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शुक्रवार, 9 जून 2017

How can agriculture become profit business

किसान को मेहनत का वाजिब दाम दो !


                                                                      पंकज चतुर्वेदी
बीते 15 दिनों से महाराष्ट्र  और मप्र में किसान आंदोलन मुखर होता जा रहा है। मंदसौर में छह लोगों के मारे जाने के अलावा दर्जनों स्थान पर आगजनी और लूट हुई। करोड़ों के कृषि  व दुग्ध उत्पाद सड़कों पर नष्ट  कर दिए गए।  कम आवक का असर बाजार पर भी दिखा। वहीं केंद्र सरकार के तीन साल के सरकारी प्रचार माध्यम जोर-जोर से चिल्ला रहे हैं कि किसान के जीवन में अब खुशहाली आ गई है क्योंकि उसे फसल-बीमा का सहारा मिल गया है। किसान अब बहुत खुश है कि उसे आसान कर्ज व क्रेडिट कार्ड मिल गया है। हालांकि हकीकत तो उन किसानों से पूछो जो हर रोज पंजाब से लेकर विदर्भ तक कर्ज व खराब फसल के कारण मौत को गले लगा रहे है। किसान की समस्या अकेले मौसमी मार के चलते फसल बेकार होना नहीं है, हर साल हजारों किसान बंपर फसल के कारण हताश हो कर खुदकुशी करते हैं। ऐसे किसानों को ना तो बीमा का कवर है ना ही कर्ज का।

अभी सोशल मीडिया पर एक ऐसे किसान की कहानी चल रही है सिमें डेढ कुंटल प्याज बेचने के बाद किसान को एक रूपया बचने का गणित समझाया गया है। बीते तीन महीने के दौरान मध्यभारत के कई राज्यों में टमाटर व प्याज की फसल के गुड़-गोर होने के किस्से सुनाई देते रहे, लेकिन कोई भी सरकारी एजेंसी माल का सही दमा देने के लिए आगे नहीं आई। कहीं टमाटर मवेशी को खिला दिए गए तो कहीं प्याज सड़क पर फैंक दिया गया। जिन इलाकों में टमाटर और प्याज का यह हाल हुआ, वे भीशण गर्मी की चपेट में आए हैं और वहां कोल्ड स्टोरेज की सुविधा है नहीं । है भी तो टमाटर तो रखते नहीं और प्याज रखने के सौ नखरे। मप्र में राज्य सरकार ने प्याज खरीदी की घोशणा की तो मंडी में पहले दिन महज एक ट्राली प्याज ही बिका, क्योंकि खरीदी के मापदंड में अधिकांश प्याज आया ही नहीं। हताश किसान अपना प्याज वहीं मडी में पटक कर चले गए। यदि देश में इनके दाम बाजार में बढते हैंे तो सारा मीडिया व प्रशासन इस की चिंता करने लगता है , लेकिन किसान की चार महीने की मेहनत व लागत मिट्टी में मिल गई तो कहीं चर्चा तक नहीं हुई।

खेती को लाभ का कार्य बनाने के लिए सन 2007 में प्रख्यात कृशि वैज्ञानिक एम.एस स्वामीनाथन की अध्यक्षता में गठित आयोग ने सरकार को रिपोर्ट सौंपी थी जिसमें किसान को उसके उत्पपाद पर न्यूनतम समर्थन मूल्य पर पचास फीसदी अतिरिक्त भुगतान की बात कही गई थी। चाहे केंद्र सरकार का चुनाव हो या फिर मप्र का पिछला विधान सभा चुनाव, सभी के घोशणा पत्र में इस रिपोर्ट को लागू करने के वायदे किए गए थे।। हालांकि इसमें भी खेती की लागत में जमीन की कीमत को षामिल नहीं किया गया था। लेकिन दुखद कि देश की अर्थ व्यवस्था की रीढ़ कहलाने वाली खेती के विकास के नाम पर बुनियादी सामाजिक सुधारों को लगातार नजरअंदाज किया जाता रहा है । पूरी तरह प्रकृति की कृपा पर निर्भर किसान के श्रम की सुरक्षा पर कभी गंभीरता से सोचा ही नहीं गया । फसल बीमा की कई योजनाएं बनीं, उनका प्रचार हुआ, पर हकीकत में किसान यथावत ठगा जाता रहा- कभी नकली दवा या खाद के फेर में तो कभी मौसम के हाथों । किसान जब ‘‘केश क्राप’’ यानी फल-सब्जी आदि की ओर जाता है तो आढ़तियों और बिचौलियों के हाथों उसे लुटना पड़ता है। पिछले साल उत्तर प्रदेश में 88 लाख मीट्रिक टन आलू हुआ था तो आधे साल में ही मध्यभारत में आलू के दाम बढ़ गए थे। इस बार किसानों ने उत्पादन बढ़ा दिया, अनुमान है कि इस बार 125 मीट्रिक टन आलू पैदा हो रहा है। कोल्ड स्टोरेज की क्षमता बामुश्किल 97 लाख मीट्रिक टन की है। जाहिर है कि आलू या तो सस्ते- मंदे दामों में बिकेगा या फिर फिर किसान उसे खेत में ही सड़ा देगा- आखिर आलू उखाड़ने, मंडी तक ले जाने के दाम भी तो निकलने चाहिए।
हर दूसरे-तीसरे साल कर्नाटक कंे कई जिलों के किसान अपने तीखे स्वाद के लिए मशहूर हरी मिर्चों को सड़क पर लावारिस फैंक कर अपनी हताशा का प्रदर्शन करते हैंे। तीन महीने तक दिन-रात खेत में खटने के बाद लहलहाती फसल को देख कर उपजी खुशी किसान के ओठों पर ज्यादा देर ना रह पाती है। बाजार में मिर्ची की इतनी अधिक आवक होती है कि खरीदार ही नहीं होते। उम्मीद से अधिक हुई फसल सुनहरे कल की उम्मीदों पर पानी फेर देती है- घर की नई छप्पर, बहन की षादी, माता-पिता की तीर्थ-यात्रा; ना जाने ऐसे कितने ही सपने वे किसान सड़क पर मिर्चियों के साथ फैंक आते हैं। साथ होती है तो केवल एक चिंता-- मिर्ची की खेती के लिए बीज,खाद के लिए लिए गए कर्जे को कैसे उतारा जाए? सियासतदां हजारेंा किसानों की इस बर्बादी से बेखबर हैं, दुख की बात यह नहीं है कि वे बेखबर हैं, विडंबना यह है कि कर्नाटक में ऐसा लगभग हर साल किसी ना किसी फसल के साथ होता है। सरकारी और निजी कंपनियां सपने दिखा कर ज्यादा फसल देने वाले बीजों को बेचती हैं, जब फसल बेहतरीन होती है तो दाम इतने कम मिलते हैं कि लागत भी ना निकले।
कृशि प्रधान अर्थव्यवस्था वाले देश में कृशि उत्पाद के न्यूनतम मूल्य, उत्पाद खरीदी, बिचौलियों की भूमिका, किसान को भंडारण का हक, फसल-प्रबंधन जैसे मुद्दे, गौण दिखते हैं और यह हमारे लोकतंत्र की आम आदमी के प्रति संवेदनहीनता की प्रमाण है। सब्जी, फल और दूसरी कैश-क्राप को बगैर सोचे-समझे प्रोत्साहित करने के दुश्परिणाम दाल, तेल-बीजों(तिलहनों) और अन्य खाद्य पदार्थों के उत्पादन में संकट की सीमा तक कमी के रूप में सामने आ रहे हैं। आज जरूरत है कि खेतों में कौन सी फॅसल और कितनी उगाई जाए, पैदा फसल का एक-एक कतरा श्रम का सही मूल्यांकन करे; इसकी नीतियां तालुका या जनपद स्तर पर ही बनें। कोल्ड स्टोरेज या वेअर हाउस पर किसान का कब्जा हो, साथ ही प्रसंस्करण के कारखाने छोटी-छोटी जगहों पर लगें।
अपने दिन-रात, जमा पूंजी लगा कर देश का पेट भरने के लिए खटने वाला किसान की त्रासदी है कि ना तो उसकी कोई आर्थिक सुरक्षा है और ना ही  सामाजिक प्रतिष्ठा , तो भी वह अपने श्रम-कणों से मुल्क को सींचने पर तत्पर रहता है। किसान के साथ तो यह होता ही रहता है - कभी बाढ़ तो कभी सुखाड़, कहीं खेत में हाथी-नील गाय या सुअर ही घुस गया, कभी बीज-खाद-दवा नकली, तो कभी फसल अच्छी आ गई तो मंडी में अंधाधुंध आवक के चलते माकूल दाम नहीं। प्राकृतिक आपदाओं पर किसी का बस नहीं है, लेकिन ऐसी आपदाएं तो किसान के लिए मौत से बदतर होती हैं। किसानी महंगी होती जा रही है तिस पर जमकर बंटते कर्ज से उस पर दवाब बढ़ रहा है। ऐसे में आपदा के समय महज कुछ सौ रूपए की राहत राशि उसके लिए ‘जले पर नमक’ की मांनिंद होती है। सरकार में बैठे लोग किसान को कर्ज बांट कर सोच रहे हैं कि इससे खेती-किसानी का दशा बदल जाएगी, जबकि किसान चाहता है कि उसे उसकी फसल की कीमत की गारंटी मिल जाए। भारत के सकल घरेलू उत्पाद का 31.8 प्रतिशत खेती-बाड़ी में तल्लीन कोई 64 फीसदी लोगों के पसीने से पैदा होता है । यह विडंबना ही है कि देश की अर्थ व्यवस्था की रीढ़ कहलाने वाली खेती के विकास के नाम पर बुनियादी सामाजिक सुधारों को लगातार नजरअंदाज किया जाता रहा है । कहने को सरकारी स्तर पर फसल के बीमा की कई लुभावनी योजनाएं सरकारी दस्तावेजों में मिल जाएंगी, लेकिन अनपढ़, सुदूर इलाकों में रहने वाले किसान इनसे अनभिज्ञ होते हैं। सबसे बड़ी बात कि योजनाओं के लिए इतने कागज-पत्तर भरने होते हैं कि किसान उनसे मुंह मोड लेता हैै।
एक बात जान लेना जरूरी है कि किसान को ना तो कर्ज चाहिए और ना ही बगैर मेहनत के कोई छूट या सबसिडी। इससे बेहतर है कि उसके उत्पाद को उसके गांव में ही विपणन करने की व्यवस्था और सुरक्षित भंडारण की स्थानीय व्यवस्था की जाए। किसान को सबसिडी से ज्यादा जरूरी है कि उसके खाद-बीज- दवा के असली होने की गारंटी हो तथा किसानी के सामानों को नकली बचने वाले को फंासी जैसी सख्त सजा का प्रावधान हो। अफरात फसल के हालात में किसान को बिचौलियों से बचा कर सही दाम दिलवाने के लिए जरूरी है कि सरकारी एजंेसिया खुद गांव-गांव जाकर  खरीदारी करे। सब्जी-फल-फूल जैसे उत्पाद की खरीद-बिक्री स्वयं सहायता समूह या सहकारी के माध्यम से  करना कोई कठिन काम नहीं है। यदि प्रत्येक किसान की बुवाई का रिकार्ड सरकार के पास हो तो उसकी न्यूनतम आय की गणना की जा सकती है। फसल होने पर किसान स्वतंत्र है विपणन के लिए, लेकिन आपदा या अफरात फसल के हालात में उसे न्यूनतम दाम मिले व उसकी फसल पर सरकारी एजेंसी का कब्जा हो। इससे मुआवजा, गिरदावरी जैसी लंबी प्रकियाओ ंसे बचा जा सकता है। एक बात और इस पूरे काम में हाने वाला व्यय, किसी नुकसान के आकलन की सरकारी प्रक्रिया, मुआवजा वितरण, उसके हिसाब-किताब में होने वाले व्यय से कम ही होगा। कुल मिला कर किसान के उत्पाद के विपणन या कीमतों को बाजार नहीं, बल्कि सरकार तय करे।
साहिबाबाद, गाजियाबाद
201005
9891928376

