My writings can be read here मेरे लेख मेरे विचार, Awarded By ABP News As best Blogger Award-2014 एबीपी न्‍यूज द्वारा हिंदी दिवस पर पर श्रेष्‍ठ ब्‍लाॅग के पुरस्‍कार से सम्‍मानित

शुक्रवार, 28 जुलाई 2017

In the memory of Prof Yashpal , :report on education policy

बस्ते के बोझ से दबी शिक्षा

आज छोटे-छोटे बच्चे होमवर्क के खौफ में जीते हैं। जबकि यशपाल समिति की सलाह थी कि प्राइमरी कक्षाओं में बच्चों को गृहकार्य सिर्फ इतना दिया जाना चाहिए कि वे अपने घर के माहौल में नई बात खोजें और उन्हीं बातों को विस्तार से समझें। मिडिल व उससे ऊपर की कक्षाओं में होमवर्क जहां जरूरी हो, वहां भी पाठ्यपुस्तक से न हो। 
छोटी कक्षाओं में सीखने की प्रक्रिया को लगातार नीरस होते जाने से बचाने व बच्चों पर पढ़ाई के बढ़ते बोझ को कम करने के इरादे से मार्च 1992 में मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने आठ शिक्षाविदों की एक समिति बनाई थी, जिसकी अगुआई प्रो. यशपाल कर रहे थे। समिति ने देश भर की कई संस्थाओं व लोगों से संपर्क किया व जुलाई 1993 में अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी। उसमें साफ लिखा गया था कि बच्चों के लिए स्कूली बस्ते के बोझ से अधिक बुरा है न समझ पाने का बोझ। सरकार ने सिफारिशों को स्वीकार भी कर लिया और एकबारगी लगा कि उन्हें लागू करने के लिए कदम उठाए जा रहे हैं। मगर फिर देश की राजनीति मंदिर-मस्जिद जैसे विवादों में ऐसी फंसी कि उस रिपोर्ट की सुध ही नहीं रही।
वैसे सरकार में बैठे लोगों से बात करें तो वे इस बात को गलत ही बताएंगे कि यशपाल समिति की रिपोर्ट लागू करने की ईमानदार कोशिशें नहीं हुर्इं। जमीनी हकीकत जानने के लिए लखनऊ जिले में चिनहट के पास स्थित गणेशपुर गांव के बच्चों का उदाहरण काफी है। कक्षा पांच की विज्ञान की किताब के पहले पाठ के दूसरे पेज पर दर्ज था कि पेड़ कैसे श्वसन क्रिया करते हैं। बच्चों से पूछा गया कि आपमें से कौन-कौन श्वसन क्रिया करता है, सभी बच्चों ने मना कर दिया कि वे ऐसी कोई हरकत करते भी हैं। हां, जब उनसे सांस लेने के बारे में पूछा गया तो वे उसका मतलब जानते थे।
बच्चों से पूछा गया कि सहायता का क्या मतलब है तो जवाब था कि पूछना, रुपया, मांगना। उनके किताबी ज्ञान ने उन्हें सिखाया कि दुनिया का अर्थ शहर, जमीन, पृथ्वी या जनता होता है। आंगनवाड़ी केंद्र में चार्ट के सामने रट रहे बच्चों ने न तो कभी अनार देखा था और न ही उन्हें ईख, ऐनक, एड़ी और ऋषि के मायने मालूम थे। किताबों ने बच्चों को भले ही ज्ञानवान बना दिया हो, पर कल्पना व समझ के संसार में वे दिनोंदिन कंगाल होते जा रहे हैं। यशपाल समिति की पहली सिफारिश थी कि बच्चों को निजी सफलता वाली प्रतियोगिताओं से दूर रखा जाए क्योंकि यह आनंददायक शिक्षा के रास्ते में सबसे बड़ा रोड़ा है। इसके स्थान पर सामूहिक गतिविधियों को प्रोत्साहित व पुरस्कृत किया जाना चाहिए। इसके विपरीत, बीते एक दशक में कक्षा में अव्वल आने की गलाकाट प्रतियोगिता में न जाने कितने बच्चे कुंठा का शिकार हो मौत को गले लगा चुके हैं।
समिति की दूसरी सिफारिश पाठ्यपुस्तक के लेखन में शिक्षकों की भागीदारी बढ़ा कर उसे विकेंद्रित करने की थी। सभी स्कूलों को पाठ्यपुस्तकों और अन्य सामग्री के चुनाव सहित नवाचार के लिए बढ़ावा दिए जाने की बात भी इस रिपोर्ट में थी। अब प्राइवेट स्कूलों को अपनी किताबें चुनने का हक तो मिल गया है, लेकिन यह अच्छा व्यापार बन कर बच्चों के शोषण का जरिया बन गया है। पब्लिक स्कूल अधिक मुनाफा कमाने की फिराक में बच्चों का बस्ता भारी करते जा रहे हैं। उधर सरकारी स्कूलों के लिए पाठ्यपुस्तकें तैयार करने वाला एनसीईआरटी इतने विवादों में है कि वह पुस्तकें लिखने वाले लेखकों का नाम तक गोपनीय रखने लगा है।
ऐसे ही हालात विभिन्न राज्यों के पाठ्यपुस्तक निगमों के हैं। दिल्ली सरकार के स्कूलों के लिए एनसीईआरटी द्वारा तैयार पुस्तकें आधा साल गुजरने के बाद भी बच्चों तक नहीं पहुंचती हैं। जाहिर है कि बच्चों को अब पूरे साल का पाठ्यक्रम तीन महीने में पूरा करने की कवायद करनी होगी। ऐसे में उन पर पढ़ाई का बोझ कम होने की बात करना बेमानी ही होगा। पाठ्यपुस्तकों को स्कूल की संपत्ति मानने व उन्हें बच्चों को रोज घर ले जाने की जगह स्कूल में ही रखने के सुझाव न जाने किस लाल बस्ते में बंध कर गुम हो गए।
समिति की एक राय यह भी थी कि केंद्रीय स्कूलों व नवोदय विद्यालयों के अलावा सभी स्कूलों को उनके राज्य के शिक्षा मंडलों से संबद्ध कर देना चाहिए। लेकिन आज सीबीएसई से संबद्धता स्कूल के स्तर का मानदंड माना जाता है और हर साल खुल रहे नए-नए पब्लिक स्कूलों को अपनी संबद्धता बांटने में सीबीएसई दोनों हाथ खोले हुए है। नतीजा है कि राज्य बोर्ड से पढ़ कर आए बच्चों को दोयम दर्जे का माना जा रहा है। कक्षा दस व बारह के बच्चों को पाठ्य सामग्री रटने की मजबूरी से छुटकारा दिलाने के लिए समिति ने परीक्षा के तरीकों में आमूलचूल बदलाव की बात कही थी। पर बोर्ड की परीक्षाओं में अव्वल आने का सबसे बढ़िया फंडा रटना ही माना जा रहा है।
एक और सिफारिश अभी तक मूर्त रूप नहीं ले पाई है, जिसमें सुझाया गया था कि नर्सरी कक्षाओं में दाखिले के लिए होने वाले टेस्ट व इंटरव्यू बंद होने चाहिए। साथ ही गैर-सरकारी स्कूलों को मान्यता देने के मानदंड कड़े करने की बात भी कही गई थी। जगह, स्टाफ, पढ़ाई और खेल के सामान के मानदंड सरकारी स्कूलों पर भी लागू हों। यह सर्वविदित है कि आज दूरस्थ गांवों तक बड़े-बड़े नाम वाले पब्लिक स्कूल खोल कर अभिभावकों की जेब काटने के धंधे पर कहीं कोई अंकुश नहीं है। आज छोटे-छोटे बच्चे होमवर्क के खौफ में जीते हैं। जबकि यशपाल समिति की सलाह थी कि प्राइमरी कक्षाओं में बच्चों को गृहकार्य सिर्फ इतना दिया जाना चाहिए कि वे अपने घर के माहौल में नई बात खोजें और उन्हीं बातों को विस्तार से समझें। मिडिल व उससे ऊपर की कक्षाओं में होमवर्क जहां जरूरी हो, वहां भी पाठ्यपुस्तक से न हो। पर आज तो होमवर्क का मतलब ही पाठ्यपुस्तक के सवाल-जवाब को कापी पर उतारना या उसे रटना रह गया है। कक्षा में चालीस बच्चों पर एक शिक्षक, विशेष रूप से प्राइमरी में तीस बच्चों पर एक शिक्षक होने की सिफारिश खुद सरकारी स्कूलों में भी लागू नहीं हो पाई है। अब एक ही शिक्षक को एक साथ कई कक्षाएं पढ़ाने की बाकायदा ट्रेनिंग शुरू हो गई है। पत्राचार के जरिए बीएड की उपाधि देने वाले पाठ्यक्रमों की मान्यता समाप्त करने की सिफारिश भी यशपाल समिति ने की थी। विडंबना यह है कि इस रिपोर्ट को सरकार द्वारा स्वीकार कर लेने के बाद करीब एक दर्जन विश्वविद्यालयों को पत्राचार से बीएड कोर्स की अनुमति सरकार ने ही दी।
समिति ने पाठ्यक्रम तैयार करने में विषयों के चयन, भाषा, प्रस्तुति, बच्चों के लिए अभ्यास आदि पर गहन चिंतन कर कई सुझाव दिए थे। उन सब की चर्चा उससमय खूब हुई। पर धीरे-धीरे शैक्षिक संस्थाओं को दुकान बनाने वालों का पंजा कसा और सबकुछ पहले जैसा ही होने लगा। भाषा के मायने संस्कृतनिष्ठ जटिल वाक्य हो गए, तभी बच्चे कहने में नहीं हिचकिचाते हैं कि वे श्वसन क्रिया तो करते ही नहीं हैं। आज हमारे देश में शिक्षा के नाम पर विदेशी पैसे की बाढ़ आई हुई है। यह धन हमारे देश पर यानी हम सभी पर कर्ज है, जिसे मय सूद के लौटाना है। पैसा विदेशी है तो उससे क्रियान्वित होने वाली अवधारणाएं व प्रक्रियाएं भी सात समंदर पार वाली हैं। डीपीइपी, सर्वशिक्षा अभियान, स्कूल चलो या शिक्षा गारंटी योजना जैसे प्रयोग स्कूल में बच्चों के नामांकन को भले बढ़ा सकते हैं, शब्द व अंक को पहचानने वाले साक्षरों के आंकड़ों में शायद इजाफा भी हो जाए, पर शिक्षा का मूल उद््देश्य (जागरूक नागरिक) कहीं नहीं दिखेगा। अपने वजन से अधिक का बस्ता ढोते बच्चों के लिए शिक्षा भी एक बोझ बन कर रह गई है।
 

