My writings can be read here मेरे लेख मेरे विचार, Awarded By ABP News As best Blogger Award-2014 एबीपी न्‍यूज द्वारा हिंदी दिवस पर पर श्रेष्‍ठ ब्‍लाॅग के पुरस्‍कार से सम्‍मानित

गुरुवार, 28 जुलाई 2022

Alternative arrangements needed for ban on polythene

 पॉलीथीन पर पाबंदी के लिए चाहिए वैकल्पिक व्यवस्था

पंकज चतुर्वेदी




इस एक जुलाई से देश में  एक बार इस्तेमाल होने वाली पोलीथिन के साथ कुल  १९ ऐसी वस्तुओं  पर पाबंदी लगाईं  गई जिनका कचरा इस धरती के अस्तित्व के लिए खतरा बन रहा है . हालाँकि यह कड़वा सच है कि बहुत से स्थान पर  इस बाबत चालन और नगद जुर्माना हो रहा है लेकिन  न इनका इस्तेमाल कम हुआ और न ही  उत्पादन. बस ,बाज़ार  में इसे चोरी छुपे लाने के नाम पर दाम जरुर बढ़ गए . इससे पहले सितम्बर -2019 प्रधानमंत्री ने अपने मन की बात मेंपॉलीथीन व प्लास्टिक से देश  को मुक्त करने का आह्वान किया था । मध्य प्रदेश  सरकार इससे पहले ही  पन्नी मुक्त प्रदेश की घोषणा कर चुकी थी . देश के कई नगरीय क्षेत्रों में इस तरह के अभियान चलते रहे, लोग भी मानते हैं कि पालीथीन थैली नुकसानदेय है लेकिन अगले ही पल कोई मजबूरी जता कर उसे हाथ में ले कर चल देते हैं। इन दिनों देश का हर शहर बरसात का पानी मोहल्ला-सड़क पर भरने से परेशान है, खा जाता है कि ड्रेनेज खराब है , जबकि   देश भर की नगर निगमों के बजट का बड़ा हिस्सा सीवर व नालों की सफाई में जाता है और परिणाम-शून्य  ही रहते हैं और इसका बड़ा कारण पूरे मल-जल प्रणाली में पॉलीथीन का अंबार होना है।


कच्चे तेल के परिशोधन से मिलने वाले डीजल, पेट्रोल आदि के साथ ही पॉलीथीन बनाने का मसाला भी पेट्रो उत्पाद ही है। यह इंसान और जानवर दोनों के लिए जानलेवा है। घटिया पॉलिथीन का प्रयोग सांस और त्वचा संबंधी रोगों तथा कैंसर का खतरा बढ़ाता है । पॉलीथीन की थैलियां नष्ट  नहीं होती हैं और धरती उपजाऊ क्षमता को नष्ट कर इसे जहरीला बना रही हैं। साथ ही मिट्टी में इनके दबे रहने के कारण मिट्टी की पानी सोखने की क्षमता भी कम होती जा रही है, जिससे भूजल के स्तर पर असर पड़ता है।  पॉलीथीन खाने से गायों व अन्य जानवरों के मरने की घटनाएं तो अब आम हो गई है। फिर भी बाजार से सब्जी लाना हो या पैक दूध या फिर किराना या कपड़े, पॉलीथीन के प्रति लोभ ना तो दुकानदार छोड़ पा रहे हैं ना ही खरीदार। मंदिरों, ऐतिहासिक धरोहरों, पार्क, अभ्यारण्य, रैलियों, जुलूसों, शोभा यात्राओं आदि में धड़ल्ले से इसका उपयोग हो रहा है। शहरों की सुंदरता पर इससे ग्रहण लग रहा है। पॉलीथीन न केवल वर्तमान बल्कि भविष्य को भी नष्ट करने पर आमादा है।


यह मानवोचित गुण है कि इंसान जब किसी सुविधा का आदी हो जाता है तो उसे तभी छोड पाता है जब उसका विकल्प हो। यह भी सच है कि पॉलीथीन बीते दो दशक के दौरान बीस लाख से ज्यादा लेगों के जीवकोपार्जन का जरिया बन चुका है जो कि इसके उत्पादन, व्यवसाय, पुरानी पन्नी एकत्र करने व उसे कबाड़ी को बेचने जैसे काम में लगे हैं। वहीं पॉलीथीन के विकल्प के रूप में जो सिंथेटिक थैले बाजार में डाले गए हैं, वे एक तो महंगे हैं, दूसरे कमजोर और तीसरे वे भी प्राकृतिक या घुलनशील सामग्री से नहीं बने हैं और उनके भी कई विषम प्रभाव हैं।  कुछ स्थानों पर कागज के बैग और लिफाफे बनाकर मुफ्त में बांटे भी गए लेकिन मांग की तुलना में उनकी आपूर्ति कम थी।



यदि वास्तव में बाजार से पॉलीथीन का विकल्प तलाशना है तो पुराने कपड़े के थैले बनवाना एकमात्र विकल्प है। इससे कई लोगों  को विकल्प मिलता है- पॉलीथीन निर्माण की छोटी-छोटी इकाई लगाए लोगों को कपड़े के थैले बनाने काउसके व्यापार में लगे लोगों को उसे दुकानदार तक पहुंचाने का और आम लोगों को सामान लाने-ले जाने का भी। यह सच है कि जिस तरह पॉलीथीन की मांग है उतनी कपड़े के थैले की नहीं होगी, क्योंकि थैला कई-कई बार इस्तेमाल किया जा सकता है, लेकिन कपड़े के थैले की कीमत, उत्पादन की गति भी उसी तरह पॉलीथीन के मानिंद तेज नहीं होगी। सबसे बड़ी दिक्कत है दूध, जूस, बनी हुई करी वाली सब्जी आदि के व्यापार की। इसके लिए एल्यूमिनियम या अन्य मिश्रित धातु के खाद्य-पदार्थ के लिए माकूल कंटेनर बनाए जा सकते है। सबसे बड़ी बात घर से बर्तन ले जाने की आदत फिर से लौट आए तो खाने का स्वाद, उसकी गुणवत्ता, दोनो ही बनी रहेगी। कहने की जरूरत नहीं है कि पॉलीथीन में पैक दूध या गरम करी उसके जहर को भी आपके पेट तक पहुंचाती है। आजकल बाजार माईक्रोवेव में गरम करने लायक एयरटाईट बर्तनों से पटा पड़ा है, ऐसे कई-कई साल तक इस्तेमाल होने वाले बर्तनों को भी विकल्प के तौर पर विचार किया जा सकता है। 


