाद, धरती के लिए सर्वाधिक जानलेवा खनन-उद्योग रहा है। पिछले तीस वर्षो में खनिज उत्पादन 50 गुना बढ़ा, लेकिन यह लाखों हेक्टेयर जंगल और खेतों को वीरान बना गया है। नई खदान मिलने पर पहले वहां के जंगल साफ होते हैं। फिर खदान में कार्यरत श्रमिकों की दैनिक जलावन की जरूरत हेतु आसपास की हरियाली होम होती है। तदुपरांत खुदाई की प्रक्रिया में जमीन पर गहरी- गहरी खदानें बनाई जाती है, जिनमें बारिश के दिनों में पानी भर जाता है। वहीं खदानों से निकली धूल-रेत और अयस्क मिशण्रदूर-दूर तक की जमीन की उर्वरा शक्ति हजम कर जाते हैं। खदानों के गैरनियोजित अंधाधुंध उपयोग के कारण जमीन के क्षारीय होने की समस्या भी बढ़ी है। ऐसी जमीन पर कुछ भी उगाना नामुमकिन ही होता है। हरित क्रांति के नाम पर जिन रासायनिक खादों द्वारा अधिक अनाज पैदा करने का नारा दिया जाता है, वे भी जमीन की कोख उजाड़ने की जिम्मेदार रही हैं। रासायनिक खादों के अंधाधुंध इस्तेमाल से पहले कुछ साल तो दुगनी-तिगुनी पैदावार मिली, फिर उसके बाद भूमि बंजर हो रही है। यही नहीं, जल समस्या के निराकरण के नाम पर मनमाने ढंग से रोपे जा रहे नलकूपों के कारण भी जमीन कटने-फटने की शिकायतें सामने आई हैं। सार्वजनिक चरागाहों के सिमटने के बाद रहे-बचे घास के मैदानों में बेतरतीब चराई के कारण भी जमीन के बड़े हिस्से के बंजर होने की घटनाएं मध्य भारत में सामने आई हैं। सिंचाई के लिए बनाई गई कई नहरों और बांधों के आसपास जल रिसने से भी दल-दल बन रहे हैं। जमीन को नष्ट करने में समाज का लगभग हर वर्ग और तबका लगा हुआ है, वहीं इसके सुधार का जिम्मा मात्र सरकारी कंधों पर है। वर्ष 1985 में स्थापित राष्ट्रीय बंजर भूमि विकास बोर्ड ने 20 सूत्रीय कार्यक्रम के 16वें सूत्र के तहत बंजर भूमि पर वनीकरण और वृक्षारोपण का कार्य शुरू किया था। आंकड़ों के मुताबिक इस योजना के तहत लगभग 1.17 करोड़ हेक्टेयर भूमि को हरा-भरा किया गया। लेकिन इन आंकड़ों का खोखलापन सेटेलाईट चित्रों से उजागर हो चुका है। प्राकृतिक और मानव-जनित कारणों के चलते आज खेती, पशुपालन, गोचर और जंगल सभी पर खतरा है। पेयजल संकट गहरा रहा है। ऐसे में केंद्र व राज्य सरकारों के विभिन्न विभागों के कब्जे में पड़ी ढेर सारी अनुत्पादक भूमि के विकास के लिए कोई कारगर प्रयास नहीं किया जाना एक विडंबना ही है। आज सरकार बड़े औद्योगिक घरानों को तो बंजर भूमि सुधार के लिए आमंत्रित कर रही है, लेकिन इस कार्य में छोटे काश्तकारों की भागीदारी के प्रति उदासीन है। विदित हो कि हमारे देश में कोई तीन करोड़ 70 लाख हेक्टेयर बंजर भूमि ऐसी है जो कृषि योग्य समतल है। अनुमान है कि प्रति हेक्टेयर 2500 रपए खर्च कर इस जमीन पर सोना उगाया जा सकता है। यानी यदि 9250 करोड़ रपए खर्च किए जाएं तो यह जमीन खेती लायक की जा सकती है, जो हमारे देश की कुल कृषि भूमि का 26 प्रतिशत है। सरकारी खर्चो में बढ़ोत्तरी के मद्देनजर इतनी राशि सरकारी तौर पर एकमुश्त मुहैया हो पाना बहुत मुश्किल लगता है। ऐसे में भूमिहीनों को मालिकाना हक देकर उस जमीन को कृषि योग्य बनाना, देश के लिए क्रांतिकारी कदम होगा। इससे कृषि उत्पादन बढ़ेगा, लोगों को रोजगार मिलेगा और पर्यावरण रक्षा भी होगी। यदि यह भी नहीं कर सकते तो स्पेशल इकोनामी जोन बनाने और अन्य औद्योगिक जरूरतों के लिए ऐसी ही अनुपयोगी, अनुपजाऊ जमीनों को लिया जाए। इसके बहुआयामी लाभ होंगे- जमीन का क्षरण रुकेगा और हरी-भरी जमीन पर मंडरा रहे संकट के बादल छटेंगे। चूंकि जहां बेकार बंजर भूमि अधिक है वहां गरीबी, बेरोजगारी भी है; अत: नए कारखाने वगैरह लगने से उन इलाकों की आर्थिक स्थिति भी सुधरेगी। बस करना यह होगा कि जो पैसा जमीन का मुआवजा बांटने में खर्च करने की योजना है, उसे समतलीकरण, जल संसाधन जुटाने, सड़क-बिजली मुहैया करवाने जैसे कामों में खर्च करना होगा।
     

शुक्रवार, 9 जनवरी 2015

Fearless criminal lawless society

क्यों नहीं रहा पुलिस का डर


                                                                    पंकज चतुर्वेदी


लग रहा है कि समूचा देश अपराध की चपेट में है- बलात्कार, छेड़छाड़, लूट की घटनाओं से आम जनता हलांकांत है। यह तो सामने आ गया है कि यदि पुलिस मुस्तैद होती, फोर्स का सही इस्तेमाल होता तो यह आग इतना विकराल रूप नहीं लेती। वैसे भी पिछले कुछ सालों से पूरे देश में सरेआम अपराधों की जैसे झड़ी ही लग गई है। भीड़भरे बाजार में जिस तरह से हथियारबंद अपराधी दिनदहाड़े लूटमार करते हैं, महिलाओं की जंजीर व मोबाईल फोन झटक लेते हैं, बैंक में लूट तो ठीक ही है, अब तो एटीएम मषीन उखाड़ कर ले जाते हैं; इससे साफ है कि अपराधी पुलिस से दो कदम आगे हैं और उन्हें कानून या खाकी वर्दी की कतई परवाह नहीं है। पुलिस को मिलने वाला वेतन और कानून व्यवस्था को चलाने के संसाधन जुटाने पर उसी जनता का पैसा खर्च हो रहा है जिसके जानोमाल की रक्षा का जिम्मा उन पर है।
डेली न्‍यूज, जयपुर 10 जनवरी 2015
 http://dailynewsnetwork.epapr.in/414125/Daily-news/10-01-2015#page/6/1
     


