My writings can be read here मेरे लेख मेरे विचार, Awarded By ABP News As best Blogger Award-2014 एबीपी न्‍यूज द्वारा हिंदी दिवस पर पर श्रेष्‍ठ ब्‍लाॅग के पुरस्‍कार से सम्‍मानित

बुधवार, 27 सितंबर 2023

Hurdles in water distribution of Teesta River between India and Bangladesh

 आखिर क्यों नहीं साकार हो रही  है तीस्ता जल वितरण योजना

पंकज चतुर्वेदी



हाल ही में संपन्न जी- 20 की नई दिल्ली में संपन्न बैठक में बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना को उम्मीद थी कि  तीस्ता नदी से उनके देश को पानी मिलने का रास्ता शायद साफ़ हो जाए . हालाँकि हमारी विदेश मंत्रालय के संसदीय स्थाई समिति ने भी यह सिफारिश कर दी है कि लम्बे समय से लटके तीस्ता जल विवाद का समाधान कर हमें  बांग्लादेश से द्विपक्षीय सम्बन्ध प्रगाढ़ करना चाहिए . वैसे तो भारत और बांग्लादेश  की सीमायें  कोई 54 नदियों का जल साझा करती हैं और पिछले साल अक्तूबर में बांग्लादेश की प्रधान मंत्री के भारत आगमन पर कुशियारा नदी से पानी की निकासी पर भारत सरकार और बांग्ला देश के बीच समझोता  भी हुआ था , जिसका लाभ दक्षिणी असम  और बांग्लादेश के सिलहट के किसानो को मिलना है , लेकिन तीस्ता नदी के पानी के बंटवारे  का मसला हर बार  विमर्श में तो आता है लेकिन उस पर सहमती नहीं बन पाती,  तीस्ता नदी  हमारे लिए केवल जलापूर्ति के लिए ही नहीं ,बल्कि बाढ़ प्रबंधन के लिए भी   महत्वपूर्ण है.


 

तीस्ता नदी सिक्किम राज्य के हिमालयी क्षेत्र के पाहुनरी ग्लेशियर से निकलती है। फिर पश्चिम बंगाल में प्रवेश करती है और बाद में बांग्लादेश में रंगपुर से बहती हुई फुलचोरी  में ब्रह्मपुत्र नदी में समाहित हो जाती है। तीस्ता नदी की लम्बाई 413 किलोमीटर है। यह नदी सिक्किम में 150 किलोमीटर , पश्चिम बंगाल के 142 किलोमीटर और फिर बांग्लादेश में 120 किलोमीटर बहती है। तिस्ता नदी का 83 फीसदी हिस्सा भारत में और 17 फीसदी हिस्सा बांग्लादेश में है। सिक्किम और  उत्तरी बंगाल के छः  जिलों के कोई करीब एक करोङ बाशिंदे खेती, सिंचाई और पेय जल के लिए इस पर निर्भर हैं . ठीक यही हाल बांग्लादेश का भी है  चूँकि  1947 बंटवारे के समय नदी का जलग्रहण क्षेत्र भारत के हिस्से में आया था , सो इसके पानी  का वितरण  ब्बीते 75 साल से अनसुलझा है. सन 1972 में पाकिस्तान से अलग हो कर बांग्लादेश के बना और उसी साल दोनों देशों ने साझा नदियों के जल वितरण पर सहमती के लिए संयुक्त जल आयोग का गठन किया . 


आयोग की पहली रिपोर्ट 1983 में आई , जिसके मुताबिक सन 1983 में भारत और बांग्लादेश के बीच तीस्ता नदी को लेकर एक समझौता हुआ. इसके तहत 39 प्रतिशत जल भारत को और  बांग्लादेश को 36 प्रतिशत जल मिलना तय हुआ .  25 प्रतिशत जल को यूँ ही रहने दिया और बाद में भारत इसका इस्तेमाल करने लगा. इस पर बांग्लादेश को आपत्ति रही लेकिन उसने भी  सन 1998 अपने यहाँ तीस्ता नदी पर एक बांध बना लिया  और भारत से अधिक पानी की मांग करने लगा . ठीक उसी समय भारत ने जलपाईगुड़ी जिले के मालबाजार उपखंड में नीलफामारी में तीस्ता नदी ग़ज़लडोबा बांध बना लिया . इससे तीस्ता नदी का नियंत्रण भारत के हाथ में चला गया। बांध में 54 गेट हैं जो तीस्ता की मुख्य धारा से पानी को विभिन्न क्षेत्रों में मोड़ने के लिए हैं। बांध मुख्य रूप से तीस्ता के पानी को तीस्ता-महानंदा नहर में मोड़ने के लिए बनाया गया था।



