My writings can be read here मेरे लेख मेरे विचार, Awarded By ABP News As best Blogger Award-2014 एबीपी न्‍यूज द्वारा हिंदी दिवस पर पर श्रेष्‍ठ ब्‍लाॅग के पुरस्‍कार से सम्‍मानित

रविवार, 3 सितंबर 2017

fertle land turning in ravine is alarming for countr

इस तरह तो पैरों के नीचे से खिसक जाएगी जमीन

इसरो का एक शोध बताता है कि थार रेगिस्तान अब राजस्थान से बाहर निकलकर कई राज्यों में जड़ जमा रहा है।

रेगिस्तान बनने का खतरा उन जगहों पर ज्यादा है, जहां पहले उपजाऊ जमीन थी।



जलवायु परिवर्तन, बढ़ती आबादी और खेती के अलाभकारी कर्म से जहां आम लोगों व मवेशियों के लिए खाने का संकट बढ़ रहा है, वहीं ये बेरोजगारी, अनियोजित शहरीकरण और पलायन का भी कारण बन रहे हैं। देश के सामने दबे पांव आ रही इस भीषण चुनौती की असली वजह है कि हम बेशकीमती भूमि खोते जा रहे हैं। नदियों व समुद्र के प्रवाह में जमीन का क्षरण हो रहा है, तो अंधाधुंध रसायनों के इस्तेमाल व जंगल उजड़ने से साल-दर-साल बंजर जमीन व रेगिस्तान का विस्तार हो रहा है। विकास, आर्थिक संपन्नता, सभी को आवास, बिजली, बेहतर परिवहन आदि तभी तक सार्थक हैं, जब तक हमारे पास जमीनें हैं। उर्वर जमीन गई, तो यह किसी कारखाने में न तो बन सकती है, न ही इसका आयात हो सकता है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, उत्तर प्रदेश में 2,42,02,000 हेक्टेयर भूमि है, जिसमें से शुद्ध बुआई वाला (यानी जहां खेती होती है) रकवा 1,68,12,000 हेक्टेयर है। यह कुल जमीन का 69.़5 फीसदी है। जाहिर है, राज्य के लोगों की जीविका का सबसे बड़ा जरिया खेती ही है। राज्य में कोई ढाई फीसदी जमीन ऊसर या खेती के लायक नहीं है। यहां 53 प्रतिशत आबादी किसान है और 20 प्रतिशत खेतिहर मजदूर। यानी लगभग तीन-चौथाई आबादी इसी जमीन से अन्न जुटाती है। एक बात और गौर करने लायक है कि 1970-1990 के दो दशकों के दौरान राज्य में नेट बोया गया क्षेत्रफल 173 लाख हेक्टेयर स्थिर रहने के पश्चात अब लगातार कम हो रहा है। भारत सरकार के पर्यावरण व वन मंत्रलय के लिए इसरो द्वारा रिमोट सेंसिंग सैटेलाइट से हाल ही में किए गए एक सर्वे की रिपोर्ट बताती है कि बीते आठ वर्षो में झारखंड जैसे छोटे, लेकिन हरे-भरे राज्य में करीब 80 हजार हेक्टेयर जमीन बंजर हो गई। इसका सबसे बड़ा कारण भूमि कटाव है। राज्य में 23 लाख हेक्टेयर जमीन यदि सघन वनाच्छादित नहीं की गई, तो जल्द ही वहां कटाव और बंजर का साम्राज्य होगा। मरुस्थलीकरण का संकट दुनिया के सामने बेहद चुपचाप, पर खतरनाक तरीके से बढ़ रहा है। इसकी चपेट में आए इलाकों में लगभग आधे अफ्रीका व एक-तिहाई एशिया के देश हैं। यहां बढ़ती आबादी के भोजन, आवास, विकास आदि के लिए बेतहाशा जंगल उजाड़े गए हैं। नवधनाढय़ वर्ग ने वातानुकूलन जैसी सुविधाओं का ऐसा इस्तेमाल किया कि ओजोन परत का छेद और बढ़ गया। याद करें कि सत्तर के दशक में अफ्रीका के साहेल इलाके में भयानक अकाल पड़ा था, तभी संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियों ने चेताया था कि लगातार बंजर हो रही जमीन के प्रति बेपरवाही रेत के अंबार को न्योता दे रही है। उस समय कुछ ऐसी सिंचाई प्रणालियां शुरू हुईं, जिनसे एकबारगी तो हरियाली आती लगी, पर तीन दशक के बाद वे परियोजनाएं भी बंजर, दलदली जमीन बनाने लगीं। ऐसी ही जमीन, जिसकी ‘टॉप सॉइल’ मर जाती है, और देखते-देखते मरुस्थल बन जाती है। जाहिर है, रेगिस्तान बनने का खतरा उन जगहों पर ज्यादा है, जहां पहले उपजाऊ जमीन थी और अंधाधुंध खेती, भूजल दोहन या सिंचाई के कारण उसकी उर्वरा शक्ति खत्म हो गई। दीगर है कि धरती के महज सात फीसदी इलाके में मरुस्थल है, पर खेती में काम आने वाली लगभग 35 प्रतिशत जमीन ऐसी भी है, जो शुष्क कहलाती है और यही खतरे का केंद्र है। बेहद हौले से विस्तार पा रहे रेगिस्तान का सबसे ज्यादा असर एशिया में ही है। इसरो का एक शोध बताता है कि थार रेगिस्तान अब राजस्थान से बाहर निकलकर कई राज्यों में अपनी जड़ें जमा रहा है। हमारे 32 प्रतिशत भूभाग की उर्वर क्षमता कम हो रही है, जिसमें से महज 24 फीसदी ही थार के इर्द-गिर्द के इलाके हैं।आज जब पृथ्वी पर जनसंख्या विस्फोट की स्थिति है, लोगों के रहने, उनका पेट भरने के लिए खाद्य पदार्थ उगाने, विकास से उपजे पर्यावरणीय संकट से जूझने के लिए हरियाली की जरूरत लगातार बढ़ रही है, तो धरती का मातृत्व गुण दिनोंदिन चुकता जा रहा है। दुर्भाग्यपूर्ण यह भी है कि मानव सभ्यता के लिए यह संकट स्वयं मानव द्वारा कथित प्रगति की दौड़ में उपजाया जा रहा है। जिस देश की बड़ी आबादी का मूल आधार कृषि हो, वहां एक तिहाई भूमि का बंजर होना काफी गंभीर मामला है।

