My writings can be read here मेरे लेख मेरे विचार, Awarded By ABP News As best Blogger Award-2014 एबीपी न्‍यूज द्वारा हिंदी दिवस पर पर श्रेष्‍ठ ब्‍लाॅग के पुरस्‍कार से सम्‍मानित

बुधवार, 8 जून 2016

Drought has adverse effect on live stock of bundelkhand

भयंकर सूखे से बेहाल मवेशियों के प्रति बेपरवाही 


भीषण सूखे से बेहाल बुंदेलखंड का एक जिला है छतरपुर। यहां सरकारी रिकार्ड में 10 लाख 32 हजार चैापाए दर्ज हैं जिनमें से सात लाख से यादा तो गाय-भैंस ही हैं। तीन लाख के लगभग बकरियां हैं। चूंकि बारिश न होने के कारण कहीं घास तो बची नहीं है सो अनुमान है कि इन मवेशियों के लिए हर महीने 67 लाख टन भूसे की जरूरत है। इनके लिए पीने के पानी की व्यवस्था का गणित अलग ही है। यह केवल एक जिले का हाल नहीं है, दो रायों में विस्तारित समूचे बुंदेलखंड के 12 जिलों में दूध देने वाले चौपायों के हालात भूख-प्यास व कोताही के हैं। आए रोज गांव-गांव में कई-कई दिन से चारा न मिलने या पानी न मिलने या फिर इसके कारण भड़क कर हाईवे पर आने से होनें वाली दुर्घटनाओं के चलते मवेशी मर रहे हैं। आने वाले गर्मी के दिन और भी बदतर होंगे क्योंकि तापमान भी बढ़ेगा।
एक स्वयंसेवी संस्था ने पल्स पोलियो व कई ऐसी ही सरकारी संस्थाओं के आंकड़ों का विश्लेषण किया तो पाया कि बीते एक दशक में मप्र व उप्र के बुंदेलखंड के 13 जिलों से 63 लाख से यादा लेाग रोजगार व पानी की कमी से हताश हो कर अपने घर-गांव छोड़ कर सुदूर नगरों को पलायन कर चुके हैं। सूखे की वजह से लोग काम की तलाश में शहरों की ओर भाग रहे हैं व गांव के गांव खाली हो गए हैं। गांवों में रह गए हैं बुजुर्ग या कमजोर। यहां भी किसान आत्महत्याओं की खबरें लगातार आ रही हैं। मवेशी चारे और पानी के अभाव में दम तोड़ रहे हैं।
बुंदेलखंड की मशहूर ‘‘अन्ना प्रथा’’ यानी लोगों ने अपने मवेशियों को खुला छोड़ दिया हैं क्योंकि चारे व पानी की व्यवस्था वह नहीं कर सकते। सैकड़ों गायों ने अपना बसेरा सड़कों पर बना लिया। मोटा अनुमान है कि हर दिन प्रत्येक गांव में लगभग 10 से 100 तक मवेशी खाना-पानी के अभाव में दम तोड़ रहे हैं। पूरे बुंदेलखंड में दस हजार से कुछ यादा गांव आते हैं। इनमें कई सड़क दुर्घटना में मारी जाती हैं और कई चारे और पानी के अभाव में कमजोर होकर मर रही हैं। किसानों के लिए यह परेशानी का सबब बनी हुई हैं क्योंकि उनकी फसलों को मवेशियों का झुंड चट कर जाता है। वैसे तो बुंदेलखंड सदियों से तीन साल में एक बार अल्प वर्षा का शिकार रहा है। यहां से रोजगार के लिए पलायन की परंपरा भी एक सदी से यादा पुरानी है, लेकिन दुधारू मवेशियों को मजबूरी में छुट्टा छोड़े देने का रोग अभी कुछ दशक से ही है।
‘‘अन्ना प्रथा’’ यानि दूध ना देने वाले मवेशी को आवारा छोड़ देने के चलते यहां खेत व इंसान दोनों पर संकट है। उरई, झांसी आदि जिलों में कई ऐसे किसान हैं जिनके पास अपने जल साधन हैं लेकिन वे अन्ना पशुओं के कारण बुवाई नहीं कर पाए। जब फसल कुछ हरी होती है तो अचानक ही हजारों अन्ना गायों का रेवड़ आता है व फसल चट कर जाता है। यदि गाय को मारो तो धर्म-रक्षक खड़े हो जाते हैं और खदेड़ों तो बगल के खेत वाला बंदूक निकाल लेता है। गाय को बेच दो तो उसके व्यापारी को रास्ते में कहीं भी गायरक्षकों द्वारा पिटाई का डर। दोनों ही हालात में खून बहता है और कुछ पैसे के लिए खेत बोने वाले किसान को पुलिस-कोतवाली के चक्कर लगाने पड़ते हैं। यह बानगी है कि बुंदेलखंड में एक करोड़ से यादा चौपाये किस तरह मुसीबत बन रहे हैं और साथ ही उनका पेट भरना भी मुसीबत बन गया है।
पिछली सरकार के दौरान जारी किए गए विशेष बुंदेलखंड पैकेज में दो करोड़ रुपये का प्रावधान महज ‘‘अन्ना प्रथा’’ रोकने के लिए आम लोगों में जागरूकता फैलाने के लिए था। अल्प वर्षा के कारण खेती न होने से हताश किसानों को दुधारू मवेशी पालने के लिए प्रोत्साहत करने के लिए भी सौ करोड़ का प्रावधान था। दो करोड़ में कभी कुछ पर्चे जरूर बंटे थे, लेकिन सौ करोड़ में जिन लोगों ने मवेशी पालने का विकल्प चुना वे भयंकर सूखे में जानवर के लिए चारा-पानी न होने से परेशान हैं। यहां जानना जरूरी है कि अभी चार दशक पहले तक बुंदेलखंड के हर गांव में चारागाह की जमीन होती थी। शायद ही कोई ऐसा गांव या मजरा होगा जहां कम से कम एक तालाब और कई कुएं नहीं हों। जंगल का फैलाव पचास फीसदी तक था। आधुनिकता की आंधी में बह कर लोगों ने चारागाह को अपना ‘चारागाह’ बना लिया व हड़प गए। तालाबों की जमीन समतल कर या फिर घर की नाली व गंदगी उसमें गिरा कर उनका अस्तित्व खत्म कर दिया। हैंड पंप या ट्यूबवेल की मृगमरिचिका में कुओं को बिसरा दिया। जंगलों की ऐसी कटाई हुई कि अब बुंदेलखंड में अंतिम संस्कार के लिए लकड़ी नहीं बची है व वन विभाग के डिपो तीन सौ किलोमीटर दूर से लकड़ी मंगवा रहे हैं। जो कुछ जंगल बचे हैं वहां मवेशी के चरने पर रोक है। कुल मिला कर देखें तो बुंदेलखंड के बाशिंदों ने खुद ही अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारी और अब इसका खामियाजा इंसान ही नहीं, मवेशी भी भुगत रहे हैं।
कुछ स्थानों पर समाज ने गौशालाएं भी खोली हैं लेकिन एक जिले में दो हजार से यादा गाय पालने की क्षमता इन गौशालाओं में नहीं है। तभी इन दिनों बुंदेलखंड के किसी भी हाईवे पर चले जाएं हजारों गायें सड़क पर बैठी मिलेंगी। यदि किसी वाहन की इन गायों से टक्कर हो जाए तो हर गांव में कुछ धर्म के ठेकेदार भी मिलेंगे जो तोड़-फोड़ व वसूली करते हैं, लेकिन इन गाय के मालिकों को इन्हें अपने ही घर में रखने के लिए प्रेरित करने वाले एक भी नहीं मिलेंगे।
यह मामला अकेले गांव-कस्बे में रहने वाले मवेशियों तक ही नहीं है, जंगल में रहने वाले जानवरों पर इसका प्रभाव बहुत ही खतरनाक हो रहा है। हालांकि अब बुंदेलखंड में जंगल बहुत कम बचे हैं, लेकिन पन्ना राष्ट्रीय पार्क जैसे जंगल जहां शेर, हिरण सहित कई जानवर पर्याप्त, संख्या में हैं, इस सूखे के कारण वहां ‘‘जंगल राज’’ होना तय है। पानी व चारे के लिए हिरण जैसे जानवर बस्ती की ओर आ रहे हैं और मारे जा रहे हैं, वहीं खाने की कमी के चलते शेर बस्ती की ओर मवेशियों पर घात लगा रहे हैं। नील गाय रहे-बचे खेतों को उजाड़ रही हैं तो बंदर जैसे जानवरों ने शहरों की ओर रूख कर लिया है। विडंबना है कि सरकार के पास इन हालातों से निबटने की कोई योजना है ही नहीं। सनद रहे कुछ साल पहले खजुराहो के एक तालाब में पानी के लिए परेशान मगरमछ भटक कर पहुंच गया था।
उम्मीद है कि एक महीने में बारिश हो जाएगी। लोगों को मुआवजा, राहत कार्य या ऐसे ही नाम पर राशि बांटी जाएगी, लेकिन देश व समाज के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले पशु-धन को सहेजने के प्रति शायद ही किसी का ध्यान जाए। बुंदेलखंड में जीवकोपार्जन का एकमात्र जरिया खेती ही है और मवेशी पालन इसका सहायक व्यवसाय। यह जान लें कि एक करोड़ से यादा संख्या का पशु धन तैयार करने में कई साल व कई अरब की रकम लगेगी, लेकिन उनके चारा-पानी की व्यवस्था के लिए कुछ करोड़ ही काफी होंगें। हो सकता है कि इस पर भी कुछ कागजी घोड़े दौड़े लेकिन जब तक ऐसी योजनाओं की क्रियान्वयन एजेंसी में संवेदनशील लोग नहीं होंगे, मवेशी का चारा इंसान के उदरस्थ ही होगा।