ऐसा नहीं है कि पुलिस खाली हाथ हैं, आए रोज कथित बाईकर्स गेंग पकड़े जाते हैं, बड़े-बड़े दावे भी होते हैं लेकिन अगले दिन ही उससे भी गंभीर अपराध सुनाई दे जाते हैं। लगता है कि दिल्ली व पड़ोसी इलाकों में दर्जनों बाईकर्स-गैंग काम कर रहे हैं और उन्हें पुलिस का कोई खौफ नहीं हैं। अकेले गाजियाबाद जिले की हिंडन पार की कालोनियों में हर रोज झपटमारी की दर्जनों घटनाएं हो रही हैं और अब पुलिस ने मामले दर्ज करना ही बंद कर दिया है। जिस गति से आबादी बढ़ी उसकी तुलना में पुलिस बल बेहद कम है। मौजूद बल का लगभग 40 प्रतिषत  नेताओं व अन्य महत्वपूर्ण लोगों की सुरक्षा में व्यस्त है। खाकी को सफेद वर्दी पहना कर उन्हीं पर यातायात व्यवस्था का भी भार है। अदालत की पेशियां, अपराधों की तफ्तीश, आए रोज हो रहे दंगे, प्रदर्शनों को झेलना। कई बार तो पुलिस की बेबसी पर दया आने लगती है।
मौजूदा पुलिस व्यवस्था वही है जिसे अंग्रेजों ने 1857 जैसी बगावत की पुनरावृत्ति रोकने के लिए तैयार किया था।  अंग्रेजों को बगैर तार्किक क्षमता वाले आततायियों की जरूरत थी ,इसलिए उन्होंने इसे ऐसे रूप में विकसित किया कि पुलिस का नाम ही लोगों में भय का संचार करने को पर्याप्त हो। आजादी के बाद लोकतांत्रिक सरकारों ने पुलिस को कानून के मातहत जन-हितैषी संगठन बनाने की बातें तो कीं लेकिन इसमें संकल्पबद्धता कम और दिखावा ज्यादा रहा। वास्तव में राजनीतिक दलों को यह समझते देर नहीं लगी कि पुलिस उनके निजी हितों के पोषण में कारगर सहायक हो सकती है और उन्होंने सत्तासीन पार्टी के लिए इसका भरपूर दुरुपयोग किया। परिणामतः आम जनता व पुलिस में अविश्वास की खाई बढ़ती चली गयी और समाज में असुरक्षा और अराजकता का माहौल बन गया। शुरू-शुरू में राजनैतिक हस्तक्षेप का प्रतिरोध भी हुआ। थाना प्रभारियों ने विधायकों व मंत्रियों से सीधे भिड़ने का साहस दिखाया पर जब ऊपर के लोगों ने स्वार्थवश हथियार डाल दिये तब उन्होंने भी दो कदम आगे जाकर राजनेताओं को ही अपना असली आका बना लिया। अन्ततः इसकी परिणति पुलिस-नेता-अपराधी गठजोड़ में हुई जिससे आज पूरा समाज इतना त्रस्त है कि सर्वोच्च न्यायालय तक ने पुलिस में कुछ ढांचागत सुधार तत्काल करने की सिफारिशें कर दीं। लेकिन लोकशाही का शायद यह दुर्भाग्य ही है कि अधिकांश राज्य सरकारें सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश को नजरअंदाज कर रही हैं। परिणति सामने है- पुलिस अपराध रोकने में असफल है।
कानून व्यवस्था या वे कार्य जिनका सीधा सरोकार आम जन से होता है, उनमें थाना स्तर की ही मुख्य भूमिका होती है। लेकिन अब हमारे थाने बेहद कमजोर हो गए हैं। वहां बैठे पुलिसकर्मी आमतौर पर अन्य किसी सरकारी दफ्तर की तरह क्लर्क का ही काम करते हैं। थाने आमतौर पर शरीफ लोगों को भयभीत और अपराधियों को निरंकुश बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। आज जरूरत है कि थाने संचार और परिवहन व अन्य अत्याधुनिक तकनीकों से लैस हांे। बदलती परिस्थितियों के अनुसार थानों के सशक्तीकरण महति है। आज अपराधी थानें में घुस कर हत्या तक करने में नहीं डरते। कभी थाने उच्चाधिकारियों और शासन की प्रतिष्ठा की रक्षा के सीमावर्ती किलों की भांति हुआ करते थे। जब ये किले कमजोर हो गये तो अराजक तत्वों का दुस्साहस इतना बढ़ गया कि वे जिला पुलिस अधीक्षक से मारपीट और पुलिस महानिदेशक की गाड़ी तक को रोकने से नहीं डरते हैं।
रही बची कसर जगह-जगह अस्वीकृत चैकियों, पुलिस सहायता बूथों, पिकेटों आदि की स्थापना ने पूरी कर दी है। इससे पुलिस-शक्ति के भारी बिखराव ने भी थानों को कमजोर किया है। थानों में ”स्ट्राइकिंग फोर्स“ नाममात्र की बचती है। इससे किसी समस्या के उत्पन्न होने पर वे त्वरित प्रभावी कार्यवाही नहीं कर पाते हैं । तभी पुलिस थानों के करीब अपराध करने में अब अपराधी कतई नहीं घबराते हैं।
पुलिस सुधारों में अपराध नियंत्रण, घटित अपराधों की विवेचना और दर्ज मुकदमें को अदालत तक ले जाने के लिए अलग-अलग  विभाग घटित करने की भी बात है।  सनद रहे अभी ये तीनों काम  एक ही पुलिस बल के पास है, तभी आज थाने का एक चैथाई स्टाफ हर रोज अदालत के चक्कर लगाता रहता है। नियमित पेट्रोलिंग लगभग ना के बराबर है। यह भी एक दुखद हकीकत है कि पुलिस को गष्त के लिए पेट्रोल बहुत कम या नहीं मिलता है। पुलिसकर्मी अपने स्तर पर इंधन जुटाते हैं, जाहिर है कि इसके लिए गैरकानूनी तरीकों का सहारा लेना ही पड़ता होगा।  उ.प्र. में कई थाने ऐसे है, जहां टेलीफोन कनेक्षन कट चुके है। राजधानी के समीपवर्ती गाजियाबाद जिले की पुलिस तो अभी भी सन 65 के माडल की जीप पर गष्त कर रही है, जबकि अपराधी पलक झपकते ही हवा से बातें करने वाली मोटरसाईकल पर सवार होते हैं।  यहां उल्लेखनीय है कि पाकिस्तान के कराचीं में पुलिस विषेश रूप से तैयार किए गए तिपहिया स्कूटरों पर गश्‍त करती है। एक तो उस पर एक साथ तीन पुलिसवाले सवार हो जाते हैं, फिर इसमें इंधन का खर्च कम है और साथ ही यह तेज गति से गलियों में भी दौड़ लेता है।
इन दिनों पुलिस सुधार का हल्ला चल रहा है । सुप्रीम कोर्ट भी इस बारे में निर्देश दे चुका हैं, लेकिन देश का नेता पुलिस का उपनिवेशिक चेहरे को बदलने में अपना नुकसान महसूस करता है । तभी विवेचना और कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए अलग-अलग एजेंसियों की व्यवस्था पर सरकार सहमत नहीं हो पा रही है ।  वे नहीं चाहते हैं कि थाना प्रभारी जैसे पदों पर बहाली व तबादलों को समयबद्ध किया जाए।  कितना दुखद है कि उप्र में मुलायम सिहं का शासन आने पर एक जाति विशेष के और मायावती की सत्ता में दूसरी जाति के सिपाही से ले कर एसपी तक की बहाली होती है। पश्‍िचिमी उ.प्र के दंगों में एक समाज विशेष के पुलिस वालों ने अल्पसंख्यकों की खूब गरदने कटवाईं। जब पुलिस का जाति व सांप्रदायिकरण इस स्तर पर होग या है तो जन सरोकार का गर्त में जाना लाजिमी ही है। इसी का परिणाम है कि उ्रप्र में अपराधी पुलिस की कमजोरियों का भरपूर लाभ उठा रहे हैं। ़ऐसा ही देष के अन्य राजयों में भी होता है। सभी जानते हैं कि अमुक दरोगा किसका आदमी है।
वैसे भी अपराधों में इजाफा नगरीय अपसंस्कृति का एक अभिन्न हिस्सा है। कोई एक दषक पहले दिल्ली नगर निगम के स्लम विभाग द्वारा करवाए गए एक सर्वेक्षण की रिपोर्ट भले ही कहीं लाल बस्ते में बंध कर गुम हो गई हे, लेकिन वह है आज भी प्रासंगिक। निगम के स्लम तथा जे जे विभाग की रिपोर्ट में कहा गया था कि राजधानी में अपराधों में ताबडतोड बढ़ौतरी के सात मुख्य कारण हैं - अवांछित पर्यावरण, उपेक्षा तथा गरीबी, खुले आवास, बडा परिवार, अनुशासनहीनता व नई पीढी का बुजुर्गों के साथ अंतर्विरोध और नैतिक मूल्यों में गिरावट। पुलिस की मौजूदा व्यवस्था इन कारकों के प्रति कतई संवेदनषील नहीं है। वह तो डंडे और अपराध हो जाने के बाद अपराधी को पकड़ कर जेल भेजने की सदियों पुरानी नीति पर ही चल रही है।
आज जिस तरह समाज बदल रहा है, उसमें संवेदना और आर्थिक सरोकार प्रधान होते जा रहे हैं, ऐसे में सुरक्षा एजेंसियों की जिम्मेदारी, कार्य प्रणाली व चेहरा सभी कुछ बदलना जरूरी है ।  आज जरूरत डंडे का दवाब बढ़ाने की नहीं है, सुरक्षा एजेंसियों को समय के साथ आधुनिक बनाने की है ।


