My writings can be read here मेरे लेख मेरे विचार, Awarded By ABP News As best Blogger Award-2014 एबीपी न्‍यूज द्वारा हिंदी दिवस पर पर श्रेष्‍ठ ब्‍लाॅग के पुरस्‍कार से सम्‍मानित

शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2015

cow needs to be profitable business not slogans

नारों से नहीं बचेगी गाय
पंकज चतुर्वेदी
‘गाय हमारी माता है, गाय को बचाना है, ‘गाय देष की पहचान है ...... जैसे नारे समय समय पर हवा में तिरते हैं, कुछ गोश्ठी, सेमीनार-जुलूस, और उसके बाद वही ढाक के तीन पात। सड़क पर ट्रकों में लदी गायों को पुलिस के पकड़वा कर, उन गाडियों में आग लगा कर व कुछ लोगों को पीट कर लोग मान लेते हैं कि उन्होंने बड़ा धर्म-रक्षा का काम कर दिया। ऐसी हरकतों में लिप्त कुछ चेहरे चुनावों में चमकते हैं और फिर सत्ता-सुख में भारत माता के साथ ही गौ माता को भी भ्ूाल जाते हैं। आंकड़े बताते हैं कि हमारे गांवों में खेती के रकबे कम हो रहे हैं, बैल पर आधारित खेती की जोत तेजी से घट रही है। यही नहीं हमारी गाय का दूध दुनिया में सबसे कम है ,इसके साथ ही गांवों के षहर की और दौड़ने या फिर षहरों के गांवेां की ओर संकुचित होने के चलते ग्रामीण अंचलों में घर के आकार छोटे हो रहे हैं और ऐसे में गाय-बैल को रखने की जगह निकालना कठिन होता जा रहा है। जब तक ऐसी व्याहवारिक बातों को सामने रख कर गौ-धन संरक्षण की बात नहीं होगी, तब तक यह कार्य किसी प्रख्यात कथा-वाचक की भागवत वाचन की ही तरह होगा, जहां कथरा सुनने के समय तो भक्तगण भावविभोर होते हैं, लेकिन वहां से बाहर निकल कर उन्हीं काम-क्रोध-लोभ-मद-मोह में डुब जाते हैं जिनके नाष के लिए कथा हो रही थी।
गाय को बचाने की बात करने में जरा भी ईमानदारी हो तो सबसे पहले देष के लगभग सभी हाईवे पर बारिष के मौसम की रातों में जा कर देखना होगा कि आखिर हजारों-हजार गायें सड़क पर क्यों बैठी होती हैं। जरा ध्यान से देखें इस झुंड में एक भी भैंस नहीं मिलती। जाहिर है कि गाय को पालने का खर्च इतना है कि उसके दूध को बेच कर पषु-पालक की भरपाई होती नहीं है। भारत की गाय का दुग्ध उत्पादन दुनिया में सबसे कम है। डेनमार्क में दूध देने वाली प्रत्येक गाय का वार्शिक उत्पादन औसत 4101 लीटर है,स्विटजरलैंड में 4156 लीटर, अमेरिका में 5386 और इंग्लैंड में 4773 लीटर है। वहीं भारत की गाय सालाना 500 लीटर से भी कम दूध देती है। उधर यदि बरेली के आई वी आर आई यानि इंडियन वेटेनरी रिसर्च इंस्टीट्यूट में जा कर देखें तो वहां केवल चार किस्म की भारतीय गौ नस्लों पर काम हो रहा है और ब्रंदावनी व थारपार जैसी किस्म की गायें एक दिन में 22 लीटर तक दूध देती हैं। दुखद है कि अभी भी गाय को ‘‘दान की बछिया’’ ही माना जाता है।  जाहिर है कि भारत में गाय पालना बेहद घाटे का सौदा है। तभी जब गाय दूध देती है तब तो पालक उसे घर रखता है और जब वह सूख जाती है तो सडक पर छोड़ देता है। बारिष के दिनों में गाय को कहीं सूखी जगह बैठने को नही मिलती, वह मक्खियों व अन्य कीट से तंग रहती है, सो हाईवे पर कुनबे सहित बैठी होती हैं। विडंबना है कि हर दिन इस तरह मुख्य सडक पर बैठी या टहलती गायों की असामयिक मौत होती है और उनके चपेट में आ कर इंसान भी चुटैल होते हैं और इस तरह आवारा गाय  आम लोगों की संवेदना भी खो देती है।
गाय की रक्षा के लिए धार्मिक  उद्धरण देना या इसे भावुक जुमलों में उलझाना कतई सफल नहीं रहा है, अतएव जरूरी है कि इसके लिए कुछ प्रभावी सुझााव या कदम उठाए जाएं। सबसे पहले तो भारतीय गाय की नस्लें सुधारने, उसकी दूध -क्षमता बढ़ाने के वैज्ञानिक प्रयास किए जाने जरूरी हैं । कुछ हद तक गायों की विदेषी नस्लों पर पाबंदी लगे व देषी नस्ल को विकसित किया जाए।  कुछ कार्यों जैसे - पूजा, बच्चों के मिल्क पाउडर आदि में गाय के दूध, घी आदि की अनिवार्यता करने पर गाय के दूध की मांग बढ़ेगी व इससे गौ पालक भी उत्साहित हांेगे। गौ मूत्र व गोबर को अलग से संरक्षित करने व उसे निर्मित खाद व कीट नाषकों का व्यावसायिक उत्पादन हो, ताकि पषु पालक को इस मद में भी कुछ आय हो और वह उसे आवारा ना छोड़ें। भारत की ग्रामीण अर्थ व्यवस्था में कभी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करने वाले बैल अब मषीनों के चलते  गांव से बाहर हो रहे हैं। छोटे रकबे में बैल से हल चलाने की अनिवार्यता, पटेला फेरने, पानी खींचने जैसे कुछ कार्यों के लिए बैल की अनिवार्यता का कानून बनना चाहिए। इससे डीजल की मांग घटेगी, और उसके दहन से ग्रामीण अंचल में बढ़ रहे प्रदूशण पर भी नियंत्रण होगा। सबसे बड़ी बात किसानेंा को यह समझााना होगा कि बैल की तुलना में ट्रैक्टर के इस्तेमाल से फसल में बेकारी ज्यादा होती है, दाना ज्यादा टूटता है।
कुछ गांवों में गौ पालन के सामुदायिक प्रयोग कियो जा सकते हैं । इसमें पूरे गांव की गायों का एक साथ पालन, उससे मिलने वाले उत्पाद का एकसाथ विपणन और उससे होने वाली आय का सभी गौ पालकों में समान वितरण जैसे प्रयोग करने जरूरी हैं। विडंबना है कि देषभर के अधिकांष गावों में सार्वजनिक गौचर की भूमि अवैध कब्जों में है। सामुदायिक पषु पालन से ऐसी चरती की जमीनों की मुक्ति का रास्ता निकलेगा। ग्रामीण सड़क परिवहन में बैल का इस्तेमाल करने के कुछ कानून बनें, गाय की खुराक, उसको रखने के स्थान की साफ-सफाई आदि का मानकीकरण जरूरी हो। पषु चिकित्सक के पाठ्यक्रम में भारतीय नस्ल के गाय-बैल के रोगों पर विषेश सामग्री हो। भारवाहक या खेत में काम करने वाले बैल के भाजन, स्वास्थ्य और काम करने के घंटों पर स्पश्ट व कठोर मार्गदर्षन हों। ये कुछ छोटे छोटे प्रयोग ग्रामीण अर्थ व्यवस्था और सामकि ताने-बाने को मजबूत करेंगे ही, गाय का भी संरक्षण करेंगे।
गाय व बैल का ग्रामीण विकास व खेती में इस्तेमाल हमारे देष को डीजल खरीदने में व्यय होने वाली विदेषी मुद्रा के भार से भी बचाता है, साथ ही डीजल से संचालित ट्रैक्टर, पंप व अन्य उपकरणों से होने वाले घातक प्रदूशण से भी निजात दिलवाता है। यह बात सरकार व समाज तक पहुंचाने के लिए बेहतरीन फिल्में, रेडियो कार्यक्रम आदि गांव-गांव तक पहुंचाना चाहिए।
जन-कवि गौरख पाण्डेय के एक गीत की पंक्ति हैं -
‘‘बस कीजिये आकाष में नारे उछालना,
यह जंग है इस जंग में ताकत लगाईये।’’
गाय को बचाने के लिए नरों या जुमलों की नहीं, सषक्त कदमों की जरूरत है। असल में गांव, गाय व उसके कुनबे को बचाने की मंषा है तो इसे धर्म- वेद-पुराण की बातों से ऊपर उठा कर तकनीक, वैज्ञानिक, प्रबंधन के कोण से प्रस्तुत करना होगा।
पंकज चतुर्वेदी
3/186 सेक्टर-2
राजेन्द्र नगर, साहिबाबाद
गाजियाबाद 201005

