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मंगलवार, 7 अगस्त 2018

India unsafe for girl child

  • इस तरह कैसे बचेंगी बेटियां?

    पंकज चतुर्वेदी


    rashtriy sahara 8-8-18
    पहले मुजफ्फरपुर और अब देवरिया, समाज की उपेक्षित बच्चियों को जहां निरापद आसरे की उम्मीद थी, वहीं उनकी देह नोची जा रही थी।कुछ साल पहले ऐसा एक नृशंस प्रकरण कांकेर में भी सामने आया था। ये वाकिये विचार करने पर मजबूर करते हैं कि क्या वास्तव में हमारे देश में छोटी बच्चियों को आस्था के चलते पूजा जाता रहा है, या फिर हमारे आदि समाज ने बच्चियों को हमारी मूल पाशविक प्रवृत्ति से बचा कर रखने के लिए परंपरा बना दी थी।सवाल है कि हमारे देश में छोटी बच्चियों को आस्था के चलते पूजा जाता रहा है या फिर हमारी मूल पाषविक प्रवृति से उन्हें बचाकर रखने के लिए यह परंपरा बनायी गयी थी?
    भारत सरकार के राष्ट्रीय अपराध अनुसंधान ब्यूरो के आंकड़े गवाह हैं कि देश में हर साल औसतन 90 हजार बच्चों के गुमने की रपट थानों तक पहुंचती है जिनमें से 30 हजार से ज्यादा का पता नहीं लग पाता। हाल ही में संसद में पेश एक आंकड़े के मुताबिक सिर्फ 2011-14 के बीच सवा तीन लाख बच्चे लापता हो गये थे। जब भी बच्चों के गुम होने के तथ्य आते हैं, तो सरकार समस्या के समाधान के लिए नए उपाय करने की बातों से आगे कुछ नहीं कर पाती।
    independent mail. bhopal 

     संयुक्त राष्ट्र की एक रपट कहती है कि भारत में हर साल 24,500 बच्चे गुम हो जाते हैं। सबसे ज्यादा बच्चे महाराष्ट्र में गुमते है। यहां 2011-14 के बीच 50,947 बच्चों के नदारद हो जाने की खबर पुलिस थानों तक पहुंची थी। मध्य प्रदेश से 24,836, दिल्ली से 19,948 और आंध्र प्रदेश से 18,540 बच्चे लापता हुए थे। विडंबना है कि गुम हुए बच्चों में बेटियों की संख्या सबसे ज्यादा होती है। सन् 2011 में गुम हुए कुल 90,654 बच्चों में से 53,683 लडकियां थीं। सन् 2012 में कुल गुमशुदा 65,038 में से 39,336 बच्चियां थीं, 2013 में कुल 1,35,262 में से 68,869 और सन् 2014 में कुल 36,704 में से 17,944 बच्चियां थीं। यह बात भी सरकारी रिकार्ड में दर्ज है कि भारत में कोई 900 संगठित गिरोह हैं जिनके सदस्यों की संख्या पांच हजार के आसपास है। लापता बच्चों से संबंधित आंकड़ों की एक हकीकत यह भी है कि राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो सिर्फ अपहरण किये गये बच्चों की गिनती बताता है। केंद्रीय समाज कल्याण बोर्ड ने कुछ साल पहले एक सर्वेक्षण करवाया था जिसमें बताया गया था कि देश में लगभग एक लाख वैश्याएं हैं जिनमें से 15 प्रतिशत 15 साल से भी कम उम्र की हैं। असल में देश में पारंपरिक रूप से कम उम्र की कोई 10 लाख बच्चियां देह व्यापार के नरक में हैं।

    यह बात सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज है कि भारत में कोई 900 संगठित गिरोह हैं, जिनके सदस्यों की संख्या पांच हजार के आसपास है। अभी कुछ साल पहले ही दिल्ली पुलिस ने राजधानी से लापता बच्च्यिों की तलाश में एक ऐसे गिरोह को पकड़ा था जो बहुत छोटी बच्चियों को उठाता था, फिर उन्हें राजस्थान में वैश्यावृति के लिए बदनाम एक जाति को बेचा जाता था। अलवर जिले के दो गांवों में पुलिस के छापे से पता चला था कि कम उम्र की बच्चियों का अपरहण किया जाता है। फिर उन्हें इन गांवों में ले जा कर खिलाया-पिलाया जाता है। गाय-भैंस से ज्यादा दूध लेने के लिए लगाये जाने वाले हार्मोन के इंजेक्शन 'आॅक्सीटासीन' देकर छह-सात साल की उम्र की इन लड़कियों को कुछ ही दिनों में 14-15 साल की किशोरी बना दिया जाता और फिर उनसे देह व्यापार कराया जाता। ऐसा नहीं है कि दिल्ली पुलिस के इस खुलासे के बाद यह घिनौना धंधा रुक गया है। अलवर, मेरठ, आगरा, मंदसौर सहित कई जिलों के कई गांव इस पैशाचिक कृत्य के लिए ही जाने जाते हैं। पुलिस छापे मारती है, बच्चियों को महिला सुधार गृह भेज दिया जाता है, फिर दलाल लोग ही बच्चियों के परिवारजन बन कर उन्हें महिला सुधार गृह से छुड़वाते हैं और उन्हें बेच देते हैं। बच्चियों की खरीद-फरोख्त करने वाले दलाल स्वीकार करते हैं कि एक नाबालिग बच्ची को धंधे वालोें तक पहुंचाने के लिए उन्हें चैगुना दाम मिलता है। वहीं कम उम्र की बच्ची के लिए ग्राहक भी ज्यादा दाम देते हैं। तभी दिल्ली व कई बड़े शहरों में हर साल कई छोटी बच्चियां गुम हो जाती हैं और पुलिस कभी उनका पता नहीं लगा पाती। इस बात को लेकर सरकार बहुत कम गंभीर है कि भारत, बांग्लादेश और नेपाल जैसे पड़ोसी देशाें की गरीब बच्चियों के लिए अतंरराष्ट्रीय बाजार बन गया है।
     भले ही मुफलिसी को बाल वैश्यावृति का प्रमुख कारण माना जाए लेकिन इसके और भी कई कारण हैं जो समाज में मौजूद विकृृत मन की सूचना देते हैं। एक तो एड्स के भूत ने दुराचारियों को भयभीत कर दिया है, सो वे छोटी बच्चियों की मांग ज्यादा करते हैं, फिर कुछ हकीमों ने भी फैला रखा है कि संक्रमण ठीक करने के लिए कम उम्र की बच्ची से संबंध बनाना कारगर उपाय है। इसके अलावा देश में कई लोग इन मासूमों का इस्तेमाल पोर्न वीडियो बनाने में कर रहे हैं। अरब देशों में भारत की गरीब मुस्लिम लड़कियों को बाकायदा निकाह करवा कर सप्लाई किया जाता है। ताईवान, थाईलैंड जैसे देह-व्यापार के अड्डों की सप्लाई-लाइन भी भारत बन रहा है। यह बात समय-समय पर सामने आती रहती है कि गोवा, पुष्कर जैसे अंतरराष्ट्रीय पर्यटक केंद्र बच्चियों की खपत के बड़े केंद्र हैं।
    कहने को तो सरकारी रिकार्ड में कई बड़े-बड़े दावे हैं: जैसे कि सन 1974 में देश की संसद ने बच्चों के संदर्भ में एक राष्ट्रीय नीति पर मुहर लगायी थी जिसमें बच्चों को देश की अमूल्य धरोहर घोषित किया गया था। भारतीय दंड संहिता की धारा 372 में नाबालिग बच्चों की खरीद-फरोख्त करने पर 10 साल की सजा का प्रवधान है लेकिन इस धारा में अपराध को सिद्ध करना बेहद कठिन है, क्योंकि अभी हमारा समाज बाल-वैश्यावृति जैसे कलंक से निकली किसी भी बच्ची के पुनर्वास के लिए सहजता से राजी नहीं होता। इस फिसलन में जाने के बाद खुद परिवार वाले बच्ची को अपनाने को तैयार नहीं होते।
     संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार समझौते की धारा 34 में उल्लेख है कि बच्चों को सभी प्रकार के उत्पीड़न से निरापद रखने की जिम्मेदारी सरकार की है। कहने को तो देश का संविधान बिना किसी भेदभाव के बच्चों की देखभाल, विकास और अब तो शिक्षा की भी गारंटी देता है लेकिन इसे नारे से आगे बढ़ाने के लिए न तो इच्छा-शक्ति है और न ही धन। कहने को कई आयोग बने हुए हैं लेकिन वे विभिन्न सियासती दलों के लोगों को पद-सुविधा देने से आगे काम नहीं कर पाते। आज बच्चियों को केवल जीवित रखना ही नहीं बल्कि उन्हें इस तरह की त्रासदियों से बचाना भी जरूरी है और इसके लिए सरकार की सक्रियता, समाज की जागरूकता और हमारी सोच में बदलाव जरूरी है।