शनिवार, 2 सितंबर 2017

It was wake up call for Big "garbage-bomb"

सावधान! यह तो छोटा धमाका है ‘कूड़ा बम’ का

                                                                                                                          पंकज चतुर्वेदी


वहीं पास से प्रधानमंत्रीजी की ‘स्वप्न परियोजना’ की आठ लेन चौड़ी सड़क का काम चल रहा है और दिन में ढाई बजे के आपसपास ऐसा लगा कि कोई बादल फटा हो, कूड़े के पहाड़ का बड़ा हिस्सा अपनी जगह से खिसका और करीब बहने वाले गंदे चौडे से नाले या नहर में इतने वेग से गिरा कि पानी उछल कर सड़क पर आया व कई गाड़ियों व इंसानों को अपने साथ बहाकर ले गया। अभी उस हादसे में मरे लेागों की संख्या को ले कर भले ही संषय हो, लेकिन यह तय हो गया है कि लगातार अदालत व एनजीटी की चेतावनियों को अनदेखा करने का ही परिणाम है कि देष की राजधानी का ‘कूड़ बम’ अब जानलेवा बन गया है। दिनांक 18 दिसंबर 2014 को दिल्ली हाई कोर्ट चेतावनी दे चुका है कि यदि समय रहते कदम नहीं उठाए गए तो दिल्ली जल्दी ही ठोस कचरे के ढेर में तब्दील हो जाएगी। दिल्ली में अभी तक कोई दो करोड मीट्रिक टन कचरा जमा हो चुका है और हर दिन आठ हजार मीट्रिक टन कूड़ा पैदा हो रहा है जिसमें से एक हजार टन प्लास्टिक का लाइलाज कचरा होता है। इसके निस्तारण के लिए कहीं जमीन भी नहीं बची है। मौजूदा लेंडफिल साईट डेढ सौ फुट से ऊंची हो गई हैं और उन पर अब अधिक कचरा नहीं डाला जा सकता। लेकिन समूचा सिस्टम इंतजार करता रहा कि कोई हादसा हो फर इस ओर ध्यान दिया जाए।
दिल्ली की नगर निगम कई-कई सौ किलोमीटर दूर तक दूसरे राज्यों में कचरे का डंपिंग ग्राउंड तलाष रही है। जरा सोचें कि इतने कचरे को एकत्र करना, फिर उसे दूर तक ढो कर ले जाना कितना महंगा व जटिल काम है।  यह सरकार भी मानती है कि देष के कुल कूड़े का महज पांच प्रतिषत का ईमानदारी से निबटान हो पाता है।  राजधानी दिल्ली का तो 57 फीसदी कूड़ा परोक्ष या अपरोक्ष रूप से यमुना में बहा दिया जाता है।  कागज, प्लास्टिक, धातु  जैसा बहुत सा कूड़ा तो कचरा बीनने वाले जमा कर रिसाईकलिंग वालों को बेच देते हैं। सब्जी के छिलके, खाने-पीने की चीजें, मरे हुए जानवर आदि कुछ समय में सड़-गल जाते हैं। इसके बावजूद ऐसा बहुत कुछ बच जाता है, जो हमारे लिए विकराल संकट का रूप लेता जा रहा है।
राजधानी दिल्ली में कचरे का निबटान अब हाथ से बाहर निकलती समस्या बनता जा रहा है। अभी हर रोज आठ हजार मीट्रिक टन कचरा उगलने वाला महानगर 2021 तक 16 हजार मीट्रिक टन कचरा उपजाएगा। फिलहाल महानगर का कचरा खपाने के तीन खत्ते या डंपिंग ग्राउंड हैं -गाजीपुर, ओखला और भलस्वा । गाजीपरु में कूड़ा खाने का कर्य जब सन 1984 में षुरू हुआ था तो इसकी क्षेत्रफल 30 एकड़ हुआ करता था, जो आज 76 एकड़ हो गया। नियम है कि कूड़े के ढेर की ऊंचाई अधिकतम 20 मीटर हो, लेकिन गाजीपुर का पहाड़ 50 मीटर से आगे निकल गया है। सरकारी रिकार्ड कहता है कि यह स्थान पर सन 2006 में ही कह दिया गया था कि अब यहां और कूड़ा नहीं खपाया जा सकता,इसके बावजूद यहां आज भी हर दिन छह सौ ट्रक कूड़ा आता है , जो लगभग 2000 टन होता है।
विडंबना है कि दिल्ली के अपने कूडे़-ढलाव कई साल पहले पूरी तरह भर गए हैं और आसपास 100 किलोमीटर दूर तक कोई नहीं चाहता कि उनके गांव-कस्बे में कूड़े का अंबार लगे। सटे हुए जिले गाजियबाद की नगर निगम ने 24 अगस्त को ही दिल्ली नगर निगम के दो ट्रकों को रंगेहाथें पकड़ाा था जब वे अपना कूड़ा सटी हुई कालोनियों में रात में फैंक कर जा रहे थे। इन ट्रकों पर पांच पांच हजार का जुर्माना भी किया गया था।  कहने को दिल्ली में दो साल पहले पोलीथीन की थैलियों पर रोक लगाई जा चुकी है, लेकिन आज भी प्रतिदिन 583 मीट्रिक टन कचरा प्लास्टिक का ही है। इलेक्ट्रानिक और मेडिकल कचरा तो यहां के जमीन और जल को जहर बना रहा है।
