My writings can be read here मेरे लेख मेरे विचार, Awarded By ABP News As best Blogger Award-2014 एबीपी न्‍यूज द्वारा हिंदी दिवस पर पर श्रेष्‍ठ ब्‍लाॅग के पुरस्‍कार से सम्‍मानित

बुधवार, 12 सितंबर 2018

Ganpati must be welcome with eco friendly vision

गणेश चतुर्थी 2018: गणपति का स्वागत नैसर्गिक ढंग से करें

बीते कुछ वर्षों में भारतीय अध्यात्म को बाजारवाद की ऐसी नजर लगी कि अब पर्व पर्यावरण पूरक नहीं रह पा रहे हैं।



लेखक- पंकज चतुर्वेदी
बरसात हुई और सारी प्रकृति नहा-धो कर तैयार हो गई, समृद्धि, सुख और आस्था के श्रम और प्रतिउत्तर के फल में। पहाड़ों से निकली लहलहाती नदियों के साथ ढेर सारी बारीक मिट्टी तटों पर जमा हो गई। इसी रज-कण में भारतीय कृषक समाज का जीविकोपार्जन और अस्तित्व बसा है सो वे मिट्टी को घर ले गए, सिद्धिविनायक की प्रतिमा बनाई, पूजा और उसको उसी जलस्नेत में ऐसी सामग्री के साथ विसर्जित कर दिया, जिससे उस जल-निधि में पलने वाले जीवों का पेट भर सके।
भारत में पर्व केवल सामाजिक अनुष्ठान नहीं हैं, बल्कि वे प्रकृति के संरक्षण का संकल्प और कृतज्ञता ज्ञापित करने का अवसर होते हैं। भारत के सभी त्यौहार सूर्य-चंद्रमा-धरती-जल संसाधनों-पशु-पक्षी आदि की आराधना पर केंद्रित हैं। लेकिन बीते कुछ वर्षो में भारतीय अध्यात्म को बाजारवाद की ऐसी नजर लगी कि अब पर्व पर्यावरण पूरक नहीं रह पा रहे हैं।
हर साल सितंबर महीने के साथ ही बारिश के बादल अपने घरों को लौटने को तैयार हो जाते हैं। सुबह सूरज कुछ देर से दिखता है और जल्दी अंधेरा छाने लगता है। असल में मौसम का यह बदलता मिजाज उमंगों, खुशहाली के स्वागत की तैयारी होता है। प्रत्येक शुभ कार्य के पहले गजानन गणपति की आराधना अनिवार्य है और इसीलिए उत्सवों का प्रारंभ गणोश चतुर्थी से ही होता है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ में अगस्त- 2016 में अपील कर चुके हैं कि देव प्रतिमाएं प्लास्टर आफ पेरिस यानी पीओपी की नहीं बनाएं, मिट्टी की ही बनाएं। लेकिन देश के दूरस्थ अंचलों की छोड़ दें, राजधानी दिल्ली में ही अक्षरधाम के करीब मुख्य एनएच-24 हो या साहिबाबाद में जीटी रोड पर थाने के सामने; धड़ल्ले से पीओपी की प्रतिमाएं बिकती हैं। ऐसा ही दृश्य देश के हर बड़े-छोटे कस्बों में देखा जा सकता है।
गत एक दशक के दौरान विभिन्न गैरसरकारी संस्थाओं, राज्यों के प्रदूषण बोर्ड आदि ने गंगा, यमुना, सुवर्णरेखा, गोमती, चंबल जैसी नदियों की जल गुणवत्ता का, गणपति या देवी प्रतिमा विसर्जन से पूर्व व पश्चात अध्ययन किया और पाया कि आस्था का यह ज्वार नदियों के जीवन के लिए खतरा बना हुआ है। जब नदियां नहीं रहेंगी तो धरती पर इंसान भी नहीं जी पाएगा।
प्रत्येक त्योहर की मूल आत्मा को समझना होगा। प्रतिमाओं को बनाने में पर्यावरण मित्र सामग्री का इस्तेमाल करने  जैसे प्रयोग किए जा सकते हैं। पूजा सामग्री में प्लास्टिक या पॉलीथिन का प्रयोग वर्जित करना, फूल-ज्वारे आदि को स्थानीय बगीचे में जमीन में दबा कर उसका कंपोस्ट बनाना, चढ़ावे के फल, अन्य सामग्री को जरूरतमंदों को बांटना, बिजली की जगह मिट्टी के दीयों का प्रयोग ज्यादा करना, तेज ध्वनि बजाने से बचना जैसे साधारण से प्रयोग हैं; जो प्रदूषण व उससे उपजने वाली बीमारियों पर काफी हद तक रोक लगा सकते हैं। पर्व आपसी सौहार्द बढ़ाने, स्नेह व उमंग का संचार करने के और बदलते मौसम में स्फूर्ति के संचार के वाहक होते हैं। इन्हें मूल स्वरूप में अक्षुण्ण रखने की जिम्मेदारी भी समाज की है।