सितंबर 2011 में, भारत के तत्कालीन प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह जब ढाका गए तो तीस्ता जल बंटवारा समझौता होना तय हुआ था . मसौदे के मुताबिक़ अंतरिम समझौते की अवधि 15 वर्ष थी और तीस्ता के 42.5 फीसदी पानी पर भारत का और 37.5 फीसदी पर बांग्लादेश का हक होना था. उस समय पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने विरोध किया और  समझोता हो नहीं पाया . फिर 2014 में, प्रधान मंत्री शेख हसीना भारत का दौरे पर आई तो एक बार समझोते की उम्मीद बढ़ी. उस बार  सुश्री शेख हसीना ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से मुलाकात भी की लेकिन ममता बनर्जी  असहमत रहीं . उनका कहना था कि  इस समझोते से उत्तर बंगाल के लोगों का पानी छीन कर बांग्लादेश दिया जा रहा है . सन 2015 में ममता बनर्जी, प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के साथ ढाका  दौरे पर गई , उन्होंने समझोते के प्रति  सकारात्मक बयान भी दिए थे लेकिन बात फिर कहीं अटक गई . जान लें जब हम इस समय 62 .5 फ़ीसदी पानी का इस्तेमाल हम कर ही रहे हैं तो  42.5 पर आना तो घाटे का सौदा ही लगेगा .

 विदित हो 5 जनवरी, 2021 को भारत-बांग्लादेश संयुक्त नदी आयोग की तकनीकी समिति की संपन्न बैठक में बहुत सी नदियों के जल वितरण के समझोते के मसौदे को अंतिम रूप दिया गया . त्रिपुरा के सबरूम शहर में पानी के संकट को दूर करने के लिए फेनी नदी से 1.82 क्यूसेक पानी निकालने पर बांग्लादेश ने मानवीय आधार प् सहमती भी दी लेकिन तीस्ता जल के वितरण का मुद्दा अनसुलझा ही रहा .

यह तय है कि तीस्ता भी जलवायु परिवर्तन और ढेर सारे बांधों के कारण संकट में है .ग़ज़लडोबा बांध से पहले जहां तीस्ता बेसिन में 2500 क्यूसेक पानी उपलब्ध था, आज यह बहाव 400 क्यूसेक से भी कम है. 1997 में बांग्लादेश में शुष्क मौसम के दौरान, तीस्ता में पानी का प्रवाह लगभग 6,500 क्यूसेक था, जो 2006 में घटकर 1,348 क्यूसेक हो गया और 2014 में यह केवल 800 क्यूसेक रह गया. नदी में जल कम होने का खामियाजा  डॉन तरफ के किसानों को उठाना पद रहा है . दुर्भाग्य है की यह सदानीरा नदी गर्मी में बिलकुल सूख जाती है और लोग पैदल ही नदी पार करते हैं। यह कहना गलत नहीं होगा कि सलीके से वितरण, बाढ़ प्रबंधन  और बेसिन क्षेत्र में कम बरसात के चलते तीस्ता एक मृत नदी में बदल गई है.  अगर ऐसा ही चलता रहा तो न सिर्फ जनजीवन बल्कि जैव विविधता को भी खतरा होगा। तीस्ता जल बंटवारा समझौता अब समय की मांग है। लेकिन तीस्ता जल-साझाकरण समझौते पर भारत की शिथिलता स्थानीय राजनीती के जंजाल में फंसी हुई है .

दोनों पडोसी देशों के बीच समझोता न हो पाने का लाभ चीन उठा रहा है.  पेइचिंग ने बांग्ला देश को 937. 8 मिलियन डॉलर की मदद दे कर तीस्ता मेगा परियोजना शुरू करवा दी है . इसके तहत  एक बड़े जलाशय का निर्माण ,  नदी के गहरीकरण के लिए खुदाई , लभग 173 किलोमीटर पर नदी तटबंध निर्माण की योजना है . इसके पूर्ण होने से  बाढ़ के समय  तीस्ता का जल  तेज प्रवाह से बांग्लादेश की तरफ जाएगा और भंडारण भी होगा, इसका सीधा असर भारत पर पडेगा

तीस्ता नदी में अपार संभावनाएं हैं। यदि तीस्ता जल-साझाकरण समझौते या तीस्ता परियोजना का उचित कार्यान्वयन संभव हो जाता है तो न केवल तीस्ता तट या उत्तर बंगाल के लोग बल्कि पूरे बांग्लादेश को इसका लाभ मिलेगा। उत्तर बंगाल की जनता के सार्वजनिक जीवन में बदलाव आएगा। पूर्वोत्तर राज्यों में बाढ़ नियंत्रण होने से अर्थव्यवस्था समृद्ध होगी. 

