My writings can be read here मेरे लेख मेरे विचार, Awarded By ABP News As best Blogger Award-2014 एबीपी न्‍यूज द्वारा हिंदी दिवस पर पर श्रेष्‍ठ ब्‍लाॅग के पुरस्‍कार से सम्‍मानित

बुधवार, 11 जनवरी 2023

Tragedy of the Himalayas sinking in religion, business and politics. Joshimath is not alone, many more are sinking

 धर्म , धंधे और सियासत में धंसते हिमालय की त्रासदी
अकेले जोशीमठ ही नहीं, बहुत से कसबे धंस रहे हैं

पंकज चतुर्वेदी



छः  जनवरी 2023 को जब उत्तराखंड राज्य सरकार के आपदा सचिव रंजित सिन्हा के नेतृत्व में वैज्ञानिक, इंजीनियर आदि की टीम जोशीमठ का निरिक्षण करने पहुंची तब तक बहुत देर  हो चुकी थी . जिन पहाड़ों , पेड़ों, नदियों ने पांच हज़ार् साल  से अधिक तक मानवीय सभ्यता, आध्यात्म, धर्म, पर्यावरण को विकसित होते देखा था, वह बिखर चुके थे . न सडक बच  रही है न मकान . न ही नदी की किनारे .सरकार ने भी कह दिया कि जोशीमठ को खाली करना होगा,अस्थाई आसरे और  चार हज़ार रूपये महीने के मुआवजे की घोषणा  हुई है लेकिन इन हज़ारों लोगों के जीवकोपार्जन का क्या होगा ?  आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित  स्थान, मूल्य और संस्कार का क्या होगा ? आंसुओं  से भरे चेहरे और आशंकाओं से भरे दिल  अनिश्चितता  और आशंका के बीच त्रिशंकु हैं . जब दुनिया पर जलवायु परिवर्तन का कहर  सामने दिख रहा है, हिमालय पहाड़ पर, विकास की नई परिभाषा गढ़ने की तत्काल जरूरत महसूस हो   रही है . जान लें यह केवल जोशीमठ की बात नहीं है , पहाड़ पर जहां जहां सर्पीली सडक पहुँच रही है, पर्यटक का बोझा बढ़ रहा है, पहाड़ों के दरकने-सरकने की घटनाएँ बढ़ रही हैं . उत्तराखंड सरकार के  आपदा प्रबंधन विभाग और  विश्व  बैंक ने सन 2018 में एक अध्ययन करवाया था जिसके अनुसार  छोटे से उत्तराखंड  में 6300 से अधिक स्थान  भूस्खलन ज़ोन के रूप में चिन्हित किये गये  . रिपोर्ट कहती है कि राज्य में चल रही हज़ारों करोड़ की विकास परियोजनाएं पहाड़ों को काट कर या जंगल उजाड़ कर ही बन रही हैं और इसी से  भूस्खलन ज़ोन की संख्या में इजाफा हो रहा है.


 जोशीमठ सामरिक दृष्टि से संवेदनशील है . भारत- चीन- तिब्बत सीमा के आखिरी गाँव के लिए मशहूर , समुद्र तल से करीब 1800 मीटर की ऊंचाई पर स्थित ज्योतिर्मठ (जोशीमठ) के जिसे बदरीनाथ धाम का प्रवेश द्वार कहा जाता है। यहां नृसिंह मंदिर के दर्शनों के बाद ही तीर्थयात्री अपनी बदरीनाथ धाम की तीर्थयात्रा शुरू करते हैं। तिब्बत (चीन) सीमा क्षेत्र का यह अंतिम नगर क्षेत्र है। नगर के अधिकांश क्षेत्र में सेना और आईटीबीपी के कैंप स्थित हैं। और अब जमीन की दरार सेना के ठिकानों  की तरफ पहुँच रही है .


मसूरी में सडक जाम से बचने के लिए 2.74 किलोमीटर के लिए लंबी सुरंग के लिए 700 करोड़ रुपये मंजूर कर दिए गए जबकि  सन 2010 में मसूरी की आईएएस अकादमी ने एक शोध में बता दिया था कि मसूरी के संसाधनों पर दबाव सहने की क्षमता चुक चुकी है. मसूरी की आबादी मात्र तीस हज़ार है और इनमें भी आठ हज़ार लोग ऐसे मकानों में रहते हैं जहां भूस्खलन का ख़तरा है, इतने छोटे से स्थान पर हर साल कोई पचास लाख लोगों का पहुंचना पानी, बिजली, सीवर सभी पर अत्यधिक बोझ का कारक है , ऐसे में सुरंग बना कर अधिक पर्यटक भेजने की कल्पना वास्तव में मसूरी की बर्बादी का दस्तावेज होगा .वैसे मसूरी के लिए सुरंग बनाए के प्रयास पहले भी हुए जब अंग्रेज शासन में वहाँ ट्रेन लाने  के लिए सुरंग की बात आई तो जन विरोध के चलते उस काम को रोकना पड़ा था और आधी अधूरी पटरियां  पड़ीं रह गयी थीं .


उत्तराखंड के सबसे लोकप्रिय  पर्यटन स्थल नैनीताल का अस्तित्व ही भूस्खलन  के कारण खतरे में है. यहाँ बालियानाला, चाइनापीक, मालरोड, कैलाखान, ठंडी सड़क, टिफिनटॉप सात नंबर क्षेत्र में जबर्दस्त भूस्खलन है . सन 1880 में नैनीताल की आबादी बमुश्किल दस हज़ार थी, और यहाँ भयानक पहाड़ क्षरण हुआ, कोई ढेढ़ सौ लोग मारे गये थे, उन दिनों तब की ब्रितानी हुकुमत ने पहाड़ गिरने से सजग हो कर नए निर्माण पर तो रोक लगाईं ही थी, शेर का डांडा पहाड़ी पर तो घास काटने, चारागाह के रूप में उपयोग करने और बागवानी पर भी प्रतिबंध लगा दी थी . कुमाऊं विवि के भूवैज्ञानिक प्रो बीएस कोटलिया बताते हैं कि नैनीताल और नैनीझील के बीच से गुजरने वाले फॉल्ट के एक्टिव होने से भूस्खलन और भूधंसाव की घटनाएं हो रही हैं. शहर में लगातार बढ़ता भवनों का दबाव और भूगर्भीय हलचल इसका कारण हो सकते हैं.


दुनिया के सबसे युवा और जिंदा पहाड़ कहलाने वाले हिमालय में हरियाली उजाड़ने की कई परियोजनाएं खतरा बनी हुई हैं. नवंबर -2019 में राज्य की कैबिनेट से स्वीकृत नियमों के मुताबिक कम से कम दस हेक्टेयर में फैली हरियाली को ही जंगल कहा जाएगा. यही नहीं वहां न्यूनतम पेड़ों की सघनता घनत्व 60 प्रतिशत से कम ना हो और जिसमें 75 प्रतिशत स्थानीय वृक्ष प्रजातियां उगी हों. जाहिर है कि जंगल की परिभाषा  में बदलाव का असल इरादा  ऐसे कई इलाकां को जंगल की श्रेणी से हटाना है जो कि कथित विकास के राह में रोड़े बने हुए हैं. उत्तराखंड में बन रही पक्की सड़कों के लिए 356 किलोमीटर के वन क्षेत्र में कथित रूप से 25 हजार पेड़ काट डाले गए. मामला एनजीटी में भी गया लेकिन तब तक पेड़ काटे जा चुके थे. यही नहीं सड़कों का संजाल पर्यावरणीय लिहाज से संवेदनशील उत्तरकाशी की भागीरथी घाटी के से भी गुजर रहा है ..उत्तराखंड के चार प्रमुख धामों को जोड़ने वाली सड़क परियोजना में 15 बड़े पुल, 101 छोटे पुल, 3596 पुलिया, 12 बाइपास सड़कें बनाने का प्रावधान है.


इधर ऋषिकेश से कर्णप्रयाग और वहां से जोशीमठ तक रेल मार्ग परियोजना, जोकि नब्बे फ़ीसदी पहाड़ में छेद कर सुरंग से हो कर जायेगी , ने पहाड़ को थर्रा कर रखा  दिया है .

