My writings can be read here मेरे लेख मेरे विचार, Awarded By ABP News As best Blogger Award-2014 एबीपी न्‍यूज द्वारा हिंदी दिवस पर पर श्रेष्‍ठ ब्‍लाॅग के पुरस्‍कार से सम्‍मानित

बुधवार, 14 सितंबर 2016

Only seminars can not promote Hindi

गोष्ठियों से नहीं होती है हिंदी साहित्य की सेवा !


पंकज चतुर्वेदी
बात कुछ साल पहले की है। एक छोटे से प्रकाशक ने नई दिल्ली के आईटीओ के करीब हिंदी भवन में पूरे दिन का साहित्यिक कार्यक्रम आयोजित किया - कुछ पुस्तकों का लोकार्पण, कुछ चर्चाएं, कविता पाठ और कुछ राजनेताओं का अभिनंदन भी। नारायण दत्त तिवारी से ले कर डा. गिरजा व्यास तक अलग- अलग सत्रों में अतिथि थे। हर बार मालाएं पहनाई जातीं, नेताओं की ठकुर सुहाती और फिर चमकीले कागज में लिपटी किताबों को खोला जाता।  इतने बड़े हाल में श्रोता जुटाना प्रत्येक सत्र की समस्या था। कुछ नेताओं के चमचे- कलछी, लोकार्पित पुस्तकों के लेखकों के नाते-रिश्तेदार, प्रकाशक के दूर-करीब के सभी नातेदार(जिनका साहित्य या पठन से दूर-दूर तक वास्ता नहीं था); ऐसे कर कर 100 लोग बामुश्किल जुटते थे। चूंकि प्रत्येक सत्र के बाद स्वल्पाहार की व्यवस्था थी, अतः सत्र समाप्त होते-होते हाल भरने लगता। आखिरी सत्र था- हिंदी पर संकट। सत्र में बामुश्किल 20 लोग थे। दिसंबर की सर्दी थी और ढलती शाम में खुले आंगन में गरम-गरम मिक्स पकौड़ों का दौर चलने लगा। भीड़ इतनी कि एक-एक पकौड़े के लिए मारा-मार मची थी। तभी अपनी प्लेट और दूसरे की प्लेट से अपने कपड़े संभालते हुए हिंदी के वरिश्ठ आलोचक डा. विश्वनाथ त्रिपाठी के ठहाका लिया, ‘‘जब तक हमारे देश में पकौड़े हैं, हिंदी को कोई संकट नहीं है।’’ कई लोगो की हंसी हवा में गूंजी। लेकिन डा. त्रिपाठी की बात वैसे ही आई-गई हो गई, जैसे कि पूरे देश में हर साल होने वाली हजारों साहित्यिक गोष्ठियाें में लिए गए संकल्प और नारे कुछ ही घंटों में सुप्त हो जाते हैं।
आमतौर पर हिंदी के अधिकांश लेखक, प्रकाशक यहां तक कि पाठक भी हिंदी-जगत की दयनीयता का रोना रोते देखे जाते हैं। प्रकाशक कहता है कि हिंदी में किताबें बिकती नहीं हैं, लेकिन वह बड़े-बड़े लोकार्पण समारोहों में खूब पैसा बहाता है। लेखक अपनी गरीबी का रोना रोता दिखता है, लेकिन अपनी गांठ के पैसे से किताब छपवा कर यार-दोस्तों में वितरित करने के लोभ-संभरण से बच नहीं पाता है। पाठक अच्छी किताबों की कमी का रोना रोता है, लेकिन सौ रूपए से अधिक की कितबा खरीदने पर घर का बजट बिगड़ने की दुहाई देने लगता है। हां ! साहित्य से जुड़े तीनों वर्ग यह कहते नहीं अघाते हैं कि वे तो साहित्य-सेवा के लिए प्रतिबद्ध हैं, सो घर फूंक तमाशा देख रहे हैं। लेकिन इस ‘‘दरिद्रता’’ की हकीकत ये आंकड़े उजागर करते हैं- हमारे देश में हर साल लगभग 85 हजार पुस्तकें छप रही हैं, इनमें 25 प्रतिशत हिंदी, 20 प्रतिशत अंग्रेजी और शेष 55 प्रतिशत अन्य भारतीय भाशाओं में हैं। लगभग 16 हजार प्रकाशक सक्रिय रूप से इस कार्य में लगे हैं। प्रकाशक के साथ, टाईप सेटर , संपादक , प्रूफ रीडर, बाईंडिग, कटिंग, विपणन जैसे कई अन्य कार्य भी जुडे़ हैं। जाहिर है कि यह समाज के बड़े वर्ग के रोजगार का भी साधन है। विश्व बाजार में भारतीय पुस्तकों का बेहद अहम स्थान है। एक तो हमारी पुस्तकों की गुणवत्ता बेहतरीन है, दूसरा इसकी कीमतें कम हैं। भारतीय पुस्तकें विश्व के 130 से अधिक देशों को निर्यात की जाती हैं।
हाल ही में नई दिल्ली में संपन्न पुस्तक मेला में हिंदी के प्रकाशकों को एक साथ एक हॉल में रखा गया था। गिनती के 10 प्रकाशकों के यहां जम कर भीड़ होती थी। वहां नामचीन लेखक सारा-सारा दिन बिताते थे। हर षाम चमकीली पन्नी में लिपटी किताबों के लोकार्पण की औपचारिकता होती थी। ना किताब पर विमर्श, ना ही उसकी विशय-वस्तु पर चर्चा, और ना ही उसकी तुलना। बस लेखक की महानता पर कुछ जुमले और उसकेे बाद आसपास के सोशलाईट क्लब या होटलों की ओर जाता एक काफिला। षराब, खाना, निंदा-रस का पान और उसी के बीच किताबों की थोक सप्लाई की जुगत। कई बार किसी पाठ्य पुस्तक में अपनी किताब फंसाने की जोड़-तोड़ । ऐसे तो हो गया भाशा व साहित्य का विकास।