गाजीपुर में हुए धमाके का कारण भी कूड़े का लगातार सड़ना व उससे खतरनाक गैसों का उत्सजग्न होतना ही बताया गया है। सनद रहे कि दिल्ली के कूड़े में बड़ी मात्रा में सबसे खतरनाक कूड़ा तो बैटरियों, कंप्यूटरों और मोबाईल का है। इसमें पारा, कोबाल्ट, और ना जाने कितने किस्म के जहरीले रसायन होते हैं। एक कंप्यूटर का वजन लगभग 3.15 किलो ग्राम होता है। इसमें 1.90 किग्रा लेड और 0.693 ग्राम परा और 0.04936 ग्राम आर्सेनिक होता हे। षेश हिस्सा प्लास्टिक होता है। इसमें से अधिकांष सामग्री गलती-’सड़ती नहीं है और जमीन में जज्ब हो कर मिट्टी की गुणवत्ता को प्रभावित करने  और भूगर्भ जल को जहरीला बनाने  का काम करती है। ठीक इसी तरह का जहर बैटरियों व बेकार मोबाईलो ंसे भी उपज रहा है।  ं
असल में कचरे को बढ़ाने का काम समाज ने ही किया है। अभी कुछ साल पहले तक स्याही वाला फाउंटेन पेन होता था, उसके बाद ऐसे बाल-पेन आए, जिनकी केवल रिफील बदलती थी। आज बाजार मे ंऐसे पेनों को बोलबाला है जो खतम होने पर फेंक दिए जाते हैं।  देष की बढ़ती साक्षरता दर के साथ ऐसे पेनों का इस्तेमाल और उसका कचरा बढ़ता गया। जरा सोचें कि तीन दषक पहले एक व्यक्ति साल भर में बामुष्किल एक पेन खरीदता था और आज औसतन हर साल एक दर्जन पेनों की प्लास्टिक प्रति व्यक्ति बढ़ रही है। इसी तरह षेविंग-किट में पहले स्टील या उससे पहले पीतल का रेजर होता था, जिसमें केवल ब्लेड बदले जाते थे और आज हर हफ्ते कचरा बढ़ाने वाले ‘यूज एंड थ्रो’ वाले रेजर ही  बाजार में मिलते हैं। अभी कुछ साल पहले तक दूध भी कांच की बोतलों में आता था या फिर लोग अपने बर्तन ले कर डेयरी जाते थे। आज दूध तो ठीक ही है पीने का पानी भी कचरा बढ़ाने वाली बोतलों में मिल रहा है। अनुमान है कि पूरे देष में हर रोज चार करोड़ दूध की थैलियां और दो करोड़ पानी की बोतलें कूड़े में फैंकी जाती हैं। मेकअप का सामान, घर में होने वाली पार्टी में डिस्पोजेबल बरतनों का प्रचलन, बाजार से सामन लाते समय पोलीथीन की थैलियां लेना, हर छोटी-बड़ी चीज की पैकिंग ;ऐसे ही ना जाने कितने तरीके हैं, जिनसे हम कूड़ा-कबाड़ा बढ़ा रहे हैं। घरों में सफाई  और खुषबू के नाम पर बढ़ रहे साबुन व अन्य रसायनों के चलन ने भी अलग किस्म के कचरे को बढ़ाया है। सरकारी कार्यालयों में एक-एक कागज की कई-कई प्रतियां बनाना, एक ही प्रस्ताव को कई-कई टेबल से गुजारना, जैसे कई कार्य हैं जिससे कागज, कंप्ूयटर के प्रिंिटग कार्टेज आदि का व्यय बढता है। और इसी कूड़े को खपाने की सभी येाजनांए विफल हो रही है। जाहिर है कि अनिवार्यता कूड़े को कम करने की होना चाहिए। इसको कम करने की योजना बनाना जरूरी है।
हाल ही में कहा गया था कि गाजीपुर में आफत बने कूड़े से राश्ट्रीय राजमार्ग बनाने का काम होगा। लेकिन यह अनिवार्य है कि दिल्ली के कूड़े को ठिकाने लगाने के लिए नए ठिकाने तलाषें जाएं, इससे भी ज्यादा अनिवार्य हैै कि कूड़ा कम करने के सषक्त प्रयास हों। इसके लिए केरल में कन्नूर जिले से सरीख ले सकते हैं जहां पूरे जिले में बॉल पेन के इस्तेमाल से लेागों ने तौबा कर लिया, क्योंकि इससे हर दिन लाखेां रिफील का कूड़ा निकलता था। पूरे जिले में कोई भी दुकानदार पॉलीथीन की थैली या प्लास्टिक के डिस्पोजेबल बर्तन ना तो बेचता है और ना ही इस्तेमाल करता है।