सनद रहे हिमालय पहाड़ ना केवल हर साल बढ़ रहा है, बल्कि इसमें भूगर्भीय उठापटक चलती रहती हैं. यहां पेड़ भूमि को बांध कर रखने में बड़ी भूमिका निभाते हैं जो कि कटाव व पहाड़ ढहने से रोकने का एकमात्र उपाय है. हिमालयी भूकंपीय क्षेत्र में भारतीय प्लेट का यूरेशियन प्लेट के साथ टकराव होता है और इसी से प्लेट बाउंड्री पर तनाव ऊर्जा संग्रहित हो जाती है जिससे क्रिस्टल छोटा हो जाता है और चट्टानों का विरुपण होता है. ये ऊर्जा भूकंपों के रूप में कमजोर जोनों एवं फाल्टों के जरिए सामने आती है.  जब पहाड़ पर तोड़फोड़ या धमाके होते हैं, जब उसके प्राकृतिक स्वरूप से छेड़छाड होती है तो भूकंप के खतरे तो बढ़ते हैं .

पहाड़ के उजड़ने के कारणों को बारीकी से देखे तो स्पष्ट हो जाता है कि जलवायु परिवर्तन की मार , अंधाधुंध  जल बिजली परियोजनाएं, बेतरतीब सडक निर्माण के साथ साथ  इन हालातों के लिए स्थानीय लोग भी कम दोषी नहीं हैं . चार धाम के पर्यटन से जीवकोपार्जन करने वालों को जब अधिक पैसा कमाने का चस्का लगा और उन्होंने अपनी जीवन शैली ही बदल डाली तो धीरे धीर यह हालात बने . प्रशासन ने घर-घर नल पहुंचा दिए। पहले जिसे जितनी जरूरत होती थी, नदी के पास जाता था और पानी का इस्तेमाल कर लेता था, अब जो घर में टोंटी लगी तो एक गिलास के लिए एक बाल्टी फैलाने का लोभ लग गया। सनद रहे इस इलाके में ठंड के दिनों में औसतन प्रति व्यक्ति 10 लीटर व गरमी में अधिकतम 21 लीटर पानी की जरूरत होती थी। कंक्रीट बढ़ने के साथ यह मांग औसतन 75 लीटर तक हो गई। जब इतना पानी इस्तेमाल होगा तो जाहिर है कि बेकार गए पानी   को बहने के लिए रास्ता भी चाहिए। अब पहाड़ों की ढलानों पर बसे मकानों के नीचे नालियों की जगह जमीन काट कर पानी तेजी से नीचे आने लगा, इससे ना केवल आधुनिक कंक्रीट वाले, बल्कि पारंपरिक मकान भी ढहने लगे। यही नहीं ज्यादा पैसा  बनाने के लोभ ने जमीनों पर कब्जे, दरिया के किनारे पर्यटकों के लिए आवास का लालच भी बढ़ाया।

यहाँ सड़क का इस्तेमाल  सामरिक से अधिक धार्मिक पर्यटन के लिए ज्यादा है और इसके पीछे  एक राजनीती भी है. इतने पर्यटक आने से स्थानीय व्यापार  बढ़ रहा है, आज कई हज़ार लोग  राज्य की विभिन्न परियोजनाओं में रोजगार पा रहे हैं , सो निश्चित ही यह स्थानीय लोगों के लिए सम्रद्धि दिखता है . यह कड़वा सच्चाई है कि धर्म अब देश की राजनीती का  माध्यम बन गया है और इस तरह सुविधापूर्ण सड़कें और चकाचौंध करने वाली जन सुविधाएँ देश में सन्देश देती हैं कि अमुक सरकार ने हिन्दू तीर्थों में काम किया . यह तो कोई जानता नहीं कि इन सुविधाओं को  मुहैया कराने  के लिए किस तरह पर्यावरण को नुक्सान हुआ लेकिन यह  कुछ  दिन के लिए आये तीर्थ यात्री के वोट बेंक बनाने का चारा जरुर होता है .

 

शनिवार, 7 जनवरी 2023

Desolate Joshimath: We have called this tragedy

 उजड़ता जोशीमठ : इस त्रासदी  को हमने ही बुलाया है

पंकज चतुर्वेदी



सामरिक दृष्टि से संवेदनशील, भारत- चीन- तिब्बत सीमा के आखिरी गाँव के लिए मशहूर , समुद्र तल से करीब 1800 मीटर की ऊंचाई पर स्थित ज्योतिर्मठ (जोशीमठ) को बदरीनाथ धाम का प्रवेश द्वार कहा जाता है। यहां नृसिंह मंदिर के दर्शनों के बाद ही तीर्थयात्री अपनी बदरीनाथ धाम की तीर्थयात्रा शुरू करते हैं। तिब्बत (चीन) सीमा क्षेत्र का यह अंतिम नगर क्षेत्र है। नगर के अधिकांश क्षेत्र में सेना और आईटीबीपी के कैंप स्थित हैं। जोशीमठ से ही पर्यटन स्थल औली के लिए रोपवे और सड़क मार्ग है। लेकिन आज यह शहर उजड़ने की कगार पर है -पिछले कुछ महिनों से नगर में कई आवासीय मकानों और सड़कों में दरारें पड़नी शुरू हुई, जो दिनों दिन मोटी होती जा रही हैं। पेट्रोल पंप से लेकर ग्रेफ कैंप तक जगह-जगह बदरीनाथ हाईवे पर भी भू-धंसाव हो रहा है। मनोहर बाग, सिंग्धार, गांधीनगर, मारवाड़ी आदि वॉर्डों में होटल, घर और खेत भी दरक रहे हैं।

जोशीमठ नगर की वर्तमान में जनसंख्या लगभग 25000 है। यहा अभी तक पञ्च सौ से जयादा  घर-दुकाने उजाड़ चुकी है. लोग सड़क अपर हैं और सरकाई अमले रिपोर्ट , आश्वासन में उलझे हैं . जबकि यहाँ रात में जो दरार हल्की दिखाई दे रही है, सुबह तक यानी 12 घंटे में हाथ डालने लायक चौड़ी हो जाती है। हर तीन दिन में देखें तो 45 घरों दरारें आ रही हैं। पूरे शहर का यही हाल है। भू-धसाव का यह दायरा दिनों-दिन बढ़ता जा रहा है। यह सभी जानते हैं कि जोशीमठ नगर पुराने रॉक स्लाइड (भूस्खलन क्षेत्र) पर बसा है। अलकनंदा नदी बहुत तेजी से यहाँ नीची आती है और इससे बहुत सारा मालवा भी आता है और भू-कटाव हो रहा है.  जिससे धीरे-धीरे भूमि खिसक रही है।

जोशीमठ के उजड़ने के कारणों को बारीकी से देखे तो स्पष्ट हो जाता है कि जलवायु परिवर्तन की मार , अंधाधुंध  जल बिजली परियोजनाएं, बेतरतीब सडक निर्माण के साथ साथ  इन हालातों के लिए स्थानीय लोग भी कम दोषी नहीं हैं . चार धाम के पर्यटन से जीवकोपार्जन करने वालों को जब अधिक पैसा कमाने का चस्का लगा और उन्होंने अपनी जीवन शैली ही बदल डाली तो धीरे धीर यह हालात बने . जब आए पर्यटक, तो उनके लिए कुछ होटल बने, सरकार ने बढ़ावा दिया तो उनके देखा-देखी कई लोगों  ने अपने पुश्तेनी  मकान अपने ही हाथों से तबाह कर सीमेंट, ईंटें दूर देश  से मंगवा कर आधुनिक डिजाईन के सुन्दर  मकान खड़े कर लिए, ताकि बाहरी लोग उनके मेहमान बन कर रहें, उनसे कमाई हो। पक्का मोटर रोड बन जाने की बाद हर साल यहाँ स्थानीय आबादी कि तुलना में दस गुना अधिक पर्यटक आते हैं