गुरुवार, 6 सितंबर 2018

Hindi not an official language, it is language of folk

हिंदी राजभाषा नहीं लोकभाषा

दिल्ली के एक नामचीन पब्लिक स्कूल के कक्षा तीन के बच्चे को गृह-कार्य डायरी में लिख कर भेजा गया कि बच्चे का ‘श्रुत लेखन’ का टेस्ट होगा। बच्चे के माता-पिता अंग्रेजी माध्यम से पढ़े थे। अपने परिचितों को फोन कर वे पूछते रहे कि यह क्या होता है?1लखनऊ के निकट चिनहट के एक माध्यमिक स्कूल की कक्षा आठ की एक घटना राज्य में शिक्षण व्यवस्था की दयनीय हालत की बानगी है। स्कूल शुरू होने के कई महीने बाद विज्ञान की किताब के पहले पाठ पर चर्चा हो रही थी। पाठ था पौधों के जीवन का। दूसरे या तीसरे पृष्ठ पर लिखा था कि पौधे श्वसन क्रिया करते हैं। बच्चों से पूछा कि क्या वे भी श्वसन करते हैं तो कोई बच्चा यह कहने को तैयार नहीं हुआ कि वे भी श्वसन करते हैं। यानी जो कुछ भी पढ़ाया जा रहा है उसे व्यावहारिक धरातल पर समझाने के कोई प्रयास नहीं हो रहे हैं, महज तोता रटंत को ही शिक्षा मान लिया जा रहा है। 1भोपाल में अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी विश्वविद्यालय का प्रारंभ इस उद्देश्य से किया गया कि वहां सभी तकनीकी विषयों की शिक्षा हिंदी में दी जाएगी। इसमें कुल 231 पाठ्यक्रम हैं। पिछले साल इसमें से 170 में एक भी प्रवेश नहीं हुआ। 14 कोर्स में केवल एक-एक छात्र है तो 46 पाठ्यक्रम ऐसे हैं, जिनमें पढ़ने वालों की संख्या 10 से भी कम है। गौर करें कि वे बच्चे जो उच्च शिक्षा में अंग्रेजी को व्यवधान मानते रहे हैं, बेहद कम फीस के साथ जब हिंदी में शिक्षा की व्यवस्था हुई तो भी वे क्यों नहीं आए? विश्वविद्यालय की वेबसाइट पर हिंदी के कुछ शब्दों पर गौर कीजिए- भेषज विज्ञान (फार्मेसी), भ्रमणभाष (मोबाइल), अंतरताना (वेबसाइट)। यही कारण है कि यहां पिछले साल इंजीनियरिंग में सात छात्र थे जो इस साल घट कर दो रह गए हैं। 1ये तीन घटनाएं बानगी हैं कि जब हम हिंदी में संप्रेषण के किसी माध्यम की चर्चा करते हैं, उस पर प्रस्तुत सामग्री पर विमर्श करते हैं तो सबसे पहले गौर करना होता है कि उस माध्यम को पढ़ने-देखने वाले कौन हैं, उनकी पठन क्षमता कैसी है और वे किस उद्देश्य से इस माध्यम का सहारा ले रहे हैं। विडंबना है कि हिंदी को राजकाज की भाषा बनाने के सरकारी प्रयासों ने हिंदी को अनुवाद की, और वह भी भाव-विहीन व संस्कृतनिष्ठ हिंदी बना कर रख दिया है। यहां जानना जरूरी है कि हिंदी अन्य भारतीय भाषाओं के मानिंद राजभाषा ही है, न कि राष्ट्रभाषा, फिर भी देश में केवल हिंदी दिवस मनाया जाता है, कभी पंजाबी, कन्नड़ या सिंधी दिवस नहीं। जबकि हिंदी की असल ताकत हमारे राज्यों की भाषाएं व बोलियां ही हैं। 11857 के करीब जनगणना में महज एक प्रतिशत लोग साक्षर पाए गए थे, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि उससे पहले भाषा, साहित्य, ज्ञान-विज्ञान, आयुर्वेद, ज्योतिष, अंतरिक्ष का ज्ञान हमारे पास नहीं था। वह था- देश की बोलियों में, संस्कृत में, उससे पहले प्राकृत या पालि में जिसे सीमित लोग समझते थे, और वे ही उसका इस्तेमाल करते थे। फिर अमीर खुसरो के समय आई हिंदी, हिंद यानी भारत के गोबर पट्टी की संस्कृति, साहित्य व ज्ञान की भाषा, उनकी बोलियों का एक समुच्चय। हिंदी साहित्य का भक्ति काल 1375 ई. से 1700 ई. तक माना जाता है। यह हिंदी साहित्य का श्रेष्ठ युग है। समस्त हिंदी साहित्य के श्रेष्ठ कवि और उत्तम रचनाएं इस युग में प्राप्त होती हैं।1सूरदास, नंददास, कृष्णदास, परमानंद दास, कुंभनदास, चतुभरुजदास, छीतस्वामी, गोविंदस्वामी, हितहरिवंश, गदाधर भट्ट, मीराबाई, स्वामी हरिदास, सूरदास- मदनमोहन, श्रीभट्ट, व्यास जी, रसखान, ध्रुवदास तथा चैतन्य महाप्रभु। इसके अलावा कई मुस्लिम लेखक भी सूफी या साझा संस्कृति की बात कर रहे थे। इस तरह से हिंदी के उदय ने ज्ञान को आम लोगों तक ले जाने का रास्ता खोला और इसीलिए हिंदी को प्रतिरोध या परंपराएं तोड़ने वाली भाषा कहा जाता है। भाषा का अपना स्वभाव होता है अैर हिंदी के इस विद्रोही स्वभाव के विपरीत जब इसे लोक से परे हट कर राजकाज की या राजभाषा बनाने का प्रयास होता है तो उसमें सहज संप्रेषणीय शब्दों का टोटा प्रतीत होता है। 1आज जिस हिंदी की स्थापना के लिए पूरे देश में हिंदी पखवाड़ा मनाया जाता है उसकी सबसे बड़ी दुविधा है मानक हिंदी यानी संस्कृतनिष्ठ हिंदी। ऐसा नहीं है कि आम लोगों की हिंदी में संस्कृत से कोई परहेज है। उसमें संस्कृत से यथावत लिए गए तत्सम शब्द भी हैं तो संस्कृत से परिशोधित हो कर आए तद्भव शब्द जैसे अग्नि से आग आदि भी हैं। इसमें देशज शब्द भी थे, बोलियों से आए स्थानीय शब्द और विदेशज भी जो अंग्रेजी, फारसी व अन्य भाषाओं से आए। 1यदि आंकड़ों पर भरोसा करें तो हिंदी में अखबार व अन्य पठन सामग्री के पाठक हर साल बढ़ रहे हैं लेकिन जब हिंदी में शिक्षा की बात आती है तो उसके हाल ‘अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी विश्वविद्यालय’ जैसे हो जाते हैं। यह समझना अनिवार्य है कि हिंदी की मूल आत्मा उसकी बोलियां हैं और विभिन्न बोलियों को संविधान सम्मत भाषाओं में शािमल करवाने, बोलियों के लुप्त होने पर बेपरवाह रहने से हिंदी में विदेशी और अग्रहणीय शब्दों का अंबार लग रहा है। भारतीय भाषाओं और बोलियों को संपन्न, समृद्ध किए बगैर हिंदी में काम करने को प्रेरित करना मुश्किल है। 1संचार माध्यमों की हिंदी आज कई भाषाओं से प्रभावित है। विशुद्ध हिंदी बहुत ही कम माध्यमों में है। दृश्य और श्रव्य माध्यमों में हिंदी की विकास-यात्र बड़ी लंबी है। हिंदी के इस देश में जहां की जनता गांव में बसती है, हिंदी ही अधिकांश लोग बोलते-समझते हैं, इन माध्यमों में हिंदी विकसित एवं प्रचारित हुई है। इसके लिए मानक हिंदी कळ्छ बनी हैं। ध्वनि-संरचना, शब्द संरचना में उपसर्ग-प्रत्यय, संधि, समास, पद संरचना, वाक्य संरचना आदि में कुछ मानक प्रयोग, कळ्छ पारंपरिक प्रयोग इन दृश्य- श्रव्य माध्यमों में हुए हैं, किंतु कुछ हिंदीतर शब्दों के मिलने से यहां विशुद्ध खड़ी बोली हिंदी नहीं है, मिश्रित शब्द, वाक्य प्रसारित, प्रचारित हो रहे हैं।1असल में कोई भी भाषा ‘बहता पानी निर्मला’ होती है, उसमें समय के साथ शब्दों का आना-जाना लगा रहता है। यदि हिंदी को वास्तव में एक जीवंत भाषा बना कर रखना है तो शब्दों का यह लेन-देन पहले अपनी बोलियों व फिर भाषाओं से हो, वरना हिंदी एक नारे, सम्मेलन, बैनर, उत्सव की भाषा बनी रहेगी।

रविवार, 2 सितंबर 2018

China is using Siang river as "water bomb"

कहीं पूर्वोत्तर के लिए ‘जल-बम’ न बन जाए सियांग
पंकज चतुर्वेदी 

अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह को पत्र भेजकर अनुरोध किया है कि उनके राज्य की चीन से लगती सीमा पर स्थित सियांग नदी के चकित करने वाले व्यवहार का गंभीरता से अध्ययन किया जाए। सियांग नदी एक बार फिर उसके किनारे बसे लोगों में खौफ पैदा कर रही है। चीन ने पानी छोड़ने की चेतावनी क्या दी, अरुणाचल प्रदेश और असम में भारी बाढ़ का खतरा मंडराने लगा। आश्चर्य इस बात का है कि जहां गत एक सप्ताह से सियांग के किनारे बसे कई गांवों पर तबाही आई है तो सियांग घाटी के कई इलाकों मेंे सूखे का संकट है।
अरुणाचल प्रदेश की जीवन रेखा कहलाने वाली सियांग नदी एक बार फिर उसके किनारे बसे लोगों में खौफ पैदा कर रही है। चीन ने उसी तरफ से पानी छोड़ने की चेतावनी क्या दी, अरूणाचल प्रदेश और असम में भारी बाढ़ का खतरा मंडराने लगा। हालांकि यह चेतावनी भी तब जारी की गई जब बीते दो सप्ताह से सियांग नदी में हो रही कुछ असामान्य हरकतों पर भारत ने चीन के सामने सवाल खड़े किए। हालांकि फिलहाल नदी का जल स्तर खतरे के निशान से भी नीचे हैं लेकिन उसमें दो-दो मीटर ऊंची लहरें उठ रही है, जैसे कि समुद्र में ज्वार-भाटे के समय उठती हैं। पीढियों से इस नदी के सहारे अपना जीवन काट रहे पासीघाट इलाके के लोगों का कहना है कि नदी में ऐसी असामानरू ऊंची लहरें उन्होंने कभी देखी नहीं।  इस समय इलाके का मौसम बेहद सामान्य है और ऐसे में तेज आवाज के साथ असामान्य रूप से उछलती लहरें केवल मेबो क्षेत्र को प्रभावित कर रही हैं । वहीं मेबो क्षेत्र से करीब 31 किलोमीटर आगे नामसिंग और इसके आसपास के इलाकों में नदी का प्रवाह बिल्कुल सामान्य है। याद करें पिछले साल भी अक्तूबर में इसी नदी का पानी पूरी तरह काला हो गया था।

सियांग नदी का उदभव पश्चिमी तिब्बत के कैलाश पर्वत और मानसरोवर झील से दक्षिणपूर्व में स्थित तमलुंग त्सो (झील) से हैं। तिब्बत में अपने कोई 1600 किलोमीटर के रास्ते में इसेयरलुंग त्संगपो  कहते हैं। भारत में दाखिल होने के बाद इस नदी को सियांग या दिहांग नाम से जाना जाता है । कोई  230 किलोमीटर का सफर तय करने के बाद यह लोहित नदी से जुड़ती है। अरूणाचल के पासीघाट से 35 किलोमीटर नीचे उतर कर इसका जुड़ाव दिबांग नी से होता है। इसके बाद यह ब्रह्मपुत्र में परिवर्तित हो जाती है।  बीते दो सप्ताह से सियांग नदी में उठ रहीं रहस्यमयी लहरों के कारण लोगों में भय है। आम लेागों मे ंयह धरणा है कि इसके पीछे चीन की ही साजिश है। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि चीन अरूणाचल प्रदेश के बड़े हिस्से पर अपना दावा करता है और यहां वह आए रोज कुछ न कुछ हरकतें करता है। अंतरराश्ट्रीय नदियों के प्रवाह में गड़बड़ी कर वह भारत को परेशान करने की साजिशें करता रहा है।