मंगलवार, 7 जून 2016

NSG will be important for India to be world Power

विश्व शक्ति बनने के लिए जरूरी है एसएसजी सदस्यता

                                                                   पंकज चतुर्वेदी
दुनियाभर के 48 देशेां के समूह ‘परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह’ (एनएसजी) की सदस्यता के लिए बीते सात साल से प्रयासरत भारत को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की स्वीटजरलैंड यात्रा के दौरान मिले समर्थन से नई उम्मीद जागी है। यह बात भी किसी से छिपी नहीं रह गई है कि जहां अमेरिका इस मसले पर भारत के साथ है तो चीन इस पर खुलेआम विरोध कर रहा है। सनद रहे कि परमाणु उर्जा के जरिये बिजल उत्पादन कर जिस तरह देश-दुनिया को रोशन कि जा सकता है, इस तकनीक के थेाड़ा सा बदलाव कर बनाए गए बंम से यह खूबसूरत दुनिया तबाह भी हो सकती है। चूंकि भारत के पड़ोस में पाकिस्तान ऐसा देश है जिसके पास परमाणु बम बनाने की क्षमता भी है और वहां आतंकवादी व सेना दोनों के पास हर समय इतनी क्षमता रहती है कि वह लोकतांत्रिक तरीके से निर्वाचित सरकार को ही पलट दें सो जाहिर है कि पाकिस्तान का परमाणु बम सुरक्षित हाथों में हैं नहीं व इसका सीधा असर भारत पर होता हे। इसी के चलते भारत ने अभी तक अंतरराष्ट्रीय परमाणु अप्रसार संधि पर दस्तखत किए नहीं हैं। और फं्रास की बानगी तो सामने है ही कि बगैर अप्रसार संधि पर दस्तखत किए एनएसजी का सदस्य बना जा सकता है।
आगामी नौ जून से दस जून तक एनएसजी की अहम बैठक है, जिसमें भारत की सदस्यता के लिए किए गए आवेदन पर विचार हो सकता है। इसके बाद 24 जून को सिओल में एनएसजी प्लेनरी की बैठक होनी है। इस बैठक में एजेंडे पर चर्चा हो सकती है। जानना जरूरी है कि इस समूह में नए सदस्य के प्रवेश के लिए पुराने सभी सदस्यों की बहुमत से सम्मित होना जरूरी है। गत 25-26 अप्रैल को ही एनएसजी सदस्यता  के लिए भारत ने आधिकारिक तौर पर एक प्रस्तुति दी थी जिसमें बताया गया था कि किस तरह भारत परमाणु उर्जा का गैरसैन्य उपयोग के लिए प्रतिबद्ध है तथा देश की बढ़ती उर्जा की जरूरत की पूर्ति के लिए उसे परमाणु बिजली घर के लिए कच्चा माल क्यों चाहिए। यह साजिश थी कि इत्तेफाक पाकिस्तान की प्रस्तुति ठीक भारत की ही तरह थी।
सन 1970 में दुनिया में शंाति व परमाणु युद्ध को रोकने के इरादे से परमाणु अप्रसार संधि प्रारंभ हुई थी जिस पर अभीतक 187 देशों ने सहमति जताई है। इसके तहत देश भविष्य में परमाणु हथियार विकसित नहीं कर सकते, बस गैरसैन्य उद्देश्यों से ही परमाणु उर्जा का इस्तेमाल कर सकते हैं। इसी के तहत सन 1974 में एनएसजी की स्थापना हुइ थी। ठीक तभी भारत ने पोकरण में धमाका कर दुनिया को चौंका दिया था। जिसके बाद एनएसजी ने भारत को परमाणु सामाग्री की आपूर्ति पर रोक लगा दी थी। फिर मनमोहन सिंह सरकार ने अेमरिका से अपने अच्छे रिश्तों को स्थापित किया और 2005-06 में एनएसजी ने भारत के लिए परमाणु व्यापार के रास्ते खोले थे। लेकिन स्थाई सदस्यता के रास्ते ंमे चीन के साथ-साथ आयरलैंउ, मेक्सिको, स्वीटजरलैंड जैसे देश भी आड़े आते रहे हैं जोकि विश्व शंाति व परमाणु अप्रसार के प्रति बेहद संवेदनशील हैं। इसी साल 24 मई को भारत के राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने अपनी चीन यात्रा के दौरान राष्ट्रपति शी जिनपिंग के सामने यह मसला उठाया था । चीन ने इस पर कोई खास ध्यान नहीं दिया था व कहा था कि भविष्य में इस पर बात करेंगे। ऐसे में स्वीटजरलैंड का समर्थन मायने तो रखता है लेकिन रास्ता इतना सरल नहीं होगा। हालाँकि, एनएसजी की सदस्यता के लिए जो शर्ते होंगी उसको भारत को मंजूर करना होगा, जैसेकि परमाणु परीक्षण न करना आदि । भले ही चीन पाकिस्तान का समर्थन कर रहा हो लेकिन एनएसजी में पाकिस्तान का प्रवेश लगभग असंभव है । सनद रहे कि वहां के सबसे बड़े परमाणु वैज्ञानिक कादिर खां पर तकनीक चोरी व अवैध तरीके से दूसरे देशेां - नार्थ कोरिया व इरान को बेचने जैसे आरोप लग चुके है।।
असल में भारत के पास अपना यूरेनियम का भ्ंाडार है लेकिन उसको परमाणु भट्टी के र्लिए इंधन में बदलने की तकनीक हो या फिर अतिरिक्त यूरेनियम को दूसरे देशेां को बेचने का अधिकार या फिर परमाणु कचरे के निस्तारण के उपाय, यह सबकुछ हमें तभी हांसिल हो सकता है जब हम एनएसजी के सदस्य हों। एनएसजी की सदस्यता मिलने से भारत के लिए परमाणु ऊर्जा के लिए उच्च तकनीक हासिल करने के रास्ते खुल जाएंगे क्योंकि एनएसजी सदस्य के देशों का इन तकनीक के हस्तांतरण पर नियंत्रण रहता है। चूंकि भारत ने परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर करने से इंकार कर दिया था, अतः एनजीटी में उसकी सदस्यता खटाई में पड़ी रही है। हालांकि सन 2008 के भारत-अमेरिका के बीच हुए अनुबंध ने दुनिया की कई ऐसी चिंताओं का निवारण कर दिया है जिससे भारत के द्वारा परमाणु बम के इस्तेमाल की संभावना होती। बताया जाता है कि भारत-अमेरिका के बीच हुई संधि में लगभग सभी अप्रसार वाली शर्तों को रखा गया था और इसी लिए आज अमेरिका भारत का सहयोग व समर्थन भी कर रहा है। सनद रहे कि भारत यदि अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर करता है तो उसे अपने लंबी दूरी मिसाईल कार्यक्रम और यूरेनियम परिशोधन परियोजनओं को बंद करना होगा। लेकिन पाकिस्तान व चीन जैसे पड़ोसी होने के कारण यह पाबंदी उसकी पुख्ता सुरक्षा व्यवस्था ेमं सेंध की तरह है। यदि इस बार भारत की कूटनीति सफल रहती है तो उर्जा के क्षेत्र में भारत की जरूरतों को पूरा करने का रास्ता खुल जाएगा तथा यह देश को विश्व शत् िबनाने का रास्ता प्रशस्त करेगा।



शुक्रवार, 3 जून 2016

Is your home is eco friendly?

कहीं घर में ही तो नहीं घुटता हैं दम?

                                                                                                                               पंकज चतुर्वेदी

‘‘वह अभी बामुश्किल एक महीने का था, घर से बाहर जाने का सवाल नहीं उठता, घर भी एक पॉश कॉलोनी में है। फिर भी उसे निमोनिया हो गया।’’ पढ़े-लिखे माता-पिता पहले तो डाक्टरों की क्षमता पर ही प्रश्न चिन्ह खड़े करते रहे कि हम तो बच्चे को बहुत सहेज कर रखते हैं, हमारा  घर सभी सुख-सुविधाओं से संपन्न है, उसे निमोनिया कैसे हो सकता है? बउ़े-बड़े नामीगिरामी डाक्टररों की पूरी फौज लगी बच्चे को बचाने में लेकिन मां का मन फंसा था कि आखिर यह हुआ कैसे?। घर में कोई बीड़ी-सिगरेट पीता नहीं है कि छोटे कण बच्चे की सयांस तक पहुंचें। उन लोगां ने अपने यहां मच्छरमार कायॅल लगना कभी का बंद कर रखा था,। । कई संभावनओं  और सवालों के बाद पता चला कि उनके घर के पिछले हिस्से में निर्माण कार्य चलरहा था। जिस तरफ रेत-सीमेंट का काम था, वहीं उस कमरे का एयरकंडीशनर लगा था और उसका एयर फिल्टर साफ नहीं था। यह तो महज बानगी है कि हम घर से बाहर जिस तरह प्रदूषण से जूझ रहे हैं, घर के भीतर भी जाने-अनजाने में हम ऐसी जीवन शैल अपनाएं हुए हैं जोकि ना केवल हमारे लिए, बल्कि समूचे वातावरण में प्रदूषण का कारक बने हुए हैं।