गुरुवार, 8 अक्टूबर 2015

International natural diesaster reduction day, 13 October 2015 : special on drought http://hindi.indiawaterportal.org/node/50133

पारम्परिक प्रणालियाँ सक्षम हैं सूखे से निबटने में

इंटरनेशनल नेचुरल डिजास्टर रिडक्शन दिवस, 13 अक्टूबर 2015 पर विशेष


.अब देश से मानसून के बादल विदा हो गए हैं और यह तय है कि भारत का बड़ा हिस्सा सूखा, पानी की कमी और पलायन से जूझने जा रहा है।

बुन्देलखण्ड में तो सैंकड़ों गाँव वीरान होने शुरू भी हो गए हैं। एक सरकारी आँकड़े के मुताबिक देश के लगभग सभी हिस्सों में बड़े जल संचयन स्थलों (जलाशयों) में पिछले साल की तुलना में कम पानी है। बुवाई तो कम हुई है ही।

यही नहीं ऐसे भी इलाके सूखा-सम्भावित की सूची में हैं जहाँ जुलाई के आखिरी दिनों में बाढ़ आ गई थी और उससे भी खेत-सम्पत्ति को नुकसान हुआ था। लगता है यह कहावत गलत नहीं है कि आषाढ़ में जो बरस गया वह ठीक है, सावन-भादो रीते जाएँगे।

सवाल उठता है कि हमारा विज्ञान मंगल पर तो पानी खोज रहा है लेकिन जब कायनात छप्पर फाड़कर पानी देती है उसे सारे साल सहेज कर रखने की तकनीक नहीं। हालांकि हम अभागे हैं कि हमने अपने पुरखों से मिली ऐसे सभी ज्ञान को खुद ही बिसरा दिया।

जरा गौर करें कि यदि पानी की कमी से लोग पलायन करते तो हमारे राजस्थान के रेगिस्तानी इलाके तो कभी के वीरान हो जाने चाहिए थे, लेकिन वहाँ रंग, लोक, स्वाद, मस्ती, पर्व सभी कुछ है। क्योंकि वहाँ के पुश्तैनी बाशिन्दे कम पानी से बेहतर जीवन जीना जानते थे।

यह आम अदमी भी देख सकता है कि जब एक महीने की बारिश में हमारे भण्डार पूरे भर कर झलकने लगे तो यदि इससे ज्यादा पानी बरसा तो वह बर्बाद ही होगा। फिर भी वर्षा के दिनों में पानी ना बरसे तो लोक व सरकार दोनों ही चिन्तित हो जाते हैं।

यह सवाल हमारे देश में लगभग हर तीसरे साल खड़ा हो जाता है कि ‘औसत से कम’ पानी बरसा या बरसेगा, अब क्या होगा? देश के 13 राज्यों के 135 जिलों की कोई दो करोड़ हेक्टेयर कृषि भूमि प्रत्येक दस साल में चार बार पानी के लिये त्राहि-त्राहि करती है। जो किसान अभी ज्यादा और असमय बारिश की मार से उबर नहीं पाया था, उसके लिये एक नई चिन्ता!

उधर कम बरसात की आशंका होते ही दाल, सब्जी, व अन्य उत्पादों के दाम बाजार में आसमानी हो गए। अभी तक उस अनाज को उगाने वालों को आँकड़ों में दिखाए गए करोड़ों-करोड़ के मुआवजे से एक छदाम भी नहीं मिला है और व्यापारी पर सम्भावित कम बारिश की आमद बढ़ गई।

यह कोई सोच ही नहीं रहा है कि क्या कम बारिश से खेती प्रभावित होगी? या पीने के पानी का संकट होगा या फिर अर्थव्यवस्था में जीडीपी का आँकड़ा गड़बड़ाएगा।

केन्द्र से लेकर राज्य व जिला से लेकर पंचायत तक इस बात का हिसाब-किताब बनानेे में लग गए हैं कि यदि कम बारिश हुई तो राहत कार्य के लिये कितना व कैसे बजट होगा। असल में इस बात को लोग नजरअन्दाज कर रहे हैं कि यदि सामान्य से कुछ कम बारिश भी हो और प्रबन्धन ठीक हो तो समाज पर इसके असर को गौण किया जा सकता है।

जरा मौसम महकमे की घोषणा के बाद उपजे आतंक की हकीक़त जानने के लिये देश की जल-कुंडली भी बाँच ली जाये। भारत में दुनिया की कुल ज़मीन या धरातल का 2.45 क्षेत्रफल है। दुनिया के कुल संसाधनों में से चार फीसदी हमारे पास हैं व जनसंख्या की भागीदारी 16 प्रतिशत है।

हमें हर साल बारिश से कुल 4000 घन मीटर पानी प्राप्त होता है, जबकि धरातल या उपयोग लायक भूजल 1869 घन किलोमीटर है। इसमें से महज 1122 घन मीटर पानी ही काम आता है। जाहिर है कि बारिश का जितना हल्ला होता है, उतना उसका असर पड़ना चाहिए नहीं।

हाँ, एक बात सही है कि कम बारिश में भी उग आने वाले मोटे अनाज जैसे ज्वार, बाजरा, कुटकी आदि की खेती व इस्तेमाल सालों-साल कम हुआ है, वहीं ज्यादा पानी माँगने वाले सोयाबीन व अन्य कैश क्रॉप (नकदी फसल) ने खेतों में अपना स्थान बढ़ाया है।

इसके चलते बारिश पर निर्भर खेती बढ़ी है। तभी थोड़ा भी कम पानी बरसने पर किसान रोता दिखता है। देश के उत्तरी हिस्से में नदियो में पानी का अस्सी फीसदी जून से सितम्बर के बीच रहता है, दक्षिणी राज्यों में यह आँकड़ा 90 प्रतिशत का है। जाहिर है कि शेष आठ महीनों में पानी की जुगाड़ ना तो बारिश से होती है और ना ही नदियों से।

भारत की अर्थव्यवस्था का आधार खेती-किसानी है। हमारी लगभग तीन-चौथाई खेती बारिश के भरोसे है। जिस साल बादल कम बरसे, आम-आदमी के जीवन का पहिया जैसे पटरी से नीचे उतर जाता है।

एक बार गाड़ी नीचे उतरी तो उसे अपनी पुरानी गति पाने में कई-कई साल लग जाते हैं। मौसम विज्ञान के मुताबिक किसी इलाके की औसत बारिश से यदि 19 फीसदी से भी कम हो तो इसे ‘अनावृष्टि’ कहते हैं। लेकिन जब बारिश इतनी कम हो कि उसकी माप औसत बारिश से 19 फीसदी से भी नीचे रह जाये तो इसको ‘सूखे’ के हालात कहते हैं।