    बुधवार, 1 अगस्त 2018

    It is not only death due to hunger

    यह अकेले भूख से मौत नहीं है। 

    पंकज चतुर्वेदी


    मुजफ्फरपुर, फिर एनआरसी और कांवड़िये--- ऐसे ही नए मुद्दे क्या खड़े हुए कि समाज भूल गया कि दिल्ली में संसद से बामुश्किल 12 किलोमीटर दूर गगनचुंबी इमारातों के बीच बसे मंडावली गांव में तीन मासूम बच्चियों की मौत भूख से हुई थी। तभी ,खबर आई कि दिल्ली से सटे साहिबाबाद में एक बच्ची भूख ना सहन कर पाने के कारण मर गई। जिला अस्पताल मानता है कि मरने वाली बच्ची व उसकी तीन बहनें कुपोषण की शिकार हैं। शायद मरने वाली बच्ची का बगैर पोस्टमार्टम के आनन फानन में अंतिम संस्कार भी इस लिए कर दिया गया कि कहीं इस पर सियासत ना हो। हालांकि दिल्ली की घटना बानगी है कि उस परिवार मरने पर सियासत से ज्यादा कुछ होता नहीं है। कोई इसमें राज्य सरकार की कमी खोज रहा है तो कहीं मानवीय संवेदना के शून्य होने की बात है। सभी गेंद को दूसरे के पाले में फैंक कर खुद को कर्मठ, ईमानदार बता रहे हैं। मसला दिल्ली का हो या साहिबाबाद या फिर झारखंड या छत्तीसगढ़ का ,असल में पेट की आंच में झुलस कर असामयिक काल के गाल में समाने वाले महज भूख से ही नहीं मरते, उनकी मौत के कई कारण होते हैं- जिसमें अज्ञानता, स्वास्थ्य सेवा, परिवार नियोजन, रोजगार जैसे मसले शामिल हैं।

    जब कभी भूख से मौत की खबर आती है तो कोई समाज की निष्ठुरता को कोसता है तो कोई सरकार की कार्यप्रणाली को आड़े हाथों लेता है, असलियत यह है कि हमारे यहां भोज्य पदार्थों का प्रबंधन नाम की कोई व्यवस्था नहीं है। भोजन में असमानता ही भूख से मौतों के मूल में है। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य व कृषि संगठन की एक रपट के मुताबिक भारत में 19.4 करोड़ लोग भूखे सोते हैं , हालांकि सरकार के प्रयासों से पहले से ऐसे लोगों की संख्या कम हुई है। भूख, गरीबी, कुपोषण व उससे उपजने वाली स्वास्थ्य, शिक्षा, मानव संसाधन प्रबंधन की दिक्क्तें देश के विकास में सबसे बड़ी बाधक हैं। हमारे यहां ना तो अन्न की कमी है और ना ही रोजगार के लिए श्रम की। कागजों पर योजनाएं भी हैं, नहीं हैं तो उन योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए जिम्म्ेदार स्थानीय स्तर की मशीनरी में जिम्मेदारी व संवेदना की।
    मंडावली और साहिबाबाद में मरीं बच्चियों की यदि पोस्टमार्टम रिपोर्ट पर गौर करें तो पता चलेगा कि उनके शरीर में वसा तो था ही नहीं, यानि वे लंबे समय से कुपोषण की शिकार थीं। यह मौत केवल दो या तीन दिन की भूख की  नहीं थी। वे लगभग जन्म से ही प्रोटिन, वसा, कार्बोहाईड्रट जैसे भोजन से वंचित थीं। उनके शरीर में खून की मात्रा भी बेहद कम थी। दिल्ली में मरी तीनों बच्चों की मां मानसिक रूप से कमजोर है। वहीं साहिबाबाद वाली महिला का पति किसी ढाबे पर तंदूर की रोटी बनाता है लेकिन अपनी सारी कमई शराब में उड़ा देता है। मांत्र शाहदरा में भीख मांग कर गुजारा कतर है। सोचने वाली बात है कि  एक मानसिक बीमार औरत और दूसरी भीख मांगने वाली महिला ; को दो-दो साल के अंतर में मां बनने पर मजबूर करने वाले पति के पास जागरूकता, परिवार नियोजन जैसे बड़े-बड़े दावे पहुंचे ही नहीं।

    दिल्ली वाले मामले में भूख, जागरूकता के अभाव और सरकारी योजनाओं की आंच उस इंसान तक नहीं पहुचने का सबसे बड़ा कारण है बच्चियों के पिता की बेराजगारी। वह पश्चिम बंगाल से दिल्ली काम की तलाश में आया और यहां रिक्शचलाता रहा। रिक्शा चेारी हो गया तो रेाजगार का संकट खउ़ा हो गया। बंगाल से दिल्ली हजारों किलोमीटर दूर कोई रिक्शा चलाने आ रहा है तो जाहिर है कि उसे अपने मूल निवास में पेट भरने के लाले पड़े हुए थे और मजबूरी में किया गया पलायन उसके परिवार के अस्तित्व पर संकट का आधार बना। एक बात और, डाक्टर का यह भी कहना है कि तीन बच्चियों की मां के मानसिक रूप से कमजोर होने का मूल कारण भी उसक कुपोषण ही है। जाहिर है कि कुपोषण से लड़ने के बड़े-बड़े इश्तेहार, गरीब लोगों को बीमारी के इलाज के रंगीन दावे और रोजगार मुहैया करवाने वाली खरबों की येाजनाएं उसके असली हितग्राहियों से बहुत दूर हैं। हर बच्चे को स्कूल और स्कूल में मिडडे मील के सुनहरे दावे जब दिल्ली में इस तरह औंधे मूंह गिरते दिख रहे हैं तो दूरस्थ अंचल में इनकी कितनी भयावह हालत होगी।
    समूचा सिस्टम इस बात के लिए भी कटघरे में खड़ा है कि रिक्शा खींचने, ढाबे पर जूठे बरतन मांजने , निर्माण कार्य में मजदूरी करने जैसे कार्य, जिसमें रोज कुंआ खोद कर प्यास बुझाने की मजबूरी होती है ,उन्हें रोजगार या उनके परिवार के भरण-पोषण व स्वास्थ्य की सुनिश्चितता की कौनसी योजना जमीनी स्तर पर काम कर रही है। यदि नहीं तो क्या ऐसे लोगों को हम रोजगार प्राप्त की सूची में गिन सकते हैं?  जिस देष  में नए खरीदे गए अनाज को रख्,ाने के लिए गोदामों में जगह नहीं है, जहां सामाजिक जलसों में परोसा जाने वाला आधे से ज्यादा भोजन कूड़ा-घर का पेट भरता है, वहां ऐसे भी लोग हैं जो अन्न के एक दाने के अभाव में दम तोड़ देते है। महाराश्ट्र में अरबपति षिरडी मंदिर के पास ही मेलघाट में हर साल हजारों बच्चों की कुपोश्ण से मौत की खबर या फिर राजस्थान के बारां जिले में सहरिया आदिवासियों की बस्ती में पैदा होने वाले कुल बच्चें के अस्सी फीसदी के उचित खुराक ना मिल पाने के कारण छोटे में ही मर जाने के वाकिये.... यह इस देष में हर रोज हो रहा है, लेकिन विज्ञापन में मुस्कुराते चैहरों, दमकती सुविधाओं के फेर में वास्तविकता से परे उन्मादित भारतवासी तक ऐसी खबरें या तो पहुंच नहीं रही हैं या उनकी संवेदनाओं को झकझोर नहीं रही हैं। ये अकेले भाजन की कमी का मसला नहीं है, इसके पीछे कई-कई महकमों की कार्य प्रणाली सवालों के घेरे में है।
    भूख से मौत वह भी उस देष में जहां खाद्य और पोशण सुरक्षा की कई योजनाएं अरबों रूपए की सबसिडी पर चल रही हैं, जहां मध्यान्य भोजन योजना के तहत हर दिन 12 करोड़ बच्चें को दिन का भरपेट भोजन देने का दावा हो, जहां हर हाथ को काम व हर पेट को भोजन के नाम पर हर दिन करोड़ों का सरकारी फंड खर्च होता हो; दर्षाता है कि योजनाओं व हितग्राहियों के बीच अभी भी पर्याप्त दूरी है। वैसे भारत में हर साल पांच साल से कम उम्र के 10 लाख बच्चों के भूख या कुपोशण से मरने के आंकड़े संयुक्त राश्ट्र संगठन ने जारी किए हैं। ऐसे में नवरात्रि पर गुजरात के गांधीनगर जिले के एक गांव में माता की पूजा के नाम पर 16 करोड़ रूपए दाम के साढ़े पांच लाख किलो षुद्ध घी को सड़क पर बहाने, मध्यप्रदेष में एक राजनीतिक दल के महासम्मेलन के बाद नगर निगम के सात ट्रकों में भर कर पूड़ी व सब्जी कूड़ेदान में फैंकने की घटनाएं बेहद दुभाग्यपूर्ण व षर्मनाक प्रतीत होती हैं।
    हर दिन कई लाख लोगों के भूखे पेट सोने के गैर सरकारी आंकड़ो वाले भारत देष के ये आंकड़े भी विचारणीय हैं। देष में हर साल उतना गेहूं बर्बाद होता है, जितना आस्ट्रेलिया की कुल पैदावार है। नश्ट हुए गेहूं की कीमत लगभग 50 हजार करोड़ होती है और इससे 30 करोड़ लोगों को सालभर भरपेट खाना दिया जा सकता है। हमारा 2.1 करोड़ टन अनाज केवल इस लिए बेकाम हो जात है, क्योंकि उसे रखने के लिए हमारे पास माकूल भंडारण की सुविधा नहीं है। देष के कुल उत्पादित सब्जी, फल, का 40 फीसदी प्रषीतक व समय पर मंडी तक नहीं पहुंच पाने के कारण सड़-गल जाता है। औसतन हर भारतीय एक साल में छह से 11 किलो अन्न बर्बाद करता है।  जितना अन्न हम एक साल में बर्बाद करते हैं उसकी कीमत से ही कई सौ कोल्ड स्टोरेज बनाए जा सकते हैं जो फल-सब्जी को सड़ने से बचा सके। एक साल में जितना सरकारी खरीदी का धान व गेहूं खुले में पड़े होने के कारण मिट्टी हो जाता है, उससे ग्रामीण अंचलों में पांच हजार वेयर हाउस बनाए जा सकते हैं। यह आंकड़ा किसी से दबा-छुपा नहीं है, बस जरूरत है तो एक प्रयास करने की। यदि पंचायत स्तर पर ही एक कुंटल अनाज का आकस्मिक भंडारण व उसे जरूरतमंद को देने की नीति का पालन हो तो कम से कम कोई भूखा तो नहीं मरेगा। बुंदेलखंड के पिछड़े जिले महोबा के कुछ लेागों ने ‘‘रोटी बैंक’’ बनाया है।  बैंक से जुड़े लेाग भेाजन के समय घरों से ताजा बनी रोटिया एकत्र करते हैं और उन्हें अच्छे तरीके से पैक कर भूखें तक पहुंचाते हैं। बगैर किसी सरकारी सहायता के चल रहे इस अनुकरणीयप्रयास से हर दिन 400 लेागों को भोजन मिल रहा है। बैंक वाले बासी या ठंडी रोटी लेते  नहीं है ताकि खाने वाले का आत्मसम्मान भी जिंदा रहे। यह बानगी है कि यदि इच्छा शक्ति हो तो छोटे से प्रयास भी भूख पर भाारी पड़ सकते हैं।
    विकास,विज्ञान, संचार व तकनीक में हर दिन कामयाबी की नई छूने वाले मुल्क में इस तरह बेरोजगारी व खाना ना मिलने से होने वाली मौतें मानवता व हमारे ज्ञान के लिए भी कलंक हैं। हर जरूरतमंद को अन्न पहुंचे इसके लिए सरकारी योजनाओं को तो थोडा़ा चुस्त-दुरूस्त होना होगा, समाज को भी थोड़ा संवेदनषील बनना होगा। हो सकता है कि हम इसके लिए पाकिस्तन से कुछ सीख लें जहां षादी व सार्वजनिक समारोह में पकवान की संख्या, मेहमानों की संख्या तथा खाने की बर्बादी पर सीधे गिरफ्तारी का कानून है। जबकि हमारे यहां होने वाले षादी समारोह में आमतौर पर 30 प्रतिषत खाना बेकार जाता है। गांव स्तर पर अन्न बैंक, प्रत्येक गरीब, बेरोजगार के आंकड़े रखना जैसे कार्य में सरकार से ज्यादा समाज को अग्रणी भूमिका निभानी होगी। बहरहाल हमें एकमत से स्वीकार करना होगा कि दिल्ली में तीन बच्चों की ऐसी मौत हम सभी के लिए षर्म की बात है। यह विडंबना है कि मानवता पर इतना बड़ा धब्बा लगा और उस इलाके के एक कर्मचारी या अफसर को सरकार ने दोशी नहीं पाया, जबकि ये अफसरान इलाके की हर उपलब्धि को अपनी बताने से अघाते नहीं हैं।