स्थानीय प्रशासन ने भी घर-घर नल पहुंचा दिए। पहले जिसे जितनी जरूरत होती थी, नदी के पास जाता था और पानी का इस्तेमाल कर लेता था, अब जो घर में टोंटी लगी तो एक गिलास के लिए एक बाल्टी फैलाने का लोभ लग गया। सनद रहे इस इलाके में ठंड के दिनों में औसतन प्रति व्यक्ति 10 लीटर व गरमी में अधिकतम 21 लीटर पानी की जरूरत होती थी। कंक्रीट बढ़ने के साथ यह मांग औसतन 75 लीटर तक हो गई। जब इतना पानी इस्तेमाल होगा तो जाहिर है कि बेकार गए पान  को बहने के लिए रास्ता भी चाहिए। अब पहाड़ों की ढलानों पर बसे मकानों के नीचे नालियों की जगह जमीन काट कर पानी तेजी से नीचे आने लगा, इससे ना केवल आधुनिक कंक्रीट वाले, बल्कि पारंपरिक मकान भी ढहने लगे। यही नहीं ज्यादा पैसा  बनाने के लोभ ने जमीनों पर कब्जे, दरिया के किनारे पर्यटकों के लिए आवास का लालच भी बढ़ाया। असल में हिमालय जिंदा पहाड़ है और वहां लगातार  भूगर्भीय गतिविधियाँ होती रहती हैं . यहाँ सैंकड़ों ऐसी धाराएं है जहां सालों पानी नहीं आता, लेकिन जब ऊपर ज्यादा बरफ पिघलती है तो वहां अचानक तेज जल-बहाव होता है। याद करें छह फरवरी 21  में जब ग्लेशियर  फटने के बाद विनाषकारी बाढ़ आई थी और पक्के कंक्रीट के मकानों के कारण सबसे ज्यादा तबाही हुई थी। असल में ऐसे अधिकांश मकान ऐसी ही सूखी जल धाराओं के रास्ते में रोप दिए गए थे। पानी को जब अपने पारंपरिक रास्ते  में ऐसे व्यवधान दिखे तो उसने उन्हें ढहा दिया।

जान लें कि चमौली  हिमालय की छाया में बसा है और यहां बरसात कम ही होती थी, लेकिन जलवायु  परिवर्तन का असर यहां भी दिख रहा है व अब गर्मियों में कई-कई बार बरसात होती है। यहां पर्यटन बढ़ने से पानी, मोटर कारों की मांग बढ़ी तो कचरा भी बढ़ा। होटल बढ़ने से जैनरेटर जैसे धुआं उगलने वाले यंत्र का इस्तेमाल भी बढ़ा। अंधाधुंध पर्यटन के कारण उनके साथ आया प्लास्टिक व अन्य पैकेजिंग का कचरा यहां के भूगोल को प्रभावित कर रहा है । इस नए किस्म के कचरे ने इलाके की पारंपरिक कचरा-निस्तारण प्रणाली को ध्वस्त कर दिया। नए किस्म से कचरा निबटान षुरू नहीं हुआ।

इस अंचल के पारंपरिक घर स्थानीय मिट्टी में रेत मिला कर धूप में पकाई गई ईंटों से बनते थे । इन घरों की बाहरी दीवारों को स्थानीय ‘पुतनी मिट्टी’ व उसमें वनस्पतियों के अवषेश को मिला कर ऐसा कवच बनाया जाता है जो शून्य  से नीचे तापमान  में भी उसमें रहने वालों को उष्मा देता था । भूकंप -संवेदनषील  इलाका तो है ही। ऐसे में पारंपरिक आवास सुरक्षित माने जाते रहे हैं। सनद रहे कंक्रीट  गरमी में और तपती व जाउ़े में अधिक ठंडा करती है।  सीमेंट की वैज्ञानिक आयु 50 साल है जबकि इस इलाके में पारंपरिक तरीके से बने कई मकान, मंदिर, मठ हजार साल से ऐसे ही शान से खड़े हैं।  यहां के पारंपरिक मकान तीन मंजिला होते हैं। -सबसे नीचे मवेशी, उसके उपर परिवार और सबसे उपर पूजा घर। इसके सामाजिक व वैज्ञानिक कारण भी हैं।

यह दुखद है कि बाहरी दुनिया के हजारों लोग यहां प्रकृति की सुंदरता निहारने आ रहे हैं लेकिन वे अपने पीछे इतनी गंदगी, आधुनिकता की गर्द छोड़कर जा रहे हैं कि  यहां के स्थानीय समाज का अस्तित्व खतरे में हैं।

पिछले साल अगस्त में इस शहर का एक भूगर्भीय सर्वेक्षण किया गया था, जिसकी रिपोर्ट नवम्बर में आई और इसमें स्पष्ट लिखा है कि भू-धंसाव का प्रमुख कारण नगर के नीचे अलकनंदा नदी से हो रहा कटाव, क्षेत्र में ड्रेनेज सिस्टम और सीवेज की व्यवस्था नहीं होना है। दुर्भाग्य है कि यहाँ महज 10 प्रतिशत परिवार ही सीवेज योजना से  जुड़े हैं 90 प्रतिशत परिवारों के घरों का पानी पिट में जा रहा है, जो पहाड़ी जमीन को भीतर ही भीतर काट रहा है .

अकेले जोशीमठ ही नहीं , चीन-नेपाल से लगी सीमा के उत्तराखंड के जिलों को यदि अपना अस्तित्व बचाना है तो नैसर्गिक जल धारों के अविरल  प्रवाह पर तो ध्यान देना ही होगा साथ ही बेलगाम पर्यटन से तौबा करना  होगा.

यह सुनिश्चित करना स्थानीय नागरिकों की जिम्मेदारी भी है कि जोशीमठ नगर में पानी की निकासी के लिए मजबूत ड्रेनेज सिस्टम हो। समूचे नगर क्षेत्र में घरों से निकले पानी को पक्की नालियों के जरिये इस तरह बहाया जाए कि पानी जमीन के अंदर न जा सके।  नए बहुमंजिला भवनों की अनुमति न दी जाए, जिससे भूमि पर अधिक दबाव न पड़ सके। नदी के किनारे भू कटाव रोकने के लिए अधिक से अधिक पेड़ लगाने, नदी के विस्तार म,आर्ग को निर्माण से मुक्त रखने की भी जरूरत है ।

शुक्रवार, 6 जनवरी 2023

Tragedy of the sinking Himalayas in religion, business and politics

                            धर्म , धंधे और सियासत में धंसते हिमालय की त्रासदी

पंकज चतुर्वेदी

बॉक्स

जोशीमठ : हम भी जम्मेदार हैं धंसती बस्ती के लिए



न सडक बच  रही है न मकान . न ही नदी की किनारे . देखते हे देखते कहीं गहरी खाई बन जाती है तो कहीं दीवार फट जाती है . सडक में मलवा भरा जाता है तो कुछ ही घंटे में दरार  दुगनी हो जाती है . कडाके की ठण्ड में मकान छोड़ने का कोई विकल्प नहीं सो कोई बल्लियाँ लगा कर तो कोई भगवान् भरोसे बना हुआ है . यह हाल हैं सामरिक दृष्टि से संवेदनशील, भारत- चीन- तिब्बत सीमा के आखिरी गाँव के लिए मशहूर , समुद्र तल से करीब 1800 मीटर की ऊंचाई पर स्थित ज्योतिर्मठ (जोशीमठ) के जिसे बदरीनाथ धाम का प्रवेश द्वार कहा जाता है। यहां नृसिंह मंदिर के दर्शनों के बाद ही तीर्थयात्री अपनी बदरीनाथ धाम की तीर्थयात्रा शुरू करते हैं। तिब्बत (चीन) सीमा क्षेत्र का यह अंतिम नगर क्षेत्र है। नगर के अधिकांश क्षेत्र में सेना और आईटीबीपी के कैंप स्थित हैं। जोशीमठ से ही पर्यटन स्थल औली के लिए रोपवे और सड़क मार्ग है। लेकिन आज यह शहर उजड़ने की कगार पर है -पिछले कुछ महिनों से नगर में कई आवासीय मकानों और सड़कों में दरारें पड़नी शुरू हुई, जो दिनों दिन मोटी होती जा रही हैं। पेट्रोल पंप से लेकर ग्रेफ कैंप तक जगह-जगह बदरीनाथ हाईवे पर भी भू-धंसाव हो रहा है। मनोहर बाग, सिंग्धार, गांधीनगर, मारवाड़ी आदि वॉर्डों में होटल, घर और खेत भी दरक रहे हैं।