एक बात जानना जरूरी है कि खाद्यान्नों के उत्पादन में कमी और देश में खाद्यान्न की कमी में भारी अन्तर है। यदि देश के पूरे हालात को गम्भीरता से देखा जाये तो हमारे बफर स्टाक में आने वाले तीन सालों का अन्न भरा हुआ है।

यह बात दीगर है कि लापरवाह भण्डारण, भ्रष्टाचारी के श्राप से ग्रस्त वितरण और गैर व्यावसायिक प्रबन्धन के चलते भले ही खेतों में अनाज पर्याप्त हो, हमारे यहाँ कुपोषण व भूख से मौत होती ही रहती हैं। जाहिर है कि इन समस्याओं के लिये इंद्र की कम कृपा की बात करने वाले असल में अपनी नाकामियों का ठीकरा ऊपर वाले पर फोड़ देते हैं।

भारत की अर्थव्यवस्था का आधार खेती-किसानी है। हमारी लगभग तीन-चौथाई खेती बारिश के भरोसे है। जिस साल बादल कम बरसे, आम-आदमी के जीवन का पहिया जैसे पटरी से नीचे उतर जाता है। एक बार गाड़ी नीचे उतरी तो उसे अपनी पुरानी गति पाने में कई-कई साल लग जाते हैं। मौसम विज्ञान के मुताबिक किसी इलाके की औसत बारिश से यदि 19 फीसदी से भी कम हो तो इसे ‘अनावृष्टि’ कहते हैं। लेकिन जब बारिश इतनी कम हो कि उसकी माप औसत बारिश से 19 फीसदी से भी नीचे रह जाये तो इसको ‘सूखे’ के हालात कहते हैं। असल में हमने पानी को लेकर अपनी आदतें खराब कीं। जब कुएँ से रस्सी डाल कर पानी खींचना होता था या चापाकल चलाकर पानी भरना होता था तो जितनी जरूरत होती थी, उतना ही जल उलीचा जाता था। घर में टोंटी वाले नल लगने और उसके बाद बिजली या डीजल पम्प से चलने वाले ट्यूबवेल लगने के बाद तो एक गिलास पानी के लिये बटन दबाते ही दो बाल्टी पानी बर्बाद करने में हमारी आत्मा नहीं काँपती है।

हमारी परम्परा पानी की हर बूँद को स्थानीय स्तर पर सहेजने, नदियों के प्राकृतिक मार्ग में बाँध, रेत निकालने, मलबा डालने, कूड़ा मिलाने जैसी गतिविधियों से बचकर, पारम्परिक जल स्रोतों- तालाब, कुएँ, बावड़ी आदि के हालात सुधार कर, एक महीने की बारिश के साथ साल भर के पानी की कमी से जूझने की रही है। अब कस्बाई लोग बीस रुपए में एक लीटर पानी खरीद कर पीने में संकोच नहीं करते हैं तो समाज का बड़ा वर्ग पानी के अभाव में कई बार शौच व स्नान से भी वंचित रह जाता है।

सूखे के कारण ज़मीन के कड़े होने, या बंजर होने, खेती में सिंचाई की कमी, रोज़गार घटने व पलायन, मवेशियों के लिये चारे या पानी की कमी जैसे संकट उभरते हैं। यहाँ जानना जरूरी है कि भारत में औसतन 110 सेंटीमीटर बारिश होती है जो कि दुनिया के अधिकांश देशों से बहुत ज्यादा है।

यह बात दीगर है कि हम हमारे यहाँ बरसने वाले कुल पानी का महज 15 प्रतिशत ही संचित कर पाते हैं। शेष पानी नालियों, नदियों से होते हुए समुद्र में जाकर मिल जाता है और बेकार हो जाता है। गुजरात के जूनागढ़, भावनगर, अमेरली और राजकोट के 100 गाँवों ने पानी की आत्मनिर्भरता का गुर खुद ही सीखा।

विछियावाड़ा गाँव के लोगों ने डेढ़ लाख व कुछ दिन की मेहनत के साथ 12 रोक बाँध बनाए व एक ही बारिश में 300 एकड़ ज़मीन सींचने के लिये पर्याप्त पानी जुटा लिया। इतने में एक नलकूप भी नहीं लगता।

ऐसे ही प्रयोग मध्य प्रदेश में झाबुआ व देवास में भी हुए। यदि तलाशने चलें तो कर्नाटक से लेकर असम तक और बिहार से लेकर बस्तर तक ऐसे हजारों-हजार सफल प्रयोग सामने आ जाते हैं, जिनमें स्थानीय स्तर पर लोगों ने सुखाड़ को मात दी है। तो ऐसे छोटे प्रयास पूरे देश में करने में कहीं कोई दिक्कत तो होना नहीं चाहिए।

खेती या बागान की घड़ा प्रणाली हमारी परम्परा का वह पारसमणि है जो कम-से-कम बारिश में भी सोना उगा सकता है। बस जमीन में गहराई में मिट्टी का घड़ा दबाना होता है। उसके आसपास कम्पोस्ट, नीम की खाद आदि डाल दें तो बाग में खाद व रासायनिक दवा का खर्च बच जाता है।

घड़े का मुँह खुला ऊपर छोड़ देते हैं व उसमें पानी भर देते हैं। इस तरह एक घड़े के पानी से एक महीने तक पाँच पौधों को सहजता से नमी मिलती है। जबकि नहर या ट्यूबवेल से इतने के लिये सौ लीटर से कम पानी नहीं लगेगा। ऐसी ही कई पारम्परिक प्रणालियाँ हमारे लोक जीवन में उपलब्ध हैं और वे सभी कम पानी में शानदार जीवन के सूत्र हैं।

कम पानी के साथ बेहतर समाज का विकास कतई कठिन नहीं है, बस एक तो हर साल, हर महीने इस बात के लिये तैयारी करना होगा कि पानी की कमी है। दूसरा ग्रामीण अंचलों की अल्प वर्षा से जुड़ी परेशानियों के निराकरण के लिये सूखे का इन्तजार करने के बनिस्बत इसे नियमित कार्य मानना होगा।

कम पानी में उगने वाली फसलें, कम-से-कम रसायन का इस्तेमाल, पारम्परिक जल संरक्षण प्रणालियों को जिलाना, ग्राम स्तर पर विकास व खेती की योजना तैयार करना आदि ऐसे प्रयास है जो सूखे पर भारी पड़ेंगे।