पंकज चतुर्वेदी
संपर्क- 9891928376




सोमवार, 5 जनवरी 2015

Needs to change mind set of gender biased society

मोमबत्ती की ऊष्मा  वहां तक क्यों नहीं पहुंचती ?

                                                                                पंकज चतुर्वेदी


जब देश-दुनिया नए साल के जष्न में मदहोश थे, तब उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले के मूसाझाग थाने में दो सिपाही गांव की 17 साल की एक लड़की को उठा लाए व रातभर उसके साथ दुष्कर्म  किया। साल के पहले दिन ही कोलकाता पुलिस ने एक जापानी युवती पर्यटक की शिकायत पर कुछ ऐसे लोगों को पकड़ा जिन पर युवती ने एक सप्तहा तक जबरिया बंधक बनाकर बलात्कार करने का आरोप लगाया। हरियाणा में कुछ युवकों की पिटाई करने वाली लड़कियों का ‘‘लाई डिटेक्टर टेस्ट’’ किया गया व उनसे अश्लील व भद्दे सवाल पूछे गए। यह दो वाकिये तो महज बानगी हैं, देश का षायद ही कोई ऐसा अखबार होगा जिसमें किसी महिला की अस्मत लूटने की घटनाएं ना छपी हों। जाहिर है कि इस तरह के अपराधियों को कानून, जनाक्रोश या स्वयं की अनैतिकता पर ना तो डर रह गया है ना ही संवेदना।
RAJ EXPRESS BHOPAL 6-1-2015 http://epaper.rajexpress.in/Details.aspx?id=251178&boxid=44446779

