My writings can be read here मेरे लेख मेरे विचार, Awarded By ABP News As best Blogger Award-2014 एबीपी न्‍यूज द्वारा हिंदी दिवस पर पर श्रेष्‍ठ ब्‍लाॅग के पुरस्‍कार से सम्‍मानित

शनिवार, 1 जुलाई 2017

GST. open Market and weekly haat-bazar


मुक्त मंडी और हाट-बाजार

पहले कहा जाता था कि भारत गांवों में बसता है और उसकी अर्थव्यवस्था का आधार खेती-किसानी है, लेकिन मुक्त अर्थव्यवस्था के दौर में यह ‘पहचान’ बदलती-सी लग रही है। लगता है कि सारा देश बाजार बन रहा है और हमारी अर्थव्यवसथा का आधार खेत से निकल कर दुकानों पर जा रहा है।





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असल में सारे देश के हाट-बाजार के पीछे केवल वे नहीं होते, जो सामने फुटपाथ पर अपना सामान बेचते हैं, और भी कई लोगों की रोजी-रोटी इनसे चलती है।


यह उदार अर्थव्यवस्था का दौर है। पूरी दुनिया एक मुक्त मंडी के रूप में बदल गई है। तेजी से मॉल संस्कृति विकसित हो रही है। इंटरनेट पर अलग बाजार फैल रहा है। घर बैठे खरीदारी की सुविधाएं उपलब्ध हैं। इन सबके बावजूद पुराने हाट-बाजार की परंपरा अब भी बनी हुई है, बल्कि लगातार समृद्ध हो रही है। गांवों-कस्बों में ही नहीं, महानगरों में भी मॉल संस्कृति के बरक्स साप्ताहिक बाजार का आकर्षण बना हुआ है। इन बाजारों और इनमें कारोबार करने वालों की स्थिति और हाट-बाजार की अर्थव्यवस्था के बारे में बता रहे हैं पंकज चतुर्वेदी।