Expensive Medical education making hole in pocket of patients


ऐसा डॉक्टर तो पैसा कमाएगा ही

पंकज चतुर्वेदी
अभी-अभी सरकार ने संसद में स्वीकार किया कि देश में कोई 8.18 लाख डॉक्टर मौजूद हैं , यदि आबादी को 1.33 अरब मान लिया जाए तो औसतन प्रति हजार व्यथ्तिक पर एक डाक्ट का आंकडज्ञ भी बहुत दूर लगता है। तिस पर मेडिकल की पढ़ाई इतनी महंगी कर दी है कि जो भी बच्चा डाक्टर बनेगा, उसकी मजबूरी होगी कि वह दोनेा हाथों से केवल नोट कमाए। मेडिकल कालेज में प्रवेश के आकांक्षी बच्चे दसवीं कक्षा पास कर ही नामी-गिरामी कोचिंग संस्थानों  की शरण में चले जाते हैं जिसकी फीस कई-कई लाख होती है। इतनी महंगी है मेडिकल की पढ़ाई, इतना अधिक समय लगता है इसे पूरा करने में , बेहद कठिन है उसमें दाखिला होना भी---- पता नहीं क्यों इन तीन समस्याओं पर सरकार कोई माकूल कदम क्यों नही उठा पा रह है।

 हर राजनीतिक दल चुनाव के समय ‘सभी को स्वास्थ्य’’ के ंरंगीन सपने भी दिखाता है, लेकिन इसकी हकीकत किससी सरकारी अस्पताल में हनीं बल्कि कसिी पंच सितारा किस्म के बड़े अस्पताल में जा कर उजागर हो जाती है- भीड़, डाक्टरों की कमी, बेतहाशा फीस और उसके बावजूद भी बदहवास तिमारदार। सनद रहे हमारे देश में पहले से ही राश्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य योजना, ईएसआई, सीजीएचएस जैसी कई स्वास्थ्य योजनाएं समाज के विभिन्न वर्गों के लिए हैं व सभी के हितग्राही असंतुश्ट, हताश  हैं। देशभर के सरकारी अस्पताल मशीनरी, डाक्टर तकनीशियनों के स्तर पर कितने कंगाल हैं, उसके किस्से आए रोज हर अखबार में छपते रहते हैं । भले ही केाई कुछ भी दावे कर ले, लेकिन हकीकत तो यह है कि हमारे यहां इतने डाक्टर ही नहीं है कि सभी को इलाज की कोई भी योजना सफल हो। यदि डाक्टर मिल भी जाएं तो आंचलिक क्षेत्र की बात दूर है, जिला स्तर पर जांच-दवा का इस स्तर का मूलभूत ढ़ांचा विकसित करने में दशकों लगेंगे ताकि मरीज महानगर की ओर ना भागे। 
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर इस बार मेडिकल कालेजों में प्रवेश की परीक्षा राश्ट्रीय स्तर पर आयोजित की गई। अब बच्चे हर राज्य में जा कर वहां के मेडिकल कालेजों में अपनी प्राथमिकता दर्ज करवा रहे हैं, इसके लिए उन्हें उस राज्य की यात्रा करनी पड़ रही है। मान लें कि यदि दिल्ली का कोई बच्चा कर्नाटक, महाराश्ट्र और त्रिपुरा राज्यों के कालेजों में जा कर अपना विकल्प भरता है। यानि बच्चा और उसके माता या पिता को साळथ जाना होगा, वक्त कम है अर्थात हवाई यात्रा की मजबूरी होगी। फिर उस राजधानी में जा कर कम से कम दो दिन ठहरना, भोजन, परिवहन आदि यानि तीन राज्यों के कालेजों के लिए ही कम से कम दो लाख जेब में होना जरूरी है। इसके बाद भी यह गारंटी नहीं कि प्रवेश हो ही जाएगा। खर्च यहीं नहीं थमते , यदि प्रवेश मिल गया तो एक साल की ट्यूशन फीस कम से कम आठ लाख। हॉस्टल, पुस्तकें व अन्य व्यय हर महीने कम से कम चालीस हजार  यानि पांच साल में चालीस लाख फीस और न्यूनतम पच्चीस लाख उपर से। अब महज एमबीबीएस करने से काम चलता नहीं है, यदि पोस्ट ग्रेजुएट किया तो एक से डेढ करोड प्रवेश व ट्यूशन फीस। आठ साल लगा कर दो करोड़ रूप्ए व्यय कर जो डाक्टर बनेगा, वह किसी गांव में जा कर सेवा करेगा या फिर मरीजों पर दया करेगा, इसकी संभावना बहुत कम रह जाती है।