सोमवार, 5 अक्टूबर 2015

Sea pollutin on alarm

धरती पर जीवन के लिए जरूरी है समुद्र को बचाना

पंकज चतुर्वेदी

उन दिनों इंसान के लिए समुद्र एक अनबुझ पहेली की तरह था । समुद्री यात्राएं मौत का पर्याय मानी जाती थीं और बहुत कम लोग महासागर की रोमांचक यात्रा कर जिंदा वापिस लौट पाते थे । आज मानव ने समुद्र की गहराईयों को बहुत हद तक नाप लिया  है । भौतिक सुखों का माध्यम बन गई हैं यह अथाह जल निधि । समुद्र केवल परिवहन या मछली का साधन नहीं रह गया, वहां से ईंधन, दवाई व बहुत कुछ प्राप्त किया जा रहा है। लेकिन इंसान के लिए भले ही यह उपलब्धि हो, लेकिन समुद्र के लिए तो यह अस्तित्व का खतरा बन रही है । आज जब पर्यावरण संरक्षण पर हर स्तर पर हल्ला-गुल्ला मचा हुआ है, ऐसे में  भी समुद्रों की अनूठी पारिस्थिती व्यवस्था के छिन्न-भिन्न होने पर कम ही चर्चा हो रही है ।
पृथ्वी के अधिकांष हिस्से पर कब्जा जमाए सागरों की विषालता व निर्मलता मानव जीवन को काफी हद तक प्रभावित करती है , हालांकि आम आदमी इस तथ्य से लगभग अनभिज्ञ है । जिस गृह ‘‘प्ृाृथ्वी ’’ पर हम रहते हैं, उसके मौसम और वातावरण में नियमित बदलाव का काफी कुछ दारोमदार समुद्र पर ही होता है । विष्व की बढ़ती जनसंख्या के लिए भोजन, रोजगार और उर्जा मुहैया करवाने का दारोमदार भी अब समुद्रों पर ही आ गया है । कहना अतिषियोक्ति नहीं होगा कि आने वाले दिनों में धरती पर जीवन का दारोमदार समुद्रों पर ही होगा । इसके बावजूद समुद्रों के दूशित होने के मसले को नदी या वायु प्रदूशण की तरह गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है ।
समुद्र वैज्ञानिक इस बात से चिंतित हैं कि सागर की निर्मल गहराईयां खाली बोतलों, केनों, अखबारों व षौच-पात्रों कें अंबार से पटती जा रही हैं । मछलियों के अंधाधुंध षिकार और मंूगा की चट्टानों की बेहिसाब तुड़ाई के चलते सागरों का पर्यावरण संतुलन गड़बड़ाता जा रहा है । धरती के बाष्ंिादे समुद्रों के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं । षहरों की गंदी नालियां, कचरा और कारखानों का अपषिश्ट सीधे ही समुद्रों में उड़ेला जा रहा है । आज समुद्र-प्रदूशण का 70 फीसदी धरती के निवासियों की लापरवाही के कारण है ।
यह आष्चर्यजनक लेकिन सत्य है कि गंदी नालियेों की सीमित मात्रा यदि समुद्र जल में मिले तो फायदेमंद है । घरों की निकासी में मौजूद नाईट्रेट और फास्फेट समुद्र को उपजाऊ बनाते हैं । इससे छोटे पौधों की पैदावार बढ़ती है और इससे मछलियों को बेहतरीन भोजन मिलता है । लेकिन यदि इन लवणों की मात्रा बढ़ जाए तो इससे समुद्र को खतरा बढ़ जाता है । छोटे पौधों की संख्या बढ़ने से जल की गहराई में काई की परत मोटी हो जाती है । फलस्वरूप सूर्य का प्रकाष भीतर तक नहीं जा पाता है और प्रकाष संष्लेशण की क्रिया या तो कम हो जाती है या फिर पूरी तरह रुक जाती है । साथ ही कार्बन डाय आक्साईड की अधिक मात्रा उत्सर्जित होने लगती है व इस प्रक्रिया में आक्सीजन का खर्च बढ़ जाता है ।  सनद रहे कि यह आक्सीजन पानी में घुली आक्सीजन से ही प्राप्त होती है । इस तरह एल्गी यानी काई नश्ट होने लगती है । निर्जीव एल्गी में वैक्टेरिया उत्पन्न हो जाते हैं व इससे पानी में सड़न पैदा हो जाती है । इस तरह पानी में प्राण वायु का स्तर बेहद कम हो जाता है और तभी वहां जल-जीव मरने लगते हें ।
ठीक यही हालत समुद्र में तेल रिसने पर होती है । खाड़ी देषों में लगातार युद्ध के चलते गत एक दषक में कई लाख गैलन तेल समुद्र में फैलता रहा है और इसका सीधा असर वहां के जीवों के जीवन पर पड़ा है ।  जब तटों के करीब की मछलियां षहरी प्रदूशण के कारण मरीं तो मछली मारने ककी बड़ी मषीनों ने गहराई में जाना षुरू कर दिया । अनुमान है कि हर साल 150,000 मीट्रिक टन प्लास्टिक के जाल व रस्सियां समु्रद में पड़ी रह जाती हैं और उसे खा कर लाखों व्हेल, सील व डाल्फीन जैसी मछलियां बेमौत मारी जाती है । भारत में तो गणेष या दुर्गा पूजा के बाद प्रतिमाओं के विसर्जन ने कई किलोमीटर तक समुद्र को जीव-विहीन बना दिया है ।
कारखानों से निकला दूशित मलवा सागरों के लिए बड़ा खतरा है । साथ ही समुद्र में बढ़ता यातायात भी वहां के पर्यावरण का दुष्मन बन गया है । समुद्री जहाजों से गिरने वाला तेल, पेट्रोलियम पदार्थ, कीटनाषक, विशैली गैसों के खाली सिलेंडर, औद्योगिक प्रषीतन जी आदि दिनों-दिन समुद्र के मिजाज को जहरीला बना रहे हैं । इस बढ़ते प्रदूशण के चलते समुद्र तटों, खाडि़यों, आदि में मछली पकड़ने वालेां पर विपरित असर पड़ रहा है । पानी के विशैला होने के कारण जलचर जीवों के विकास, वृद्धि, भोजन, ष्वसन क्रिया और उनमें रोगों से लड़ने की प्रतिरोधक क्षमता बुरी तरह प्रभावित हो रही है ।
भारत में पष्चिम के गुजराम से नीचे आते हुए कोकण, फिर मलाबार और कन्याकुमारी से ऊपर की ओर घूमते हुए कोरामंडल और आगे बंगाल के सुंदरबन तक ंकोई 5600 किलोमीटर सागर तट है। यहां नेषनल पार्क व सेंचुरी जैसे 33 संरक्षित क्षेत्र हैं। इनके तटों पर रहने वाले करोड़ों लोगों की आजीविका का साधन समुद्र से उपजह मछली व अन्य उत्पाद ही हैं । लेकिन विडंबना है कि हमारे समुद्री तटों का पर्यावरणीय संतुलन तेजी से गड़बड़ा रहा है।  मुंबई महानगर को कोई 40 किलोमीटर समुद्र तट का प्राकृतिक-आषीर्वाद मिला हुआ है, लेकिन इसके नैसर्गिग रूप से छेड़-छाड़ का ही परिणाम है कि यह वरदान अब महानगर के लिए आफत बन गया है। इस महानगर में कई ‘‘चैपाटियां’8 है जो कि पर्यावरणीय त्रासदी की वीभत्स उदाहरण हैं।  कफ परेड से गिरगांव चैपाटी तक कभी केवल सुनहरी रेत, चमकती चट्टानें और नारियल के पेड़ झूमते दिखते थे। कोई 75 साल पहले अंग्रेज षासकों ने वहां से पुराने बंगलों को हटा कर मरीन ड्राईव और बिजनेस सेंटर का निर्माण करवा दिया। उसके बाद तो मुंबई के समुद्री तट गंदगी, अतिक्रमण और बदबू के भंडार बन गए।  जुहू चैपाटी के छोटे से हिस्से और फौज के कब्जे वाले नवल चैपाटी(कोलाबा) के अलावा समूचा समुद्री किनारा कचरे व मलवे के ढेर में तब्दील हो गया है । तभी थेाड़ी साी बरसात या ज्वार-भाटाा में षहर कराहने लगता है।
देष की पर्यटन राजधानी कहलाने वाले गोवा के  कालानगुटे , बागा, अंजुना, बागटोर आदि चर्चित समुद्री तट पर्यटकों द्वारा फैंके गए कचरे से पट रहे हैं। षहर का कचरा भी लहरों के साथ किनारे पर आ जाता है और कीचड़ की गहरी परत छोड़ जाता है। चैन्ने के मरीना बीच के सौंदर्यीकरण पर तो खूब खरचा हो रहा है, लेकिन पर्यावरणीय छेड़छाड़ पर कोई रोक-टोक नहीं है। पुरी में हाईकोर्ट के सख्त आदेष के बावजूद समुद्र से 500 मीटर के दायरे में कई होटल बन गए हैं। समुद्र के किनारे बसे षहरों व होटलों से उत्सर्जित कचरे व अपषिश्टों के चलते जीवन-रेखा कहलाने वाले समुद्र तट बंजर और वीरान हो गए हैं । मछली पकड़ने के लिए बड़ी व षक्तिषाली मोटर बोटों की व्यवस्था करना बहुत कम मछुआरों के लिए ही संभव है । इस तरह समुद्री प्रदूशण लाखों लोगों के लिए रोजी-रोटी का संकट भी बन गया है । समुद्र तटों के संरक्षण के कई कानून हैं , कई अदालतों ने भी निर्देष दिए हैं; लेकिन इस दिषा में समाज से जिस जागरूकता की अपेक्षा है, उसका सर्वथा अभाव दिखता है ।