बुधवार, 30 अगस्त 2017

Elephant in villages or Villages in forest ?


गांवों में गजराज का आतंक

झारखंड के घाटशिला इलाके के आधा दर्जन गांव के लोग गत दो महीने से ना तो सो पा रहे हैं ना ही जंगल या खेत जा पा रहे हैं। गितिलडीह, चाडरी, मकरा, तालाडीह, भदुआ आदि गावों में कभी भी कोई बीस जंगली हाथियों का दल धमक जाता है, घर में रखा धन, महुआ आदि खाता है, झोपड़ियों तोड़ देता है। गांव वाले या तो भाग जाते है। या फिर मशाल जला कर उन्हें भगाने का प्रयास करते हैं। छत्तीसगढ़ के रायगढ़, बलरामपुर, सरगुजा आदि जिलों के हालात इससे अलग नहीं हैं। यहां धरमजयगढ़ ब्लाक में हाथी पिछले सप्ताह ही एक व्यक्ति को पटक कर मार चुके हैं। तमिलनाडु के वेल्लोर जिला मुख्यालय के बाहरी इलाके में एक जंगली हाथी मुदुक्करई जंगल से घुस आया और चार लोगों को पटक कर मार दिया। पश्चिम बंगाल के नागरकाटा चायबागान इलाके के मेटली ब्लाक में चाल्सा गांव में हाथी कई लोगों को बस्ती उजाड़ चुके हैं। उधर, इन दिनों झारखंड-ओडिशा-छत्तीसगढ़ की सीमा के आसपास एक हाथी-समूह का आतंक है। जंगल महकमे के लोग उस झुंड को केवल अपने इलाके से भगा कर अपने कर्तव्य की इतिश्री मान लेते हैं, जबकि ये गजराज-दल भाग कर दूसरे राज्य में उत्पात मचाते हैं। कहा जा रहा है कि हाथी बस्ती में आ गया है, लेकिन यदि तीस साल पहले के जमीन के रिकार्ड को उठा कर देखें तो साफ हो जाएगा कि इंसान ने हाथी के जंगल में घुसपैठ की है। दुनियाभर में हाथियों को संरक्षित करने के लिए गठित आठ देशों के समूह में भारत शामिल हो गया है। भारत में इसे ‘‘राष्ट्रीय धरोहर पशु’ घोषित किया गया है। इसके बावजूद भारत में बीते दो दशकों के दौरान हाथियों की संख्या स्थिर हो गई है। जिस देश में हाथी के सिर वाले गणोश को प्रत्येक शुभ कार्य से पहले पूजने की परंपरा है, वहां की बड़ी आबादी हाथियों से छुटकारा चाहती है। पिछले एक दशक के दौरान मध्य भारत में हाथी का प्राकृतिक पर्यावास कहलाने वाले झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा में हाथियों के बेकाबू झुंड के हाथों एक हजार से ज्यादा लाग मारे जा चुके हैं। धीरे-धीरे इंसान और हाथी के बीच के रण का दायरा विस्तार पाता जा रहा है। देश में हाथी के सुरक्षित कॉरिडोरों की संख्या 88 हैं, इसमें 22 पूर्वोत्तर राज्यों, 20 केंद्रीय भारत और 20 दक्षिणी भारत में हैं। कभी हाथियों का सुरक्षित क्षेत्र कहलाने वाले असम में पिछले सात सालों में हाथी व इंसान के टकराव में 467 लोग मारे जा चुके हैं। अकेले पिछले साल 43 लोगों की मौत हाथों के हाथों हुई। उससे पिछले साल 92 लोग मारे गए थे। झारखंड की ही तरह बंगाल व अन्य राज्यों में आए रोज हाथी को गुस्सा आ जाता है और वह खड़े खेत, घर, इंसान; जो भी रास्ते में आए कुचल कर रख देता है। देशभर से हाथियों के गुस्साने की खबरें आती ही रहती हैं। पिछले दिनों भुवनेश्वर में दो लोग हाथी के पैरों तले कुचल कर मारे गए। छत्तीसगढ़ में हाथी गांव में घुस कर खाने-पीने का सामान लूट रहे हैं। दक्षिणी राज्यों के जंगलों में गर्मी के मौसम में हर साल 20 से 30 हाथियों के निर्जीव शरीर संदिग्ध हालात में मिल रहे हैं। प्रकृति के साथ लगातार हो रही छेड़छाड़ को अपना हक समझने वाला इंसान हाथी के दर्द को समझ नहीं रहा है और धरती पर पाए जाने वाले सबसे भारी-भरकम प्राणी का अस्तित्व संकट में है। जानना जरूरी है कि हाथियों को 100 लीटर पानी और 200 किलो पत्ते, पेड़ की छाल आदि की खुराक जुटाने के लिए हर रोज 18 घंटों तक भटकना पड़ता है। हाथी दिखने में भले ही भारी-भरकम हैं, लेकिन उसका मिजाज नाजुक और संवेदनशील होता है। थोड़ी थकान या भूख उसे तोड़ कर रख देती है। ऐसे में थके जानवर के प्राकृतिक घर यानी जंगल को जब नुकसान पहुंचाया जाता है तो मनुष्य से उसकी भिडं़त होती है। बढ़ती आबादी के भोजन और आवास की कमी को पूरा करने के लिए जमकर जंगल काटे जा रहे हैं। उसे जब भूख लगती है और जंगल में कुछ मिलता नहीं या फिर जल-स्रेत सूखे मिलते हैं तो वे खेत या बस्ती की ओर आ जाते हैं। मानव आबादी के विस्तार, हाथियों के प्राकृतिक वास में कमी, जंगलों की कटाई और बेशकीमती दांतों का लालच; कुछ ऐसे कारण हैं जिनके कारण हाथी को निर्ममता से मारा जा रहा है । यदि इस दिशा में गंभीरता से विचार नहीं किया गया तो जंगलों का सर्वोच्च गौरव कहलाने वाले गजराज को सर्कस, चिड़ियाघर या जुलूसों में भी देखना दुर्लभ हो जाए

मंगलवार, 29 अगस्त 2017

self gods are challenge to democracy

बाबाओं का साम्राज्य चिंता है लोकतंत्र के लिए

                                                                                                                                   पंकज चतुर्वेदी

सात सौ एकड़ के आलीशान परिसर में रहने वाले बाबा को जब अदालत ने लोकतंत्र के एक स्तंभ न्यायपालिका का सबक सिखाया तो तत्काल उसके गिरोह के लेागों ने कार्यपालिका को कुछ घंटे किे लिए बेबस कर दिया। जिस देश में दंगों से निबटने के लिए अलग से प्रशिक्षित रेपीड एक्शन फोर्स हो, जहां पर कश्मीर व पूर्वोत्तर में आतंकियो से जूझने वाला केंद्रीय आरक्षित पुलिस बल यानि सीआरपीएफ हो, राज्य का सशस्त्र बल और जिले की पुलिस व खुफिया तंत्र हो, उसके बावजूद सेना को महज दंगाईयों से निबटने को उतारना पड़े; यह बानगी है कि जिसके पास जमीन-जायदाद की ताकत है, उसके पास जन-बल भी है और यही भीड़-तंत्र समूचे लोकतंत्र को पंगु बनाने की ताकत रखता है। जिस तरह पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान , उप्र के कुछ हिस्सों में दो दिन से व्यवस्थाएं पंगु हैं, स्कूल-कालेज, दफ्तर बंद हैं, हजारों बसें, सैंकड़ों ट्रैन रद्द की गई हैं, यह विडंबना है कि क्या एक इतने बड़े विशाल देश के इतने समग्र तंत्र को कभी कोई एक व्यक्ति हिला सकता है। मामला महज गुरमीत के बलात्कारी घोशित होने से उपजी हिंसा का नहीं है, यह समय है पूरे देश में आस्था, धर्म और आध्यात्म के नाम पर चल रही दुकानों के ताकतवर होने के दूरगामी परिणामों का भी आकलन किया जाए।