प्लास्टिक से होने वाले नुकसान को कम करने के लिए बायो प्लास्टिक को बढ़ावा देना चाहिए। बायो प्लास्टिक चीनी, चुकंदर, भुट्टा जैसे जैविक रूप से अपघटित होने वाले पदार्थों के इस्तेमाल से बनाई जाती है। हो सकता है कि षुरूआत में कुछ साल पन्नी की जगह कपड़े के थैले व अन्य विकल्प के लिए कुछ सबसिडी दी जाए तो लोग अपनी आदत बदलने को तैयार हो जाएंगे। लेकिन यह व्यय पॉलीथीन से हो रहे व्यापक नुकसान के तुलना में बहेद कम ही होगा।

सनद रहे कि 40 माइक्रान से कम पतली पन्नी सबसे ज्यादा खतरनाक होती है। सरकारी अमलों को ऐसी पॉलीथीन उत्पादन करेन वाले कारखानों को ही बंद करवाना पड़ेगा। वहीं प्लास्टिक कचरा बीन कर पेट पालने वालों के लिए विकल्प के तौर पर बंगलुरू के प्रयोग को विचार कर सकते हैं, जहां लावारिस फैंकी गई पन्नियों को अन्य कचरे के साथ ट्रीटमेंट करके खाद बनाई जा रही है। हिमाचल प्रदेश में ऐसी पन्नियों को डामर के साथ गला कर सड़क बनाने का काम चल रहा है।  


केरल के कन्नूर का उदाहरण तो सभी के सामने हैं जहां प्रशासन से ज्यादा समाज के अन्य वर्ग को साथ लिया गया। बाजार, रेस्तरां, स्कूल, एनजीओ, राजनीतिक दल आदि एक जुट हुए। पूरे जिले को छोटे-छोटे क्लस्टर में बांटा गया, फिर समाज के हर वर्ग, खासकर बच्चों ने इंच-इंच भूमि  से प्लास्टिक का एक-एक कतरा बीना गया उसे ठीक से पैक किया गया और नगर निकायों ने उसे ठिकाने लगाने की जिम्मेदारी निभाई। इसके साथ ही जिले में हर तरह की पॉलीथिन थैली, डिस्पोजेबल बर्तन, व अन्य प्लासिटक पैकिंग पर पूर्ण पांबदी लगा दी गई। कन्नूर के नेशनल इंस्टीट्यूट और फेशन टेक्नालाजी के छात्रों ने इवीनाबु बुनकर सहकारी समिति और कल्लेतेरे ओद्योगिक बुनकर सहकारी समिति के साथ मिल कर बहुत कम दाम पर बेहद आकर्षक  व टिकाऊ थैले बाजार में डाल दिए। सभी व्यापारिक संगठनों, मॉल आदि ने इन थैलों को रखना शुरू किया और आज पूरे जिले में कोई भी पन्नी नहीं मांगता है। खाने-पीने वाले होटलों ने खाना पैक करवा कर ले जाने वालों को घर से टिफिन लाने पर छूट देना शुरू कर दिया और घर पर सप्लाई भी अब स्टील के बर्तनों में की जा रही है जो कि ग्राहक के घर जा कर खाली कर लिए जाते हैं। वहां यह पन्नी मुक्त जिले का चौथा साल है . सिक्किम में पहले लाचेन गाँव ने सीलबंद पानी की बोतलों से ले कर डिस्पोजेबल बरत पर रोक लगाई , फिर पूरे  राज्य में इस तरह की पाबन्दी जनवरी-२२ से लागू है. वहां पानी की प्लास्टिक की बोतल के विकल्प में बांस और मिटटी की बोतलें बहुत लोकप्रिय हुई हैं . जर्मनी में प्लास्टिक के कचरे से बिजली का निर्माण भी किया जा रहा है।  विकल्प तो और भी बहुत कुछ हैं, बस जरूरत है तो एक नियोजित  दूरगामी योजना और उसके क्रियान्वयन के लिए जबरदस्त इच्छा शक्ति  की। 

रविवार, 24 जुलाई 2022

mining turns killer

 हत्यारा होता खनन

पंकज चतुर्वेदी



 

हरियाणा के नूंह जिला के तावडू थाना क्षेत्र के गांव पचगांव में  अवैध खनन की सूचना मिलने पर कार्यवाही को गए डीएसपी सुरेंद्र विश्नोई को अभी 19 जुलाई को जिस तरह पत्थर के अवैध खनन  से भरे  ट्रक से कुचल कर मार डाला गया , उससे एक बार फिर खनन माफिया के निरंकुश इरादे उजागर हुए हैं . यह घटना  अरावली पर्वतमाला से अवैध खनन की है , वही  अरावली जिसका अस्तित्व है तो गुजरात से दिल्ली तक कोई 690 किलोमीटर का इलाका  पाकिस्तान की तरफ से आने वाली रेत की आंधी से निरापद है और रेगिस्तान होने से बचा है . व्ही अरावली है जहां के वन्य क्षेत्र में कथित अतिक्रमण के कारण पिछले साल लगभग इन्हीं दिनों सवा लाख लोगों की आबादी वाले खोरी गाँव को उजाड़ा गया था,  यह वही अरावली है जिसके बारे में  सुप्रीम कोर्ट ने अक्तूबर 2018 जब सरकार से पूछा कि राजस्थान की कुल 128 पहाड़ियों में से 31 को क्या हनुमानजी उठा कर ले गए? तब सभी जागरूक लोग चौंके कि इतनी सारी पांबदी के बाद भी अरावली पर चल रहे अवैध खनन से किस तरह भारत पर खतरा है.