मेला हो या फिर गोश्ठियां, वातानुकूलित परिवेश में भी पसीने से तर-बतर लोकार्पण करते और पुस्तकें बिकने के लिए सरकार, समाज और टीवी को कोसते इन बुजुर्गवार से जब पूछो कि आप इतनी मेहनत क्यों कर रहे हैं ? तत्काल संत बन जाते हैं - ‘‘ हम तो हिंदी की, साहित्य की सेवा कर रहे हैं।’’ तो क्या साहित्य इतना दयनीय हो गया है कि उसे सेवा की जरूरत पड़ रही है ? साहित्य तो पहले समाज को दिशा और दशा देने का साधन था। अब क्या साहित्य ही दीन-हीन हो गया है ? बीते दो दशकों के दौरान सूचना और ज्ञान का विस्फोट हुआ। इंटरनेट पर करोडा़ें-अरबों पेज सूचनाएं भरी हुई हैं- इसमें कई करोड़ साहित्य से संबंधित हैं, विश्व साहित्य से संबंधित। युग आ गया तुलना का और उसमें श्रेश्ठ के आगे बढ़ने का। कुछ दशकों पहले तक शिक्षा समाज के एक सीमित वर्ग का हक हुआ करता था । ऐसे मनुवादियों के बोले-लिखे गए षब्द ब्रह्म वाक्य होते थे। वे क्या कह या लिख रहे हैं उसका आकलन करने वाले सामित थे, वैश्विक स्तर पर उसकी तुलना करने वाले तो विरले ही थे। विज्ञान और तकनीकी ने उस ‘ज्ञान के एकाधिकार’’ को समाप्त कर दिया है। ऐसे में खुद को बाजार में दिखाने, अपनी श्रेश्ठता सिद्ध करने और अपेन लेखन को विशिश्ठ बताने के लिए कुछ लेखकों ने गोश्ठियों का सहारा ले रखा है। यदि देशभर की सरकारी गोश्ठियों का आकलन करें तो पांएगे कि वही 100-50 चैहरे कभी मंचासीन होते हैं तो कहीं सामने कुर्सियों पर और उन्हीं में से कुछ षाल ओढ़ कर नारियल व चैक पकड़ते दिख जाएंगे।
कुछ बड़े प्रकाशक बड़े ही शातिर अंदाज में अपनी पुस्तकों के लोकार्पण समारोहों का आयोजन करते हैं। उसमें आमंत्रित एक-एक व्यक्ति उनकी पुस्तकों की थोक बिक्री के माध्यम होते हैं। हाल ही में दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में हिंदी की एक लेखिका के कैलाश मानसरोवर यात्रा के संस्मरणों की पुस्तक का लोकार्पण हुआ। आमंत्रण कार्ड पर बड़े ही सुगठित षब्दों में कार्यक्रम के पश्चात रसरंजन के लिए आमंत्रण का उल्लेख था। कितना निरीह है हिंदी का प्रकाशन जगत और कितनी साहित्य सेवा हो रही है ?
हिंदी प्रकाशन जगत के साथ सबसे बड़ी समस्या है, प्रकाशक बनने के लिए किसी प्रकार का कोई बंधन या कानून ना होना।  कोई भी व्यक्ति कभी भी अपने नाम से घर के पते से या गुमनाम पते से प्रकाशक बन सकता है। एक ही प्रकाशक कई-कई अलग-अलग नामों से पुस्तकें छाप सकता हैं। ना तो किसी पंजीयन की जरूरत है और ना ही किसी निरीक्षण या नियंत्रण का डर।  जिस किसी को भ्रम हो गया कि वह लेखक बन सकता है, अपने माता-पिता, गुरू या प्रेयसी को समर्पित कर एक पुस्तक छाप डालता है। इनमें कवियों की संख्या बहुत बड़ी है। और ऐसे लेखकों की आत्म-संतुश्टि साहित्यिक आयोजन के नाम पर कुछ लोगों को जुटाने व उन्हें खिलाने-पिलाने का जरिया होती है। गोश्ठी में लेखक की तारीफ होती है, रचना का उल्लेख तक नहीं होता। यदि रसरंजन की व्यवस्था हो तो लेखक की तुलना प्रेमचंद या निराला से करने की हिमाकत करने से भी नहीं चूकते हैं।
इस तरह के आयोजनों और पुस्तकों के प्रकाशन के कई दूरगामी खतरे हैं:
1 अच्छी पठन सामग्री ऐसी अधकचरा पुस्तकों के बीच कहीं छिप जाती हैं। लगातार स्तरहीन पुस्तकें देखने के बाद आम पाठक का ध्यान पठन से भटक जाता है।
2. गोश्ठियों में उठाए गए मुद्दों पर जब अमल होता नहीं देखते हैं तो नए लेखकों, पाठकों और आम लोगों के मन में पुस्तकें व लेखकों के प्रति अविश्वास का भाव उस ही तरह जाग जाता है, जैसा वे राजनेताओं के बारे में सोचते हैं।
3. फिजूलिया प्रकाशनों से कागज का अपव्यय होता है, जोकि सीधे-सीधे पर्यावरणीय संकट को बढ़ावा देता है। इसका विपरीत असर बाजार में कागज के मूल्यो ंमे वृद्धि के रूप में छात्रों व अन्य प्रकाशकों को भी झेलना पड़ता है।
4 स्तरहीन आयोजन समय, श्रम और संसाधन की फिजूलखर्ची होते हैं। कई बार अच्छे पाठक व लेखक ऐसे आयोजनों से केवल इस लिए दूर हो जाते हैं कि ऐसे आयोजनों की कुख्याति होती है।
5. सरकारी संस्थानों द्वारा आयोजित गोश्ठियां तो कतिपय लोगों को उपकृत करने या उपलब्ध बजट को फूंकने तक सीमित रहती हैं। बातें बड़ी-बड़ी होती है, सेमिनार रिपोर्ट भी छपती है, मीडिया कवरेज भरपूर होता है ; नहीं होता है तो बस वहां व्यक्त उदगारों पर अमल। सरकारी सेमिनारों के आयोजन पर लगभग रोक लगनी चाहिए।