पंकज चतुर्वेदी
सहायक संपादक
नेषनल बुक ट्रस्ट इंडिया
 नेहरू भवन, वसंत कुंज इंस्टीट्यूषनल एरिया फेज-2
 वसंत कुंज, नई दिल्ली-110070
 संपर्क- 9891928376

HOW INDIA WILL REDUCE CARBON

बढ़ते कार्बन उत्सजर्न में हमारा आश्वासन
देश में कार्बन उत्सजर्न की मौजूदा मात्र को 33 से 35 फीसदी तक घटाने की चुनौती बहुत बड़ी है।


HINDUSTAN 5-10-15
भारत ने तो संयुक्त राष्ट्र को आश्वस्त कर दिया कि 2030 तक हमारा देश कार्बन उत्सर्जन की मौजूदा मात्र को 33 से 35 फीसदी घटा देगा। लेकिन असल समस्या उन देशों के साथ है, जो मशीनी विकास और आधुनिकीकरण के चक्क्र में पूरी दुनिया को कार्बन उत्सर्जन का दमघोंटू बक्सा बनाए दे रहे हैं। भारत में अब भी बड़ी संख्या में ऐसे परिवार हैं, जो खाना पकाने के लिए लकड़ी या कोयले के चूल्हे इस्तेमाल कर रहे हैं, सो अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां परंपरागत ईंधन के बहाने भारत पर दबाव बनाती हैं, जबकि विकसित देशों में कार्बन उत्सर्जन के अन्य कारण ज्यादा घातक हैं। वायुमंडल में सभी गैसों की मात्र तय है और 750 अरब टन कार्बन कार्बन डाई-ऑक्साइड के रूप में वातावरण में मौजूद है। कार्बन की मात्र बढ़ने के साथ ही धरती के गरम होने का खतरा बढ़ जाता है। दुनिया में अमेरिका सबसे ज्यादा 1,03,30,000 किलो टन कार्बन उत्सर्जित करता है, जो वहां की आबादी के अनुसार प्रति व्यक्ति 17.4 टन है। उसके बाद कनाडा प्रति व्यक्ति 15.7 टन, फिर रूस 12.6 टन। जापान, जर्मनी, दक्षिण कोरिया आदि औद्योगिक देशो में भी कार्बन उत्सर्जन 10 टन प्रति व्यक्ति से ज्यादा है। इनकी तुलना में भारत महज प्रति व्यक्ति 1.7 टन कार्बन उत्सर्जित करता है। अनुमान है कि यह 2030 तक तीन गुणा, यानी अधिकतम पांच टन तक जा सकता है। लेकिन भारत नदियों का देश है, वह भी अधिकांश ऐसी नदियां, जो पहाड़ों पर बर्फ के पिघलने से बनती हैं, सो हमें इसे हरसंभव कम करने के कदम उठाने ही होंगे।इसके लिए हमें एक तो स्वच्छ ईंधन को बढ़ावा देना होगा। हमारे देश में ईंधन गैस की कमी नहीं है। हां, इसे लोगों तक पहुंचाने का नेटवर्क बनाना और सबको गैस उपलब्ध करवाना बड़ी चुनौती है। कार्बन उत्सर्जन घटाने में सबसे बड़ी बाधा वाहनों की बढ़ती संख्या, मिलावटी पेट्रो पदार्थो की बिक्री, घटिया सड़कें व ऑटो पार्ट्स के अलावा यातायात जाम की समस्या है। कचरे का बढ़ता ढेर और उसके निपटान की माकूल व्यवस्था न होना भी एक बड़ी बाधा है। अभी तक यह मान्यता रही है कि पेड़ कार्बन डाई-ऑक्साइड को सोखकर ऑक्सीजन में बदलते रहते हैं। सो, जंगल बढ़ने से कार्बन का असर कम होगा। यह आंशिक तथ्य है। कार्बन डाई-ऑक्साइड पेड़ों की वृद्धि में भी सहायक होती है। लेकिन यह तभी संभव होता है, जब पेड़ों को नाइट्रोजन सहित सभी पोषक तत्व सही मात्र में मिलते रहें। खेतों में बेशुमार रसायनों के इस्तेमाल से बारिश का बहता पानी कई गैर-जरूरी तत्वों को लेकर जंगलों में पेड़ों तक पहुंचाता है और इससे वहां की जमीन में मौजूद नैसर्गिक तत्वों का गणित गड़बड़ा जाता है। ऐसी बहुत सारी समस्याएं हैं, जिनके समाधान हमें जल्द ही खोजने होंगे, संयुक्त राष्ट्र को हमने जो आश्वासन दिया है, उसे पूरा करने के लिए यह जरूरी है। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2015