गाजियाबाद  दिल्ली से सटा एक विकसित जिला कहलाता है, उसे राजधानी दिल्ली का विस्तार कहना ही उचित होगा। कोई 43 लाख आबादी वाले इस जिले में डाक्टरों की संख्या महज 1800 है, यानी एक डाक्टर के जिम्मे औसतन तीस हजार मरीज। इनका बीस फीसदी भी आम लोगों की पहुंच में नहीं है, क्योंकि अधिकांश डाक्टर उन बड़े-बड़े अस्पतालो में काम कर रहे है, जहां तक औसत आदमी का पहुंचना संभव नहीं होता। राजधानी दिल्ली में ही चालीस फीदी आबादी झोला छाप , नीमहकीमों या छाड़-फूंक वालों के बदौलत अपने स्वास्थ्य की गाड़ी खींचती है। कहने की जरूरत नहीं है कि ग्रामीण स्तर पर स्वास्थ सेवा की बानगी उ.प्र. का ‘‘एन एच आर एम’’ घेाटाला है। विश्व स्वास्थ्य सांख्यिकी संगठन के ताजा आंकड़ों के मुताबिक भारत में 13.3 लाख फीजिशियन यानी सामान्य डाक्टरों की जरूरत है जबकि उपलब्ध हैं महज 6.13 लाख।

 सरकारी आंकड़े बताते हैं कि भारत में प्रति 1667 व्यक्ति पर औसतन एक डाक्टर उपलब्ध है। अब गाजियाबाद जैसे षहरी जिले और सरकार के आंकड़ों को आमने-सामने रखें तो सांख्यिकीय-बाजीगरी उजागर हो जाती है। यहां जानना जरूरी है कि अमेरिका में आबादी और डाक्टर का अनुपात 1ः 375 है, जबकि जर्मनी में प्रति 283 व्यक्ति पर एक डाक्टर उपलब्ध है। भारत में षहरी क्षेत्रों में तो डाक्टर हैं भी, लेकिन गांव जहां 70 फीसदी आबादी रहती है, डाक्टरों का टोटा है। षहरों में भी उच्च आय वर्ग या आला ओहदों पर बैठे लोगों के लिए तो स्वास्थ्य सेवाएं सहज हैं, लेकिन आम लोगों की हालत गांव की ही तरह है।

जब तब संसद में जर्जर स्वास्थ्य सेवाओं की चर्चा होती है तो सरकार डाक्टरों का रोना झींकती है, लेकिन उसे दूर करने के प्रयास कभी ईमानदारी से नहीं हुए। हकीकत में तो कई सांसदों या उनके करीबियों के मेंडिकल कालेज हैं और वे चाहते नहीं हैं कि देश में मेडिकल की पढ़ाई सहज उपलब्ध हो। बकौल मेडिकल कांउसिंल भारत में 335 मेडिकल कालेजों में 40,525 सीटें एमबीबीएस की हैं। कुछ साल पहले तब के केंद्र सरकार ने ग्रामीण क्षेत्रों के लिए अलग से डाक्टर तैयार करने के चार साला कोर्स की बात कही थी, लेकिन सरकारी दम पर उसका क्रियान्वयन संभव था हीं नहीं, और प्राईवेट कालेज वाले ऐसी किसी को परवान चढ़ने नहीं देना चाहते।  हमारे देश के लगभग 400 जिलो में विशाल व सुविधा संपन्न सरकारी जिला अस्पताल हैं जहां अनुभवी डाक्टर भी हैं। यह कोई बड़ी बात नहीं है कि ऐसे  अस्पतालों में महज 20 या 40 सीट के मेडिकल कालेज शुरू कर दिए जाएं। इससे स्थानीय डाक्टर को ऐकेडमिक येागदान का अवसर भी मिलेगा, साथ ही सरकारी अस्पतालों की परिसंपत्ति व संसाधन का इस्त्ेमाल बहुत कम लागत में एक रचनात्मक कार्य के लिए हो सकेगा।  तात्कालीक जरूरत तो इस बात की है कि हर राज्य में जा कर काउंसलिंग के नाम पर अपने दस्तावेज परीक्षण करवाने के आदेश पर रोक लगा कर इसकी कोई केंद्रीकृत व आनलाईन व्यवस्था लागू की जाए। साथ ही निजी या सरकारी मेडिकल कालेज में ट्यूशन फीस कम करना, सबसिडी दर पर पुस्तकें उपलब्ध करवाने जैसे प्रयोग किये जा सकते है। ताकि भारत में सभी को स्वास्थ्य का नारा साकार रूप ले सके।
हाल के वर्शों में इंजीनियरिंग और बिजनेस की पढ़ाई के लिउ जिस तरह से कालेज खुले, उससे हमारा देश तकनीकी शिक्षा और विशेशज्ञता के क्षेत्र में दुनिया के सामने खड़ा हुआ है। हमारे यहां महंगी मेडिकल की पढ़ाई, उसके बाद समुचित कमाई ना होने के कारण ही डाक्टर लगातार विदेशों की ओर रूख कर रहे हैं। यदि मेडिकल की पढ़ाई सस्ती की जाए, अधिक मेडिकल कालेज खोलने की पहल की जाए, ग्रामीण क्षेत्र में डाक्टरों को समुचित सुविधाएं दी जाएं तो देश के मिजाज को दुरूस्त करना कोई बड़ी बात नहीं है, लेकिन मेडिकल की पढ़ाई में जिस तरह सरकार ने निजी क्षेत्र को विस्तार से रोक रखा है, जिस तरह अंधाधुंध फीस ली जा रही है; उससे तो यही लगता है कि सरकार ही नहीं चाहती कि हमारे यहां डाक्टरों की संख्या बढ़े। और जब तक डाक्टर नहीं बढ़ेंगे सबके लिए स्वास्थ्य की बात महज लफ्फाजी से ज्यादा नहीं होगी।


रविवार, 23 जुलाई 2017

Flyover-unnder pass cause of jam in rainy season

शहरी विकास की पोल खोलती बारिश

महानगरों में बढ़ते यातायात को सहज बनाने के लिए बीते एक दशक के दौरान ढेर सारे फ्लाईओवर और अंडरपास बने। दावे किए गए कि अमुक सड़क अब ट्रैफिक सिग्नल से मुक्त हो गई है। इसके बावजूद वहां प्रति दिन जाम लगना आम बात है। यदि मानवजन्य कारणों को अलग कर दिया जाए तो दिल्ली जैसे शहरों में जाम लगने के अधिकांश स्थान या तो फ्लाईओवर हैं या फिर अंडरपास। यह मुसीबत बरसात के दिनों में और गंभीर हो जाती है

फजीहत करवाते फ्लाईओवर
पंकज चतुर्वेदी

 