रविवार, 11 सितंबर 2016

How to achive target of Malaria free India since 2030



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संयुक्त राश्ट्र ने हाल ही में हमारे पड़ोसी देश श्रीलंका को मलेरिया से मुक्त घेाशित कर दिया। इसमें कोई षक नहीं कि वहां की आबादी और क्षेत्रफल भारत से बहुत कम है, लेकिन यह भी मानना होगा कि हमारे पास संसाधन, मानव श्रम, शिक्षा, चिििकत्सा  की मूलभूत सुविधांए श्रीलंका से कहीं ज्यादा हैं। दोनो देशेां की मौसमी और भौगोलिक परिस्थितयों में काफी समानता है, लेकिन पिछले अनुभव बानगी हैं कि हमारे देश में योजनाएं तो बहुत बनती हैं लेकिन उनके क्रियान्वयन स्त्र पर लालफीताशाही के चलते अपेक्षित परिणाम नहीं मिले। मलेरिया डेंगू , जापानी बुखार और चिकनगुनिया जैसे नए-नए संहारक शस्त्रों से लैसे हो कर जनता पर टूट रहा है और सरकारी महकमे अपने पुराने नुस्खों को
अपना कर उनके असफल होने का रोना रोते रहते हैं । यही नहीं हाथी पांव यानी फाईलेरिया के मरीजों की संख्या भी बढ़ रही है । विशेषरूप से राजस्थान के रेगिस्तानी इलाकों(जहां हाल के वर्षों में अप्रत्याशित रूप से घनघोर पानी बरसा है), बिहार के सदानीरा बाढ़ग्रस्त जिलों मध्यप्रदेश ,पूर्वोंत्तर राज्यें व नगरीय-स्लम में बदल रहे दिल्ली कोलकाता जैसे महानगरों में जिस तरह मलेरिया का आतंक बढ़ा है, वह आधुनिक चिकित्या विज्ञान के लिए चुनौती है । सरकारी तंत्र पश्चिमी-प्रायांजित एड्स की काली छाया के पीछे भाग रहा है, जबकि मच्छरों की मार से फैले रोग को डाक्टर लाइलाज मानने लगे हैं । उनका कहना है कि आज के मचछर मलेरिया की प्रचलित दवाओं को आसानी से हजम कर जाते हैं । दूसरी ओर घर-घर में इस्तेमाल हो रही मच्छर -मार दवाओं के बढ़ते प्रभाव के कारण मच्छर अब और जहरीला हो गया है । देश के पहाड़ी इलाकों में अभी कुछ साल पहले तक मच्छर देखने को नहीं मिलता था, अब वहां रात में खुले में साने की कल्पना भी नहीं की जा सकती है । बहरहाल यूएन ने दक्षिण-पूर्व एशिया के जिन 35 देशो में सन 2030 तक मलेरिया से पूरी तरह मुक्ति का लक्ष्य रखा है, उसमें भारत भी है। श्रीलंका ेक अलावा मालदीव भी मलेरिया-मुक्त हो चुका है। यह भी बानगी है कि सन 2014 में हमारे मलेरिया उन्मूलन के कुल बजट का 90 फीसदी प्रशासनीक व्यय में ही खप गया। मेडिकेटेड मच्छरदानी वितरित करने के लक्ष्य की पूर्ति एक फीसदी ही रही। यह आंकड़े हमारी मलेरिया से लड़ने की इच्छा-शक्ति की बानगी हैं।
श्रीलंका भाारी बारिश, ढेर सरी जल संरचनाओं, व नमी वले घने जंगलों वाला देश है जहां मच्छर और उससे जनित रोगों के उपजने का अनुकूल परिवेश हुआ करता था। वहां दो दशक से मलेरिया-मुक्त अभियान का असर था कि सन 2006 में वहां मलेरिया के मामले 1000 से कम दर्ज हुए।  अक्तूबर-2012 में इसके रोगी षून्य रहे और उसके बाद पिछले साढे तीन साल में एक भी मलेरिया का मरीज सामने नहीं आया। वहीं भारत में सन् 1958 में अंतरराष्ट्रीय मानदंडों के अनुरूप शुरू हुए राष्ट्रीय मलेरिया उन्मूलन कार्यक्रम को शुरूआती दौर में खासी सफलता मिली थी । 1965 में तो मलेरियाग्रस्त रोगियों की सालाना संख्या महज एक लाख थी । सरकारी रिकार्ड के मुताबिक उस साल देशभर में कोई भी मलेरिया के कारण मरा नहीं । सनद रहे कि आजादी के समय हर साल साढ़े सात करोड़ लोगों के मलेरिया की चपेट में आने व आठ लाख लोगों की इससे मौत होने के सरकारी आंकड़े दर्ज हुए थे । साठ के दशक में ‘‘ ना मच्छर रहेगा और ना ही मलेरिया’’ का नारा काफी हद तक सफल रहा । लेकिन सत्तर का दशक आते-आते इस नारे में कुछ बदलाव आ गया -‘‘ मच्छर तो रहेगा, लेकिन मलेरिया नहीं ’’ । देश के स्वास्थ्य विभाग के रजिस्टर बताते हैं कि 1976 में मलेरिया ने फिर बाढ़ तोड़ दी थी । इस साल 64 लाख से अधिक लोग मलेरिया की चपेट में आए । सरकार एक बार फिर चेती और 1983 में मलेरियाग्रस्त लोगों की संख्या 16 लाख 65 हजार हो गई । 1992 में मलेरिया के 21.26 लाख मामले प्रकाश में आए । 1997 में यह संख्या बढ़ कर 25.53 लाख हो गई । यही नहीं इस दौरान मलेरिया से मरने वालों की संख्या 422 से बढ़ कर 711 हो गई ।  