14 अगस्त  की रात से अचानक उठ रहीं भयंकर लहरेां के कारण बोरगुली, सिंगार, सेरम, नामसेंग आदि दर्जनों गांवों की नदी किनारे की हजारों हेक्टेयर जमीन पानी में समा गई व नदी का विस्तार आबादी की ओर हो गया। यही नहीं इससे पहले अपर सियांग, जोकि चीन के करीब है, के तुतिंग औरगेलियों गांव में मछली व मवेशी मरने की खबरें भी आई थीं। पिछले साल अक्तूबर में भी बेहद साफ और निर्मल जल वाली सियांग नदी का पानी बेहद मटमैला हो गया था। उसमें सीमेंट जैसी हजारों टन कीचड़ आई थी। नदी का कई सौ किलामीटर हिस्से का पानी एकदम काला हो गया था व पीने के लायक नहीं बचा था।, वहां मछलियां भी मर गई थीं। नदी के पानी में सीमेंट जसा पतला पदार्थ होने की बात जिला प्रशासन ने अपनी रिपोर्ट में कही थी। सनद रहे सियांग नदी के पानी से ही अरूधाचल प्रदेश की प्यास बुझती है। तब संसद में भी इस पर हल्ला हुआ था और चीन ने कहा था कि उसके इलाके में 6.4 ताकत का भूकंप आया था, संभवतया यह मिट्टी उसी के कारण नदी में आई होगी। हालांकि भूगर्भ वैज्ञानिकों के रिकार्ड में इस तरह का कोई भूकंप उस दौरान चीन में महसूस नहीं किया गया था।  इसी साल जुलाई में विदेया राज्य मंत्री वी के सिंह ने संसद में सूचित किया था कि चीन के साथ द्विपक्षीय वार्ता में सियंग नदी का मसला उठाया गया था और भारत सरकार ने नदी के सीमावर्ती इलाकांें में जल-प्रवाह निरीक्षण के लिए विशेश व्यवस्था कर रही है।

इससे पहले सन 2012 में सियांग नदी रातों -रात अचानक सूख गई थी। तब सितंबर के दूसरे सप्ताह में पूर्वी सियांग जिले के पासीघाट शहर के लोगों ने पाया था । इससे पहले नौ जून 2000 को सियांग नदी का जल स्तर अचानक 30 मीटर उठ गया था और लगभग पूरा शहर डूब गया जिससे संपत्ति की व्यापक क्षति हुई थी. इसके अलावा तिब्बत में एक जलविद्युत बांध के ढह जाने से सात लोगों की मौत हो गयी थी।
सियांग नदी में यदि कोई गड़बड़ होती है तो अरूणाचल प्रदेश की बड़ी आबादी का जीवन संकट में आ जाता है। पीने का पानी, खेती, मछली पालन सभी कुछ इसी पर निर्भर हैं सबसे बड़ी बात सियंाग में प्रदूशण का सीधा असर ब्रह्मपुत्र जैसी विशाल नदी और उसके किनारे बसे सात राज्यों के जन-जीवन व अर्थ व्यवस्था पर पड़ता है। असम के लखीमपुर जिले में पिछले साल आई कीचड़ का असर आज देखा जा रहा है। वहां के पानी में आज भी आयरन की मात्रा सामान्य से बहुत अधिक पाई जा रही है।


तिब्बत राज्य में यारलुंग सांगपो नदी को शिनजियांग प्रांत के ताकलीमाकान की ओर मोड़ने के लिए चीन दुनिया की सबसे लंबी सुरंग के निर्माण की योजना पर काम कर रहा है।  हालांकि सार्वजनिक तौर पर चीन ऐसी किसी योजना से इनकार करता रहा है। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि चीन ने इस नदी को जगह-जगह रोक कर यूनान प्रांत में आठ जल विद्युत परियोजना प्रारंभ की हैं और कुल मिला कर इस नदी का सारा प्रवाह नियंत्रण चीन के हाथ में है। पिछले साल मई-2017 में चीन भारत के साथ सीमावर्ती नदियों की बाढ़ आदि के आंकड़े साझा करने से इंकार करचुका है। वह जो आंकड़े हमें दे रहा है वह हमारे कोई काम के ही नहीं हैं।
भले ही चीन सरकार के वायदों के आधार पर भारत सरकार भी यह इंकार करे कि चीन, अरूणाचल प्रदेश से सटी सीमा पर कोई खनन गतिविधि नहीं कर रहा है। लेकिन हांगकांग से प्रकाशित ‘‘साएथ चाईना मॉर्निंग पोस्ट’’ की एक ताजा रिपोर्ट बताती है कि चीन अरूणाचल प्रदेश से सटी सीमा पर भारी मात्रा में खनन कर रहा हीै क्योंकि उसे वहां चांदी व सोने के अयस्क के कोई 60 अरब डालर के भंडार मिले हैं। नदी में पानी गंदला होना या लहरें ऊंची होना जैसी अस्वाभावकि बातों का कारण चीन की ऐसी हरकतें भी हो सकता है। भारत सरकार को इस क्षेत्र में अपने खुफिया सूत्र विकसित कर चीन की जल-जंगल-जमीन से जुड़ी गतिविधियों पर नजर रखनी चाहिए, वरना जल-बम का असर परमाणु बम से भी भयंकर होगा।


बुधवार, 29 अगस्त 2018

climate change going dangerous for india




मानव के अस्तित्व पर संकट की आहट

पंकज चतुर्वेदी

इस बार केरल बरसात में बह गया। पिछले साल चेन्नई में यही हुआ था और उससे पहले साल कश्मीर में। देश का बड़ा हिस्सा सूखा रहता है और किसी एक जगह सारा पानी बरस जाता है। इसी साल 18 फरवरी को गत पांच सालों में सबसे गर्म दिन कहा गया था। दरअसल, मौसम एक दशक से समाज को तंग कर रहा है। हाल ही में अमेरिका की स्पेस एजेंसी नासा ने भी कहा है कि फरवरी में तापमान में अप्रत्याशित वृद्धि ने पूर्व के महीनों के रिकार्ड को तोड़ दिया है। आज तापमान में वृद्धि के रिकार्ड टूटने जा रहे हैं। 1951 से 1980 की तुलना में धरती की सतह और समुद्र का तापमान फरवरी में 1.35 सेल्सियस अधिक रहा है।



बदलाव को समझने के लिए भारत के आदिग्रंथ महाभारत के एक हिस्से को बांचते हैं। करीब पांच हज़ार वर्ष पूर्व के ग्रंथ महाभारत में ‘वनपर्व’ में महाराजा युधिष्ठिर मार्कण्डेय ऋषि से विनम्रतापूर्वक पूछते हैं— ‘महामुने, आपने युगों के अन्त में होने वाले अनेक महाप्रलय के दृश्य देखे हैं, मैं आपके श्रीमुख से प्रलयकाल का निरूपण करने वाली कथा सुनना चाहता हूं।’ इसमें ऋषि जवाब देते हैं— ‘हे राजन! प्रलय काल में सुगंधित पदार्थ नासिका को उतने गंधयुक्त प्रतीत नहीं होंगे। रसीले पदार्थ स्वादिष्ट नहीं रह जाएंगे। वृक्षों पर फल और फूल बहुत कम हो जाएंगे और उन पर बैठने वाले पक्षियों की विविधता भी कम हो जाएगी। वर्षाऋतु में जल की वर्षा नहीं होगी। ऋतुएं अपने-अपने समय का परिपालन त्याग देंगी। वन्य जीव, पशु-पक्षी अपने प्राकृतिक निवास की बजाय नागरिकों के बनाए बगीचों और विहारों में भ्रमण करने लगेंगे। संपूर्ण दिशाओं में हानिकारक जन्तुओं और सर्पों का बाहुल्य हो जाएगा। वन-बाग और वृक्षों को लोग निर्दयतापूर्वक काट देंगे।’ कृषि और व्यापार पर टिप्पणी करते हुए मार्कण्डेय ऋषि कहते हैं— ‘भूमि में बोये हुए बीज ठीक प्रकार से नहीं उगेंगे। खेतों की उपजाऊ शक्ति समाप्त हो जाएगी। लोग तालाब-चरागाह, नदियों के तट की भूमि पर भी अतिक्रमण करेंगे। समाज खाद्यान्न के लिए दूसरों पर निर्भर हो जाएगा।’