मंगलवार, 26 सितंबर 2023

Mosquitos going strong in climate change

               जलवायु परिवर्तन से मजबूत हो रहे हैं मच्छर

पंकज चतुर्वेदी



इस साल भादो की बरसात शुरू हुई और उत्तर प्रदेश और बिहार के कई जिलों में बच्चों के बुखार और उसके बाद असामयिक मौत की खबर आने लगी, अकेले फिरोजाबाद जिले में  ही कोई पचास बच्चे मरे | यह  साफ़ हो चुका है कि बच्चों के बड़े स्तर पर बीमार होने का साल कारण मच्छर जनित रोग हैं . दुखद है कि हमारे देश में कई दशक से मलेरिया उन्मूलन चल रहा हैं लेकिन दूरगामी योजना के अभाव में न मच्छर कम हो रहे न ही मलेरिया, उलटे मच्छर  अधिक ताकतवर बन कर अलग-अलग किस्म के रोग के संचारक बन रहे हैं और मलेरिया डेंगू , जापानी बुखार और चिकनगुनिया जैसे नए-नए संहारक शस्त्रों से लैस हो कर जनता पर टूट रहा है|


 

यह बात भी सिद्ध हो चुकी है कि हमारे यहां मलेरिया निवारण के लिए इस्तेमाल हो रही दवाएं  असल में मच्छरों को ही ताकतवर बना रही हैं। विशेषरूप से राजस्थान के रेगिस्तानी इलाकों(जहां हाल के वर्षों में अप्रत्याशित रूप से घनघोर पानी बरसा है), बिहार के सदानीरा बाढ़ग्रस्त जिलों मध्यप्रदेश ,पूर्वोंत्तर राज्यें व नगरीय-स्लम में बदल रहे दिल्ली कोलकाता जैसे महानगरों में जिस तरह मलेरिया का आतंक बढ़ा है, वह आधुनिक चिकित्या विज्ञान के लिए चुनौती है । आज के मच्छर  मलेरिया की प्रचलित दवाओं को आसानी से हजम कर जाते हैं । दूसरी ओर घर-घर में इस्तेमाल हो रही मच्छर -मार दवाओं के बढ़ते प्रभाव के कारण मच्छर अब और जहरीला हो गया है । देश के पहाड़ी इलाकों में अभी कुछ साल पहले तक मच्छर देखने को नहीं मिलता था, अब वहां रात में खुले में सोने की कल्पना भी नहीं की जा सकती है ।


एक वैज्ञानिक अध्ययन से पता चला है कि डेंगू का संक्रमण रोकने में हमारी दवाएं निष्प्रभावी हैं। यूनिवर्सिटी ऑफ नॉर्थ बंगाल, दार्जीलिंग ने बंगाल के मलेरिया ग्रस्त इलाकों में इससें निबटने के लिए इस्तेमाल हो रही दवाओं -डीडीटी, मैलाथिओन परमेथ्रिन और प्रोपोक्सर को ले कर प्रयाग किए और पाया कि मच्छरों में प्रतिरोध पैदा करने वाली जैव-रासायनिक प्रक्रिया के तहत मच्छरों में मौजूद एंजाइम काबरेक्सीलेस्टेरेसेस, ग्लूटाथिओन एस-ट्रांसफेरेसेस और साइटोक्रोम पी450 या संयुक्त रूप से काम करने वाले ऑक्सीडेसेस के माध्यम से उत्पन्न डिटॉक्सीफिकेशन द्वारा प्रतिरोधक क्षमता उत्पन्न हुई है। इस अध्ययन से जुड़े वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. धीरज साहा ने बताया, ‘कीटनाशकों के अंधाधुंध उपयोग के कारण मच्छरों ने अपने शरीर में कीटनाशकों के नियोजित कार्यों का प्रतिरोध करने के लिए रणनीतियों का विकास कर किया है। इसी प्रक्रिया को कीटनाशकों के प्रति प्रतिरोधी क्षमता के विकास रूप में जाना जाता है।गौरतलब है कि एडीस एजिप्टि और एडीस अल्बोपिक्टस डेंगू के रोगवाहक मच्छरों की प्रजातियां हैं, जो पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में फैली हैं।



 

शुरूआती दिनों में शहरों को मलेरिया के मामले में निरापद माना जाता था और तभी शहरों में मलेरिया उन्मूलन पर कोई खास ध्यान नहीं दिया गया । 90 के दशक में भारत में औद्योगिकीकरण के विकास के साथ नए कारखाने लगाने के लिए ऐसे इलाकों के जंगल काटे गए, जिन्हें मलेरिया-प्रभावित वन कहा जाता था । ऐसे जंगलों पर बसे शहरों में मच्छरों को बना-बनाया घर मिल गया । जर्जर जल निकास व्यवस्था, बारिश के पानी के जमा होने के आधिक्य और कम क्षेत्रफल में अधिक जनसंख्या के कारण नगरों में मलेरिया के जीवाणु तेजी से फल-फूल रहे हैं । भारत में मलेरिया से बचाव के लिए सन् 1953 में राष्ट्रीय मलेरिया नियंत्रण कार्यक्रम शुरू किया गया था । गांव-गांव में डी.डी.टी. का छिड़काव और क्लोरोक्वीन की गोलियां बांटने के ढर्रे में सरकारी महकमे भूल गए कि समय के साथ कार्यक्रम में भी बदलाव जरूरी है । धीरे-धीरे इन दवाओं की प्रतिरोधक क्षमता मच्छरों में आ गई । तभी यह छोटा सा जीव अब ताकतवर हो कर निरंकुश बन गया है ।