दिल्ली की पूर्वी सीमा पर बनी रिहाइशी कॉलोनी दिलशाद गार्डन सन अस्सी के आसपास बसनी शुरू हुई थी। दिल्ली-शाहदरा को मिला कर इसका नाम दिलशाद पड़ा। यहां डीडीए फ्लैट बने और मध्यवर्गीय लोग आ बसे। उसी समय वहां कुछ रेहड़ी-पटरी वाले सब्जी और कुछ सामान शाहदरा से लाकर बेचने लगे। नब्बे के दशक में यहां बड़ा बाजार बन गया, लेकिन उससे दोगुना बड़ा बाजार उन रेहड़ी-पटरी वालों का हो गया। उसने साप्ताहिक बाजार का स्वरूप ले लिया था। चूंकि इस इलाके में मंगलवार को बाजार-बंदी होती है, सो साप्ताहिक बाजार उसी दिन भरने लगा। आज यहां का बाजार हर गली में फैल गया है और इसकी कुल लंबाई सात किलोमीटर हो गई है।  दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की हर कॉलोनी में ऐसे साप्ताहिक बाजार आज भी लोगों की जीवन रेखा बने हैं। दिल्ली में ऊंची इमारतों में पूरी तरह वातानुकूलित बाजार यानी मॉल के ठीक सामने लगने वाले इन बाजारों में कंधे छीलती भीड़ देख कर कई लोगों को हैरानी हो सकती है।
दिल्ली के डीडीए फ्लैट कालकाजी का साप्ताहिक बाजार हो या वसंत विहार जैसे संभ्रांत इलाके का बुध बाजार, करोलबाग और विकासपुरी का मंगल बाजार या फिर सुदूर भोपाल, बीकानेर या सहरसा के साप्ताहिक हाट-बाजार; जरा गंभीरता से देखें तो ये सामाजिक समरसता का अनूठा उदाहरण हैं। दैनिक मजदूरी करने वाला हो या अफसर की बीवी या फिर खुद दुकानदार, सभी आपको यहां मिल जाएंगे। दिल्ली में जिस दिन बाजार की छुट्टी होती है, उस दिन सस्ता बाजार अपनी रौनक पर होता है। वैसे दिल्ली का सबसे पुराना साप्ताहिक बाजार ‘चोर बाजार’ के नाम से मशहूर है। पहले यह लाल किले के सामने मैदान में लगता था, फिर सुरक्षा कारणों से जामा मस्जिद से दरियागंज तक लगने लगा। यहां जूते, किताबें, ब्रांडेड कपड़े, आटो पार्टस, हार्डवेयर, रसोई के बर्तन, सभी कुछ इतनी कम कीमत पर मिल जाते हैं कि हैरानी होती है।
ऐसे साप्ताहिक बाजार पूरे देश के कस्बों, शहरों और गांवों में लगते हैं। ये एक तरह से मेले की तरह होते हैं। कम क्रय क्षमता वाले लोग, घर से कम निकलने वाली महिलाओं, नई गृहस्थी जमाने वाले युवाओं के लिए यह वरदान होते हैं। यहां छोले-भटूरे, चाट-पकौड़ी, पूड़ी-तरकारी, फल-सब्जियां, नमकीन, कपड़े, नकली जेवर, जूते-चप्पल, पर्स, मेकअप का सामान, रसोई के बर्तन, गद्दे-रजाई-चादर, चाकू-छुरी सब कुछ उपलब्ध होता है। हकीकत यह है कि ये बाजार रोजगार की तलाश में अपने घर-गांव से पलायन कर आए निम्न आय वर्ग के लोगों की जीवनरेखा होते हैं। आम बाजार से सस्ता, चर्चित ब्रांड से मिलता-जुलता सामान, छोटे, कम दाम वाले पैकेट, घर के पास और देर रात तक सजा बाजार। पहले कहा जाता था कि भारत गांवों में बसता है और उसकी अर्थव्यवस्था का आधार खेती-किसानी है, लेकिन मुक्त अर्थव्यवस्था के दौर में यह ‘पहचान’ बदलती-सी लग रही है। लगता है कि सारा देश बाजार बन रहा है और हमारी अर्थव्यवसथा का आधार खेत से निकल कर दुकानों पर जा रहा है। भारत की एक प्रमुख व्यावसायिक संस्था के फौरी सर्वे के आंकड़े बताते हैं कि दुनिया में सबसे ज्यादा दुकानें भारत में हैं। जहां अमेरिका जैसे विकसित या सिंगापुर जैसे व्यापारिक देश में प्रति हजार आबादी पर औसतन सात दुकानें हैं, वहीं भारत में यह आंकड़ा ग्यारह है। उपभोक्ताओं की संख्या की तुलना में भारत सबसे अधिक दुकानों वाला देश बन गया है।
सवाल है कि इस आंकड़े को उपलब्धि मान कर खुश हों या अपने देश के पारंपरिक ढांचे के दरकने की चेतावनी मान कर सतर्क हो जाएं। इसी सर्वे के अगले हिस्से में बताया गया है कि भारत का मात्र दो प्रतिशत बाजार नियोजित है, शेष अट्ठानबे प्रतिशत असंगठित है और उसकी कोई पहचान नहीं है। यह असंगठित बाजार बहुत हद तक कानून सम्मत भी नहीं है। दिल्ली में सवा करोड़ की आबादी में बारह लाख दुकानें हैं! खोखे, गुमटी, रेहड़ी पर बाजार अलग है! कुल मिला कर देखें तो प्रत्येक दस आदमी पर एक दुकान है! ०
कहां से आते हैं दुकानदार
वह बनारस में रिक्शा चलाता था, फिर किसी के कहने पर दिल्ली आ गया। यहां चांदनी चौक में एक थोक के मसाले की दुकान पर रेहड़ी चलाने लगा। धीर-धीरे लाभ-हानि का कुछ गणित समझ आया, तो उसी दुकान से थोड़ा-थोड़ा मसाला लेकर बाहरी दिल्ली की कच्ची कॉलोनियों में बेचने लगा। फिर वहां हाट-बाजार भरने लगा तो उसका ठिया बन गया। अब वह सप्ताह के प्रत्येक दिन किसी न किसी बाजार में जाता है। पहले रिक्शे से माल ढोता था। अब एक पुराना स्कूटर लेकर उसे रिक्शे से जोड़ दिया है। उसकी बेटी भी अब बाजार में उसका साथ देती है।  ऐसे ही कुछ लोग करीबी गांवों से सब्जी लाते हैं, तो कुछ पिलखुवा या हरियाणा से चादर और तौलिया जैसे सामान थोक के भाव उठा लेते हैं। कइयों का संपर्क एक्सपोर्ट करने वाली इकाइयों से है। वहां का किसी नुक्स के कारण लौटाया गया माल उनके लिए हाट-बाजार का हॉट-सेल बनता है। इन बाजार वालों में कई घाटे या किसी अन्य कारणों से अपनी दुकान या बड़ा व्यापार गंवा चुके लोग भी होते हैं तो कई एक सुदूर कस्बे से अपनी किस्मत चमकाने आए लोग भी। कुल मिला कर ऐसे बाजारों में अगर ग्राहकों की बड़ी संख्या प्रवासी या पलायन से उपजी आबादी की होती है, तो विक्रेता भी इसी श्रेणी के होते हैं। ०
कई आश्रित हैं इस बाजार के
असल में सारे देश के हाट-बाजार के पीछे केवल वे नहीं होते, जो सामने फुटपाथ पर अपना सामान बेचते हैं, और भी कई लोगों की रोजी-रोटी इनसे चलती है। एक तो हर जगह बाजार लगाने की जिम्मेदारी स्थानीय निकाय यानी नगर निगम से लेकर ग्राम पंचायत तक की होती है। हर विक्रेता से उसकी पैठ या बैठकी का निश्चित शुल्क वसूला जाता है। बहुत-सी जगहों पर निकाय इसे ठेके पर उठा देते हैं और ठेकेदार के आदमी प्रत्येक दुकानदार से एक शाम की वसूली करते हैं। यह राशि पंद्रह रुपए से सौ रुपए तक होती है। बाजार के लिए लकड़ी के फट्टे या टेबल, ऊपर तिरपाल, और बैटरी से चलने वाली एलईडी लाइट की आपूर्ति करने वालों का बड़ा वर्ग पूरी तरह इन हाट बाजार पर ही निर्भर होता है। कई लोग ऐसे बाजारों के सामान के परिवहन के लिए वाहन उपलब्ध कराते हैं।  इसके अलावा बहुत-सा धन ऐसा भी इन बाजारों के जरिए जेबों तक घूमता है, जिसका कोई हिसाब-किताब नहीं होता, जैसे कि पुलिस का हफ्ता, सफाई वाले को अतिरिक्त पैसा देना और कई जगह स्थानीय रंगदारी भी। हाट-बाजार में दुकान लगाने वालों का अभी तक कभी कोई सर्वेक्षण हुआ नहीं, लेकिन अनुमान है कि दिल्ली, गाजियाबाद, नोएडा, फरीदाबाद, गुरुग्राम में लगने वाले कोई तीन सौ से अधिक बाजारों में पैंतीस से चालीस हजार दुकानदार हैं। पूरे देश में यह संख्या लाखों में होगी। इसके बावजूद न तो इनको कोई स्वास्थ्य सुविधा मिली है और न ही बैंक से कर्ज या ऐसी कोई बीमा की सुविधा।
यह पूरा काम बेहद जोखिम का है, बरसात हो गई तो बाजार नहीं लगेगा, कभी-कभी त्योहारों के पहले जब पुलिस के पास कोई संवेदनशील सूचना होती है तो भी बाजार नहीं लगता। ऐसे दुकानदारों का वैसे तो पूरा सप्ताह ही एक बाजार से दूसरे बाजार में अपना ठीया जमाने, ग्राहक को बुलाने में बीतता है, थोड़ा भी समय मिला तो उन्हें खुद बाजार जाकर अपनी दुकान के लिए थोक व्यापारी से माल लेना होता है। पिछले दिनों पांच सौ और हजार के नोट बंद होने के दौरान उत्पन्न नगदी के संकट के चलते ऐसे बाजारों का हाल बुरा हो गया था। यह अरबों रुपए महीने की नगद अर्थव्यवस्था है। यहां न तो पेटीएम या कार्ड स्वाईप मशीन का चलन है, न यहां जीएसटी की चर्चा होती है। पटरी बाजारों ने नए बसते शहर देखे, चमकते मॉल का आगमन देखा, घरों में खुलती दुकानें देखीं, कई तरह के विरोध सहे, लेकिन सप्ताह के किसी तयशुदा दिन सड़क के किनारे, भयंकर ट्राफिक के बीच भारी चिल्लपों वाले बाजार की रौनक कभी कम नहीं हुई। ०
कराची का क्लिफ्टन बाजार
पाकिस्तान में कराची के लोगों का असल चेहरा देखना हो, तो क्लिफ्टन समुद्र तट पर हर रविवार और मंगलवार को भरने वाला हाट-बाजार जरूर देखना होगा। क्लिफ्टन के समुद्री तट की रेत पर कई किलोमीटर के इलाके में भारतीय साप्ताहिक हाट-बाजार से कई गुना बड़ा बाजार। कोई दस हजार कारों की पार्किंग, लगभग पांच हजार दुकानदार और साठ से अस्सी हजार लोग, एक साथ बाजार करते हुए। यहां जूते से लेकर ऊनी कपड़ों तक, रसोई के बर्तन, इलेक्ट्रॉनिक सामान, सजावट के हस्तशिल्प, किताबें, सीडी, खानपान सब कुछ एक ही जगह मिल जाता है। बाजार के एक सिरे पर बकायदा ‘प्राथमिक उपचार’ का स्टाल है। कहीं कोई पुलिस या सुरक्षाकर्मी नहीं दिखता। बाजार में कई हिंदू महिलाएं सिर पर मांग और ंिबंदी के साथ दिख जाती हैं।
कई किलोमीटर तक फैले बाजार में किसी भी तरह के वाहन का प्रेवश नहीं होता। बाजार में कम उम्र के पठान लड़के बड़ी-सी टोकरी लिए जगह-जगह खड़े मिल जाते हैं, जो खरीदारों का सामान कार तक पहुंचाते हैं। एक अनुशासित और मिश्र संस्कृति के कराची की अनूठी मिसाल है यह बाजार! यहां भी हिंदी फिल्मों के संगीत की सीडी की दर्जन-भर दुकानें दिखती हैं। यहां के हिंदी फिल्मों के बाजार का अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि हाट में नई से नई बालीवुड फिल्म की सीडी आराम से साठ पाकिस्तानी रुपए, यानी भारतीय रुपए में चालीस से भी कम में खरीदी जा सकती है! वहां सब्जी बेचने वाले अधिकांश हिंदू होते हैं, जोकि मलेर या लालुखेत जैसी बस्तियों में रहते हैं।
वे नहीं चाहते साप्ताहिक बाजार
दिल्ली से सटे गाजियाबाद का नवयुग मार्केट वहां के कनाट प्लेस की तरह है। यह बाजार पहले मंगलवार को बंद रहता था, सो पिछले चालीस सालों से यहां उसी दिन बाजार भरने लगा। फिर स्थानीय व्यापारियों के कहने पर बाजार रविवार को लगने लगा। इसमें कोई पांच हजार रेहड़ी-पटरी वाले आते हैं। पिछले कुछ महीनों से साप्ताहिक बाजार के मसले पर व्यापारियों और पटरी दुकानदारों में खींचतान चल रही है। नाराज व्यापारियों का कहना है कि नवयुग मार्केट के साप्ताहिक बाजार में नब्बे प्रतिशत दुकानदार देवबंद, सहारनपुर, बिजनौर, मेरठ, मुजफ्फरनगर, हापुड़, दिल्ली, सीलमपुर आदि क्षेत्रों से आते हैं, जिनकी कोई पहचान नहीं है। नवयुग मार्केट में ढाई सौ शोरूम और चार सौ दुकानें हैं। करीब डेढ़ हजार परिवार इस अवैध पैठ के चलते रविवार को दिन भर घरों में बंधक बन कर रह जाते हैं।
यह मामला अकेले गाजियाबाद का नहीं है। देश के अलग-अलग हिस्सों से समय-समय पर इन बाजारों को बंद करने की मांग उठती रहती है। इसके पीछे गिनाए जाने वाले कारण लगभग एक जैसे होते हैं:
० बाजार के कारण यातायात ठप्प हो जाता है और इलाके के रहवासी अपने घर में बंधक हो जाते हैं।
० ऐसे बाजारों में गिरहकटी होती है, अपराधी आते हैं।
० ये बाजार गंदगी फैलाते हैं और इसके चलते आवार पशु यहां आ जाते हैं।
मगर असलियत दूसरी है। ऐसे बाजारों को बंद कराने के पीछे स्थानीय व्यापारियों के कारण दीगर होते हैं:
० बाजार से कम कीमत पर सामान मिलने से हर सप्ताह घर का सामान खरीदने वाले लोग उनकी दुकानों पर न जाकर हाट-बाजार का इंतजार करते हैं।
० हाट-बाजार में मिलने वाली सस्ती चीजों और मोलभाव की आदत के कारण ग्राहक अक्सर उनकी दुकान पर भी मोलभाव करते हैं।
० कई बार साप्ताहिक बाजारों से उगाही करने वाले गिरोहों के आपसी टकराव होते हैं और इसी के चलते वे बाजार को बंद कराने की साजिश रचते हैं। ०
बस्तर का हाट
बस्तर अक्सर तभी चर्चा में आता है, जब वहां कुछ खून बहता है, लेकिन वहां बारूद की गंध के अलावा बहुत कुछ है। उसमें सबसे महत्त्वपूर्ण है अपनी परंपराओं, जीवनशैली और सभ्यता को सहेज कर रखने का जीवट और कला। बस्तर का क्षेत्रफल केरल राज्य से अधिक है और यहां के घने जंगलों में आदिवासियों के छोटे-छोटे करीब साढ़े तीन हजार गांव हैं। हर पांच-छह गांव के मध्य एक हाट होता है, जहां लोग अपनी जरूरत की वस्तुएं खरीद-बेच सकते हैं। बस्तर में लगने वाले इन हाटों में यहां की संस्कृति, खानपान और रहन-सहन के तौर-तरीकों को बेहद करीब से जानने-समझने का मौका मिलता है। यहां के बाजारों में रोजमर्रा की चीजें, कपड़े, स्थानीय आभूषण, चींटी की चटनी, सल्फी और पारंपरिक मुर्गा लड़ाई देख सकते हैं, जो बस्तर को खास बनाते हैं। बस्तर के आदिवासियों का जीवन कुछ दशक पहले तक पूरी तरह जंगलों पर निर्भर था, महुआ, इमली, बोंडा, चिरौंजी की गुठली जैसे उत्पाद लेकर वे साप्ताहिक बाजार में जाते, वहां से नमक जैसी जरूरी चीजें उसके बदले में ले लेते। नक्सलियों के बढ़ते असर पर रोकथाम के लिए आंचलिक क्षेत्रों तक सुरक्षा बल तैनात किए गए। ये सुरक्षाकर्मी भी इन्हीं हाट-बाजार में अपनी जरूरत का सामान लेने जाने लगे। नक्सलियों ने वहां घात लगा कर कई बार सुरक्षाकर्मियों पर हमले किए। उसके बाद वहां के बाजार सिमटने लगे।
बस्तर के घनघोर जंगलों के बीच बीजापुर जिला मुख्यालय से लगभग पचास किलोमीटर दूर बासागुड़ा के आदिवासी जानते नहीं थे कि वे जिस चिरौंजी को औने-पौने दाम में बचेते रहे हैं, वह उन्हें मालामाल कर सकती है। चिरौंजी की पैदावार के लिए मशहूर बासागुड़ा के लोग अब तक बिचौलियों के शोषण का शिकार थे, जिन्हें जिला प्रशासन ने नई राह दिखाते हुए उनके भविष्य को संवारने का अवसर प्रदान किया है। यहां की औरतों के स्वसहायता समूह ने साप्ताहिक बाजार के जरिए अपने इलाके की तकदीर बदल दी। बासागुड़ा साप्ताहिक बाजार में आदिवासी नमक के बदले बहुत कम दर पर चिरौंजी बेचा करते थे। इस प्रथा के चलते यहां के आदिवासियों को अपनी वनोपज का वाजिब दाम कभी नहीं मिल पाया। अब राज्य सरकार के प्रयास से चिरौंजी की गुठली साप्ताहिक बाजार में पचास से सौ रुपए की दर से कोचियों और लघु वनोपज समिति द्वारा खरीदी जा रही है। यहां सालाना दो सौ क्विंटल से ज्यादा चिरौंजी गुठली की आवक होती है। इस आवक को देखते हुए ग्रामीणों को आत्मनिर्भर बनाने के मकसद से जिला प्रशासन ने बासागुड़ा में डेढ़ लाख रुपए स्वीकृत कर चार चिरौंजी मिलिंग मशीनें स्थापित कराई। हीरापुर में चिरौंजी प्रसंस्करण केंद्र स्थापित किया गया, जहां साप्ताहिक बाजार से चिरौंजी की गुठली क्रय कर मिलिंग शुरू की गई। ०