वे आगे कहते हैं— ‘हे राजन! एक स्थिति ऐसी भी आएगी कि जनपद जन-शून्य होने लगेंगे। चारों ओर प्रचण्ड तापमान संपूर्ण तालाबों, सरिताओं और नदियों के जल को सुखा देगा। लंबे काल तक पृथ्वी पर वर्षा होनी बंद हो जाएगी। प्रचण्ड तेज वाले सात सूर्य उदित होंगे और जो कुछ भी धरती पर शेष रहेगा, उसे वे भस्मीभूत कर देंगे।’
धरती की सतह का इस तरह गर्म होना चिंताजनक है और हालात मार्कण्डेय ऋषि द्वारा किए गये वर्णन की ही तरह हैं। तापमान के संतुलन बिगड़ने का अर्थ है हमारे अस्तित्व पर संकट। यह तो सभी जानते हैं कि 750 अरब टन कार्बन डाइआक्साइड वातावरण में मौजूद है। कार्बन की मात्रा बढ़ने का दुष्परिणाम है कि जलवायु परिवर्तन व धरती के गर्म होने जैसेे प्रकृतिनाशक बदलाव हम झेल रहे हैं। कार्बन की मात्रा में इजाफे से दुनिया पर तूफान, कीटों के प्रकोप, सुनामी या ज्वालामुखी जैसे खतरे मंडरा रहे हैं।

आज विश्व में अमेरिका सबसे ज्यादा 1,03,30,000 किलो टन कार्बन डाइआक्साइड उत्सर्जित करता है जो कि वहां की आबादी के अनुसार प्रति व्यक्ति 17.4 टन है। उसके बाद कनाडा प्रति व्यक्ति 15.7 टन, फिर रूस 12.6 टन है। भारत महज 20 लाख सत्तर हजार किलो टन या प्रति व्यक्ति महज 1.7 टन कार्बन डाइआक्साइड ही उत्सर्जित करता है। चूंकि भारत नदियों का देश है, वह भी अधिकांश ऐसी नदियां जो पहाड़ों पर बर्फ पिघलने से बनती हैं।


कार्बन उत्सर्जन की मात्रा कम करने के लिए हमें एक तो स्वच्छ ईंधन को बढ़ावा देना होगा। गरीब लोगों को बेहद कम दाम पर गैस उपलब्ध करवाना ही बड़ी चुनौती है। कार्बन उत्सर्जन घटाने में सबसे बड़ी बाधा वाहनों की बढ़ती संख्या, मिलावटी पेट्रो पदार्थों की बिक्री, घटिया सड़कें व ऑटो-पार्ट्स की बिक्री व छोटे कस्बों तक यातायात जाम होने की समस्या है। देश में बढ़ता कचरे का ढेर व उसके निपटान की माकूल व्यवस्था न होना भी कार्बन उत्सर्जन नियंत्रण की बड़ी बाधा है। साथ ही बड़े बांध, सिंचाई नहरों के कारण बढ़ते दल-दल भी कार्बन डाइआक्साइड पैदा करते हैं।

कार्बन की बढ़ती मात्रा से दुनिया के गर्म होने से उत्पन्न हालात से जूझना सारी दुनिया का फर्ज है, लेकिन भारत में मौजूद प्राकृतिक संसाधन व पारपंरिक ज्ञान इसका सबसे सटीक निदान है। छोटे तालाब, कुएं, पारंपरिक मिश्रित जंगल, खेती व परिवहन के पुराने साधन, कुटीर उद्योग का सशक्तीकरण कुछ ऐसे प्रयास हैं जो बगैर किसी मशीन या बड़ी तकनीक या फिर अर्थव्यवस्था को प्रभावित किए बगैर ही कार्बन पर नियंत्रण कर सकते हैं।
धरती के गर्म होने से सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं ग्लेशियर। ग्लोबल वार्मिंग या धरती का गर्म होना, कार्बन उत्सर्जन, जलवायु परिवर्तन से जूझने के तरीके भी बताया जाना अनिवार्य है।

गुरुवार, 23 अगस्त 2018

In Era of climate change, interlink of rivers should be rethink

नई चुनौतियां के परिपेक्ष्य में नदी जोड़ पर पुनर्विचार जरूरी
पंकज चतुर्वेदी

केरल में बरसात साल के आठ महीने होती है। वहां बादलों का स्थाई डेरा कहलाता है, लेकिन इस बार वहां जैसी बरसात हुई, वह ठीक उसी तरह थी जैसे कि दो साल पहले चैन्ने में और उससे पिछले साल कष्मीर में। जाहिर है कि जलवायु परिवर्तन का भयानक असर हिंदुस्तान में दिखने लगा है जिसके कारण अचानक किसी क्षेत्र विोश में भयंकर बरसात हो जाती है तो बाकी हिस्से सूखे रहते हैं या फिर मौसम का चक्र गड़बड़ा रहा है। जब बरसात की जरूरत हो तब गरमी होती है और ठंड के दिनों में गरमी। केरल बानगी है कि बड़े बांधों  में बरसात का पानी रोक  कर रखना मौसम के इस बैतुके मिजाज में तबाही ला सकता है। केरल के चार जिलों में भारी नुकसान का कारक बांधेंा के लबालब होने पर उनके मजबूरी में सभी दरवाजे खोलना था। यह हालात चेतावनी है उन परियोजनओं को जिनमें बड़े बांध बनाए जा रहे हैं।