1998 में मरने वालों की ंसख्या 1010 और उसके आगे के सालों में इसमें सतत बढ़ौतरी होती रही है । अनुमान है कि इस साल(31 मार्च को समाप्त हुए वित्तीय वर्ष में )यह संख्या दो हजार के पार है । हांलाकि पिछले दिनों इंडियन काउंसिल आफ मेडिकल रिसर्च द्वारा श्री पदम सिंह प्रधान की अध्यक्षता में गठित 16 सदस्यांे की कमेटी ने बेहद गंभीर चेतावनी देते हुए बताया है कि भारात में मलेरिया से मरने वालों की असल संख्या , सरकारी आंकडात्रें के चालीस गुणा अधिक होती हे। इस समिति ने पाया कि भारत में हर साल औसतन चालीस हजार लोग मच्छर के कारण काल के गाल में समा जाते हैं।  इन दिनों पश्चिम बंगाल में मलेरिया का आतंक ज्यादा है । सन 2006 में वहां मलेरिया के 18 हजार से अधिक मामले और 55 मौतें दर्ज की गईं ।सन 2015 में हमारे यहां चिकनगुनया के 27,553 अैर डेंगू के 99,913 मामले दर्ज हुए थे। इस साल तो जुलाई तक ही मलेरिया के 4,71,083 मरीज आए जिनमें से 119 की मौत हो गई। 31 अगस्त तक चिकनगुनया के 12,555 और डेंगेू के 27,889 मामले प्रकाश में आए, जबकि डेंगू से मरने वालों की संख्या 60 रही। सनद रहे रोग का यह भयावह रूप् हमारे र्प्यटन उद्योग का सबसे बड़ा दुश्मन है।
शुरूआती दिनों में शहरों को मलेरिया के मामले में निरापद माना जाता था और तभी शहरों में मलेरिया उन्मूलन पर कोई खास ध्यान नहीं दिया गया । 90 के दशक में भारत में औद्योगिकीकरण का विकास हुआ । नए कारखाने लगाने के लिए ऐसे इलाकों के जंगल काटे गए, जिन्हें मलेरिया-प्रभावित वन कहा जाता था । ऐस जंगलों पर बसे शहरों में मच्छरों को बना-बनाया घर मिल गया । जर्जर जल निकास व्यवस्था, बारिश के पानी के जमा होने के आधिक्य और कम क्षेत्रफल में अधिक जनसंख्या के कारण नगरों में मलेरिया के जीवाणु तेजी से फल-फूल रहे हैं । भारत में मलेरिया से बचाव के लिए सन् 1953 में राष्ट्रीय मलेरिया नियंत्रण कार्यक्रम शुरू किया गया था । गांव-गांव में डी.डी.टी. का छिड़काव और क्लोरोक्वीन की गोलियां बांटने के ढर्रे में सरकारी महकमे भूल गए कि समय के साथ कार्यक्रम में भी बदलाव जरूरी है । धीरे-धीरे इन दवाओं की प्रतिरोधक क्षमता मच्छरों में आ गई । तभी यह छोटा सा जीव अब ताकतवर हो कर निरंकुश बन गया है । पिछले कुछ सालों से देश में कोहराम मचाने वाला मलेरिया सबटर्मियम या पर्निसियम मलेरिया कहलाता है । इसमें तेज बुखार के साथ-साथ लकवा, या बेहोशी छा जाती है । हैजानुमा दस्त, पैचिस की तरह शौच में खून आने लगता है । रक्त-प्रवाह रुक जाने से शरीर ठंडा पड़ जाता है । गांवों में फैले नीम-हकीम ही नहीं , बड़े-बड़े डिगरी से लैसे डाक्टर भी भ्रमित हो जाते हैं कि दवा किस मर्ज की दी जाए।  डाक्टर लेबोरेट्री- जांच व दवाएं बदलने में तल्लीन रहते हैं और मरीज की तड़प-तड़प कर मौत हो जाती है । इसे समझना बड़ा मुश्किल रहता है कि यह नए जमाने का मलेरिया है । मध्यप्रदेश में घर-घर में लोगों को चलने-फिरने से लाचार बनाने वाले चिकनगुनिया के इलाज में भी डाक्टरों के साथ ऐसे ही संशय की स्थिति रहती है ।
हालांकि ब्रिटिश गवर्नमेंट पब्लिक हेल्थ लेबोरेट्री सर्विस(पीएचएलसी) की एक अप्रकाशित रिपोर्ट में बीस साल पहले ही चेता दिया गया था कि दुनिया के गर्म होने के कारण मलेरिया प्रचंड रूप ले सकता है । गर्मी और उमस में हो रहा इजाफा खतरनाक बीमारियों को फैलाने वाले कीटाण्ुाओं व विषाणुओं के लिए संवाहक के माकूल हालात बना रहा है । रिपोर्ट में कहा गया था कि एशिया में तापमान की अधिकता और ठहरे हुए पानी के कारण मलेरिया के परजीवियों को फलने-फूलने का अनुकूल अवसर मिल रहा है । कहा तो यह भी जाता है कि घरों के भीतर अंधाधुंध शौचालयों के निर्माण व शैाचालयों के लिए घर के नीचे ही टेंक खोदने के कारण मच्छरों की आबादी उन इलाकों में भी ताबड़तोड़ हो गई है, जहां अभी एक दशक पहले तक मच्छर होते ही नहीं थे । सनद रहे कि हमारे यहां स्वच्छता अभियान के नाम पर गांवों में जम कर षौचालय बनाए जा रहे हैं, जिनमें ना तो पानी है, ना ही वहां से निकलने वाले गंदे पानी की निकासी की मुकम्मल व्यवस्था। राजधानी दिल्ली में ही जल-भराव, कूड़े के निबटान, मच्छरों के लार्वा विकसित होने से रोकने के मामले में फिसड्डी हैं। यहां मुख्य सडत्रकां पर थोड़ी सी बरसात का पानी ठहर जाता है। हर रोज नौ लाख टन कचरा बगैर ठिकाने लगाए पडा रहता है।