हालांकि हम भारतीय अपने अनुभवों से मिली सीख को ज्यादा दिन स्मृति में रखने के आदी नहीं है, कुछ दिन सबकुछ सतर्कता से याद रहता है और फिर वही पुराने ढर्रे पर आ जाते हैं। पंजाब में ही चार दशक पहले सत्ता हथ्यिाने को एक बाबा तैयार किया गया था- संत भिंडरावाले और उसने देखते ही देखते अपनी समानांतर सेना तैयार कर ली थी, हरमिंदर साहब जैसे पवित्र स्थल पर कब्जा कर लिया था, । उस समय भी सेना को बुलाना पड़ा, संत तो मारा गया, लेकिन उसके रक्त-बीज ने उन्हीं की गठनकर्ता को भी निगल लिया। कभी युद्ध या खेती के लिए  महीनों घर से बाहर रहने वाली अकेली औरतों व बच्चों के सुरक्षित-निरापद, आध्यात्मिक  आवास के लिए बनने वाले डेरे धीरे-धीरे मजबूत होते गए। राधा स्वामी के ही कई अलग-अलग धड़े हैं व हर एक के पास देश के चप्पे-चप्पे में जमीनें हैं। गुरमीत राम रहीम का डेरा भी उसी में से निकला था। ऐसे ही कई बाबा-बैरागी गत चार दशकों से देश में खुद को ताकतवर बना रहे है।। भले ही आम आदमी के लिए जमींदारी एक्ट के तहत जमीन खरीदने या मालिकाना हक की सीमा हो, लेकिन आध्यात्म-धर्म का चोला पहने इन बाबाओं पर कोई सीमा या रोक नहीं हैं।

इस तरह का हर एक बाबा पहले प्रवचन देता है, फिर अचार, पापड़, बड़ी जैसा व्यापार शु रू करता है। फिर दवाएं व अन्य उपभोक्ता वस्तुएं तैयार करने लगता है। इस तरह एक तो उसके पास उसके प्रवचन वालों का दल होता है, फिर उसके यहां से रोजगार पाने वाले लोग व उनका परिवार भी अनायास उनके भीड़ का हिस्सा बन जाते हैं। याद करें जब आशाराम बापू को बलात्कार के आरोप में पकड़ा था तो उसके भक्त भी कोहराम पर उतर आए थे, अजा भी उसके समर्थन में आए रोज महिलाएं अभियान चलाती रहती हैं। आयकर विभाग ने सन 2014 में जब बापू के अमदाबाद आश्रम पर छापा डाला था तो उसके यहां से दस हजार करोड़ के नगदी, गहने, बैंक खाते, बॉंड, डिवेंचर व अन्य निवेश का रिकार्ड मिला। इसके अलावा अकेले गुजरात  के 10 जिला में 45 स्थानों पर साथ ही मप्र, राजस्थान, आन्ध्र प्रदेश , महाराष्ट्र  के आठ लिो में 33 स्थानों पर कई-कई एकड़ की जमीनें मिलीं थीं। आज भी बापू का आर्थिक सामग्राज्य उसी तरह चल रहा है और उसके तंत्र से जुड़े लोग उसके समर्थन में लगे हैं। तभी आरोप है कि बापू व उसके बेटे के खिलाफ गवाही देने वाले कई लोग अब तक मारे भी जा चुके हैं।

अभी तीन साल पहले ही सन 2000 तक सिंचाई विभाग में जूनियर इंजीनीयर रहे रामपाल के संत वाले चोले ने प्रशासन  को दस दिनों तक बंधक बनाए रखा था और उसे गिरफ्तार करने में चार लोगों की जान गई थीं। उसने भी अपने महज 12 साल के संतई अवतार में एक हजार करोड़ की संपदा कमा ली। देश के कई हिसें में उसकी जमीनें, होटल, आदि है। अभी भी बाबा के पर्याप्त समर्थक हैं जो उसकी वेबसाईट भी चला रहे हैं। ऐसे ही कई बाबा बैरागियों के किस्से व उनकी जमीन-जायदाद सामने आती रही हैं। एक संत श्री-श्री ने अदालतों व एनजीटी को धता बतोते हुए यमुना के रीवर बेड़ के पर्यावरणीय तंत्र की हत्या की और आज भी उन पर लगाया गया जुर्माने को नहीं चुकाया। रामदेव का बढ़ता व्यापारकि संसार, उनके द्वार अर्जित की गई जमीनों से जुड़े विवाद और अब उनका स्वयं का सुरक्षा बल गठित करना भी गौरतलब  है। ऐसे ही आध्यात्म के नाम पर दुकान चलाने वाला जाकिर नाईक का आतंकी कनेक्शन सामने आ चुका है। देश के हर कौने में ईसाई मिशिनरियों द्वारा जमीन खरीदने, अपना पूरा तंत्र विकसित करने से सभी वाकिफ हैं। ये सभी यदा-कदा खुद को कानून से ऊपर बताने के भीड-तंत्र का इस्तेमाल करते रहते हैं।
कहा जा सकता है कि कानून के सामने सभी समान है और कानून ऐसे स्वयंभु बाबाओं को औकात बताता रहता है, लेकिन जरा विचार करें कि एक मुजरिम को अदालत तक ले जाने के लिए यदि हजारों का सुरक्षा बल लगाना पड़े, उसको जेल तक पहुंचाने के लिए कई लेागेा की लाशों, और कई अरब की सरकारी संपत्ति के नुकसान का खामियाजा भुगतना पड़े।
गुरमीत सिंह की गिरफ्तार से पहले यदि हाई कोर्ट सख्त नहीं हुआ होता तो स्थानीय सरकार तो पूरी तरह उसके सामने नतमस्तक थी और उसका बड़ा खामियाजा देश भुगतता। यह किसी से छुपा नहीं है कि सभी राजनीतिक दल इन बाबाओं के भक्तों, संपदा और षक्ति का फायदा सत्ता शिखर तक पहुंचने के लिए उठाते हैं और तभी ये लोग अपनी समानांतर सरकार चलाने में सफल होते हैं। यह वक्त आ गया है कि सरकार व समाज दोनो इस तरह के बाबा-डेरों-संतों-आध्यात्मिक गुरूओं के संपदा एकत्र करने, उनके धन व व्यापार पर एक नियंत्रण लागू करे ताकि भविश्य में कोई ‘गुरमीत’ बाात्कार करके सउ़कों पर कानून का बलात्कार  रता ना दिखें।