पिछले कुछ सालों से देश में कोहराम मचाने वाला मलेरिया सबटर्मियम या पर्निसियम मलेरिया कहलाता है । इसमें तेज बुखार के साथ-साथ लकवा, या बेहोशी छा जाती है । हैजा नुमा दस्त, पैचिस की तरह शौच में खून आने लगता है । रक्त-प्रवाह रुक जाने से शरीर ठंडा पड़ जाता है । गांवों में फैले नीम-हकीम ही नहीं , बड़े-बड़े डिगरी से लैसे डाक्टर भी भ्रमित हो जाते हैं कि दवा किस मर्ज की दी जाए।  डाक्टर लेबोरेट्री- जांच व दवाएं बदलने में तल्लीन रहते हैं और मरीज की तड़प-तड़प कर मौत हो जाती है ।




हालांकि ब्रिटिश गवर्नमेंट पब्लिक हेल्थ लेबोरेट्री सर्विस(पीएचएलसी) की एक अप्रकाशित रिपोर्ट में बीस साल पहले ही चेता दिया गया था कि दुनिया के गर्म होने के कारण मलेरिया प्रचंड रूप ले सकता है । गर्मी और उमस में हो रहा इजाफा खतरनाक बीमारियों को फैलाने वाले कीटाण्ुाओं व विषाणुओं के लिए संवाहक के माकूल हालात बना रहा है । रिपोर्ट में कहा गया था कि एशिया में तापमान की अधिकता और ठहरे हुए पानी के कारण मलेरिया के परजीवियों को फलने-फूलने का अनुकूल अवसर मिल रहा है । कहा तो यह भी जाता है कि घरों के भीतर अंधाधुंध शौचालयों के निर्माण व शैाचालयों के लिए घर के नीचे ही टेंक खोदने के कारण मच्छरों की आबादी उन इलाकों में भी ताबड़तोड़ हो गई है, जहां अभी एक दशक पहले तक मच्छर होते ही नहीं थे । सनद रहे कि हमारे यहां स्वच्छता अभियान के नाम पर गांवों में जम कर शौचालय  बनाए जा रहे हैं, जिनमें ना तो पानी है, ना ही वहां से निकलने वाले गंदे पानी की निकासी की मुकम्मल व्यवस्था।
अधिक फासला के लोभ में सिंचाई के साधन बढ़ाने और फसल को कीटों से निरापद रखने के लिए कीटनाशकों के बढ़ते इस्तेमाल ने भी मलेरिया को पाला-पोसा है । बड़ी संख्या में बने बांध और नहरों के करीब विकसित हुए दलदलों ने मच्छरों की संख्या बढ़ाई है । रही बची कसर फसलों में डीडीटी ऐसे ही कीटनाशकों के बेतहाशा दुरूपयोग ने पूरी कर दी । खाने के पदार्थों में डीडीटी का मात्रा जहर के स्तर तक बढ़ने लगी, वहीं दूसरी ओर मच्छर ने डीडीटी को डकार लेने की क्षमता विकसित कर ली । बढ़ती आबादी के लिए मकान, खेत और कारखाने मुहैया करवाने के नाम पर गत् पांच दशकों के दौरान देश के जंगलों की निर्ममता से कटाई की जाती रही है । कहीं अयस्कों की खुदाई तो जलावन या फर्नीचर के लिए भी पेड़ों को साफ किया गया ।  हालांकि घने जंगल मच्छर व मलेरिया के माकूल आवास होते हैं और जंगलों में रहने वाले  आदिवासी मलेरिया के बड़े शिकार होते रहे हैं । जंगलों के कटने से इंसान के पर्यावास में आए बदलाव और मच्छरों के बदलते ठिकाने ने शहरी क्षेत्रों में मलेरिया को आक्रामक बना दिया ।
विडंबना है कि हमारे देश में मलेरिया से निबटने की नीति ही गलत है - पहले मरीज बनो, फिर इलाज होगा । जबकि होना यह चाहिए कि मलेरिया फैल ना सके, इसकी कोशिश हों । मलेरिया प्रभावित राज्यों में पेयजल या सिंचाई की योजनाएं बनाते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि ठहरा हुआ पानी कहीं ‘‘ मच्छर-प्रजनन केंद्र’’ तो नहीं बन रहा है । धरती का गरम होता मिजाज जहां मलेंरिया के माकूल है, पहीं एंटीबायोटिक दवाओं के मनमाने इस्तेमाल से लोगों की रोग-प्रतिरोधक क्षमता घट रही है । नीम व ऐसी ही वनोषधियों से मलेरिया व मच्छर उन्मूलन की दवाओं को तैयार करना हमारी प्राथमिकता होना चाहिए ।