हरित क्रांति के लिए सिंचाई के साधन बढ़ाने और फसल को कीटों से निरापद रखने के लिए कीटनाशकों के बढ़ते इस्तेमाल ने भी मलेरिया को पाला-पोसा है । बड़ी संख्या में बने बांध और नहरों के करीब विकसित हुए दलदलों ने मच्छरों की संख्या बढ़ाई है । रही बची कसर फसलों में डीडीटी ऐसे ही कीटनाशकों के बेतहाशा दुरूपयोग ने पूरी कर दी । खाने के पदार्थों में डीडीटी का मात्रा जहर के स्तर तक बढ़ने लगी, वहीं दूसरी ओर मच्छर ने डीडीटी को डकार लेने की क्षमता विकसित कर ली । बढ़ती आबादी के लिए मकान, खेत और कारखाने मुहैया करवाने के नाम पर गत् पांच दशकों के दौरान देश के जंगलों की निर्ममता से कटाई की जाती रही है । कहीं अयस्कों की खुदाई तो जलावन या फर्नीचर के लिए भी पेड़ों को साफ किया गया ।  जहां 1950 में 40.48 मिलीयन हेक्टर में हरियाली का राज था, आज यह सिमट कर 22 मिलीयन के आसपास रह गया है । हालांकि घने जंगल मच्छर व मलेरिया के माकूल आवस होते हैं और जंगलों में रहने वचाले आदिवासी मलेरिया के बड़े शिकर होते रहे हैं । लेकिन यह भी तथ्य है कि वनवासियों में मलेरिया के कीटाणुओं से लड़ने की आंतरिक क्षमता विकसित हो चुकी थी । जंगलों के कटने से इंसान के पर्यावास में आए बदलाव और मच्छरों के बदलते ठिकाने ने शहरी क्षेत्रों में मलेरिया को आक्रामक बना दिया ।
मलेरिया उपचार की सर्वाधिक प्रचलित दवा ‘‘ क्लोरोक्वीन’’ है । आज यह पूरी तरह निष्प्रभावी है, उलटे इसके विषम असर हो रहे हैं, इसके बावजूद इसकी बिक्री व वितरण धड़ल्ले से हो रहा है । सन 2000में तो देश के 14 राज्यों के कई जिलों में बाकायदा इस पर रिसर्च हुआ था, जिसमें पाया गया था कि मच्छरों में पाया जाने वाला पी.फाल्सीपेरम परजीवी इस दवा का आदी हो चुका है । उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर, पश्चिम बांगाल के पुरूलिया, बोगमुंडी व जलपाईगुड़ी , उड़ीसा के क्योंझर, गुजरात के पंचमहल,कच्छी , कोलार, महाराष्ट्र के चंद्रपुर, असम के कार्बी, नोगांव दरांग , अरूणाचल प्रदेश के लोहित तथा तिराब, मिजोरम के आयजोल,लुंगलेई और नगालैंड के सभी जिलों में यह दवा मलेरिया के रोगियों पर बेअसर साबित हुई है । वैसे इन जिलों में अब क्लोक्वीन की सप्लाई बंद कर सल्फाडाक्सीन भेजी जा रही है ।
एक बात और ग्रामीण भारत में पूरा मलेरिया अभियान छह लाख ‘‘आशा’ कार्यकर्ताओं के बल पर खड़ा है । इन्हें ना तो समय पर वेतन मिल रहा है, ना ही पर्याप्त परीक्षण किट या दवाएं , कुल मिला कर वे स्वयं निराशा में रहती हैं। वहीं सरकारी अस्पतालों के हालात बहुत बुरे हैं, 80 प्रतिशत अस्पतलों में क्षमता से दोगुने मरीज भरती हैं। दिल्ली में ही एक बिस्तर पर पदो-तीन मरीज डाले जा रहे हैं।
जहां सारी दुनिया मलेरिया से निबटने के प्रयास कर रही है, वहीं भारत सरकार इसके प्रति लापरवाह ही है । जान कर आश्चर्य होगा कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति में मलेरिया की चर्चा तक नहीं है । जब देश की आबादी, मच्छर, मलेरिया , महंगाई सभी कुछ में बढ़ौतरी हो रही है।, ऐसे में मलेरिया के बजट में पहले से भी कमी की जा रही है । सनद रहे कि मलेरिया से जूझने के कुल बजट से अधिक तो एड़स के नारे-पोस्टरों पर खर्च किया जा रहा है । वैसे भी मलेरिया बजट की कुल राशि का तीन-चौथाई तो गैर-योजना मद में जाता है । दिल्ली में इस बार पानी अच्छा बरसा तो नगर निगम की पोल खुल गई, ना नाले साफ ना मुहल्ले, तभी एनसीआर के अस्पताल मच्छर-जनित रेागों से पटे पड़े हैं।
महालेखा नियंत्रक व परीक्षक(सीएजी) की पिछली कई रिपोर्ट गवाह हैं कि उत्तर प्रदेश जैसे राजयों में मलेरिया से पीड़ित अस्पताल पहुंचने वाले आधे से अधिक मरीजों का कोई इलाज ही नहीं किया गया । मच्छर से निबटने के लिए मंजूर पैसे से कारें खरीीद कर आला -अफसरों को उपकृत करना, एबीईआर यानी रक्त परीक्षण, डीडीटी का छिड़काव आदि कार्य कागजों पर ही होते रहे हैं ।
विडंबना है कि हमारे देश में मलेरिया से निबटने की नीति ही गलत है - पहले मरीज बनो, फिर इलाज होगा । जबकि होना यह चाहिए कि मलेरिया फैल ना सके, इसकी कोशिश हों । मलेरिया प्रभावित राज्यों में पेयजल या सिंचाई की योजनाएं बनाते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि ठहरा हुआ पानी कहीं ‘‘ मच्छर-प्रजनन केंद्र’’ तो नहीं बन रहा है । धरती का गरम होता मिजाज जहां मलेंरिया के माकूल है, पहीं एंटीबायोटिक दवाओं के मनमाने इस्तेमाल से लोगों की रोग-प्रतिरोधक क्षमता घट रही है । नीम व ऐसी ही वनोषधियों से मलेरिया व मच्छर उन्मूलन की दवाओं को तैयार करना हमारी प्राथमिकता होना चाहिए ।