शुक्रवार, 30 जून 2017

flood" A men made disaster



देश को पीछे धकेल देती है बाढ़

अभी तो बरसात का पहले महीना ही चल रहा है और पूर्वोत्तर राज्यों से लेकर पूर्वी उत्तर प्रदेश तक कई स्थानों पर नदियां उफन कर खेत-बस्ती में घुस गई हैं। अभी तो मानसून के 60 दिन बकाया हैं और मौसम विभाग की उस भविष्यवााणी के सच होने की संभावना दिख रही है कि इस साल सदी का सबसे बेहतरीन मानसून होगा व बरसात औसत से ज्यादा होगी। तात्कालिक तौर पर तो यह सूचना सुखद लगती है लेकिन जल-प्लावन के चलते तबाही के बढ़ते दायरे के आंकड़े अलग तरह का खौफ पैदा करते हैं। पिछले कुछ सालों के आंकड़ें देखें तो पाएंगे कि बारिश की मात्रा भले ही कम हुई है, लेकिन बाढ़ से तबाह हुए इलाके में कई गुना बढ़ोतरी हुई है।
कुछ दशकों पहले जिन इलाकों को बाढ़ से मुक्त क्षेत्र माना जाता था, अब वहां की नदियां भी उफनने लगी हैं और मौसम बीतते ही उन इलाकों में एक बार फिर पानी का संकट छा जाता है। असल में बाढ़ महज एक प्राकृतिक आपदा ही नहीं है, बल्कि यह देश के गंभीर पर्यावरणीय, सामाजिक और आर्थिक संकट का कारक बन गया है। हमारे पास बाढ़ से निपटने को महज राहत कार्य या यदा-कदा कुछ बांध या जलाशय निर्माण का विकल्प है, जबकि बाढ़ के विकराल होने के पीछे नदियों का उथला होना, जलवायु परिवर्तन, बढ़ती गरमी, रेत की खुदाई व शहरी प्लास्टिक व खुदाई मलवे का नदी में बढ़ना, जमीन का कटाव जैसे कई कारण दिनों-दिन गंभीर होते जा रहे हैं। जिन हजारों करोड़ की सड़क, खेत या मकान बनाने में सरकार या समाज को दशकों लग जाते हैं, उसे बाढ़ का पानी पलक झपकते ही उजाड़ देता है। हम नए कायांर्े के लिए बजट की जुगत लगाते हैं और जीवनदायी जल उसका काल बन जाता है।
देश में सबसे ज्यादा सांसद व प्रधानमंत्री देने वाले राज्य उत्तर प्रदेश की उर्वरा धरती, कर्मठ लोग, अयस्क व अन्य सांसधन उपलब्ध होनेे के बावजूद विकास की सही तस्वीर न उभर पाने का सबसे बड़ा कारण हर साल आने वाली बाढ़ से होने वाले नुकसान हैं। बीते एक दशक के दौरान राज्य में बाढ़ के कारण 45 हजार करोड़ रुपए कीमत की तो महज खड़ी फसल नष्ट हुई है। सड़क, सार्वजनिक संपत्ति, इंसान, मवेशी आदि के नुकसान अलग हैं। राज्य सरकार की रपट को भरोसे लायक मानें तो सन 2013 में राज्य में नदियों के उफनने के कारण 3259.53 करोड़ का नुकसान हुआ था जो कि आजादी के बाद का सबसे बड़ा नुकसान था।
अब तो देश के शहरी क्षेत्र भी बाढ़ की चपेट में आ रहे हैं। इसके कारण भौतिक नुकसान के अलावा मानव संसाधन का जाया होना तो असीमित है। सनद रहे कि देश के 800 से ज्यादा शहर नदी किनारे बसे हैं, वहां तो जलभराव का संकट है ही, कई ऐसे कस्बे जो अनियोजित विकास की पैदाइश हैं, शहरी नालों के कारण बाढ़-ग्रस्त हो रहे हैं। सन-1953 से लेकर 2010 हम बाढ़ के उदर में 8,12,500 करोड़ फूंक चुके हैं जबकि बाढ़ उन्मूलन के नाम पर व्यय राशि 1,26,000 करोड़ रुपए है। यह धन राशि मनरेगा के एक साल के बजट का कोई चार गुणा है। आमतौर पर यह धन राशि नदी प्रबंधन, बाढ़ चेतावनी केंद्र बनाने और बैराज बनाने पर खर्च की गई लेकिन यह सभी उपाय बेअसर ही रहे हैं। आने वाले पांच साल के दौरान बाढ़ उन्मूलन पर होने वाले खर्च का अनुमान 57 हजार करोड़ आंका गया है।

मौजूदा हालात में बाढ़ महज एक प्राकृतिक प्रकोप नहीं, बल्कि मानवजन्य साधनों की त्रासदी है। बाढ़ एक तरफ विकास की राह में रोड़ा है तो दूसरी तरफ देश के जल संसाधनों के लिए भी नुकसानदेह है।
अतएव बाढ़ के बढ़ते सुरसा-मुख पर अंकुश लगाने के लिए शीघ्र कुछ करना होगा । कुछ लोग नदियों को जोड़ने में इसका निराकरण खोज रहे हैं। हकीकत में नदियों के प्राकृतिक बहाव, तरीकों, विभिन्न नदियों के उंचाई-स्तर में अंतर जैसे विषयों का हमारे यहां कभी निष्पक्ष अध्ययन ही नहीं किया गया और इसी का फायदा उठाकर कतिपय ठेकेदार, सीमेंट के कारोबारी और जमीन-लोलुप लोग इस तरह की सलाह देते हैं। पानी को स्थानीय स्तर पर रोकना, नदियों को उथला होने से बचाना, बड़े बांध पर पाबंदी, नदियों के करीबी पहाड़ों पर खुदाई पर रोक और नदियों के प्राकृतिक मार्ग से छेड़छाड़ को रोकना कुछ ऐसे सामान्य प्रयोग हैं, जोकि बाढ़ सरीखी भीषण विभीषिका का मुंह-तोड़ जवाब हो सकते हैं