Rethink of river link projects

राजनीतिः नदी जोड़ योजना पर पुनर्विचार जरूरी

जब नदियों को जोड़ने की योजना बनाई गई थी, तब देश व दुनिया के सामने ग्लोबल वार्मिंग, ओजोन क्षरण, ग्रीनहाउस प्रभाव जैसी चुनौतियां नहीं थीं, जबकि गंभीरता से देखें तो नदी जोड़ जैसी परियोजनाएं इन वैश्विक संकटों को और बढ़ा देंगी। ऐसे में यह जरूरी है कि सरकार नई वैश्विक परिस्थितियों में नदियों को जोड़ने की योजना पर नए सिरे से विचार करे।



अभी केंद्र सरकार ने तय कर दिया है कि भारत पेरिस जलवायु समझौते पर अमल करेगा और अपने यहां कार्बन उत्सर्जन घटाने पर गंभीरता से काम करेगा।
अभी केंद्र सरकार ने तय कर दिया है कि भारत पेरिस जलवायु समझौते पर अमल करेगा और अपने यहां कार्बन उत्सर्जन घटाने पर गंभीरता से काम करेगा। ठीक उसी समय हुक्मरान तय कर चुके हैं कि देश में नदियों को जोड़ने की परियोजना लागू करना ही है और उसकी शुरुआत बुंदेलखंड से होगी जहां केन व बेतवा को जोड़ा जाएगा। असल में आम आदमी नदियों को जोड़ने का अर्थ समझता है कि किन्हीं पास बह रही दो नदियों को किसी नहर जैसी संरचना के माध्यम से जोड़ दिया जाए, जिससे जब एक में पानी कम हो तो दूसरे का उसमें मिल जाए। पहले यह जानना जरूरी है कि असल में नदी जोड़ने का मतलब है, एक विशाल बांध और जलाशय बनाना और उसमें जमा दोनों नदियों के पानी को नहरों के माध्यम से उपभोक्ता तक पहुंचाना। केन-बेतवा जोड़ योजना कोई बारह साल पहले जब तैयार की गई थी तो उसकी लागत पांच सौ करोड़ के करीब थी।
अभी वह कागज पर ही है और 2015 में इसकी अनुमानित लागत अठारह सौ करोड़ तक पहुंच गई। सबसे बड़ी बात यह कि जब नदियों को जोड़ने की योजना बनाई गई थी, तब देश व दुनिया के सामने ग्लोबल वार्मिंग, ओजोन क्षरण, ग्रीनहाउस प्रभाव जैसी चुनौतियां नहीं थीं, जबकि गंभीरता से देखें तो नदी जोड़ जैसी परियोजनाएं इन वैश्विक संकटों को और बढ़ा देंगी।
जलवायु परिवर्तन के कारण चेन्नई में पिछले साल और उससे पहले कश्मीर में आई तबाही की बानगी शायद बुंदेलखंडवासी भूल गए हों, लेकिन वे इस बार उसी प्राकृतिक आपदा का स्वाद चख रहे हैं। तीन साल के भयंकर सूखे के बाद इस बार जो बरख बरस रहे हैं कि कई जगह पंद्रह दिनों से जनजीवन ठप है। सैकड़ों जगह ऐसी हैं जहां तालाबों की जल-निकासी के पारंपरिक ‘ओने’ खोलना पड़ा है। बरसात की त्रासदी इतनी गहरी है कि भले ही जल-स्रोत लबालब हो गए हैं लेकिन खेतों में बुआई नहीं हो पाई और जहां हुई वहां बीज सड़ गए। ग्लोबल वार्मिंग से उपज रही जलवायु अनियमितता और इसके दुष्प्रभाव के प्रति सरकार व समाज में बैठे लोग कम ही वाकिफ या जागरूक हैं। यह भी जान लें कि आने वाले दिनों में यह संकट और गहराना है, खासकर भारत में इसके कारण मौसम के चरम रूप यानी असीम गरमी, भयंकर ठंड, बेहिसाब सूखा या बरसात। प्राय: जिम्मेदार लोग यह कह कर पल्ला झाड़ते दिखते हैं कि यह तो वैश्विक संकट है, हम इसमें क्या कर सकते हैं!
केन और बेतवा दोनों का ही उद्गम स्थल मध्यप्रदेश में है। दोनों नदियां लगभग समांतर एक ही इलाके से गुजरती हुई उत्तर प्रदेश में जाकर यमुना में मिल जाती हैं। जाहिर है, जब केन के जलग्रहण क्षेत्र में अल्पवर्षा या सूखे का प्रकोप होगा तो बेतवा की हालत भी ऐसी ही होगी। तिस पर अठारह सौ करोड़ (भरोसा है कि जब इस पर काम शुरू होगा तो यह राशि बाईस सौ करोड़ तक पहुंच जाएगी) की योजना न केवल संरक्षित वन का नाश, हजारों लोगों के पलायन का कारक बन रही है, बल्कि इससे उपजी संरचना दुनिया का तापमान बढ़ाने में ही मददगार होगी।
नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर स्पेस रिसर्च (आइएनपीसी), ब्राजील का एक गहन शोध है कि दुनिया के बड़े बांध हर साल 104 मिलियन मीट्रिक टन मीथेन गैस का उत्सर्जन करते हैं और यह वैश्विक तापमान में वृद्धि के कुल मानवीय योगदान का चार फीसद है। सनद रहे कि बड़े जलाशय, दलदल बड़ी मात्रा में मीथेन का उत्सर्जन करते हैं। ग्लोबल वार्मिंग के लिए जिम्मेवार मानी जाने वाली गैसों को ग्रीनहाउस गैस कहते हैं। इनमें मुख्य रूप से चार गैसें- कार्बन डाइआॅक्साइड, मीथेन, नाइट्रस आॅक्साइड और सल्फर हेक्साफ्लोराइड- तथा दो गैस-समूह- हाइड्रोफ्लोरोकार्बन और परफ्लोरोकार्बन शामिल हैं। ग्रीनहाउस गैसों के अत्यधिक उत्सर्जन से वायुमंडल में उनकी मात्रा निरंतर बढ़ती ही जा रही है। ये गैसें सूर्य की गर्मी के बड़े हिस्से को परावर्तित नहीं होने देतींं, जिससे गर्मी की जो मात्रा वायुमंडल में फंसी रहती है, उससे तापमान में वृद्धि हो जाती है।
पिछले बीस से पचास वर्षों में वैश्विक तापमान में करीब एक डिग्री सेंटीग्रेड की वृद्धि हो चुकी है। केन-बेतवा को जोड़ने के लिए छतरपुर जिले के ढोढन में 77 मीटर ऊंचा और 2031 मीटर लंबा बांध बनाया जाएगा। इसके अलावा 221 किलोमीटर लंबी नहरें भी बनेंगी। इससे होने वाले वनों के नाश और पलायन को अलग भी रख दें तो भी निर्माण, पुनर्वास आदि के लिए जमीन तैयार करने व इतने बड़े बांध व नहरों से इतना दलदल बनेगा और यह मीथेन गैस उत्सर्जन का बड़ा कारक साबित होगा। भारत आज कोई 3 करोड़ 35 लाख टन मीथेन उत्सर्जन करता है और हमारी सरकार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसे कम करने के लिए प्रतिबद्ध है।
इस परियोजना का सबसे बड़ा असर दुनिया भर में मशहूर तेजी से विकसित बाघ क्षेत्र के नुकसान के रूप में भी होगा। पन्ना नेशनल पार्क का 41.41 वर्ग किलोमीटर वह क्षेत्र पूरी तरह जलमग्न हो जएगा, जहां आज तीस बाघ हैं। सनद रहे कि 2006 में यहां बाघ बिल्कुल नहीं थे। सिर्फ बाघों की संरक्षित रिहाइश नष्ट नहीं होगी, जंगल के तैंतीस हजार पेड़ भी काटे जाएंगे। यह भी जान लें कि इतने पेड़ तैयार होने में कम से कम आधी सदी का समय लगेगा। जाहिर है, जंगल कटाई व वन का नष्ट होना, जलवायु परिवर्तन को प्रभावित करने वाले कारक हैं। यही नहीं, जब यह परियोजना बनाई गई थी, तब बाघ व जंगली जानवर कोई विचारणीय मसले थे ही नहीं, जबकि आज दुनिया के सामने जैव विविधता संरक्षण एक बड़ी चुनौती है।