डेंगू का दंश
राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के हर शहर-गांव , कालेानी में डेंगू के मरीजों की बाढ़ अस्पतालोे की ओर आ रही है । गाजियाबाद जैसे जिलों के अस्पताल तो बुखार-पीड़ितों से पटे पड़े हैं। अब तो इतना खौफ है कि साधारण बुखार का मरीज भी बीस-पच्चीस हजार रूपए दिए बगैर अस्पताल से बाहर नहीं आता है। डाक्टर जो दवाएं दे रहे हैं उनका असर भगवान-भरोसे है । वहीं डेंगू के मच्छरों से निबटने के लिए दी जा रही दवाएं उलटे उन मच्छरों को ताकतवर बना रही हैं ।
डेंगू फैलाने वाले ‘एडिस’ मच्छर सन 1953 में अफ्रीका से भारत आए थे । उस समय कोई साढ़े सात करोड़ लोगों को मलेरिया वाला डेंगू हुआ था , जिससे हजारों मौतें हुई थीं । अफ्रीका में इस बुखार को डेंगी कहते हैं । यह तीन प्रकार को होता है । एक वह, जोकि चार-पांच दिनों में अपने आप ठीक हो जाता है, लेकिन मरीज को महीनों तक बेहद कमजोरी  रहती है । दूसरे किस्म में मरीज को हेमरेज हो जाता है, जो उसकी मौत का कारण भी बनता है । तीसरे किस्म के डेंगू में हेमरेज के साथ-साथ रोगी का ब्लड प्रेशर बहुत कम हो जाता है, इतना कि उसके मल -द्वार से खून आने लगता है व उसे बचाना मुश्किल हो जाता है ।
विशेषज्ञों के मुताबिक डेंगू के वायरस भी चार तरह के होते हैं- सीरो-1,2, 3 और 4। यदि किसी मरीज को इनमें से किन्हीं दो तरह के वायरस लग जाएं तो उसकी मौत लगभग तय होती है । ऐसे मरीजों के शरीर पर पहले लाल-लाल दाने पड़ जाते हैं । इसे बचाने के लिए शरीर के पूरे खून को बदलना पड़ता है । सनद रहे कि डेंगू से पीड़ित मरीज को 104 से 107 डिग्री बुखार आता है । इतना तेज बुखार मरीज की मौत का पर्याप्त कारण हो सकता है । डेंगू का पता लगाने के लिए मरीज के खून की जांच करवाई जाती है, जिसकी रिपोर्ट आने में देा-तीन दिन लग जाते हैं । तब तक मरीज की हालत लाइलाज हो जाती है । यदि इस बीच गलती से भी बुखार उतारने की कोई उलटी-सीधी दवा ले ली तो लेने के देने पड़ जाते हैं ।
भारतीय उपमहाद्वीप में मच्छरों की मार बढ़ने का बड़ा कारण यहां बढ़ रहे दलदली क्षेत्र को कहा जा रहा है । थार के रेगिस्तान की इंदिरा गांधी नहर और ऐसी ही सिंचाई परियोजनाओं के कारण दलदली क्षेत्र तेजी से बढ़ा है । इन दलदलों में नहरों का साफ पानी भर जाता है और यही ‘एडीस’ मच्छर का आश्रय-स्थल बनते हैं । ठीक यही हालत देश के महानगरों की है जहां, थेाड़ी सी बारिश के बाद सड़कें भर जाती हैं । ब्रिटिश गवरमेंट पब्लिक हेल्थ लेबोरेट्री सर्विस(पीएचएलसी) की एक अप्रकाशित रिपेार्ट के मुताबिक दुनिया के गरम होने के कारण भी डेंगूरूपी मलेरिया प्रचंड रूप धारण कर सकता है । जलवायु विशेषज्ञों का कहना है कि गरम और उमस भरा मौसम, खतरनाक और बीमारियों को फैलाने  वाले कीटाणुओं और विषाणुओं के लिए संवाहक जीवन-स्थिति का निर्माण कर रहे हैं ।  रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि एशिया में तापमान की अधिकता और अप्रवाही पानी के कारण मलेरिया के परजीवियों को फलने-फूलने का अनुकूल माहौल मिल रहा है ।
बहरहाल डेंगू के मरीज बढ़ रहे हैं और  नगर निगम के कर्मचारी घर-घर जा कर मच्छर के लार्वा चैक करने की औपचारिकता निभा रहे हैं । सरकारी लाल बस्तों में दर्ज है कि हर साल करोड़ो रूपए के डीडीटी, बीएचसी, गेमैक्सिन, वीटेकस और वेटनोवेट पाउडर का छिड़काव हर मुहल्ले में हो रहा है, ताकि डंेगू फैलाने वाले मच्छर ना पनप सकें । हकीकत तो यह है कि मच्छर इन दवाओं को खा-खा कर और अधिक खतरनाक हो चुके हैं । यदि किसी कीट को एक ही दवा लगातार दी जाए तो वह कुछ ही दिनों में स्वयं को उसके अनुरूप ढ़ाल लेता है । हालात इतने बुरे हैं कि ‘पाईलेथाम’ और ‘मेलाथियान’ दवाएं फिलहाल तो मच्छरों पर कारगर हैं, लेकिन दो-तीन साल में ही ये मच्छरों को और जहरीला बनाने वाली हो जाएंगी ।
भले की देश के मच्छरों ने अपनी खुराक बदल दी हो, लेकिन अभी भी हमारा स्वास्थ्य -तंत्र ‘‘ क्लोरोक्वीन’’ पर ही निर्भर है । हालांकि यह नए किस्म के मलेरिया यानी डेंगू पर पूरी तरह अप्रभावी है । डेंगू के इलाज में ‘‘प्राइमाक्वीन कुछ हद तक सटीक है, लेकिन इसका इस्तेमाल तभी संभव है, जब रोगी के शरीर में ‘‘ जी-6 पी.डी.’’ नामक एंजाइम की कमी ना हो । यह दवा रोगी के यकृत में मौजूद परजीवियों का सफाया कर देती है ।  विदित हो कि एंजाइम परीक्षण की सुविधा देश के कई जिला मुख्यालयों पर भी उपलब्ध नहीं है, अतः इस दवा के इस्तेमाल से डाक्टर भी परहेज करते हैं ।  इसके अलावा ‘‘क्वीनाईन ’’ नामक एक महंगी दवा भी उपलब्ध है, लेकिन इसकी कीमत आम मरीज की पहुंच के बाहर है ।