जब चौड़ी सडकें , गगन चुम्बी इमारतें और भव्य प्रासाद किसी क्षेत्र के विकास का एकमात्र पैमाना बन जाएँ तो जाहिर है कि इसका खामियाजा वहां की जमीन , जल और  जन को ही उठाना पडेगा . निर्माण कार्य से जुडी प्राकृतिक  संपदा  का गैरकानूनी खनन खासकर पहाड़ से पत्थर और नदी से बालू , अब हर राज्य की राजनीति का हिस्सा बन गया है , पंजाब हो या मप्र या बिहार या फिर  तमिलनाडु , रेत खनन के आरोप प्रत्यारोप से कोई भी दल अछूता नहीं हैं . असल में इस दिशा में हमारी नीतियाँ हीं- “गुड खा कर गुलगुले से परहेज” की हैं.

जरा देखिये -बरसात के दिनों में छोटी –बड़ी नदियाँ सलीके से बह सकें , उनके मार्ग में नैसर्गिक गतिविधियाँ हो सकें, इस उद्देश्य से राष्ट्रीय हरित न्यायलय ने समूचे देश में नदियों से रेत निकालने पर 30 जून से चार महीने के लिए पाबन्दी लगाईं हुई है , लेकिन क्या इस तरह के आदेश जमीनी स्तर पर क्रियान्वयित होते हैं ? मप्र के भिंड  जिले में प्रशासन को खबर मिली कि लहार क्षेत्र की पर्रायच रेत खदान पर सिंध नदी में अचानक नदी में आए तेज बहाव के चलते कई ट्रक फँस गए हैं . जब सरकारी बचाव दल वहां गया तो उजागर हुआ कि 72 से अधिक डम्पर और ट्रक बीच नदी में खड़े हो कर  बालू निकाल रहे थे .. छत्तीसगढ़ के सूरजपुर जिले में रेड नदी से लगी लगभग 30 किलोमीटर में 10 जेसीबी लगा कर अवैध खनन किया जा रहा है, जबकि राज्य में एन जी टी के आदेश के पालन हेतु टास्क फोर्स का भी गठन किया है, लेकिन वह कागजों में है। भैयाथान तहसील के खोपा ग्राम घाट, प्रतापपुर तहसील का केवरा ग्राम और खंडगवा घाट में मशीन लगा खनन किया जा रहा है। राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने राज्य में अवैध खनन पर कड़ी कार्यवाही करने के निर्देश दिए हैं.  जबकि वास्तविकता तो यह है की किसी भी राज्य में सरकारी या निजी निर्माण कार्य पर कोई रोक है नहीं, सरकारी निर्माण कार्य की तय समय- सीमा भी है – फिर बगैर  रेत-पत्थर के कोई निर्माण जारी रह नहीं सकता. जाहिर है कि कागजी कार्यवाही ही होगी और उससे प्रकृति  बचने से रही .

यह किसी से छुपा नहीं था कि यहां पिछले कुछ सालों के दौरान वैध एवं अवैध खनन की वजह से सोहना से आगे तीन पहाड़ियां गायब हो चुकी हैं। होडल के नजदीक, नारनौल में नांगल दरगु के नजदीक, महेंद्रगढ़ में ख्वासपुर के नजदीक की पहाड़ी गायब हो चुकी है। इनके अलावा भी कई इलाकों की पहाड़ी गायब हो चुकी है। रात के अंधेरे में खनन कार्य किए जाते हैं। सबसे अधिक अवैध रूप से खनन की शिकायत नूंह जिले से सामने आती है। पत्थरों की चोरी की शिकायत सभी जिलों में है।वैसे तो भूमाफिया की नजर दक्षिण हरियाणा की पूरी अरावली पर्वत श्रृंखला पर है लेकिन सबसे अधिक नजर गुरुग्राम, फरीदाबाद एवं नूंह इलाके पर है। अधिकतर भूभाग भूमाफिया वर्षों पहले ही खरीद चुके हैं। जिस गाँव में डीएसपी  श्री विश्नोई शहीद  हुए , असल में वह गाँव भी अवैध है . अवैध खनन की पहाड़ी तक जाने का रास्ता इस गाँव के बीच से एक संकरी पगडण्डी से ही जाता है , इस गाँव के हर घर में डम्पर खड़े हैं . यहाँ के रास्तों में जगह जगह अवरोध हैं , गाँव से कोई पुलिस या अनजान गाडी गुजरे तो पहले गाँव से खबर कर दी जाती है जो अवैध खनन कर रहे होते हैं . यही नहीं पहाड़ी पर भी कई लोग इस बात की निगरानी करते हैं और सूचना देते है कि पुलिस की गाडी आ रही है .

अब  इतना सब आखिर हो यों न ! भले ही अरावली गैर खनन  क्षेत्र घोषित हो लेकिन यहाँ क्रशर धड़ल्ले से चल रहे हैं और क्रशर के लिए कच्छा माल तो इन अवैध खनन से ही मिलता है . हरियाणा – राजस्थान  सीमा अपर स्टे जमालपुर के बीवन पहाड़ी पर ही 20 क्रशर हैं , जिनके मालिक सभी रसूखदार लोग हैं.  सोहना के रेवासन ज़ोन में आज भी 15 क्रशर चालू हैं . तावडू में भी पत्थर दरने का काम चल रहा है. हालाँकि इन सभी क्रशर के मालिक कहते हैं कि उनको  कच्चा माल  राजस्थान से मिलता है . जबकि हकीकत तो यह है कि पत्थर उन्ही पहाड़ों का है जिन पर पाबंदी है . हरियाण के नूह जिला पुलिस डायरी बताती है कि वर्ष 2006 से अभी तक 86 बार  खनन माफिया ने पुलिस पर हमले किये . यह एक बानगी है कि खनन माफिया पुलिस से टकराने में डरता नहीं हैं