राष्ट्रीय जल संवर्धन प्राधिकरण के दस्तावेज बताते हैं कि भारत में नदी जोड़ की मूलभूत योजना 1850 में पहली बार सर आर्थर कॉटन ने बनाई थी, फिर 1972 में डॉ केएल राव ने गंगा और कावेरी जोड़ने पर काम किया था। सन 1978 में केप्टन डास्टर्स का गार्लेड नहर योजना पर काम हुआ और सन 1980 में नदी जोड़ की राष्ट्रीय परियोजना तैयार हुई। आज देश में इस सिलसिले में जिन परियोजनाओं पर विचार हो रहा है उसका आधार वही 1980 के दस्तावेज हैं। सन 1980 में जलवायु परिवर्तन या ग्रीनहाउस गैसों की कल्पना भी नहीं हुई थी। कहने की जरूरत नहीं कि यदि इस योजना पर काम शुरू भी हुआ तो कम से कम एक दशक इसे पूरा होने में लगेगा व इस दौरान अनियमित जलवायु, नदियों के अपने रास्ता बदलने की त्रासदियां और गहरी होंगी।
ऐसे में जरूरी है कि सरकार नई वैश्विक परिस्थितियों में नदियों को जोड़ने की योजना पर नए सिरे से विचार करे। इतने बड़े पर्यावरणीय नुकसान, विस्थापन, पलायन और बहुत सारा धन व्यय करने के बाद भी बुंदेलखंड के महज तीन से चार जिलों को मिलेगा क्या, इसका आकलन भी जरूरी है। इससे एक चौथाई से भी कम धन खर्च कर समूचे बुंदेलखंड के पारंपरिक तालाबों, बावड़ी कुओं और जोहड़ों की मरम्मत की जा सकती है। सिकुड़ गई छोटी नदियों को उनके मूल स्वरूप में लाने के लिए काम हो सकता है। गौर करें कि अंग्रेजों के बनाए पांच बांध सौ साल में दम तोड़ गए हैं, आजादी के बाद बने तटबंध व स्टाप डैम पांच साल भी नहीं चले, लेकिन समूचे बुंदेलखंड में एक हजार साल पुराने चंदेलकालीन तालाब, लाख उपेक्षा व रखरखाव के अभाव के बावजूद आज भी लोगों के गले व खेत तर कर रहे हैं। उनके आसपास लगे पेड़ व वहां पल रहे जीव स्वयं ही उससे निकली मीथेन जैसी ग्रीनहाउस गैसों का शमन भी करते हैं।

बुधवार, 7 जून 2017

Terrorism trying to enter in Punjab again

भारी पड़ सकती है पंजाब की अनदेखी
पंकज चतुर्वेदी
आपरेषन ब्लू स्टार की 33वी बरसी पर पंजाब के कई अखबारों में विज्ञापन छपे, भिंडरावाले के फोटो वाले विज्ञापन। फिर हरमिंदर साहिब में कुछ लोगों ने पृथक खालिस्तान राश्ट्र के समर्थन में नार लगा दिए। यह हमारी आतंकवाद-विरोधी नीति के साथ मजाक है कि देष में मुस्लिम के अलावा अन्य किसी को आतंकवादी माना नहीं जाता। अफजल गुरू की फांसी पर एक कौम या राज्य को कटघरे में खड़ा किया जाता है लेकिन सुप्रीेम कोर्ट से सजा पाए भूल्लर के मामले में सहानुभूति की बात होती है। कष्मीर में पाकिस्तान और आईएसआई का खेल खुल गया तो वे एक बार फिर अपने पुराने ठिकाने को टटोलने लगे। कैसी विउंबना है कि जो कनाड़ा कभी भारत की आजादी के संषस्त्र संघर्श ‘‘गदर आंदोलन’’ का केंद्र रहा, वहां आज कुछ सिख परिवार भारत के ही खिलाफ साजिषों को गढ़ रहे हैं। लोग भले नहीं होंगे कि कुछ महीनों पहले देष की सबसे सुरक्षित माने जाने वाली जेल में कई साल से समानांतर चल रही दुनिया का खुलासा हुआ था, जहां अपराधी फेसबुक पर पोस्ट लगा कर धमकियां दे रहे थे, खालिस्तान लिबरेषन फोर्स का मुखिया स्काईप पर पाकिस्तान बात करता था। यह अकेले एक जेल के हालात नहीं थे, राज्य में वे सभी जेल जहां जमींदोज हो चुके खालिस्तान अंादोलन से जुड़़े लेाग बंद थे, वहां हालात ऐसे ही थे। राज्य में सरकार बदलने के बाद हालात भी बदले और धीरे-धीरे सामने आने लगा कि किस तरह अकाली अपनी तयषुदा हर से बचने के लिए खाड़कुओं को षह दे रहे थे। यही नहीं सतलुज-यमुना लिंक विवाद के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद छोटे-छोटे गांव में इसे सिखों के साथ अन्याय व अलग देष की मांग एकमात्र हल जैसी सभाएं हुई, जिसे सरकार नजरअंदाज करती रही।