जोशीमठ नगर की वर्तमान में जनसंख्या लगभग 25000 है। यहा अभी तक पञ्च सौ से ज्यादा  घर-दुकाने उजाड़ चुकी है. लोग सड़क पर हैं और सरकाई अमले रिपोर्ट , आश्वासन में उलझे हैं . जबकि यहाँ रात में जो दरार हल्की दिखाई दे रही है, सुबह तक यानी 12 घंटे में हाथ डालने लायक चौड़ी हो जाती है। हर तीन दिन में देखें तो 45 घरों दरारें आ रही हैं। पूरे शहर का यही हाल है। भू-धसाव का यह दायरा दिनों-दिन बढ़ता जा रहा है। यह सभी जानते हैं कि जोशीमठ नगर पुराने रॉक स्लाइड (भूस्खलन क्षेत्र) पर बसा है। अलकनंदा नदी बहुत तेजी से यहाँ नीची आती है और इससे बहुत सारा मलवा भी आता है और भू-कटाव हो रहा है.  जिससे धीरे-धीरे भूमि खिसक रही है।

जोशीमठ के उजड़ने के कारणों को बारीकी से देखे तो स्पष्ट हो जाता है कि जलवायु परिवर्तन की मार , अंधाधुंध  जल बिजली परियोजनाएं, बेतरतीब सडक निर्माण के साथ साथ  इन हालातों के लिए स्थानीय लोग भी कम दोषी नहीं हैं . चार धाम के पर्यटन से जीवकोपार्जन करने वालों को जब अधिक पैसा कमाने का चस्का लगा और उन्होंने अपनी जीवन शैली ही बदल डाली तो धीरे धीर यह हालात बने . जब आए पर्यटक, तो उनके लिए कुछ होटल बने, सरकार ने बढ़ावा दिया तो उनके देखा-देखी कई लोगों  ने अपने पुश्तेनी  मकान अपने ही हाथों से तबाह कर सीमेंट, ईंटें दूर देश  से मंगवा कर आधुनिक डिजाईन के सुन्दर  मकान खड़े कर लिए, ताकि बाहरी लोग उनके मेहमान बन कर रहें, उनसे कमाई हो। पक्का मोटर रोड बन जाने की बाद हर साल यहाँ स्थानीय आबादी कि तुलना में दस गुना अधिक पर्यटक आते हैं

स्थानीय प्रशासन ने भी घर-घर नल पहुंचा दिए। पहले जिसे जितनी जरूरत होती थी, नदी के पास जाता था और पानी का इस्तेमाल कर लेता था, अब जो घर में टोंटी लगी तो एक गिलास के लिए एक बाल्टी फैलाने का लोभ लग गया। सनद रहे इस इलाके में ठंड के दिनों में औसतन प्रति व्यक्ति 10 लीटर व गरमी में अधिकतम 21 लीटर पानी की जरूरत होती थी। कंक्रीट बढ़ने के साथ यह मांग औसतन 75 लीटर तक हो गई। जब इतना पानी इस्तेमाल होगा तो जाहिर है कि बेकार गए पान  को बहने के लिए रास्ता भी चाहिए। अब पहाड़ों की ढलानों पर बसे मकानों के नीचे नालियों की जगह जमीन काट कर पानी तेजी से नीचे आने लगा, इससे ना केवल आधुनिक कंक्रीट वाले, बल्कि पारंपरिक मकान भी ढहने लगे। यही नहीं ज्यादा पैसा  बनाने के लोभ ने जमीनों पर कब्जे, दरिया के किनारे पर्यटकों के लिए आवास का लालच भी बढ़ाया। असल में हिमालय जिंदा पहाड़ है और वहां लगातार  भूगर्भीय गतिविधियाँ होती रहती हैं . यहाँ सैंकड़ों ऐसी धाराएं है जहां सालों पानी नहीं आता, लेकिन जब ऊपर ज्यादा बरफ पिघलती है तो वहां अचानक तेज जल-बहाव होता है। याद करें छह फरवरी 21  में जब ग्लेशियर  फटने के बाद विनाषकारी बाढ़ आई थी और पक्के कंक्रीट के मकानों के कारण सबसे ज्यादा तबाही हुई थी। असल में ऐसे अधिकांश मकान ऐसी ही सूखी जल धाराओं के रास्ते में रोप दिए गए थे। पानी को जब अपने पारंपरिक रास्ते  में ऐसे व्यवधान दिखे तो उसने उन्हें ढहा दिया।

जान लें कि चमौली  हिमालय की छाया में बसा है और यहां बरसात कम ही होती थी, लेकिन जलवायु  परिवर्तन का असर यहां भी दिख रहा है व अब गर्मियों में कई-कई बार बरसात होती है। यहां पर्यटन बढ़ने से पानी, मोटर कारों की मांग बढ़ी तो कचरा भी बढ़ा। होटल बढ़ने से जैनरेटर जैसे धुआं उगलने वाले यंत्र का इस्तेमाल भी बढ़ा। अंधाधुंध पर्यटन के कारण उनके साथ आया प्लास्टिक व अन्य पैकेजिंग का कचरा यहां के भूगोल को प्रभावित कर रहा है । इस नए किस्म के कचरे ने इलाके की पारंपरिक कचरा-निस्तारण प्रणाली को ध्वस्त कर दिया। नए किस्म से कचरा निबटान शुरू  नहीं हुआ।

इस अंचल के पारंपरिक घर स्थानीय मिट्टी में रेत मिला कर धूप में पकाई गई ईंटों से बनते थे । इन घरों की बाहरी दीवारों को स्थानीय ‘पुतनी मिट्टी’ व उसमें वनस्पतियों के अवषेश को मिला कर ऐसा कवच बनाया जाता है जो शून्य  से नीचे तापमान  में भी उसमें रहने वालों को उष्मा देता था । भूकंप -संवेदनषील  इलाका तो है ही। ऐसे में पारंपरिक आवास सुरक्षित माने जाते रहे हैं। सनद रहे कंक्रीट  गरमी में और तपती व जाउ़े में अधिक ठंडा करती है।  सीमेंट की वैज्ञानिक आयु 50 साल है जबकि इस इलाके में पारंपरिक तरीके से बने कई मकान, मंदिर, मठ हजार साल से ऐसे ही शान से खड़े हैं।  यहां के पारंपरिक मकान तीन मंजिला होते हैं। -सबसे नीचे मवेशी, उसके उपर परिवार और सबसे उपर पूजा घर। इसके सामाजिक व वैज्ञानिक कारण भी हैं।

यह दुखद है कि बाहरी दुनिया के हजारों लोग यहां प्रकृति की सुंदरता निहारने आ रहे हैं लेकिन वे अपने पीछे इतनी गंदगी, आधुनिकता की गर्द छोड़कर जा रहे हैं कि  यहां के स्थानीय समाज का अस्तित्व खतरे में हैं।

पिछले साल अगस्त में इस शहर का एक भूगर्भीय सर्वेक्षण पर्यावरणविद् प्रो. रवि चोपड़ा, भूवैज्ञानिक डॉ. नवीन जुयाल और डॉ. एसपी सती ने किया गया था, जिसकी रिपोर्ट नवम्बर में आई और इसमें स्पष्ट लिखा है कि भू-धंसाव का प्रमुख कारण नगर के नीचे अलकनंदा नदी से हो रहा कटाव, क्षेत्र में ड्रेनेज सिस्टम और सीवेज की व्यवस्था नहीं होना है। स्थानीय नगर पालिका के अनुसार यहाँ महज 10 प्रतिशत परिवार ही सीवेज योजना से  जुड़े हैं 90 प्रतिशत परिवारों के घरों का पानी पिट में जा रहा है, जो पहाड़ी जमीन को भीतर ही भीतर काट रहा है .