    Mobile use in school should be ban


    आखिर क्यों न लगे भारत में भरी स्कूलों में मोबाईल फोन पर रोक

    पंकज चतुर्वेदी 

    पिछले दिनों फ्रांस की संसद ने एक कानून बना कर देश के प्राथमिक और जूनियर हायर सेकेंडरी स्कूलों में बच्चों द्वारा मोबाईल फोन के इस्तेमाल पर पाबंदी लगा दी गयी है । यह कानून अगले स्कूली सत्र यानि सितम्बर 2018 से लागू हो जाएगा । इसके बाद दुनियाभर में इस पर बहस शुरू हो गयी है , कई लोग स्कूल में मोबाईल के फायदे गिना रहे हैं जबकि फ्रांस  के युवा राष्ट्रपति इमानुअल मकरन ने विभिन्न सर्वेक्षण, रिपोर्ट को आधार बना आकर बच्चों के स्कूल में सेल फोन के इस्तेमाल पर पाबंदी का बिल खुद पेश किया और सांसदों से इसके लिए समर्थन माँगा । जान लें कि फ्रांस  में स्कूल के भीतर बच्चों के मोबाईल फोन पर रोक की बहस लम्बे समय से चल रही हैं । सन 2006 में भी इस पर एक बिल पेश किया गया था, लेकिन तब संसद से उसे माकूल समर्थन नहीं मिला था । फ्रांस जैसे विकसित देश के इस कदम से भारत में भी कुछ लोग ऐसी पाबंदी के कानून की बात कर रहे हैं क्योंकि हमारे यहां मोबाईल फोन के दुरूपयोग, वह भी स्कूल व किशोरों में , के मामले बए़ते जा रहे हैं।

    पिछले कुछ महीनों के दोैरान देश के विभिन्न हिस्सों से ऐसे वीडियो खूूब टीवी समाचारों की सुर्खियां बनीं हैं जिनमें कम उम्र के लड़के किसी अवयस्क लड़की के साथ जोर-जबरदस्ती कर रहे थे या कहीं किसी को महज किसी शक में पीट-पीट कर जान से मार दिया गया। हाथ में मोबाईल व उसमें इंटरनेट कनेक्शन ने इन युवाओं के दिल में अपराध की गंभीरता के बनिस्पत जल्दी कुख्यात होने या व्यापक भय पैदा करने की अपाराधिक भावना को बलवती बनाया। हमारा देश दुनिया में सबसे तेजी से मोबाईल उपभौक्ता में विस्तार वाले देशों में से एक है। यह किसी से छुपा नहीं है कि भारत  में सस्ता इंटरनेट और साथ में कम दाम का स्मार्ट फोन अपराध का बड़ा कारण बना हुआ है,- खासकर किशोरों में यौन अपराध हों या मारापीटी या फिर शेखी बघारने को किये जा रहे दुःसाहस। । मोबाईल के कमरे व् वीडियो और उसे इन्टरनेट के जरिये पलक झपकते ही दुनिया तक पहुंचा कर अमर-अजर होने की आकांक्षा युवाओं को कई गलत रास्ते की और मोड़ रही है। दिल्ली से सटे नोयडा में स्कूल के बच्चों ने अपनी ही टीचर का गन्दा वीडियो बना कर सोशल मीडिया पर डाल दिया । क्षणिक आवेश में किसी के प्रति आकर्षित हो गयी स्कूली लड़कियों के अश्लील  वीडियो क्लिप से इन्टरनेट संसार पटा  पडा हैं । इसके विपरीत कई बच्चों के लिए अनजाना रास्ता तलाशना हो या, किसी गूढ़ विषय का हल या फिर देश दुनिया के जानकारी या फिर अपने विरुद्ध हुए अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाना ; इन सभी में हाथ की मुट्ठी में सिमटी दुनिया के प्रतीक मोबाईल ने नयी ताक़त और राह दी है, खासकर युवा लड़कियों को मोबाईल ने बेहद सहारा दिया है ।
    हालांकि यह भी सच है की भारत और फ्रांस  के सामजिक- आर्थिक समीकरण बेहद भिन्न हैं, फ्रांस  में किये गए एक सर्वे के अनुसार देश के 12 से 17 साल आयु वर्ग के नब्बे प्रतिशत बच्चों के पास स्मार्ट मोबाईल है । भारत में यह आंकडा बहुत कम होगा । असल में फ्रांस  के शिक्षकों  की शिकायत थी कि कम उम्र के बच्चे क्लास में फोन ले कर बोर्ड और पुस्तकों के स्थान पर मोबाईल पर ज्यादा ध्यान देते हैं, वे एक दुसरे को मेसेज भेज कर चुहल करते है या फेसबुक, इन्स्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया पर लगे रहते हैं । इससे उनके सीखने और याद रखने की गति तो प्रभावित हो ही रही है, बच्चों के स्वास्थ्य पर भी विपरीत असर हो रहा है । अब वे खेल के मैदान में पसीना बहाने के बनिस्पत आभासी दुनिया में व्यस्त रहते है, इससे उनमें मोटापा, आलस आ रहा है, आँखें कमजोर होना , याददाश्त कमजोर होना भी इसके प्रभाव दिखे, पहले बच्चे जिस गिनती, पहाड़े, स्पेलिंग या तथ्य को अपनी स्मृति में रखते थे, अब वे सर्च इंजन  की चाहत में उसे याद नहीं रखते , यहाँ तक की कई बच्चों को अपने घर का फोन नम्बर तक याद नहीं था,
    हालांकि फ्रांस के कोई इक्यावन हज़ार प्रायमरी और सात हज़ार जूनियर सेकेंडरी स्कूलों में से आधे में स्कूल प्रशासन ने पहले से ही फोन पर रोक लगा रखी है , लेकिन अब यह एक कानून बन गया है, कानूनन बच्चा स्कूल में फोन तो ले कर आ सकता है लेकिन उसे फोन को अपने बसते के भीतर या ऐसे स्थान पर रखना होगा, जहां से वह दिखे नहीं , वैसे इस कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है की यदि कोई बच्चा इसका उलंघन कर्फे तो उसके साथ क्या किया जाये, फ्रांस  के स्कूलों में अभी तो फोन मिलने पर टीचर उसे अपने पास रख लेते हैं और अगले दिन उनके माता-पिता  को बुला कर उन्हें सौंप देते हैं । वैसे जानकार इसे फ़िज़ूल की कवायद मान रहे हैं, बस्ते में रखे फोन से चेटिंग या सोशल मीडिया इस्तेमाल करना बच्चों के लिए कोई कठिन नहीं होगा ।
    उल्लेखनीय है कि पूर्व में अमेरिका के कुछ राज्यों में भी बच्चों के स्कूल में सेल फोन पर पाबंदी लग चुकी है लें बाद में उसे उठा लिया गया। जमैका में सन 2005 में , नाईजीरिया में 2012 में मलेशिया में, 2014 में ऐसे नियम बने - जापान, बेल्जियम में । इंडोनेशिया आदि देशों  में  बच्चों के फोन के इस्तेमाल पर कुछ सीमायें हैं, जैसे जापान में रात में नौ बजे के बाद बच्चे फोन के इस्तेमाल से परहेज करते हैं ।
    यह कटु सत्य है कि स्कूल में फोन कई किस्म की बुराइयों को जन्म दे रहा है । इसके साथ ही आज फ़ोन में खेल, संगीत, वीडियों,  जैसे कई ऐसे  एप उपलब्ध है जिसमें बच्चे का मन लगना ही है और इससे उसकी शिक्षा पर विपरीत प्रभाव पड़ता हैं । लेकिन इम्तेहान में धोखाधड़ी और नक़ल का एक बड़ा औजार यह बन गया हैं। यही नहीं इसके कारण अपराध भी हो रहे हैं।
    निर्कुश अश्लीलता स्मार्ट फोन पर किशोर बच्चों के लिए सबसे बड़ा जहर है , चूँकि ये फोन महंगे भी होते हैं इस लिए अक्सर बेहतर फोन खरीदने या ज्यादा इन्टरनेट  पेक खरीदने के लिए बच्चे चोरी जैसे काम भी करने लगते हैं । विद्यालयों में फोन ले कर जा रहे बच्चों में से बड़ी संख्या धमकियों को भी झेलती है , कई एक शोषण का शिकार भी होते हैं ।
    वैसे बगैर किसी दंड के फ्रांस का कानून कितना कारगर होगा यह तो वक़्त ही बताएगा लेकिन डिजिटल दुनिया पर आधुनिक हो रहे विद्यालयों में इस कदम से एक बहस जरुर शुरू हो गयी है, खासतौर पर भारत जैसे देश में जहां अशिक्षा , असमानता , बेरोजगारी और गरीबी से कुंठित युवाओं की संख्या बढती जा रही है , जहां कक्षा आठ के बाद स्कूल से ड्राप आउट दर बहुत ज्यादा है , लेकिन कई राज्यों में स्कूल के मास्टर को स्मार्ट फोन पर सेल्फी के साथ हाजिरी लगाना अनिवार्य है, ऐसे देश में विद्यालय में बच्चे ही नहीं शिक्षक के भी सेल फोन के इस्तेमाल की सीमाएं, पाबंदियां अवश्य लागु होना चाहिए।
    खेद है कि भारत का सुप्रीम कोर्ट गत तीन साल से सरकार से अश्लील वेबसाईट पर पाबंदी के आदेश दे रहा है और सरकार उस पर अधूरे मन से कार्यवाही अक्रती है और अगले ही दिन वे नंगी साईट फिर खुल जाती हैं , देश के झारखण्ड राज्य के जामताड़ा जिले के आंचलिक क्षेत्रों में अनपढ़ युवा मोबाईल से बेंक फ्रौड का अंतर्राष्ट्रीय गिरोह चलाते हैं लेकिन  सरकार असहाय रहती हैं । ऐसे में हमारे यहाँ ऐसे कानून की सोचना दूर की कौड़ी है लेकिन इस पर व्यापक बहस अवश्य होना चाहिए ।