गुरुवार, 21 सितंबर 2023

Libya's inundation is a tragedy of mixed climate change and human negligence

        मौसम की मार  और इंसानी कोताही की मिलीजुली त्रासदी है लीबिया का जलप्लावन
पंकज चतुर्वेदी
 


कभी लीबिया के सांस्कृतिक राजधानी कहलाने समुद्र के किनारे बसे दरना में इस समय मौत नाच रही है , कोई नब्बे हज़ार आबादी के शहर में 21 हज़ार लोग या तो मारे गए हैं या  लापता हैं . शहर का आधा हिस्सा सुनामी  की तरह आय सैलाब में पूरी तरह बह गया . जलवायु परिवर्तन, बड़े बाँध, कम रखरखाव वाले बाँध किस तरह मानवीय इतिहास की भीषणतम त्रासदी ला सकते हैं, यह दुनिया को चेतावनी है. अभी दस सितम्बर को भूमध्यसागरीय चक्रवाती  तूफ़ान के साथ साथ , पहाड़ों से घिरे दरना शहर में भूस्खलन हुआ , मूसलाधार बारिश और भयंकर हवाएँ चलीं . उसके बाद इस शहर को बाढ़ से बचाने के लिए बनाए गये दो विशाल बाँध  मिटटी के ढेर से बिखर गए और पानी ने तबाही मचा दी ..

यह सभी जानते थे कि दरना शहर  बाढ़ त्रासदी को ले कर संवेदनशील रहा है . सन 1942 से अभी तक कम से कम पांच  बार यहाँ भयानक बाढ़ आई है  . शहर को बाढ़ से बचाने के लिए सत्तर के दशक में वादी- देरना जल धारा  पर यहाँ दो बाँध बनाए गये . इनमें से एक अल- बिलाद तो शहर से बमुश्किल एक किलोमीटर दूर था . कोई 45 मीटर उंचाई के इस बाँध की जलग्रहण क्षमता  1.5  मिलियन क्यूबिक मीटर थी . जबकि दूसरा बाँध अबू मंसूर शहर से कोई 13 किमी दूर था, जिसकी ऊंचाई 75 मीटर और जल क्षमता 22.5 मिलियन क्यूबिक मीटर थी . विदित हो लीबिया में कर्नल गद्दाफी की सरकार के पतन के बाद देश  विभिन्न  सशस्त्र  गिरोहों की हिंसा का शिकार है . देश के दो हिस्सों में अलग-अलग लोगों का नियन्त्रण है . ऐसे में बांधों के रखरखाव की किसी को परवाह थी नहीं . दोनों बाँध इस तरह बने थे कि एक के भरने पर दूसरा भरता था . त्रासदी के समय इनमें एक साथ इतना पानी आ गया कि पहले अल बिलाद बांध भर गया और उसके जल भराव ने पानी को पीछे की तरफ धकेला . उधर अबू मंसूर में पहले से ही पानी भरा था . वह इस रिवर्स प्रेशर से  बिखर गया और इस तरह दोनों कमजोर बाँध एक आपदा में बदल गए .

सीबा यूनिवर्सिटी द्वारा प्रकाशित पुरे एंड एप्लाइड साइंस जर्नल, वॉल्यूम 21, वर्ष 2022 में एक साल पहले ए आर आशूर , ओमर अल –मुख़्तार यूनिवर्सिटी , अलबीदा, लीबिया का एक शोध पत्र प्रकाशित हुआ था जिसमें बरसात के बढ़ते मिजाज और  बांधों की जर्जर हालत के चलते किसी बड़े खतरे की चेतावनी दी गई  थी . हालंकि यह शोध सारी दुनिया  में पढ़ा गया  लेकिन न तो लीबिया सरकार और न ही विश्व के अन्य देश या संयुक्त राष्ट्र संस्थाओं ने इसकी कोई परवाह की . परिणाम मने ऐसे तबाही है जिसका खामियाजा अभी सालों भोगना है . अभी लोग वहां साफ़ पानी ना मिलने से मर रहे हैं , लाशों के शहर में फ़ैल रही बदबू ने बीमारी, मौत के नए अध्याय लिख दिए हैं, वहां न तो अस्पताल हैं , न ही डोक्टर या दवा. हर तरफ इन्सान और जानवरों के शव सड़ रहे हैं .