यही नहीं खलिस्तान लिबरेषन फोर्स के प्रमुख हरमिंदर सिंह के भागने व अचानक दिल्ली में रेलवे स्टेषन पर पकड़े जाने पर भी सवालिया निषान है। समझा जा रहा है कि असल में यह साजिष का ही हिस्सा था कि बूढे, बेकार हो गए आतंकी को पकड़वा कर पुलिस की पीठ भी थपथ्पाा ला जाए और असल में जिन्हे छूमंतर होना था, वे हो भी जाएं।
सनद रहे पंजाब में बड़े बदमाष या गिरोहबाज थेाडे दिनों बाद खुद को खाड़कू कहने लगते हैं। और ऐसे गिरोहों को पाकस्तिान के एजेंट अपना मोहरा बना लेते है।। विडंबना है कि हमारे देष के राश्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार कभी पंजबा में आतंकवाद विरोधी मुहिम के विषेशज्ञ माने जाते थें और आज सुलगते पंजाब का अनदेखी की जा रही है।
पिछले साल पंजाब के पठानकोट के अकालगढ में वायु सेना के षिविर पर हुए आतंकंी हमले को ले कर कई बातें हवा में उड़ती रही और वहां मारे गए आतंकियों की पहचान अभी तक उजागर नहीं की गई। पूरे मामले में एक वरिश्ठ पुलिस अफसर की संदिग्ध भूमिका पर अभी भी षंकाओं के बादल छाए है, जिसकी गाड़ी ले कर आतंकी वायु सेना अड्डे तक पहुंचे थे। इस घटना के बाद मई में पंजाब की खुफिया एजेंसी ने एक रपट केंद्र को भेजी थी, जिसमें बताया गया था कि कनाड़ा में ब्रिटिष कोलंबिया के ‘‘मिषन सिटी’’ में पंजाब से भगोड़ा घोशित आतंकी हरदीप निज्जर खालिस्तान टेरर फोर्स के नाम से संगठन चला रहा है। जहां भारत के खिलाफ जहर उगलने व हथियारों की ट्रैनिंग भी दी जा रही है। रिपोर्ट में पाकसितान के रास्ते हथियार आने की भी चेतावनी थी। उधर खालिस्तान जिंदाबाद फोर्स के रंजीत सिंह नीता द्वारा पाकिस्तान में हिजबुल आतंकियों को सिख धर्म, परंपरा, गुरूमुखी, पंजाब के रास्तों, जंगलों का प्रषिक्षण देने के भी  प्रमाण सरकार के पास हैं।
अभी एक साल पहले ही पाकिस्तान की सीमा के करीबी फरीदकोट जिले के बरगड़ी गांव में पवित्र ग्रंथ श्री गुरूग्रंथ सहिब के 110 पन्ने कटे-फटे हालात में सड़कों पर मिले। बताया गया कि यह पन्ने जून महीने में बुर्ज जवाहर सिंह गांव के गुरूद्वारे से चोरी किए गए ग्रंथ साहेब के थे। उसके बाद कोई दो दषक बाद  वहां इतनी बड़ी संख्या में अर्धसैनिक बलों को उतारना पड़ा था। यही नहीं पंजाब की आग अब पडोसी राज्य हरियाणा तक फैल गई है। 23 अक्तूबर को सिरसा, अंबाला सहित कई जिलों में बंद व जुलूस निकाले गए जिससे जीटी रोड ठप रही । उस समय भी पंजाब पुलिस ने कहा था कि मसला और भी गंभीर है क्योंकि इस पूरे उपद्रव के तार दूर देषों से जुड़े हैं। पुलिस का दावा था कि पंजाब के पांच जिलों में कुछ संदिग्ध लेागों के पास विदेष से खूब पैसा आया था।
यही नहीं पिछले साल जून में ही खालिस्तान समर्थकों ने खूब सिर उठाया था, ब्लू स्टार की बरसी के नाम पर जगह-जगह जलसे हुए थे। सटे हुए जम्मू में तो कई दिन कफ्र्यु लगाना पड़ा था क्योंकि वहां पुलिस से भिडंत में कई मौत हुई थीं। जून महीने के आसपास ही मनिंदरजीत सिंह बिट्टा की हत्या के लिए बम फोड़कर नौ लोगों की हत्या के अपराधी देवेन्द्रपाल सिंह भुल्ल्र को दिल्ली की तिहाड़ जेल से तबादला करवा कर अमृतसर बुलाया गया और वहां एक अस्पताल में एसी कमरे में रखा गया।
यह किसी से छिपा नहीं है कि हारनेे के बाद अकाली काफी कुछ पंथिक एजेंडे की ओर मुड़ गए हैं और केंद्र सरकार में साझेदार होने के कारण एनकी हरकतों को नजरअंदाज किया जाता है। बेहतर आर्थिक स्थिति के मार्ग पर तेजी से आगे बढ़ने वाले पंजाब राज्य में आतंकवादियों पर नरम रवैया तथा अफवाहों का बाजार भी उतना ही तेजी से विकसित हो रहा है, जितनी वहां की समृद्धता । ऐसी सच्ची-झूठी खबरें लोगों के बीच भ्रम, डर व आषंकाएं पैदा कर रही हैं, आम जन-जीवन को प्रभावित कर रही हैं और कई बार भगदड़ के हालात निर्मित कर रही हैं । विडंबना है कि बेसिर पैर की इन लफ्फाजियों के पीछे असली मकसद को पता करने में सरकार व समाज दोनो ही असफल रहे हैं । यह जीवट, लगन और कर्मठता पंजाब की ही हो सकती है, जहां के लोगों ने खून-खराबे के दौर से बाहर निकल कर राज्य के विकास के मार्ग को चुना व उसे ताकतवर बनाया । बीते एक दशक के दौरान पंजाब के गांवों-गांवों तक विकास की धारा बही है । संचार तकनीक के सभी अत्याधुनिक साधन वहां जन-जन तक पहुंचे हैं, पिछले कुछ सालों में यही माध्यम वहां के अफवाहों का वाहक बना है ।
फेसबुक या गूगल पर खोज करें तो खालिस्तान, बब्बर खालसा, भिंडरावाले जैसे नामों पर कई सौ पेज वबेसाईट उपलब्ध हैं। इनमें से अधिकांष विदेषों से संचालित है। व कई एक पर टिप्पणी करने व समर्थन करने वाले पाकिस्तान के हैं। यह बात चुनावी मुद्दा बन कर कुछ हलकी कर दी गई थी कि पंजाब में बड़ी मात्रा में मादक दवाओं  की तस्करी की जा रही है व युवा पीढ़ी को बड़ी चालाकी से नषे के संजाल में फंसाया जा रहा है। सारी दुनिया में आतंकवाद अफीम व ऐसे ही नषीले पदार्थों की अर्थ व्यवस्था पर सवार हो कर परवान चढा हे। पंजाब में बीते दो सालें में कई सौ करोड़ की हेरोईन जब्त की गई है व उसमें से अधिकांष की आवक पाकिस्तान से ही हुई। स्थानीय प्रषासन ने इसे षायद महज तस्करी का मामला मान कर कुछ गिरफ्तारियों के साथ अपनी जांच की इतिश्री समझ ली, हकीकत में ये सभी मामले राज्य की फिजा को खराब करने का प्रयास रहे हैं।
अभी 31 मई को बठिंडा पुलिस ने एक महिला सहित चार ऐसे खलिस्तानी आतंकियो को हथियार सहित पकड़ा था जो कि दिल्ली में सज्जन कुमार और टाईटलर की हत्या करना चाहते थे। उनके भी तार कनाड़ा से जुड़े मिले हैं। जरा कुछ पीछे ही जाएं, सितंबर- 2014 में बब्बर खालसा का सन 2013 तक अध्यक्ष रहा व बीते कई दषकों से पाकिस्तान में अपना घर बनाएं रतनदीप सिंह की गिरफ्तारी पंजाब पुलिस ने की। उसके बाद  जनवंबर- 14 में ही दिल्ली हवाई अड्डे से खलिस्तान लिबरेषन फोर्स के प्रमुख हरमिंदर सिंह उर्फ मिंटू को एक साथी के साथ गिरफ्तार किया गया। ये लेाग थाईलैंड से आ रहे थे। यही मिंटू नाभा जेल से भागा व दिल्ली में 27 नवंबर को ही पकड़ लिया गया। पंजाब के मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या के मामले में सजायाफ्ता व  सन 2004 में अतिसुरक्षित कहे जाने वाली चंडीगढ की बुढैल जेल से सुरंग बना कर फरार हुए जगतार सिंह तारा को जनवरी-2015 में थाईलैंड से पकड़ा गया। एक साथ विदेषों में रह कर खालिस्तानी आंदोलन को जिंदा रखने वाले षीर्श आतंकवादियों के भारत आने व गिरफ्तार होने पर भले ही सुरक्षा एजेंसिंयां अपनी पीठ ठोक रही हों, हकीकत तो यह है कि यह उन लोगों का भारत में आ कर अपने नेटवर्क विस्तार देने की येाजना का अंग था। भारत में जेल अपराधियों के लिए सुरक्षित अरामगाह व साजिषों के लिए निरापद स्थल रही है। रही बची कसर जनवरी-15 में ही राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रकाष सिंह बादल ने 13 कुख्यात सजा पाए आतंकवादियों को समय से पहले रिहा करने की मांग कर दी थी जिसमें जगतार सिंह तारा भी एक था। कुल मिला कर देखे तो जहां एक तरफ राज्य सरकार पंथक एजेंडे की ओर लौटती दिख रही है तो इलाके में मादक पदार्थों की तस्करी की जड़ तक जाने के प्रयास नहीं हो रहे हैं।
यह कैसी विडंबना है कि पंजाब के अखबारों में षहीदी समागम के नाम पर करोड़ांे के विज्ञापन दिए जाते हैं और सरकार इस पर मौन रहती है। फिर ऐसे में दो दशक पहले तक संवेदनशील रहे सीमावर्ती राज्य को ले कर केंद्र सरकार का आंखें मूंदे रखना कहीं कोई गंभीर परिणाम भी दे सकता है ।