    रविवार, 29 जुलाई 2018

    Why Delhi do not listen pain of daughter of Mujaffarpur

    Independent mail. bhopal 30-7-18

    बिहार की बच्चियों का दर्द और समाज का यह मौन

    कभी लगता ही नहीं है कि भारत वह देश है, जहां महिलाओं को देवी के रूप में पूजा जाता है या फिर साल की दो नवरात्रियों और न जाने कितने अवसरों पर छोटी बच्च्यिों को पैर पूजकर देवी-तुल्य माना जाता है। दिल्ली के निर्भया कांड ने भले ही सरकारें बदल दी हों, कानून में पॉक्सो एक्ट और जुड़ गया हो लेकिन नहीं बदले तो छोटी बच्चियों की अस्मिता के सवाल। कठुआ कांड में राजनीति, इंदौर में दुधमुंही बच्ची के साथ कुकर्म में एक महीनेे के भीतर फांसी की सजा या मंदसौर कांड पर हंगामा, सब कुछ बेमानी है। हमारा समाज इन सभी को एक घटना मान कर भूल जाता है और इंसानों के बीच मौजूद पिशाच बेखौफ बने रहते हैं। बिहार के मुजफ्फरपुर से जो तस्वीर सामने आ रही है, वह समूचे देश के लिए शर्मनाक है। 
    वे बच्चियां, जो निराश्रित थीं जिनको पालने-पोसने का जिम्मा सरकार ने लिया था, जिनका पालन-पोषण जनता के पैसे से हो रहा था, उनका शारीरिक शोषण उन्हीं के संरक्षक कर रहे थे। चार बच्चियां गायब हैं। दुखद यह भी है कि इस हैवानी कृत्य में आश्रम में काम करने वाली महिला कर्मचारी भी शामिल या मौन थीं। बिहार सरकार ने सीबीआई जांच का लालीपाॅप पकड़ाकर अपना पल्ला झाड़ लिया है। सारा देश 2019 के चुनाव में अधिक वोट की लूट के लिए योजना का औजार बना हुआ है। छात्रावास की बच्चियों से हुए कुकर्म को पूरा सुन लें तो हमें शक होने लगेगा कि क्या हम दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का दावा करने लायक हैं भी या नहीं। मीडिया कुंभ में डुबकी, राजनीतिक चितंन और पाकिस्तान से युद्ध के उन्माद में लिप्त है, जबकि बिहार की बच्चियां सोचने पर मजबूर हैं कि उनमें और दिल्ली में इतना फासला क्यों है? 

    बता दें कि बिहार के मुजफ्फरपुर शहर के साहू रोड पर निराश्रित बच्चियों के लिए राज्य शासन द्वारा एक आश्रम संचालित होता है। इस बालिका गृह के संचालन का जिम्मा स्वयंसेवी संस्था 'सेवा संकल्प एवं विकास समिति' को 24 अक्टूबर, 2013 को सौंपा गया था। यह संस्था एक नवंबर, 2013 से इसका संचालन कर रही थी। राज्य सरकार ने ही टाटा इंस्टीट्यूट आफ सोशल साइंसेस को राज्य के बाल एवं बालिका गृहों के सोशल ऑडिट का जिम्मा 30 जून, 2017 को सौंपा था। उसने सरकार को इसी वर्ष 27 अप्रैल को अपनी रिपोर्ट सौंपी थी। रिपोर्ट में मुजफ्फरपुर के बालिका गृह में यौन हिंसा, अमानवीय व्यवहार और उत्पीड़न की घटनाओं का उल्लेख किया गया था। रिपोर्ट के आधार पर 30 मई, 2018 को महिला थाना, मुजफ्फरपुर में प्राथमिकी दर्ज करायी गयी। उसके लगभग दो महीने बाद कार्रवाई की सुगबुगाहट हुई। यह समूचे सिस्टम के सड़ जाने की बानगी है। 
    बीते 55 महीने में वहां 47 लड़कियों की इंट्री हुई। इनमें से तीन की मृत्यु हो गयी। वर्ष 2015 में एक लड़की, जबकि वर्ष 2017 में दो की मृत्यु हुई थी। इनमें दो लड़कियों की मौत अस्पताल में हुई थी। बालिका गृह के रिकॉर्ड में तीन लड़कियां गायब थीं। जब ज्यादा होहल्ला हुआ तो बालिका गृह की कुल 44 में से 42 बालिकाओं की मेडिकल जांच करायी गयी। इनमें से 34 बालिकाओं के साथ दुष्कर्म की पुष्टि हुई है। ये लड़कियां कुपोषण की शिकार हैं। उनके शरीर पर जलाकर दागने और चोटों के निशान हैं। बच्चियों को नशा दिया जाता था। आश्रम से मिर्गी में बेहोश करने के लिए दिये जाने वाले इंजेक्शन भी जब्त हुए हैं। कई लड़कियों के गर्भवती होने, कुछ को मार कर गायब कर देने की बातें भी समने आ रही हैं। जब आश्रयदाता ही हैवान बन जाए तो किस पर भरोसा हो? 
    लड़कियों के बयान के आधार पर गिरफ्तार लोगों में सबसे चर्चित नाम ब्रजेश ठाकुर का है, जो इस आश्रम को चलाने वाले एनजीओ का संचालक है। उसके पिता राधामोहन ने सन 1982 में 'प्रातःकमल' के नाम से एक अखबार प्रारंभ किया था। बाद में ब्रजेश ने अपने पिता की विरासत को विस्तार देकर एक अंग्रेजी और एक उर्दू अखबार भी शुरू किया। जमीन के धंधे से भी अकूत दौलत कमायी। रुतबा इतना कि सन 2005 में उसके बेटे के जन्मदिन पर बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार खुद उसके घर गये थे। यह किसी से छिपा नहीं है कि ब्रजेश के अखबारों को राज्य सरकार के सबसे ज्यादा विज्ञापन क्यों मिलते हैं? बच्चियों के लिए बना आश्रम, ब्रजेश का घर और तीनों अखबारों के कार्यालय परस्पर सटे हुए हैं। कह सकते हैं कि एक ही परिसर में हैं। पैसे का रुतबा, आखबार-नवीसी की ठसक और अफसर-नेताओं की संलिप्तता से यह पाप सालों तक होता रहा। तभी यहां की लड़कियों को बाहर भेजने, दोस्तों को भीतर लाने व हर दिन लड़कियों की अस्मत से खेलने के घिनौने कृत्य की खबरें बाहर नहीं आ पायीं। ये बच्चियां उस समाज से आती हैं, जो शोषण को अपनी नियति मानता है। इन्हें दबाना, चुप करना आसान होता है। जिस उम्र में इन्हें अपनी मां के आंचल में होना चाहिए, उसमें वे उज्जवल भविष्य की उम्मीदों के साथ घर से दूर रह रही थीं। अब ये बच्चियां कभी बाहरी समाज पर भरोसा नहीं कर पाएंगी। यह विडंबना ही है कि इन बच्चियों के साथ घिनौना काम करने वालों के प्रति कहीं जन आक्रोश जैसी बात सामने नहीं आ रही है। यदि सरकार इन बच्चियों को सुरक्षित, स्वस्थ और सकारात्मक माहौल नहीं दे सकती, तो बेहतर होगा कि उन्हें अपने हाल पर छोड़ दिया जाता।
    एक बात और, यह कहानी केवल मुजफ्फरपुर के आश्रम की ही नहीं है। टाटा इंस्टीट्यूट आफ सोशल साइंसेस ने बिहार के कई अन्य आश्रमों में भी ऐसे ही हालात होने की आशंका जतायी है। शक तो यह भी है कि कई आश्रमों में एक संगठित गिरोह यह सब कर रहा था। विडंबना यह है कि दिल्ली इस पाशविकता से निर्विकार है। वहां कोई मोमबत्ती या जुलूस-जलसा नहीं। एक बात जान लें कि इन बच्चियों की देखभाल पर हमारे-आपके कर से व्यय हो रहा था। यानी हम भी उनके पालकों में से एक हुए लेकिन हमारा मौन हमारे ही गैर-जिम्मेदाराना रवैये को उजागर कर रहा है। कभी उन छोटी बच्चियों से मिलें, उनकी आंखों से बहते हुए आंसुओं और मौन को पढ़ें, लगता है कि वे पूछ रही हैं कि उनका दर्द इंडिया गेट पर भीड़ क्यों नहीं जुूटा पाया? हंसने-खेलने के दिनों में जीवन के प्रति उनकी निराशा हर देशवासी से सवाल करती दिखती है कि क्या मेरी देह का दंश आपको भीतर से झकझोरता नहीं है?