शुक्रवार, 25 अगस्त 2017

Now Potato will cause cry for Farmers

सावधान! अब आलू रूलाएगा किसानों को

                                                    पंकज चतुर्वेदी

जुलाई के पहले हफ्ते में मध्यप्रदेश के कम से कम 25 जिलों की सड़कों पर प्याज के बोरे के बोर पड़े थे, लेाग मुफ्त में उठा कर ले जा रहे थे और उसके बाद एक-एक जिले में कई सौ टन प्याज सड़ने लगा। जब वातावरण में सड़े प्याज की गंध घुटने लगी तो जेसीबी मशीन लगा कर प्याज को जमींदोज करवाया गया। जुलाई के चौथे सप्ताह आते-आते राज्य में प्याज के दाम 16 रूप्ए किलो हो गए, जबकि करीबी राज्यों में यह दाम 20 से तीस रूपए किलो। और अभी से चेतावनी दे दी गई है कि आने वोले महीनों में उत्तर प्रदेश के आलू किसान भी मप्र की तरह बंपर फसल का स्यापा करने वाले हैं। इसके बावजूद सरकार इस दिशा में फिलहाल कुछ नहीं सोच रही है। संकट होगा, बवाल होग, मुआवजा बंटेंगा- समूची सियासत इसी पर चलती है। यदि सरकारी आंकड़ों पर भरोसा करें तो हमारे देश में हर साल षीत भंडारण गृहों के अभाव में एक लाख करोड़ का कृशि उत्पाद नश्ट हो जाता है। अपनी फसल का माकूल दाम ना मिलने पर सरकार जितना मुआवजा या खाटे में उत्पाद खरीदती है उस पर एक साल में किए गए व्यय से आंचलिक क्षेत्रों में भंडारण की माकूल व्यवस्था बना दी जाए तो किसान को अपना माल तत्काल बेचने की बैचेनी या मजबूरी नहीं रहेगी, इसके चलते उसे फसल का सही दाम भी मिलेगा और बाजार खुद उसके पास चल कर बाजार आएगा।

एक तरफ जहां किसान प्राकृतिक आपदा में अपनी मेहनत व पूंजी गंवाता है तो यह भी डरावना सच है कि हमारे देश में हर साल कोई 75 हजार करोड के फल-सब्जी, माकूल भंडारण के अभाव में नश्ट हो जाते हैं।  आज हमारे देश में कोई 6300 कोल्ड स्टोरेज हैं जिनकी क्षमता 3.5 करोड़ मैट्रीक टन की है।  जबकि हमारी जरूरत 6100 मोट्रीक टन क्षमता के कोल्ड स्टोरेज की है। मोटा अनुमान है कि इसके लिए लगभग 55 हजार करोड रूपए की जरूरत है। जबकि इससे एक करोड़ 20 लाख किसानों को अपने उत्पाद के ठीक दाम मिलने की गारंटी मिलेगी। वैसे जरूरत के मुताबिक कोल्ड स्टोरेज बनाने का व्यय सालाना हो रहे नुकसान से भी कम है। चाहे आलू हो या मिर्च या ऐसेी ही फसल, इनकी खासियत है कि इन्हें लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है। आलू, मटर, टमाटर, अंगूर आदि का प्रसंस्करण कर वह पर्याप्त लाभ देती हैं।

सरकार मंडियों से कर वूसलने, वहां राजनीति करने में तो आगे रहती है, लेकिन वेयर हाउस या कोल्ड स्टोरेज स्थापित करने की उनकी जिम्मेदारिया पर चुप रहती हे। यही तो उनके द्वारा किसान के षोशण का हथियार भी बनता हे।
भारत के सकल घरेलू उत्पाद का 31.8 प्रतिशत खेती-बाड़ी में तल्लीन कोई 64 फीसदी लोगों के पसीने से पैदा होता है । दुखद कि देश की अर्थ व्यवस्था की रीढ़ कहलाने वाली खेती के विकास के नाम पर बुनियादी सामाजिक सुधारों को लगातार नजरअंदाज किया जाता रहा है । पूरी तरह प्रकृति की कृपा पर निर्भर किसान के श्रम की सुरक्षा पर कभी गंभीरता से सोचा ही नहीं गया । फसल बीमा की कई योजनाएं बनीं, उनका प्रचार हुआ, पर हकीकत में किसान यथावत ठगा जाता रहा- कभी नकली दवा या खाद के फेर में तो कभी मौसम के हाथों । किसान जब ‘‘केश क्राप’’ यानी फल-सब्जी आदि की ओर जाता है तो आढ़तियों और बिचौलियों के हाथों उसे लुटना पड़ता है।

उत्तर प्रदेश का आलू किसान अपने खेत में षानदार फसल देख कर ही तनाव में है। राज्य के कोल्ड स्टोरेज में पहले से ही 90 लाख मीट्रिक टन से ज्यादा आलू भरा है। बाहरी राज्यों से मांग न होने से निकासी हो नहीं रही है। उधर कर्नाटक में आलू की फसल आ गई है सो दक्षिणी राज्यों के निर्यात का रास्ता बंद हो गया। स्थानीय बाजार के लिए आलू के दाम अधिकतम 400 रूप्ए क्विंटल हैं और इससे कियान की लागत भी नहीं निकल रही। हालात यही रहे तो इस बार कोल्ड स्टोरेज में आलू सड़ेगा। वैसे भी सरकारी समर्थन मूल्य 487 रुपये प्रति क्विंटल की दर से तो कोल्ड स्टोरेज किराया व रखरखाव आदि की पूर्ति भी बामुश्किल हो पाती है।
हर दूसरे-तीसरे साल कर्नाटक कंे कई जिलों के किसान अपने तीखे स्वाद के लिए मशहूर हरी मिर्चों को सड़क पर लावारिस फैंक कर अपनी हताशा का प्रदर्शन करते हैंे। तीन महीने तक दिन-रात खेत में खटने के बाद लहलहाती फसल को देख कर उपजी खुशी किसान के ओठों पर ज्यादा देर ना रह पाती है। बाजार में मिर्ची की इतनी अधिक आवक होती है कि खरीदार ही नहीं होते। उम्मीद से अधिक हुई फसल सुनहरे कल की उम्मीदों पर पानी फेर देती है- घर की नई छप्पर, बहन की षादी, माता-पिता की तीर्थ-यात्रा; ना जाने ऐसे कितने ही सपने वे किसान सड़क पर मिर्चियों के साथ फैंक आते हैं। साथ होती है तो केवल एक चिंता-- मिर्ची की खेती के लिए बीज,खाद के लिए लिए गए कर्जे को कैसे उतारा जाए? सियासतदां हजारेंा किसानों की इस बर्बादी से बेखबर हैं, दुख की बात यह नहीं है कि वे बेखबर हैं, विडंबना यह है कि कर्नाटक में ऐसा लगभग हर साल किसी ना किसी फसल के साथ होता है। सरकारी और निजी कंपनियां सपने दिखा कर ज्यादा फसल देने वाले बीजों को बेचती हैं, जब फसल बेहतरीन होती है तो दाम इतने कम मिलते हैं कि लागत भी ना निकले।