दो साल पहले  देश को हिला देने वाले दिसंबर-2012 के दामिनी कांड में एक आरोपी की जेल में कथित आत्महत्या हो गई व बाकी की फंासी की सजा पर अदालती रोक चल रही है। उस कांड के बाद बने पास्को कानून में जम कर मुकदमें कायम हो रहे हैं। दामिनी कांड के दौरान हुए आंदोलन की ऊष्मा  में सरकारें बदल  गईं। उस कांड के बाद हुए हंगामें के बाद भी इस तरह की घटनाएं सतत होना यह इंगित करता है कि बगैर सोच बदल,े केवल कानून से कुछ होने से रहा, तभी देश के कई हिस्सों  में ऐसा कुछ घटित होता रहा जो इंगित करता है कि महिलाओं के साथ अत्याचार के विरोध में यदा-कदा प्रज्जवलित होने वाली मोमबत्तियां केवल उन्हीं लोेगों का झकझोर पा रही हैं जो पहले से काफी कुछ संवदेनशील  है- समाज का वह वर्ग जिसे इस समस्या को समझना चाहिए -अपने पुराने रंग में ही है - इसमें आम लोग हैं, पुलिस भी है और समूचा तंत्र भी।
दिल्ली में दामिनी की घटना के बाद हुए देशभर के धरना-प्रदर्शनों में शायद करोड़ों मोमबत्त्तिया जल कर धुंआ हो गई हों लेकिन समाज के बड़े वर्ग पर दिलो-दिमाग पर औरत के साथ हुए दुव्र्यवहार को ले कर जमी भ्रांतियों की कालिख दूर नहीं हो पा रही हे। ग्रामीण समाज में आज भी औरत पर काबू रखना, उसे अपने इषारे पर नचाना, बदला लेने - अपना आतंक बरकरार रखने के तरीके आदि में औरत के शरीर को रोंदना एक अपराध नहीं बल्कि मर्दानगी से जोड़ कर ही देखा जाता हे। केवल कंुठा दूर करने या दिमागी परेशानियों से ग्रस्त पुरुष  का औरत के शरीर पर बलात हमला महज महिला की अस्मत या इज्जत से जोड़ कर देखा जाता हे। यह भाव अभी भी हम लोगों में पैदा नहीं कर पा रहे हैं कि बलात्कार करने वाला मर्द भी अपनी इज्जत ही गंवा रहा है। हालांकि जान कर आष्चर्य होगा कि चाहे दिल्ली की 45 हजार कैदियों वाली तिहाड़ जेल हो या फिर दूरस्थ अंचल की 200 बंदियों वाली जेल ; बलात्कार के आरोप में आए कैदी की , पहले से बंद कैदियों द्वारा दोयम दर्जें का माना जाता है और उसकी पिटाई या टाॅयलेट सफाई या जमीन पर सोने को विवश करने जैसे स्वघोशित नियम लागू हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि जेल जिसे असामाजिक लोगों की बस्ती कहा जाता है, जब वहां बलात्कारी को दोयम माना जाता है तो बिरादरी-पंचायतें- पुलिस इस तरह की धारणा क्यों विकसित नहीं कर पा रही हैं। खाप, जाति बिरादरियां, पंचायतें जिनका गठन कभी समाज के सुचारू संचालन के इरादे से किया गया था अब समानांतर सत्ता या न्याय का अड्डा बन रही है तो इसके पीछे वोट बैंक की सियासत होना सर्वमान्य तथ्य है। हरियाणा में जिन बच्चियों को उनके साहस के लिए सम्मानित करने की घोशणा स्वयं मुख्यमंत्री कर चुके थे, बाद में खाप के दवाब में उन्ही लडकियों के खिलाफ जांच के आदेश दे दिए गए।
ऐसा नही है कि समय-समय पर  बलात्कार या शोषण  के मामले चर्चा में नहीं आते हैं और समाजसेवी संस्थाएं इस पर काम नहीं करती हैं, । बाईस साल पहले भटेरी गांव की साथिन भंवरी देवी  को बाल विवाह के खिलाफ माहौल बनाने की सजा सवर्णों द्वारा बलातकार के रूप में दी गई थीं उस ममाले को कई जन संगठन सुप्रीम कोर्ट तक ले गए थे और उसे न्याय दिलवाया था। लेकिन जान कर आष्चर्य होगा कि वह न्याय अभी भी अधूरा है । हाई कोर्ट से उस पर अंतिम फैसला नहीं आ पाया है । इस बीच भंवरी देवी भी साठ साल की हो रही हैं व दो मुजरिमों की मौत हो चुकी है। ऐसा कुछ तो है ही जिसके चलते लोग इन आंदालनो, विमर्षों, तात्कालिक सरकारी सक्रिताओं को भुला कर गुनाह करने में हिचकिचाते नहीं हैं। आंकडे गवाह हैं कि आजादी के बाद से बलात्कार के दर्ज मामलों में से छह फीसदी में भी सजा नहीं हुई। जो मामले दर्ज नहीं नहीं हुए वे ना जाने कितने होंगे।
फांसी की मांग, नपुंसक बनाने का षोर, सरकार को झुकाने का जोर ; सबकुछ अपने- अपने जगह लाजिमी हैं लेकिन जब तक बलात्कार को केवल औरतों की समस्या समझ कर उसपर विचार किया जाएगा, जब तक औररत को समाज की समूची ईकाई ना मान कर उसके विमर्ष पर नीतियां बनाई जाएंगी; परिणा अधूरे ही रहें्रे। फिर जब तक सार्वजनिक रूप से मां-बहन की गाली बकना , धूम्रपान की ही तरह प्रतिबंधित करने जैसे आघारभूत कदम नहीं उठाए जाते  , अपने अहमं की तुश्टि के लिए औरत के शरीर का विमर्ष सहज मानने की मानवीय वत्त्ृिा पर अंकुश नहीं लगाया जा सकेगा। भले ही जस्टिस वर्मा कमेटी सुझाव दे दे, महिला हेल्प लाईन षुरू हो जाए- एक तरफ से कानून और दूसरी ओर से समाज के नजरिये में बदलाव की कोषिश एकसाथ किए बगैर असामनता, कुंठा, असंतुश्टि वाले समाज से ‘‘रंगा-बिल्ला’’ या ‘‘राम सिंह-मुकेश’’ या रामसेवक यादव की पैदाईश को रोका नहीं जा सकेगा।  मोमबत्तियों की उश्मा असल में  उन लोगों के जमीर को  पिघलने के लिए होना चाहिए जिनके लिए औरत उपभोग की वस्तु है, नाकि सियासती उठापटक के लिए।


शनिवार, 3 जनवरी 2015

human dying due to pesticides

दवाओं के कहर से जहर होती जमीन
पंकज चतुर्वेदी


प्रजातंत्र लाईव 4 जनवरी 2015 http://www.readwhere.com/read/409659/Prajatantra-Live/issue-230#page/9/1