प्रदूषण का नाम लेते ही हम वाहनों या कारखनों से निकलने वाले काले धुएं की बात करने लगते हैं लेकिन सावधान होना जरूरी है कि घर के भीतर कां प्रदूषण यानी इनडोर पॉल्यूशन  बाहरी की तुलना में और भी घातक है। दिल्ली, मुम्बई, चेन्नई, कोलकाता और बेंगलुरू जैसे शहरों में तो इसकी स्थिति और खराब है। यहां जनसंख्या घनत्व ज्यादा है, आवास बेहद सटे हुए हैं, हरियाली कम है । खासतौर पर बच्चों के मामले में तो यह और खतरनाक होता जा रहा है। पिछले साल पटेल चेस्ट इंस्टिट्यूट के डिपार्टमेंट ऑफ रेस्पेरेटरी मेडिसिन के डॉक्टर राजकुमार द्वारा किए गए एक शोध में दावा किया गया है कि घर के अंदर बढ़ते प्रदूषण के कारण लगातार अस्थमा के मरीज बढ़ रहे हैं। सबसे ज्यादा बच्चे दमे की चपेट में आ रहे हैं।
घर के भीतर के प्रदूषण में राजधानी दिल्ली के हालात बहुत ही गंभीर पाए गए। कुछ जगह तो घर के अंदर का प्रदूषण इस खतरनाक स्तर तक पहुंच गया है कि वहां के 14 प्रतिशत से भी अधिक बच्चे अस्थमा के रोगी बन चुके हैं। शोध के अनुसार सबसे खतरनाक स्थिति शाहदरा की पाई गई। यहां 394 बच्चों में से 14.2 प्रतिशत अस्थमा के शिकार पाए गए। खराब स्थिति के मामले में दूसरे नंबर पर शहजादाबाग रहा। यहां 437 में से 9.6 प्रतिशत बच्चों को अस्थमा का रोगी पाया गया। वहीं, अशोक विहार में कुल 441 बच्चे हैं, जिनमें से 7.5 प्रतिशत अस्थमा के रोगी हो गए हैं। जनकपुरी में कुल 400 बच्चे हैं, जिनमें से 8.3 प्रतिशत अस्थमा के रोगी हो गए हैं। निजामुद्दीन में कुल 350 बच्चे हैं, जिनमें से 8.3 प्रतिशत अस्थमा के रोगी हो गए हैं। इसी तरह सीरी फोर्ट में 387 बच्चों में से 6.2 प्रतिशत अस्थमा के रोगी हो गए हैं। लेकिन जैसे- जैसे गांव की ओर बढ़े तो ,मामले घटते गए। दौलतपुरा में 325 बच्चों में से 4.6 प्रतिशत तो जगतपुरी में 370 बच्चों में से मात्र 3.2 को अस्थमा की शिकायत पाई गई। शोध में यह चेतावनी भी सामने आई कि औद्योगिक क्षेत्र वाले घरों में तो 11.8 प्रतिशत बच्चे अस्थमा का शिकार हो चुके हैं। वहीं आवासीय क्षेत्रों के 7.5 प्रतिशत बच्चे अस्थमा के मरीज मिले। इस मामले गांवों की स्थिति बेहतर है। ग्रामीण क्षेत्रों में मात्र 3.9 प्रतिशत बच्चे इस रोग से पीड़ित मिले। सनद रहे कि छोटे बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग अपा अधिकांश समय घर पर ही बिताते हैं, अतः घर के भीतर का ्रपदूषण उनके लिए ज्यादा जानलेवा है।
डॉक्टर राजकुमार ने शोध में 3104 बच्चों को शामिल किया जिनमें 60.3 प्रतिशत लड़के थे और 39.7 प्रतिशत लड़कियां थीं। बच्चों को अस्थमा की शिकायत तो नहीं, यह जांचने के लिए विशेष तौर पर केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, अमेरिकन थोरासिक काउंसिल और द इंटरनेशनल स्टडी ऑफ अस्थमा एंड एलर्जी इन चाइल्डहुड द्वारा तैयार किए सवाल पूछे गए।
असल में हमने भौतिक सुखों के लिए जो कुछ भी सामान जोड़ा है उसमें से बहुत सा समूचे परिवेश के लिए खतरा बना है। किसी ऐसे बुजुर्ग से मिले जिनकी आयु साठ साल के आसपास हो और उनसे जानें कि उनके जवानी के दिनों में हर दिन घर से कितना कूड़ा निकलता था । आपको जानकर आश्चर्य होगा कि जितना कूड़ा हम एक दिन में आज घर से बाहर फैंक रहे हैं उतना वे दस दिन ेमं भी नहीं करते थे। आज पैकिंग सामग्री, पेन से ले कर रेजर तक सबकुछ डिस्पोजबल है और जाने-अनजाने में हम इनका इस्तेमाल कर कूड़े को बढ़ाते हैं। माईक्रोवब जैसे विबजली उपकरण्ण अधिक इस्तेमाल करने पर बहुत गंभीर बीमारियों का कारक बनते हैं, वहीं नए किस्म के कारपेट, फर्नीचर, परदे सभी कुछ बारिक धूल कणों का संग्रह स्थल बन रहे हैं और यही कण इंसान की सांस की गति में व्यवधान पैदा करते हैं। सफाई, सुगंध, कीटनाशकों के इस्तेमाल भले ही तात्कालिक आनंद देते हों,े लेकिन इनका फैंफड़ों पर बहुत गंभीर असर होता है।
आमतौर पर सुबह आपको कई ऐसे लेाग मिल जाएंगे जो दूसरों की क्यारी से फूल तोड़ते होते हैं। उनसे पूछे तो कहेंगे कि भगवान को चढ़ाने का ले रहे हैं। जर सोचें कि यदि भगवान ने ही फूल बनाए हैं तो वे उनका क्या करेंगे। असल में इस परंपरा के पीछे कारण ही यही था कि लोग अपने घर में फूलदार पौधे लगाएं, जो सुदर भी दिखें व पर्यावरण को भी सहेजे। विडंबना है कि हम अपने घर-आंगन की जमीन पर तो सीमेंट लगा कि निरापद बना दते हैं जिससे उस पर कोई पौधा ना उगे, लेकिन दूसरे की क्यारी के फूल से भगवान को खुश करने का प्रयास करते है।
यह भी दुखद है कि हम प्रदूषण के लिए दोष कल-कारखानों को देते हैं लेकिन हमारे घर से उपजा कूड़े पर विचार नहीं करते। क्या ऐसा बॉलपेन इस्तेमाल नहीं लाया जा सकता जिसमें केवल रिफील बदलना हो नाकि पूरा पेन। पुराने वाले फाउंटेन पेन भी अच्छा विकल्प हैं। क्या घर से निकलते समय एक कप़ड़े का थैला साथ में नहीं रखा जा सकता, ताकि सामान के साथ घर में पॉलीथीन का प्रेवश ना हो और यह कचरे के साथ घर से बाहर जा कर सीवर, नाली या किसी मवेशी का गला ना चॉक करे?



अपने घर को पर्यावरण मित्र बनाने के लिए कुछ सुझाव
1. आमतौर पर घरों में कई तरह के डिटरजेंट या साबुन आ रहे हैं- मुंह धोने का, शरीर का, शैंपू व कंडीशनर, बर्तन मांजने, कपड़े धोने,फर्श चमकाने, टायलेट साफ करने का आदिआदि। कम से कम 12 तरीके के ऐसे रसायन हम हर दिन घर में इस्तेमाल कर रहे हैं जो कि पानी की खपत बढ़ा रहे हैं , साथ ही निस्तार क जरिये नालों व नदियो ंतक जा रहे जल को दूषित कर रहे हैं। जरा प्रयास करें कि क्या हम हर दिन साबुन या सफाई वाले रसायनों में कुछ कम कर सकते हैं या उनकी मात्रा कम कर सकते है।। एक लाख आबादी वाला कोई शहर यदि अपने डिटरजेंट व रसायनों की मात्रा आधी कर दे तो उनके करीबी नदी व तालाब की प्रदूषण एक चौथाई रह जाएगा , साथ ही उनकी पानी की खपत तीन चौथाई हो जाएगी।
2. घर में यदि आर. ओ . लगा है तो उसके व्यर्थ्ज्ञ निकले पानी को नाली में ना बहने दें, उसे किसी जगह एकत्र करें व टायलेट या बगीचे में इस्तेमाल करें।
3. अपने घर के बाहर कच्ची जमीन पर सीमेंट पोतने से बचें। कच्ची जमीन बआरिश के जल को सहेजती हे , इससे आपके इलाके का भूजल स्तर स्वतः ही  अच्छा बना रहेगा।
4.  घर में कम से कम कीटनाशक का इस्तेमाल करें- ना तो पौधों में ना हीक मरों में। असल में ये कीटनाशक हानिकारक कीडों की क्षमता बढ़ा देते हें, वहीं इनकी फिराक में कई ऐसेसूक्ष्म जीवाणु मर जाते हैं जो कि प्रकृति के संरक्षक होते हैं।
5. घर में पौघे जरूर लगाएं लेकिन उनको घर के भीतर लगाने से परहेज करें। क्योंकि रात में जब घर बंद होता है तो इन पौधों से निकलने वाली कार्बन डाइऑक्साइड गैस सेहत के लिए नुकसानदेह साबित होगा।
6. घर के भीतर की धूल साफ करने का काम नियमित रूप से करना चाहिए। यदि घर में पालतू जानवर है तो उसकी सफाई का भी ध्यान रखें। घर में मच्छर-कॉकरोच मारने के लिए जहरीले कैमिकल न छिड़कें। घर के अंदर धूम्रपान न करें।