सारी दुनिया जब अपने यहां कार्बन फुट प्रिंट घटानें को प्रतिबद्ध है वहीं भारत में नदियों को जोड़ने की परियोजना लागू की जा रही है। उसकी शुरूआत बुंदेलखंड से होगी जहां केन व बेतवा को जोड़ा जाएगा। असल में आम आदमी नदियें को जोड़ने का अर्थ समझता है कि किन्हीं पास बह रही पदो नदियों को किसी नहर जैसी संरचना के माध्यम से जोड़ दिया जाए , जिससे जब एक में पानी कम हो तो दूसरे का उसमें मिल जाए। पहले यह जानना जरूरी है कि असल में  नदी जोड़ने का मतलब है, एक विशाल  बांध और जलाशय  बनाना और उसमें जमा देानेां नदियों के पानी को नहरों के माध्यम  से  उपभोक्ता तक पहुंचाना। केन-बेतवा जोड़ योजना कोई 12 साल पहले जब तैयार की गई थी तो उसकी लगात 500 करोड के करीब थी, अभी वह कागज पर ही है और सन 2015 में इसकी अनुमानित लागत 1800 करोड़ पहुंच गई है। सबसे बड़ी बात जब नदियों को जोउ़ने की येाजना बनाई गई थी, तब देष व दुनिया के सामने ग्लोबल वार्मिंग, ओजोन क्षरण, ग्रीन हाउस इफेक्ट, जैसी चुनौतियां नहीं थीं और गंभीरता से देखें तो नदी जोड़ जैसी परियोजनाएं इन वैश्विक  संकट को और बढ़ा देंगी।
जलवायु परिवर्तन के कारण प्राकृतिक आपदा का स्वाद  उस बुंदेलखंड के लोग चख ही रहे है। जहां नदी जोड़ योजना लागू की जाना है। सूखे को तो वहां तीन साल में एक बार डेरा रहता ही है। लेकिन अब वहां बरसात का पेटर्न बिल्कुल बदल गया है। सावन तक सूखा फिर भाछों में किसी एक जगह पर इतनी बरसात की तबाही हो जाए। बरसात की त्रासदी इतनी गहरी है कि भले ही जल-स्त्रोत लबालब हो गए हैं लेकिन खेतों में बुवाई नहीं हो पाई और जहां हुई वहां बीज सड़ गए। ग्लोबल वार्मिंग से उपज रही जलवायु अनियमितता और इसके दुश्प्रभाव के प्रति सरकार व समाज में बैठे लोग कम ही वाकिफ या जागरूक हैं।  यह भी जान लें कि आने वाले दिनों यह संकट और गहराना है, खासकर भारत में इसके कारण मौसम के चरम रूप यानि असीम गरमी, भयंकर ठंड, बेहिसाब सूखा या बरसात।  प्रायः जिम्मेदार लोग यह कह कर पल्ला झाड़ते दिखते हैं कि यह तो वैष्विक  दिक्कत है और हम इसमें क्यों कर सकते हैं। फिर दिसंबर-2015 में पेरिस में संपन्न ‘जयवायु षिखर सम्मेलन’ में भारत के तत्कालीन पर्यावरण मंत्री श्री प्रकाष जावडेकर की वह प्रतिबद्धता याद करने की जरूरत है जिसमें उन्होंने आने वाले दस सालों में भारत की ओर से कार्बन उत्सर्जन घटाने का आष्वासन दिया था।
‘‘नदियों का पानी समुद्र में ना जाए, बारिष  में लबालब होती नदियां गांवेंा -खेतों में घुसने के बनिस्पत ऐसे स्थानों की ओर मोड़ दी जाए जहां इसे बहाव मिले तथा समय- जरूरत पर इसके पानी को इस्तेमाल किया जा सके ’’ - इस मूल भावना को ले कर नदियों को जोड़ने के पक्ष में तर्क दिए जाते रहे हैं । लेकिन यह विडंबना है कि केन-बेतवा के मामले में तो ‘‘ नंगा नहाए निचोडै़ क्या’ की लोकोक्ति सटीक बैठती है । केन और बेतवा दोनों का ही उदगम स्थल मध्यप्रदेष में है । दोनो नदियां लगभग समानांतर एक ही इलाके से गुजरती हुई उत्तर प्रदेष में जा कर यमुना में मिल जाती हैं । जाहिर है कि जब केन के जल ग्रहण क्षेत्र में अल्प वर्शा या सूखे का प्रकोप होगा तो बेतवा की हालत भी ऐसी ही होगी । तिस पर 1800 करोड़(भरोसा है कि जब इस पर काम षुरू होगा तो यह 22 करोड़ पहुंच जाएगा) की येाजना ना केवल संरक्षित वन का नाष, हजारों लेागेां के पलायन का करक बन रही है, बल्कि इससे उपजी संरचना दुनिया का तापमान बढ़ाने का संयत्र बन जाएगा।
नेषनल इंस्टीट्यूट फार स्पेस रिसर्च(आईएनपीसी), ब्राजील का एक गहन षोध है कि दुनिया के बड़े बांध हर साल 104 मिलियन मेट्रीक टन मीथेन गैस का उत्सर्जन करते हैं और यह वैष्विक तापमान में वृद्धि की कुल मानवीय योगदान का चार फीसदी है। सनद रहे बड़े जलाषय, दलदल बड़ी मात्रा में मीथेन का उत्सर्जन करती है। ग्लोबल वार्मिंग के लिए ज़िम्मेवार  माने जाने वाली गैसों को ग्रीन हाउस या हरितगृह गैस कहते हैं। इनमें मुख्य रूप से चार गैस- कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड और सल्फ़र हेक्साफ़्लोराइड, तथा दो गैस-समूह- हाइड्रोफ़्लोरोकार्बन और परफ़्लोरोकार्बन शामिल हैं।ग्रीन हाउस गैसों के अत्यधिक उत्सर्जन से वायुमंडल में उनकी मात्रा निरंतर बढ़ती ही जा रही है। ये गैसें सूर्य की गर्मी के बड़े हिस्से को परावर्तित नहीं होने देती हैं, जिससे गर्मी की जो मात्रा वायुमंडल में फंसी रहती है, उससे तापमान में वृद्धि हो जाती है। पिछले 20 से 50 वर्षों में वैश्विक तापमान में करीब एक डिग्री सेंटीग्रेड की वृद्धि हो चुकी है। केन-बेतवा नदी को जोड़ने के लिए छतरपुर जिले के ढोढन में 77 मीटर उंचा और 2031 मीटर लंबाई का बंध बनाया जाएगा। इसके अलावा 221 किलोमीटर लंबी नहरें भी बनेंगी। इससे होने वले वनों के नाष और पलायन को अलग भी रख दें तो भी निर्माण, पुनर्वास आदि के लिए जमीन तैयार करने व इतने बड़े बांध व नहरों से इतना दलदल बनेगा और यह मीथेन गैस उत्सर्जन का बड़ा कारध बनेगा। भारत आज कोई तीन करोड़ 35 लाख टन मीथेन उत्सर्जन करता है व हमारी सरकार अंतरराश्ट्रीय स्तर पर इसे कम करने के लिए प्रतिबद्ध है।
इस परियोजना का सबस बड़ा असर दुनियाभर में मषहूर तेजी से विकसित बाघ क्षेत्र के नुकसान के रूप् ेमं भी होगा, पन्ना नेषनल पार्क का 41.41 वर्ग किलोमीटर वह क्षेत्र पूरी तरह जलमग्न हो जएगा, जहां आज 30 बाघ हैं । सनद रहे सन 2006 में यहां बाघेां की संख्या षून्य थी। अकेले बाघ का घरोंदा ही नहीं जंगल के 33 हजार पेड़ भी काटे जाएंगे। यह भी जान लें कि इतने बड़े हजरों पेड़े तैयार होने में कम से कम आधी सदी का समय लगेगा। जाहिर है कि जंगल कटाई व वन का नश्ट होना, जलवायु परिवर्तन को प्रभावित करने दवाले कारक हैं। यही नहीं जब यह परियोजना बनाई गई थी, तब बाघ व जंगली जानवर कोई विचारणीय मसले थे ही नहीं, जबकि आज दुनिया के सामने जैवविविधता संरक्षण एक बड़ी चुनौती है।
राट्रीय जल संवर्धन प्राधिकरण के दस्तावेज बताते हैं कि भारत में नदी जोड़ों की मूलभूत योजना सन 1850 में पहली बार सर आर्थर कॉटन ने बनाई थी फिर सन 1972 में डा. के.एल. राव ने गंगा कावेरी जोड़ने पर काम किया था। सन 1978 में केप्टन डास्टर्स का गार्लेंड नहर योजना पर काम हुआ और सन 1980 में नदी जोड़ का राश्ट्रीय परिदृष्य परियोजना तैयार हुई। आज देष में जिन परियोजनाओं पर विचार हो रहा है उसका आधार वही सन 1980 का दस्तावेज हैं। जाहिर है सन 1980 में जलवायु परिवर्तन या ग्रीनहाउस गैसों की कल्पना भी नहीं हुई थी। कहने की जरूरत नहीं है कि यदि इस योजना पर काम षुरू भी हुआ तो कम से कम एक दषक इसे पूरा होने में लगेगा व इस दौरान अनियमित जलवायु, नदियों के अपने रास्ता बदलने की त्रासदियां और गहरी होंगी।
ऐसे में जरूरी है कि सरकार नई वैष्विक परिस्थितियों में नदियों को जोड़ने की योजना का मूल्यांकन करे। सबसे बड़ी बात इतने बड़े पर्यावरणीय नुकसान, विस्थापन, पलायन और धन व्यय करने के बाद भी बुंदेलखंड के महज तीन से चार जिलों को मिलेगा क्या? इसका आकलन भी जरूरी है। इससे एक चौथाई से भी कम धन खर्च कर समूचे बुंदेलखंड के पारंपरिक तालाब, बावड़ी कुओं और जोहड़ों की मरम्म्त की जा सकती है। सिकुड़ गई छोटी नदियों को उनके मूल स्वरूप् में लाने के लिए काम हो सकता है। गौर करें कि अं्रगेजों के बनाए पांच बांध 100 साल में दम तोड़ गए हैं, आजादी के बाद बने तटबंध व स्टाप डेम पांच साल भी नहीं चले, लेकिन समूचे बुंदेलखंड में एक हजार साल पुराने चंदेलकालीन तालाब, लाख उपेक्षा व रखरखाव के अभाव के बावजूद आज भी लेागों के गले व खेत तर कर रहे हैं। उनके आसपास लगे पेड़ व उसमें पल रहे जीव स्वयं ही उससे निकली मीथेन जैसी ग्रीन हाउस गैसों का षमन भी करते हैं।