communal riots drawback for development of country



दंगे देश को पीछे ढकेलते हैं

पंकज चतुर्वेदी


 सावधान ! हम पीछे की ओर लौट रहे हैं, ग्रेटर नोएडा का दादरी इलाका, जहां जमीन की कीमतें देश में सबसे ज्यादा हैं, जहां से देश का एकमाञ सुपर एक्सप्रेस वे गुजरता है, ठीक करीब ही फार्मूला 1 रेसिंग ट्रैक है, वहां बिसाहडा गांव में मंदिर के लाउड स्पीकर से एलान होता है कि दानिश मुसलमान ने गौ माता को मार डाला है और तीन चार सौ लोगों की भीड उसके घर पर हमला कर देती है, घर की हर चीज को खिडकी दरवाजे को तोडा जाता है, बुजुर्ग अखलाक को तब तक पीटा जाता है , जब तक उसके प्राण ना निकल गए, उसके 21 साल के बेटे दानिश ने अपने घर की पहली मंजिल के कमरे में छुपने की कोशशि की तो घर के उस हिस्से को भी तोडा गया, दानिश अस्पताल में जिंदगी मौत की लडाई लड रहा है, घर की औरतों का कहना है कि उनके यहां ईद का बकरे का गोश्त फ्रीज में रखा था।
यही नहीं पुलिस ने कुछ लोगों को पकडा और थाने ले आई तो लंपटों की भीड ने थाने पर हमला कर दिया, जिसमें एक डीएसपी व एक तहसीलदार भी घायल हुए, पुलिस वाले अपनी जान बचा कर भागते दिखे , उपद्रवियों ने कई वाहन फूंक डाले..... अभी तो जांच की जा रही है कि क्या वास्तव में दानिश के घर गाय का गोश्त था ? मंदिर से अफवाह फैला कर भडकाने वाले लोग कौन थे ? लेकिन जरा जरा सोचें कि सूचना, संचार , आर्थिक तौर पर इतने विकसित इलाकों में भी दंगों की फसल बाने के लिए इतने पुराने हथकंडे अपनाए जा रहे है और वे कारगर हो रहे हैं और 60 साल पहले की तरह पुलिस असफल हो रही है।
PRABHAT MEERUT, 4-10-15
मसला केवल बिसाहडा का ही नहीं है, एक सप्ताह से सुलग रहे रांची में भी बीती रात ठीक इसी तरह की अफवाहें फैलाई गई कि किसी मंदिर में गौ मांस है व वहां फिर दंगा भडक गया, ऐसा ही सफल प्रयास भागलपुर के जब्बरचक इलाके के एक धार्मिक स्थल से हुआ। सबसे ज्यादा चैंकाने वाला वाकिया तो उत्त्राखंड के कोटद्वार का है जहां एक मामूली से सडक हादसे को सांप्रदायिक रंग दे दिया गया, बदमाया किस्म के लेागों ने सब्जी फल की दुकानें लूटीं।
यह कुछ घटनाएं महज 24 घंटों के भीतर की हैं, ये घटनाएं अधिकांश उन इलाकों में हुई जहां सांप्रदायिक तनाव की घटनांए या तो बहुत कम होती हैं या फिर कई दशकों से वहां ऐसा हुआ नहीं था, ये सभी घटनाएं ऐसी हरकतों से शुरू हुई हैं जिनका उल्लेख आजादी के ठीक पहले सा उसके बाद सन 1955 तक तक मिलता रहा है
यह असहिष्णुता है, धार्मिकता है, कट्रटरता है या आपस में कम होता भरोसा या फिर कोई बहुत बडी साजिश,। यह बेहद गंभीर मसला है और ऐसी घटनाओं से देश की दुनिया में छबि खराब होती है व इसका विपरीत असर विकास पर भी पडता है। आज जब आटे-दाल के भाव लोगों का दिमाग घुमाए हुए हैं, बेराजगारों की कतार बढती जा रही है,  देश का आधा हिस्सा गंभीर सूखे की ओर बढ़ रहा है, ऐसे में धर्म-जाति, भोजन, वस्त्र, आस्था, पूजा पद्धति के नाम पर इंसान का इंसाने से भिड़ जाना व उसका खून कर देना, उस आईएसआईएस की हरकतों से कम नहीं है जो दुनिया में आतंक का राज चाहता है। विडंबना है कि प्रषासन के लिए यह महज कानून व्यवस्था का मसला होता है और नेताओं के लिए बयानबाजी व कीचड उछालने का जरिया, जबकि असल में यह नासूर बनती सामाजिक समस्या है जो देश की प्रगति के पैर में बेडि़यों की तरह है। अपने आसपास सतर्क भी रहें कि कहीं कोई ऐसी कुत्सित हरकत तो नहीं कर रहा है जिस व्यापार, धंधे, प्रापर्टी, मानव संसाधन और सबसे बड़ी बात भरोसे का निर्माण करने में इंसान व मुल्क को दशकों लगते हैं, उसे बर्बाद करने में पल भी लगता। महज कोई क्षणिक आक्रोश, विद्वेश या साजिश की आग में समूची मानवता और रिष्ते झुलस जाते हैं और पीछे रह जाती हैं संदेह, बदले और सियासती दांव पेंच की इबारतें। दो साल पहले पष्चिमी उत्त प्रदेश के चार जिलों में भउ़के भयावह दंगे की जांच की जस्टिस विष्णु सहाय आयोग की रपट के पूरे पन्ने अभी खुले नहीं हैं, लेकिन कहानी वही पुरानी है। दंगे भड़कने के दौरान कोई भी नेता, दल या संगठन अपने दल-बल के साथ सामने नहीं आया व लोगों को षांत करने में सक्रिय नहीं हुआ। जब पूरा बवंडर तबाही कर गया उसके बाद बयानवीर एक दूसरे पर कीचड़ उछालते दिखे। लेकिन इस सच को ना तो कोई आयोग और ना ही कोई जांच एजेंसी न्याय की चैखट तक ले जा पाएगी, क्योंकि हर बार की तरह इन दंगों का भी अपना अर्थषास्त्र है। 
आजादी के बाद सन 1964 में कलकत्ता, राऊरकेला और जमषेदपुर में कई दिनोतं क ख्ूनखराबा हुआ था, जिसमें 2000 से ज्यादा लोग मारे गए थे। जांच आयोग ने पाया था कि असल में दंगा भड़काने के पीछे शराब के ठेकों पर कब्जा करने वाली लाॅबी के निजी टकराव थे। मार्च-1968 में असम के करीम गंज में एक मुसलमान किसान की गाय एक हिंदू के खेत में घुस गई, आपसी झगड़ा इतना विकराल हो गया कि दंगे में 82 लोग मारे गए। अक्तूबर-1977 के बनारस दंगे में 36 जानें गई थीं व इसके पीछे का कारण एंग्लो-बंगाली कालेज के मैदान में जुलाहों द्वारा अपना तागा सुखाने का साधारण सा विवाद था।  मार्च-1978 में संभल के दंगे का कारण पदो स्मगलरों के गुटों का आपसी विवाद पाया गया था।  1984 में इंदिरा गांधी की हत्ष्या के बाद सिंख दंगों में तीन हजार से ज्यादा सिखों की जान और अरबों की संपत्ति नश्ट की गई थी। इसके लिए कईं जांच आयोग, कई विषेश दल गठित हुए, यदि कईं की गंभीरता से जांच करें तो यह संगठित अपराध, लूटपाट, राजनीति का घालमेल नजर आता है।
जरा याद करें 27 फरवरी 2002 को साबरमती एक्सप्रेस में 50 कार सेवकों (25 महिलाएं व 15 बच्चे) को जिंदा जला देने के बाद गुजरात के 25 में से 16 जिलों के 151 शहर और 993 गांवों में मुसलमानों पर योजनाबद्ध हमले हुए। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इन दंगों  में कुल 1044 लोग मारे गए, जिनमें 790 मुसलमान और 254 हिंदू थे। यहां व्यापारी वर्ग के डरपोक कहे जाने वाले बोहरोंके व्यवसाय-दुकानों का निशाना बना कर फूंका गया। मुसलमानों की होटलों, वाहनों को बाकायदा नक्षा बना कर नश्ट किया गया, बाद में पता चला कि असल खुन्नस तो व्यापारिक प्रतिद्वंदिता की थी, जिसे  सांप्रदायिक रंग दे दिया गया। यह बात ब और पुख्ता हो गई जब दंगों के बाद गुजरात के गांवों में मुसलमानेां की दुकानों से सामान ना खरीदन जैसे पर्चें बांटे गए। उत्तर प्रदेश में कई बार दंगों की वजह सरकारी संपत्ति पर कब्जा कर रही है। अभी 2014 में सहारनपुर में सिखों व मुसलमानेां के बीच हुए तनाव का असली कारण सरकारी जमीन पर धार्मिक स्थल के नाम पर कब्जा करने की साजिश के तौर पर सामने आया था।