गुरुवार, 2 जून 2016

controversies on history of school books


किसने हक दिया भविष्य तय करने का

                                                           पंकज चतुर्वेदी
त्रिपुरा की पाठ्य पुस्तकों से आजादी की लड़ाई के नायकों को हटा कर मार्क्स व हिटलर के पाठ जोड़े जा रहे हैं। राजस्थान की पुस्तकों से नेहरूजी के व्यक्तित्व और कृतित्व को हटाने पर विवाद हो रहा है। खबर यह भी थी कि राजस्थान सरकार अपनी स्कूल की पाठ्य पुस्तकों में मोदीजी पर अध्याय देने वाली थीए जिसे स्वयं मोदीजी ने ही रोक दिया। राज्यों में सरकारें बदलें और ऐसे विवाद ना हों घ् ऐसा होता नहीं है। राजनेता अपने वोट बैंक के खातिर स्कूली शिक्षा के पाठ्यक्रमों में बदलाव की बात कर विवाद उपजाते ही रहते हैं । स्कूली शिक्षा यानीए देश की आगामी पीढ़ी की नींव रखने का कार्य ! पाठ्यक्रम का निर्धारण यानी देश के भविश्य का ढ़ंाचा तैयार करना !! पाठ्य पुस्तकें यानी बाल मन को उसके प्रौढ़ जीवन की चुनौतियों से सामना करने का संबल प्रदान करने लायक बौद्धिक खुराक देना ।  जाहिर है कि स्कूली शिक्षा की दिशा व दशा निर्धारित करते समय यदि छोटी सी भूल हो जाए तो देश के भविश्य पर बड़ी समस्या खड़ी हो सकती है ।
यह इतना संवेदनशीलए महत्वपूर्ण और दूरगामी विशय का निर्धारण करने का हक राजनेताओं को किसने दे दिया घ् कहा जा सकता है कि यह निर्धारण तो शिक्षाविदों की कमेटी कर रही है । तो भी देश के करोड़ों.करोड़ लोगों के भाग्य विधात बनने का हक इन दर्जनभर विशेशज्ञों को कैसे प्राप्त हो गया घ् कुछ लोगों के निजी मानदंड और निर्णयों के द्वारा लाखों.लाख लोगों के जीवन को आकार देने की योजना बनाना कहां तक उचित होगा घ् यह विडंबना ही है कि हमारे नेता व बुद्धिजीवी पाठ्यक्रम व उसकी पुस्तकों के मामले में आमतौर पर सुप्तावस्था में ही रहते हैंए हां जब कहीं उनकी निजी आस्था या स्वार्थ पर चोट दिखती है तो वे सक्रिय हो जाते हैं।
इस बात से कोई इंकार नहीं करेगा कि हमारे देश में इन दिनों जो कुछ पढ़ाया जा रहा हैए उसका इस्तेमाल सालाना परीक्षा में अधिक से अधिक नंबर लाने तक ही सीमित रहता है । छात्र के व्यावहारिक जीवन में उस शिक्षा की कोई अनिवार्यता नहीं दिखती है । कहने को तो पाठ्यक्रम के बड़े.बड़े उद्देश्य कागजों पर दर्ज हैं ष् जिसमें कुछ विशयों ; भाशाए गणितए विज्ञान ए इतिहास आदिद्धमें बच्चों को एक स्तर तक निपुणता प्रदान करनाए उनमें नैतिक व सामजिक गुणों का विकास करना आदि प्रमुख हैं । लेकिन यह स्पश्ट नहीं है कि ये उद्देश्य किस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए तय किए गए है । आम बच्चों से पूछें या फिर शिक्षकों से भीए वे क्यों पढ़ें घ् तो उत्तर जिस तरह के आएंगे ए वे व्यक्तिगत संपन्नता के उद्देश्य की ओर अधिक झुके दिखते हैं । लेकिन हमारे नीति निर्धारक इस बारे में चुप ही रहते हैं । 
नैतिक व आध्यात्मिक शिक्षाए देश की सांस्कृतिक  धरोहरों के प्रति सम्मान जैसे जुमले भी शिक्षा नीति के दस्तावेज में मिल जाते हैं । लेकिन इसका क्रियान्वयन कैसे होए घ् इस पर कोई पुस्तक या नीति कुछ कहती.सुनती नहीं दिखती है । प्रत्येक श्रमकार्य और व्यक्ति के प्रति सम्मानए आत्म.सम्मान समेतए आत्म.दिशानिर्देशनय सहिष्णुताय सहृदयता एवं हानिरहितप्रवृत्तिय कार्यस्थल एवं अन्यत्र समान लक्ष्यों को पूरा करने के लिए सहयोगय नैतिक बल आदि अपने.आप में लक्ष्य हैं। आत्म.दिशा निर्देशन से कई अन्य वैयक्तिक गुणों या विशिष्टताओं का भी विकास होता हैए जैसेए अपनी बड़ी परियोजनाओं के प्रति पूर्ण प्रतिबद्धताय न्याय की स्वतंत्रताय आत्म.विश्वासय अपनी समझ। वैयक्तिक समृद्धिए जिसका एक आधुनिक स्वरूप है वैयक्तिक स्वायत्तताए का व्यापक मूल्य कई अन्य बातों पर भी निर्भर करता हैए जैसेए विभिन्न प्रकार के शारीरिक भय की स्थिति में साहस प्रदर्शन का पारंपरिक गुणय भोजनए मद्यपान एवं शारीरिक सुख की पिपासा पर सही नियंत्रणय क्रुद्ध होने की दशा में आत्म नियंत्रणय धैर्य आदिए आदि। इसके बनिस्पत इतिहास किस तरह प्रस्तुत किया जाएए इस पर तलवारें खिंचीं रहती हैं । कोई षक नहीं कि एक ही घटना को दो तरह से प्रस्तुत किया जा सकता है. गुजरात या मुजफ्फर नगर के दंगे हमारी वास्तविकता हैं और इससे हम निगाह नहीं चुरा सकते हैंए ये इतिहास का हिस्सा होंगे । लेकिन यदि इसकी जानकारी बच्चों को देना हो तो इसके दो तरीके होंगे . एक नृशंसताए मारकाट व किसने किस पर किया के लोमहर्शक किस्से । दूसरा तरीका होगा कि दंगों के दौरान सामने आई आपसी सहयोगए मानवीय रिश्तों व सहयोग की घटनाओं का विवरण । ठीक इसी तरह इतिहास को भी लिखा जा सकता है । लेकिन मूल प्रश्न यह है कि इतिहास या भाशा या नैतिक शिक्षा को पढ़ाने का उद्देश्य क्या हो और इसे तय करने का कार्य कुछ लोगों को ही क्यों सौंपा जाए । इसी तरह की नौटंकी भाशा को ले कर होती रहती है। सरकार बदलती हैए किताब लिखवाने की जिम्मेदारी वाले अफसर बदलते हैं तो धीरे से भाशा की पाठ्य पुस्तकों के रचनाकार बदल जाते हैं। कोई यह बताने को तैयार नहीं होता कि  अमुक रचना से भाशा किस तरह समृद्ध होगी। हां! यह जरूर दिख जाता है कि ष्अपना वालाा लेखकश्श् किस तरह से समृद्ध होगा।
भारत एक लोकतांत्रिक देश हैए लोकतंत्र यानी आम सहमति का षासन । फिर शिक्षा की दिशा व दशा तय करने में इस लोकतांत्रिक प्रवृति को क्यों नहीं अपनाया जा रहा है । कुछ नेता कह सकते हैं कि वे लोकतांत्रिक तरीके से चुने हुए हैं और उन्हें इसका हक मिला है । लेकिन वे नेता जानते हैं कि उन्हें व उनकी पार्टी देश की कुल आबादी के बामुश्किल 20 फीसदी लोगों ने चुना है । कुछ शिक्षक या शिक्षाविद कहते हैं कि वे विशेशज्ञ हैं ए उन्होंने अपने जीवन के कई साल इस क्षेत्र में लगा दिए अतः उन्हें पाठ्यक्रम तय करने का हक है । लेकिन यह लोकतंत्र की मूल भावना के विपरीत है . लोकतंत्र में तो प्रत्येक आदमी के वोट की कीमत समान होती हैए वोट अर्थात उसकी राय की । यह राय शिक्षा को ले कर भी हो सकती है । देश की भविश्य क्या हो घ् इस पर राय देने का हक एक रिक्शा चलाने वाले या एक दुकानदार को उतना ही है जितना कि नामचीन शिक्षाविदों व नेताओं को । लोकतंत्र की इस प्राथमिक भावना से देश की जनता को वंचित रख कर कुछ लोगों का अपने निजी अनुभव व ज्ञान को थोपना किसी भी तरह से नैतिक तो नहीं है ।
पिछली एनडीए सरकार के लोगों ने अपने गोपनीय लेखकों से किताबें लिखवाई थीं। सरकार बदली तो एनसीईआरटी  का निजाम बदल गया और नई सरकार उन्हीें पुराने लेखकों से;जिन को वामपंथी कहा जाता हैद्ध नए सिरे से लिखवाने लगी । अब निजाम बदलते ही दीनानाथ बतराए जगमोहन सिंह राजपूत जैसे लोग अपने तरीके की किताबों के लिए सक्रिय हो गए है। इतिहास हो या भूगोलए गणित हो विज्ञान या भाशा य कोई भी विशय अंतिम सत्य की सीमा तक नहीं पहुचा हैए प्रत्येक में षोधए खोज व संशोधनए की गुंजाईश बनी रहती है । विज्ञान की पुस्तकों में जैवविविधताए जल संरक्षणए नैनो टैक्नालाजीए मोबाईल और इंटरनेट जैसे नए विषयों की दरकार हैए जबकि हमारी सरकारी पाठ्य पुस्तकें उसी पुराने ढर्रे पर चल रही हैं। गणित में बुलियन एल्जेबराए सांख्यिीकी में नई खोजंेए स्फेरिकल एस्ट्रानामी जैसे विषयों पर कोई बात करने को राजी नहीं हैं। ये विषय देश की आने वाली पीढ़ी को दिशा देने में सहायक हैं। विवाद और टकराव होते हैं इतिहास और हिंदी या अन्य भाषा की किताबों पर।
 किताब या लेखक भले ही कोई होए पाठ्यक्रम का उद्देश्य व उससे वांछित लक्ष्य तो स्पश्ट होने चाहिए । इसके लिए समाज के विभिन्न वर्गों में व्यापक बहसए विकल्पों की खोज और सर्वसम्मति को प्राप्त किए बगैर शिक्षा के बारे में कोई भी नया ढ़ांचा बनाना ए देश के साथ धोखेबाजी ही है । ब्रिटेनए आस्ट्रेलिया जैसे देशों में स्कूलों के लिए राश्ट्रीय पाठ्यक्रम के उद्देश्य तय करने के लिए पिछले कुछ सालों में आम सहमति के लिए व्यापक बहसए सर्वेक्षण आदि का सहारा लिया गया था । भारत जैेसे मानव संसाधन से संपन्न देश में उन अनुभवों को दुहराने से कौन बचना चाहता है घ् वे लेाग जो कि अपनी विशेशज्ञता से ऊपर किसी को नहीं समझ रहे हैं या वे नेता जिनके स्वार्थ इस तरह के विवादों में निहित हैं ।
पंकज चतुर्वेदी
साहिबाबाद
गाजियाबाद 201005
9891928376ए