पंकज चतुर्वेदी



better to fall of Maharaja

ऐसे महाराज का तो पतन ही बेहतर

एयर इंडिया

                                                          पंकज चतुर्वेदी



 सरकार के वित्त मंत्री अरूण जेटली नीति आयोग के उस सुझाव से सहमत दिख रहे हैं जिसमें कहा गया है कि कर्ज में दबी एयर इंडिया का पूर्ण निजीकरण कर दिया जाना चाहिए। हालांकि नागर विमानन मंत्रालय, एयर इंडिया को आर्थिक द्रिष्टी से व्यावहारिक बनाने के लिए सभी संभावित विकल्पों पर विचार कर रहा है। सनद रहे कि जहां भारत में हवाई यात्रा का व्यवसाय सफलता के नए आयाम रच रहा है वहीं सरकारी कंपनी एयर इंडिया का कर्ज व घाटा दिन-दुगना रात चौगुना होता जा रहा है। यही नहीं सरकारी यात्राओं में एयर इंडिया की अनिवार्यता दूसरे महकमों के लिए भी घाटे का सौदा बनता जा रहा है। इस समय एया इंडिया का घाटा 52 हजार करोड़ को पार कर चुका है। सन 2012 में तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार ने एयर इंडिया के लिए 30,000 करोड़ रुपये के राहत पैकेज की घोषणा की थी, जो कि दस साल के दौरान दिया जाएगा। इसी पैकेज के बूते एयर इंडिया परिचालन में बनी हुई है। जिसमें विमान खरीदने से संबंधित 21,000 करोड़ और एयर इंडिया को चलाने के लिए 8,000 करोड़ का कर्ज है। हालांकि एयर इंडिया के कर्मचारी और कई संगठन निजीकरण के विरोध में हैं। लेकिन जनता के कर के पैसे से चल रहे इस संस्थान के कर्मचारी हैं कि खुद के पैर पर खड़े होने को तैयार नहीं है। पिछले दिनों मुंबई से उड़ने वाली एक उड़ान इस लिए पांच घंटे लेट हो गई क्योंकि पायलट व स्टाफ एक साथी की जन्मदिन मना रहे थे। कभी क्रू मेंबर नहीं पहुंचे तो कभी जहाज ही हवाई अड्डे नहीं पहुंचा, कभी पायलेट की कमी हो गई ... भारत की सरकारी विमान कंपनी में यह आए रोज की बात है। बेचारे सरकारी कर्मचारियों पर पाबंदी है कि उन्हें अपने सरकारी दौरे इसी एयरलाइंस से करने हैं, सो जहाज में लोग दिखते भी हैं। बेहद जर्जर प्रबंधन, लागातर घाटे व आम लोगों की अपेक्षाओं पर खरा उतरने में अक्षम रही एयर इंडिया को अब सरकारी इमदाद के बल पर जिंदा रखना हमारे संसाधनों का दुरूपयोग ही दिखता है। दुनिया की सबसे घटिया एयरलाइंस में तीसरे नंबर पर शुमार एयर इंडिया का घाटा खत्म करने के लिए सरकार पिछले नौ साल में तीस हजार करोड़ व्यय कर चुकी है। इस धन से कश्मीर से कन्याकुमारी तक और गुजरात से असम तक दो लेन के हाईवे बन सकते थे।सार्वजनिक क्षेत्र की विमानन कंपनी एयर इंडिया को आईआईएम अमदाबाद के प्रो. रवीन्द्र ढोलकिया के अगुवाई में बने विशेष दल ने कुछ साल पहले बचत बढ़ाने व खर्च घटाने के लिए निजी एयर लाईंस से सबक लेने की सलाह दी थी। फिर धर्माधिकारी समिति कर्मचारियों के वेतनमान व भत्तों की सिफारिश की। ढोलकिया कमेटी ने नागरिक उड्डयन मंत्रालय को सौंपी गई रिपोर्ट में कुल 46 सिफारिशें थीं। इसमें कहा गया है कि प्रति दिन 14 करोड़ के परिचालन घाटे को कम करने के लिए एयर लाईस को कर्मचारियोें की संख्या और कम करनी होगी। सनद रहे कि जब इतने कर्मचरियों के होने पर भी मानवीय कमियों के कारण परिचालन व प्रबंधन में इतनी अव्यवस्थाएं हैं तो कर्मचारी कम होने पर इसका क्या हाल होगा। यह समिति एयर इंडिया के कर मुक्ति 10 हजार करोड़ के बांड जारी करने की बात भी कहती है - जरा सोचें कि इतने बड़े घाटे व कुव्यवस्था को झेल रही कंपनी के बांड कौन लेगा?ढोलकिया समिति का सुझाव है कि ट्रेवल एजेंट को दिया जाने वला एक प्रतिशत कमीशन बंद किया जाए, इसके ऐवज में एजेंट ग्राहक से सुविधा शुल्क ले लें। यह किसी से छिपा नहीं है कि निजी एयरलाइंस एजेंटों को ज्यादा मुनाफा देती है। ऐसे में उनका एक फीसद भी बंद हो जाने पर एयर इंडिया का टिकट कौन बेचना चाहेगा। यदि केवल सरकारी कर्मचारियों के बदौलत एयरलाइंस चलानी है तो सरकार के एक जेब से पैसा निकाल कर दूसरी जेब में देने की इस घाटे व घोटालों भरी प्रक्रिया पर विराम लग जाना ही बेहतर होगा। एयर इंडिया के अधिकांश उड़ानों के समय पर निजी एयरलाइंस पहले ही कब्जा किए हुए हैं, निजी कंपनियों का स्टाफ बेहद प्रोफेशनल तरीके से सवारियों से व्यवहार करता है उनके विमानों के देरी से उड़ने का प्रतिशत बहुत कम है- जाहिर है कि इनसे मुकाबला करना या पार पाना ‘‘महाराज’ के बस का नहीं है, क्योंकि राजा तो कभी कुछ गलत करता ही नहीं है, सो उसके सुधरने की कोई गुंजाईश नहीं है।

रविवार, 4 जून 2017

Global warming threat to earth

तापमान से संकट में अस्तित्व 

इन दिनों नौतपा चल रहा है। कहते हैं कि ये दिन जितने तपते हैं, उतने ही मेघ बरसते हैं। लेकिन असलियत तो यह है कि नौतपा से पंद्रह दिन पहले ही देश के बड़े हिस्से का मिजाज 48 डिग्री तक पहुंच गया। नौतपा में तो पूरे देश में बरसात हो रही है। गत पंद्रह दिनों से कभी तेज धूप होती है तो कहीं बादल व बूंदाबांदी और अचानक ठंड-सी लगने लगती है। जरा गंभीरता से अपने अतीत के पन्नों का पलट कर देखें तो पाएंगे कि मौसम की यह बेईमानी बीते एक दशक से कुछ ज्यादा ही समाज को तंग कर रही है।

हाल ही में अमेरिका की स्पेस एजेंसी नासा ने भी कहा है कि फरवरी महीने में ही तापमान में अप्रत्याशित वृद्धि ने पूर्व के महीनों के रिकार्ड को तोड़ दिया है। नासा के आंकड़ों के अनुसार, यह पर्यावरण के लिए उत्पन्न होनेवाले खतरे के संकेत हैं। बीते शनिवार को डाटा जारी होने के बाद उनका अध्ययन कर भूमिगत तापमान पर अपने ब्लाग में जेफ मास्टर्स और बाब हेनसन ने लिखा है कि यह मानव उत्पादित ग्रीन हाउस गैसों के नतीजतन वैश्विक तापमान में लंबे समय में वृद्धि की चेतावनी है। मार्च की शुरुआत में प्रारंभिक नतीजों से यह सुनिश्चत हो गया है कि तापमान में वृद्धि के रिकार्ड टूटने जा रहे हैं। 1951 से 1980 के मध्य की आधार अवधि की तुलना में धरती की सतह और समुद्र का तापमान फरवरी में 1.35 डिग्री सेल्सियस अधिक रहा है। जबकि इस जनवरी में ही आधार अवधि का रिकार्ड टूट चुका है।आखिर ऐसा क्यों हो रहा है और इस बदलाव के कारण धरती किस दिशा में जा रही है, इसके लिए जरा भारत के आदिग्रंथ महाभारत के एक हिस्से को बांचते हैं। करीब पांच हजार वर्ष पूर्व के ग्रंथ महाभारत में ‘वनपर्व’ में महाराजा युधिष्ठिर का मार्कंडेय ऋषि से मार्मिक संवाद दर्ज है। युधिष्ठिर मार्कंडेय ऋषि से विनम्रता पूर्वक पूछते हैं- ‘महामुने, आपने युगों के अंत में होनेवाले अनेक महाप्रलय के दृश्य देखे हैं, मैं आपके श्रीमुख से प्रलयकाल का निरूपण करने वाली कथा सुनना चाहता हूं।’ इसमें ऋषि जवाब देते हैं- ‘हे राजन, प्रलय काल में सुगंधित पदार्थ नासिका को उतने गंधयुक्त प्रतीत नहीं होंगे। रसीले पदार्थ स्वादिष्ट नहीं रह जाएंगे। वृक्षों पर फल और फूल बहुत कम हो जाएंगे और उन पर बैठने वाले पक्षियों की विविधता भी कम हो जाएगी। वर्षाऋतु में जल की वर्षा नहीं होगी। ऋतुएं अपने-अपने समय का परिपालन त्याग देंगी।