बीते सवा सालों के दौरान  नदियों से रेत निकालने को ले कर हमारे देश में  कम से कम 418 लोग मारे गए और 438 घायल हुए। गैर-सरकारी संस्था साउथ एशिया नेटवर्क ऑन डैम्स, रिवर्स एंड पीपल (एसएएनडीआरपी) द्वारा दिसंबर 2020 से मार्च 2022 तक, 16 महीने में रेत खनन की वजह से होने वाली दुर्घटनाओं और हिंसा के मामलों का मीडिया रिपोर्टिंग के आधार पर किए गए अध्ययन के मुताबिक इनमें 49 मौत खनन के लिए नदियों में खोदे गए कुंड में डूबने से हुई हैं। ये आंकड़े बताते हैं कि खनन के दौरान खदान ढहने और अन्य दुर्घटनाओं में कुल 95 मौत और 21 लोग घायल हुए। खनन से जुड़े सड़क हादसों में 294 लोगों की जान गई और 221 घायल हुए हैं। खनन से जुड़ी हिंसा में 12 लोगों को जान गंवानी पड़ी और 53 घायल हुए हैं। अवैध खनन के खिलाफ आवाज़ उठाने वाले कार्यकर्ताओं-पत्रकारों पर हमले में घायल होने वालों का आंकड़ा 10 है। जबकि सरकारी अधिकारियों पर खनन माफिया के हमले में दो मौत और 126 अधिकारी घायल हुए हैं। खनन से जुड़े आपसी झगड़े या गैंगवार में सात मौत और इतने ही घायल हुए हैं।

नदी के एक जीवित संरचना है और रेत उसके श्वसन  तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा। भीशण गर्मी में सूख गए नदी के आंचल को जिस निर्ममता से उधेड़ा जा रहा है वह इस बार के  विश्व पर्यावरण दिवस के नारे - केवल एक धरतीऔर प्रकृति के साथ सामंजस्य से टिकाऊ जीवन ’’ के बिलकुल विपरीत है।  मानव जीवन के लिए जल से ज्यादा जरूरी जल-धारांए हैं। नदी महज पानी के परिवहन का मार्ग नहीं होती, वह  धरती के तापमान के संतुलन, जल-तंत्र के अन्य अंग जैसे जलीय जीव व पौधों के लिए आसरा होती है।  लेकिन आज अकेले नदी ही नहीं मारी जा रही, उसकी रक्षा का साहस करने वाले भी मारे जा रहे हैं . साल 2012 में मप्र इ मुरेना में नूह की ही तरह युवा आइपीएस अफसर नरेंद्र कुमार  को पत्थर से भरे ट्रेक्टर से कुचल कर मार डाला था . कुछ दिन वहां सख्ती हुई लेकिन  फिर खनन-माफिया यथावत काम करने लगा , उसी चम्बल में सन  2015 में एक सिपाही को को मार डाला गया था . इसी मुरेना में सन 2018 में एक डिप्टी  रेंजर की ह्त्या ट्रेक्टर से कुचल कर की गई .यह लम्बा सिलसिला है . आगरा. इटावा.फतेहाबाद से ले कर  गुजरात तक ऐसी घटनाएँ हर रोज होती हैं, कुछ दिन उस पर रोष होता है और यह महज एक अपराध घटना के रूप में कहीं गूम हो जाता है  और उस अपराध के कारक अर्थात पर्यावरण संरक्ष्ण और कानून की पालना पर बात होती नहीं है .

यह जान लें की जब तक निर्माण कार्य से पहले उसमें लगने वाले पत्थर , रेत, ईंट की आवश्यकता  का आकलन और उस निर्माण का ठेका लेने वाले से पहले ही सामग्री जुटाने का स्रोत नहीं तलाशा जाता . अवैध खनन  और खनन में रसूखदार लोगों के दखल को रोका जा सकता नहीं है.  आधुनिकता और पर्यावरण के बीच समन्वयक विकास की नीति पर गंभीरता से काम करना जरुरी है .  अवैध खनन जंगल, नदी , पहाड़, पेड़  और अब जन के जान का दुश्मन बन चुका है . यह केवल  कानून का नहीं , मानवीय और पर्यवार्नीय अस्तित्व का मसला है .

गुरुवार, 21 जुलाई 2022

Flood comes due to damming of rivers

 नदियों को बाँधने  से आती है बाढ़

पंकज चतुर्वेदी

 


 अभी तो सावन की पहली फुहार ने ही धरती को सुवासीत किया था कि गुजरात और महाराष्ट्र  पानी पानी हो गया . इसमें कोई शक नहीं कि गुजरात के शहरों में विकास और नगरीकरण स्तरीय है लेकिन अहमदाबाद से ले आकर नवसारी तक सब कुछ  एक बरसात की झड़ी में ही पानी में धुल  गया . महाराष्ट्र के वे हिस्से जो अभी एक हफ्ता पहले एक एक बूँद तो तरस  रहे थे, अब जलमग्न हैं . इन दोनों प्रदेशों की जल कुंडली बांचे तो लगता है कि प्रकृति चाहे जितनी वर्षा कर दे, यहां की जल -निधियां इन्हें सहेजने में सक्षम हैं। लेकिन अंधाधुध रेत-उत्खनन, नदी क्षेत्र में अतिक्रमण, तालाबों  के गुम होने के चलते ऐसा हो नहीं पा रहा है और राज्य के चालीस फीसदी हिस्से में शहर में नदियां घुस गई हैं। इससे बदतर हालात तो तेलंगाना और आन्ध्र प्रदेश के हैं .गोदावरी नदी अब  गाँव-नगरों में बह रही है.जहां आधा देश अभी बारिश की बात जोह रहा है ,  कुछ राज्यों, खासकर गुजरात में कुदरत की नियामत कहलाने वाला पानी अब कहर बना हुआ है। जब बाँध के दरवाजों से  अकूत जल निधि छोड़ी तो गाँव दुबे और खासकर गुजरात में तो जब बाँध भर गए तो उस पानी की पिछली  मार (बेक वाटर )  से भी जम कर बर्बादी हुई .