वाडिया इंस्टीट्यूट आफ हिमालयन जियोलॉजी की वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. स्वप्नमिता चौधरी ने यूरोपियन स्पेस एजेंसी के सेटेलाइट इंटरफेयरोमेट्रिक सिंथेटिक एपर्चर रडार (इंसार) के जरिये जोशीमठ की तस्वीरों के अध्ययन के बाद सरकार को यह सुझाव दिया है। उनका कहना है कि जोशीमठ के कई इलाकों में बड़े पैमाने पर भूधंसाव हो रहा है। इसके लिए काफी हद तक बदहाल सीवरेज प्रणाली और ड्रेनेज सिस्टम जिम्मेदार है। शहर में बारिश के दौरान जिन नालों से पानी बहता है, उनके आसपास या ऊपर बड़े पैमाने पर निर्माण कार्य होने से पानी अलकनंदा नदी में पहुंचने के बजाय जमीन में जा रहा है। यह भूधंसाव का बड़ा कारण बन रहा है।


 

 

सडक जरुरी लेकिन सियासत नहीं

इसमें कोई शक नहीं कि उत्तराखंड में 300 किमी की सीमा चीन- तिब्बत से मिलती है और यहाँ फौज की मौजूदगी जरुरी है । यहाँ  से महज 100 किलोमीटर दूर नीति दर्रा और 50 किलोमीटर  दूर माना दर्रा है .विदित हो उत्तराखंड से केंद्र सरकार को जो ब्योरा भेजा गया है, उसके मुताबिक, पिछले 10 साल में चीन की बाड़ाहोती क्षेत्र में लगातार 63 बार घुसपैठ कर चुका है। ऐसे में वहां तक त्वरित  परिवहन के लिए सडक अनिवार्य  है लेकिन जब इस सडक का इस्तेमाल  सामरिक से कहीं अधिक पर्यटन या व्यवसाय के लिए होता है तो जोशीमठ जैसे हादसे सामने आते हैं . इधर ऋषिकेश से कर्णप्रयाग और वहां से जोशीमठ तक रेल मार्ग परियोजना, जोकि नब्बे फ़ीसदी पहाड़ में छेद कर सुरंग से हो कर जायेगी , ने पहाड़ को थर्रा कर रखा  दिया ; हमारी निर्माण –तकनीक  पर पुनर्विचार  के लिए मजबूर करती है . हालांकि पिछले साल नवम्बर में यह मसला  सुप्रीम कोर्ट में गया था और कोर्ट ने पर्यावरण के बदले  रक्षा को महत्व देते हुए  चार लेन  सडक पर मंजूरी दे दी थी . यह तो विचार करना  ही होगा कि सीमा पार भी भूगोल और मौसम वैसा ही है जैसा जोशीमठ का . उधर भी तो सड़क जैसी मूलभूत सुविधाएँ जुटाई ही गई होंगी , क्या वहां भी बस्तियां ऐसे ही उजाड़ रही हैं ? असला में ह्मारे यहाँ  सड़क का इस्तेमाल  सामरिक से अधिक धार्मिक पर्यटन के लिए ज्यादा है . इस साल मई महीने का आंकडा है कि चारधाम यात्रा शुरू होने के कुछ दिनों के अंदर ही 9.5 लाख से अधिक रजिस्ट्रेशन हो चुके थे . उनमें से सबसे ज्यादा रजिस्ट्रेशन केदारनाथ धाम के लिए हुए जो 3.35 लाख से अधिक था , यह आंकड़ा निर्धारित क्षमता से तीन गुना अधिक रहा . जाहिर है कि इतने लोगों के परिवहन, कचरे, जल- आपूर्ति का खामियाजा फड्को ही भोगना है, चूँकि  अब यह व्यापार बन गया है सो  भूमि और जल संसाधन पर अवैध कब्जे,  यात्रियों के लये अधिक सुविधा जुटाने के लिए नैसर्गिक संसाधनों का दोहन गौण हो गया है .

एक बात जान लें इसके पीछे  एक राजनीती भी है और  अर्थ तंत्र भी . इतने पर्यटक आने से स्थानीय व्यापार  बढ़ रहा है, आज कोई दस हज़ार लोग  राज्य की विभिन्न परियोजनाओं में रोजगार पा रहे हैं , सो निश्चित ही यह स्थानीय लोगों के लिए सम्रद्धि दिखता है . यह कड़वा सच्चाई है कि धर्म अब देश की राजनीती का  माध्यम बन गया है और इस तरह सुविधापूर्ण सड़कें और चकाचौंध करने वाली जन सुविधाएँ देश में सन्देश देती हैं कि अमुक सरकार ने हिन्दू तीर्थों में काम किया . यह तो कोई जानता नहीं कि इन सुविधाओं को  मुहैया अक्राने के लिए किस तरह पर्यावरण को नुक्सान हुआ लेकिन यह  कुछ  दिन के लिए आये तीर्थ यात्री के वोट बेंक बनाने का चारा जरुर होता है . सियासत यहीं नहीं रूकती , जब जोशीमठ में घर फूटने पर प्रदर्शन होते हैं तो यह भी आरोप लग जाते हैं कि  पहाड़ में विकास का विरोध करने वाले कम्युनिस्ट हैं और उनकी निष्ठा और खाद पानी चीन से आती है .  यानी एक तरफ धर्म की सियासत तो दूसरी तरफ आत्मघाती विकास के विरोध को धर्म-विरोधी ठहराएं के नारे .

 

 

ज़िंदा पहाड़ से छेड़छाड़ खतरनाक

 

चूँकि जोशीमठ एक कस्बा है और वहां लगो राजनितिक रूप से जागरूक है सो वहां की चर्चा भी हो रही है , चीन सीमा का करीब नीति घाटी  के जुग्जू गांव के लोग बीते दो सालों से  बेशुमार भूस्खलन से तंग हैं . यह भोटिया जनजाति का गाँव है और यहाँ लोग पूरी बरसात गुफाओं में बिताते है क्योंकि यहाँ बरसात के साथ पहाड़ धरकना हर दिन की घटना है . उत्तराखंड सरकार के  आपदा प्रबंधन विभाग और  विश्व  बैंक ने सन 2018 में एक अध्ययन करवाया था जिसके अनुसार  छोटे से उत्तराँचल  में 6300 से अधिक स्थान  भूस्खलन ज़ोन के रूप में चिन्हित किये गये  . रिपोर्ट कहती है कि राज्य में चल रही हज़ारों करोड़ की विकास परियोजनाएं पहाड़ों को काट कर या जंगल उजाड़ कर ही बन रही हैं और इसी से  भूस्खलन ज़ोन की संख्या में इजाफा हो रहा है.

दुनिया के सबसे युवा और जिंदा पहाड़ कहलाने वाले हिमालय  के पर्यावरणीय छेड़छाड़ से उपजी सन 2013 की केदारनाथ त्रासदी को भुला कर उसकी हरियाली उजाड़ने की कई परियोजनाएं उत्तराखंड राज्य के भविश्य  के लिए खतरा बनी हुई हैं. गत नवंबर -2019 में राज्य की कैबिनेट से स्वीकृत नियमों के मुताबिक कम से कम दस हेक्टेयर में फैली हरियाली को ही  जंगल कहा जाएगा. यही नहीं वहां न्यूनतम पेड़ों की सघनता घनत्व 60 प्रतिशत से कम ना हो और जिसमें 75 प्रतिशत स्थानीय वृक्ष प्रजातियां उगी हों. जाहिर है कि जंगल की परिभाषा  में बदलाव का असल इरादा  ऐसे कई इलाकां को जंगल की श्रेणी से हटाना है जो कि कथित विकास के राह में रोड़े बने हुए हैं. उत्तराखंड में बन रही पक्की सड़कों के लिए 356 किलोमीटर के वन क्षेत्र में कथित रूप से 25 हजार पेड़ काट डाले गए. मामला एनजीटी में भी गया लेकिन तब तक पेड़ काटे जा चुके थे. यही नहीं सड़कों का संजाल पर्यावरणीय लिहाज से संवेदनशील उत्तरकाशी की भागीरथी घाटी के से भी गुजर रहा है ..उत्तराखंड के चार प्रमुख धामों को जोड़ने वाली सड़क परियोजना में 15 बड़े पुल, 101 छोटे पुल, 3596 पुलिया, 12 बाइपास सड़कें बनाने का प्रावधान है. कोई 12 हजार करोड़ रुपए के अलावा ऋषिकेश से कर्णप्रयाग तक रेलमार्ग परियोजना भी स्वीकृति हो चुकी है, जिसमें ना सिर्फ बड़े पैमाने पर जंगल कटेंगे, वन्य जीवन प्रभावित होगा और पहाड़ों को काटकर सुरंगे और पुल निकाले जाएंगें.