दिल्ली से सटे पश्चिम उत्तर प्रदेश का दोआब इलाका, गंगा-यमुना नदी द्वारा सदियों से बहा कर लाई मिट्टी से विकसित हुआ था। यहां की मिट्टी इतनी उपजाऊ थी कि पूरे देश का पेट भरने लायक अन उगाने की क्षमता थी इसमें। अब प्रकृति इंसान की जरूरत तो पूरा कर सकती है, लेकिन लालच को नहीं । और  ज्यादा फसल के लालच में यहां अंधाधुंध खाद व कीटनाशकों का जो प्रयोग शुरू हुआ कि अब यहां पाताल से, नदी, से जोहड़ से, खेत से, हवा से  हवा-पानी नहीं मौत बरसती हैं। बागपत से लेकर ग्रेटर नोएडा तक के कोई 160 गंावों में हर साल सैंकड़ों लोग कैंसर से मर रहे हैं। सबसे ज्यादा लेागों को लीवर व आंत का कैंसर हुआ हे। बाल उड़ना, किडनी खराब होना, भूख कम लगना, जैसे रोग तो यहां  हर घर में हैं। सरकार कुछ कर रही है, राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण भी कुछ नोटिस दे रहा है, लेकिन इलाके में खेतों में छिड़कने वाले जहर की बिक्री की मात्रा हर दिन बढ़ रही है।  दुखद है कि अब नदियों के किनारे ‘विष-मानव’ पनप रहे हैं जो कथित विकास की कीमत चुकाते हुए असमय काल के गाल में समा रहे हैं। हमारे देश में हर साल कोई दस हजार करोड़ रूपए के कृषि-उत्पाद खेत या भंडार-गृहों में कीट-कीड़ों के कारण नष्ट हो जाते हैं । इस बर्बादी से बचने के लिए कीटनाशकों का इस्तेमाल बढ़ा हैं । जहां सन 1950 में इसकी खपत 2000 टन थी, आज कोई 90 हजार टन जहरीली दवाएं देश के पर्यावरण में घुल-मिल रही हैं । इसका कोई एक तिहाई हिस्सा विभिन्न सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों के अंतर्गन छिड़का जा रहा हैं ।  सन 1960-61 में केवल 6.4 लाख हेक्टर खेत में कीटनाशकों का छिड़काव होता था। 1988-89 में यह रकबा बढ़ कर 80 लाख हो गया और आज इसके कोई डेढ़ करोड़ हेक्टर होने की संभावना है। ये कीटनाशक जाने-अनजाने में पानी, मिट्टी, हवा, जन-स्वास्थ्य और जैव विविधता को बुरी तरह प्रभावित कर रहे हैं। इपले अंधाधुंध इस्तेमाल से पारिस्थितक संतुलन बिगड़ रहा है, सो अनेक कीट व्याधियां फिर से सिर उठा रही हैं। कई कीटनाशियों की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ गई है और वे दवाओं को हजम कर रहे हैं। इसका असर खाद्य श्रंखला पर पड़ रहा है और उनमें दवाओं व रसायनों की मात्रा खतरनाक स्तर पर आ गई है। एक बात और, इस्तेमाल की जा रही दवाईयों का महज 10 से 15 फीसदी ही असरकारक होता है, बकाया जहर मिट्टी, भूगर्भ जल, नदी-नालों का हिस्सा बन जाता है।
कनार्टक के मलनाड इलाक में सन 1969-70 के आसपास बड़ा अजीब रोग फैला। लकवे से मिलते-जुलते इस रोग के शिकार गरीब मजदूर थे। शुरू में उनके पिंडलियों और घुटने के जोड़ो में दर्द हुआ,फिर रोगी खड़े होने लायक भी नहीं रह गया। 1975 में हैदराबाद के नेशनल इंस्टीट्यूट आफ न्यूट्रिशन ने चेता दिया था कि ‘‘ एंडमिक एमिलियिन आर्थराईटिस आफ मलनाड’’ नामक इस बीमारी का कारण ऐसे धान के खेतों में पैदा हुई मछली, केकडे़ खाना है जहां कीटनाशकों का इस्तेमाल हुआ हो।  इसके बावजूद वहां धान के खेतों में पैराथिया और एल्ड्रिन का बेतहाशा इस्तेमाल जारी है, जबकि बीमारी एक हजार से अधिक गांवेां में फैल चुकी है।
दिल्ली, मथुरा, आगरा जैसे शहरों में पेयजल सप्लाई का मुख्य स्त्रोत यमुना नदी के पानी में डीडीटी और बीएसजी की मात्रा जानलेवर स्तर पर पहुंच गई है। यहां उपलब्ध शाकाहारी और मांसाहारी दोनों किस्म की खाद्य सामग्री में इन कीटनााशकों की खासी मात्रा पाई गई है। औसत भारतीय के दैनिक भोजन में  लगभग 0.27 मिग्रा डीडीटी पाई जाती है। दिल्ली के नागरिकों के शरीर में यह मात्रा सबसे अधिक है। यहां उपलब्ध गेंहू में 1.6 से 17.4 भाग प्रति दस लाख, चावल में 0.8 से 16.4 भाग प्रति 10 लाख, मूंगफली में 3 से 19.1 भाग प्रति दस लाख मात्रा डीडीटी मौजूद हे।  महाराष्ट्र में बोतलबंद दूध के 70 नमूनों में डीडीटी और एल्ड्रिन की मात्रा 4.8 से 6.3 भाग प्रति दस लाख पाई गई है, जबकि  मान्य मात्रा महज 0.66 है। मुंबई में टंकी वाले दूध में तो एल्ड्रिन का हिस्सा 96 तक था।
पंजाब में कपास की फसल पर सफेद मक्खियों के लाइलाज हमले का मुख्य कारण रासायनिक कीटनाशकों का इस्तेमाल किया जाना पाया गया है। अब टमाटर को ही हें। इन दिनों अच्छी प्रजाति के ‘रूपाली’ और ‘रश्मि’ किस्म के टमाटरों का सर्वाधिक प्रचलन है। इन प्रजातियों को सर्वाधिक नुकसान हेल्योशिस आर्मिजरा नामक कीड़े से होता है। टमाटर में सुराख करने वाले इस कीड़े के कारण आधी फसल बेकार हो जाती है। इन कीडों का मारने के लिए बाजार में रोगर हाल्ट, सुपर किलर, रेपलीन और चैलेंजर नामक दवाएं मिलती हैं।  इन दवाओं पर दर्ज है कि इनका इस्तेमाल एक फसल पर चार-पांच बार से अधिक ना किया जाए।लेकिन यह वैज्ञानिक चेतावनी बहुत महीन अक्षरों में व अंग्रजी में दर्ज होती है, जिसे पढ़ना व समझना किसान के बस से बाहर की बात है। लिहाजा लालच में आ कर किसान इस दवा की छिड़काव 25 से 30 बार कर देता है। शायद टमाटर पर कीड़े तो नहीं लगते हैं, लेकिन उसको खाने वाले इंसान का कई गंभीर बीमारियों की चपेट में आने की पुष्टि भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद भी कर चुकी है। संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक डा. ओपी लाल के शोध में बताया गया है कि इन दवाओं से उपचारित लाल-लाल सुंदर टमाटरों को खाने से मस्तिष्क, पाचन अंगों, किडनी, छाती और स्नायु तंत्रों पर बुरा असर पड़ता है। इससे कैंसर होने की संभावना भी होती है।  कीटनााशकों पर छपी सूचनाओं का पालन ना होने की समस्या अकेले टमाटर की नहीं, बल्कि बेहद व्यापक है।