अभी कुछ फुहारें क्या पड़ी ,दिल्ली और उसके आसपास के सभी महानगर- गाजियाबाद, नोएडा, गुडगांव पानी-पानी हो गए। कई सड़कों पर पांच किलोमीटर तक लंबा जाम लग गया। गरमी से निजात के आनंद की कल्पना करने वाले सड़कों पर जगह-जगह पानी भरने से ऐसे दो-चार हुए कि अब बारिश के नाम से ही डर रहे हैं। बारिश भले ही रिकार्ड में बेहद कम थी, लेकिन आधी दिल्ली ठिठक गई। जहां उड़ कर जाने को यह भी नहीं कि ऐसा केवल दिल्ली में ही हो रहा है। यह तो हर साल की कहानी है और देश के कोई दो दर्जन महानगरों की त्रासदी है। हर बार सारा दोष नालों की सफाई ना होने ,बढ़ती आबादी, घटते संसाधनों और पर्यावरण से छेड़छाड़ पर थोप दिया जाता हैं । विडंबना है कि शहर नियोजन के लिए गठित लंबे-चौडे़ सरकारी अमले पानी के बहाव में शहरों के ठहरने पर खुद को असहाय पाते हैं । दुखद है कि जाम का कारण बनने वाला पानी का भराव उन जगहों पर होता है जिन्हे सड़क निर्माण तकनीक की आधुनिक संरचना कहते हैं - अंडर पास व फ्लाई ओवर।
देश की राजधानी दिल्ली में सुरसामुख की तरह बढ़ते यातायात को सहज बहाव देने के लिए बीते एक दशक के दौरान ढेर सारे फ््लाई ओवर और अंडरपास बने। कई बार दावे किए गए कि अमुक सड़क अब ट्राफिक सिग्नल से मुक्त हो गई है, इसके बावजूद दिल्ली में हर साल कोई 185 जगहों पर 125 बड़े जाम और औसतन प्रति दिन चार से पांच छोटे जाम लगना आम बात है।  इनके प्रमुख कारण किसी वाहन का खराब होना, किसी धरने-प्रदर्शन की वजह से यातायात  का रास्ता बदलना, सड़कांे की जर्जर हालत ही होते हैं । लेकिन जान कर आश्चर्य होगा कि यदि मानवजन्य जाम के कारणों को अलग कर दिया जाए तो महानगर दिल्ली में जाम लगने के अधिकांश स्थान या तो फ्लाई ओवर हैं या फिर अंडर पास। और यह केवल बरसात के दिनों की ही त्रासदी नहीं है, यह मुसीबत बारहों महीने, किसी भी मौसम में आती है। कहीं इसे डिजाईन का देाश कहा जा रहा है तो कहीं लोगों में यातायात-संस्कार का अभाव। लेकिन यह तय है कि अरबों रूपए खर्च कर बने ये हवाई दावे हकीकत के धरातल पर त्रासदी ही हैं।
बारिश के दिनों में अंडर पास में पानी भरना ही था, इसका सबक हमारे नीति-निर्माताओं ने आईटीओ के पास के शिवाजी ब्रिज और कनाट प्लेस के करीब के मिंटो ब्रिज से नहीं लिया था। ये दोनों ही निर्माण बेहद पुराने हैं और कई दशकों से बारिश के दिनों में दिल्ली में जल भराव के कारक रहे हैं। इसके बावजूद दिल्ली को ट्राफिक सिग्नल मुक्त बनाने के नाम पर कोई चार अरब रूपए खर्च कर दर्जनभर अंडरपास बना दिए गए। लक्ष्मीनगर चुंगी, द्वारका मार्ग, मूलचंद,पंजाबी बाग आदि कुछ ऐसे अंडर पास हैं जहां थोड़ी सी बारिश में ही कई-कई फुट पानी भर जाता है। सबसे षर्मनाम तो है हमारे अंतरराश्ट्रीय हवाई अड्डे को जोड़ने वाले अंडर पास का नाले में तब्दील हो जाना। कहीं पर पानी निकालने वाले पंपों के खराब होने का बहाना है तो सड़क डिजाईन करने वाले नीचे के नालों की ठीक से सफाई ना होने का रोना रोते हैं तो दिल्ली नगर पालिका अपने यहां काम नहीं कर रहे कई हजार कर्मचारियों की पहचान ना कर पाने की मजबूरी बता देती है। इन अंडरपास की समस्या केवल बारिश के दिनों में ही नहीं है। आम दिनों में भी यदि यहां कोई वाहन खराब हो जाए या दुर्घटना हो जाए तो उसे खींच कर ले जाने का काम इतना जटिल है कि जाम लगना तय ही होता है। असल में इनकी डिजाईन में ही खामी है जिससे बारिश का पूरा जल-जमाव उसमें ही होता है। जमीन के गहराई में जा कर ड्रैनेज किस तरह बनाया जाए, ताकि पानी की हर बूंद बह जाए, यह तकनीक अभी हमारे इंजीनियरों को सीखनी होगी।
ठीक ऐसे ही हालात फ्लाईओवरों के भी हैं। जरा पानी बरसा कि उसके दोनो ओर यानी चढ़ाई व उतार पर पानी जमा हो जाता है। कारण एक बार फिर वहां बने सीवरों की ठीक से सफाई ना होना बता दिया जाता है। असल में तो इनकी डिजाईन में ही कमी है- यह आम समझ की बात है कि पहाड़ी जैसी किसी भी संरचना में पानी की आमद ज्यादा होने पर जल नीचे की ओर बहेगा। मौजूदा डिजाईन में नीचे आया पानी ठीक फ्लाईओवरों से जुड़ी सड़क पर आता है और फिर यह मान लिया जाता है कि वह वहां मौजूद स्लूस से सीवरों में चला जाएगा। असल में सड़कों से फ्लाईओवरों के जुड़ाव में मोड़ या अन्य कारण से एक तरफ गहराई है और यहीं पानी भर जाता है। कई स्थान पर इन पुलों का उठाव इतना अधिक है और महानगर की सड़कें हर तरह के वाहनों के लिए खुली भी हुई हैं, सो आए रोज इन पर भारी मालवाहक वाहनों का लोड ना ले पाने के कारण खराब होना आम बात है। एक वाहन खराब हुआ कि कुछ ही मिनटों में लंबा हो जाता है। ऐसे हालात सरिता विहार, लाजपत नगर, धौलाकुआं, नारायणा, रोहिणी आदि में आम बात हैं।
अंडर पास का हर बार तालाब बन जाना गाजियाबाद के गौशाला अंडरपास की स्थाई समस्या है तो जयपुर जाने वाले राश्ट्रीय राजमार्ग 8 पर गुडगांव के लिए जाने वाले प्रत्येक रपटे पर बारिश का पानी जमा होता ही है। दिल्ली के हवाई अड्डे स ेले कर दिलशाद गार्डन तक के अंडर पास जरा से बादल बरसने पर दरिया बन जाते हैं। फरीदाबाद में प्रत्येक पुल बरसात के बाद जाम हो जाता है। यह दिक्कत अकेले दिल्ली एनसीआर तक ही नहीं है, लखनउ, इंदौर, पटियाला, सूरत जैसे षहर भी पुल व भूमिगत पथों के बारिश में बेकार होने की शिकायतें करते रहते हैं। भले ही अब बरसात कुछ ही दिनों होती हो, लेकिन कुछ ही दिनों में कुछ ही घंटों में होने वाला जाम ईंधन की बर्बादी, उससे उपजे कार्बन के कारण धरती को स्थाई नुकसान तथा ईंधन की खरीद पर भारत के विदेशी पूंजी के व्यय में इजाफा करता है। जाहिर है कि फ्लाई ओवर और अंडरपास के डिजाईन बरसात को ध्यान में रख कर बनाए जाने आवश्यक हैं ताकि उससे पानी को बचाया भी जा सके।
अब षायद दिल्ली को वर्ल्ड क्लास सिटी बनाने के स्वप्नदृश्टाओं को सोचना होगा कि कई अरब-खरब खर्च कर यदि ऐसी ही मुसीबत को झेलना है तो फिर ट्राफिक सिग्नल सिस्टम ही क्या बुरा है ? जैसे हाल ही में सरकार को समझ में आया कि कई-कई करोड़ खर्च कर बनाए गए भूमिगत पैदल पारपथ आमतौर पर लोग इस्तेमाल करते ही नहीं हैं और नीतिगत रूप से इनका निर्माण बंद कर दिया गया है। 
यह विडंबना है कि हमारे नीति निर्धारक यूरोप या अमेरिका के किसी ऐसे देश की सड़क व्यवस्था का अध्ययन करते हैं जहां ना तो दिल्ली की तरह मौसम होता है और ना ही एक ही सड़क पर विभिन्न तरह के वाहनों का संचालन। उसके बाद सड़क, अंडरपास और फ्लाईओवरों की डिजाईन तैयार करने वालों की शिक्षा भी ऐसे ही देशों में लिखी गई किताबों से होती हैं। नतीजा सामने है कि ‘‘आधी छोड़ पूरी को जावे, आधी मिले ना पूरी पावे’’ का होता है। हम अंधाधंुध खर्चा करते हैं, उसके रखरखाव पर लगातार पैसा फूंकते रहते हैं- उसके बावजूद ना तो सड़कों पर वाहनों की औसत गति बढ़ती है और ना ही जाम जैसे संकटों से मुक्ति। काश! कोई स्थानीय मौसम, परिवेश और जरूरतों को ध्यान में रख कर जनता की कमाई से उपजे टैक्स को सही दिशा में व्यय करने की भी सोचे। सरकार में बैठे लोग भी इस संकट को एक खबर ेस कहीं आगे की सोच के साथ देखे।