सोमवार, 26 जून 2017

A neglected, polluted joint of yamuna-hindon

हिंडन-यमुना का एक उपेक्षित और नीरस संगम

दूर-दूर तक कोई पेड़ नहीं, कोई पक्षी नहीं, बस बदबू ही बदबू। यह नोएडा का सेक्टर-150 है, जो ग्रेटर नोएडा से सटा हुआ है। यहीं है एक गांव मोमनथाल। उससे आगे कच्ची, रेतीली पगडंडी पर कोई तीन किलोमीटर चलने के बाद एक धारा दिखाई देती है। कुछ दूर बाद दोपहिया वाहन भी नहीं जा सकते। अब पगडंडी भी नहीं है, जाहिर है कि वर्षों से कभी कोई उस तरफ आया ही नहीं होगा। सीधे हाथ पर शांत यमुना का प्रवाह और बायीं तरफ से आता गंदा, काला पानी, जिसमें भंवरें उठ रही हैं, गति भी तेज है। यह है हिंडन। जहां तक आंखेें देख सकती हैं, गाढ़ी हिंडन को खुद में समाने से रोकती दिखती है यमुना। विकास के प्रतिफल का यह दृश्य राजधानी दिल्ली की चौखट पर है। इसके आसपास देश की सबसे शानदार सड़क, शहरी स्थापत्य, शैक्षिक संस्थान और बाग-बगीचे हैं। दो महान नदियों का संगम आखिर  इतना नीरस, उदास और उपेक्षित क्यों है?
इसे देखकर पाठ्य-पुस्तकों में दशकों से छप रहे उन शब्दों की प्रामाणिकता पर शक होने लगता है, जिनमें कहा जाता रहा है कि मानव सभ्यता का विकास नदियों के किनारे हुआ और नदियों के संगम स्थल को बेहद पवित्र माना जाता है। धार्मिक आख्यान कहते हैं कि हिंडन नदी पांच हजार साल पुरानी है। मान्यता है कि इस नदी का अस्तित्व द्वापर युग में भी था और इसी नदी के पानी से पांडवों ने खांडवप्रस्थ को इंद्रप्रस्थ बना दिया था। जिस नदी का पानी कभी लोगों की जिंदगी को खुशहाल करता था, आज उसी नदी का पानी लोगों की जिंदगी के लिए खतरा बन गया है। बीते 20 साल में हिंडन इस कदर  प्रदूषित हुई कि उसका वजूद लगभग समाप्त हो गया है। गाजियाबाद जिले के करहेड़ा गांव से आगे बढ़ते हुए इसमें केवल औद्योगिक उत्सर्जन और विशाल आबादी की गंदगी ही बहती दिखती है। छिजारसी से आगे पर्थला खंजरपुर के पुल के नीचे ही नदी महज नाला दिखती है। कुलेसरा व लखरावनी गांव पूरी तरह हिंडन के तट पर हैं। इन दो गांवों की आबादी दो लाख पहुंच गई है। अधिकांश सुदूर इलाकों से आए मेहनत-मजदूरी करने वाले। उनको हिंडन घाट की याद सिर्फ दीपावली के बाद छठ पूजा के समय आती है। तब घाट की सफाई होती है, इसमें गंगा का पानी नहर से डाला जाता है। कुछ दिनों बाद फिर यह नाला बन जाती है। अपने अंतिम 55 किलोमीटर में सघन आबादी के बीच से गुजरती इस नदी में कोई जीव, मछली नहीं है। इसके पानी में ऑक्सीजन की मात्रा शून्य है।
हाल ही में राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण यानी एनजीटी के आदेश पर हिंडन नदी के किनारे बसे गाजियाबाद, मेरठ, बागपत, शामली, मुजफ्फरनगर, सहारनपुर जनपद के करीब 154 गांवों के 31 हजार हैंडपंपों को 21 अक्तूबर तक उखाड़ने के निर्देश दिए गए हैं। एनजीटी ने अपने एक अध्ययन से पुख्ता किया कि अधिकांश हैंडपंपों का पानी भारी धातुओं से दूषित है और संदेह है कि सहारनपुर, शामली और मेरठ जिले के लगभग 45 तरह के उद्योग नदी के जल में आर्सेनिक, पारा जैसे जानलेवा रसायन डाल रहे हैं। अभी इसी साल मई में दिल्ली में यमुना नदी को निर्मल बनाने के लिए 1,969 करोड़ रुपये के एक्शन प्लान को मंजूरी दी गई है, जिसमें यमुना में मिलने वाले सभी सीवरों व नालों पर प्लांट लगाने की बात है। मान भी लिया जाए कि दिल्ली में यह योजना कामयाब हो गई, पर वहां से दो कदम दूर निकलकर इसका मिलन जैसे ही हिंडन से होगा, ये सैकड़ों करोड़ रुपये बर्बाद होते दिखेंगे।
हिंडन के तट पर बसा समाज इसके प्रति बेहद उदासीन रवैया रखता है। ये अधिकांश लोग बाहरी हैं और इस नदी के अस्तित्व से खुद के जीवन को जोड़कर देख नहीं पा रहे हैं। जरूरत इस बात की है कि हिंडन के तटों पर आकर बसे लोग इस नदी को नदी के रूप में पहचानें, इसके जहर होने से उनकी जिंदगी पर होने वाले खतरों के प्रति गंभीर हों, इसके तटों की सफाई व सौंदर्यीकरण पर काम हो। सबसे बड़ी बात यह कि जिन दो महान नदियों का संगम बिल्कुल गुमनाम है, वहां कम से कम घाट, पहुंचने का मार्ग, संगम स्थल के दोनों ओर वृक्षारोपण जैसे तात्कालिक कार्य किए जाएं। हिंडन की मौत एक नदी या जलधारा का अंत नहीं, बल्कि एक प्राचीन सभ्यता, संस्कृति और संस्कार का भी अवसान होगा।

शुक्रवार, 23 जून 2017

Who cares for victim of radiation ?

विकिरण का दंश झेल रहे लोगों से बेपरवाही 


रावतभाटा यानी राजस्थान में परमाणु शक्ति से बिजली बनाने का संयत्र लगा है, लेकिन एटमी ताकत को बम में बदलने के लिए जरूरी तत्व जुटाने का भी यह मुख्य जरिया है। इस बिजली घर से पांच किमी दूर स्थित तमलाव गांव में बोन ट्यूमर, थायराइड ग्लैंड, सिस्टिक ट्यूमर जैसी बीमारियां हर घर की कहानी है। केंद्र के कर्मचारियों और वहां रहने वालों के बच्चे टेढ़े-मेढ़े हाथ-पांव और अविकसित अंग पैदाइशी होना आम बात हो गई है। यहां तक कि पशुओं की संख्या भी कम होती जा रही है। बकरियों में विकलांगता और गर्भपात की घटनाएं बढ़ी हैं... 

 

कुछ साल पहले जापान फुकुशिमा परमाणु बिजली संयंत्र के रिसाव से पैदा हुए हालातों को भारत अब बिसरा चुका है। हमारे शहर जिस बिजली से जगमगा रहे हैं, जिन कल-कारखानों से हमारी अर्थव्यवसथा संचालित हो रही है, उसके लिए बिजली उत्पादन के लिए संचालित परमाणु शक्ति आधारित बिजलीघर देश की बड़ी आबादी को तिल-तिल मरने को मजबूर किए हुआ है। भारत में देश के भाग्यविधाता उन लाखों लोगों के प्रति बेखबर हैं, जोकि देश को परमाणु-संपन्न बनाने की कीमत पीढि़यों से विकिरण की त्रासदी सह कर चुका रहे हैं।

एटमी ताकत पाने के तीन प्रमुख पद हैं- यूरेनियम का खनन, उसका प्रसंस्करण और फिर विस्फोट या परीक्षण। लेकिन जिन लोगों की जान-माल की कीमत पर इस ताकत को हासिल किया जा रहा है, वे नारकीय जीवन काट रहे हैं! परमाणु ऊर्जा से बनने वाली बिजली का उपभोग करने वाले नेता व अफसर तो दिल्ली या किसी शहर में सुविधा संपन्न जीवन जी रहे हैं, परंतु हजारों लोग ऐसे भी हैं, जो इस जुनून की कीमत अपना जीवन देकर चुका रहे हैं। जिस जमीन पर परमाणु ताकत का परीक्षण किया जाता रहा है, वहां के लोग पेट के खातिर अपने ही बच्चों को अरब देशों में बेच रहे हैं। जिन इलाकों में एटमी ताकत के लिए रेडियो एक्टिव तत्व तैयार किए जा रहे हैं, वहां की अगली पीढ़ी तक का जीवन अंधकार में दिख रहा है। जिस जमीन से परमाणु बम का मुख्य मसाला खोदा जा रहा है, वहां के बाशिंदे तो जैसे मौत का हर पल इंतजार ही करते हैं।

झारखंड के पूर्वी सिंहभूम जिले के जादुगोड़ा में भारत की पहली और एकमात्र यूरेनियम की खान है। यहां से अयस्क का खनन किया जाता है और उसे परिशोधन के लिए हजार किमी दूर हैदराबाद भेजा जाता है। इस प्रक्रिया में शेष बचे जहरीले कचरे को एक बार फिर जादुगोड़ा लाकर आदिवासी गांवों के बीच दफनाया जाता है। यूरेनियम कारपोरेशन ऑफ इंडिया यानी युसिल लाख दावा करे कि खनन या कचरे का जनजीवन पर कोई असर नहीं पड़ रहा है। पर हकीकत यह है कि पिछले तीन-चार सालों में यहां एक सैकड़ा से अधिक असामयिक मौतें हुई हैं। खुद युसिल का रिकार्ड बताता है कि यूरेनियम खनन और उसके कचरे के निबटारे में लगे औसतन 15 लोग हर साल मारे जा रहे हैं। ये सभी मौतें टीबी, ल्यूकेमिया, कैंसर जैसी बीमारियों से होती हैं और इसके मूल में रेडियो विकिरण ही था। उसके बाद कंपनी ने रिकार्ड को उजागर करना ही बंद कर दिया है, लेकिन गैरसरकारी आंकड़े बता रहे हैं कि साल का अंक बढ़ने के साथ-साथ मौत के आंकड़े भी बढ़ रहे हैं। सिंहभूम जिले के सिविल सर्जन ने विकिरण से प्रभावित कई लोगों की पहचान भी की है। इलाके के आदिवासी विकिरण-मुक्त जीवन के लिए लगातार संघर्ष कर रहे हैं। पिछले कई सालों से आंदोलन, लाठीचार्ज, धरने, गिरफ्तारियां, उत्पीड़न यहां के बाशिंदों की नियति बन गया है। जब कोई मौत होती है तो गुस्सा भड़कता है।