जरा बारिकी से देखें तो इस बाढ़ का असल कारण वे बांध हैं  जिन्हें भविश्य के लिए जल-संरक्षण या बिजली उत्पापन के लिए अरबों रूपए खर्च कर बनाया गया था। किन्हीं बांधों की उम्र पूरी हो गई है तो कही सिल्टेज है और कई जगह जलवायु परिवर्तन जैसे खतरे के चलते अचानक तेज बरसात के अंदाज के मुताबिक उसकी संरचना ही नहीं रखी गई।  जहां-जहां बांध के दरवाजे खोले जा रहे हैं या फिर ज्यादा पानी जमा करने के लालच में खोले नहीं जा रहे, पानी बस्तियों में घुस रहा है। संपत्ति का नुकसान और लोगों की मौत का आकलन करें तो पाएंगे कि बांध महंगा सौदा रहे हैं।

बाढ़ स्थिति की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक यदि असम  और पूर्वोत्तर राज्यों को छोड़ दें तो करीब एक करोड़ लोग बाढ़ से प्रभावित हो चुके हैं। अकेले गुजरात और महाराष्ट्र में जल भराव से मरने वालों की संख्या ढेढ़ सौ पार कर चुकी है .ये मौतें असल में पानी के बस्ती में घुसने या तेज धार में फंसने के कारण हुई हैं। अभी तक  बाढ़ के कारण संपत्ति के नुकसान का सटीक आंकड़ा नहीं आया है लेकिन सार्वजनिक संपत्ति जैसे सड़क आदि,खेतों में खड़ी फसल, मवेशी, मकान आदि की तबाही करोड़ो में ही है। दादर नगर हवेली की राजधानी सिलवासा में मधुबन डेम में अचानक जलस्तर बढऩे से सभी दरवाजे 4 मीटर की ऊंचाई तक खोल दिए और  डेढ़ लाख क्यूसेक पानी छोड़ा गया। बाद में इसे बढ़ाकर दो लाख क्यूसेक कर दिया गया। 


दमण गंगा नदी में डिस्चार्ज बढऩे से कराड़, रखोली, कुड़ाचा, सामरवरणी, मसाट, आमली, अथाल, पिपरिया, पाटी, चिचपाड़ा, वासोणा, दपाड़ा, तीघरा, वागधरा, लवाछा में नदी खतरे के निशान पर बह रही है। भुरकुड फलिया, इन्दिरा नगर, बाविसा फलिया में जलभराव से लोगों को शामत आ गई है। महाराष्ट्र के सीमावर्ती दुधनी, कौंचा, सिंदोनी, मांदोनी, खेरड़ी में भारी बारिश से साकरतोड़ नदी भी उफान पर रही है। विस्तार के मैदानी खेत तालाब बन गए हैं। घरों की छत से पानी टपक रहा हैं। खानवेल से मांदोनी, सिंदोनी तथा दुधनी, कौंचा तक गांवों में लोग कच्चे घरों में निवास करते हैं। नदी की तराई वाली बस्तियों में जलभराव से लोगों की मुश्किलें बढ़ गई हैं। अथाल में दमण गंगा का जलस्तर वार्निंग लेवल से ऊपर (30 मीटर ऊँचाई) पहुंच गया है। नदी किनारे स्वामीनारायण मंदिर की ओर बने श्मशान घाट में पानी घुस गया है। रिवर फ्रंट पानी में डूबने से वहां लोगों के जाने पर रोक लगा दी है।



महाराष्ट्र के भंडारा में एक तरफ भारी बरसात है तो दूसरी तरफ लबालब भर गये बाँध . यहाँ गोसीखुर्द बांध के 27, मेडीगड्डा बांध के 65, इरई और बेंबला बांध के दो-दो दरवाजें खोल दिए गए हैं, जिससे अनेक नदी-नालों में बाढ़ आ गई है। बाढ़ के कारण  सैकड़ों गांव संपर्क क्षेत्र से बाहर हैं। हजारों हेक्टेयर क्षेत्र की फसलें बर्बाद हो गईं।  सर्वाधिक बाढ़ प्रभावित गड़चिरोली का साली संकट भी नदियों को बाँधना ही है .उधर सिरोंचा तहसील से सटे तेलंगाना राज्य के मेडीगड्डा बांध के 85 में से एकसाथ 65 गेट खोलने के कारण गोदावरी नदी का जलस्तर बढ़ने लगा है। इस नदी तट पर बसे सिरोंचा तहसील के दर्जनों गांवों के नागरिकों को सतर्कता बरतने की अपील स्थानीय प्रशासन ने की है। साथ ही सैकड़ों गांवों की बिजली आपूर्ति ठप पड़ी हुई है।  पिछले तीन दिनों से गड़चिरोली जिले में बाढ़ का प्रकोप जारी है। नालों में बाढ़ की स्थिति निर्माण होने से जिले के बाढ़ग्रस्त 11 गांवों के 129 परिवारों के 353 लोगों को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया गया है।  जिले के विभिन्न स्थानों पर कुल 35 मकान धराशायी होने की जानकारी मिली है।  

चंद्रपुर जिले में निरंतर बारिश के कारण निचले इलाकों में पानी भर गया है। नदी, नाले उफान पर होने से धानोरा-गडचांदुर, शेगांव-वरोरा जैसे कई मार्ग बंद हो गए हैं। इरई डैम के दो दरवाजे खोले गए हैं। वर्धा नदी भी लबालब होकर बह रही है। नासिक शहर के जलमग्न होने का कारण शहर को पेय जल आपूर्ति करने वाले गंगा सागर बाँध के  दरवाजे खोलना ही रहा हैं .यह है तो गोदावरी जल तन्त्र का ही हिस्सा और गोदावरी उधर दक्षिणी राज्यों में रौद्र रूप में है ,

 