पंकज चतुर्वेदी
यूजी-1, 3/186 ए राजेन्द्र नगर
सेक्टर-2
साहिबाबाद
गाजियाबाद 201005
9891928376, 0120-4241060
चब7001010/हउंपसण्बवउ

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शुक्रवार, 21 जुलाई 2017

sewar death spot for cleaner

गंदगी के समंदर में गर्क होती जिंदगी

सीवर सफाई में लगे श्रमिकों के बीच किए गए सर्वे से मालूम चलता है कि उनमें से 49 फीसदी लोग सांस की बीमारियों, खांसी व सीने में दर्द के रोगी हैं। 11 प्रतिशत को डरमैटाइसिस, एक्जिमा और ऐसे ही चर्म रोग हैं।

अभी बीते शनिवार को दिल्ली के घिटोरनी में एक फार्म हाउस के सीवर की सफाई के दौरान चार लोग काल के गाल में समा गए। इसी साल अप्रैल महीने में दिल्ली एनसीआर के फरीदाबाद और गाजियाबाद में सीवर की जानलेवा गैस से दम घुटने के चलते छह लोग मरे हैं। एक अप्रैल को उदयपुर में एक ही स्थान पर पांच लोग मारे गए। ऐसी मौतें हर साल हजार से ज्यादा होती हैं। हर मौत का कारण सीवर की जहरीली गैस बताया जाता है।

हर बार कहा जाता है कि यह लापरवाही का मामला है। पुलिस ठेकेदार के खिलाफ मामला दर्ज कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेती है। यही नहीं अब नागरिक भी अपने घर के सैप्टिक टैंक की सफाई के लिए अनियोजित क्षेत्र से मजदूरों को बुला लेते हैं और यदि उनके साथ कोई दुर्घटना होती है तो न तो उनके आश्रितों को कोई मुआवजा मिलता है और न ही कोताही करने वालों को कोई समझाईश। शायद यह पुलिस को भी नहीं मालूम है कि सीवर सफाई का ठेका देना हाईकोर्ट के आदेश के विपरीत है। समाज के जिम्मेदार लोगों ने कभी महसूस ही नहीं किया कि नरक-कुंड की सफाई के लिए बगैर तकनीकी ज्ञान व उपकरणों के निरीह मजदूरों को सीवर में उतारना अमानवीय है।
विडंबना है कि सरकार व सफाई कर्मचारी आयोग सिर पर मैला ढोने की अमानवीय प्रथा पर रोक लगाने के नारों से आगे इस तरह से हो रही मौतों पर ध्यान ही नहीं देते। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और मुंबई हाईकोर्ट ने सात साल पहले सीवर की सफाई के लिए दिशा-निर्देश जारी किए थे, जिनकी परवाह और जानकारी किसी को नहीं है। सरकार ने भी सन 2008 में एक अध्यादेश लाकर गहरे में सफाई का काम करने वाले मजदूरों को सुरक्षा उपकरण प्रदान करने की अनिवार्यता की बात कही थी। नरक कुंड की सफाई का जोखिम उठाने वाले लेागों की सुरक्षा-व्यवस्था के कई कानून हैं और मानव अधिकार आयोग के निर्देश भी।

लंकिन इनके पालन की जिम्मेदारी किसी की नहीं। कोर्ट के निर्देशों के अनुसार सीवर की सफाई करने वाली एजंसी के पास सीवर लाईन के नक्शे, उसकी गहराई से संबंधित आंकड़े होना चाहिए। सीवर सफाई का दैनिक रिकॉर्ड, काम में लगे लोगों की नियमित स्वास्थ्य जांच, आवश्यक सुरक्षा उपकरण मुहैया करवाना, काम में लगे कर्मचारियों का नियमित प्रशिक्षण, सीवर में गिरने वाले कचरे की नियमित जांच कि कहीं इसमें कोई रसायन तो नहीं गिर रहे हैं, जैसे निर्देशों का पालन होता कहीं नहीं दिखता।

यह एक शर्मनाक पहलू है कि यह जानते हुए भी कि भीतर जानलेवा गैसें और रसायन हैं, एक इंसान दूसरे इंसान को बगैर किसी बचाव या सुरक्षा-साधनों के भीतर ढकेल देता है । सनद रहे कि महानगरों के सीवरों में महज घरेलू निस्तार ही नहीं होता, उसमें ढेर सारे कारखानों की गंदगी भी होती है। यही नहीं सीवर के काम में लगे लोगों को सामाजिक उपेक्षा का भी सामना करना होता है। दिल्ली में सीवर सफाई में लगे कुछ श्रमिकों के बीच किए गए सर्वे से मालूम चलता है कि उनमें से 49 फीसदी लोग सांस की बीमारियों, खांसी व सीने में दर्द के रोगी हैं। 11 प्रतिशत को डरमैटाइसिस, एक्जिमा और ऐसे ही चर्म रोग हैं। लगातार गंदे पानी में डुबकी लगाने के कारण कान बहने व कान में संक्रमण, आंखों में जलन व कम दिखने की शिकायत करने वालों का संख्या 32 फीसदी थी। भूख न लगना उनका एक आम रोग है।

इतना होने पर भी सीवरकर्मियों को उनके जीवन की जटिलताओं की जानकारी देने के लिए न तो सरकारी स्तर पर कोई प्रयास हुए हैं और न ही किसी स्वयंसेवी संस्था ने इसका बीड़ा उठाया है। आज के अर्थ-प्रधान और मशीनी युग में सफाईकर्मियों के राजनीतिक व सामाजिक मूल्यों के आकलन का नजरिया बदलना जरूरी है। सीवरकर्मियों को देखें तो महसूस होता है कि उनकी असली समस्याओं के बनिस्पत भावनात्मक मुद्दों को अधिक उछाला जाता रहा है। केवल छुआछूत या अत्याचार जैसे विषयों पर टिका चिंतन-मंथन उनकी व्यावहारिक दिक्कतों से बेहद दूर है। सीवर में काम करने वालों को काम के लिए आवश्यक सुरक्षा उपकरण, आर्थिक संबल और स्वास्थ्य की सुरक्षा मिल जाए जो उनके बीच नया विश्वास पैदा किया जा सकता है।