    शुक्रवार, 27 जुलाई 2018

    SHAHAR turning river

    क्यों  आ रही है शहरों में बाढ़
     पंकज चतुर्वेदी

    आशाढ की पहली बरसात में एक घंटे पानी क्या बरसा राजधानी दिल्ली व उससे सटे षहर ठिठक गए। सड़ाकं पर दरिया था और नाले उफान पर। दिल्ली से सटे गाजियाबाद, नोएडा, गुडगांव जैसे षहरों के बडे नाम घुटने-घुटने पानी में डूबते दिखे। मप्र का छोटा सा कस्बा शिवपुरी भी पानी-पानी हो गया और छह महीने से बारिश की कामना कर रहे लोग आने वाले तीन महीनों की आश्ंाका भांप कर कांप गए। एसी ही खबरें गोंडा हो या औरेया, गुवाहाटी हो या फिर मुंबई से आ रही हैं। पूरे देश में गरमी से निजात के आनंद की कल्पना करने वाले सड़कों पर जगह-जगह पानी भरने से ऐसे दो-चार हुए कि अब बारिश के नाम से ही डर रहे हैं।
    विडंबना है कि शहर नियोजन के लिए गठित लंबे-चौडे़ सरकारी अमले पानी के बहाव में शहरों के ठहरने पर खुद को असहाय पाते हैं । सारा दोष नालों की सफाई ना होने ,बढ़ती आबादी, घटते संसाधनों और पर्यावरण से छेड़छाड़ पर थोप देते हैं । वैसे इस बात की जवाब कोई नहीं दे पाता है कि नालों की सफाई सालभर क्यों नहीं होती और इसके लिए मई-जून का इंतजार क्यों होता है । इसके हल के सपने, नेताओं के वादे और पीड़ित जनता की जिंदगी नए सिरे से शुरू करने की हड़बड़ाहट सब कुछ भुला देती है । यह सभी जानते हैं कि दिल्ली में बने ढेर सारे पुलों के निचले सिरे, अंडरपास और सबवे हलकी सी बरसात में जलभराव के स्थाई स्थल हैं,लेकिन कभी कोई यह जानने का प्रयास नहीं कर रहा है कि आखिर निर्माण की डिजाईन में कोई कमी है या फिर उसके रखरखाव में ।
    देश की राजधानी दिल्ली में सुरसामुख की तरह बढ़ते यातायात को सहज बहाव देने के लिए बीते एक दशक के दौरान ढेर सारे फ््लाई ओवर और अंडरपास बने। कई बार दावे किए गए कि अमुक सड़क अब ट्राफिक सिग्नल से मुक्त हो गई है, इसके बावजूद दिल्ली में हर साल कोई 185 जगहों पर 125 बड़े जाम और औसतन प्रति दिन चार से पांच छोटे जाम लगना आम बात है।  इनके प्रमुख कारण किसी वाहन का खराब होना, किसी धरने-प्रदर्शन की वजह से यातायात  का रास्ता बदलना, सड़कांे की जर्जर हालत ही होते हैं । लेकिन जान कर आश्चर्य होगा कि यदि मानवजन्य जाम के कारणों को अलग कर दिया जाए तो महानगर दिल्ली में जाम लगने के अधिकांश स्थान या तो फ्लाई ओवर हैं या फिर अंडर पास। और यह केवल बरसात के दिनों की ही त्रासदी नहीं है, यह मुसीबत बारहों महीने, किसी भी मौसम में आती है। कहीं इसे डिजाईन का देाश कहा जा रहा है तो कहीं लोगों में यातायात-संस्कार का अभाव। लेकिन यह तय है कि अरबों रूपए खर्च कर बने ये हवाई दावे हकीकत के धरातल पर त्रासदी ही हैं।
    बारिश के दिनों में अंडर पास में पानी भरना ही था, इसका सबक हमारे नीति-निर्माताओं ने आईटीओ के पास के शिवाजी ब्रिज और कनाट प्लेस के करीब के मिंटो ब्रिज से नहीं लिया था। ये दोनों ही निर्माण बेहद पुराने हैं और कई दशकोंू से बारिश के दिनों में दिल्ली में जल भराव के कारक रहे हैं। इसके बावजूद दिल्ली को ट्राफिक सिग्नल मुक्त बनाने के नाम पर कोई चार अरब रूपए खर्च कर दर्जनभर अंडरपास बना दिए गए। लक्ष्मीनगर चुंगी, द्वारका मार्ग, मूलचंद,पंजाबी बाग आदि कुछ ऐसे अंडर पास हैं जहां थोड़ी सी बारिश में ही कई-कई फुट पानी भर जाता है। सबसे षर्मनाम तो है हमारे अंतरराश्ट्रीय हवाई अड्डे को जोड़ने वाले अंडर पास का नाले में तब्दील हो जाना। कहीं पर पानी निकालने वाले पंपों के खराब होने का बहाना है तो सड़क डिजाईन करने वाले नीचे के नालों की ठीक से सफाई ना होने का रोना रोते हैं तो दिल्ली नगर पालिका अपने यहां काम नहीं कर रहे कई हजार कर्मचारियों की पहचान ना कर पाने की मजबूरी बता देती है। इन अंडरपास की समस्या केवल बारिश के दिनों में ही नहीं है। आम दिनों में भी यदि यहां कोई वाहन खराब हो जाए या दुर्घटना हो जाए तो उसे खींच कर ले जाने का काम इतना जटिल है कि जाम लगना तय ही होता है। असल में इनकी डिजाई में ही खामी है जिससे बारिश का पूरा जल-जमाव उसमें ही होता है। जमीन के गहराई में जा कर ड्रैनेज किस तरह बनाया जाए, ताकि पानी की हर बूंद बह जाए, यह तकनीक अभी हमारे इंजीनियरों को सीखनी होगी।
    ठीक ऐसे ही हालात फ्लाईओवरों के भी हैं। जरा पानी बरसा कि उसके दोनो ओर यानी चढ़ाई व उतार पर पानी जमा हो जाता है। कारण एक बार फिर वहां बने सीवरों की ठीक से सफाई ना होना बता दिया जाता है। असल में तो इनकी डिजाईन में ही कमी है- यह आम समझ की बात है कि पहाड़ी जैसी किसी भी संरचना में पानी की आमद ज्यादा होने पर जल नीचे की ओर बहेगा। मौजूदा डिजाईन में नीचे आया पानी ठीक फ्लाईओवरों से जुड़ी सड़क पर आता है और फिर यह मान लिया जाता है कि वह वहां मौजूद स्लूस से सीवरों में चला जाएगा। असल में सड़कों से फ्लाईओवरों के जुड़ाव में मोड़ या अन्य कारण से एक तरफ गहराई है और यहीं पानी भर जाता है। कई स्थान पर इन पुलों का उठाव इतना अधिक है और महानगर की सड़कें हर तरह के वाहनों के लिए खुली भी हुई हैं, सो आए रोज इन पर भारी मालवाहक वाहनों का लोड ना ले पाने के कारण खराब होना आम बात है। एक वाहन खराब हुआ कि कुछ ही मिनटों में लंबा हो जाता है। ऐसे हालात सरिता विहार, लाजपत नगर, धौलाकुआं, नारायणा, रोहिणी आदि में आम बात हैं।
    अब षायद दिल्ली को वर्ल्ड क्लास सिटी बनाने के स्वप्नदृश्टाओं को सोचना होगा कि कई अरब-खरब खर्च कर यदि ऐसी ही मुसीबत को झेलना है तो फिर ट्राफिक सिग्नल सिस्टम ही क्या बुरा है ? जैसे हाल ही में सरकार को समझ में आया कि कई-कई करोड़ खर्च कर बनाए गए भूमिगत पैदल पारपथ आमतौर पर लोग इस्तेमाल करते ही नहीं हैं और नीतिगत रूप से इनका निर्माण बंद कर दिया गया है। 