वन्य जीव, पशु-पक्षी अपने प्राकृतिक निवास के बजाय नागरिकों के बनाए बगीचों और विहारों में भ्रमण करने लगेंगे। संपूर्ण दिशाओं में हानिकारक जंतुओं और सर्पों का बाहुल्य हो जाएगा। वन-बाग और वृक्षों को लोग निर्दयतापूर्वक काट देंगे।’ कृषि और व्यापार पर टिप्पणी करते हुए मार्कंडेय ऋषि कहते हैं- ‘भूमि में बोए हुए बीज ठीक प्रकार से नहीं उगेंगे। खेतों की उपजाऊ शक्ति समाप्त हो जाएगी। लोग तालाब-चरागाह, नदियों के तट की भूमि पर भी अतिक्रमण करेंगे। समाज खाद्यान्न के लिए दूसरों पर निर्भर हो जाएगा।’ वे आगे कहते हैं- ‘हे राजन, एक स्थिति ऐसी भी आएगी कि जनपद जन-शून्य होने लगेंगे। गरीब लोग और अधिकांश प्राणी भूख से बिलबिलाकर मरने लगेंगे। चारों ओर प्रचंड तापमान संपूर्ण तालाबों, सरिताओं और नदियों के जल को सुखा देगा। लंबे काल तक पृथ्वी पर वर्षा होनी बंद हो जाएगी। प्रचंड तेज वाले सात सूर्य उदित होंगे और जो कुछ भी धरती पर शेष रहेगा, उसे वे भस्मीभूत कर देंगे।’ फिर लौटकर अपने मूल सवाल पर आते हैं कि फरवरी के तापमान में खतरनाक स्तर पर वृद्धि आखिर क्यों हुई? इस माह वैश्विक तापमान में 1.35 सेल्सियस की बढ़ोतरी हुई। धरती की सतह का इस तरह गरम होना चिंताजनक है और हालात मार्कंडेय ऋषि द्वारा किए गए वर्णन के ही रहे हैं। तापमान ऊर्जा का प्रतीक तो है, लेकिन इसके संतुलन बिगड़ने का अर्थ है हमारे अस्तित्व पर संकट। यह तो सभी जानते हैं कि वायुमंडल में सभी गैसों की मात्रा तय है और 750 अरब टन कार्बन कार्बन डायआक्साइड के रूप में वातावरण में मौजूद है। कार्बन की मात्रा बढ़ने का दुष्परिणाम है कि जलवायु परिवर्तन व धरती के गरम होने जैसेे प्रकृतिनाशक बदलाव हम झेल रहे हैं। कार्बन की मात्रा में इजाफे से दुनिया पर तूफान, कीटों के प्रकोप, सुनामी या ज्वालामुखी जैसे खतरे मंडरा रहे हैं। दुनिया पर तेजाबी बारिश की संभावना बढ़ने का कारक भी है कार्बन की बेलगाम मात्रा। धरती में कार्बन का बड़ा भंडार जंगलों में हरियाली के बीच है। पेड़, प्रकाश संश्लेषण के माध्यम से हर साल कोई सौ अरब टन यानी पांच फीसदी कार्बन वातावरण में पुनर्चक्रित करते है। आज विश्व में अमेरिका सबसे ज्यादा एक करोड़ तीन लाख 30 हजार किलो टन कार्बन डायआक्साइड उत्सर्जित करता है जो कि वहां की आबादी के अनुसार प्रति व्यक्ति 7.4 टन है। उसके बाद कनाड़ा प्रति व्यक्ति 15.7 टन, फिर रूस 12.6 टन हैं । जापान, जर्मनी, दक्षिण कोरिया आदि औद्योगिक देशों में भी कार्बन उत्सर्जन दस टन प्रति व्यक्ति से ज्यादा ही है। इसकी तुलना में भारत महज 20 लाख 70 हजार किलो टन या प्रति व्यक्ति महज 1.7 टन कार्बन डायआक्साइड ही उत्सर्जित करता है। अनुमान है कि यह 2030 तक तीन गुना यानी अधिकतम पांच टन तक जा सकता है। इसमें कोई शक नहीं कि प्राकृतिक आपदाएं देशों की भौगोलिक सीमाएं देखकर तो हमला करती नहीं हैं। चूंकि भारत नदियों का देश है, वह भी अधिकतर ऐसी नदियां जो पहाड़ों पर बरफ पिघलने से बनती हैं, सो हमें हरसंभव प्रयास करने ही चाहिए।कार्बन उत्सर्जन की मात्रा कम करने के लिए हमें एक तो स्वच्छ ईंधन को बढ़ावा देना होगा। हमारे देश में रसोई गैस की तो कमी है नहीं, हां सिलेंडर बनाने के लिए जरूरी स्टील, सिलेंडर वितरण के लिए आंचलिक क्षेत्रों तक नेटवर्क को विकसित करना और गरीब लोगों को बेहद कम दाम पर गैस उपलब्ध करवाना ही बड़ी चुनौती है। कार्बन उत्सर्जन घटाने में सबसे बड़ी बाधा वाहनों की बढ़ती संख्या, मिलावटी पेट्रो पदार्थों की बिक्री, घटिया सड़कें व आटो पाट्र्स की बिक्री तथा छोटे कस्बों तक यातायात जाम होने की समस्या है। देश में बढ़ता कचरे का ढेर व उसके निबटान की माकूल व्यवस्था न होना भी कार्बन उत्सर्जन नियंत्रण की बड़ी बाधा है। सनद रहे कि कूड़ा जब सड़ता है तो उससे बड़ी मात्रा में मिथेन, कार्बन मोनो व डायआक्साइड गैसें निकल कर वायुमंडल में कार्बन के घनत्व को बढ़ाती हैं। साथ ही बड़े बांध, सिंचाई नहरों के कारण बढ़ते दलदल भी कार्बन डायआक्साइड पैदा करते हैं।कार्बन की बढ़ती मात्रा से दुनिया का गरम होने के कारण दुनिया में भूख, बाढ़, सूखे जैसी विपदाओं का न्यौता है। जाहिर है कि इससे जूझना सारी दुनिया का फर्ज है, लेकिन भारत में मौजूद प्राकृतिक संसाधन व पारपंरकि ज्ञान इसका सबसे सटीक निदान है। छोटे तालाब व कुएं, पारंपरिक मिश्रित जंगल, खेती व परिवहन के पुराने साधन, कुटीर उद्योग का सशक्तीकरण कुछ ऐसे प्रयास हैं जो बगैर किसी मशीन या बड़ी तकनीक या फिर अर्थ व्यवस्था को प्रभावित किए बिना ही कार्बन पर नियंत्रण कर सकते हैं और इसके लिए हमें पश्चिम से उधार में लिए ज्ञान की जरूरत भी नहीं है।धरती के गरम होने से सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं ग्लेशियर। ये हमारे लिए उतने ही जरूरी है जितना साफ हवा या पानी। तापमान बढ़ने से इनका गलना तेजी से होता है। इसी के चलते कार्बन उत्सर्जन में तेजी आती है और इससे एक तो धरती का तापमान नियंत्रण प्रणाली पर विपरीत प्रभाव होता है, दूसरा नदियों व उसके जरिए समुद्र में जल का स्तर बढ़ता है। जाहिर है, जल स्तर बढ़ने से धरती पर रेत का फैलाव होता है, साथ ही कई इलाकों के डूबने की संभावना भी होती है। ग्लोबल वार्मिंग या धरती का गरम होना, कार्बन उत्सर्जन, जलवायु परिवर्तन और इसके दुष्परिणामस्वरूप धरती के शीतलीकरण का काम कर रहे ग्लेशियरों पर आ रहे भयंकर संकट व उसके कारण समूची धरती के अस्तित्व के खतरे की बातें अब पुस्तकों, सेमीनार व चेतावनियों से बाहर निकल कर आम लेागों के बीच जानी जरूरी हैं। साथ ही इसके नाम पर डराया भी नहीं जाए, बल्कि इससे जूझने के तरीके बताए जाने चाहिए।