यह तथ्य भी गौरतलब है कि भारत में हिंदू-मुस्लिम जबकों की 1200 साल की सहयात्रा में दंगों का अतीत तो पुराना है नहीं। कहा जाता है कि अहमदाबाद में सन् 1714, 1715, 1716 और 1750 में हिंदू मुसलमानों के बीच झगड़े हुए थे। उसके बाद 1923-26 के बीच कुछ जगहों पर मामूली तनाव हुए । सन् 1931 में कानपुर का दंगा भयानक था, जिसमें गणेश शंकर विद्यार्थी की जान चली गई थी। दंगें क्यों होते हैं? इस विशय पर प्रो. विपिन चंद्रा, असगर अली इंजीनियर से ले कर सरकार द्वारा बैठाए गए 100 से ज्यादा जांच आयोगों की रिपोर्ट तक साक्षी है कि झगड़े ना तो हिंदुत्व के थे ना ही सुन्नत के। कहीं जमीनों पर कब्जे की गाथा है तो कहीं वोट बैंक तो कहीं नाजायज संबंध तो कहीं गैरकानूनी धंधे।
सन् 1931 में कानपुर में हुए दंगों के बाद कांग्रेस ने छह सदस्यों का एक जांच दल गठित किया था। सन् 1933 में जब इस जांच दल की रिपोर्ट सार्वजनिक की जानी थी तो तत्कालीन ब्रितानी सरकार ने उस पर पाबंदी लगा दी थी। उस रिपोर्ट में बताया गया था कि सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और राजनीतिक विविधताओं के बावजूद सदियों से ये दोनों समाज दुर्लभ सांस्कृतिक संयोग प्रस्तुत करते आए हैं। उस रिपोर्ट में दोनों संप्रदायों के बीच तनाव को जड़ से समाप्त करने के उपायों को तीन वर्गों में विभाजित किया गया था -धार्मिक-शैक्षिक, राजनीतिक-आर्थिक और सामाजिक। उस समय तो अंग्रेजी सरकार ने अपनी कुर्सी हिलती देख इस रिपोर्ट पर पाबंदी लगाई थी। आज कतिपय राजनेता अपनी सियासती दांवपेंच को साधने के लिए उस प्रासंगिक रिपोर्ट को भुला चुके हैं। मुंबई दंगों की श्रीकृश्ण आयोग की रपट का जिन्न तो कोई भी सरकार बोतल से बाहर नहीं लाना चाहती।
मुसलमान ना तो नौकरियों में है ना ही औद्योगिक घरानों में, हां हस्तकला में उनका दबदबा जरूर है। लेकिन विडंबना है कि यह हुनरमंद अधिकांश जगह मजदूर ही हैं। यदि देश में दंगों को देखें तो पाएंगे कि प्रत्येक फसाद मुसलमानों के मुंह का निवाला छीनने वाला रहा है। भागलपुर में बुनकर, भिवंडी में पावरलूम, जबलपुर में बीडी, मुरादाबाद में पीतल, अलीगढ़ में ताले, मेरठ में हथकरघा..., जहां कहीं दंगे हुए मजदूरों के घर जलें, उनमे कुटीर उद्योग चैपट हुए। एस. गोपाल की पुस्तक ‘‘द एनोटोमी आॅफ द कन्फ्रंटेशन’’ में अमिया बागछी का लेखन इस कटु सत्य को उजागर करता है कि सांप्रदायिक दंगे मुसलमानों की एक बड़ी तादाद को उन मामूली धंधों से भी उजाड़ रहे हैं जो उनके जीवनयापन का एकमात्रा सहारा है। (प्रिडेटरी कर्मशलाईजेशन एंड कम्यूनिज्म इन इंडिया)। गुजरात में दंगों के दौरान मुसलमानों की दुकानों को आग लगाना, उनका आर्थिक बहिष्कार आदि गवाह है कि दंगे मुसलमानों की आर्थिक गिरावट का सबसे कारण है। यह जान लें कि उ.प्र. में मुसलमानों के पास सबसे ज्यादा व सबसे उपजाऊ जमीन  और दुधारू मवेषी पष्चिमी उत्तर प्रदेश में ही हैं। इस बार का दंगा मुसलमानेां को इस पुष्तैनी धंधे से मरहूम करने की बड़ी साजिश  दिखता है।
दंगे मानवता के नाम पर कलंक हैं। धर्म, भाषा, मान्यताओं, रंग जैसी विशमताओं के साथ मत-विभाजन होना स्वाभाविक है। लेकिन जब सरकार व पुलिस में बैठा एक वर्ग खुद सांप्रदायिक हो जाता है तो उसकी सीधी मार निरपराध, गरीब और अशिक्षित वर्ग पर पड़ती है। यही हमारे देश में होता है फिर सवाल केवल मुसलमान से ही क्यों पूछा जाता है?
एक बारगी लगता हो कि दंगे महज किसी कौम या फिरके को नुकसान पहुंचाते हैं, असल में इससे नुकसान पूरे देश के विकास, विष्वास और व्यवसाय को होता है। आज जरूरत इस बात की है कि दंगों के असली कारण, साजिश को सामने लाया जाए तथा मैदान में लड़ने वालों की जगह उन लेागों को कानून का कड़ा पाठ पढ़ाया जाए जो घर में बैठ कर अपने निजी स्वार्थ के चलते लोगों को भड़काते हैं व देश के विकास को पटरी से नीचे लुढकाते हैं।