गुजरात में पंचमहाल जिले के हालोल क्षेत्र में देव नदी डैम के 6 दरवाजे आंशिक तौर पर खोलने के बाद वडोदरा की वाघोडिया तहसील के 19 व डभोई तहसील के 7 गांव के लोगों को घर बार छोड़ कर भागना पड़ा है । बांधों में जलस्तर बढ़ रहा है। नर्मदा बांध का जलस्तर क्षमता के मुकाबले अब 47.71 फीसदी हो गया है। राज्य के इस सबसे बड़े बांध में सात दिनों में सात फीसदी जलसंग्रह बढ़ा है। अन्य प्रमुख 206 बांधों में क्षमता का 33.61 फीसदी जल संग्रह हो गया है। हाल में 18 बांधों में 90 फीसदी से अधिक संग्रह होने पर हाइअलर्ट हैं। जबकि आठ में 80 फीसदी से अधिक और 90 फीसदी से कम संग्रह होने पर अलर्ट और 11 बांधों में 70 फीसदी से अधिक और 80 फीसदी से कम संग्रह है, इन बांधों को सामान्य चेतावनी पर रखा है।  इन्हीं बांधों से धीरे धीर पानी भी छोड़ा जा रहा है ताकि भारी बरसात को सहेजा जा सके और यही जल क़यामत बन कर शहरों में घुस रहा है . नर्मदा बांध का जलस्तर लगातार बढ़ रहा है। उपरवास में बारिश के कारण 42240 क्यूसेक पानी आ रहा है। नर्मदा बांध का जलस्तर 115.58 मीटर है। पूरे गुजरात में बारिश के कारण नहर में पानी छोड़ना बंद कर दी गई है। गरुड़ेश्वर में 35 मीटर ऊंचा वियर बांध बारिश के कारण ओवरफ्लो हो गया है। बांध के ओवरफ्लो होने से नर्मदा नदी में बाढ़ जैसे हालात पैदा हो गए हैं। नर्मदा नदी का जलस्तर बढ़ने से तटीय क्षेत्र के लोगों को अलर्ट कर दिया गया है। इस नदी का प्रवाह सीधे चणोद करनाड़ी से होकर भरूच तक जाती है।

जिस सरदार सरोवर को देश के विकास का प्रतिमान कहा जा रही है, उसे अपनी पूरी क्षमता से भरने की जिद में उसके दरवाजे खोले नहीं गए और सरदार सरोवर बांध स्थल से मध्य प्रदेश के धार जिले के चिखल्दा तक नर्मदा नदी की दिशा विपरीत हो गई है। नदी पूर्व से पश्चिम की तरफ बहती है, लेकिन अब पश्चिम से पूर्व की तरफ बह रही है। इसके पीछे का कारण सरदार सरोवर बांध के गुजरात के जल संग्रहण इलाके में भारी वर्षा बताई जा रही है, जबकि मध्य प्रदेश में वर्षा कम हुई है। धार जिले के नर्मदा किनारे बसे तीर्थस्थल कोटेश्वर व डूब क्षेत्र के गांव चिखल्दा में नर्मदा उलटी दिशा में बहती नजर आई। गुजरात में भारी वर्षा होने से मध्य प्रदेश के तीन जिलों आलीराजपुर, धार व बड़वानी में सरदार सरोवर बांध के 140 किमी की परिधि में यह दृश्य नजर आया . जाहिर है की आने वाले दिनों में जब मध्य प्रदेश के इन इलाकों में भी बरसात होगी तो भारी तबाही देखने को मिलेगी . मप्र के रायसेन का बारना डैम ओवर फ्लो करने लगा है जिसके बाद सोमवार को डैम के 6 गेट खोल दिए गए जिससे आसपास के इलाके पानी में डूब गए. सड़कों पर पानी भर गया. लोगों के सामान भी पानी में डूब गए. डैम से पानी छोड़े जाने की वजह से नेशनल हाइवे 145 पर बना पुल पानी में डूब गया है...बारना नदी पर बने पुल के ऊपर से पानी बहने लगा है जिससे यातायात भी प्रभावित हुआ.

बिहार में तो हर साल 11 जिलों में बाढ़ का कारण केवल और केवल तो बांधों का टूटना या फिर क्षमता से ऊपर बहने वाले बांधों के दरवाजे खोलना होता है । महाराश्ट्र के गडचिरोली में जब बादल जम कर बरस रहे थे, तभी सीमा पर तेलंगाना सरकार के मेंड्डीकट्टा बांध के सारे 65 दरवाजे खोल दिए गए। जब तीन लाख 81 हजार 600 क्यूसिक पानी सिरोंचा तहाल के गांवों तक भरा तो वहां तबाही ही थी। इधर मध्यप्रदेष में गांधी सागर व बाध सागर डेम के दरवाजे खोलने से नर्मदा व सोन के जल स्तर में भारी वृद्धि से तट पर बसे सैंकड़ों गांव खतरे में है. उ.प्र में गंगा व यमुना को जहां भी बांधने के प्रयास हुए, वहां इस बार जल-तबाही हे। दिल्ली में इस बार पानी बरसा नहीं लेकिन हथिनि कुड बेराज में पानी की आवक बढ़ते ही दरवाजे खाले जाते हैं व दिल्ली में हजारों लोगों को विस्थापित करना पड़ता है।

द एशियन डेवलपमेंट बैंक के अनुसार भारत में प्राकृतिक आपदाओं में बाढ़ सबसे ज्यादा कहर बरपाती है। देश में प्राकृतिक आपदाओं के कुल नुकसान का 50 प्रतिशत केवल बाढ़ से होता है। बाढ़ से 65 साल में लोगों की मौत 1,09,414 हुई और 25.8 करोड़ हेक्टेयर फसलों को नुकसान हुआ।  अनुमान है कि कुल आर्थिक नुकसान 4.69 लाख करोड़ का होगा। कभी इसका अलग से अध्ययन हुआ नहीं लेकिन बारिकी से देखें तो सबसे ज्यादा नुकसान बांध टूटने या दरवाजे खालने से आई विपदा से हुआ है। मौजूदा हालात में बाढ़ महज एक प्राकृतिक प्रकोप नहीं, बल्कि मानवजन्य साधनों का त्रासदी है । बड़े बांध जितना लाभ नहीं देते, उससे ज्यादा विस्थापन, दलदली जमीन और हर बरसात में उससे होने वाली तबाही के खामियाजे हैं। यह दुर्भाग्य है कि हमारे यहां बांधों का रखरखाव हर समय भ्रश्टाचार की भेट चढता है। ना उनकी गाद ठिकाने से साफ होती है और ना ही सालाना मरम्मत। उनसे निकलने वाली नहरें भी अपनी क्षमता से जल -प्रवाह नहीं करतीं क्योंकि उनमें भरी गाद की सफाई केवल कागजों पर होती है। कुछ लोग नदियों को जोड़ने में इसका निराकरण खोज रहे हैं। हकीकत में नदियों के प्राकृतिक बहाव, तरीकों, विभिन्न नदियों के उंचाई-स्तर में अंतर जैसे विशयों का हमारे यहां कभी निष्पक्ष अध्ययन ही नहीं किया गया और इसी का फायदा उठा कर कतिपय ठेकेदार, सीमेंट के कारोबारी और जमीन-लोलुप लोग इस तरह की सलाह देते हैं। पानी को स्थानीय स्तर पर रोकना, नदियों को उथला होने से बचाना, बड़े बांध पर पाबंदी , नदियों के करीबी पहाड़ों पर खुदाई पर रोक और नदियों के प्राकृतिक मार्ग से छेड़छाड़ को रोकना कुछ ऐसे सामान्य प्रयोग हैं, जोकि बाढ़ सरीखी भीशण विभीशिका का मुंह-तोड़ जवाब हो सकते हैं।