गुरुवार, 1 जून 2017

Kannur crusaid for garbage free city

आज के "हिंदुस्तान" के सम्पादकीय पेज पर , ऐसी कहानी जिसका पालन सभी राज्यों, विभागों और व्यक्तियों को करना चाहिए


एक शहर जिसने कचरे के खिलाफ मुहिम छेड़ दी



‘कन्नन’ का अर्थ है श्रीकृष्ण और ‘उर’ यानी स्थान। केरल के दक्षिण-पूर्व में तटीय शहर कन्नूर देश का ऐसा पहला शहर बन गया है, जहां से प्लास्टिक कचरा पूरी तरह विदा हो गया है। केरल के पिछले स्थापना दिवस एक नवंबर को जिले ने ‘सुंदर गांव-सुंदर भूमि’ का संकल्प लिया और पांच महीने में यह मूर्त रूप में आ भी गया। यह तो बानगी है, राज्य भर में ‘हरित केरलम्’ परियोजना के तहत कचरा कम करने के कई ऐसे उपाय प्रारंभ किए गए हैं, जो अनुकरणीय हैं।

समृद्ध अतीत और सर्वधर्म समभाव के प्रतीक कन्नूर ने जब तय किया कि जिले को देश का पहला प्लास्टिक-मुक्त जिला बनाना है, तो इसके लिए प्रशासन से ज्यादा समाज के अन्य वर्गों को साथ लिया गया। बाजार, रेस्तरां, स्कूल, एनजीओ, राजनीतिक दल एकजुट हुए। पूरे जिले को छोटे-छोटे क्लस्टर में बांटा गया, फिर समाज के हर वर्ग, खासकर बच्चों ने इंच-इंच भूमि से प्लास्टिक का एक-एक कतरा बीना, उसे ठीक से पैक किया गया और नगर निकाय ने उसे ठिकाने लगाने की जिम्मेदारी निभाई।

साथ ही जिले में हर तरह की पॉलीथिन थैली, डिस्पोजेबल बर्तन, व अन्य प्लास्टिक पैकिंग पर पांबदी लगा दी गई। कन्नूर के नेशनल इंस्टीट्यूट और फैशन टेक्नोलॉजी के छात्रों ने सहकारी समितियों के साथ मिलकर बहुत कम दाम पर आकर्षक व टिकाऊ थैले बाजार में डाल दिए। सभी व्यापारिक संगठनों, मॉल आदि ने इन थैलों को रखना शुरू किया और आज पूरे जिले में कोई भी पन्नी नहीं मांगता है। रेस्तरां व होटलों ने खाना पैक कराने वालों को घर से टिफिन लाने पर रियायत देनी शुरू कर दी है। घर पर सप्लाई भी स्टील के बर्तनों में की जा रही है, जो ग्राहक के घर जाकर खाली कर लिए जाते हैं।

नेशनल एनवायर्नमेंट इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट, नागपुर के मुताबिक, देश में हर साल करीब 44 लाख टन खतरनाक कचरा निकल रहा है। हमारे देश में औसतन प्रति व्यक्ति 20 से 60 ग्राम कचरा हर दिन निकालता है। इसमें से आधे से अधिक कागज, लकड़ी या पुट्ठा होता है, जबकि 22 फीसदी कूड़ा घरेलू कचरा होता है। कचरे का निपटान पूरे देश के लिए समस्या बनता जा रहा है। दिल्ली के नगर निगम कई-कई सौ किलोमीटर दूर तक दूसरे राज्यों में कचरे का डंपिंग ग्राउंड तलाश रहे हैं। इतने कचरे को एकत्र करना, फिर उसे दूर तक ढोकर ले जाना महंगा और जटिल काम है। सरकार भी मानती है कि देश के कुल कूड़े का महज पांच प्रतिशत का ईमानदारी से निपटान हो पाता है।

अनुमान है कि पूरे देश में हर रोज चार करोड़ दूध की थैलियां और दो करोड़ पानी की बोतलें कूड़े में फेंकी जाती हैं। मेकअप के सामान, घर में भी डिस्पोजेबल बरतनों के प्रचलन, बाजार से सामान लाते समय पॉलीथिन की थैलियां लेना, हर छोटी-बड़ी चीज की पैकिंग, ऐसे न जाने कितने तरीके हैं, जिनसे हम कूड़ा-कबाड़ा बढ़ा रहे हैं। घर में सफाई और खुशबू के नाम पर बढ़ रहे साबुन व अन्य रसायनों के चलन ने भी अलग किस्म के कचरे को बढ़ाया है। केरल ने इस विकराल समस्या को समझा और पूरे राज्य में कचरा कम करने के लिए कुछ कदम उठाए। सबसे ज्यादा सफल रहा है डिस्पोजेबल बॉल पेन के स्थान पर इंक पेन के इस्तेमाल का अभियान। सरकार ने पाया कि हर दिन लाखों की संख्या में रिफिल और एक समय इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक पेन राज्य के कचरे में इजाफा कर रहे हैं।

सो, आदेश निकालकर सभी सरकारी दफ्तरों में बॉल प्वॉइंट वाले पेनों पर पांबदी लगा दी गई। अब सरकारी खरीद में केवल इंक पेन खरीदे व इस्तेमाल किए जा रहे हैं। कई जिलों में एक दिन में पांच लाख तक बेकार प्लास्टिक पेन एकत्र हुए। इस बीच इंक पेन और स्याही पर भी छूट दी जा रही है। अनुमान है कि योजना सफल हुई , तो हर रोज 50 लाख पेन का कचरा पर्यावरण में मिलने से रह जाएगा। सरकार ने कार्यालयों में पैक्ड पानी की बोतलों के स्थान पर स्टील के बर्तनों में पानी, सरकारी आयोजनों में फ्लेक्स बैनर और गुलदस्ते के फूलों को पन्नी में लपेटने पर रोक लगा दी है। हर कार्यालय में कचरे को अलग-अलग करना, कंपोस्ट बनाना, कागज के कचरे को रिसाइकिल के लिए देने की योजनाएं जमीनी स्
तर पर बेहद कारगर रही हैं।

शुक्रवार, 26 मई 2017

Traditional water resourese only can save humanity

गाद तालाबों में जमी या हमारी सोच में 
अब तो देश के 32 फीसदी हिस्से को पानी की किल्लत के लिए गरमी के मौसम का इंतजार भी नहीं करना पड़ता है। बारहों महीने, तीसों दिन यहां जेठ ही रहता है। सरकार संसद में बता चुकी है कि देश की 11 फीसदी आबादी साफ पीने के पानी से महरूम है। पानी के लिए तकदीर को कोसते समाज और संसाधनों का रोना रोती सरकार को शायद यह मालूम ही नहीं है कि पूरे देश के 7.2 लाख हेक्टेयर पर अभी भी पारंपरिक झीलें बची हुई हैं। दूसरी तरफ यदि कुछ दशक पहले पलट कर देखें तो आज पानी के लिए हाय-हाय कर रहे इलाके अपने स्थानीय स्त्रोतों की मदद से ही खेत और गले दोनों के लिए अफरात पानी जुटाते थे। एक दौर आया कि अंधाधुंध नलकूप रोपे जाने लगे, जब तक संभलते जब तक भूगर्भ का कोटा साफ हो चुका था। 

समाज को एक बार फिर बीती बात बन चुके जल-स्त्रोतों की ओर जाने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है- तालाब, कुएं, बावड़ी। लेकिन एक बार फिर पीढि़यों का अंतर सामने खड़ा है, पारंपरिक तालाबों की देखभाल करने वाले लोग किसी ओर काम में लग गए और अब तालाब सहेजने की तकनीक नदारद हो गई है। तभी तो सन् 2001 से अभी तक तालाबों से गाद निकालने के नाम पर सरकार ने आठ सौ करोड़ से ज्यादा फूंक दिए और नतीजा रहा ढाक के तीन पात! तालाबों की जल-ग्रहण क्षमता भले ही न बढ़ी हो पर कुछ लोगों का बैंक बैलेंस जरूर बढ़ गया।देश की 58 पुरानी झीलों को पानीदार बनाने के लिए सन् 2001 में केंद्र सरकार के पर्यावरण और वन मंत्रालय ने राष्ट्रीय झील संरक्षण योजना शुरू की थी। इसके तहत कुल 883.3 करोड़ रुपए का प्रावधान था। इसके तहत मध्य प्रदेश की सागर झील, रीवा का रानी तालाब और शिवपुरी झील, कर्नाटक के 14 तालाबों, नैनीताल की दो झीलों सहित 58 तालाबों की गाद सफाई के लिए पैसा बांटा गया। इसमें राजस्थान के पुष्कर का कुंड और धरती पर जन्नत कही जाने वाली श्रीनगर की डल झील भी थी।