इन दिनों बाजार में मिल रही चमचमाती भिंडी और बैंगन देखने में तो बेहद आकर्षक है, लेकिन खाने में उतनी ही कातिल! बैंगन को चमकदार बनाने के लिए उसे फोलिडज नामक रसायन में डुबोया जाता है। बैंगन में घोल को चूसने की अधिक क्षमता होती है,जिससे फोलिडज की बड़ी मात्रा बैंगन जज्ब कर लेते हैं। इसी प्रकार भिंडी को छेद करने वाले कीड़ों से बचाने के लिए एक जहरीली दवा का छिड़काव किया जाता हे। ऐसे कीटनाशकों से युक्त सबिज्यों का लगातार सेवन करने से सांस की नली बंद होने की प्रबल संभावना हाती है। इसी तरह गेंहू को कीड़ों से बचाने के लिए मेलाथियान पाउडर को मिलाया जाता है। इस पाउडर के जहर को गेंहू को धो कर भी दूर नहीं किया जा सकता है। यह रसायन मानव शरीर के लिए जहर की तरह है।
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान(एम्स) के फार्माकोलाजी विभाग के एक अध्ययन से पता चलता है कि मच्छर, काकरोच को मारने वाली दवाओं का कुप्रभाव सबसे ज्यादा 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों पर पड़ता है। ग्रीन पीस इंडिया की एक रिपोर्ट बताती है कि कीटनाशक बच्चों के दिमाग को घुन की तरह खोखला कर रहे हैं। संस्था ने बच्चों के मानसिक विकास पर कीटनाशकों के प्रभाव का अध्ययन करने के लिए देश के छह अलग-अलग राज्यों के जिलों में शोध किया। ये जिले थे - बटिंडा(पंजाब), भरूच(गुजरात),रायचूर(कनार्टक), यवतमाल(महाराष्ट्र), थेनी(तमिलनाडु) और वारंगल(आंध््राप्रदेश)। रिपोर्ट में बताया गया हे कि कीटनाशकों के अंधाधुंध, अवैज्ञानिक व असुरक्षित इस्तेमाल के कारण भोजन और जल में रासायनिक जहर की मात्रा बढ़ रही है। इसका सेवन करने वाले बच्चों का मानसिक विकास अपेक्षाकृत धीमा है।
कीटनाशकों के कारण जैव विविधता को होने वाले नुकसान की भरपाई तो किसी भी तरह संभव नहीं हैं। गौरतलब है कि सभी कीट, कीड़े या कीटाणू नुकसानदायक नहीं होते हैं। लेकिन बगैर सोचे-समझे प्रयोग की जा रही दवाओं के कारण ‘पर्यावरण मित्र’ कीट-कीड़ों की कई प्रजातियां जड़मूल से नष्ट हो गई हैं । सनद रहे कि विदेशी पारिस्थितिकी के अनुकूल दवाईयों को भारत के खेतों के परिवेश के अनुरूप जांच का कोई प्रावधान नहीं है। विषैले और जनजीवन के लिए खतरा बने हजारेंा कीटनाशकों पर विकसित देशों ने अपने यहां तो पाबंदी लगा दी है, लेकिन अपने व्यावसायिक हित साधने के लिए इन्हें भारत में उड़ेलना जारी रखा है।
असुरक्षित कृषि रसायनों से पर्यावरण खराब होने से बचाने के लिए केंद्र सरकार ने जून-93 में 12 कीटनाशकों पर पूण प्रतिबंध और 13 के इस्तेमाल पर कुछ पाबंदियांें की औपचारिकात निभाई थी। प्रतिबंधित की गई दवाओं में एक ‘सल्फास’ के नाम से कुख्यात एल्यूमिनियम फास्फाईड भी है। आज शायद ही ऐसा कोई दिन जाता होगा जब अखबारों में सल्फास खा कर खुदकुशी करने की खबर ना छपी हो। डीडीटी और बीएचसी जैसे बहुप्रचलित कीटनााशक भी सरकारी रिकार्ड में  प्रतिबंधित हैं। ऐसी अन्य दवाएं हं -डाय ब्रोमो क्लोरो, पेंटा क्लोरो नाईट्रो बंेजीन, पेंटा क्लोरो फेनाल, हेप्टा क्लोरो एल्ड्रिन, पैरा क्वाट डाई मिथाईल सल्फेट, नोईट्रोफेन और टेट्राडाईफेन। लेकिन ये सभी दवाएं अलग-अलग नामों से दिल्ली से ले कर दूरस्थ गांवों तक कहीं भी खरीदी जा सकती हैं। सरकारी महकमों की खरीद के नाम पर इनके कारखानों के लाईसेंस धड़ल्ले से जारी किए जाते हैं और कारखाने अपने उत्पादों को पीछे के दरवाजे से बाजार में बेचते हैं। सल्फास, डीडीटी, बीएचसी और मैलाथियान जैसे कीटनाशकों के दाम बेहद कम होने के कारण ये छोटे किसानों में बेहद लोकप्रिय हैं। चूंकि सरकार ने इन दवाओं की बिक्री पर प्रतिबंध(भले ही कागजों पर) लगाया है, लेकिन उत्पादन पर नहीं। सरकारी महकमों के लिए खरीद के नाम पर इनके कारखानों के लाईसेंस धड़ल्ले से जारी किए जाते हैं, जबकि इनमें बना माल बेरोकटोक पीछे के दरवाजे से बाजार में भेज दिया जाता है।
यह विडंबना है कि देश में हरित क्रांति का झंडा लहराने वालों ने हमारे खेतों व उत्पादों को विषैले रसायनों का गुलाम बना दिया है। नतीजतन एक बारगी तो लगता है कि पैदावार बढ़ गई है, लेकिन जल्दी ही इसके कारण जमीन के बंजर होने और उसका भक्षण करने वालों को शारीरिक विसंगतियों की चपेट में आने का सामना करना पड़ता है। इससे खेती की लागत बढ़ रही है, साथ ही मानव संसाधन का नुकसान तथा स्वास्थ्य पर खर्चो की बढ़ौतरी हो रही है। हमारा देश कई सदियों- युगों से खेती करता आ रहा है। हमारे पास कम लागत में अच्छी फसल उगाने का पारंपरिक ज्ञान है। लेकिन यह ज्ञान जरूरत तो पूरी कर सकता है, लिप्सा को नहीं। अंतरराष्ट्रीय बाजार गुणवत्ता, उपभोक्ता और प्रशोधन जैसे नारों पर खेती चाहता है, जबकि हमारी परंपरा धरती को माता आौर खेती को पूजा मााने की है।  हमारे पारंपरिक बीज, गोबर की खाद, नीम ,गौमूत्र जैसे प्राकृतिक तत्वों के कीटनााशक शायद पहले से कम फसल दें, लेकिन यह तय है कि इनसे जहर नहीं उपजेगा।
इन दिनों देष में कइ जगहों पर बगैर रासायनिक दवा व खाद के फसल उगाने का प्रचलन बढ़ा है, लेकिन यह फैशन से ज्यादा नहीं है और ऐसे उत्पादों के दाम इतने ज्यादा हैं कि आम आदमी इसे खरीदने से बेहतर आम जहरीले उत्पाद खरीदना श्रेयस्कर समझता है।