पानी इस समय विश्व  के संभावित संकटों में शीर्ष पर है । पीने के लिए पानी, उद्योग , खेती के लिए पानी, बिजली पैदा करने को पानी । पानी की मांग के सभी मोर्चों पर आशंकाओं और अनिश्चितताओं के बादल मंडरा रहे हैं । बरसात के पानी की हर एक बूंद को एकत्र करना व उसे समुद्र में मिलने से रोकना ही इसका एकमात्र निदान है। इसके लिए बनाए गए बड़े भारी भरकम बांध कभी विकास के मंदिर कहलाते थे । आज यह स्पश्ट हो गया है कि लागत उत्पादन, संसाधन सभी मामलों में ऐसे बांध घाटे का सौदा सिद्ध हो रहे हैं । विश्व  बांध आयोग  के एक अध्ययन के मुताबिक समता, टिकाऊपन, कार्यक्षमता, भागीदारीपूर्ण निर्णय प्रक्रिया और जवाबदेही जैसे पांच मूल्यों पर आधारित है और इसमें स्पश्ट कर दिया गया है कि ऐसे निर्माण उम्मीदों पर खरे नहीं उतर रहे हैं ।  यदि पानी भी बचाना है और तबाही से भी बचना है तो नदियां को अविरल बहने दें और उसे बीते दो सौ  साल के मार्ग पर कोई निर्माण न करें।

रविवार, 17 जुलाई 2022

Thirst will not be quenched without understanding monsoon

 मानसून को समझे बगैर नहीं बुझगी प्यास

पंकज चतुर्वेदी

 


मानसून ने अभी दस्तक ही दी है और पूर्वोत्तर और दक्षिण भारत के जो हिस्से  पानी के लिए व्याकुल थे, पानी-पानी हो गए। जल संकट के लिए सबसे  परेशान मध्य भारत में जैसे ही प्रकृति ने अपना आशीष  बरसाया और ताल-तलैया, नदी-नाले उफन कर धरा को अमृतमय करने लगे , मीडिया ने इसे तबाही, बर्बादी, विनाश  जैसी नफरतों से धिक्कारना शुरू  कर दिया । असल में पानी को ले कर हमारी सोच प्रारंभ से ही त्रुटिपूर्ण है- हमें पढ़ा दिया गया कि नदी, नहर, तालाब झील आदि पानी के स्त्रोत हैं, हकीकत में हमारे देश में पानी का स्त्रोत केवल मानूसन ही हैं, नदी-दरिया आदि तो उसको सहेजने का स्थान मात्र हैं।  यह धरती ही  पानी के कारण जीवों से आबाद है और पानी के आगम मानसून को हम कदर नहीं करते और उसकी नियामत को सहेजने के स्थान हमने खुद उजाड़ दिए।  गंगा-यमुना के उद्गम स्थल से छोटी नदियों के गांव-कस्बे तक बस यही हल्ला है कि बरसात ने खेत-गांव सबकुछ उजाड़ दिया। यह भी सच है कि अभी मानसून विदा होते ही उन सभी इलाकों में पानी की एक-एक बूंद के लिए मारा-मारी होगी और लोग पीने के एक गिलास पानी में आधा भर कर जल-संरक्षण के प्रवचन देते और जल जीवन का आधार जैसे नारे दीवारों पर पोतते दिखेंगे। और फिर बारिकी से देखना होगा कि मानसून में जल का विस्तार हमारी जमीन पर हुआ है या वास्तव में हमने ही जल विस्तार के नैसर्गिक परिघि पर अपना कब्जा जमा लिया है।

मानसून शब्द  असल में अरबी शब्द मौसिमसे आया है, जिसका अर्थ होता है मौसम। अरब सागर में बहने वाली मौसमी हवाओं के लिए अरबी मल्लाह इस षब्द का इस्तेमाल करते थे। हकीकत तो यह है कि भारत में केवल तीन ही किस्म की जलवायु है - मानसून, मानसून -पूर्व और मानसून-पश्चात। तभी भारत की जलवायु को मानसूनी जलवायु कहा जाता है । जान लें मानसून का पता सबसे पहले पहली सदी ईस्वी में हिप्पोलस ने लगाया था और तभी से इसके मिजाज को भांपने की वैज्ञानिक व लोक प्रयास जारी हैं।

भारत के लेक-जीवन, अर्थ व्यवस्था, पव-त्योहार का मूल आधार बरसात या मानसून का मिजाज ही है। कमजोर मानसून पूरे देश को सूना कर देता है। कहना अतिशियोक्ति नहीं होगा कि मानसून भारत के अस्तित्व की धुरी है। जो महानगर- शहर पूरे साल वायु प्रदूशण के कारण हल्कान रहते हैं, इसी मौसम में वहां के लोगों को सांस लेने को साफ हवा मिलती है।  खेती-हरियाली और साल भर के जल की जुगाड़ इसी बरसात पर निर्भर है। इसके बावजूद जब प्रकृति अपना आशीश इन बूंदों के रूप में देती है तो समाज व सरकार इसे बड़े खलनायक के रूप में पेश करने लगते हैं। इसका असल कारण यह है कि हमारे देश में मानसून को सम्मान करने की परंपरा समाप्त होती जा रही है - कारण भी है , तेजी से हो रहा षहरों की ओर पलायन व गांवों का षहरीकरण।