वैसे इस तबाही  को केवल  जर्जर बाँध के सर नहीं मढ़ा जा सकता . भले ही अभी इस बात को स्वीकारने में हिचकिचाहट हो, लेकिन 24 घंटे में 16 इंच अर्थात कोई 411 मिलीमीटर बरसात , जलवायु परिवर्तन के कुप्रभाव की तरफ भी इशारा है . सनद रहे जिन नदियों पर बाँध हैं वे आमतौर पर सूखी ही रहती हैं . मुसलाधार बरसात ने   शहर को घेरे हुए पहाड़ों से ताकतवर जलधाराओं का तेजी से नीचे गिरना और उसके साथ जबर्दस्त भूमि कटाव का काम किया . उल्लेखनीय है कि दरना ,  जेबेल अख़दर के पूर्वी छोर पर स्थित है.  लीबिया में वैसे ही बहुत कम जंगल हैं लेकिन यह इलाका हरा हरा है . शुष्क जलवायु के कारण, लीबिया जंगल केवल 0.1% है। दरना को  पूर्वी लीबिया का उपजाऊ इलाका माना जाता है. यह देश का सर्वाधिक पानीदार क्षेत्र है, जहाँ सालाना लगभग 600 मिलीमीटर (24 इंच) वर्षा होती है. दुर्भाग्य से दस सितम्बर को एक ही दिन में इतना पानी गिर गया .  

 

इस शहर की स्थापना 15वीं शताब्दी में एक प्राचीन यूनानी उपनिवेश डार्निस द्वारा की गई थी. यहा अमेरिकी भी आये और फ़्रांसिसी भी और इटालियन भी, ब्रितानी उपनिवेश भी रहा . तभी सफेद रंग से एक से पुते घर , ढेर सारे झरने, ताड़ के घने  बाग़  के सताह-साथ यहा सब्जी- फल के बड़े बागन हुआ करते थे . यह एक कपड़ा मिल भी थी . इलाके का सुंदर पर्यटन स्थल अब कीचड, दलदल और रेत से पट गया है .

दुनियाभर  में यह बात अब  सभी जान गए हैं कि  जलवायु परिवर्तन के कारण, बेमौसम, अचानक और तीव्र मौसम हो रहा है. इस तरह की बारिश  से भारत और दक्षिणी एशिया अछूता नहीं हैं . डेढ़ दशक पहले विश्व बाँध आयोग चेतावनी दे चुका था कि  बड़े बाँध (जो 45 मीटर से अधिक ऊँचे है ) मानवीय जीवन के लिए बड़ी त्रासदी बन्ने जा रहे हैं . भारत में भी ऐसे कोई 28बाँध  ऐसे है जिनकी निर्धारित उम्र बीत चुकी है और अभी भी उनका इस्तेमाल हो रहा है . हमारे यहाँ हर साल दसियों जगह बाढ़ से  नुक्सान का साल कारण बांधो का क्षमता तक भर जाना और उसके बाद उनके दरवाजे खोल देना हैं . यह सटीक समय है कि हम अपने बड़े बांधों को जलवायु परिवर्तन के मद्देनजर आंके, उनका प्रबंधन करें और भविष्य में सिंचाई और जल संचयन के लिए छोटी – सठिय और पारम्परिक जल परियोजनाओं पर अधिक ध्यान दें . 

मंगलवार, 19 सितंबर 2023

Ban on mobile in school: Is it a hindrance in the new education policy?

 


         स्कूल में मोबाइल पर पाबन्दी : नई शिक्षा नीति में बाधक तो नहीं ?

पंकज चतुर्वेदी



पिछले दिनों  दिल्ली में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने यूनेस्को के सहयोग से तैयार एक कार्टून किताब  के विमोचन के अवसर पर बच्चों से पूछ लिया कि वे कितना समय  मोबाइल-कम्प्यूटर पर देते हैं . उन्होंने बच्चों से पूछा कि उनका स्क्रीम टाइम क्या है। इस सवाल पर वहां मौजूद बच्चे दाएं-बाएं देखने लगे। हालांकि कुछ बच्चों ने सकुचाते हुए तीन से चार घंटे बताया। इस पर श्री प्रधान ने कहा कि मानसिक स्वास्थ्य के लिए ज्यादा स्क्रीन टाइम नुकसानदायक है।  इससे तीन दिन पहले ही आंध्र प्रदेश सरकार ने स्कूलों में फोन पर पाबन्दी लगा दी ,  सरकार ने यह कदम यूनेस्को  की उस रिपोर्ट के बाद उठाया जिसमें मोबाइल के अधिक इस्तेमाल से बच्चों के मानसिक विकास पर विपरीत असर पड़ने की बात कही थी .राज्य में अब शिक्षक भी कक्षा में फोन नहीं ले जा सकते . हालाँकि कोविड से पहले दुनिया में फ़्रांस जैसे देश ने भी शिक्षा में सेल फोन पर पूरी तरह पाबन्दी लगाई थी . कोलंबिया, अमेरिका . इटली , सिंगापूर, बंगलादेश जैसे देशों में कक्षा में मोबाइल पर रोक है .  भारत में फ़िलहाल यह अटपटा लग रहा है क्योंकि अभी डेढ़ साल पहले हमारा सारा स्कूली शिक्षा तन्त्र ही सेल फोन से संचालित था. यही नहीं  नई शिक्षा नीति -2020, जो कि देश में शिक्षा के क्षेत्र में क्रन्तिकारी बदलाव का दस्तावेज है, में  मोबाइल और डिजिटल डिवाइस के सलीके से प्रयोग को प्रोत्साहित किया गया है .