देश के अलग-अलग हिस्सों में कभी टमाटर तो कभी अंगूर, कभी मूंगफली तो कभी गोभी किसानों को ऐसे ही हताश करती है। राजस्थान के सिरोही जिले में जब टमाटर मारा-मारा घूमता है तभी वहां से कुछ किलोमीटर दूर गुजरात में लाल टमाटर के दाम ग्राहकों को लाल किए रहते हैं। दिल्ली से सटे पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई जिलों में आए साल आलू की टनों फसल बगैर उखाड़े, मवेशियों को चराने की घटनाएं सुनाई देती हैं। आश्चर्य इस बात का होता है कि जब हताश किसान अपने ही हाथों अपनी मेहनत को चौपट करता होता है, ऐसे में गाजियाबाद, नोएडा, या दिल्ली में आलू के दाम पहले की ही तरह तने दिखते हैं। राजस्थान, मध्यप्रदेश, महाराश्ट्र, और उप्र के कोई दर्जनभर जिलों में गन्ने की खड़ी फसल जलाने की घटनांए हर दूसरे-तीसरे साल होती रहती है। जब गन्ने की पैदावार उम्दा होती है तो तब षुगर मिलें या तो गन्ना खरीद पर रोक लगा देती हैं या फिर दाम बहुत नीचा देती हैं, वह भी उधारी पर। ऐसे में गन्ना काट कर खरदी केंद्र तक ढो कर ले जाना, फिर घूस दे कर पर्चा बनवाना और उसके बाद भुगतान के लिए दो-तीन साल चक्कर लगाना; किसान को घाटे का सौदा दिखता है। अतः वह खड़ी फसल जला कर अपने

कृशि प्रधान अर्थव्यवस्था वाले देश में कृशि उत्पाद के न्यूनतम मूल्य, उत्पाद खरीदी, बिचौलियों की भूमिका, किसान को भंडारण का हक, फसल-प्रबंधन जैसे मुद्दे, गौण दिखते हैं सब्जी, फल और दूसरी कैश-क्राप को बगैर सोचे-समझे प्रोत्साहित करने के दुश्परिणाम दाल, तेल-बीजों(तिलहनों) और अन्य खाद्य पदार्थों के उत्पादन में संकट की सीमा तक कमी के रूप में सामने आ रहे हैं। आज जरूरत है कि खेतों में कौन सी फॅसल और कितनी उगाई जाए, पैदा फसल का एक-एक कतरा श्रम का सही मूल्यांकन करे; इसकी नीतियां तालुका या जनपद स्तर पर ही बनें। कोल्ड स्टोरेज या वेअर हाउस पर किसान का कब्जा हो, साथ ही प्रसंस्करण के कारखाने छोटी-छोटी जगहों पर लगें।
किसान भारत का स्वाभिमान है और देश के सामाजिक व आर्थिक ताने-बाने का महत्वपूर्ण जोड़ भी इसके बावजूद उसका षोशण हो रहा है । किसान को उसके उत्पाद का सही मूल्य मिले, उसे भंडारण, विपणन की माकूल सुविधा मिले, खेती का खर्च कम हो व इस व्यवसाय में पूंजीपतियों के प्रवेश पर प्रतिबंध -जैसे कदम देश का पेट भरने वाले किसानों का पेट भर सकते हैं । विडंबना है कि हमारे आर्थिक आधार की मजबूत कड़ी के प्रति ना ही समाज और ना ही सियासती दल संवेदनशील दिख रहे हैं। काश कोई किसान को फसल की गारंटेड कीमत का आश्वासन दे पाता  तो किसी भी किसान कोे कभी जान ना देनी पड़ती।