    यह विडंबना है कि हमारे नीति निर्धारक यूरोप या अमेरिका के किसी ऐसे देश की सड़क व्यवस्था का अध्ययन करते हैं जहां ना तो दिल्ली की तरह मौसम होता है और ना ही एक ही सड़क पर विभिन्न तरह के वाहनों का संचालन। उसके बाद सड़क, अंडरपास और फ्लाईओवरों की डिजाईन तैयार करने वालों की शिक्षा भी ऐसे ही देशों में लिखी गई किताबों से होती हैं। नतीजा सामने है कि ‘‘आधी छोड़ पूरी को जावे, आधी मिले ना पूरी पावे’’ का होता है। हम अंधाधंध खर्चा करते हैं, उसके रखरखाव पर लगातार पैसा फूंकते रहते हैं- उसके बावजूद ना तो सड़कों पर वाहनों की औसत गति बढ़ती है और ना ही जाम जैसे संकटों से मुक्ति। काश! कोई स्थानीय मौसम, परिवेश और जरूरतों को ध्यान में रख कर जनता की कमाई से उपजे टैक्स को सही दिशा में व्यय करने की भी सोचे।
    हमारे देश में संस्कृति, मानवता और बसावट का विकास नदियों के किनारे ही हुआ है । सदियों से नदियों की अविरल धारा और उसके तट पर मानव-जीनव फलता-फूलता रहा है । बीते कुछ दशकों में विकास की ऐसी धारा बही कि नदी की धारा आबादी के बीच आ गई और आबादी की धारा को जहां जगह मिली वह बस गई । और यही कारण है कि हर साल कस्बे नगर बन रहे हैं और नगर महानगर । बेहतर रोजगार, आधुनिक जनसुविधाएं और, उज्जवल भविष्य की लालसा में अपने पुश्तैनी घर-बार छोड़ कर शहर की चकाचाैंंध की ओर पलायन करने की बढ़ती प्रवृति का परिणाम है कि देश में षहरों में और षहरों की आबादी बढ़ती जा रही है।
    दिल्ली, कोलकाता, पटना जैसे महानगरों में जल निकासी की माकूल व्यवस्था न होना शहर में जल भराव का स्थाई कारण कहा जाता है । नागपुर का सीवर सिस्टम बरसात के जल का बोझ उठाने लायक नहीं है, साथ ही उसकी सफाई महज कागजों पर होती है। मुंबई में मीठी नदी के उथले होने और सीवर की 50 साल पुरानी सीवर व्यवस्था के जर्जर होने के कारण बाढ़ के हालात बनना सरकारें स्वीकार करती रही है। बंगलौर में पारंपरिक तालाबों के मूल स्वरूप में अवांछित छेड़छाड़ को बाढ़ का कारक माना जाता है । शहरों में बाढ़ रोकने के लिए सबसे पहला काम तो वहां के पारंपरिक जल स्त्रोतों में पानी की आवक और निकासी के पुराने रास्तों में बन गए स्थाई निर्माणों को हटाने का करना होगा । यदि किसी पहाड़ी से पानी नीचे बह कर आ रहा है तो उसका संकलन किसी तालाब में ही होगा । विडंबना है कि ऐसे जोहड़-तालाब कंक्रीट की नदियों में खो गए हैं । परिणामतः थोड़ी ही बारिश में पानी कहीं बहने को बहकने लगता है ।
    महानगरों में भूमिगत सीवर जल भराव का सबसे बड़ा कारण हैं । जब हम भूमिगत सीवर के लायक संस्कार नहीं सीख पा रहे हैं तो फिर खुले नालों से अपना काम क्यों नहीं चला पा रहे हैं ? पोलीथीन, घर से निकलने वाले रसायन और नष्ट न होने वाले कचरे की बढ़ती मात्रा, कुछ ऐसे कारण हैं, जोकि गहरे सीवरों के दुश्मन हैं । महानगरों में सीवरों और नालों की सफाई भ्रष्टाचार का बड़ा माध्यम है । यह कार्य किसी जिम्मेदार एजेंसी को सौंपना आवश्यक है, वरना आने वाले दिनों में महानगरों में कई-कई दिनों तक पानी भरने की समस्या उपजेगी, जो यातायात के साथ-साथ स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा होगा । दिल्ली में तो हाई कोर्ट लगभग हर साल नगर निगम को नालों की सफाई को लेकर  फटकारता है, लेकिन जिम्मेदर अफसर इससे बेपरवाह रहते हैं।
    नदियों या समु्रद के किनारे बसे नगरों में तटीय क्षेत्रों में निर्माण कार्य पर पांबदी की सीमा का कड़ाई से पालन करना समय की मांग है । तटीय क्षेत्रों में अंधाधुंध निर्माण जल बहाव के मार्ग में बाधा होते हैं, जिससे बाढ़ की स्थिति बन जाती है । सीआरजेड कानून में तटों पर निर्माण, गंदगी आदि पर कड़े प्रावधान हैं, लेकिन सरकार अमले कभी भी इन पर क्रियान्वयन की सोचते तक नहीं हैं ।
    विभिन्न नदियों पर बांधे जा रहे बड़े बांधों के बारे में नए सिरे से विचार करना जरूरी है । गत वर्श सूरत में आई बाढ़ हो या फिर उससे पिछले साल सूखाग्रस्त बुंदेलखंड के कई जिलों का जलप्लावन, यह स्पष्ट होता है कि कुछ अधिक बारिश होने पर बांधों में क्षमता से अधिक पानी भर जाता है । ऐसे में बांधेंा का पानी दरवाजे खोल कर छोड़ना पड़़ता है । अचानक छोड़े गए इस पानी से नदी का संतुलन गड़बड़ाता है और वह बस्ती की ओर दौड़ पड़ती है । सनद रहे ठीक यही हाल दिल्ली में भी यमुना के साथ होता है । हरियाणा के बांधों में पानी अधिक होने पर जैसे ही पानी छोड़ा जाता है राजधानी के पुश्तों के पास बनी बस्तियां जलमग्न हो जाती हैं । बांध बनाते समय उसकी अधिकतम क्षमता, अतिरिक्त पानी आने पर उसके अनयंत्र भंडारण के प्रावधान रखना शहरों को बाढ़ के खतरे से बचा सकता है ।
    महानगरों में बाढ़ का मतलब है परिवहन और लोगों का आवागमन ठप होना। इस जाम के ईंधन की बर्बादी, प्रदूशण स्तर में वृद्धि और मानवीय स्वभाव में उग्रता जैसे कई दीर्घगामी दुश्परिणाम होते हैं। इसका स्थाई निदान तलाशने के विपरीत जब कहीं शहरों में बाढ़ आती है तो सरकार का पहला और अंतिम कदम राहत कार्य लगाना होता है, जोकि तात्कालिक सहानुभूतिदायक तो होता है, लेकिन बाढ़ के कारणों पर स्थाई रूप से रोक लगाने में अक्षम होता है । जल भराव और बाढ़ मानवजन्य समस्याएं हैं और इसका निदान दूरगामी योजनाओं से संभव है ; यह बात शहरी नियोजनकर्ताओं को भलींभांति जान लेना चाहिए और इसी सिद्धांत पर भविष्य की योजनाएं बनाना चाहिए ।

    पंकज चतुर्वेदी
    यू जी -1 ए 3/186, राजेन्द्र नगर सेक्टर-2
    साहिबाबाद, गाजियाबाद
    201005
    संपर्क: 9891928376, 011- 26707758(आफिस),