पंकज चतुर्वेदी
फ्लेट - यू.जी.-1 3/186 राजेन्द्र नगर सेक्टर -2
साहिबाबाद, गाजियाबाद 201005


शुक्रवार, 2 जनवरी 2015

Jute can change faith of farmers



जूट उद्योग को दरकार से सरकारी संरक्षण की

पंकज चतुर्वेदी

 
डेली न्‍यूज, जयपुर 2 जनवरी 2015 http://dailynewsnetwork.epapr.in/409175/Daily-news/03-01-2015#page/6/1
जूट को पर्यावरण-मित्र और फिर से उपयोग लायक प्राकृतिक फाईबर है । यह बारिश की फसल है और अगस्त-सितंबर में इसकी कटाई होने लगती है। दुनियाभर में जिस तरह नष्‍ट ना होने वाली प्लास्टिक और पेड़ काट कर तैयार कागज के इस्तेमाल से परहेज की मुहिम चल रही है, ऐसे में जूट की मांग बढ़ गई है ।  इसके बावजूद भारत में जूट की खेती सरकारी उपेक्षा से आहत है । हमारे देश में जूट उपजाने वाले खेतों के महज 13 फीसदी ही सिंचित  हैं । शेष  खेती भगवान भरोसे यानी बारिश पर निर्भर करती है । चूंकि जूट की खेती बेहद खर्चीला व मेहनत का काम है और सरकार इसके किसानों की मूलभूत जरूरतों जैसे - सिंचाई, उन्नत बीज, फसल सुरक्षा और बाजार के प्रति गंभीर नहीं रही है, अतः मांग के बावजूद हर साल जूट का रकवा घटता जा रहा है । उधर बांग्लादेश के जूट उत्पादकों से मिल रही चुनौतियों के चलते हमारा जूट उद्योग बदतर होता जा रहा है।
जूट की खेती मूलरूप से पश्चिम  बंगाल, असम, ओडिशा , मेघालय, त्रिपुरा व उत्तरप्रदेश में होती है । यहां विश्‍व  के कुल जूट उत्पादन का 40 प्रतिशत उपजाता है ।  भारत के कोई 40 लाख किसान लगभग आठ लाख हैक्टर में जूट उगाते हैं । जबकि इस जूट से बाजार की मांग लायक उत्पाद तैयार करने के कारखानों में ढाई लाख से अधिक लोग रोजगार पाते हैं । देश में पैदा होने वाले जूट का आधा तो अकेले पश्‍चिम बंगाल में होता है । हालांकि हमारे देश में जूट पैदा करना छोटे या मझोले किसानों का ही काम है ।  
द सी एक्‍सप्रेस, आगरा http://theseaexpress.com/epapermain.aspx
इन दिनों अंतरराष्‍ट्रीय बाजार में भारतीय उपमहाद्वीप के पारंपरिक जूट की अच्छी मांग है । जूट का इस्तेमाल न केवल बोरे बनाने में , बल्कि  सजावटी सामान, फैशनेबल कपड़े व चप्पल आदि बनाने में भी हो रहा है । कई फैशन संस्थान इस फैब्रीक से अत्याधुनि कपड़े बना कर उनका सफल षो भी कर चुके हैं । यूरोप के उच्च वर्ग में इसकी ड्रेसों की अच्छी मांग है । जूट के बारीक हस्तषिल्प के उम्दा कारीगर हमरे देश के उत्तर-पूर्वी राज्यों के गांव-गांव में फैले हुए हैं । गौरतलब है कि उत्तर-पूर्वी राज्यों में रोजगार के अवसर मुहैया करवाना व पारंपरिक लोक षिल्पियों को काम दिलवाना सरकार के सामने सदैव से चुनौती रहा है ।
जूट की डंडी से उम्दा दर्जे का चिकना कागज बनता है । हमारे देश में हर साल कोई 45 लाख क्विंटल जूट-डंठल निकलता है और यह सब चूल्हे में ईंधन के रूप में फुंक जाता है । लबकि इसका ताप कम होता है और धुआं अत्यधिक । थोड़ी सी पूंजी से डंठलों से कागज बनाने के कारखाने पर भी सरकार को विचार करना चाहिए ।
जूट उद्योग सदैव से निर्यातोन्मुख रहा है । कच्चे जूट व उससे बने सामान के उत्पादन की द़ष्टि  से भारत दुनिया में पहले स्थान पर और इससे बनी चीजों के निर्यात के मामले में दूसरे स्थान पर है । हर साल चीनी और अनाज के लिए जूट के बोरों की अनिवार्य पैकेजिंग के लिए सरकार ने 1987 में एक विशेष  अधिनियम  लागू किया था । गत वर्ष  इस अधिनियम के विरूद्ध कोलकाता हाई कोर्ट में याचिका दायर कर दी गई थी ।  उल्लेखनीय है कि चीनी व अनाज के लिए जूट के बोरे को अनिवार्य तो कर दिया गया, लेकिन सरकार ही प्र्याप्त संख्या में बोरे उपलब्ध नहीं करवा पाई । यानी महज पैकेजिंग सामग्री के अभाव में इनके व्यापार का नुकसान हुआ ।
जूट की खेती के लिए आवश्‍यक अधिक पानी की इस क्षेत्र में कमी नहीं है । जाहिर है कि बाढ़ व पर्याप्त मात्रा में श्रमिकों की मौजूदगी इस इलाके में जूट उत्पादन व उसके हस्त शिल्प की बेहतर संभावनाएं दर्शाती है । इसके विपरित असम में हर साल जूट की बुवाई घटती जा रही है । नगालेंड में थोड़ी सी जमीन पर इसकी खेती हो रही है । मेघालय के गारो व खासी पहाड़ी क्षेत्रों में लगभग 5000 हेक्टर में जूट उगाया जा रहा है । त्रिपुरा में भी जूट पैदावार में हर साल कमी आ रही है । आंकड़ों पर गौर करें तो पाएंगे कि हमारे खेतों में जूट की फसल साल-दर-साल कम होती जा रही है । वर्ष 2007-08 से 2012-13 के छह साल के दौरान देश में जूट पैदावार के आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2008-09 में सबसे कम 1476 लाख टन जूट खेतों में उगा । सन 2007-08 में 1782 लाख टन, वर्ष 2009-10 में 1620, 10-11 में 1800, सन 2011-12 में 1845 और सन 12-13 में 1674 लाख टन उत्पादन हुआ। आंकडे साफ दर्शाते हैं कि उत्पादन बढ नहीं रहा है।  असल में बांग्लादेश सरकार जूट उत्पादों को निर्यात करने पर सीधे 10 प्रतिशत नगद सहायता देती है। इसके चलते वहां के उत्पाद सस्ते हैं व वहां के उत्पादक अधिक उत्साह से यह काम करते है।। इसके विपरीत हारे यहां जूट के तागों की कीमतें 15 प्रतिशत कम हो गई हैं, इससे किसान का लाभ बहुत ही कम हो गया है और उसका अपनी पारंपरिक खेती से मोह भंग हो रहा है।
उत्तर -पूर्वी राज्यों की जमीन और जलवायु जहां बेहतरीन जूट उत्पादन में सक्षम है, वहीं किसानों की माली हालत ठीक ना होना व पैदावार के लिए बाजार का ना होना एक त्रासदी ही है ।  असम के अमीनगंज में सरकार ने प्लास्टिक टेक्नालाजी के प्रशिक्षण का संस्थान तो खोल दिया, लेकिन स्थानीय उत्पाद व तकनीक के जूट की सुध किसी ने नहीं ली । जूट के थैले, सजावटी सामान, फ्लोरिंग, शा, चादर आदि बनाने में इलाके की जनजातियों को महारत् हांसिल है । जरूरत है तो बस उन्हें प्रोत्साहित करने  और उनके हुनर को दुनिया के सामने लाने के सही मंच की ।
विडंबना है कि इतनी जबरदस्त संभावनाओं वाले उत्पाद को उगाने के क्षेत्रों के विधिवत चिन्हांकन का काम भी नहीं हुआ है । ऐसे इलाकों को पहचान कर वहां अधिक फसल देने वाले बीज व तकनीक मुहैया करवा कर उत्तर-पूर्वी राज्यों में रोजगार की गंभीर समस्या का सहजता से हल खोजा जा सकता है । जूट महज पेट भरने का साधन मात्र नहीं है, यह मनुष्‍
य और प्रकृति के बीच  बढ़ रही दूरी के बीच सेतु भी है ।