पंकज चतुर्वेदी
साहिबाबाद गाजियाबाद 201005
9891928376





मंगलवार, 22 अगस्त 2017

Defeated China in South China sea is crying in sikkim

डोकलाम विवाद

चीन सागर में हताशा की प्रतिक्रिया


                                                                                            पंकज चतुर्वेदी 



अमेरिका ने अपना युद्ध पोत साउथ चाइना सी में उतार दिया है। अमेरिका के इस कदम में जापान और भारत भी उसके साथ है। यहां जानना जरूरी है कि दक्षिणी चीन के समुद्र में सुलग रही आग काफी सालों से भड़कते-भड़कते बच रही है। यह भी जानना जरूरी है कि कोई 35 लाख वर्ग किलोमीटर में फैले दक्षिणी चीन समुद्र क्षेत्र का नाम ही चीन पर है और उस पर चीन का कोई न तो पारंपरिक हक है और न ही वैधानिक। इस पर मुहर पिछले साल 2016 के जुलाई में अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय लगा चुका है। खुद को इतना दबाव में देख कर चीन बेवजह डोकलाम में सीमा विवाद कर दुनिया को युद्ध की धमकी के साथ दबाना चाहता है। जबकि अब भारत ने सिक्किम व अरुणाचल सीमा पर एक इंच भी पीछे हटने से इंकार कर दिया है।
दक्षिणी चीन समुद्र का जल क्षेत्र, कई एशियाई देशों जिनमें वियतनाम, फिलीपींस, मलेशिया आदि शामिल हैं, के चीन के साथ तनाव का कारण बना हुआ है। चीन ने इस इलाके के कुछ द्वीपों पर लड़ाकू विमानों के लिए पट्टी बना लीं तो अमेरिका के भी कान खड़े हो गए। अमेरिका ने इस पर सख्त आपत्ति जतायी। पिछले दिनों अमेरिका की नौ सेना के समुद्री सर्वेक्षण विभाग द्वारा समुद्र के खारेपन और तापमान बाबत एक सर्वेक्षण हेतु इस समुद्री क्षेत्र में एक ड्रोन को पानी की गहराई में छोड़ा गया था। चीन ने अपनी नौसेना के जरिये उस ड्रोन को पानी से निकलवा कर जब्त कर लिया। विदेश नीति के माहिर लोग जानते हैं कि डोनाल्ड ट्रंप के चुनाव जीतते ही उनके द्वारा ताइवान के राष्ट्रपति तसाई इंग वेनमे से फोन पर बात करना चीन को नागवार गुजरा था। चीन का कहना है कि ताइवान पर उसका कब्जा है और उसने ताइवान को केवल प्रशासिनक स्वायत्तता प्रदान की है।
दक्षिणी चीन समुद्र दक्षिणी-पूर्वी एशिया से प्रशांत महासागर के पश्चिमी किनारे चीन, ताइवान, फिलीपीन्स, मलेशिया, इंडोनेशिया और वियतनाम स्थित हैं। ये सभी देश इस समुद्र पर अपने-अपने दावे कर रहे हैं। 1947 में चीन ने नक्शे के जरिए इस पर अपना दावा पेश किया था। इसके बाद कई एशियाई देशों ने चीन के इस कदम से असहमति जताई। वियतनाम, फिलीपीन्स और मलेशिया ने भी कई द्वीपों पर दावा किया। वियतनाम ने कहा कि उसके पास जो नक्शा है उसमें पार्सेल और स्प्रैटली आइलैंड्स प्राचीन काल से उसका हिस्सा है। इसी तरह ताइवान ने भी दावा किया। गत 17 साल से फिलीपींस कूटनीतिक प्रयासों के जरिये चीन से दक्षिण चीन सागर विवाद सुलझा लेना चाहता था। बात बनी नहीं, तो फिलीपींस ने 2013 में हेग स्थित अंतर्राष्ट्रीय न्यायाधिकरण ‘पीसीए’ का दरवाजा खटखटाया। न्यायाधिकरण ने 12 जुलाई, 2016 को संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून के अनुच्छेद-258 को आधार बनाकर फैसला दिया कि ‘नाइन डैश लाइन’ की परिधि में आने वाले जल क्षेत्र पर चीन कोई ऐतिहासिक दावेदारी नहीं कर सकता।
असल में इस महत्वपूर्ण समुद्र इलाके से हर साल कम से कम पांच सौ अरब डॉलर के सामान की आवाजाही होती है। यहां तेल और गैस का विशाल भंडार है। यूएस डिपार्टमेंट ऑफ एनर्जी के अनुमान के मुताबिक यहां 11 बिलियन बैरल्स ऑइल और 190 ट्रिलियन क्यूबिक फीट प्राकृतिक गैस संरक्षित है। 1982 के यूनाइटेड नेशंस कन्वेंशन ऑन द लॉ ऑफ द सी के मुताबिक कोई भी देश अपने समुद्री तटों से 200 नॉटिकल मील की दूरी तक समुद्री संसाधनों मछली, तेल, गैस आदि पर दावा कर सकता है। इस संधि को चीन, वियतनाम, फिलीपीन्स और मलेशिया ने तो माना लेकिन अमेरिका ने इस पर दस्तखत नहीं किए। वैसे तो दक्षिणी चीनी समुद्र पर अमेरिका का न तो कोई दावा है और न ही इसकी सीमा उससे कहीं लगती है। लेकिन वह इस महत्वपूर्ण मार्ग व ऊर्जा के भंडार पर निगाह तो रखता ही है। इस इलाके के ऊर्जा संसाधनों पर भारत की भी रुचि है। वियतनाम तो भारत को बाकायदा यहां गैस व तेल की खोज के लिए आमंत्रित भी कर चुका है। सन‍् 2011 में ओएनजीसी विदेश लिमिटेड ने जब वियतनाम में तेल की खोज आरंभ की, तो चीन काफी रोष में था। चीन कई बार अमेरिका को धमका चुका है कि वह दक्षिण चीन सागर से दूर रहे। चीन ने इन दिनों कहना शुरू किया है कि भारत यदि वियतनाम में तेल की खोज कर सकता है तो पाक अधिकृत कश्मीर में हमारे प्रोजेक्ट क्यों नहीं लग सकते।
अमेरिकी चिंता है कि पेइचिंग इसका इस्तेमाल अपनी रणनीतिक पहुंच बढ़ाने के लिए कर सकता है। वहीं तेल व गैस के लिए अरब देशों पर उसकी निर्भरता का आधार भी कमजोर होता जा रहा है।  दूसरा घरेलू दवाब के चलते उस क्षेत्र में वह अब लंबे समय तक सेना रख नहीं पाएगा। ऐसे हालात में उसे तेल व गैस के नए भंडार चाहिए।
चूंकि चीन को किसी भी सूरत में साउथ चाइना सी पर से अपना दावा और कब्जे को छोड़ना ही पड़ेगा, सो वह भारत के साथ सैन्य टकराव की बात कर रहा है। इससे एक तो अपने नागरिकों को वह अपनी ताकत पर विश्वास दिलाना चाहता है, दूसरा परमाणु संपन्न और दुनिया की दो बड़ी सैन्य ताकतों के टकराव के चलते विश्व युद्ध के भय को फैलाकर वह साउथ चाइना सी क्षेत्र में अपना कुछ हिस्सा बताना चाहता है।

Religion of terrorism. Bail order of Purohit in Malegaon blast by Supreme court

This is the decision of Supreme court on bail petition of col. purohit on Hidu terrorism
Is the terrorism have color of religion ?

























The right to a dignified farewell and a new standard in medical world

  गरिमापूर्ण विदाई का अधिकार और चिकित्सा की नई मर्यादा पंकज चतुर्वेदी लगभग  12 साल असीम और अव्यक्त पीड़ा के साथ  जीवन जी रहे हरीश राणा अं...