farmers do not need loan or insurance , the requre only cost of there labour

किसान को ना तो कर्ज चाहिए ना ही बीमा


                                                                    पंकज चतुर्वेदी
पिछले एक महीने से सरकारी प्रचार माध्यम जोर-जोर से चिल्ला रहे हैं कि किसान के जीवन में अब खुशहाली आ गई है क्योंकि उसे फसल-बीमा का सहारा मिल गया है। किसान अब बहुत खुश है कि उसे आसान कर्ज व क्रेडिट कार्ड मिल गया है। हालांकि हकीकत तो उन किसानों से पूछो जो हर रोज पंजाब से लेकर विदर्भ तक कर्ज व खराब फसल के कारण मौत को गले लगा रहे है। किसान की समस्या अकेले मौसमी मार के चलते फसल बेकार होना नहीं है, हर साल हजारों किसान बंपर फसल के कारण हताश हो कर खुदकुशी करते हैं। ऐसे किसानों को ना तो बीमा का कवर है ना ही कर्ज का। अभी सोशल मीडिया पर एक ऐसे किसान की कहानी चल रही है सिमें डेढ कुंटल प्याज बेचने के बाद किसान को एक रूपया बचने का गणित समझाया गया है। बीते तीन महीने के दौरान मध्यभारत के कई राज्यों में टमाटर व प्याज की फसल के गुड़-गोर होने के कस्स्ेि सुनाई देते रहे, लेकिन कोई भी सरकारी एजेंसी माल का सही दमा देने के लिए आगे नहीं आई। कहीं टमाटर मवेशी को खिला दिए गए तो कहीं प्याज सउ़क पर फैंक दिया गया। जिन इलाकों में टमाटर और प्याज का यह हाल हुआ, वे भीशण गर्मी की चपेट में आए हैं और वहां कोल्ड स्टोरेज की सुविधा है नहीं । है भी तो टमाटर तो रखते नहीं और प्याज रखने के सौ नखरे। सनद रहे इस समय दिल्ली एनसीआर में टमाटर के दाम चालीस रूपए किलो से कम नहीं है। यदि ये दाम और बढ़े तो सारा मीडिया व प्रशासन इस की चिंता करने लगेगा, लेकिन किसान की चार महीने की मेहनत व लागत मिट्टी में मिल गई तो कहीं चर्चा तक नहीं हुई।
दुखद कि देश की अर्थ व्यवस्था की रीढ़ कहलाने वाली खेती के विकास के नाम पर बुनियादी सामाजिक सुधारों को लगातार नजरअंदाज किया जाता रहा है । पूरी तरह प्रकृति की कृपा पर निर्भर किसान के श्रम की सुरक्षा पर कभी गंभीरता से सोचा ही नहीं गया । फसल बीमा की कई योजनाएं बनीं, उनका प्रचार हुआ, पर हकीकत में किसान यथावत ठगा जाता रहा- कभी नकली दवा या खाद के फेर में तो कभी मौसम के हाथों । किसान जब ‘‘केश क्राप’’ यानी फल-सब्जी आदि की ओर जाता है तो आढ़तियों और बिचौलियों के हाथों उसे लुटना पड़ता है। पिछले साल उत्तर प्रदेश में 88 लाख मीट्रिक टन आलू हुआ था तो आधे साल में ही मध्यभारत में आलू के दाम बढ़ गए थे। इस बार किसानों ने उत्पादन बढ़ा दिया, अनुमान है कि इस बार 125 मीट्रिक टन आलू पैदा हो रहा है। कोल्ड स्टोरेज की क्षमता बामुश्किल 97 लाख मीट्रिक टन की है। जाहिर है कि आलू या तो सस्ते- मंदे दामों में बिकेगा या फिर फिर किसान उसे खेत में ही सड़ा देगा- आखिर आलू उखाड़ने, मंडी तक ले जाने के दाम भी तो निकलने चाहिए।
हर दूसरे-तीसरे साल कर्नाटक कंे कई जिलों के किसान अपने तीखे स्वाद के लिए मशहूर हरी मिर्चों को सड़क पर लावारिस फैंक कर अपनी हताशा का प्रदर्शन करते हैंे। तीन महीने तक दिन-रात खेत में खटने के बाद लहलहाती फसल को देख कर उपजी खुशी किसान के ओठों पर ज्यादा देर ना रह पाती है। बाजार में मिर्ची की इतनी अधिक आवक होती है कि खरीदार ही नहीं होते। उम्मीद से अधिक हुई फसल सुनहरे कल की उम्मीदों पर पानी फेर देती है- घर की नई छप्पर, बहन की षादी, माता-पिता की तीर्थ-यात्रा; ना जाने ऐसे कितने ही सपने वे किसान सड़क पर मिर्चियों के साथ फैंक आते हैं। साथ होती है तो केवल एक चिंता-- मिर्ची की खेती के लिए बीज,खाद के लिए लिए गए कर्जे को कैसे उतारा जाए? सियासतदां हजारेंा किसानों की इस बर्बादी से बेखबर हैं, दुख की बात यह नहीं है कि वे बेखबर हैं, विडंबना यह है कि कर्नाटक में ऐसा लगभग हर साल किसी ना किसी फसल के साथ होता है। सरकारी और निजी कंपनियां सपने दिखा कर ज्यादा फसल देने वाले बीजों को बेचती हैं, जब फसल बेहतरीन होती है तो दाम इतने कम मिलते हैं कि लागत भी ना निकले।
कृशि प्रधान अर्थव्यवस्था वाले देश में कृशि उत्पाद के न्यूनतम मूल्य, उत्पाद खरीदी, बिचौलियों की भूमिका, किसान को भंडारण का हक, फसल-प्रबंधन जैसे मुद्दे, गौण दिखते हैं और यह हमारे लोकतंत्र की आम आदमी के प्रति संवेदनहीनता की प्रमाण है। सब्जी, फल और दूसरी कैश-क्राप को बगैर सोचे-समझे प्रोत्साहित करने के दुश्परिणाम दाल, तेल-बीजों(तिलहनों) और अन्य खाद्य पदार्थों के उत्पादन में संकट की सीमा तक कमी के रूप में सामने आ रहे हैं। आज जरूरत है कि खेतों में कौन सी फॅसल और कितनी उगाई जाए, पैदा फसल का एक-एक कतरा श्रम का सही मूल्यांकन करे; इसकी नीतियां तालुका या जनपद स्तर पर ही बनें। कोल्ड स्टोरेज या वेअर हाउस पर किसान का कब्जा हो, साथ ही प्रसंस्करण के कारखाने छोटी-छोटी जगहों पर लगें। यदि किसान रूठ गया तो ध्यान रहे, कारें तो विदेश से मंगवाई जा सकती हैं, एक अरब की आबादी का पेट भरना संभव नहीं होगा।
अपने दिन-रात, जमा पूंजी लगा कर देश का पेट भरने के लिए खटने वाला किसान की त्रासदी है कि ना तो उसकी कोई आर्थिक सुरक्षा है और ना ही  सामाजिक प्रतिश्ठा, तो भी वह अपने श्रम-कणों से मुल्क को सींचने पर तत्पर रहता है। किसान के साथ तो यह होता ही रहता है - कभी बाढ़ तो कभी सुखाड़, कहीं खेत में हाथी-नील गाय या सुअर ही घुस गया, कभी बीज-खाद-दवा नकली, तो कभी फसल अच्छी आ गई तो मंडी में अंधाधुंध आवक के चलते माकूल दाम नहीं। प्राकृतिक आपदाओं पर किसी का बस नहीं है, लेकिन ऐसी आपदाएं तो किसान के लिए मौत से बदतर होती हैं। किसानी महंगी होती जा रही है तिस पर जमकर बंटते कर्ज से उस पर दवाब बढ़ रहा है। ऐसे में आपदा के समय महज कुछ सौ रूपए की राहत राशि उसके लिए ‘जले पर नमक’ की मांनिंद होती है। सरकार में बैठे लोग किसान को कर्ज बांट कर सोच रहे हैं कि इससे खेती-किसानी का दशा बदल जाएगी, जबकि किसान चाहता है कि उसे उसकी फसल की कीमत की गारंटी मिल जाए। भारत के सकल घरेलू उत्पाद का 31.8 प्रतिशत खेती-बाड़ी में तल्लीन कोई 64 फीसदी लोगों के पसीने से पैदा होता है । यह विडंबना ही है कि देश की अर्थ व्यवस्था की रीढ़ कहलाने वाली खेती के विकास के नाम पर बुनियादी सामाजिक सुधारों को लगातार नजरअंदाज किया जाता रहा है । कहने को सरकारी स्तर पर फसल के बीमा की कई लुभावनी योजनाएं सरकारी दस्तावेजों में मिल जाएंगी, लेकिन अनपढ़, सुदूर इलाकों में रहने वाले किसान इनसे अनभिज्ञ होते हैं। सबसे बड़ी बात कि योजनाओं के लिए इतने कागज-पत्तर भरने होते हैं कि किसान उनसे मुंह मोड लेता हैै।
एक बात जान लेना जरूरी है कि किसान को ना तो कर्ज चाहिए और ना ही बगैर मेहनत के कोई छूट या सबसिडी। इससे बेहतर है कि उसके उत्पाद को उसके गांव में ही विपणन करने की व्यवस्था और सुरक्षित भंडारण की स्थानीय व्यवस्था की जाए। किसान को सबसिडी से ज्यादा जरूरी है कि उसके खाद-बीज- दवा के असली होने की गारंटी हो तथा किसानी के सामानों को नकली बचने वाले को फंासी जैसी सख्त सजा का प्रावधान हो। अफरात फसल के हालात में किसान को बिचौलियों से बचा कर सही दाम दिलवाने के लिए जरूरी है कि सरकारी एजंेसिया खुद गांव-गांव जाकर  खरीदारी करे। सब्जी-फल-फूल जैसे उत्पाद की खरीद-बिक्री स्वयं सहायता समूह या सहकारी के माध्यम से  करना कोई कठिन काम नहीं है। यदि प्रत्येक किसान की बुवाई का रिकार्ड सरकार के पास हो तो उसकी न्यूनतम आय की गणना की जा सकती है। फसल होने पर किसान स्वतंत्र है विपणन के लिए, लेकिन आपदा या अफरात फसल के हालात में उसे न्यूनतम दाम मिले व उसकी फसल पर सरकारी एजेंसी का कब्जा हो। इससे मुआवजा, गिरदावरी जैसी लंबी प्रकियाओ ंसे बचा जा सकता है। एक बात और इस पूरे काम में हाने वाला व्यय, किसी नुकसान के आकलन की सरकारी प्रक्रिया, मुआवजा वितरण, उसके हिसाब-किताब में होने वाले व्यय से कम ही होगा। कुल मिला कर किसान के उत्पाद के विपणन या कीमतों को बाजार नहीं, बल्कि सरकार तय करे।
साहिबाबाद, गाजियाबाद
201005
9891928376