सनद रहे हिमालय पहाड़ ना केवल हर साल बढ़ रहा है, बल्कि इसमें भूगर्भीय उठापटक चलती रहती हैं. यहां पेड़ भूमि को बांध कर रखने में बड़ी भूमिका निभाते हैं जो कि कटाव व पहाड़ ढहने से रोकने का एकमात्र उपाय है. जानना जरूरी है कि हिमालयी भूकंपीय क्षेत्र में भारतीय प्लेट का यूरेशियन प्लेट के साथ टकराव होता है और इसी से प्लेट बाउंड्री पर तनाव ऊर्जा संग्रहित हो जाती है जिससे क्रिस्टल छोटा हो जाता है और चट्टानों का विरुपण होता है. ये ऊर्जा भूकंपों के रूप में कमजोर जोनों एवं फाल्टों के जरिए सामने आती है.  जब पहाड़ पर तोड़फोड़ या धमाके होते हैं, जब उसके प्राकृतिक स्वरूप से छेड़छाड होती है तो दिल्ली  तक भूकंप के खतरे तो बढ़ते ही हैं यमुना में कम पानी का संकट भी खड़ा होता है.

अकेले जोशीमठ ही नहीं , चीन-नेपाल से लगी सीमा के उत्तराखंड के जिलों को यदि अपना अस्तित्व बचाना है तो नैसर्गिक जल धारों के अविरल  प्रवाह पर तो ध्यान देना ही होगा साथ ही बेलगाम पर्यटन से तौबा करना  होगा. यह भी समझना होगा कि  जोशीमठ में ही तो गढ़वाल राइफल्स और आईटीबीपी के केम्प हैं, चूँकि वे बुग्याल अर्थात मैदान में हैं जबकि पुराने गाँव या कसबे  पहाड़ के ढलान पर, सो वहां  भूगर्भीय और पर्यावरणीय परिवर्तन की मार ज्यादा होती है .

 

हालांकि यह बात स्वीकार करना होगा कि ग्लेशियर के करीब बन रही जल विद्युत परियोजना के लिए हो रहे धमाकों व तोड़ फोड़ से शांत- धीर गंभीर रहने वाले जीवित हिम- पर्वत नाखुश हैं। हिमालय भू विज्ञान संस्थान का एक अध्ययन बताता है कि गंगा नदी का मुख्य स्त्रोत गंगोत्री हिंम खंड भी औसतन 10 मीटर के बनिस्पत 22 मीटर सालाना की गति से पीछे खिसका हैं। सूखती जल धाराओं के मूल में ग्लेशियर  क्षेत्र के नैसर्गिक स्वरूप में हो रही तोड़फोड है. जोशीमठ मने  दरारों के विरुध्ध आन्दोलन कर रहे अरुण सती भी त्रासदी का कारण जोशीमठ के आसपास बन रही भारी-भरकम जल विद्युत परियोजनाओं को मानते हैं . जोशीमठ की जड़ को हेलंग-विष्णुप्रयाग बाइपास के नाम पर खोदने का काम शुरू कर दिया गया है। स्थानीय लोग मानते हैं कि चूँकि विद्युत परियोजना की सुरंग को जोशीमठ शहर के नीची भूगर्भ में मशीनों से खोदा जा रहा है और इसके लिए चल रही भारी मशीने ही शहर में जमीन के धंसने का मूल कारण है .

यह सुनिश्चित करना स्थानीय नागरिकों की जिम्मेदारी भी है कि जोशीमठ नगर में पानी की निकासी के लिए मजबूत ड्रेनेज सिस्टम हो। समूचे नगर क्षेत्र में घरों से निकले पानी को पक्की नालियों के जरिये इस तरह बहाया जाए कि पानी जमीन के अंदर न जा सके।  नए बहुमंजिला भवनों की अनुमति न दी जाए, जिससे भूमि पर अधिक दबाव न पड़ सके। नदी के किनारे भू कटाव रोकने के लिए अधिक से अधिक पेड़ लगाने, नदी के विस्तार मार्ग  को निर्माण से मुक्त रखने की भी जरूरत है ।

U'Khand's Joshimath: Down the Slippery Slope of 'Development'

 

U'Khand's Joshimath: Down the Slippery Slope of 'Development'

The onslaught of construction on the hill towns and villages of Uttarakhand has been relentless

Pankaj Chaturvedi

Reports from the Garhwal hills have never been grimmer. With cracks developing in more than 500 houses due to continued land subsidence in Uttarakhand’s Joshimath, over 3,000 people are out in the cold.



While this may be news to some, for locals this is an ongoing nightmare. Late last year, cracks developed in more than 220 homes in Sweeth, Dhamak, Nakrota and Dobripanth villages. Complaints against the railway ministry, and a 5-day protest by villagers who blocked the Rishikesh-Srinagar road had little effect. The Srinagar sub-divisional magistrate’s recommendation that the railways pay a compensation of Rs 1.54 crore to the affected villagers was brushed aside on the grounds that the ongoing construction (of the 125 km broad gauge link from Rishikesh to Karnaprayag) had nothing to do with the cracks.

The onslaught of construction on the hill towns and villages of Uttarakhand has been relentless. Flash floods overwhelmed Reni (home to the Chipko movement) when an avalanche damaged NTPC’s 520 MW Tapovan Vishnugad hydropower project in February 2021. The village was declared dangerous, and residents had to be evacuated to safer places.

NGOs active in the region report three landslides a day. Last year alone, between end-September and the first week of October, Kedarnath experienced three massive avalanches. The one that hit the higher reaches of the Uttarakashi hills on October 1 claimed the lives of 27 mountaineers.

The Himalayas are a relatively young mountain chain, comprising mainly of shale, which is a weak sedimentary rock. Unseen by the human eye, geological activities continue to take place in this still-growing range. Stress energies are stored along the boundaries where the Indian plate collides with the Eurasian plate. Not only does this result in rock deformation, it also erupts in the form of earthquakes through weak zones and fault lines.

Global warming causes erratic and heavy precipitation, resulting in even more avalanches. Add to this the explosions caused by dynamite-blasting for the widening of roads and the building of tunnels, and the earthquake risk shoots up, with the reach of the tremors going as far as Delhi. While the wanton felling of trees in the name of development leads to the destruction of the only thing that can prevent soil erosion—tree roots. The Himalayan region also has hundreds of streams which remain dry for years but become conduits for flash floods during cloud bursts or glacial bursts.

The devastating flash floods after a glacial burst in February 2021 damaged concrete houses built on the bed of ‘dry’ streams. Signs of climate change are also all too apparent. Chamoli, located in the rain shadow area, has moved from scarce rainfall to unseasonal downpours even in summer.

Scientists have repeatedly warned against over-construction and mindless commissioning of hydro projects (to date, over 500 of them) in such an eco-sensitive area. Warnings have thus far fallen on deaf ears. The grandiose Kedarnath and Badrinath Master Plans are being executed on moraines (unstable paraglacial sediment) in areas prone to natural disasters. The use of dynamite continues unabated. Environmental activist Sushila Bhandari was assured by Union home minister Amit Shah that dynamite would not be used in the mountains, but there seem to be no signs of it stopping “any time soon”.

Frequent subsidence, cloudbursts, landslides and flash floods are not new to this besieged Himalayan region. But the rapacious rate of ‘development’ in recent years has created new uncertainties and unforeseen consequences. A spike in the demand for hotels, resorts, water, roads and transport to cater to the seasonal influx of tourists has increased the use of diesel generators, exacerbated pollution, and hiked up waste generation, mostly non-biodegradable plastic.

The modern constructions are completely at odds with their environment. Traditionally, hill houses were built with local expertise, and local material. The outer walls of sun-baked bricks, clay and sand were plastered with a mix of chalk soil (putni mitti) and plants. These walls kept houses warm even when temperatures dropped below zero. They also turned out to be safer and stronger in a seismic zone. This is evident from the three-storeyed homes, temples and monasteries that have weathered every storm for hundreds of years, while the much newer cement houses are in danger of crumbling to the ground.

The Modi government has justified accelerated infrastructure development in the hills on grounds of national security. The Supreme Court and the National Green Tribunal have accepted this argument, disregarding expert opinion against widening hill roads beyond five metre and further deforestation.