प्रशासन के आश्वासन मिलते हैं। ‘राष्ट्र गौरव’ की बेदी पर बलि होने के लिए एक बार फिर भूखे-मजबूर आदिवासियों की नई जमात खड़ी हो जाती है।रावतभाटा यानी राजस्थान में परमाणु शक्ति से बिजली बनाने का संयत्र लगा है, लेकिन एटमी ताकत को बम में बदलने के लिए जरूरी तत्व जुटाने का भी यह मुख्य जरिया है। कुछ साल पहले गुजरात इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट रिसर्च ने रावतभाटा के आसपास 17 दिन तक विस्तृत अध्ययन किया था। संस्था के लोगों ने कोई छह हजार घरों पर पड़ताल की थी। इन्होंने पाया कि रावतभाटा के करीबी गांवों में अन्य गांवों की तुलना में जन्मजात विकलांगता की दर तीन गुना अधिक है। गर्भपात, मरे हुए बच्चे पैदा होना, स्त्रियों में बांझपन आदि का प्रतिशत भी बहुत ऊंचा है। इस बिजली घर से पांच किमी दूर स्थित तमलाव गांव में बोन ट्यूमर, थायराइड ग्लैंड, सिस्टिक ट्यूमर जैसी बीमारियां हर घर की कहानी है। केंद्र के कर्मचारियों और वहां रहने वालों के बच्चे टेढ़े-मेढ़े हाथ-पांव और अविकसित अंग पैदाइशी होना आम बात हो गई है। यहां तक कि पशुओं की संख्या भी कम होती जा रही है। बकरियों में विकलांगता और गर्भपात की घटनाएं बढ़ी हैं। इस सर्वेक्षण में कई डॉक्टर भी थे। उन्होंने स्पष्ट चेतावनी दी है कि विकिरण की थोड़ी सी मात्रा भी शरीर में परिवर्तन के लिए काफी होती है।

विकिरण जीव कोशिकाओं को क्षति ग्रस्त करता है। इससे आनुवांशिकी कोशिकाओं में भी टूट-फूट होती है। आने वाली कई पीढि़यों तक अप्रत्याशित बीमारियों की संभावना बनी रहती है।शौर्य भूमि पोखरण में भव्य स्मृति स्थल बनाने के लिए करोड़ों का खर्चा करने के लिए आतुर लोगों ने कभी यह जानने की जुर्रत नहीं की कि तपती मरूभूमि में जनजीवन होता कैसा है। परीक्षण-विस्फोट से डेढ़ सौ मकान पूरी तरह बिखर गए थे। सालभर के लिए पानी इकट्ठा रखने वाले ‘टांकों’ के टांके टूट गए। उसके एवज में सरकार ने जो मुआवजा बांटा था, उससे एक कमरा भी खड़ा नहीं होना था। धमाके के बाद जब इलाके में नाक से खून बहने और अन्य बीमारियों की खबरें छपीं तो खुद तत्कालीन प्रधानमंत्री ने किसी भी तरह के विकिरण कुप्रभाव न होने के बयान दिए थे। जबकि भूगर्भीय परीक्षण के बाद रेडियोधर्मी जहर के रिसाव की मात्रा और उसके असर पर कभी कोई जांच हुई ही नहीं है। राजस्थान विश्वविद्यालय के एक शोधकर्ता डॉ. अग्रवाल ने पाया था कि 1974 में विस्फोट के बाद पोखरण व करीबी गांवों में कैंसर के रोगियों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है। पोखरण क्षेत्र सरकारी उपेक्षा का किस हद तक शिकार है, इसकी बानगी है कि यहां पेट पालने के लिए लोग अपने बच्चों को बेच रहे हैं। पोखरण और इसकी पड़ोसी पंचायत शिव के कोई एक दर्जन गांव-ढ़ाणियों से हर साल सैकड़ों बच्चे ऊंट दौड़ के लिए खाड़ी देशों को जाते हैं। ये बच्चे 12 से 14 साल उम्र और 30-35 किलो वजन के होते हैं। इनका वजन नहीं बढ़े, इसके लिए उन्हें खाना-पीना कम दिया जाता है। जैसलमेर जिले के भीखोडोई, फलसूंड, बंधेव, फूलोसर व राजमथाई और बाडमेर के उंडू , कानासर, आरंग, रतेउ, केसुआ आदि गांवों के लड़के अरब देशों को गए हैं। ये गरीब मुसलमान, सुतार, राजपूत और जाट बिरादरी के हैं। अपने घरों के लिए पेट का जुगाड़ बने ये बच्चे जब विदेश से लौटे तो पैसा तो खूब लाए पर असामान्य हो गए। वे तुतलाने और हकलाने लगे। कई बच्चे शारीरिक और मानसिक रूप से विकलांग हो गए। हर समस्या की तरह इस पर भी सरकार का तो यही कहना है कि इलाके से कोई बच्चा नहीं गया है। पर वास्तविकता को यी बात उजागर करती है कि अकेले पोखरण से हर साल 30 से 50 पासपोर्ट बन रहे हैं। जेसलमेर जिले में हर साल डेढ़ हजार पासपोर्ट बन रहे हैं।जय जवान-जय किसान के साथ जय विज्ञान के नारे की प्रासंगिकता पोखरण के इस पहलू से संदिग्ध हो जाती है। इस घोर रेगिस्तान में न तो उद्योग-धंधे खुल सकते हैं और न ही व्यापार की संभावनाएं हैं। ऊपर से एक तरफ प्रकृति की मार है तो दूसरी ओर जय विज्ञान का आतंक। आखिर किस बात का गौरव है?यह विडंबना ही है कि भारत में इन तीनों स्तर पर जनजीवन भगवान भरोसे हैं। षायद इस बात का आकलन किसी ने किया ही नहीं कि परमाणु ताकत से बिजली बनाकर हम जो कुछ पैसा बचाएंगे या कमाएंगे; उसका बड़ा हिस्सा जनस्वास्थ्य पर खर्च करना होगा या फिर इससे अधिक धन का हमारा मानव संसाधन बीमारियों की चपेट में होगा। आने वाली पीढ़ी के लिए ऊर्जा के साधन जोड़ने के नाम पर एटमी ताकत की तारीफ करने वाले लोगों को यह जान लेना चाहिए कि क्षणिक भावनात्मक उत्तेजना से जनता को लंबे समय तक बरगलाया नहीं जा सकता है। यदि हमारे देश के बाशिंदे बीमार, कुपोषित और कमजोर होंगे तो लाख एटमी बिजली घर या बम भी हमें सर्वशक्तिमान नहीं बना सकते हैं।