बुधवार, 1 जून 2016

Traditional water consevation system is only solution of frequent droughts

पारंपरिक जल संरक्षण प्रणाली ही बचा सकती हें सूखे के प्रकोप से 


इस बार के सूखे से यह तो स्पष्ट हो गया है कि भारी भरकम बजट, राहत जैसे शब्द जल संकट का निदान नहीं है।। यदि भारत का ग्रामीण जीवन और खेती बचाना है तो बारशि की हर बूंद को सहेजने के अलावा और कोई चारा नहीं है। बुंदेलखंड अभी तीन साल पहले ही कई करोड़ रुपये का विशेष पैकेज उदरस्थ कर चुका था, लेकिन जब बादल नहीं बरसे तो ना तो नल-जल योजनाएं काम आई और ना ही ही नलकूप। ना तो बुंदेलखंड के लिए अल्प वर्षा नई बात है और ना ही वहां के समाज के लिए कम पानी में गुजारा करना, लेकिन बीते पांच दशक के दौरान आधुनिकता की आंधी में दफन हो गई पारंपरिक जल प्रणालियों के चलते आज वहां निराशा, पलायन व बेबसी का आलम है।
सनद रहे कि हमारे पूर्वजांे ने देश-काल परिस्थिति के अनुसार बारिश को समेट कर रखने की कई प्रणालियां विकसित व संरक्षित की थीं, जिसमें तालाब सबसे लोकप्रिय थे। घरों की जरूरत यानि पेयजल व खाना बनाने के लिए मीठे पानी का साधन कुआं कभी घर-आंगन में हुआ करता था। धनवान लोग सार्वजनिक कुएं बनवाते थे। हरियाणा से मालवा तक जोहड़ या खाल जमीन की नमी बरकरार रखने की प्राकृतिक संरचना हैं। ये आमतौर पर वर्षा-जल के बहाव क्षेत्र में पानी रोकने के प्राकृतिक या कृत्रिम बांध के साथ छोटा तालाब की मानिंद होता है। तेज ढलान पर तेज गति से पानी के बह जाने वाले भूस्थल में पानी की धारा को काटकर रोकने की पद्धति ‘‘पाट’’ पहाड़ी क्षेत्रों में बहुत लोकप्रिय रही है। एक नहर या नाली के जरिये किसी पक्के बांध तक पानी ले जाने की प्रणाली ‘‘नाड़ा या बंधा’’ अब देखने को नहीं मिल रही है। कुंड और बावड़िया महज जल संरक्षण के साधन नहीं, बल्कि हमारी स्थापत्य कला का बेहतरीन नमूना रहे हैं। आज जरूरत है कि ऐसी ही पारंपरिक प्रणालियों को पुनर्जीवित करने के लिए खास योजना बनाई जाए व इसकी जिम्मेदारी स्थानीय समाज की ही हो।
यह देश-दुनिया जब से है तब से पानी एक अनिवार्य जरूरत रही है और अल्प वर्षा, मरूस्थल, जैसी विषमताएं प्रकृति में विद्यमान रही हैं- यह तो बीते दो सौ साल में ही हुआ कि लोग भूख या पानी के कारण अपने पुश्तैनी घरों-पिंडों से पलायन कर गए। उसके पहले का समाज तो हर तरह की जल-विपदा का हल रखता था। अभी हमारे देखते-देखते ही घरों के आंगन, गांव के पनघट व कस्बों के सार्वजनिक स्थानों से कुएं गायब हुए हैं। बावड़ियों को हजम करने का काम भी आजादी के बाद ही हुआ। हमारा आदि-समाज गर्मी के चार महीनों के लिए पानी जमा करना व उसे किफायत से खर्च करने को अपनी संस्कृति मानता था। वह अपने इलाके के मौसम, जलवायु चक्र, भूगर्भ, धरती-संरचना, पानी की मांग व आपूर्ति का गणित भी जानता थ। उसे पता था कि कब खेत को पानी चाहिए और कितना मवेशी को और कितने में कंठ तर हो जाएगा। वह अपनी गाड़ी को साफ करने के लिए पाईप से पानी बहाने या हजामत के लिए चालीस लीटर पानी बहा देने वाली टोंटी का आदी नहीं था। भले ही आज उसे बीते जमाने की तकनीक कहा जाए, लेकिन आज भी देश के कस्बे-शहर में बनने वाली जन योजनाओं में पानी की खपत व आवक का वह गणित कोई नहीं आंक पाता है जो हमारा पुराना समाज जानता था।
राजस्थान में तालाब, बावड़ियां, कुई और झालार सदियों से सूखे का सामना करते रहे। ऐसे ही कर्नाटक में कैरे, तमिलनाडु में ऐरी, नागालैंड में जोबो तो लेह-लद्दाक में जिंग, महाराष्ट्र में पैट, उत्तराखंड में गुल, हिमाचल प्रदेश में कुल और और जम्मू में कुहाल कुछ ऐसे पारंपरिक जल-संवर्धन के सलीके थे जो आधुनिकता की आंधी में कहीं गुम हो गए और आज जब पाताल का पानी निकालने व नदियों पर बांध बनाने की जुगत अनुतीर्ण होती दिख रही हैं तो फिर उनकी याद आ रही है। गुजरात के कछ के रण में पारंपरिक मालधारी लोग खारे पानी के ऊपर तैरती बारिश की बूंदों के मीठे पानी को ‘विरदा’ के प्रयोग से संरक्षित करने की कला जानते थे। सनद रहे कि उस इलाके में बारिश भी बहुत कम होती है। हिम-रेगिस्तान लेह-लद्दाक में सुबह बरफ रहती है और दिन में धूप के कारण कुछ पानी बनता है जो शाम को बहता है। वहां के लोग जानते थे कि शाम को मिल रहे पानी को सुबह कैसे इस्तेमाल किया जाए। तमिलनाडु में एक जल सरिता या धारा को कई कई तालाबों की श्रृंखला में मोड़कर हर बूंद को बड़ी नदी व वहां से समुद्र में बेजा होने से रोकने की अनूठी परंपरा थी। उत्तरी अराकोट व चेंगलपेट जिला में पलार एनीकेट के जरिए इस ‘‘पद्धति तालाब’’ प्रणाली में 317 तालाब जुड़े हैं। रामनाथपुरम में तालाबों की अंतरश्रृंखला भी विस्मयकारी है। पानी के कारण पलायन के लिए बदनाम बुंदेलखंड में भी पहाड़ी के नीचे तालाब, पहाड़ी पर हरियाली वाला जंगल और एक तालाब के ‘‘ओने’’(अतिरिक्त जी की निकासी का मुंह) से नाली निकाल कर उसे उसके नीेचे धरातल पर बने दूसरे तालाब से जोड़ने व ऐसे पांच-पांच तालाबों की कतार बनाने की परंपरा 900वीं सदी में चंदेल राजाओं के काल से रही है। वहां तालाबों के आंतरिक जुड़ावों को तोड़ा गया, तालाब के बंधान फोड़े गए, तालाबों पर कॉलोनी या खेत के लिए कब्जे हुए, पहाड़ी फोड़ी गई, पेड़ उजाड़ दिए गए। इसके कारण जब जल देवता रूठे तो पहले नल, फिर नलकूप के टोटके किए गए। सभी उपाय जब हताश रहे तो आज फिर तालाबों की याद आ रही है।
सन 1944 में गठित ‘फेमिन इनक्वायरी कमीशन’ ने साफ निर्देश दिए थे कि आने वाले सालों में संभावित पेयजल संकट से जूझने के लिए तालाब ही कारगर होंगे। कमीशन की र्पिाट तो लाल बस्ते में कहीं दब गई और देश की आजादी के बाद इन पुश्तैनी तालाबों की देखरेख करना हमने मुनासिब नहीं समझा। चाहे कालाहांडी हो या फिर बुंदेलखंड या फिर तेलंगाना ; देश के जल-संकट वाले सभी इलाकों की कहानी एक ही है। इन सभी इलाकों में एक सदी पहले तक कई-कई सौ बेहतरीन तालाब होते थे। यहां के तालाब केवल लोगों की प्यास ही नहीं बुझाते थे, यहां की अर्थ व्यवस्था का मूल आधार भी होते थे। मछली, कमल गट्टा , सिंघाड़ा, कुम्हार के लिए चिकनी मिट्टी; यहां के हजारों-हजार घरों के लिए खाना उगाहते रहे हैं।
तालाबों का पानी यहां के कुओं का जल स्तर बनाए रखने में सहायक होते थे। शहरीकरण की चपेट में लोग तालाबों को ही पी गए और अब उनके पास पीने के लिए कुछ नहीं बचा है। कागजों पर आंकडों में देखें तो हर जगह पानी दिखता है लेकिन हकीकत में पानी की एक-एक बूंद के लिए लोग पानी-पानी हो रहे हैं। जहां पानी है, वह इस्तेमाल के काबिल नहीं है। आज जलनिधि को बढ़ता खतरा बढ़ती आबादी से कतई नहीं है। खतरा है आबादी में बढ़ोतरी के साथ बढ़ रहे औद्योगिक प्रदूषण, दैनिक जीवन में बढ़ रहे रसायनों के प्रयोग और मौजूद जल संसाधनों के अनियोजित उपयोग से।
आज जरूरत है कि पारंपरिक प्रणालियों को पुनर्जीवित करने के लिए खास योजना बनाई जाए व इसकी जिम्मेदारी स्थानीय लोगों की ही हो।