गुरुवार, 1 अक्टूबर 2015

Remembering words of Gandhi


गांधी के विचारों पर कुठाराघात


1यह बात अलग-अलग मंचों पर-अवसरों पर, राजनेता व स्वयंसेवी लगातार कहते हैं कि गांधी एक व्यक्ति या नाम नहीं, बल्कि जीवन जीने का सिद्धांत है । फिर भी गांधीजी की एक भी समझाइश पर क्रियान्वयन से परहेज किया जाता रहा है। यह बात भी अब खुल कर सामने आ गई है कि अपने आखिरी दिनों में गांधी खुद को उपेक्षित व विरक्त महसूस कर रहे थे। तन्हा गांधी की आत्मा अपने महाप्रयाण के समय तब के सत्ता-शिखरों से बेहद निराश थी। उन्हें लग रहा था कि जिन मूल्यों के लिए वे संघर्ष कर रहे थे वे असल में आम लोगों तक पहुंचे ही नहीं। जिस अहिंसा के नारे को उनहोंने आजादी का मूल मंत्र बनाया था, वह आजादी मिलते ही काफूर हो गया था, विभाजन की घोषणा होते ही पूरे देश में हुआ कत्लेआम इसकी बानगी था। जाहिर है कि गांधीजी को उस समय समझ आ गया था कि उनके अहिंसा, व दीगर संदेश नारे से ज्यादा नहीं हैं। तभी से एक हताश गांधी को हर साल उनके जन्म दिवस पर बार-बार शहीद किया जाता है। ‘‘भारत को आजादी मिल गई, कांग्रेस का काम पूरा हो गया।
अब इसकी जरूरत नहीं है, इसे समाप्त कर देना ही ठीक है। हमारी कांग्रेस सत्ता की भांति हथियारों के बल पर कायम नहीं रह सकेगी। कांगे्रस ने जनता का विश्वास अपने त्याग, और तप के आधार पर संपादित किया है। पर यदि कांगे्रस जनता की सेवक न बन कर उसकी अधीश्वर बने, अथवा मालिक का दर्जा अपना ले तो मैं अपने अनेक वर्षों के अनुभव के आधार पर भविष्यवाणी कर सकता हूं, चाहे मैं जीवित रहूं या न रहूं, एक क्रांति देश में फैल जाएगी और लोग सफेद टोपी वालों का चुन-चुन कर सफाया कर देंगें। उसका फायदा एक तीसरी शक्ति उठाएगी।’’ आजादी के कुछ दिन पहले ही 21 मई 1947 को महात्मा गांधी ने पटना में एक जनसभा को संबोधित करते हुए कोई छह दशक बाद के भारत के हालात का अंदाजा लगा लिया था। कांग्रेस, देश और जनता आज कुछ वैसे ही हालात से रूबरू हैं, जिसकी आशंका गांधी जी को थी। वैसे तो गांधी के शरीर को 30 जनवरी 1948 को गोडसे ने एक ही बार मारा था, लेकिन उसके बाद तो उनकी आत्मा व विचारों की हत्या का दौर शुरू हो गया है। दूरदर्शी गांधी ने कई दशक पहले ही अंदाजा लगा लिया था कि आजाद हिंदुस्तान को धर्म और जाति के नाम पर विवाद झेलने पड़ेंगे। 11 मई 1935 के ‘हरिजन’ के अंक में उनहोंने धार्मिक संकीर्णता पर कुठाराघात करते हुए एक आलेख लिखा था। ‘यदि मेरे हाथ में सत्ता होती और मैं कानून बना सकता तो मैं धर्म परिवर्तन पर रोक लगा देता’। गांधी की विरासत के असली हकदार होने का दावा करने वालों के हाथों सत्ता व कानून की डोर लगभग 50 सालों से है। केंद्र में एक भी सरकार ऐसी नहीं बनी, जिसने राजघाट पर जा कर बापू के संकल्प नहीं दोहराए हों। परंतु पूरे देश में धर्म परिवर्तन धड़ल्ले से हो रहा है और इसके विषम परिणाम जनजातीय इलाकों में सामने भी आ रहे हैं। राजनेता का धर्म जनसेवा होता है, जब वही धर्म परिवर्तन का व्यवसाय करने को उतारू है तो उससे गांधी की आत्मा को सहेजने की क्या उम्मीद की जाए। गांधीजी को गिनी- चुनी चीजों से नफरत थी, उनमें सबसे ऊपर शराब का नाम था। ‘यंग इंडिया’ के 03 मार्च 1927 के अंक में उनहोंने एक लेख में उल्लेख किया था कि शराब और अन्य मादक द्रव्यों से होने वाली हानि कई अंशों में मलेरिया आदि बीमारियों सें होने वाली हानियों से असंख्य गुना ज्यादा है। कारण, बीमारियों से तो केवल शरीर को ही हानि पहुंचती है, जबकि शराब आदि से शरीर और आत्मा दोनों का ही नाश होता है। ‘यंग इंडिया’ के ही 15 सितंबर 1927 अंक में गांधीजी ने मदिरापान पर एक कड़ी टिप्पणी कर इस दिशा में अपनी मंशा जताई थी, ‘मैं भारत का गरीब होना पसंद करूंगा, लेकिन मैं यह नहीं बर्दाश्त करूंगा कि हजारों लोग शराबी हों। अगर भारत में शराब पांबदी जारी रखने के लिए लोगों को शिक्षा देना बंद करना पड़े तो कोई परवाह नहीं। मैं यह कीमत चुका कर भी शराबखोरी बंद करूंगा।’ राजघाट पर फूल चढ़ाते समय हमारे ‘भारत भाग्य विधाता’ क्या कभी गांधी के इस संकल्प को याद करने का प्रयास करते हैं? आज हर सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं के संचालन के लिए धन जुटाने में शराब से आ रहा राजस्व बड़ी मात्रा में है। पंजाब में अधिक शराब बेच कर किसानों को मुμत बिजली-पानी देने की घोषणाओं में किसी को शर्म नहीं आई। हरियाणा में शराबबंदी को समाप्त करना चुनावी मुद्दा बना था। केरल में शराब बंदी को सुप्रीम कोर्ट तक ले जाने वाले कई राजनेता ही है। दिल्ली में घर-घर तक शराब पहुंचाने की योजनाओं में सरकार यूरोप की नकल कर रही है। उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश के कई राजनेता शराब के ठेकों से परोक्ष-अपरोक्ष जुड़े हैं। यही नहीं भारत सरकार के विदेश महकमे बाकायदा सरकारी तौर पर शराब-पार्टी देते हैं। ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ की 46वीं वर्षगांठ पर दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में संपन्न समारोह में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने बड़े साफ मन से स्वीकार किया था कि गांधीजी के सिद्धांतों पर अमल न करके सरकार ने गलती की है। हम उस गलती को सुधारेंगे।’ लेकिन उसके बाद उनकी सरकार चली नहीं। वैसे तो इस बात पर भी शक है कि उस समारोह के बाद वहां बैठे किसी नीति निर्धारक को राजीवजी के ऐसे संकल्प की याद भी रही हो। हां, हर साल बदलती सरकारें गांधी के एक-एक सपने को चूर जरूर करती रहीं । खादी या कुटीर उद्योग की बात हो या शिक्षा या स्वाबलंबन की या फिर अनुसूचित जाति के लोगों के कल्याण या अल्पसंख्यकों को भयमुक्त माहौल देने की नीति, गांधी कहीं बिसूरता सा रहा। महात्मा गांधी ने भारतीय परिवेश में रोजगारोन्मुखी शिक्षा का खाका तैयार किया था, ताकि गांव का पढ़ा-लिखा तबका रोजगार के लिए शहर की ओर पलायन न करे। लेकिन आज की समूची शिक्षा प्रणाली शहरी तड़क-भड़क की ओर आकर्षित करती सी प्रतीत होती है। पठन-पाठन का मूल आधार होता है उसका भाषा माध्यम। गांधीजी हिंदी व अन्य भारतीय भाषाओं में शिक्षा व अन्य कामकाज के कट्टर समर्थक थे। देश की आजादी के बाद उन्होंने ‘हरिजन सेवक’ (21.09.1947) में एक आलेख में इस विषय पर अपनी स्पष्ट टिप्पणी की थी : ‘मेरा मतलब यह है कि जिस तरह हमारी आजादी को जबरदस्ती छीनने वाले अंग्रेजों की सियासी हुकुमत को हमनें सफलतापूर्वक इस देश से निकाल दिया, उसी तरह हमारी संस्कृति को दबाने वाली अंग्रेजी भाशा को भी हमें यहां से निकाल देना चाहिए।’ कैसी विडंबना है कि गांधी के देश में अंग्रेजी ना केवल दिन दुगना-रात चैगुना प्रगति कर रही है, बल्कि संसद, सुप्रीम कोर्ट और सभी बड़े दμतरों में आधिकारिक भाषा अंग्रेजी ही है। यही नहीं अब तो हमारे देश में ऐसे बुद्धिजीवियों की जमात खड़ी हो रही है, जो कि अंग्रेजी को विदेशी भाषा ही नहीं मानते हैं। गांधी के सच्चे भक्तों की सरकारें अब स्कूली स्तर पर सरकारी स्कूलों में भी अंग्रेजी को अनिवार्य बना रही हैं। दिल्ली दुनिया के सबसे अधिक प्रदूषित नगरों में से है। यहां की सबसे बड़ी सड़क (रिंग रोड) को महात्मा गांधी का नाम दिया गया है, यह जानते हुए भी कि यह सबसे दूषित इलाकों में से एक है। इतनी बड़ी सड़क को गांधी का नाम देकर नेताओं ने सोचा कि वे गांधी को सम्मानित कर रहे हैं। ठीक उसी तरह गांधी के सिद्धांतों और मान्यताओं की समाधियों पर फूल चढ़ा कर उनकी आंख का पानी नहीं मर रहा है। न्यायमूर्ति कुदाल आयोग की रिपोर्ट में तो देश की गांधीवादी संस्थाओं को विभिन्न अनियमितताओं व कानून-विरोधी कृत्यों का अड्डा बताया गया था। कांग्रेस के प्रति गांधी की भविष्यवाणी आज सत्य होती दिखती है। दूसरे मामलों में भी लोगों को अब संभल जाना चाहिए, वरना गांधी का नाम तो उनके महान कार्यों के कारण सदैव याद रख जाएगा, पर साथ में यह भी भुलाया नहीं जा सकेगा कि उस संत की शिक्षाओं को न मानकर हमने क्या खो दिया है

The right to a dignified farewell and a new standard in medical world

  गरिमापूर्ण विदाई का अधिकार और चिकित्सा की नई मर्यादा पंकज चतुर्वेदी लगभग  12 साल असीम और अव्यक्त पीड़ा के साथ  जीवन जी रहे हरीश राणा अं...