    बुधवार, 25 जुलाई 2018

    save every drop of rain

    जरा सोचें हम कितना पानी बर्बाद करते हैं

    पंकज चतुर्वेदी

    janwani, meerut 

    कहा जा रहा है कि देश के तिहाई हिस्से में बरसात कमजोर है और वहां सूखे के हालात की संभावना है। दूसरी तरफ देश के कई हिस्सो में पानी तबाही मचाए है। खासकर महानगर व बड़े शहर जोकि सारे साल बूंद-बूंद पानी को तरसते हैं, थोड़ी सी बरसात से पानी-पानी हो रहे हैं। लेकिन विडंबना है कि पानी से लबालब दिख रही प्रकृति कुछ ही दनिों में पानी के लिए तरसती दिखेगी। बारिकी से देखें तो पानी की कमी से ज्यादा उसको व्यर्थ करने या कोताही से खर्च करने या अपेक्षित रूप से संचय नहीं कर पाने का ही परिणाम होता है कि हम पानी की कमी का रोना रोते हैं। खासतौर पर इस समय जब पानी की अफरात है, उसे सालभर संचय करने के लिए उसकी आवक-जावक पर नजर रखना जरूरी है। जान लें कि बाढ़ और सूखा प्रकृति के दो पहलू हैं, बिल्कुल धूप और छांव की तरह,। लेकिन बारिष बीतते ही देषभर में पानी की त्राहि-त्राहि की खबरें आने लगती हैं, । कही पीने को पानी नहीं है तो कहीे खेत को । लेकिन क्या हमने कभी यह जानने की कोशिश की है कि बारिश का इतना सारा पानी आखिर जाता कहां है?  इसका कुछ हिस्सा तो भाप बनकर उड़ जाता है और कुछ समुद्र में चला जाता है। कभी सोचा आपने कि यदि इस पानी को अभी सहेजकर न रखा गया तो भविष्य में क्या होगा और कैसे पूरी होगी हमारी पानी की आवश्यकता।

    दुनिया के 1.4 अरब लोगाों को पीने का शुद्ध पानी नहीं मिल पा रहा है। हम यह भूल जाते हैं कि प्रकृति जीवनदायी संपदा यानी पानी हमें एक चक्र के रूप में प्रदान करती है और इस चक्र को गतिमान रखना हमारी जिम्मेदारी है। इस चक्र के थमने का अर्थ है हमारी जिंदगी का थम जाना। प्रकृति के खजाने से हम जितना पानी लेते हैं उसे वापस भी हमें ही लौटाना होता है। पानी के बारे में एक नहीं, कई चौंकाने वाले तथ्य हैं जिसे जानकर लगेगा कि सचमुच अब हममें थोड़ा सा भी पानी नहीं बचा है। कुछ तथ्य इस प्रकार हैं-मुंबई में रोज गाड़ियां धोने में ही 50 लाख लीटर पानी खर्च हो जाता है। दिल्ली, मुंबई और चेन्नई जैसे महानगरों में पाइपलाइनों के वॉल्व की खराबी के कारण 17 से 44 प्रतिशत पानी प्रतिदिन बेकार बह जाता है। ब्रह्मपुत्र नदी का प्रतिदिन 2.16 घन मीटर पानी बंगाल की खाड़ी में चला जाता है। भारत में हर वर्ष बाढ़ के कारण करीब हजारों मौतें व अरबों का नुकसान होता है। इजरायल में औसत बारिष 10 सेंटीमीटर है , इसके बावजूद वह इतना अनाज पैदा कर लेता है कि वह उसका निर्यात करता है। दूसरी ओर भारत में औसतन 50 सेंटीमीटर से भी अधिक वर्षा होने के बावजूद सिंचाई के लिए जरूरी जल की कमी बनी रहती है।

    पिछले 70 वर्षो में भारत में पानी के लिए कई भीषण संघर्ष हुए हैं, कभी दो राज्य नदी के जल बंटवारे पर भिड़ गए तो कहीं सार्वजनिक नल पर पानी भरने को ले कर हत्या हो गई। खेतों में नहर से पानी देने को हुए विवादों में तो कई पुष्तैनी दुष्मिनियों की नींव रखी हुई हैं।  यह भी कडवा सच है कि हमारे देष में औरत पीने के पानी की जुगाड़ के लिए हर रोज ही औसतन चार मील पैदल चलती हैं। पानीजन्य रोगों से विश्व में हर वर्ष 22 लाख लोगों की मौत हो जाती है। पूरी पृथ्वी पर एक अरब 40 घन किलोलीटर पानी है। इसमें से 97.5 प्रतिशत पानी समुद्र में है जोकि खारा है, शेष 1.5 प्रतिशत पानी बर्फ के रूप में धु्रव प्रदेशों में है। बचा एक प्रतिशत पानी नदी, सरोवर, कुआं, झरना और झीलों में है जो पीने के लायक है। इस एक प्रतिशत पानी का 60वां हिस्सा खेती और उद्योगों में खपत होता है। बाकी का 40वां हिस्सा हम पीने, भोजन बनाने, नहाने, कपड़े धोने एवं साफ-सफाई में खर्च करते हैं। यदि ब्रश करते समय नल खुला रह गया है तो पांच मिनट में करीब 25 से 30 लीटर पानी बरबाद होता है। बॉथ टब में नहाते समय धनिक वर्ग 300 से 500 लीटर पानी गटर में बहा देते हैं। मध्यम वर्ग भी इस मामले में पीछे नहीं हैं जो नहाते समय 100 से 150 पानी लीटर बरबाद कर देता है। हमारे समाज में पानी बरबाद करने की राजसी प्रवृत्ति है जिस पर अभी तक अंकुश लगाने की कोई कोशिश नहीं हुई है। हकीकत में जब से देश आजाद हुआ है तब से आज तक इस दिशा में कोई भी काम गंभीरता से नहीं हुआ है। विश्व में प्रति 10 व्यक्तियों में से 2 व्यक्तियों को पीने का शुद्ध पानी नहीं मिल पाता है। ऐसे में प्रति वर्ष 6 अरब लीटर बोतलबंद पानी मनुष्य द्वारा पीने के लिए प्रयुक्त किया जाता है।

    पानी का स्रोत कही जाने वाली नदियों में बढ़ते प्रदूषण को रोकने के लिए विशेषज्ञ उपाय खोजने में लगे हुए हैं, किंतु जब तक कानून में सख्ती नहीं बरती जाएगाी तब तक अधिक से अधिक लोगाों को दूषित पानी पीने को विवश होना पड़ सकता है। पृथ्वी का विस्तार 51 करोड़ वर्ग किलोमीटर है। उसमें से 36 करोड़ वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र पानी से घिरा हुआ है। दुर्भाग्य यह है कि इसमें से पीने लायक पानी का क्षेत्र बहुत कम है। 97 प्रतिशत भाग तो समुद्र है। बाकी के तीन प्रतिशत हिस्से में मौजूद पानी में से 2 प्रतिशत पर्वत और ध्रुवों पर बर्फ के रूप में जमा हुआ है, जिसका कोई उपयोग नहीं होता है। यदि इसमें से करीब 6 करोड़ घन किलोमीटर बर्फ पिघल जाए तो हमारे महासागारों का तल 80 मीटर बढ़ जाएगाा, किंतु फिलहाल यह संभव नहीं। पृथ्वी से अलग यदि चंद्रमा की बात करें तो वहां के ध्रुवीय प्रदेशों में 30 करोड़ टन पानी का अनुमान है। पृथ्वी पर पैदा होने वाली सभी वनस्पतियां भी जलजन्य है। आलू में और अनन्नास में 80 प्रतिशत और टमाटर में 95 प्रतिशत पानी है। पीने के लिए मानव को प्रतिदिन कम से कम पांच लीटर और पशुओं को 50 लीटर पानी चाहिए। एक लीटर गााय का दूध प्राप्त करने के लिए 800 लीटर पानी खर्च करना पड़ता है, जबकि एक किलो गेहूं उगााने के लिए एक हजार लीटर और एक किलो चावल उगाने के लिए चार हजार लीटर पानी की आवश्यकता होती है। इस प्रकार भारत में 83 प्रतिशत पानी खेती और सिंचाई के लिए उपयोग किया जाता है। 1991 में भारतीय अर्थव्यवस्था में खुलापन आने के बाद निजीकरण का जोर बढ़ा है। एक के बाद एक कई क्षेत्र निजीकरण की भेंट चढ़ते गए। सबसे बड़ा झटका जल क्षेत्र के निजीकरण का है। जब भारत में बिजली के क्षेत्र को निजीकरण के लिए खोला गया तब कोई बहस नहीं हुई। बड़े पैमाने पर बिजली गुल होने का डर दिखाकर निजीकरण को आगे बढ़ाया गया जिसका नतीजा आज सबके सामने है। सरकारी तौर पर भी यह स्वीकार किया जा चुका है कि सुधार औंधे मुंह गिरे हैं और राष्ट्र को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी है। अब पानी के क्षेत्र में ऐसी ही निजीकरण की बात हो रही है। कई जगह नदियों को निजी हाथों में सौंपा जा रहा है। विकास के नाम पर तालबा व नदियों को उजाड़ने में कोई परहेज नहीं हो रहा है।
    Raj express 30-7

    यदि अभी बरसात के पानी की हर बूंद को सहेजा नहीं गया तय मानें कि फिर पानी केवल हमारी आंखों में ही बच पाएगा। हमारा देश वह है जिसकी गोदी में हजारों नदियां खेलती थीं, आज वे नदियां हजारों में से केवल सैकड़ों में रह गई हैं। आखिर कहां गई ये नदियां कोई नहीं बता सकता। नदियों की बात छोड़ें, हमारे गांव-मोहल्लों तक से तालाब, कुएं, बावडी आदि लुप्त हो रहे हैं। जान लें, पानी की कमी, मांग में वृद्धि तो साल-दर-साल ऐसी ही रहेगी। अब मानव को ही बरसात की हर बूंद को सहेजने और उसे किफायत से खर्च करने पर विचार करना होगा। इसमें अन्न की बर्बादी सबसे बड़ा मसला है- जितना अन्न बर्बाद होता है, उतना ही पानी जाया होता है।