झील सफाई का पैसा पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर राज्यों को भी गया। अब सरकार ने मापा तो पाया कि इन सभी तालाबों से गाद निकली कि नहीं, पता नहीं, लेकिन इसमें पानी पहले से भी कम आ रहा है। केंद्रीय जल आयोग ने जब खर्च पैसे की पड़ताल की तो ये तथ्य सामने आए। कई जगह तो गाद निकाली ही नहीं और उसकी ढुलाई का खर्चा दिखा दिया। कुछ जगह गाद निकाल कर किनारों पर ही छोड़ दी, जोकि अगली बारिश में ही फिर से तालाब में गिर गई। असल में तालाब की सफाई का काम आज के अंग्रेजीदां इंजीनियरों के बस की बात नहीं है। छतरपुर जिले के अंधियारा तालाब की कहानी गौर करें, कोई 19 साल पहले वहां सूखा राहत के तहत तालाब गहराई का काम लगाया गया। इंजीनियर साहब ने तालाब के बीचों-बीच खूब गहरी खुदाई करवा दी। जब इंद्र देवता मेहरबान हुए तो तालाब एक रात में लबालब हो गया, लेकिन यह क्या? अगली सुबह ही उसकी तली दिख रही थी।

असल में हुआ यूंकि बगैर सोचे हुई-समझे की गई खुदाई में तालाब की वह झिर टूट गई, जिसका संबंध सीधे इलाके के ग्रेनाइट भू संरचना से था। पानी आया और झिर से बह गया। यहां जानना जरूरी है कि अभी एक सदी पहले तक बुंदेलखंड के इन तालाबों की देखभाल का काम पारंपरिक रूप से ढीमर समाज के लोग करते थे। वे तालाब को साफ रखते, उसकी नहर, बांध, जल आवक को सहेजते और एवज में तालाब की मछली, सिंघाड़े और समाज से मिलने वाली दक्षिणा पर उनका हक होता। इसी तरह प्रत्येक इलाके में तालाबों को सहेजने का जिम्मा समाज के एक वर्ग ने उठा रखा था और उसकी रोजी-रोटी की व्यवस्था वही समाज करता था, जो तालाब के जल का इस्तेमाल करता था। तालाब तो लोक की संस्कृति सभ्यता का अभिन्न अंग हैं और इन्हें सरकारी बाबुओं के लाल बस्ते के बदौलत नहीं छोड़ा जा सकता। हकीकत में तालाबों की सफाई और गहरीकरण अधिक खर्चीला काम नहीं है, न ही इसके लिए भारीभरकम मशीनों की जरूरत होती है। यह सर्वविदित है कि तालाबों में भरी गाद, सालों साल से सड़ रही पत्तियों और अन्य अपशिष्ट पदार्थों के कारण ही उपजी है, जो उम्दा दर्जे की खाद है। रासायनिक खादों ने किस कदर जमीन को चौपट किया है? यह किसान जान चुके हैं और उनका रुख अब कंपोस्ट व अन्य देसी खादों की ओर है। किसानों को यदि इस खादरूपी कीचड़ की खुदाई का जिम्मा सौंपा जाए तो वे वे सहर्ष राजी हो जाते हैं।

उल्लेखनीय है कि राजस्थान के झालावाड़ जिले में खेतों में पालिश करने के नाम से यह प्रयोग अत्यधिक सफल व लोकप्रिय रहा है। कर्नाटक में समाज के सहयोग से ऐसे कोई 50 तालाबों का कायाकल्प हुआ है, जिसमें गाद की ढुलाई मुफ्त हुई, यानी ढुलाई करने वाले ने इस बेशकीमती खाद को बेचकर पैसा कमाया। इससे एक तो उनके खेतों को उर्वरक मिलता है, साथ ही साथ तालाबों के रखरखाव से उनकी सिंचाई सुविधा भी बढ़ती है। सिर्फ आपसी तालमेल, समझदारी और अपनी पंरपरा तालाबों के संरक्षण की दिली भावना हो तो न तो तालाबों में गाद बचेगी, न ही सरकारी अमलों में घूसखोरी की कीच होगी। सन 1944 में गठित ‘फेमिन इनक्वायरी कमीशन’ ने साफ निर्देश दिए थे कि आने वाले सालों में संभावित पेयजल संकट से जूझने के लिए तालाब ही कारगर होंगे, कमीशन की रिपोर्ट तो लाल बस्ते में कहीं दब गई। आजादी के बाद इन पुश्तैनी तालाबों की देखरेख करना तो दूर, उनकी दुर्दशा करना शुरू कर दिया। चाहे कालाहांडी हो या फिर बुंदेलखंड या फिर तेलंगाना, देश के जलसंकट वाले सभी इलाकों की कहानी एक ही है। इन सभी इलाकों में एक सदी पहले तक कई-कई सौ बेहतरीन तालाब होते थे। यहां के तालाब केवल लोगों की प्यास ही नहीं बुझाते थे, यहां की अर्थव्यवस्था का मूल आधार भी होते थे। मछली, कमल गट्टा, सिंघाड़ा, कुम्हार के लिए चिकनी मिट्टी... यहां के हजारों-हजार घरों के लिए खाना उगाहते रहे हैं। तालाबों का पानी यहां के कुओं का जलस्तर बनाए रखने में सहायक होते थे। शहरीकरण की चपेट में लोग तालाबों को ही पी गए और अब उनके पास पीने के लिए कुछ नहीं बचा है। गांव या शहर के रुतबेदार लोग जमीन पर कब्जा करने के लिए बाकायदा तालाबों को सुखाते हैं, पहले इनके बांध फोड़े जाते हैं, फिर इनमें पानी की आवक के रास्तों को रोका जाता है- न भरेगा पानी, न रह जाएगा तालाब।

गांवों में तालाब से खाली हुई उपजाऊ जमीन लालच का कारण होती है तो शहरों में कालोनियां बनाने वाले भूमाफिया इसे सस्ता सौदा मानते हैं। यह राजस्थान में उदयपुर से लेकर जैसलमेर तक, हैदराबाद में हुसैनसागर, हरियाणा में दिल्ली से सटे सुल्तानपुर लेक या फिर उत्तर प्रदेश के चरखारी व झांसी हों या फिर तमिलनाडु की पुलिकट झील सभी जगह एक ही कहानी है। हां, पात्र अलग-अलग हो सकते हैं। सभी जगह पारंपरिक जल-प्रबंधन के नष्ट होने का खामियाजा भुगतने और अपने किए या फिर अपनी निष्क्रियता पर पछतावा करने वाले लोग एकसमान ही हैं। कनार्टक के बीजापुर जिले की कोई बीस लाख आबादी को पानी की त्राहि-त्राहि के लिए गरमी का इंतजार नहीं करना पड़ता है। कहने को इलाके चप्पे-चप्पे पर जल भंडारण के अनगिनत संसाधन मौजूद हैं, लेकिन हकीकत में बारिश का पानी यहां टिकता ही नहीं हैं। लोग रीते नलों को कोसते हैं, जबकि उनकी किस्मत को आदिलशाही जल प्रबंधन के बेमिसाल उपकरणों की उपेक्षा का दंश लगा हुआ है। समाज और सरकार पारंपरिक जल-स्रोतों कुओं, बावड़ियों और तालाबों में गाद होने की बात करता है, जबकि हकीकत में गाद तो उन्हीं की सोच में है। सदा नीरा रहने वाली बावड़ी-कुओं को बोरवेल और कचरे ने पाट दिया तो तालाबों को कंक्रीट का जंगल निगल गया। एक तरफ प्यास से बेहाल होकर अपने घर-गांव छोड़ते लोगों की हकीकत है तो दूसरी ओर पानी का अकूत भंडार! यदि जलसंकट ग्रस्त इलाकों के सभी तालाबों को मौजूदा हालात में भी बचा लिया जाए तो वहां के हर इंच खेत को तर सिंचाई, हर कंठ को पानी और हजारों हाथों को रोजगार मिल सकता है। एक बार मरम्मत होने के बाद तालाबों के रखरखाव का काम समाज को सौंपा जाए, इसमें महिलाओं के स्वयं सहायता समूह, मछली पालन सहकारी समितियां, पंचायत, गांवों की जल बिरादरी को शामिल किया जाए। जरूरत इस बात की है कि आधुनिकता की आंधी के विपरीत दिशा में अपनी जड़ों को लौटने की इच्छा शक्ति विकसित करनी होगी।

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