इस बार के सूखे से यह तो स्पष्ट हो गया है कि भारी भरकम बजट, राहत जैसे शब्द जल संकट का निदान नहीं है।। यदि भारत का ग्रामीण जीवन और खेती बचाना है तो बारशि की हर बूंद को सहेजने के अलावा और कोई चारा नहीं है। बुंदेलखंड अभी तीन साल पहले ही कई करोड़ रुपये का विशेष पैकेज उदरस्थ कर चुका था, लेकिन जब बादल नहीं बरसे तो ना तो नल-जल योजनाएं काम आई और ना ही ही नलकूप। ना तो बुंदेलखंड के लिए अल्प वर्षा नई बात है और ना ही वहां के समाज के लिए कम पानी में गुजारा करना, लेकिन बीते पांच दशक के दौरान आधुनिकता की आंधी में दफन हो गई पारंपरिक जल प्रणालियों के चलते आज वहां निराशा, पलायन व बेबसी का आलम है।
सनद रहे कि हमारे पूर्वजांे ने देश-काल परिस्थिति के अनुसार बारिश को समेट कर रखने की कई प्रणालियां विकसित व संरक्षित की थीं, जिसमें तालाब सबसे लोकप्रिय थे। घरों की जरूरत यानि पेयजल व खाना बनाने के लिए मीठे पानी का साधन कुआं कभी घर-आंगन में हुआ करता था। धनवान लोग सार्वजनिक कुएं बनवाते थे। हरियाणा से मालवा तक जोहड़ या खाल जमीन की नमी बरकरार रखने की प्राकृतिक संरचना हैं। ये आमतौर पर वर्षा-जल के बहाव क्षेत्र में पानी रोकने के प्राकृतिक या कृत्रिम बांध के साथ छोटा तालाब की मानिंद होता है। तेज ढलान पर तेज गति से पानी के बह जाने वाले भूस्थल में पानी की धारा को काटकर रोकने की पद्धति ‘‘पाट’’ पहाड़ी क्षेत्रों में बहुत लोकप्रिय रही है। एक नहर या नाली के जरिये किसी पक्के बांध तक पानी ले जाने की प्रणाली ‘‘नाड़ा या बंधा’’ अब देखने को नहीं मिल रही है। कुंड और बावड़िया महज जल संरक्षण के साधन नहीं, बल्कि हमारी स्थापत्य कला का बेहतरीन नमूना रहे हैं। आज जरूरत है कि ऐसी ही पारंपरिक प्रणालियों को पुनर्जीवित करने के लिए खास योजना बनाई जाए व इसकी जिम्मेदारी स्थानीय समाज की ही हो।
यह देश-दुनिया जब से है तब से पानी एक अनिवार्य जरूरत रही है और अल्प वर्षा, मरूस्थल, जैसी विषमताएं प्रकृति में विद्यमान रही हैं- यह तो बीते दो सौ साल में ही हुआ कि लोग भूख या पानी के कारण अपने पुश्तैनी घरों-पिंडों से पलायन कर गए। उसके पहले का समाज तो हर तरह की जल-विपदा का हल रखता था। अभी हमारे देखते-देखते ही घरों के आंगन, गांव के पनघट व कस्बों के सार्वजनिक स्थानों से कुएं गायब हुए हैं। बावड़ियों को हजम करने का काम भी आजादी के बाद ही हुआ। हमारा आदि-समाज गर्मी के चार महीनों के लिए पानी जमा करना व उसे किफायत से खर्च करने को अपनी संस्कृति मानता था। वह अपने इलाके के मौसम, जलवायु चक्र, भूगर्भ, धरती-संरचना, पानी की मांग व आपूर्ति का गणित भी जानता थ। उसे पता था कि कब खेत को पानी चाहिए और कितना मवेशी को और कितने में कंठ तर हो जाएगा। वह अपनी गाड़ी को साफ करने के लिए पाईप से पानी बहाने या हजामत के लिए चालीस लीटर पानी बहा देने वाली टोंटी का आदी नहीं था। भले ही आज उसे बीते जमाने की तकनीक कहा जाए, लेकिन आज भी देश के कस्बे-शहर में बनने वाली जन योजनाओं में पानी की खपत व आवक का वह गणित कोई नहीं आंक पाता है जो हमारा पुराना समाज जानता था।
राजस्थान में तालाब, बावड़ियां, कुई और झालार सदियों से सूखे का सामना करते रहे। ऐसे ही कर्नाटक में कैरे, तमिलनाडु में ऐरी, नागालैंड में जोबो तो लेह-लद्दाक में जिंग, महाराष्ट्र में पैट, उत्तराखंड में गुल, हिमाचल प्रदेश में कुल और और जम्मू में कुहाल कुछ ऐसे पारंपरिक जल-संवर्धन के सलीके थे जो आधुनिकता की आंधी में कहीं गुम हो गए और आज जब पाताल का पानी निकालने व नदियों पर बांध बनाने की जुगत अनुतीर्ण होती दिख रही हैं तो फिर उनकी याद आ रही है। गुजरात के कछ के रण में पारंपरिक मालधारी लोग खारे पानी के ऊपर तैरती बारिश की बूंदों के मीठे पानी को ‘विरदा’ के प्रयोग से संरक्षित करने की कला जानते थे। सनद रहे कि उस इलाके में बारिश भी बहुत कम होती है। हिम-रेगिस्तान लेह-लद्दाक में सुबह बरफ रहती है और दिन में धूप के कारण कुछ पानी बनता है जो शाम को बहता है। वहां के लोग जानते थे कि शाम को मिल रहे पानी को सुबह कैसे इस्तेमाल किया जाए। तमिलनाडु में एक जल सरिता या धारा को कई कई तालाबों की श्रृंखला में मोड़कर हर बूंद को बड़ी नदी व वहां से समुद्र में बेजा होने से रोकने की अनूठी परंपरा थी। उत्तरी अराकोट व चेंगलपेट जिला में पलार एनीकेट के जरिए इस ‘‘पद्धति तालाब’’ प्रणाली में 317 तालाब जुड़े हैं। रामनाथपुरम में तालाबों की अंतरश्रृंखला भी विस्मयकारी है। पानी के कारण पलायन के लिए बदनाम बुंदेलखंड में भी पहाड़ी के नीचे तालाब, पहाड़ी पर हरियाली वाला जंगल और एक तालाब के ‘‘ओने’’(अतिरिक्त जी की निकासी का मुंह) से नाली निकाल कर उसे उसके नीेचे धरातल पर बने दूसरे तालाब से जोड़ने व ऐसे पांच-पांच तालाबों की कतार बनाने की परंपरा 900वीं सदी में चंदेल राजाओं के काल से रही है। वहां तालाबों के आंतरिक जुड़ावों को तोड़ा गया, तालाब के बंधान फोड़े गए, तालाबों पर कॉलोनी या खेत के लिए कब्जे हुए, पहाड़ी फोड़ी गई, पेड़ उजाड़ दिए गए। इसके कारण जब जल देवता रूठे तो पहले नल, फिर नलकूप के टोटके किए गए। सभी उपाय जब हताश रहे तो आज फिर तालाबों की याद आ रही है।
सन 1944 में गठित ‘फेमिन इनक्वायरी कमीशन’ ने साफ निर्देश दिए थे कि आने वाले सालों में संभावित पेयजल संकट से जूझने के लिए तालाब ही कारगर होंगे। कमीशन की र्पिाट तो लाल बस्ते में कहीं दब गई और देश की आजादी के बाद इन पुश्तैनी तालाबों की देखरेख करना हमने मुनासिब नहीं समझा। चाहे कालाहांडी हो या फिर बुंदेलखंड या फिर तेलंगाना ; देश के जल-संकट वाले सभी इलाकों की कहानी एक ही है। इन सभी इलाकों में एक सदी पहले तक कई-कई सौ बेहतरीन तालाब होते थे। यहां के तालाब केवल लोगों की प्यास ही नहीं बुझाते थे, यहां की अर्थ व्यवस्था का मूल आधार भी होते थे। मछली, कमल गट्टा , सिंघाड़ा, कुम्हार के लिए चिकनी मिट्टी; यहां के हजारों-हजार घरों के लिए खाना उगाहते रहे हैं।
तालाबों का पानी यहां के कुओं का जल स्तर बनाए रखने में सहायक होते थे। शहरीकरण की चपेट में लोग तालाबों को ही पी गए और अब उनके पास पीने के लिए कुछ नहीं बचा है। कागजों पर आंकडों में देखें तो हर जगह पानी दिखता है लेकिन हकीकत में पानी की एक-एक बूंद के लिए लोग पानी-पानी हो रहे हैं। जहां पानी है, वह इस्तेमाल के काबिल नहीं है। आज जलनिधि को बढ़ता खतरा बढ़ती आबादी से कतई नहीं है। खतरा है आबादी में बढ़ोतरी के साथ बढ़ रहे औद्योगिक प्रदूषण, दैनिक जीवन में बढ़ रहे रसायनों के प्रयोग और मौजूद जल संसाधनों के अनियोजित उपयोग से।
आज जरूरत है कि पारंपरिक प्रणालियों को पुनर्जीवित करने के लिए खास योजना बनाई जाए व इसकी जिम्मेदारी स्थानीय लोगों की ही हो।
(लेखक नेशनल बुक ट्रस्ट से जुड़े हैं)