मंगलवार, 18 जुलाई 2017

children-should-have-a-lot-of-books


बच्चों को चाहिए ढेर सारी किताबें

                                                         
पंकज चतुर्वेदी

बाल मन और जिज्ञासा एक-दूसरे के पूरक शब्द ही हैं। वहीं जिज्ञासा का सीधा संबंध कौतुहल से है। उम्र बढ़ने के साथ ही अपने परिवेश की हर गुत्थी को सुलझाने की जुगत लगाना बाल्यावस्था की मूल-प्रवृत्ति है। भौतिक सुखों व बाजारवाद की बेतहाशा दौड़ के बीच दूषित हो रहे सामाजिक परिवेश और बच्चों की नैसर्गिक जिज्ञासु प्रवृत्ति पर बस्ते के बोझ के कारण एक बोझिल-सा माहौल पैदा हो गया है। ऐसे में बच्चों को दुनिया की रोचक जानकारी सही तरीके से देना राहत भरा कदम होता है। पुस्तकें इसका सहज, सर्वसुलभ और सटीक माध्यम हैं। भले ही शहरी बच्चों का एक वर्ग इंटरनेट व अन्य माध्यमों से ज्ञानवान बन रहा है, पर आज भी देश के आम बच्चे को ज्ञान, मनोरंजन, और भावी चुनौतियों का मुकाबला करने के काबिल बनाने के लिए जरूरी पुस्तकों की बेहद कमी है।
आज बच्चे बड़े अवश्य हो रहे हैं, पर अनुभव जगत के नाम पर एक बड़े शून्य के बीच। पूरे देश के बच्चों से जरा चित्र बनाने को कहें। तीन-चौथाई बच्चे पहाड़, नदी, झोपड़ी और उगता सूरज उकेर देंगे। बाकी बच्चे टीवी पर दिखने वाले डिज्नी चैनल के कुछ चरित्रों के चित्र बना देंगे। यह बात साक्षी है कि स्पर्श, ध्वनि, दृष्टि के बुनियादी अनुभवों की कमी, बच्चों की नैसर्गिक क्षमताओं को किस हद तक खोखला बना रही है।

1857 की क्रांति के वक्त अफगानिस्तान से लेकर कन्याकुमारी तक की साक्षरता दर महज एक फीसदी थी। आजादी के समय भी हमारी साक्षरता दर दयनीय ही थी। आज हमारे यहां शिक्षा भी एक क्रांति के रूप में आई है। यह हम सभी मानेंगे कि अब गांव में स्कूल खुलना उतना ही बड़ा विकास का काम माना जाता है, जितना सड़क बनना या अन्य कोई काम। पर बच्चों पर स्कूल में पढ़ाई का बोझ बढ़ता जा रहा है- ऐसी पढ़ाई का बोझ, जिसका बच्चों की जिंदगी, भाषा और संवेदना से कोई सरोकार नहीं है। ऐसी पढ़ाई समाज के क्षय को रोक नहीं सकती, उसे बढ़ावा ही दे सकती है।

भारत में बाल साहित्य की पुस्तकों का इतिहास दो सौ वर्षों का नहीं हुआ है। वैसे 14वीं सदी में अमीर खुसरो ने पहेलियां लिखी थीं, जिनका लक्षित वर्ग बच्चों को माना गया था। 1817 में कोलकाता में कुछ ईसाई मिशनरियों ने बच्चों के लिए पुस्तकों का प्रकाशन शुरू किया था। राजा शिव प्रसाद सिंह सितारे हिंद ने 1867 में बच्चों के लिए कहानियां लिखीं और 1876 में लड़कों के लिए कहानियां नाम से अपने संग्रह प्रकाशित करवाए थे। कहा जा सकता है कि आधुनिक मुद्रण में बच्चों की हिंदी में पहली किताबें वही थीं।

शुरुआती दिनों में हमारा बाल साहित्य पंचतंत्र, हितोपदेष, जातक, पौराणिक व दंतकथाओं तक ही सीमित रहा। कहा गया कि बाजार उभार में है, सो प्रकाशक ऐसा सुरक्षित रास्ता पकड़ना चाहते हैं जहां उन्हें घाटा न लगे। इक्कीसवीं सदी में वैश्वीकरण ने पूरी दुनिया के दरवाजे एक-दूसरे के लिए खोल दिए। टीवी, इंटरनेट क्रांति ने सूचना का प्रवाह इतना तीव्र कर दिया कि भारत जैसे देश की बाल पीढ़ी लड़खड़ा-सी गई, पर उसका एक फायदा बाल पुस्तकों को जरूर हुआ- उसकी विषयवस्तु और गुणवत्ता आदि में सुधार आया।

मगर यह विडंबना है कि हिंदी के बड़े लेखक बच्चों के लिए लिखने से बचते हैं, जबकि मराठी, बांग्ला में ऐसा नहीं है। आज जरूरी है कि बच्चों की पठन अभिरुचि में बदलाव, उनकी अपेक्षाओं, अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य आदि को ध्यान में रखकर आंचलिक क्षेत्रों तक शोध हों, लोगों को अंग्रेजी ही नहीं, भारत की अन्य भाषाओं में बाल साहित्य पर हो रहे काम की जानकारी मिले तथा हिंदी के बड़े लेखक बच्चों के लिए लिखें।

सोमवार, 17 जुलाई 2017

why rivers are flooding

छेड़छाड़ से बिफर रही हैं नदियां

                            पंकज चतुर्वेदी

जो देश अभी एक महीने पहले एक-एक बूंद पानी के लिए तरस रहा था, बादल क्या बरसे, आधे से ज्यादा इलाका बाढ़ की चपेट में आ गया। असम जैसे राज्य में साठ से ज्यादा मौत हो चुकी हैं व 25 जिले पूरीत रह जलमग्न है।। असम, बिहार, पूर्वी उ.्रप तो हर साल बारिश में हलकान रहता है,लेकिन इस बार तो गुजरात का सौराश्ट्र और राजस्थान के शेखावटी के रेतीले इलाके भी जलमग्न हैं। पिछले कुछ सालों के आंकड़ें देखें तो पायेंगे कि बारिश की मात्रा भले ही कम हुई है, लेकिन बाढ़ से तबाह हुए इलाके में कई गुना बढ़ौतरी हुई है । कुछ दशकों पहले जिन इलाकों को बाढ़ से मुक्त क्षेत्र माना जाता था, अब वहां की नदियां भी उफन रही हैं और मौसम बीतते ही, उन इलाकों में एक बार फिर पानी का संकट छा जाता है । गंभीरता से देखें तो यह छोटी नदियों के लुप्त होने, बड़ी नदियों पर बांध और मध्यम नदियों के उथले होने का दुष्परिणाम है। बाढ़ अकेले कुछ दिनों की तबाही ही नहीं लाती है, बल्कि वह उस इलाके के विकस को सालेां पीछे ले जाती है ।