बुधवार, 21 जून 2017

pollution of develpopment

विकास से घुटता  दिल्ली का दम

                                                                    
पंकज चतुर्वेदी
यदि पश्चिमी विक्षोभ  के असर के चलते हुई दो-तीन दिन की बरसात के कारण तापमान में आई कमी को अलग रख दे ंतो गत 50 दिनों से दिल्ली जमकर तप रही है। अकेले आसमान से आग नहीं बरस रही, असल में पूरा षहर एक तो राजस्थान की तरफ से आ रही रेतीली आंधी के चलते बारीक कणों से हलकान है तो साथ ही विकास की गतिविधियां परिवेश में इतना जहर घोल दे रही है जितना कि दो साल में कुल मिला कर नहीं होता है। बीते 17 साल में सबसे बुरे हालात है हवा के। तेज तापमान, वाहनों के धुंए और निर्माण की धूल के चलते वायुमंडल में ओजोन की मात्रा बढ़ना सबसे ज्यादा जानलेवा हो रहा है। इस विश्व पर्यावरण दिवस पर सबसे बड़ी चेतावनी सामने आई कि दिल्ली महानगर में वाहनों की संख्या एक करोड़ हो चुकी है। इसमें हर दिन बाहर से आने वाले पांच लाख वाहन, अवैध तरीके से या एक ही लाईसेंस पर चल रहे कई-कई व्यावसायिक वाहन, स्कूटर को रिक्शे में जोड़ कर बने अवैध वाहन आदि शामिल नहीं है। कुल मिला कर वाहनों का धुआं, फिर निर्माण कार्या के कारण हो रहे जाम के कारण उपजने वाला धुआं और उपर से धूल-मिट्टी। राजधानी की विडंबना है कि तपती धूप हो तो भी प्रदूषण बढ़ता है, बरसात हो तो जाम होता है व उससे भी हवा जहरीली होती है। ठंड हो तो भी धुंध के साथ धुंआ के साथ मिल कर हवा जहरीली ।
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़े बताते हैं कि मई महीने के 77 प्रतिशत दिनों के दौरान दिल्ली की हवा में ओजोन की मात्रा,  मानक स्तर 100 माईक्रो ग्राम प्रति क्यूबिक मीटर से अधिक रही। अप्रैल महीने के 52 फीसदी और फरवरी के 12 फीसद दिनों में यह मानक को पार की। जब वातावरण की गर्मी 40 डिगरी के पार हो जाती है। तो वाहनों, कारखानों आदि से निकले धुएं और धूल के कणो में मौजूद हाईड्रो कार्बन, नाईट्रोजन डाय आक्साईड जैसी प्रदूषक गैसें आपस में रासायनिक क्रिया करती है और उससे ओजोन गैस उपजती है। ओजोन की अधिक मात्रा सांस  और दिल की सेहत बिगाड़ने का बड़ा कारक है।
कुछ ही दिनों पहले ही मे ंविश्व स्वास्थ संगठन ने दिल्ली को दुनिया का सबसे ज्यादा दूशित वायु वाले षहर के तौर पर चिन्हित किया है। इसके बावजूद यहां के निर्माण कार्य ना तो जन स्वास्थय की परवाह कर रहे हंे ना ही पर्यावरण कानूनों की। गत दो महीने से दिल्ली के लगभग बीच से निकलने वाले राश्ट्रीय राजमार्ग 24 के चौड़ीकरण का अनियोजित और बेतरतीब चौड़ीकरण दिल्ली के लिए जानलेवा बन रहा है। सनद रहे यह सड़क दिल्ली एनसीआर की एकतिहाई आबादी के दैनिक आवागमन के अलावा कई राज्यों को जोड़ने वाला ऐसा मार्ग है जो महानगर के लगभग बीच से गुजरता है। एक तो इसके कारण पहले से बनी सड़कें संकरी हो गई हैं, फिर बगैर वैकल्पिक व्यवस्था किए इस पर वाहन का बोझ डाल दिया गया। कालेखां से गाजीपुर तक का बामुश्किल नौ किलोमीटर का रास्ता पार करने में एक वाहन को एक घंटा लगा रहा है। उसके साथ ही खुदाई, मिक्सिंग प्लांट से उड़ रही धूल अलग है। ठीक इसी तरह के लगभग 35 निर्माण कार्य राजधानी में अलग-अलग स्थानों पर चल रहेें हैं जहां हर दिन कोई 65 करोड़ रूपए का ईंधन जल रहा है लेागों के घंटे बरबाद हो रहे हैं। इसके चलते दिल्ली की हवा में कितना जहर घुल गया है, इसका अंदाजा खौफ पैदा करने वालो आंकड़ों कों बांचने से ज्यादा डाक्टरों के एक ंसंगठन के उस बयान से लगाया जा सकता है जिसमें बताया गया है कि देश की राजधानी में 12 साल से कम उम्र के 15 लाख बच्चे ऐसे है, जो अपने खेलने-दौड़ने की उम्र में पैल चलने पर ही हांफ रहे हैं। इनमें से कई सौ का डाक्टर चेता चुके हैं कि यदि जिंदगी चाहते हो तो दिल्ली से दूर चले जाएं।  दरअसल इस खतरे के मुख्य कारण 2.5 माइक्रो मीटर व्यास वाला धुएं में मौजूद एक पार्टिकल और वाहनों से निकलने वाली गैस नाइट्रोजन ऑक्साइड है, जिसके कारण वायु प्रदूषण से हुई मौतों का आंकड़ा लगातार बढ़ता जा रहा है। इस खतरे का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि वायु प्रदूषण करीब 25 फीसदी फेंफड़े के कैंसर की वजह है। इस खतरे पर काबू पा लेने से हर साल करीब 10 लाख लोगों की जिंदगियां बचाई जा सकेंगी ।
यह स्पश्ट हो चुका है कि दिल्ली में वायु प्रदूशण का बड़ा कारण यहां बढ़ रहे वाहन, ट्राफिक जाम और राजधानी से सटे जिलों में पर्यावरण के प्रति बरती जा रही कोताही है। हर दिन बाहर से आने वाले कोई अस्सी हजार ट्रक या बसें यहां के हालात को और गंभीर बना रहे हैं। इसमें कोई दो राय नहीं है कि समस्या बेहद गंभीर है । सीआरआरआई की एक रपट के मुताबिक राजधानी के पीरागढी चौक से हर रोज 315554 वाहन गुजरते हैं और यहां जाम में 8260 किग्रा ईंधन की बर्बादी होती है। इससे निकलने वाला कार्बन 24119किग्रा होता है। कनाट प्लेस के कस्तूरबागांधी मार्ग पर प्रत्येक दिन 81042 मोटर वाहन गुजरते हैं व रेंगते हुए चलने के कारण 2226 किग्रा इंधन जाया करते हैं।। इससे निकला 6442 किग्रा कार्बन वातावरण को काला करता है। और यह हाल दिल्ली के चप्पे-चप्पे का है। यानि यहां सडकों पर हर रोज कई चालीस हजार लीटर इंधन महज जाम में फंस कर बर्बाद होता है। कहने को तो पार्टिकुलेट मैटर या पीएम के मानक तय हैं कि पीएम 2.5 की मात्रा हवा में 50पीपीएम और पीएम-10 की मात्रा 100 पीपीएम से ज्यादा नहीं होना चाहिए। लेकिन दिल्ली का कोई भी इलाका ऐसा नहीं है जहां यह मानक से कम से कम चार गुणा ज्यादा ना हो।
पीएम ज्यादा होने का अर्थ है कि आंखों मंे जलन, फैंफडे खराब होना, अस्थमा, कैंसर व दिल के रोग। जाहिर है कि यदि दिल्ली की संास थमने से बचाना है तो यहां ना केवल सड़कों पर वाहन कम करने होंगे, इसे आसपास के कम से कम सौ किलोमीटर के सभी षहर कस्बों में भी वही मानक लागू करने होंने जो दिल्ली षहर के लिए हों। अब करीबी षहरों की बात कौन करे जब दिल्ली में ही जगह-जगह चल रही ग्रामीण सेवा के नाम पर ओवर लोडेड  वाहन, मेट्रो स्टेशनों तक लोगों को ढो ले जाने वाले दस-दस सवारी लादे तिपहिएं ,पुराने स्कूटरों को जुगाड के जरिये रिक्शे के तौर पर दौड़ाए जा रहे पूरी तरह गैरकानूनी वाहन हवा को जहरीला करने में बड़ी भूमिका निभा रहे हैं। सनद रहे कि वाहन सीएजी से चले या फिर डीजल या पेट्रोल से, यदि उसमें क्षमता से ज्यादा वजन होगा तो उससे निकलने वाला धुआं जानलेवाा ही होगा। यदि दिल्ली को एक अरबन स्लम बनने से बचाना है तो इसमें कथित लोकप्रिय फैसलों से बचना होगा, जिसमें सबसे महत्वपूर्ण है यहां बढ़ रही आबादी को कम करना। सनद रहे कि इतनी बड़ी आबादी के लिए चाहे मेट्रो चलाना हो या पानी की व्यवस्था करना, हर काम में लग रही उर्जा का उत्पादन  दिल्ली की हवा को विषैला बनाने की ओर एक कदम होता है। यही नहीं आज भी दिल्ली में जितने विकास कार्यों कारण जाम , ध्ूाल उड़ रही है वह यहां की सेहत ही खबरा कर रही है, भले ही इसे भविश्य के लिए कहा जा रहा हो। लेकिन उस अंजान भविश्य के लिए वर्तमान बड़ी भारी कीमत चुका रहा है।


शनिवार, 17 जून 2017

President election should be on mutual consent



सर्वसम्मति से हो राष्ट्रपति  का चुनाव

                                              
पंकज चतुर्वेदी
भारत गणतंत्र के 13वें राष्ट्रपति  चुनाव की अधिसूचना जारी होते ही राजनीतिक दल अपने-अपने खेमे को संभालने में लग गए हैं। याद रहे कि आजादी के बाद हुए 13 बार राष्ट्रपति  चुनाव में केवल एक बार सन 1977 में ही नीलम संजीव रेड्डी आम सहमति से निर्वाचित हुए थे, वरना हर बा मतदान होता ही है और केंद्र का सत्ताधारी दल अपनी पसंद का उम्मीदवार जिताने में सफल होता है। कहने को हमारा राष्ट्रपति  तीनों सेना का प्रमुख, भारतीय लोकतंत्र का सर्वषक्तिमान और देष का प्रथम नागरिक होता है, लेकिन कई स्थान पर उसकी भूमिका रबर-स्टैंप  की ही होती है। यह किसी से छिपा नहीं है कि पिछले कुछ सालों में राजनीतिक विद्वेष निजी हमलों के निचचले स्तर पर आ गया है। छोटे से छोटे चुनाव में भाजपा हर कीमत पर जीत सुनिष्चित करने के लिए हर तरीका अपनाती है। लेकिन भारत का राष्ट्रपति  किसी राजनीतिक दल का नहीं होता और यदि सन 2017 का राष्ट्रपति  सर्वसम्मति से चुना जाए तो यह देष की राजनीति के लिए एक सुखद पहल होगा। हालांकि इस साल एकमत हो कर जीएसटी बिल पास करने का प्रयोग काफी कुछ सफल रहा है।