It is a fact that Uttarakhand does have a 300 km border with Chineseheld Tibet, with the Mana Pass barely 50 km from Joshimath. As many as 63 border intrusions by China have been reported in the last 10 years in the Barahoti area alone. As such, it is important to have good, all-weather roads for military movement to the border. But the so-called infrastructure under construction appears to be catering more to the demands of the tourism sector than the military. Not surprisingly, many residents believe the national security argument to be a smokescreen even as hoteliers, transporters and promoters reap windfall gains as domestic tourism, more specifically religious tourism, picks up.

At the commencement of the Char Dham Yatra in May 2022, as many as 9.5 lakh pilgrims registered with 3.5 lakh for Kedarnath. Experts estimated these figures were three times more than the capacity of these places. While religious tourism booms, it is the mountain that bears the brunt of motorised vehicles, emission and waste—all of which have long-term implications.

The short-term gains are glaringly evident. Glittering public facilities, highways, cheek by jowl malls and multiplexes and resorts have generated employment. Transporters and hoteliers have never had it so good. People are more prosperous than before and the political leaders are happy at such visible signs of progress. The devout are also happy at the facelift being given to their places of worship and the facilities being provided to the pilgrims, which include helicopter rides.

Not surprisingly, people raising ecological concerns about the over-exploitation of natural resources are derided as anti-nationals and ‘communists owing their allegiance to China’. Worse, they are described as ‘anti-Hindu, anti-development and anti-national’, as protestors in Joshimath have discovered to their chagrin in the past few months.

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While the plight of people in Joshimath has belatedly caught the attention of the government and the media, similar issues in the rest of the state have gone largely unnoticed. Being an urban conglomeration and home to relatively well-off and politically-aware people, Joshimath has managed to have its voice heard. Most people, however, even within Uttarakhand, may not have heard of Jugju village in the Niti Valley near the China border. Bhotia villagers of Jugju for the past several years have been shifting to caves in the rainy season because landslides are now a daily occurrence.

Environmentalist Ravi Chopra and geologists Naveen Juyal and S.P. Sati have also drawn attention to the erosion caused by the river Alaknanda that flows past the town. Swapnamita Chowdhary, senior scientist at the Wadia Institute of Himalayan Geology, points out that poor drainage and sewage systems in Joshimath are also responsible for land subsidence. Based on her studies of satellite pictures taken through through the European Space Agency’s Interferometric Synthetic Aperture Radar (InSAR), she added that indiscriminate constructions above and around storm drains have blocked the outlets for overflow during the rainy season.

While several studies have already been done on the retreating glaciers, especially the Gangotri glacier, experts have also cautioned that dried and drying water streams pose additional threats which need to be acknowledged. Older villages and towns on the slopes of mountains are more vulnerable and require special attention. Not only Joshimath, but all the districts across the Indo-Nepal and India-China border need help to cope with geological and environmental changes.

Joshimath: That Sinking Feeling

Is Joshimath finally sinking? Will the gateway to the Valley of Flowers survive? If so, for how long? These questions have begun to haunt inhabitants, many of whom are afraid, exhausted and sleepless. With cracks appearing on ceilings and walls and getting wider over the past few weeks, those who could leave, have left. Those who couldn’t are taking turns to sleep and stay awake at night, huddled together and praying that their homes do not cave in.

The last major habitation in this region near the China border, this town with a population of ~25,000 (16,000 as per the 2011 Census) has been living with the nightmare since 2021 when the first cracks were noticed in a number of houses. As they spread, residents panicked and invited a group of geologists and experts to study the phenomenon. The team concluded in August 2022 that fears of the town subsiding were real and advised emergency measures.

The state government belatedly woke up last month and directed the DM of Chamoli to evacuate people, if necessary. A meeting has also been convened on January 15 to take stock of the situation.

Since then, a stretch on the Joshimath-Helang highway has caved in. Homes, hotels, resorts, shops and offices have reported rapidly widening cracks while a hotel has tilted to a dangerous angle. Land subsidence has been reported from a number of places between the petrol pump and GREF camp on Badrinath highway; cracks have appeared in houses and fields in Manohar Bagh, Singdhar, Gandhi Nagar and Marwari wards. Tenants have vacated their rented houses and fled to safer places while house owners are left to wonder about the future.

S.P. Sati, a leading geologist and head of the department of Basic and Social Sciences at Garhwal University, had pointed out in October last year that besides Joshimath, ‘the gateway to the Badrinath temple and Hemkund Saheb’, several other towns in the Himalayas like Gangotri, Uttarkashi and Gopeshwar were also sinking “as they have been built on a thick cover of landslide material, which is inherently unstable”.

In a social media post, Vicky Rawat, an architect, concurred. “It’s a simple case of unplanned development, illegal construction and failure to understand and address the issue of water channels flowing underneath the mountains. The solution: planned water sewage drainage layout and lightweight construction techniques,” he posted.

A sharp increase in the number of tourists, hotels and resorts, road-widening projects, hydel plants and bypasses are being blamed. Residents also regret abandoning traditional houses in favour of ‘modern’ houses made of brick and mortar.

The influx of tourists led to a rush for water on tap—when people fetched water, they were more prudent in their usage and water wastage was less. Consumption of water went up from 21 litres per person to 75 litres in the summer months. More water flowing into the soil and down the slopes into the ground has made the land more vulnerable to subsidence.

The construction of the Helang-Vishnuprayag bypass (work on the project has now been halted by the Chamoli administration), tunnels being dug below Joshimath town for a hydel plant and the absence of a robust drainage system are cited as the other culprits, even as residents continue to keep their fingers crossed.

बुधवार, 4 जनवरी 2023

Ganga river turns sewar


 गंगा में सीवर की गंदगी तो रुके

पंकज चतुर्वेदी

पिछले दिनों, कोई तीन साल बाद प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में संपन्न हुई नमामि गंगे परियोजना की समीक्षा बैठक में यह बात तो सामने आ गई कि जितना धन और  लगन इस महत्वाकांक्षी परियोजना के लिए समर्पित की गई, उसके अपेक्षित परिणाम आये नहीं ।  केंद्र ने वित्तीय वर्ष 2014-15 से 31 अक्टूबर, 2022 तक इस परियोजना को कुल 13,709।72 करोड़ रुपये जारी किए और इसमें से 13,046।81 करोड़ रुपये खर्च हुए । सबसे ज्यादा पैसा 4,205।41 करोड़ रुपये उत्तर प्रदेश को दिया गया क्योंकि गंगा की 2,525 किलोमीटर लंबाई का लगभग 1,100 किलोमीटर उत्तर प्रदेश में पड़ता है।  तना धन खर्च होने के बावजूद गंगा में  गंदे पानी के सीवर मिलने को रोका नहीं जा सका है और यही इसकी असफलता का बड़ा कारण है । 



 वैसे तो भारत सरकार द्वारा 2014 में गंगा नदी के प्रदूषण को कम करने और पुनर्जीवित करने के उद्देश्य से शुरू की गई स्वच्छ गंगा के लिए राष्ट्रीय मिशन (एनएमसीजी)10 ऐसी प्रमुख पहलों में शामिल किया गया है जिन्होंने प्राकृतिक दुनिया को बहाल करने में अहम भूमिका निभाई है। संयुक्त राष्ट्र जैव विविधता सम्मेलन के दौरान जारी एक रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत की पवित्र नदी गंगा के मैदानी हिस्सों की सेहत सुधारने के उद्देश्य वाली परियोजना दुनियाभर की उन 10 अति महत्वपूर्ण पहलों में से एक है जिसे संयुक्त राष्ट्र ने प्राकृतिक दुनिया को बहाल करने में उनकी भूमिका के लिए पहचाना है। 


लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि गंगा के हालत इस परियोजना के शुरूआती स्थल हरिद्वार में भी उतने ही बुरे दिन देख  रही है, जितने औद्योगिक कचरे के लिए कुख्यात कानपुर या शहरी  नाबदान  को नदी में मिलाने के लिए बदनाम बिहार में । सन 2014 में शुरू हुई इस परियोजना के अंतर्गत कोई बीस हज़ार करोड़ रूपये की लागत से सीवेज ट्रीटमेंट अवसंरचना, नदी तट पर घाट और श्मशान घाट निर्माण ,नदी-सतह की सफाई आदि कार्य किया जाना था । 