पंकज चतुर्वेदी
यूजी-1, 3/186 ए राजेन्द्र नगर
सेक्टर-2
साहिबाबाद
गाजियाबाद 201005
9891928376, 0120-4241060









urban planning needs to be modified as global warming chalanges



राजनीति: नगर नियोजन के नए तकाजे


पिछले दो महीनों के दौरान प्रत्येक महानगर की चकाचौंध और विकास की जमकर पोल खुली।


शहरों में बाढ़ रोकने के लिए पहला काम तो वहां के पारंपरिक जलस्रोतों में पानी की आवक और निकासी के पुराने रास्तों में बन गए स्थायी निर्माणों को हटाने का करना होगा। अगर किसी पहाड़ी से पानी नीचे बह कर आ रहा है तो उसका संग्रहण किसी तालाब में ही होगा। विडंबना है कि ऐसे जोहड़-तालाब कंक्रीट के जंगल में खो गए हैं।
राजधानी दिल्ली हो या फिर भोपाल या बंगलुरुया फिर हैदराबाद, पिछले दो महीनों के दौरान प्रत्येक महानगर की चकाचौंध और विकास की जमकर पोल खुली। यह पहली बार नहीं हो रहा है, लगभग हर साल बरसात में होता है या बगैर बरसात के भी हो जाता है। शहर के वाहन थम जाते हैं। यह भी सच है कि जिस तरह जाम में फंसे आम लोग केवल अपने वाहन के निकलने का रास्ता बना कर इस समस्या से मुंह मोड़ लेते हैं, उसी तरह शहरों के लोग ऐसी कोई भी दिक्कत आने पर हल्ला करना भी मुनासिब नहीं समझते, मीडिया जरूर कुछ सक्रिय रहता है और उसके बाद फिर समाज नोन-तेल-लकड़ीमें व्यस्त हो जाता है। शहरीकरण आधुनिकता की हकीकत है और पलायन इसका मूल, लेकिन नियोजित शहरीकरण ही विकास का पैमाना है। गौर करें कि चमकते-दमकते दिल्ली शहर की डेढ़ करोड़ हो रही आबादी में से कोई चालीस फीसद झोपड़-झुग्गियों में रहती है, यहां की सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था लचर और अपर्याप्त है। मुंबई या कोलकता के हालात भी इससे कहीं बेहतर नहीं हैं।
आर्थिक उदारीकरण के दौर में जिस तरह खेती-किसानी से लोगों को मोह भांग हुआ और जमीन बेच कर शहरों में मजदूरी करने का चलन बढ़ा है, उससे गांवों का कस्बा बनना, कस्बों का शहर और शहर का महानगर बनने की प्रक्रिया तेज हुई है। विडंबना है कि हर स्तर पर शहरीकरण की एक ही गति-मति रही। पहले आबादी बढ़ी, फिर खेत में अनधिकृत कॉलोनी काट कर या किसी सार्वजनिक पार्क या पहाड़ पर कब्जा कर अधकच्चे, उजड़े-से मकान खड़े हुए। कई दशकों तक न तो नालियां बनीं न सड़क, और धीरे-धीरे इलाका अर्बन-स्लममें बदल गया। लोग रहें कहीं भी, लेकिन उनके रोजगार, यातायात, शिक्षा व स्वास्थ्य-सुविधा का दबाव तो उसीचार दशक पुरानेनियोजित शहर पर पड़ा, जिस पर अनुमान से दस गुना ज्यादा बोझ हो गया है। परिणाम सामने है कि दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, कोलकाता जैसे महानगर ही नहीं, देश के आधे से ज्यादा शहरी क्षेत्र अब बाढ़ की चपेट में हैं।
गौर करने लायक बात यह भी है कि साल में ज्यादा से ज्यादा पच्चीस दिन बरसात के कारण बेहाल हो जाने वाले ये शहरी क्षेत्र पूरे साल में आठ से दस महीने पानी की एक-एक बूंद के लिए तरसते हैं। राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान, पटना के एक शोध में सामने आया है कि नदियों के किनारे बसे लगभग सभी शहर अब थोड़ी-सी बरसात में ही दम तोड़ देते हैं। दिक्कत अकेले बाढ़ की नहीं है, इन शहरों की दुरमट मिट्टी में पानी सोखने की क्षमता अच्छी नहीं होती है। चूंकि शहरों में अब गलियों में भी सीमेंट पोत कर आरसीसी सड़कें बनाने का चलन बढ़ गया है और औसतन बीस फीसद जगह ही कच्ची बची है, सो पानी सोखने की प्रक्रिया नदी-तट के करीब की जमीन में तेजी से होती है।
जाहिर है कि ऐसी बस्तियों की उम्र ज्यादा नहीं है और लगातार कमजोर हो रही जमीन पर खड़े कंक्रीट के जंगल किसी छोटे-से भूकम्प से भी ढह सकते हैं। याद करें दिल्ली में यमुना किनारे वाली कई कॉलोनियों के बेसमेंट में अप्रत्याशित पानी आने और ऐसी कुछ इमारतों के गिर जाने की घटनाएं भी हुई हैं। देश की राजधानी दिल्ली के दरवाजे पर खड़े गाजियाबाद में गगनचुंबी इमारतों के नए ठिकाने राजनगर एक्सटेंशन को दूर से देखो तो एक समृद्ध, अत्याधुनिक उपनगरीय विकास का नमूना दिखता है, लेकिन जैसे-जैसे मोहन नगर से उस ओर बढ़ते हैं तो अहसास होने लगता है कि समूचा सुंदर स्थापत्यत एक बदबूदार गंदे नाबदान के किनारे है। जरा और ध्यान से देखें तो साफ हो जाता है कि यह एक भरपूर जीवित नदी का बलात गला घोंट कर कब्जाई जमीन पर किया गया विकास है, जिसकी कीमत फिलहाल तो नदी चुका रही है, लेकिन वह दिन दूर नहीं जब नदी के असामयिक काल कवलित होने का खमियाजा समाज को भी भुगतना होगा। यह दुखद है कि आंध्र प्रदेश जैसे राज्य की नई बन रही राजधानी नदी के जलग्रहण क्षेत्र में बनाई जा रही है और उसका अति बरसात में डूबना तय है।