वैसे भारत  में सस्ता इंटरनेट और साथ में कम दाम का स्मार्ट फोन अपराध का बड़ा कारण बना हुआ है,- खासकर किशोरों में यौन अपराध हों या मारापीटी या फिर शेखी बघारने को किये जा रहे दुह्साह्स . मोबाईल के कमरे व् वीडियो और उसे इन्टरनेट के जरिये पलक झपकते ही दुनिया तक पहुंचा कर अम्र-अजर होने की आकांक्षा युवाओं को कई गलत रास्ते की और मोड़ रही है, दिल्ली से सटे नोयडा में स्कूल के बच्चों ने अपनी ही टीचर का गन्दा वीडियो बना कर सोशल मिडिया पर डाल दिया . क्षणिक आवेश में किसी के प्रति आकर्षित हो गयी स्कूली लड़कियों के अश्लील  वीडियो क्लिप से इन्टरनेट संसार पटा  पडा हैं . इसके विपरीत कई बच्चों के लिए अनजाना रास्ता तलाशना हो या, किसी गूढ़ विष का हल या फिर देश दुनिया के जानकारी या फिर अपने विरुध्ध हुए अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाना ; इन सभी में हाथ की मुट्ठी में सिमटी दुनिया के प्रतिक मोबाईल ने नयी ताक़त और राह डी है, खासकर युवा लड़कियों को मोबाईल ने बेहद सहारा दिया है .


हालांकि यह भी सच है की भारत में मोबाइल –धारक बच्चों का आंकडा बहुत कम है . खासकर सरकारी स्कूल में जाने वाले बच्चों में आधे से अधिक बच्चे अभी अपने माता पिता का फोन मांग कर ही कम चलते हैं  लेकिन यह बात सच है कि यदि बच्चे क्लास में फोन ले कर बैठते हैं  वह बोर्ड और पुस्तकों के स्थान पर मोबाईल पर ज्यादा ध्यान देते हैं. वे एक दुसरे को मेसेज भेज कर चुहल करते है या फेसबुक, इन्स्ताग्राम  जैसे सोशल मीडिया  पर लगे रहते हैं . इससे उनके सीखने और याद रखने की गति तो प्रभावित हो ही रही है, बच्चों के स्वास्थ्य पर भी विपरीत असर हो रहा है . अब वे खेल के मैदान में पसीना बहाने के बनिस्पत आभासी दुनिया में व्यस्त रहते है, इससे उनमें मोटापा, आलस आ रहा है, आँखें कमजोर होना , याददाश्त कमजोर होना भी इसके प्रभाव दिखे, पहले बच्चे जिस गिनती, पहाड़े, स्पेलिंग या तथ्य को अपनी स्मृति में रखते थे, अब वे सर्च इंजन  की चाहत में उसे याद नहीं रखते , यहाँ तक की कई बच्चों को अपने घर का फोन नम्बर तक याद नहीं था. सबसे बड़ी बात सेल फोन के साथ बच्चा  भीड़ के बीच भी अकेला रहता है और धीरे धीरे सामुदायिकता या सहस्तित्व की भावना से वह दूर हो जाता है . अधिक गुस्सा आना या हिंसक होना इसी प्रवृति के दुष्परिणाम हैं .



यह कटु सत्य है कि स्कूल में फोन कई किस्म की बुराइयों को जन्म दे रहा है  आज फ़ो में खेल, संगीत, वीडियों,  जैसे कई ऐसे  एप उपलब्ध है जिसमें बच्चे का मन लगना ही है और इससे उसकी शिक्षा पर विपरीत प्रभाव पड़ता हैं इसके साथ ही इम्तेहान में धोखाधड़ी और नक़ल का एक बड़ा औजार यह बन गया हैं  यही नहीं इसके कारण अपराध भी हो रहे हैं. निरंकुश  अश्लीलता स्मार्ट फोन पर किशोर बच्चों के लिए सबसे बड़ा जहर है , चूँकि ये फोन महंगे भी होते हैं इस लिए अक्सर बेहतर फोन खरीदने या ज्यादा इन्टरनेट  पेक खरीदने के लिए बच्चे चोरी जैसे काम भी करने लगते हैं  विद्यालयों में फोन ले कर जा रहे बच्चों में से बड़ी संख्या धमकियों को भी झेलती है , कई एक शोषण का शिकार भी होते हैं .