भारतीय संविधान की के अनुच्छेद 54 में राष्ट्रपति  निर्वाचन की प्रक्रिया का विवरण है। इसी के अनुसार अगले राष्ट्रपति  के चुनाव की अधिसूचना जारी हो गई है। नामाकंन जमा करने की अंतिम तिथि 28 जून है। उम्मीदवार को 50 अनुमोदक और 50 प्रस्तावकों के हस्ताक्षर के साथ नामांकन प्रस्तुत करना होता है। ये प्रस्तावक और अनुमोदकों का मतदाता होना अनिवार्य है। और इस निर्वाचन में मतदाता होते हैं दोनो सदनों के सांसद और सभी विधानसभाओं के विधायक। 17 जुलाई मतदान और 20 जुलाई 2017 को चुनाव परिणाम आएंगे। इस बार निर्वाचन अधिकारी लोकसभा के महासचिव को बनाया गया है। यह भी जान लें ि कइस चुनाव में कोई चुनाव चिन्ह नहीं होता और सभी मतदाता सभी उम्मीदवारों को वोट देते हैं, बस फर्क होता है कि उन्हें अपनी प्राथमिकता बताना होता है। जिस उम्मीदवार को पहली प्राथमिकता से ज्यादा वोट मिलते हैं, वहीं विजयी होता है। प्रत्येक राज्य से विधायक औ सांसद के मतों की कीमत एक फार्मूले के अनुसार तय की जाती है जिसमें महत्वपूर्ण भेमिका उस राज्य की आबादी की होती है। इस बार कुल मत 10,98,882 है। यानि विजेता को 5,49,442 वोट पाना अनिवार्य है। वैसे फौरी तौर पर देखें तो केंद्र की सत्ता में बैठे लोगों को  अपना उम्मीदावार जितवाने में कोई दिक्कत नहीं होना चाहिए।, लेकिन इसमें कुछ पैंच भी हैं। सबसे बड़ा संट षिसेना को ले कर है। उसके पास 18 सांसद और 63 विधायाकों के मत हैं।  हालांकि वह एनडीए का पुराना भागीदार दल है, लेकिन सन 2007 के चुनाव में उसने मराठी मानुश के नाम पर प्रतिभादेवी सिंह पाटिल को वोट दे कर एनडीए को धता बता चुकी है। इस बार भी उसके संबंध भाजपा से बेहद कटु हैं। भाजपा में ही षत्रुघन सिन्हा जैसे कई सांसद और विधायक है जिनकी ‘‘आत्मा की आवाज’’ कभी भी जाग्रत हो सकती है।
इसमें कोई षक नहीं है कि इस दौर में लोकतंत्र कई चुनौतियों से जूझ रहा है, देष की आर्थिक स्थिति, सीमा पर तनाव , अंतरराश्ट्रीय स्तर पर मंदी और रोजगार की कमी जैसे  कई संकट हैं जिनका सामना करने के लिए केवल बहुमत की संख्या से काम नहीं चल सकता। जरूरी है कि देष की राजनीति टकराव का रास्ता छोड़ कर सहमति और सामंजस्य से विकास और आम नागरिक की भलाई का कोई रास्ता चुने। राष्ट्रपति  के चुनाव के लिए भी एनडीए को दक्षिण के कुछ दलों के समर्थन का भरोसा है, लेकिन लाख गधित उनके पक्ष में दिख रहा हो, लेकिन थोड़े में ही खेल बिगड़ भी सकता है। यह खतरा एनडीए के रण्णनीतिकार भी जानते है।। उधर कांग्रस की छतरी के तले एकत्र हुए विपक्ष ने फिलहाल तो सर्वसम्म्ति से उम्मीदवार तय करने की बात कही है। एनडीए ने वैंकेया नायडू, राजनाथ सिंह और अरूण जेटली की तीन सदस्यों की कमेटी सर्वसम्मत निर्विरोध  निर्वाचन के लिए गठित की है। विपक्ष के मन भी एक भय है, यदि उनका उम्मीदवार चुनाव हार गया तो? आम लोग इस चुनाव के तरीके या गणित से इतने वाकिफ नहीं हैं, लेकिन दूर तक संदेष तो यही जाएगा कि मोदी सरकार की बड़ी जीत । इस जीत के हंगामें का असर अगले साल होने वाले कई राज्यों के विधान सभा चुनावों मनोवैज्ञानिक तौर पर विपरीत ही जाएगा। कुल मिला कर देखें तो दोनों ही खेमे अपने-अपने डर और आषंका से घिरे हैं और दोनों ही खेमे टकराव के बनिस्पत निर्विरोध चुनाव को प्राथमिकता देंगे।
होना भी यही चाहिए कि देष के सर्वोच्च पद के लिए सियासती अखाड़े ना खुदें और सभी को स्वीकार्य कोई  इस पद को सुषोभित करे। यूपीए, बिहर केगठबंधन और ममता बनर्जी का हट होगा कि कोई संघ का कट्टर छबि वाला इस पर ना आए। उधर विपक्ष महिला, दलित या आदिवासी के नाम पर कहीं सहमत हो सकता है। विप्ख की ओर से महात्मा गांधी के पौत्र और बंगाल के पूर्व राज्यपाल राजमोहन गांधी और लोकसभा की पूर्व स्पीकर व बाबू जगजीवनराम की बेटी मीराकुमार के नाम पर काफी कुछ सहमति है। जबकि सत्ताधारी दल में अभी कई नाम हवा में हैं। द्रोपदी मूर्म से ले कर  लालकृश्ण आडवाणी तक के नाम उछाले जा रहे हैं, लेकिन खबर यह है कि एनडीए खेमा एपीजे अब्दुल कलाम जैसा कोई सर्वमान्य नाम को तलाष चुका है। हालांकि पार्टीका एक कट्टरवादी धड़ा आजादी के बाद पहली बार मिले सबसे बड़े बहुमत का लाभ उठा कर किसी कट्टर छबि वाले संघ कार्यकर्ता को यह पद देने की वकालत कर रहा है तो आज की भाजपा में गत 10 सालों के दौरान दल बदल कर आए लोग, जिनका अब बहुमत है, वे किसी गैरराजनीतिक व्यक्ति को इस पद के लिए चुनने के हिमायती हैं। अनुमान है कि 21 जून तक यह खेमा अपने नाम की घोशण कर देगा।
हालांकि एनडीए के वरिश्ठ नेता इस पूरे सप्ताह सोनिया गांधी से ले कर ममता बनर्जी, सतीषचंद्र मिश्र, सीताराम येचुरी आदि से मेल मुलाकात कर सम्मत नाम की संभावना तलाष रहे हैं। लेकिन यह सब पैतरेबाजी हैं। देष के स्वस्थ लोकतत्र और बिखराव की राजनित से बचने का यह सटीक अवसर है कि सभी दल मिल कर हमारे देष के प्रथम नागरिक को चुनें।

शुक्रवार, 16 जून 2017

Neither follow rules nore feel public difficulties

न अदालत की परवाह न जनता की चिंता 

पंकज चतुर्वेदी

रेल, राष्ट्रीय राजमार्ग पर चक्का जाम करने वालों पर सख्त सजा और आर्थिक दंड के प्रावधान वाला कानून बनना जरूरी है। जो लोग वीडियो रिकाडिंर्ग में सड़क जाम करते दिखें, उन्हें प्रथमदृष्टया दोषी मान कर चुनाव लड़ने, सरकारी अस्पताल में इलाज करवाने जैसे कुछ कायोंर् से रोका जाए। जिन जगहों पर जाम या अराजकता के हालात बने, वहां के अफसरों को इसका जिम्मेदार माना जाना चाहिए, आखिर वे इसी बात का वेतन लेते हैं... 


पिछले दिनों मध्य प्रदेश में किसानों को उनकी मेहनत का वाजिब दाम दिलवाने के लिए आंदोलन हुआ। कई दिनों तक सड़कें बंद रहीं, रेल भी रोकी गईं। सैकड़ों सरकारी व निजी वाहन फूंक दिए गए। जनजीवन को ठप्प करने के इस कार्य को नाम दे दिया आंदोलन का। किसानों की मांगे जायज हैं, उन पर ध्यान दिया जाना जरूरी है, लेकिन इसके लिए की गई हिंसा, तोड़फोड़ व व्यवधान को किसी भी स्तर पर जायज नहीं ठहराया जा सकता। विडंबना यह है कि कुछ जन प्रतिनिधि लोगों को सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के लिए उकसाते दिखे। रही-बची कसर राज्य सरकार ने पूरी कर दी, पुलिस की गोली से मारे गए लोगों के परिवारजनों को एक करोड़ का मुआवजा देने की घोषणा कर दी गई।

यह सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश के विपरीत भी है, जिसमें तोड़-फोड़ में लगे लोगों से उसका मुआवजा वसूलने का निर्देश दिया गया था।हमारा देश भी अजब-गजब है, कहीं विवाह समारोह के नाम पर सड़कें जाम हैं तो कोई धार्मिक या सियासती रैली-जलसे निकाल रहा है तो कोई नमाज-पूजा-आरती, तो कोई धरना-प्रदर्शन। सनद रहे पिछले साल सुप्रीम कोर्ट के दो न्यायाधीशों की पीठ ने केंद्र सरकार को तीन हफ्ते का समय देते हुए आए रोज रास्ते रोकने वालों के खिलाफ ठोस कार्यवाही सुनिश्चित करने के लिए कहा था। अदालत ने यह भी कहा था कि रेल-रास्ता रोकने की अपील करने वालों के खिलाफ अनिवार्य अभियोजन हो और तीन महीने के भीतर ऐसे प्रकरणों का निबटारा भी हो। किसी को अस्पताल पहुंचने की अनिवार्यता तो किसी की नौकरी का इंटरव्यू- इन सबसे लापरवाह न जाने कब-कौन-किन मांगों को लेकर सड़क घेर कर खड़ा हो। ऐसा नहीं कि अदालतों ने ऐसे बंद-प्रदर्शनों पर पहली बार नाखुशी जताई हो और सरकार ने उसको गंभीरता से नहीं लिया हो। विडंबना है कि ऐसे कृत्य करने वालों को न तो नैतिकता की चिंता है और न ही वैधानिकता की।