शहरों में बाढ़ का सबसे बड़ा कारण तो यहां के प्राकृतिक नालों पर अवैध कब्जे, भूमिगत सीवरों की ठीक से सफाई न होना है। लेकिन इससे बड़ा कारण है हर शहर में हर दिन बढ़ते कूड़े का भंडार व उसके निबटान की माकूल व्यवस्था न होना। अकेले दिल्ली में नौ लाख टन कचरा हर दिन बगैर उठाए या बगैर निबटान के सड़कों पर पड़ा रह जाता है। जाहिर है कि बरसात होने पर यही कूड़ा पानी के नाली तक जाने के रास्ते या फिर सीवर के मुंह को बंद करता है। महानगरों में भूमिगत सीवर जल भराव का सबसे बड़ा कारण हैं। जब हम भूमिगत सीवर के लायक संस्कार नहीं सीख पा रहे हैं तो फिर खुले नालों से अपना काम क्यों नहीं चला पा रहे हैं? पोलीथीन, घर से निकलने वाले रसायन और नष्ट न होने वाले कचरे की बढ़ती मात्रा, कुछ ऐसे कारण हैं जो कि गहरे सीवरों के दुश्मन हैं। यदि शहरों में कूड़ा कम करने और उसके निबटारे के कारगर उपाय नहीं हुए तो नालों या सीवर की सफाई के दावे या फिर आरोप बेमानी ही रहेंगे।
एक बात और। बंगलुरुया हैदराबाद या दिल्ली में जिन इलाकों में पानी भरता है अगर वहां की कुछ दशक पुरानी जमीनी संरचना का रिकार्ड उठा कर देखें तो पाएंगे कि वहां पर कभी कोई तालाब, जोहड़ या प्राकृतिक नाला था। अब पानी के प्राकृतिक बहाव के स्थान पर सड़क या कॉलोनी रोपी गई है तो पानी भी तो धरती पर अपने हक की जमीन चाहता है? न मिलने पर वह अपने पुराने स्थानों की ओर रुख करता है। मुंबई में मीठी नदी के उथले होने और सीवर की पचास साल पुरानी व्यवस्था के जर्जर होने के कारण बाढ़ के हालात बनने की हकीकत को सरकारें स्वीकार करती रही हैं। बंगलुरु में पारंपरिक तालाबों के मूल स्वरूप में अवांछित छेड़छाड़ को बाढ़ का कारक माना जाता है।
शहरों में बाढ़ रोकने के लिए सबसे पहला काम तो वहां के पारंपरिक जल स्रोतों में पानी की आवक और निकासी के पुराने रास्तों में बन गए स्थायी निर्माणों को हटाने का करना होगा। अगर किसी पहाड़ी से पानी नीचे बह कर आ रहा है तो उसका संग्रहण किसी तालाब में ही होगा। विडंबना है कि ऐसे जोहड़-तालाब कंक्रीट के जंगल में खो गए हैं। परिणामत: थोड़ी ही बारिश में पानी कहीं बहने की जगह बहकने लगता है। यदि अब भी समाज संभल जाए और नदियों, नालों, पहाड़ों पर अतिक्रमण की प्रवृत्ति से बचे तो कम से कम उनकी बसी-बसाई गृहस्थी जलप्लावित होने से बच सकती है।
शहरीकरण व वहां बाढ़ की दिक्कतों पर विचार करते समय एक वैश्विक त्रासदी को ध्यान में रखना जरूरी है- जलवायु परिवर्तन। इस बात के लिए हमें तैयार रहना होगा कि वातावरण में बढ़ रहे कार्बन और ग्रीनहाउस गैस प्रभावों के कारण ऋतुओं का चक्र गड़बड़ा रहा है और इसकी दुखद परिणति है- मौसम का चरम उतार-चढ़ाव। गरमी में भयंकर गरमी तो ठंड के दिनों में कभी बेतहाशा जाड़ा तो कभी गरमी का अहसास। बरसात में कभी सुखाड़ तो कभी अचानक आठ से दस सेमी पानी बरस जाना। पिछले साल चेन्नई, उससे पहले कश्मीर और इस साल दिल्ली व हैदराबाद में ऐसे चरम मौसम सड़कों को दरिया बना चुके हैं। संयुक्त राष्ट्र की एक ताजा रिपोर्ट तो ग्लोबल वार्मिंग के चलते भारत की चार करोड़ आबादी पर खतरा बता रही है। इसमें कहा गया है कि यदि धरती का तापमान ऐसे ही बढ़ा तो समुद्र का जल-स्तर बढ़ेगा और उसके चलते कई शहरों पर डूब का खतरा होगा। यह खतरा महज समुद्र तटों के शहरों पर नहीं होगा, बल्कि उन शहरों को भी डुबा सकता है जो ऐसी नदियों के किनारे हैं जिनका पानी सीधे समुद्र में गिरता है।
अब यह तय है कि आने वाले दिन शहरों के लिए सहज नहीं होंगे, यह भी तय है कि आने वाले दिन शहरीकरण के विस्तार के हैं, तो फिर किया क्या जाए? आम लोग व सरकार कम से कम कचरा फैलाने का संकल्प लें। पॉलीथिन पर तो पूरी तरह पाबंदी लगे। शहरों में अधिक से अधिक खाली जगह यानी कच्ची जमीन हो, ढेर सारे पेड़ हों। शहरों में जिन स्थानों पर पानी भरता है, वहां उसे भूमिगत करने के प्रयास हों। तीसरा प्राकृतिक जलाशयों व नदियों को उनके मूल स्वरूप में रखने तथा उनके जलग्रहण क्षेत्र को किसी भी रूप में निर्माण-मुक्त रखने के प्रयास हों। पेड़ तो वातावरण की गर्मी को नियंत्रित करने और बरसात के पानी को जमीन पर गिर कर मिट्टी काटने से बचाते ही हैं।
इन सब अनुभवों के मद््देनजर नगर नियोजन की नीति और नियम नए सिरे तय करना जरूरी है। शहरी व्यवस्थाएं, रास्ते, यातायात, बसाहटें इस ढंग से हों कि वे बरसाती पानी के निकास में बाधा न बनें। यही नहीं, वर्षाजल को किस तरह जमीन के नीचे पहुंचाया जाए, यह भी सोचना होगा। अभी इसका तनिक खयाल नहीं रखा जाता, चप्पा-चप्पा कंक्रीट से पटा होता है। फिर, भूमिगत जल का भंडार खाली क्यों नहीं होगा। हमारे शहर पानी की मांग तो अधिकाधिक बढ़ाते जा रहे हैं, पर पानी के संरक्षण और संचयन की योजना नहीं बना रहे हैं। अगर वे अब भी नहीं संभले तो बहुत देर हो जाएगी।


The right to a dignified farewell and a new standard in medical world

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