सोमवार, 20 अगस्त 2018

Kerala needs long term planning for flood relief

केरल को तत्काल राहत की दरकार





युद्ध हो, भूकंप या बाढ़ या फिर किसी भी अन्य प्रकार की प्राकृतिक आपदा, भारत के नागरिकों की खासियत है कि ऐसे दुर्भाग्यपूर्ण अवसरों पर उनके हाथ पीड़ितों की मदद व सहयेाग के लिए हर समय खुले रहते हैं। छोटे-छोटे गांव-कस्बे तक आम लोंगों से इमदाद जुटाने के कैंप लग जाते हैं, गली-गली लोग झोली फैला कर घूमते हैं, अखबारों में फोटो छपते हैं कि मदद के ट्रक रवाना किए गए। फिर कुछ दिनों बाद आपदा ग्रस्त इलाकों के स्थानीय व राज्य प्रशासन की लानत-मनानत करने वाली खबरें भी छपती हैं कि राहत सामग्री लावारिस पड़ी रही और जरूरतमंदों तक पहुंची ही नहीं। हो सकता है कि कुछ जगह ऐसी कोताही भी होती हो, लेकिन वास्तविकता तो यह है कि आम लोगों को यही पता ही नहीं होता है कि किस आपदा में किस समय किस तरह की मदद की जरूरत है। उदाहरण के लिए बीते वर्षाें आए अब बिहार के जल प्लावन को ही लें तो देशभर में कपड़ा-अनाज जोड़ा जा रहा है, और दीगर वस्तुएं जुटाई जा रही हैं, पैसा भी। भले ही उनकी भावना अच्छी हो लेकिन यह जानने का कोई प्रयास नहीं कर रहा है कि आज वहां तत्काल किस चीज की जरूरत है और आने वाले महीनों या साल में कब क्या अनिवार्य होगा।1समुद्र तट पर बसे केरल में बीते एक सदी की सबसे भयानक जल-त्रसदी है यह और शायद भारत का सबसे बड़ा राहत अभियान भी। करीब दस लाख लोग 6,000 से अधिक राहत शिविरों में रह रहे हैं। राज्य की करीब 16,000 किलोमीटर सड़क व 164 से ज्यादा पुल पूरी तरह नष्ट हो गए हैं। सेना और अन्य सुरक्षा बलों के एक लाख से ज्यादा जवान 24 घंटे राहत कार्य में लगे हैं। 1चूंकि केरल की बड़ी आबादी विदेश में है अत: समूचे विश्व से राहत सामग्री भी आ रही है। अलप्पुझा, एर्नाकुलम और त्रिशुर जिलों में सड़कें, रेलवे-पथ, पुल, सरकारी स्कूल व भवन सब कुछ तबाह हो गया है। कई हजार हेक्टेयर खेत बर्बाद होने से किसान की तबाही का आंकड़ा तो अकल्पनीय है। कई हजार वर्ग किलोमीटर का इलाका ऐसा है जहां आने वाले कई महीनों तक पानी व उसके साथ आई रेत और गाद जमा रहेगी। जब बारिश थमी है तो उन गलियों-मुहल्लों में भरे पानी को निकालना, कीचड़ हटाना, मरे हळ्ए जानवरों और इंसानों का निस्तारण करने के साथ समग्र साफ-सफाई करना सबसे बड़ा काम है और यह सबसे बड़ी चळ्नौती भी है। 1चळ्नौती इसलिए क्योंकि इसके लिए तत्काल जरूरत है पानी के बड़े पंपों की, जेसीबी मशीन, टिप्पर व डंपर की, ईंधन की, गेती-फावड़ा दस्ताने, गम बूट आदि की। जब तक गंदगी, मलबा और गंदा पानी इस इलाके से हटेगा नहीं, तब तक जीवन को फिर से पटरी पर लाना मुश्किल है। यह भी तय है कि किसी भी सरकारी सिस्टम में इतनी भारी व महंगी मशीनों को तत्काल खरीदना संभव नहीं होता। यदि समाज के लोग इस तरह के औजार-उपकरण खरीद कर राज्य सरकार को भेंट स्वरूप दें तो पुनर्वास कार्य सही दिशा में चल पाएंगे और एक समयसीमा के दायरे में इन कार्यों को अंजाम देते हळ्ए बड़ी आबादी की जिंदगी को व्यवस्थित किया जा सकता है। 1पानी में फंसे लोगों के लिए भोजन तो जरूरी है ही और उसकी व्यवस्था स्थानीय सरकार व कई जन संगठन कर भी रहे हैं, लेकिन इस बात पर कम ध्यान है कि वहां पीने के लिए साफ पानी की बहुत कमी है। आसपास एकत्र हळ्आ पानी बदबूदार है। दूसरी ओर राज्य के सभी वाटर ट्रीटमेंट प्लांट बंद पड़े हैं और यदि ऐसे में गंदा पानी पीया तो हैजा फैलने की आशंका रहेगी। लाखों बोतल पेयजल की रोज की मांग के साथ-साथ बिना बिजली के चलने वाले वाटर फिल्टर, बड़े आरओ, बैटरी, इन्वर्टर व आम लोगों के लिए मोमबत्तियां व माचिस की वहां बेहद जरूरत है। कारण वहां बिजली की सप्लाई सामान्य करने में बहुत सी बाधाएं हैं। बिजली के तार- खंभे, इंसुलेटर आदि विभिन्न तकनीकी चीजों की जरूरत तो है ही और उसे भी स्थापित करने के लिए अधिक कामगारों की जरूरत है। हालांकि ये सब ऐसे तकनीकी काम हैं जिनमें अभी महीनों लग सकते हैं। ऐसे में छोटे जेनरेटर और इन्वर्टर बेहद महत्वपूर्ण भूमिका में हो सकते हैं।1ऐसा नहीं है कि बड़ी व्यवस्थाएं जुटाने के लिए आम पीड़ित लोगों का ध्यान ही नहीं रखा जाए। हजारों लोग ऐसे हैं जो मधुमेह, ब्लड प्रेशर, थायरायड जैसी ऐसी बीमारियों से पीड़ित हैं जिन्हें नियमित दवाई लेना होता है और बाढ़ उनकी सारी दवा बहा कर ले गई है। इसके अलावा अपना सबकुछ लुटने का दर्द और राहत शिविरों की सीमित व्यवस्था के चलते मानसिक रूप से अव्यवस्थित लोगों की संख्या भी बढ़ रही है। इन लोगों के लिए उनकी नियमित दवाएं, पीने के पानी की बोतलें, डेटॉल, फिनाईल, नेफथेलीन की गोलियां, क्लोरिन की गोलियां, पेट में संक्रमण, बुखार जैसी बीमारियों की दवाएं, ग्लूकोज पाउडर, सेलाईन, औरतों के लिए सेनेटरी नैपकीन, फिलहाल तत्काल जरूरत की चीजें हैं। अब यदि आम लोग अपने घर के पुराने ऊनी कपड़ों की गठरियां या गेंहू चावल आदि वहां भेजेंगे तो तत्काल उसका इस्तेमाल हो नहीं पाएगा। वैसे भी केरल में इतना जाड़ा कभी होता नहीं कि ऊनी कपड़े पहनने की नौबत आए। इसकी जगह वहां चादर, हल्के कंबल भेजे जाएं तो उन वस्तळ्ओं का तत्काल उपयोग हो सकता है। वरना भेजे गए बंडल लावारिस सड़ते रहेंगे और हरी झंडे दिखा कर फोटो खिंचाने वाले लोग हल्ला करते रहेंगे कि मेहनत से जुटाई गई राहत सामग्री राज्य सरकार इस्तेमाल नहीं कर पाई। यदि हकीकत में ही कोई कुछ भेजना चाहता है तो सीमेंट, लोहा जैसी निर्माण सामग्री के ट्रक भेजने के संकल्प लेना होगा।1केरल के आंचलिक गांवों से ढाई लाख लोग अपने घर से पूरी तरह विस्थापित हुए हैं। वहां के बाजार बह गए हैं। वाहन नष्ट हो गए हैं। ऐसे में हुए जान-माल के नुकसान के बीमा दावों का तत्काल व सही निबटारा एक बड़ी राहत होता है। चूंकि राज्य सरकार का बिखरा-लुटा-पिटा अमला अभी खुद को ही संभालने में लगा है, अभी तक राज्य सरकार का अनुमान है कि नदियों के रौद्र रूप ने राज्य को 10,787 करोड़ रुपये का नुकसान कर दिया है। 1नुकसान के आकलन, दावों को प्रस्तुत करना, बीमा कंपनियों पर तत्काल भुगतान के लिए दबाव बनाने आदि कार्यों के लिए बहुत से पढ़े-लिखे लोगों की वहां जरूरत है। ऐसे लोगों की भी जरूरत है जो दूरदराज में हुए माल-असबाब के नुकसान की सूचना, सही मूल्यांकन को सरकार तक पहुंचा सकें और यह सुनिश्चित कर सकें कि केंद्र या राज्य सरकार की किन योजनाआंे का लाभ उन्हें मिल सकता है। 1कई जिलों में बाढ़ का पानी तो उतर रहा है लेकिन वहां अपने जीवन को फिर से पटरी पर लाने की समस्या सामने आ खड़ी हुई है।1सरकार कहती है कि राहत का पैसा बैंक खाते में जाएगा और उसी खाते में जाएगा जिसके पास आधार कार्ड है। इसके लिए अभी तो फॉर्म भरा जाएगा। जिसका घर व सामान सबकुछ बाढ़ में बह गया, उसके पास आधार तो होने से रहा, फिर जब भूख आज लगी है तो राहत का एक महीने बाद मिला पैसा किस काम का? ऐसे में लोगों को उनकी पहचान के कागजात उपलब्ध कराने के कार्य के लिए ढेर सारे स्वयंसेवकों को आगे आना होगा, जबकि दिल्ली या अन्य शहर में बैठ कर उनके डुप्लीकेट आधार आदि कंप्यूटर से निकाल कर उन तक पहुंचा सकें। 