कथित आंदोलनकारियों को भड़का कर यह अनैतिक काम करने के लिए उकसाने वाले लोग विधानसभा व अन्य सदनों के सदस्य हैं और उन्हें मालूम है कि इस तरह से जनता को परेशान करने के अलावा कुछ हाथ नहीं लगेगा। हो सकता है कि उनकी मांग जायज भी हों, लेकिन अपनी मांग के समर्थन में उठाए गए कदम न तो आम आदमी को जायज लग रहे हैं और न ही यह किसी देश के लोकतांत्रिक ढांचे के लिए स्वस्थ परंपरा है। क्या जनता का प्रतिनिधि होने का दावा करने वाले यह नहीं जानते हैं कि इस तरह का बंद न केवल गैरकानूनी है, बल्कि इसके दूरगामी परिणाम जनता के विरेाध में ही हैं। लोकतंत्र में निर्णय जनता के हाथों होता है, इसका यह मतलब कतई नहीं है कि लोकतंत्र जनता के हाथों में खेलता है। चुनाव वह समय होता है, जब जनता अपनी अपेक्षाओं पर खरा न उतरने वालों को कुर्सी से नीचे उतार फेंकती है। लेकिन आज हालात तो अराजकता की ओर इशारा कर रहे हैं, अपनी बात लोगों तक पहुंचाने के लिए सड़क पर आ जाओ, जाम कर दो, सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाओ, प्रशासन तंत्र को बंधक बनाओ।

लगभग अपहरणकर्ताओं की तर्ज पर अपनी मांगें मनवाने के लिए दूसरों की असुविधा, कानून की सीमा या फिर विधि की प्रक्रिया को नजरअंदाज किया जाए। वे जन-प्रतिनिधि, जिन्हें जनता विभिन्न सदनों में इस उम्मीद से चुनकर भेजती है कि वे उनकी दिक्कतों को दूर करने के कानून बनाएंगे। सदन में तो वे चुप बैठे रहते हैं या जाते ही नहीं हैं और झूठी सहानुभूति दिखाने के लिए सड़कों पर उधम करते हैं। जबकि वे भी जानते हैं कि जिन नीतियों, कानूनों के कारण कीमतें बढ़ रही हैं, उन्हें सदन में पास करवाने में उनकी भी समान भागीदारी रही है। यही नहीं कई बार सत्ताधारी दल के लोग भी ऐसी हरकतों में शामिल होते हैं और ऐसे में पुलिस भी बच कर निकलती है। सन 1997 में ही केरल हाईकोर्ट एक मामले में आदेश दे चुकी थी कि इस तरह के बंद-हुड़दंग अवैध होते हैं। पिछले दिनों ही बंबई हाईकोर्ट सन् 2004 में भाजपा-शिवसेना द्वारा आयोजित बंद के मामले में सख्त आदेश दिए कि धरना-प्रदर्शन के दौरान यदि अधिकारी अदालत द्वारा निर्धारित दिशा-निर्देशों का पालन करवाने में असफल रहते हैं तो उन्हें भी अदालत की अवमानना का दोषी करार दिया जा सकता है।

न्यायमूर्ति बिलाल नाजकी और वीके ताहिलरमानी की बेंच ने बंद-धरने के बारे में जारी दिशा-निर्देशों में स्पष्ट किया है कि किसी भी बंद का आह्वान करने पर उस नेता की पूरी जिम्मेदारी होगी। नेता को जनता के जीवन और संपत्ति की क्षति के लिए मुआवजा देना होगा। कोर्ट ने सड़क पर आम लोगों की आवाजाही निरापद रखने के भी निर्देश दिए। इससे पहले कोलकता, मद्रास और दिल्ली की अदालतें भी समय-समय पर ऐसे आदेश देती रही है। लेकिन नेता हैं कि मानते ही नहीं है। अधिकांश मामलों में पुलिस और प्रशासन भी हालात बिगड़ने का इंतजार करते रहते हैं।सरकारी आंकड़े गवाह हैं कि हमारे देश में हर साल सड़कों पर हंगामे की 56 हजार छोटी-बड़ी घटनाएं होती हैं। इनकी चपेट में आ कर कोई पचास हजार वाहन बर्बाद हो जाते हैं, जिनमें 10 हजार बस या ट्रक होते हैं। अकेले दिल्ली में सालभर में 100 से अधिक तोड़फोड़, उधम की घटनाएं दर्ज की जाती हैं। इस प्रकार के रोज-रोज के ंबंद, धरना-प्रदर्शन, जाम से आम आदमी आजिज आ चुका है। इन अराजकताओं के कारण समय पर इलाज न मिल पाने के कारण मौत होने, परीक्षा छूट जाने, नौकरी का इंटरव्यू न दे पाने जैसे किस्से अब आम हो चुके हैं और सरकार इतने गंभीर विषय पर संवेदनहीन बनी हुई है। सड़क रोकने, सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने, सार्वजनिक रूप से हंगामा करने को गैरकानूनी व अवैधानिक ठहराने वाली कई धाराएं व उन पर कड़ी सजा के प्रावधान हमारी दंड संहिता में हैं, लेकिन जब कानून बनाने वाले निर्वाचित प्रतिनिधि संसद व विधान सभाओं मे ही ऐसी सड़क-छाप हरकतें करते हैं तो सड़क वालों को यह करने से कौन रोकेगा?पुलिस का काम कानून-व्यवस्था बनाए रखना है, पुलिस का काम सुचारू यातायात बनाए रखना है, इसके लिए वह वेतन लेती है, जनता की गाढ़ी कमाई से निकले करों से यह वेतन दिया जाता है।

लेकिन जब पच्चीस-पचास लोग नारे लगाते हुए चौराहों पर लेट जाते हैं तो पुलिस मूकदर्शक बनी रहती है, इंतजार करती है, लंबे ट्राफिक जाम का या फिर स्थिति बिगड़ने का और उसके बाद अपनी चरम-कार्यवाही यानी बल प्रयोग पर उतारू हो जाती है। साफ दिखता है कि पुलिस का प्रशिक्षण ऐसे हालातों से निबटने के नाम पर शून्य हैै। भीड़ को जमा होने से रोकना, आम लोगों के जनजीवन को नुकसान पहुंचाने वाले लोगों पर कड़ी कार्यवाही करना, गुप्तचर सूचनाओं के आधार पर उपद्रवियों के इरादे भांपना और उसके अनुसार ‘प्रिवेंटिव’ कार्यवाही करना जैसे पुलिस भूल ही चुकी है। यह भी विंडबना है कि पचास से अधिक सशस्त्र पुलिस वालों की मौजूदगी में सौ लोगों की भीड़ सड़क पर कोहराम काटती है और इसकी जिम्मेदारी तय कर किसी भी पुलिस अफसर पर कार्यवाही करने का कोई रिकार्ड देशभर की पुलिस के पास नहीं है। अब समय आ गया है कि देश के विकास में व्यवधान बनी ऐसी हरकतों को सख्ती से रोका जाए। रेल, राष्ट्रीय राजमार्ग पर चक्का जाम करने वालों पर सख्त सजा और आर्थिक दंड के प्रावधान वाला कानून बनना जरूरी है। जो लोग वीडियो रिकाडिंर्ग में सड़क जाम करते दिखें उन्हें प्रथमदृष्टया दोषी मान कर चुनाव लड़ने, सरकारी अस्पताल में इलाज करवाने जैसे कुछ कायोंर् से रोका जाए। जिन जगहों पर जाम या अराजकता के हालात बने, वहां के अफसरों को इसका जिम्मेदार माना जाना चाहिए, आखिर वे इसी बात का वेतन लेते हैं। दिल्ली और प्रत्येक शहर में धरना-प्रदर्शन आदि के लिए आबादी से दूर कोई स्थान तय करने, उस स्थान पर लोगों की आवाज सुनने वाले सक्षम अफसरान की बहाली करना जैसे कदम भी आज समय की मांग हैं। यह तभी संभव है, जब राजनेताओं की प्रबल इच्छाशक्ति उनके छोटे-छोटे स्वाथोंर् पर भारी पड़े। पुलिस को उस मजबूरी से ऊपर उठना होगा कि भीड़ पर कोई कार्यवाही करना संभव नहीं होता है। आज बेहतरीन इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस मौजूद हैं, जो हजारों की भीड़ में से उत्पातियों की पहचान कर सकती है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि सड़कों पर उधम, उत्पात, जाम, कोहराम देश की प्रगति के सबसे बड़े दुश्मन हैं और इनको समर्थन देने वाला देश के खिलाफ काम कर रहा है। और ऐसे लोगों को आंदोलनकारी या भीड़ का हिस्सा मान कर छोड़ देना अब नासूर बनता जा रहा है। बिजली, पानी या पुलिस या हर तरह की दिक्कत का हल सड़क रोककर तलाशने वालों को चुनाव लड़ने से रोकने जैसी पाबंदी लगाना समय की मांग है। ऐसे मामलों में वीडियो रिकार्डिंग को पर्याप्त सबूत मान कर मामले का संज्ञान लेना होगा।

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