    बुधवार, 18 जुलाई 2018

    Identify supporter of violence in the name of religion

    हिंसा पर अट्टहास करने वालों के असली मकसद को पहचानें। 

    पंकज चतुर्वेदी 


    17 जुलाई 2018 को जब देश की शीर्ष अदालत कानून के भीड़ के हाथों बंधक बनाने की बढ़ती प्रवृति पर अपनी नाखुशी जाहिर करते हुए इस पर सख्त कानून का आदेश दे रही थी, ठीक उसी समय देश के छोर पर झारखंड के पाकुड़ जिले के एक गांव में अस्सी साल के स्वामी अग्निवेश को सरे राह पीटा जा रहा था। जयश्री राम के उदघोष के साथ मां-बहन की गालियां और निर्मम पिटाई होती रही। अग्निवेश के बोल विवादास्पद होते हैं, वे हरियाणा सरकार में पूर्व मंत्री रहे हैं, यह सूचना स्थानीय प्रशासन के लिए पर्याप्त थी कि उनके साथ सुरक्षा व्यवस्था हो, लेकिन लगता है कि सारे कुएं में भांग घुली थी और घटना के घंटाभर बाद पुलिस पहुंची। मसला बस यहीं तक नहीं रूका, उसके बाद देश में इस घटना के विरोध में जितने स्वर उठे, उतने ही लोग इस पर हर्ष-आनंद जताने वाले भी मुखर थे। ठीक उसी तरह जैसे गौरी लंकेश की हत्या, अखलाक या पहलु खां या ऐसी ही अन्य  सार्वजनिक रूप से पीट-पीट कर मारने की घटनाओं के बाद हुआ। फेसबुक को एक व्यापक सर्वे तो नहीं कह सकते, लेकिन वह पांच हजार लेागों के मिजाज का आईना जरूर है। सबसे दुखद यह है कि इस तरह धर्म-रक्षा के नाम पर सार्वजनिक हत्या करने वालों के पक्ष में कुतर्क गढ़ने वालों में सबसे अधिक वे लोग होते हैं जिन्हें सनातन समाज में श्रेष्ठ, शिक्षित और समाज का मार्गदर्शक माना जाता है।

    देश में सांप्रदायिक दंगों का काला अतीत दो दशक से ज्यादा पुराना है। यह बात दीगर है कि धर्म की आउ़ में भउ़के दंगों की जब जांच हुई तो पता चला कि अधिकांश के पीछे जमीन पर कब्जे, व्यापारिक प्रतिस्पर्द्धा जैसे मसले थे। अयोध्या के विवादास्पद ढांचे को गिराने का प्रयोग भीड़तंत्र को कानून व संविधान के खिलाफ नैतिक बनाने का प्रयोग संभवतया पहला था। उसके बाद सोशल मीडिया के आगमन के बाद अफवाहों, कुतर्क, असत्य के आधार पर एक आम आदमी में इतना भय पैदा कर देना कि वह एक ऐसी भीड़ की हिस्सा बन जाए जोकि किसी की भी जान ले सकती है, बेहद आसान हो गया। धर्म, संस्कृति, देश, बच्चे, भाषा , विचार ऐसे ही कुछ भावनात्मक मुद्दों को आए रोज की सियासत का हिस्सा बना कर अजीब सा खैफ का माहौल बनाया जाता है फिर जब भय अपने चरम पर होता है तो इंसान आक्रामक हां जता है, उसका विवेक शुन्य हो जाता है और वह संविधान-कानून’ नैतिकता, सभी से परे हट कर महज भीउ़ का अंजान चैहरा बन जाता है।

    भीउ़ का उन्माद तो ठीक है, आखिर वे लोग कौन हें जोकि भीउ़ के किसी कृत्य को अपना नैतिक समर्थन देते है। जैसे कि स्वामी अग्निवेश की पिटाई के लिए लेागों ने उनके हिंदू देवी-देवता या पूजा पर दिए गए बयानों की आउ़ ली, कुछ ने उन्हें नक्सली समथक या ईसाई मिशिनरी का आदमी कहा। कुछ लोग अन्ना आंदोलन में उनके कपिल सिब्बल से बातचीत का वीडियो ले कर आ गए। लेकिन कोई यह नहंी स्पष्ट कर पाया कि क्या वैचारिक असहमति या प्रतिरोध-स्वर होने पर किसी की पिटाई या हत्या जायज है। मान लेंकि अलवर का पहलू खांन गाय का अवैध व्यापार कर रहा था तो उसे सरे राह पीटने व उसकी जान लेने के अधिकार किस कानून-धर्म-संथा ने अपराधियां को दे दिए थे। यदि अग्निवेश नक्सली समर्थक है तो पंद्रह साल से छत्तीसगड़ में और दस साल की झारंखंड की सरकार ने उन्हें जेल में क्यों नहीं डाल दिया। मूर्तिपूजा के विरोध में तो स्वामी दयानंद सरस्वती ने क्या कुछ नहीं कहा तो क्या उनकी हत्या को जायज ठहराया जा सकता है? ये हत्यारे, ये विचार और ये तेवर असल में देश के लोकतंत्रात्मक प्रणाली के लिए ही खतरा हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा कि देश की लोकतंत्रात्मक और धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था के लिए भीड़ तंत्र नुकसानदेह है।
    सोशल मीडिया पर अग्निेवेश की पिटाई या गौरी लंकेश की हत्या या फिर ऐसी ही अन्य मॉब लिंचिंग की घटनाओं का समर्थन करने वाले एक ही विचारधारा के लोग हैं। उनका तर्क भी एक ही है कि हिंदू धर्म खतरे में है और ऐसी घटनांए धर्म-रक्षा के लिए हैं। असल में ऐसे लेाग किसी कुभ, सिंहस्था या माघ मेले में जाते नहीं हैं, ये लोग हर महीने की अमावस पर गंगा के तट को देखते नहीं है, जहां बगैर किसी परिषद, संघ या संगठन के आमंत्रण के लाखों लोग सदियों से आते हैं और आस्था के साथ अपने पीढ़ियों से चले आ रहे  पुराने संस्कार निभाते हैं। विडंबना है कि फेसबुक पर धर्म रक्षा के नाम पर  हिंसा को जायद ठहराने वालों में सबसे बड़ी संख्या उस समाज के लोगों की होती है जिस पर जिम्मेदारी है कि वह लोगों को धर्म के सही मायने, धर्मग्रंथों का असली मकदसद बताए आखिर ऐसा क्यों हो रहा है कि सबसे अधिक बुद्धिजीवी कहे जाना वाले समाज को ही धर्म खतरे में दिख रहा है?
    हकीकत यह ह कि अभी कुछ दशक पहले तक शिक्षा और साक्षरता पर सीमित लोगों का अधिकार था। सरकार, नौकरी, समाज सभी जगह उनकी पेठ सबसे ज्यादा थी। वैश्वीकारण के बाद सभी समाज, वर्ग, जाति के लोग शिक्षा पा रहे हैं। सभी धर्म को अपने नजरिये से आंक रहे हैं। सभी के पास वदे को सरल भाषा में पढ़ने व समझने की अवसर पर समझ है। ऐसे में सदियों से अपने ज्ञान के बल पर अल्प श्रम के बद भी शाही जीवकोपार्जन करने की प्रवृति वाले लोगों को अपना सिंहासन डगमगाता दिख रहा है। । हालांकि यह हर गांव’कस्बे की कहानी है कि नवरात्रि जैसे पर्व में मुर्गा व शराब की बिक्री कम हो जाती है, जाहिर है कहने की जरूरत नहीं कि इसके सेवन मे कौन लेाग शािमल हैं। शायद जान कर आश्चर्य होगा कि सन्यास व संत परंपरा में अधिकांश लोग गैर ब्राहम्ण है और अखाड़ों में रहेन वाले साध्ुाओं में सर्वाधिक ओबीसी कहलाने वाले वर्ग से होते हैं। इसे बावजूद खुद को धर्म की शीर्ष मानने वाले स्वयंभु लोग  अब उन लोगों को भयभीत कर, भड़का कर धर्म के संकट का हौआ खड़ा कर रहे हैं। असल में संकट में उनका जातिय आधार पर स्थावित स्वयंभु श्रेष्ठता का दंभ है। जो उन्होने स्वयं अपने मन-वचन और कर्म से गंवाया है। ऐसे ही लोग सोशल मीडिया पर मुखर स्वर में धर्म के नाम पर हुडदंगई को जायज ठहराते हैं। एक बात और इस भीउ़ को धार देने में बेरोजगारी, खाली दिमाग,  बेहद कम दाम पर मोाबईल पर चौवीसों घंटे उपलब्ध डाटा और ऐसे मसलों में राजनीतिक नेत्त्व का ढीला रवैया आग में पानी का काम करता है।
    यदि असमति या अपने विचार को स्थापित करने के लिए अग्निवेश को पीटने को जायज ठहराया जा सकता है तो फिर पनी कथित विचारधारा के लिए सरेआम हत्या व लूट कने वाले नक्सली या पूर्वोत्र या कश्मीर में अलगाववादियों के भी अपने तर्क सामने हैं।  अराजकता, और कानून से परे समानांतर  हरकतें करना, देश के अस्तित्व, अस्मिता और अवसर के लिए बेहद खतरनाक हैं। इससे हमारी आर्थिक प्रगति और अंतरराष्ट्रीय छबि पर भी असर पउ़ रहा हे। आम युवाओं को  सोचना होगा कि सोशल मीडिया या अन्य माध्यामों से उन्हें भयभीत कर उकसाने वाले लोगो का असल मकसद क्या है?  जब तक संविधान है तब तक ना तो देश को खतरा है और ना ही सनातन धर्म को।

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