पंकज चतुर्वेदी

गुरुवार, 1 जनवरी 2015

slogans can not save the cow

भावुकता और नारों से नहीं बचेगी गाय
पंकज चतुर्वेदी, वरिष्ठ पत्रकारF
दैनिक हिंदुस्तान ०२ जनवरी २०१५ http://epaper.livehindustan.com/
गाय हमारी माता है,  गाय को बचाना है,  गाय देश की पहचान है- जैसे नारे समय-समय पर सुनाई पड़ते रहते हैं। सड़क पर ट्रकों में लदी गायों को पुलिस से पकड़वा करके,  उन गाड़ियों में आग लगाकर व कुछ एक को पीटकर लोग मान लेते हैं कि उन्होंने गौ-सेवा का पुण्य कमा लिया। लेकिन आंकड़े कुछ और बताते हैं। हमारे गांवों में बैल आधारित खेती की जोत तेजी से घटती हुई लगभग खत्म हो रही है। हमारी गाय दुनिया में सबसे कम दूध देने वाली गाय है। लगातार बंट रहे परिवारों के कारण ग्रामीण अंचलों में घर के आकार छोटे हो रहे हैं। ऐसे में,  गाय-बैल को रखने की जगह निकालना काफी कठिन होता जा रहा है। जब तक ऐसी व्यावहारिक बातों को सामने रखकर गो-धन संरक्षण की बात नहीं होगी,  तब तक यह कार्य किसी कथा-वाचक के भागवत वाचन की ही तरह होगा,  जहां कथा सुनते समय तो भक्तगण भाव-विभोर होते हैं। लेकिन वहां से बाहर निकलकर वे अपनी उसी दुनियादारी में वापस लौट जाते हैं,  जिससे मुक्ति की खोज के लिए वे उस कथा में गए थे।

सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि हमारे यहां अब भी गाय को ‘दान की बछिया’  ही माना जाता है। जाहिर है कि भारत में गाय पालना बेहद घाटे का सौदा है। जब गाय दूध देती है,  तब तो पालक उसे घर रखता है और जब वह सूख जाती है,  तो सड़क पर छोड़ देता है। बारिश के दिनों में गायों को कहीं सूखी जगह बैठने को नहीं मिलती,  वे मक्खियों व अन्य कीटों से तंग रहती हैं, सो राजमार्गों पर कुनबे सहित बैठी होती हैं। विडंबना है कि हर दिन इस तरह मुख्य सड़क पर बैठी या टहलती गायों की असामयिक मौतें होती हैं और उनकी चपेट में आकर इंसान भी चोटिल होते हैं और इस तरह आवारा गायें आम लोगों की संवेदना खो देती हैं। गायों की रक्षा के लिए धार्मिक उद्धरण देने या इसे भावुक जुमलों में उलझाने की बजाय इसके लिए कई जरूरी कदम उठाए जाने चाहिए। सबसे पहले तो भारतीय गाय की नस्ल सुधारने,  उसकी दूध-क्षमता बढ़ाने के वैज्ञानिक प्रयास किए जाने जरूरी हैं।

कुछ हद तक गायों की विदेशी नस्लों पर पाबंदी लगे व देशी नस्ल को विकसित किया जाए। कुछ कार्या,  जैसे पूजा, बच्चों के मिल्क पाउडर आदि में गाय के दूध, घी आदि की अनिवार्यता करने से गाय के दूध की मांग बढ़ेगी और इससे गो-पालक भी उत्साहित होंगे। गो-मूत्र व गोबर को अलग से संरक्षित करने व उनसे निर्मित खाद व कीट नाशकों का व्यावसायिक उत्पादन हो,  ताकि पशु पालक को इससे भी कुछ आय हो और वे उसे आवारा न छोड़ें। गायों के संरक्षण के साथ हमें बैल का उपयोग बढ़ाने पर भी लगातार सोचना होगा। अगर हम गाय को सचमुच बचाना चाहते हैं,  तो हमें इसकी धार्मिकता नहीं,  इसकी आर्थिकी को मजबूत बनाना होगा। ग्रामीण और कस्बायी अर्थव्यवस्था में गाय को महत्वपूर्ण स्थान देकर ही उसे बचाया जा सकता है।

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