कागजों पर यह जितनी लुभावनी लगती है , जमीन पर इसका कोई असर दिख नहीं रहा । ‘नमामि गंगे परियोजना की जब शुरुआत हुई, तो दावा किया गया कि 2019 तक गंगा को स्वच्छ कर दिया जाएगा । इसके बावजूद राष्ट्रीय नदी में अब भी 60 फीसदी सीवेज गिराया जा रहा है । करोड़ों लोगों की आस्था वाली गंगा का पानी 97 स्थानों पर आचमन के लायक भी नहीं है ।

यह बात आदालत में सरकार स्वीकार करती है कि बिहार में  गंगा किनारे सीवेज उपचार की सबसे खराब स्थिति है । राज्य में 1100 एमएलडी सीवेज की निकासी होती है और सिर्फ 99 एमएलडी (एसटीपी क्षमता का 44 फीसदी) सीवेज का उपचार किया जा रहा है । यानी 1010 एमएलडी सीवेज सीधे गंगा में गिराया जा रहा है । बिहार में 224–50 एमएलडी क्षमता वाले सात एसटीपी हैं, जो क्षमता से कम काम कर रहे हैं । पडोसी राज्य झारखंड में  452 एमएलडी सीवेज की निकासी होती है, जबकि राज्य में 107–05 एमएलडी क्षमता वाले 16 एसटीपी काम कर रहे हैं । अपनी क्षमता से 68 फीसदी (72–794 एमएलडी) का ही उपचार कर रहे हैं । गंगा अवतरण वाले राज्य उत्तराखंड में सीवेज निकासी तो 329–3 एमएलडी होती है और  प्रबंधित करने के लिए कुल 67 एसटीपी 397–20 एमएलडी क्षमता के मौजूद हैं । हालांकि, सिर्फ 234–23 एमएलडी यानी 59 फीसदी सीवेज का ही उपचार होता है ।


गंगा किनारे के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में  5500 एमएलडी सीवेज निकासी होती है । कुल 118 एसटीपी हैं, जिनकी क्षमता 3655–28 एमएलडी है । यहां भी क्षमता से काफी कम 3033–65 एमएलडी यानी एसटीपी की कुल क्षमता का 83 फीसदी ही सीवेज का उपचार हो रहा है । एक जनहित याचिका के उत्तर में सरकार ने इलाहाबद हाई कोर्ट को बताया था कि कोर्ट को बताया गया कि गंगा किनारे प्रदेश में 26 शहर हैं और अधिकांश में एसटीपी नहीं है । सैकड़ों उद्योगों का गंदा पानी सीधे गंगा में गिर रहा है । नदी के विसर्जन राज्य पश्चिम बंगाल में 2758 एमएलडी सीवेज की निकासी हर रोज होती है, जबकि 1236–981 एमएलडी सीधे गंगा में गिराया जा रहा है । राज्य में कुल 37 एसटीपी हैं, जिनकी क्षमता 1438 एमएलडी सीवेज की है ।



उत्तरप्रदेश में  गंगा स्वच्छता की बानगी कानपुर है जहां सात सालों में जुलाई–2022 तक 800 करोड़ से अधिक हुआ लेकिन प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ही कहता है कि कई जगह पानी जहरीला है । एक रिपोर्ट बताती  है कि गंगा में कई स्थानों पर विशेषकर जाजमऊ क्षेत्र में गंगा के जल में बीओडी (बायो डिजाल्व ऑक्सीजन) निर्धारित मात्रा से डेढ़ गुना ज्यादा है । जाहिर है कि पानी के भीतर ऑक्सीजन की कमी बढ़ती जा रही है । यह स्पष्ट दिखाता है कि गंगा में टेनरियों और सीवरेज का कचरा नालों के जरिये लगातार सीधे गिराया जा रहा है । शुरुआत में गंगा नदी के लिए लाइलाज बने सीसामऊ नाले को केंद्र सरकार की सक्रियता के चलते बंद तो करा दिया गया लेकिन अभी भी करीब सात नाले ऐसे हैं, जिन्हें टैप नहीं किया जा सका है ।


दूसरी वजह यह है कि गंगा में टेनरियों और नालों का प्रदूषित पानी रोकने के लिए स्थापित किए गए र्ट्रीटमेंट प्लांट का संचालन सही तरीके से नहीं हो रहा है । यही वजह है कि गंगा में प्रदूषण कम होने के बजाय बढ़ता जा रहा है । बोर्ड की रिपोर्ट कहती है कि मई की गर्मी और उसके बाद बरसात में नदी का जल स्तर बढ़ने के बाद भी बीओडी की मात्रा में विशेष अंतर नहीं आया । 

पिछले साल ही  प्रयागराज उच्च न्यायालय ने कहा था कि यह चिंताजनक है कि गंगा में प्रदूषण का ग्राफ गिरने की बजाय बढ़ता जा रहा है । राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन  की रिपोर्ट में पाया कि गंगा के प्रमुख पांच राज्यों में कुल सीवेज के उपचार के लिए मौजूद 245 एसटीपी में से 226 एसटीपी ही ठीक हैं । यह सभी अपनी क्षमता का महज 68 फीसदी ही काम कर रहे हैं ।

गंगा प्रदूषण मामले की सुनवाई के दौरान बड़ा खुलासा हुआ कि सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट अडानी की कंपनी चला रही हैं और सरकार के साथ उनके करार यह दर्ज है कि किसी समय प्लांट में क्षमता से अधिक गंदा पानी आया तो शोधित करने की जवाबदेही कंपनी की नहीं होगी । इस पर कोर्ट ने कहा, ‘‘ऐसे करार से तो गंगा साफ होने से रही । योजनाएं इस तरह की बन रही हैं जिससे दूसरों को लाभ पहुंचाया जा सके और जवाबदेही किसी की न हो  ।’’ एक जनहित याचिका की सुनवाई कर रही इलाहाबाद हाईकोर्ट की पूर्णपीठ मुख्य न्यायाधीश राजेश बिंदल, न्यायमूर्ति एम के गुप्ता तथा न्यायमूर्ति अजित कुमार ने कहा कि जब ऐसी संविदा है तो शोधन की जरूरत ही क्या है ? उच्च न्यायालय ने इस बात पर गुस्सा जताया कि यूपी प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड मूकदर्शक बना हुआ है और कहा, ‘‘इस विभाग की जरूरत ही क्या है, इसे बंद कर दिया जाना चाहिए  । कार्यवाही करने में क्या डर है । कानून में बोर्ड को अभियोग चलाने तक का अधिकार है ।’’ कोर्ट ने कहा जल निगम एसटीपी की निगरानी कर रहा है किन्तु उसके पास पर्यावरण इंजीनियर नहीं है ।

उल्लेखनीय है कि उत्तर प्रदेश में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) सिर्फ 136 एसटीपी की निगरानी करता है । इसमें से 105 ही काम कर रहे हैं, जिनमें से 96 एसटीपी नियम और मानकों का पालन नहीं कर रहे हैं । इसकी वजह से नारोरा के बाद 97 स्थानों पर पानी की गुणवत्ता बहुत खराब है ।

उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल में 10139–3 एमएलडी (मिलियन लीटर प्रतिदिन) सीवेज पैदा होता है । 3959–16 एमएलडी यानी करीब 40 फीसदी सीवेज ही ट्रीटमेंट प्लांट से होकर गुजरता है । बाकी 6180–2 एमएलडी यानी 60 फीसदी को सीधा गंगा में गिराया जाता है । गंगा के प्रमुख पांच राज्यों में मौजूद 226 सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) भी अपनी क्षमता से कम काम कर रहे हैं और गंगा में सीधे गिरने वाले सीवेज की मात्रा में लगातार बढोत्तरी कर रहे हैं ।

यह दुर्भाग्य है कि गंगा पवित्रता अभियान  स्वच्छता के स्थान पर सौन्दर्यीकरण में धन फूंकने का जरिया  बन गया है। नदी के घात भले ही कच्चे हों लेकिन पानी में गंदगी न हो और धरा की अविरलता हो ; जबतक यह संकल्प नहीं लिया जाता- गंगा अकेवल कागजों में  पवित्र दिखेगी ।

The right to a dignified farewell and a new standard in medical world

  गरिमापूर्ण विदाई का अधिकार और चिकित्सा की नई मर्यादा पंकज चतुर्वेदी लगभग  12 साल असीम और अव्यक्त पीड़ा के साथ  जीवन जी रहे हरीश राणा अं...