एक महीने के भीतर जब हालात कुछ सुधरेंगे तो स्कूल व शिक्षा की याद आएगी और तब पता चलेगा कि सैलाब में स्कूल, बच्चों के बस्ते, किताबें सब कुछ बह गया है। इस समय कोइ दो लाख बच्चों को बस्ते, कापी-किताबों, पैंसिल, पुस्तकों की जरूरत है। 

इस बार यदि ईद, दीपावली या क्रिसमस के तोहफों में हर घर से यदि एक-एक बच्चे के लिए बस्ता, कंपास, टिफिन बॉक्स, वाटर बोटल, पांच नोट बुक, पेन-पैंसिल का सेट वहां चला जाए तो केरल के भविष्य के सामने छाया धुंधलका छंटने की संभावनाएं बढ़ जाएंगी। वहां की पाठ्य पुस्तकों को फिर से छपवाना पड़ेगा, ब्लेक बोर्ड व फर्नीचर बनवाना पड़ेगा। इसके लिए राज्य के छोटे-छोटे क्लस्टर में, मुहल्लों में संस्थागत या निजी तौर पर बच्चों के लिए काम करने की जरूरत है। इसके साथ उनके पौष्टिक आहार के लिए बिस्किट, सूखे मेवे जैसे खराब न होने वाले भोच्य पदार्थ की मांग वहां है।1यदि आवश्यकता के अनुरूप दान या मदद न हो तो यह समय व संसाधन दोनों का नुकसान ही होता है। यह सही है कि हमारे यहां आज तक इस बात पर कोई दिशा-निर्देश बनाए ही नहीं गए कि आपदा की स्थिति में किस तरह की तात्कालिक तथा दीर्घकालिक सहयोग की आवश्यकता होती है। असल में यह कोई दान या मदद नहीं है, हम एक मुल्क का नागरिक होने का अपना फर्ज अदा करने के लिए अपने संकटग्रस्त देशवासियों के साथ खड़े होते हैं। ऐसे में यदि हम जरूरत के मुताबिक काम करें तो हमारा सहयोग सार्थक होगा। 1जलवायु परिवर्तन व प्रकृति के साथ छेड़छाड़ से यह तो तय है कि आने वाले दिनों में देशभर में लोगों को कई किस्म की प्राकृतिक विपदाओं का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे में जिस तरह आपदा प्रबंधन के लिए अलग से महकमे बनाए गए हैं, वैसे ही इस तरह के हालात से निबटने के लिए जरूरी सामान को देशवासियों से एकत्र करने का काम पूरे साल करना चाहिए।

केरल में हालिया बाढ़ ने वहां लोगों की जिंदगी तबाह कर दी है। केवल सरकार के भरोसे लाखों लोगों की जिंदगी को पटरी पर लाना बहुत मुश्किल है। इसलिए बतौर नागरिक हमें भी आगे आना होगा। साथ ही यह भी समझना होगा कि वहां तत्काल किस तरह की मदद की जरूरत है और उसेकिस तरह से पूरा किया जा सकता है। इससे सबक यह भी लेने की जरूरत है कि भविष्य में आपदा के बाद राहत के लिए इंतजाम पहले से तैयार रखने होंगे1


पश्चिमी घाट में केरल सर्वाधिक संवेदनशील


जाने-माने वैज्ञानिक डॉ. माधव गाडगिल ने केरल में आई बाढ़ को मानव-जनित त्रसदी के रूप में करार दिया है। दअरसल, वन एवं पर्यावरण मंत्रलय ने दक्षिण भारत के पश्चिमी घाट इलाके में पारिस्थितिकी के संदर्भ में प्रसिद्ध वैज्ञानिक माधव गाडगिल के नेतृत्व में वर्ष 2010 में एक एक्सपर्ट पैनल का गठन किया था। मौजूदा संकट की आशंका जताते हळ्ए उन्होंने उसी समय सरकार को आगाह किया था। उस समय प्रस्तळ्त की गई अपनी रिपोर्ट में उन्होंने सरकार को इस बारे में आगाह किया था कि पश्चिमी घाट इलाके की पारिस्थितिकी व्यापक रूप से नाजळ्क है और यहां किसी तरह की छेड़छाड़ करना भविष्य में खतरनाक साबित हो सकता है। रिपोर्ट में कहा गया कि छह राज्यों के बीच फैले पश्चिमी घाट में केरल का इलाका सर्वाधिक संवेदनशील है। 1इस इलाके में जारी विविध विकास कायरें को विशेषज्ञों के सलाह से अंजाम दिए जाने पर जोर दिया गया था। लेकिन उसका अनळ्पालन नहीं किया गया, जिसका गंभीर नतीजा आज लोगों को भळ्गतना पड़ रहा है। पर्यावरण मंत्रलय ने पश्चिमी घाट में 57,000 वर्ग किमी इलाके को संवेदनशील घोषित करते हळ्ए इसमें किसी भी प्रकार के निर्माणकार्य पर रोक लगाने को कहा था, जिसमें यहां चल रही खनन गतिविधियों, बड़े निर्माणों समेत थर्मल पावर प्लांट और प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों पर पूर्णतया पाबंदी लगाने की बात की थी।

शुक्रवार, 10 अगस्त 2018

Justice delayed is justice denied

सावधान ! यह चेतावनी न्यायपालिका के लिए भी है 

पंकज चतुर्वेदी

दिल्ली से सटे गाजियाबाद में बीते एक सप्ताह से वकील अदालत में काम नहीं कर रहे हैं। अनुमान है कि हर दिन 100 से अधिक मामले फैसले के लिए टलते जा रहे हैं, जमानत और मामूली धारा वाले मामलों को तो कोई ध्या नही नहीं रख रहा। कोई वकील साहब ढाबे में खाना खा रहे थे और गरम रोटी देने को लेर विवाद हुआ। पुलिस वालों ने वकील साहब को पीट दिया, उसके बाद वकील हाथों में डंडे ले कर पुलिस अकप्तान के पास पहुंच गए, रास्ता जाम किया। उसके बाद पुलिस ने वकीलों पर लाठी चला दी। वकील सिटी एसपी पर कार्यवाही के लिए अड़े हैं। इस तरह देखते ही देखते कुछ हजार प्रकरणों का बोझ यहां दिन दुगना-रात चौगुना हो रहा है। देष के 6़00 से अधिक जिला अदालतों में ऐसी घटनाएं होती ही रहती हैं  और न्याय का मंदिर पेंडिंग मामलों का अंबार बनता जाता है। बीते एक साल में तीन बार देष की सर्वोच्च अदालत के मुख्य न्यायाधीष ने सरकार से अदालतों में बढते मुकदमे के बोझ तथा जजों की कमी पर गंभीरता से गौर करने के लिए सार्वजनिक बयान दिया है। देष की सबसे बड़ी अदालत- सुप्रीम कोर्ट , लंबित मामलों की संख्या 54,864, हाई कोर्ट - पेंडिंग मुकदमें - 40 लाख साठ हजार 709। देश में सर्वाधिक मामले निचली अदालतों में लंबित है, जहां इनकी संख्या करीब पौने तीन करोड़ है। यदि इसी गति से मुकदमों का निबटान होता रहा तो 320 साल चाहिए।इस बीच अदालतों में भ्रश्टाचार का मामला भी खूब उछल रहा है।  दूसरी तरफ आए रोज ऐसे मामले सामने आ रहे हैं जिसमें षिक्षित लोग कानून अपने हाथेां में ले कर खुद ही न्याय करना चाहते हैं। लोकतंत्र में न्याय व्यवस्था तीसरा स्तंभ है और उसकी ऐसी जर्जर हालत पूरे तंत्र को कमजोर कर रही है। ऐसे में अदालतों के सामाजिक सरोकार पर विचार होना जरूरी है।
यदि विधि मंत्रालय के आंकड़ों पर ही भरोसा करें तो हमारे यहां आबादी की तुलना में न्यायाधीशों का अनुपात प्रति 10 लाख पर 17.86 न्यायाधीशों का है। मिजोरम में यह अनुपात सर्वाधिक है। वहां प्रति 10 लाख पर 57.74 न्यायाधीश हैं। दिल्ली में यह अनुपात 47.33 है और देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में प्रति 10 लाख आबादी पर मात्र 10.54 न्यायाधीश हैं। पश्चिम बंगाल में न्यायाधीशों का यह अनुपात सबसे कम है। वहां प्रति 10 लाख की आबादी पर सिर्फ 10.45 न्यायाधीश हैं। कोई भी जज हर साल 2600 से ज्यादा मुकदमों का निबटारा नहीं कर पाता , जबकि नए दर्ज मालों की संख्या इससे कहीं अधिक होती है। दरअसल, ऊपरी अदालतों में न्यायाधीशों की संख्या संसद द्वारा कानून बनाकर ही बढ़ाई जा सकती है। विडंबना तो यह है कि काम के बोझ को देखते हुए नई नियुक्तियां तो हो नहीं रहीं, हां कुल स्वीकृत पदों पर भी जज आसीन नहीं है। देश के 24 उच्च न्यायालयों में फिलहाल 43 फीसद नियुक्तियां खाली पड़ी हैं। जहां इन अदालतों में जजों की संख्या 1044 होनी चाहिए थी, वहीं अभी यह संख्या केवल 599 है। सर्वाेच्च न्यायलय में 3 पद रिक्त हैं। इन रिक्तियों के बढ़ने का एक कारण एनजेएसी के गठन पर विवाद भी रहा, क्योंकि जब तक यह मामला लंबित रहा, तब तक कोई भी नियुक्ति नहीं हुई और जब कोलेजियम प्रणाली बहाल कर दी गई, तब भी समन्वय की कमी के चलते नियुक्तियां लटक जाती हैं। सर्वाेच्च न्यायलय में 2008 के संशोधन अधिनियम के द्वारा संख्या बढाकर 30 कर दी गई थी, लेकिन वर्तमान में सर्वाेच्च न्यायलय में 27 न्यायाधीश ही नियुक्त हैं, हालांकि पिछले कुछ समय से सर्वाेच्च अदालत पर मुकदमों का बोझ कम करने के लिए एक राष्ट्रीय अपील न्यायालय के गठन पर विचार चल रहा है, लेकिन यदि इस अपीलीय न्यायलय का गठन किया गया तब भी अतिरिक्त न्यायाधीशों की नियुक्ति करनी होगी।