ल्ल पंकज चतुर्वेदी
इस बार के सूखे से यह तो स्पष्ट हो गया है कि भारी भरकम बजट, राहत जैसे शब्द जल संकट का निदान नहीं है।। यदि भारत का ग्रामीण जीवन और खेती बचाना है तो बारशि की हर बूंद को सहेजने के अलावा और कोई चारा नहीं है। बुंदेलखंड अभी तीन साल पहले ही कई करोड़ रुपये का विशेष पैकेज उदरस्थ कर चुका था, लेकिन जब बादल नहीं बरसे तो ना तो नल-जल योजनाएं काम आई और ना ही ही नलकूप। ना तो बुंदेलखंड के लिए अल्प वर्षा नई बात है और ना ही वहां के समाज के लिए कम पानी में गुजारा करना, लेकिन बीते पांच दशक के दौरान आधुनिकता की आंधी में दफन हो गई पारंपरिक जल प्रणालियों के चलते आज वहां निराशा, पलायन व बेबसी का आलम है।
सनद रहे कि हमारे पूर्वजांे ने देश-काल परिस्थिति के अनुसार बारिश को समेट कर रखने की कई प्रणालियां विकसित व संरक्षित की थीं, जिसमें तालाब सबसे लोकप्रिय थे। घरों की जरूरत यानि पेयजल व खाना बनाने के लिए मीठे पानी का साधन कुआं कभी घर-आंगन में हुआ करता था। धनवान लोग सार्वजनिक कुएं बनवाते थे। हरियाणा से मालवा तक जोहड़ या खाल जमीन की नमी बरकरार रखने की प्राकृतिक संरचना हैं। ये आमतौर पर वर्षा-जल के बहाव क्षेत्र में पानी रोकने के प्राकृतिक या कृत्रिम बांध के साथ छोटा तालाब की मानिंद होता है। तेज ढलान पर तेज गति से पानी के बह जाने वाले भूस्थल में पानी की धारा को काटकर रोकने की पद्धति ‘‘पाट’’ पहाड़ी क्षेत्रों में बहुत लोकप्रिय रही है। एक नहर या नाली के जरिये किसी पक्के बांध तक पानी ले जाने की प्रणाली ‘‘नाड़ा या बंधा’’ अब देखने को नहीं मिल रही है। कुंड और बावड़िया महज जल संरक्षण के साधन नहीं, बल्कि हमारी स्थापत्य कला का बेहतरीन नमूना रहे हैं। आज जरूरत है कि ऐसी ही पारंपरिक प्रणालियों को पुनर्जीवित करने के लिए खास योजना बनाई जाए व इसकी जिम्मेदारी स्थानीय समाज की ही हो।
यह देश-दुनिया जब से है तब से पानी एक अनिवार्य जरूरत रही है और अल्प वर्षा, मरूस्थल, जैसी विषमताएं प्रकृति में विद्यमान रही हैं- यह तो बीते दो सौ साल में ही हुआ कि लोग भूख या पानी के कारण अपने पुश्तैनी घरों-पिंडों से पलायन कर गए। उसके पहले का समाज तो हर तरह की जल-विपदा का हल रखता था। अभी हमारे देखते-देखते ही घरों के आंगन, गांव के पनघट व कस्बों के सार्वजनिक स्थानों से कुएं गायब हुए हैं। बावड़ियों को हजम करने का काम भी आजादी के बाद ही हुआ। हमारा आदि-समाज गर्मी के चार महीनों के लिए पानी जमा करना व उसे किफायत से खर्च करने को अपनी संस्कृति मानता था। वह अपने इलाके के मौसम, जलवायु चक्र, भूगर्भ, धरती-संरचना, पानी की मांग व आपूर्ति का गणित भी जानता थ। उसे पता था कि कब खेत को पानी चाहिए और कितना मवेशी को और कितने में कंठ तर हो जाएगा। वह अपनी गाड़ी को साफ करने के लिए पाईप से पानी बहाने या हजामत के लिए चालीस लीटर पानी बहा देने वाली टोंटी का आदी नहीं था। भले ही आज उसे बीते जमाने की तकनीक कहा जाए, लेकिन आज भी देश के कस्बे-शहर में बनने वाली जन योजनाओं में पानी की खपत व आवक का वह गणित कोई नहीं आंक पाता है जो हमारा पुराना समाज जानता था।
राजस्थान में तालाब, बावड़ियां, कुई और झालार सदियों से सूखे का सामना करते रहे। ऐसे ही कर्नाटक में कैरे, तमिलनाडु में ऐरी, नागालैंड में जोबो तो लेह-लद्दाक में जिंग, महाराष्ट्र में पैट, उत्तराखंड में गुल, हिमाचल प्रदेश में कुल और और जम्मू में कुहाल कुछ ऐसे पारंपरिक जल-संवर्धन के सलीके थे जो आधुनिकता की आंधी में कहीं गुम हो गए और आज जब पाताल का पानी निकालने व नदियों पर बांध बनाने की जुगत अनुतीर्ण होती दिख रही हैं तो फिर उनकी याद आ रही है। गुजरात के कछ के रण में पारंपरिक मालधारी लोग खारे पानी के ऊपर तैरती बारिश की बूंदों के मीठे पानी को ‘विरदा’ के प्रयोग से संरक्षित करने की कला जानते थे। सनद रहे कि उस इलाके में बारिश भी बहुत कम होती है। हिम-रेगिस्तान लेह-लद्दाक में सुबह बरफ रहती है और दिन में धूप के कारण कुछ पानी बनता है जो शाम को बहता है। वहां के लोग जानते थे कि शाम को मिल रहे पानी को सुबह कैसे इस्तेमाल किया जाए। तमिलनाडु में एक जल सरिता या धारा को कई कई तालाबों की श्रृंखला में मोड़कर हर बूंद को बड़ी नदी व वहां से समुद्र में बेजा होने से रोकने की अनूठी परंपरा थी। उत्तरी अराकोट व चेंगलपेट जिला में पलार एनीकेट के जरिए इस ‘‘पद्धति तालाब’’ प्रणाली में 317 तालाब जुड़े हैं। रामनाथपुरम में तालाबों की अंतरश्रृंखला भी विस्मयकारी है। पानी के कारण पलायन के लिए बदनाम बुंदेलखंड में भी पहाड़ी के नीचे तालाब, पहाड़ी पर हरियाली वाला जंगल और एक तालाब के ‘‘ओने’’(अतिरिक्त जी की निकासी का मुंह) से नाली निकाल कर उसे उसके नीेचे धरातल पर बने दूसरे तालाब से जोड़ने व ऐसे पांच-पांच तालाबों की कतार बनाने की परंपरा 900वीं सदी में चंदेल राजाओं के काल से रही है। वहां तालाबों के आंतरिक जुड़ावों को तोड़ा गया, तालाब के बंधान फोड़े गए, तालाबों पर कॉलोनी या खेत के लिए कब्जे हुए, पहाड़ी फोड़ी गई, पेड़ उजाड़ दिए गए। इसके कारण जब जल देवता रूठे तो पहले नल, फिर नलकूप के टोटके किए गए। सभी उपाय जब हताश रहे तो आज फिर तालाबों की याद आ रही है।
सन 1944 में गठित ‘फेमिन इनक्वायरी कमीशन’ ने साफ निर्देश दिए थे कि आने वाले सालों में संभावित पेयजल संकट से जूझने के लिए तालाब ही कारगर होंगे। कमीशन की र्पिाट तो लाल बस्ते में कहीं दब गई और देश की आजादी के बाद इन पुश्तैनी तालाबों की देखरेख करना हमने मुनासिब नहीं समझा। चाहे कालाहांडी हो या फिर बुंदेलखंड या फिर तेलंगाना ; देश के जल-संकट वाले सभी इलाकों की कहानी एक ही है। इन सभी इलाकों में एक सदी पहले तक कई-कई सौ बेहतरीन तालाब होते थे। यहां के तालाब केवल लोगों की प्यास ही नहीं बुझाते थे, यहां की अर्थ व्यवस्था का मूल आधार भी होते थे। मछली, कमल गट्टा , सिंघाड़ा, कुम्हार के लिए चिकनी मिट्टी; यहां के हजारों-हजार घरों के लिए खाना उगाहते रहे हैं।
तालाबों का पानी यहां के कुओं का जल स्तर बनाए रखने में सहायक होते थे। शहरीकरण की चपेट में लोग तालाबों को ही पी गए और अब उनके पास पीने के लिए कुछ नहीं बचा है। कागजों पर आंकडों में देखें तो हर जगह पानी दिखता है लेकिन हकीकत में पानी की एक-एक बूंद के लिए लोग पानी-पानी हो रहे हैं। जहां पानी है, वह इस्तेमाल के काबिल नहीं है। आज जलनिधि को बढ़ता खतरा बढ़ती आबादी से कतई नहीं है। खतरा है आबादी में बढ़ोतरी के साथ बढ़ रहे औद्योगिक प्रदूषण, दैनिक जीवन में बढ़ रहे रसायनों के प्रयोग और मौजूद जल संसाधनों के अनियोजित उपयोग से।
आज जरूरत है कि पारंपरिक प्रणालियों को पुनर्जीवित करने के लिए खास योजना बनाई जाए व इसकी जिम्मेदारी स्थानीय लोगों की ही हो।
(लेखक नेशनल बुक ट्रस्ट से जुड़े हैं)

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