सरकारी आंकड़े बताते हैं कि 1951 में बाढ़ ग्रस्त भूमि की माप एक करोड़ हेक्टेयर थी । 1960 में यह बढ़ कर ढ़ाई करोड़ हेक्टेयर हो गई । 1978 में बाढ़ से तबाह जमीन 3.4 करोड़ हेक्टेयर थी और 1980 में यह आंकड़ा चार करोड़ पर पहुंच गया । अभी यह तबाही कोई सात करोड़ हेक्टेयर होने की आशंका है । पिछले साल आई बाढ़ से साढ़े नौ सौ से अधिक लोगों के मरने, तीन लाख मकान ढ़हने और चार लाख हेक्टेयर में खड़ी फसल बह जाने की जानकारी सरकारी सूत्र देते हैं । यह जान कर आश्चर्य होगा कि सूखे और मरुस्थल के लिए कुख्यात राजस्थान भी नदियों के गुस्से से अछूता नहीं रह पाता है ।ं देश में बाढ़ की पहली दस्तक असम में होती है । असम का जीवन कहे जाने वाली ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियां मई-जून के मध्य में ही विनाश फैलाने लगती हैं । हर साल लाखों बाढ़ पीड़ित शरणार्थी इधर-उधर भागते है । बाढ़ से उजड़े लोगों को पुनर्वास के नाम पर एक बार फिर वहीं बसा दिया जाता है, जहां छह महीने बाद जल प्लावन होना तय ही होता है । यहां के प्राकृतिक पहाडों की बेतरतीब खुदाई कर हुआ अनियोजित शहरीकरण और सड़कों का निर्माण भी इस राज्य में बाढ़ की बढ़ती तबाही के लिए काफी हद तक दोषी है । सनद रहे वृक्षहीन धरती पर बारिश का पानी सीधा गिरता है और भूमि पर मिट्टी की उपरी परत, गहराई तक छेदता है । यह मिट्टी बह कर नदी-नालों को उथला बना देती है, और थोड़ी ही बारिश में ये उफन जाते हैं । हाल ही में दिल्ली में एनजीटी ने मेट्रो कारपोरेशन को चताया है कि वह यमुना के किनारे  जमा किए गए हजारों ट्रक मलवे को हटवाए। यह पूरे देश में हो रहा है कि विकास कार्याें के दौरान निकली मिट्टी व मलवे को स्थानीय नदी-नालों में चुपके से डाल दिया जा रहा है। और तभी थोड़ी सी बारिश में ही  इन जल निधियों का प्रवाह कम हो जाता है व पानी बस्ती,खेत, ंजगलों में घुसने लगता है।

   देश के कुल बाढ़ प्रभवित क्षेत्र का 16 फीसदी बिहार में है । यहां कोशी, गंड़क, बूढ़ी गंड़क, बाधमती, कमला, महानंदा, गंगा आदि नदियां तबाही लाती हैं । इन नदियों पर तटबंध बनाने का काम केन्दª सरकार से पर्याप्त सहायता नहीं मिलने के कारण अधूरा हैं । यहां बाढ़ का मुख्य कारण नेपाल में हिमालय से निकलने वाली नदियां हैं । ‘‘बिहार का शोक’’ कहे जाने वाली कोशी के उपरी भाग पर कोई 70 किलोमीटर लंबाई का तटबंध नेपाल में है । लेकिन इसके रखरखाव और सुरक्षा पर सालाना खर्च होने वाला कोई 20 करोड़ रूपया बिहार सरकार को झेलना पड़ता है । हालांकि तटबंध भी बाढ़ से निबटने में सफल रहे नहीं हैं । कोशी के तटबंधों के कारण उसके तट पर बसे 400 गांव डूब में आ गए हैं । कोशी की सहयोगी कमला-बलान नदी के तटबंध का तल सील्ट (गाद) के भराव से उंचा हो जाने के कारण बाढ़ की तबाही अब पहले से भी अधिक होती हैं । फरक्का बराज की दोषपूर्ण संरचना के कारण भागलपुर, नौगछिया, कटिहार, मंुगेर, पूर्णिया, सहरसा आदि में बाढ़ ग्रस्त क्षेत्र बढ़ता जा रहा है । विदित हो आजादी से पहले अंग्रेज सरकार व्दारा बाढ़ नियंत्रण में बड़े बांध या तटबंधों को तकनीकी दृष्टि से उचित नहीं माना था । तत्कालीन गवर्नर हेल्ट की अध्यक्षता में पटना में हुए एक सम्मेलन में डा. राजेन्दªप्रसाद सहित कई विद्वानों ने बाढ़ के विकल्प के रूप में तटबंधों की उपयोगिता को नकारा था । इसके बावजूद आजादी के बाद हर छोटी-बड़ी नदी को बांधने का काम अनवरत जारी है ।
    बगैर सोचे समझे नदी-नालों पर बंधान बनाने के कुप्रभावों के कई उदाहरण पूरे देश में देखने को मिल रहे हैं। वैसे शहरीकरण, वन विनाश और खनन तीन ऐसे प्रमुख कारण हैं, जो बाढ़ विभीषिका में उत्प्रेरक का कार्य कर रहे है । जब प्राकृतिक हरियाली उजाड़ कर कंक्रीट जंगल सजाया जाता है तो जमीन की जल सोखने की क्षमता तो कम होती ही है, साथ ही सतही जल की बहाव क्षमता भी कई गुना बढ़ जाती है । फिर शहरीकरण के कूड़े ने समस्या को बढ़ाया है । यह कूड़ा नालों से होते हुए नदियों में पहुंचता है । फलस्वरूप नदी की जल ग्रहण क्षमता कम होती है ।
   पंजाब और हरियाणा में बाढ़ का कारण जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश में हो रहा जमीन का अनियंत्रित शहरीकरण ही है । इससे वहां भूस्खलन की घटनाएं बढ़ रही हैं और इसका मलवा भी नदियों में ही जाता है । पहाड़ों पर खनन से दोहरा नुकसान है । इससे वहां की हरियाली उजड़ती है और फिर खदानों से निकली धूल और मलवा नदी नालों में अवरोध पैदा करता है । हिमालय से निकलने वाली नदियों के मामले में तो मामला और भी गंभीर हो जाता है । सनद रहे हिमालय, पृथ्वी का सबसे कम उम्र का पहाड़ है । इसकी विकास प्रक्रिया सतत जारी है, तभी इसे ‘‘जीवित-पहाड़’’ भी कहा जाता है । इसकी नवोदित हालत के कारण यहां का बड़ा भाग कठोर-चट्टानें ना हो कर, कोमल मिट्टी है । बारिश या बरफ के पिघलने पर, जब पानी नीचे की ओर बहता है तो साथ में पर्वतीय मिट्टी भी बहा कर लाता है । पर्वतीय नदियों में आई बाढ़ के कारण यह मिट्टी नदी के तटों पर फैल जाती है । इन नदियों का पानी जिस तेजी से चढ़ता है, उसी तेजी से उतर जाता है । इस मिट्टी के कारण नदियों के तट बेहद उपजाऊ हुआ करते हैं । लेकिन अब इन नदियों को जगह-जगह बांधा जा रहा है, सो बेेशकीमती मिट्टी अब बांध्बांधंांेे में ही रुक जाती है और नदियों को उथला बनाती रहती है । साथ ही पहाड़ी नदियों में पानी चढ़ तो जल्दी जाता है, पर उतरता बड़े धीरे-धीरे है ।
  मौजूदा हालात में बाढ़ महज एक प्राकृतिक प्रकोप नहीं, बल्कि मानवजन्य साधनों का त्रासदी है । हकीकत में नदियों के प्राकृतिक बहाव, तरीकों, विभिन्न नदियों के उंचाई-स्तर में अंतर जैसे विशयों का हमारे यहां कभी निश्पक्ष अध्ययन ही नहीं किया गया और इसी का फायदा उठा कर कतिपय ठेकेदार, सीमेंट के कारोबारी और जमीन-लोलुप लोग इस तरह की सलाह देते हैं। पानी को स्थानीय स्तर पर रोकना, नदियों को उथला होने से बचाना, बड़े बांध पर पाबंदी , नदियों के करीबी पहाड़ों पर खुदाई पर रोक और नदियों के प्राकृतिक मार्ग से छेउ़छाड़ को रोकना कुछ ऐसे सामान्य प्रयोग हैं, जोकि बाढ़ सरीखी भीशण विभीशिका का मुंह-तोड़ जवाब हो सकते हैं।
पंकज चतुर्वेदी
फ्लेट यूजी-1, 3/186 राजेन्द्र नगर सेक्टर-2
साहिबाबाद, गाजियाबाद
201005
संपर्क: 9891928376, 011- 26707758(आफिस),