देष की सड़कों पर आए रोज अपराध होने के बाद न्याय दिलवाने के लिए सड़कों पर गुस्सा भले ही महज पुलिस या व्यवस्था का विरोध नजर आ रहा हो, हकीकत में यह हमारी न्याय व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती है - लोग अब महसूस कर रहे हैं कि देर से मिला न्याय अन्याय के बराबर ही है। यह बात भी लोग अब महसूस कर रहे हैं कि हमारी न्याय व्यवस्था में जहां अपराधी को बचने के बहुत से रास्ते खुले रहते हैं , वहीं पीड़ित की पीड़ा का अनंत सफर रहता है। हाल ही में देष की सुप्रीम कोर्ट ने हमारी आपराधिक न्याय प्रणाली पर ही सवाल खड़े करते हुए कहा है कि  निचली अदालतों के दोशी को दी जाने वाली सजा के निर्धारण के लिए कोई विधायी या न्यायिक दिषा-निर्देष ना होना हमारी न्याय प्रणाली की सबसे कमजोर कड़ी है। कई मामाले पहले दस साल या उससे अधिक निचली अदालत में चलते हैं फिर उनकी अपील होती रहती है। कुछ मिला कर एक उम्र बीत जाती है, न्याय की आस में वहीं लंपट और पेष्ेावर अपराधी न्याय व्यवस्था की इस कमजोरी का फायदा उठा कर कानून से बैखोफ बने रहते हैं।

भले  ही हमारी न्याय व्यवस्था में लाख खामियां हैं, अदालतों में इंसाफ की आस कभी-कभी जीवन की संास से भी दूर हो जाती है । इसके बावजूद देश को विधि सममत तरीके से चलाने के लिए लोग अदालतों को उम्मीद की आखिरी किरण तो मानते ही हैं । बीते कुछ सालों से देष में जिस तरह अदालत के निर्देशों पर सियासती दलों का रूख देखने को मिला हैै, वह न केवल शर्मनाक है, बल्कि इससे संभावना जन्म लेती है कि कहीं पूरे देश का गणतंत्रात्मक ढ़ांचा ही पंगु न हो जाए ।
यह विडंबना है कि देष का बहुत बड़ा तबका थोडे़ से भी न्याय की उम्मीद न्यायपालिका से कर ही नहीं पाता है। गरीब लोग तो न्यायालय तक पहुंच ही नहीं पाते। इसकी औपचारिकताओं और जटिल प्रक्रियाओं के कारण केवल वकीलों द्वारा ही न्यायालय में बात कही जा सकती है, लेकिन गरीब लोग वकीलों की बड़ी-बड़ी फीसें नहीं दे सकते, वे न्याय से वंचित रह जाते हैं। जो कुछ लोग न्यायालय तक पहुंच पाते हैं उन्हें यह उम्मीद नहीं होती कि एक निष्चित समयावधि में उनके विवाद का निपटारा हो पाएगा। मुकदमे के निर्णय में जितने समय की सजा दी जाती है उससे ज्यादा समय तो मुकदमों की सुनवाई में ही लग जाता है। अगर इस दौरान मुवक्किल जेल से बाहर हुआ तो इस सारे मुकद्मे के दौरान अपने को बचाने की कवायद की परेषानी और सजा से ज्यादा खर्चे और जुर्माना ही कष्टदायी हो जाता है। पुलिस और प्रभावषाली लोग न्यायिक प्रक्रिया को और भी ज्यादा दूरूह बना रहे हैं क्योंकि प्रभावषाली लोग पुलिस को अपने इषारों पर नचाते हैं और उन लोगों को डराने धमकाने और चुप कराने के लिए पुलिस का इस्तेमाल करते हैं जो अत्याचारी और षोषणपूर्ण व्यवस्था को बदलने का प्रयास कर रहे हैं। एक तरफ न्याय प्रक्रिया जटिल है तो दूसरी ओर वकील या अदालतों पर कोई जिम्मेदारी या समयबद्धता का दवाब नहीं है। देषभर की अदालतों में वकील साल में कई दिन तो हडताल पर ही रहते हैं, यह जाने बगैर कि एक पेषी चूकने से उनके मुवक्किल की न्याय से दूरी कई साल की बढ़ जाती है। यह भी कहना गलत ना होगा कि बहुत से मामलों में वकील खुद ज्यादा पेषी की ज्यादा फीस के लालच में केस को खींचते रहते हैं।

देष की बड़ी और घनी आबादी, भाशाई, सामाजिक और अन्य विविधताओं को देखते हुए मौजूदा कानून और दंड देने की प्रक्रिया पूरी तरह असफल रही है। ऐसे में कुछ सिनेमा याद आते हैं- 70 के दषक में एक फिल्म में हत्या के लिए दोशी पाए गए राजेष खन्ना को फरियादी के घर पर देखभाल करने के लिए रखने पर उसका ह्दय परिवर्तन हो जाता है। अभिशेक बच्चन की एक फिल्म में बड़े बाप के बिगड़ैल युवा को एक वृद्धाश्रम में रह कर बूढ़ों की सेवा करना पड़ती है।  वैसे पिछले साल दिल्ली में एक लापरवाह ड्रायवर को सड़क पर खड़े हो कर 15 दिनों तक ट्राफिक का संचालन करने की सजा वाला मामला भी इसी श्रंखला में देखा जा सकता है, लेकिन दुर्भाग्य कि ऐसी व्यावहारिक सजा को बाद में बड़ी अदालत ने कानूनसम्मत ना मानते हुए रोक लगा दी थी। मोटर साईकलों पर उपद्रव काटने वाले सिख युवकों को कुछ दिनों के लिए गुरूद्वारे में झाड़ू-पोंछा करने का सजा की भी समाज में बेहद तारीफ हुई थी।
क्या यह वक्त नही आ गया है कि लिखे कानून के बनिस्पत सुधार के लिए जरूरी कदमों या अपराध-निवारण को अपनाया जाए ? आज की न्यायीक व्यवस्था बेहद महंगी, डरावनी, लंबी खिंचने वाली है। गरीब लोग तो अदालतों की प्रक्रिया में सहभागी ही नहीं हो पाते हैं। उनके लिए न्याय की आस बेमानी है। साक्ष्य अधिनियम को सरल बनाना, सात साल से कम सजा वाले मामालों में सयब़ नीति बनाना, अदालतों में बगैर वकील की प्रक्रिया को प्रेरित करना, हडताल जैसी हालत में तारीख आगे बढत्राने की जगह वकील को दंडित करना जैसे कदम अदालतों के प्रति आम आदमी के विष्वास को बहाल करने में मददगार हो सकते हैं। ऊंची फीस लेने वाले वकीलों का एक वर्ग ऐसी सिफारिषों को अव्यावहारिक और गैरपारदर्षी या असंवदेनषील करार दे सकता है, लेकिन देषभर में सड़कों पर उतरे लोगों की भावना ऐसी ही है और लोकतंत्र में जनभावना ही सर्वोपरि होती है।
पंकज चतुर्वेदी
यू जी-1, 3/186 राजेन्द्र नगर, सेक्टर-2
साहिबाबाद, गाजियाबाद
201005
गाजियाबाद 201005




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