भारतीय मानसून का संबंध मुख्यतया  गरमी के दिनों  में होने वाली वायुमंडलीय परिसंचरण में परिवर्तन से है। गरमी की शुरूआत होने से सूर्य उत्तरायण हो जाता है। सूर्य के उत्तरायण के साथ -साथ अंतःउष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र का भी उत्तरायण होना प्रारंभ हो जाता है इसके प्रभाव से पश्चिमी जेट स्ट्रीम हिमालय के उत्तर में प्रवाहित होने लगती है। इस तरह तापमान बढने से निम्न वायुदाब निर्मित होता है। दक्षिण में हिंद महासागर में मेडागास्कर द्वीप के समीप उच्च वायुदाब का विकास होता है इसी उच्च वायुदाब के केंद्र से दक्षिण पश्चिम मानसून की उत्पत्ति होती है । जान लें तापमान बढ़ने के कारण एशिया पर न्यून वायुदाब बन जाता है। इसके विपरीत दक्षिणी गोलार्द्ध में शीतकाल के कारण दक्षिण हिंद महासागर तथा उत्तर-पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया के पास उच्च दाब विकसित हो जाता है। परिणामस्वरूप उच्च दाब वाले क्षेत्रों से अर्थात् महासागरीय भागों से निम्न दाब वाले स्थलीय भागों की ओर हवाएँ चलने लगती हैं। सागरों के ऊपर से आने के कारण नमी से लदी ये हवाएँ पर्याप्त वृष्टि प्रदान करती हैं। जब निम्न दाब का क्षेत्र अधिक सक्रिय हो जाता है तो दक्षिण-पूर्वी व्यापारिक हवा भी भूमध्य रेखा को पार करके मानसूनी हवाओं से मिल जाती है। इसे दक्षिण-पश्चिमी मानसून अथवा भारतीय मानसून भी कहा जाता है। इस प्रकार एशिया में मानसून की दो शाखाएँ हो जाती हैं-भारत में भी दक्षिण-पश्चिम मानसून की दो शाखाएँ हो जाती हैं-बंगाल की खाड़ी और अरब सागर की शाखा। लवायु परिवर्तन का गहरा असर भारत में अब दिखने लगा है, इसके साथ ही ठंड के दिनों में अलनीनो और दीगर मौसम में ला नीना का असर हमारे मानसून-तंत्र को प्रभावित कर रहा है।

विडंबना यह है कि हम अपनी जरूरतों के कुछ लीटर पानी को घटाने को तो राजी हैं लेकिन मानसून से मिले जल को संरक्षित करने के मार्ग में खुद ही रोड़ अटकाते हैं। जबकि मानूसन को सहेजने वाली नदियों में पानी सुरक्षित रखने के बनिस्पत रेत निकालने पर ज्यादा ध्यान देते हैं।हम यह भूल जाते हैं कि नदी की अपनी याददाश्त होती है, वह दो सौ साल तक अपने इलाके को भूलती नहीं। गौर से देखें तो आज जिन इलाकों में नदी से तबाही पर विलप हो रहा है, वे सभी किसी नदी के बीते दो सदी के रास्ते में यह सोच कर बसा लिए गए कि अब तो नदी दूसरे रास्ते बह रही है, खाली जगह पर बस्ती बसा ली जाए। दूर क्यों जाएं, दिल्ली में ही अक्षरधाम मंदिर से ले कर खेलगांव तक को लें, अदालती दस्तावेजों में खुड़पेंच कर यमुना के जल ग्रहण क्षेत्र में बसा ली गईं। दिल्ली के पुराने खादर बीते पांच दशक में ओखला-जामिया नगर से ले कर गीता कालोनी, बुराड़ी जैसी घनी कालेनियों में बस गए और अब सरकार यमुना का पानी अपने घर में रोकने के

उ.प्र में गंगा व यमुना या उनकी सखा-सहेलियों को जहां भी बांधने के प्रयास हुए, वहां इस बार जल-तबाही होती है। गुजरात का उदाहरण सामने हैं नर्मदा को बंधने से उसके हर षहर की आधुनिकता पर ‘‘पानी’’ का फिर गया है। हमारी नदियां उथली हैं और उनको अतिक्रमण  और कभी -कभी सुदरता या रिवर फ्रंट के नाम पर  संकरा किया गया। नदियों का अतिरिक्त पानी सहेजने वाले तालाब-बावली-कुएं नदारद हैं।  फिर पानी सहेजने व उसके बहुउद्देशीय इस्तेमाल के लिए बनाए गए बांध, अरबों की लगातदशकों के समय, विस्थापन  के बाद भी थोडी सी बरसात को समेट नहीं पा रहे हैं। पहाड़, पेड, और धतरी को सांमजस्य के साथ  खुला छोड़ा जाए तो इंसान के लिए जरूरी सालभ्र का पानी को भूमि अपने गर्भ में ही सहेज ले।

असल में हम अपने मानसून के मिजाज, बदलते मौसम में बदलती बरसात, बरसात के जल को सहेज कर रखने के प्राकृतिक खजानों की रक्षा के प्रति ना तो गंभीर हैं और ना ही कुछ नया सीखना चाहते हैं।  पूरा जल तंत्र महज भूजल पर टिका है जबकि यह सर्वविविदत तथ्य है कि भूजल पेयजल का सुरक्षित साधन नहीं है।  हर घर तक नल से जल पहुंचाने की योजना का सफल क्रियान्वयन केवल मानूसन को सम्मान देने से ही संभव होगा।

मानसून अब केवल भूगोल या मौसम विज्ञान नहीं हैं- इससे इंजीनियरिंग, ड्रैनेज ,सेनिटेशन, कृषि , सहित बहुत कुछ जुड़ा है। मानसून-प्रबंधन का गहन अध्ययन हमारे स्कूलों से ले कर  इंजीनियरिंग पाठ्यक्रमों में हो , जिसके तहत केवल मानसून से पानी ही नहीं, उससे जुड़ी फसलों, सड़कों, षहरों में बरसाती पानी के निकासी के माकूल प्रबंधों व संरक्षण जैसे अध्याय हों।

 

 

How National Book Trust Become Narendra Book Trust

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