गुरुवार, 13 जुलाई 2017

Kawadiya shoud respect public too

आस्था के साथ सामाजिक सरोकार भी

कांवड़ यात्रा
पंकज चतुर्वेदी

 

 

देहरादून से लेकर दिल्ली और फरीदाबाद से करनाल तक के तीन राज्यों के कोई 70 जिले आगामी 21 जुलाई तक कांवड़ यात्रा को लेकर चिंतित हैं। इस बार अनुमान है कि कोई चार करोड़ कांवड़िये गंगा जल लेने हरिद्वार पहुंच रहे हैं। हाल ही में अमरनाथ यात्रियों पर हमले तथा कश्मीर में सक्रिय आतंकवादियों में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के संदीप शर्मा के शामिल होने से सुरक्षा एजेंसियां भी चिंतित हैं।
श्रावण के महीने में हरिद्वार, देवघर (झारखंड), काशी जैसे प्रसिद्ध शिवालयों से पैदल कांवड़ में जल लेकर शिवालयों तक आने की परंपरा सैकड़ों साल पुरानी है। अभी कुछ साल पहले तक ये कांवड़िये अनुशासन व श्रद्धा में इस तरह डूबे रहते थे कि राह चलते लोग स्वयं ही उनको रास्ता दे दिया करते थे। लेकिन राजनीति में धर्म के घालमेल का असर बीते एक दशक के दौरान कांवड़ यात्रा पर दिखने लगा। पहले संख्या में बढ़ोतरी हुई, फिर उनकी सेवा के नाम पर लगने वाले टेंटों-शिविरों की संख्या बढ़ी। गौरतलब है कि ‘भोलोंÓÓ की सेवा’ÓÓ के सर्वाधिक शिविर दिल्ली में लगते हैं, जबकि कांवड़ियों में दिल्ली वालों की संख्या बामुश्किल 10 फीसदी होती है।
पिछले साल अकेले गाजियाबाद जिले में कांवडि़यों द्वारा रास्ता बंद करने, मारपीट करने, वाहनों को तोड़ने की पचास से ज्यादा घटनाएं हुई थीं। हरिद्वार में तो कुछ विदेशी महिलाओं ने पुलिस में रपट की थी कि उनसे छेड़छाड़ हुई है। बीते एक दशक के दौरान देखा गया है कि कांवड़ यात्रा के दस दिनों में दिल्ली से लेकर हरियाणा-राजस्थान व उधर हरिद्वार को जाने वाली सड़कों पर अराजक कब्जा हो जाता है। इस बार मामला बेहद संवेदनशील है क्योंकि खुफिया एजेंसियां आतंकवादी हमले की आशंका जता रही हैं।
इस बार भी डाक कांवड़ पर पाबंदी, डीजे बजाने पर रोक जैसे जुमले उछाले जा रहे हैं, लेकिन यह तय है कि इनका पालन होना मुश्किल ही होता है। बड़े-बड़े वाहनों पर पूरी सड़क घेर कर, उद्दंडों की तरह डंडा-लाठी-बेसबाल के बल्ले लहराते हुए, श्रद्धा से ज्यादा बेलगाम युवा सड़कों पर आ जाते हैं। कांवड़ यात्रा शुरू होते ही हिंसक घटनाओं की खबरें आती हैं। अधिकांश मामलों में कारण किसी कांवड़िये का जल सड़क पर चल रहे अन्य वाहन से टकरा कर छलकने या सड़क दुर्घटना आदि होता है।

यह जानना जरूरी है कि इनके कारण राष्ट्रीय राजमार्ग पर एक सप्ताह तक पूरी तरह चक्का जाम रहना देश के लिए अरबों रुपए का नुकसान करता है। इस रास्ते में पड़ने वाले 74 कस्बों, शहरों का जनजीवन भी थम जाता है। स्कूलों की छुट्टी करनी पड़ती है और सरकारी दफ्तरों में कामकाज लगभग ना के बराबर होता है। गाजियाबाद में तो लोगों का घर से निकलना दुश्वार हो जाता है। शहर में फल, सब्जी, दूध की आपूर्ति बुरी तरह प्रभावित होती है। आम जनता आस्था के नाम पर यह सब भी सहर्ष सह लेती है लेकिन असल दिक्कत होती है अराजकता से।
राजधानी की विभिन्न संस्थाओं में काम करने वाले कोई सात लाख लोग जीटी रोड के दोनों तरफ बसी गाजियाबाद जिले की विभिन्न कॉलोनियों में रहते हैं। इन सभी लोगों के लिए इन दिनों में कार्यालय जाना त्रासदी से कम नहीं होता। गाजियाबाद-दिल्ली सीमा पर अप्सरा बार्डर पूरी तरह कांवड़ियों की मनमानी की गिरफ्त में रहता है, जबकि इस रास्ते से गुरु तेग बहादुर अस्पताल जाने वाले गंभीर रोगियों की संख्या प्रतिदिन हजारों में होती है।

धर्म, आस्था, पर्व, संकल्प, व्रत, ये सभी भारतीय संस्कृति व लोकजीवन के अभिन्न अंग हैं लेकिन जब यह लोकजीवन के लिए ही अहितकर और धर्म के लिए अरुचिकर हो जाए तो इसकी प्रक्रिया पर विचार करना अत्यावश्यक है। धर्म दूसरों के प्रति संवेदनशील हो, धर्म का पालन करने वाला स्वयं को तकलीफ देकर जन कल्याण की सोचे; यह हिंदू धर्म की मूल भावना है।
जिस तरह कांवड़ियों की संख्या बढ़ रही है, उसको देखते हुए कांवड़ियों का पंजीयन, उनके मार्ग पर पैदल चलने लायक पतली पगडंडी बनाना, महानगरों में कार्यालय व स्कूल के समय में कांवड़ियों के आवागमन पर रोक, कांवड़ लाने की मूल धार्मिक प्रक्रिया का प्रचार-प्रसार, सड़क घेर कर शिविर लगाने पर पाबंदी जैसे कदम लागू करना जरूरी है।
असल में कांवड़ यात्रा अब एक बड़ा व्यवसाय बन गई है। करोड़ों लोगों के लिए टीशर्ट, नेकर, कांवड़, लोटे, सजावटी सामान से लेकर कई वस्तुओं का अपना बाजार है। जरूरत इस बात की है कि प्रशासन खुद के निर्देशों का कड़ाई से पालन करे। साधु-संत भी कांवड़ यात्रा के सात्विक तरीकों के प्रति लोगों को प्रेरित करें।

The right to a dignified farewell and a new standard in medical world

  गरिमापूर्ण विदाई का अधिकार और चिकित्सा की नई मर्यादा पंकज चतुर्वेदी लगभग  12 साल असीम और अव्यक्त पीड़ा के साथ  जीवन जी रहे हरीश राणा अं...