मोबाइल , विद्यालय और शिक्षा का एक दूसरा पहलु भी है . जिस देश में मोबाईल कनेक्शन की संख्या देश की कुल आबादी के लगभग करीब पहुंच रही हो, जहां किशोर ही नहीं 12 साल के बच्चे के लिए मोबाईल स्कूली-बस्ते की तरह अनिवार्य बनता जा रहा है, वहां बच्चों को डिजिटल साक्षरता, जिज्ञासा, सृजनशीलता, पहल और सामाजिक कौशलों की ज़रूरत । हम पुस्तकों में पढ़ाते हैं कि गाय रंभाती है या शेर दहाड़ता है। कोई भी शिक्षक यह सब अब मोबाईल पर सहजता से बच्चों को दिखा कर  अपने पाठ को कम शब्दों में सहजता से समझा सकता है। मोबाईल पर सर्च इंजन का इस्तेमाल, वेबसाईट पर उपलब्ध सामग्री में यह चीन्हना कि कोन सी पुष्ट-तथ्य वाली नहीं हैअपने पाठ में पढ़ाए जा रहे स्थान, ध्वनि, रंग , आकृति को तलाशना व बूझना प्राथमिक शिक्षा में शमिल होना चाहिए। किसी दृश्य को  चित्र या वीडिया के रूप में सुरक्षित रखना एक कला के साथ-साथ सतर्कता का भी पाठ है। मैंने अपने रास्ते में कठफोडवा देखा, यह जंगल महकमे के लिए सूचना हो सकती है कि हमारे यहां यह पक्षी भी आ गया है। साथ ही आवाजों को रिकार्ड करना, भी महत्वूपर्ण कार्य है। मोबाईल का सही तरीके से इस्तेमाल खुद को शिक्षक कहने वालों के लिए एक खतरा सरीखा है। हमारे यहां बच्चों को मोबाईल के सटीक इस्तेमाल का कोई पाठ किताबों  में हैं ही नहीं।


भारत में शिक्षा का अधिकार व कई अन्य कानूनों के जरिये बच्चों के स्कूल में पंजीयन का आंकड़ा और साक्षरता दर में वृद्धि निश्चित ही उत्साहवर्धक है लेकिन जब गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की बात आती है तो यह आंकड़ा हमें शर्माने को मजबूर करता है कि हमारे यहां आज भी 10 लाख शिक्षकों की कमी है। इस खाई को पाटने में डिजिटल माध्यम की सफल भूमिका कोरोना काल में देखि जा चुकी है .

वैसे बगैर किसी दंड के अंदर प्रदेश का कानून कितना कारगर होगा यह तो वक़्त ही बताएगा लेकिन डिजिटल दुनिया पर आधुनिक हो रहे विद्यालयों में इस कदम से एक बहस जरुर शुरू हो गयी है, खासतौर पर भारत जैसे देश में जहां अशिक्षा , असमानता , बेरोजगारी और गरीबी से कुंठित युवाओं की संख्या बढती जा रही है , जहां कक्षा आठ के बाद स्कूल से ड्राप आउट डॉ बहुत ज्यादा है , लेकिन कई राज्यों में स्कूल के मास्टर को स्मार्ट फोन पर सेल्फी के साथ हाजिरी लगाना अनिवार्य है, ऐसे देश में विद्यालय में बच्चे ही नहीं शिक्षक के भी सेल फोन के इस्तेमाल की सीमाएं, पाबंदियां अवश्य लागु होना चाहिए, खेद है की भारत का सुप्रीम कोर्ट गत छह साल से सरकार से अश्लील वेबसाईट पर पाबंदी के आदेश दे रहा है और सरकार उस पर अधूरे मन से कार्यवाही अक्रती है और अगले ही दिन वे नंगी साईट फिर खुल जाती हैं , देश के झारखण्ड राज्य के जामताड़ा जिले के आंचलिक क्षेत्रों में अनपढ़ युवा मोबाईल से बेंक फ्रौड का अंतर्राष्ट्रीय गिरोह चलाते हैं लेकिन  सरकार असहाय रहती हैं . ऐसे में हमारे यहाँ मोबाइल पर कक्षा में पूर्ण पाबंदी  और अनिवार्यता के बीच सामंजस्य जैसे मसले पर सभी पक्षकारों के बीच बहस अवश्य होना चाहिए .

 

शुक्रवार, 15 सितंबर 2023

Slogans can not reduce carbon emissions

 नारों से कम  नहीं होगा कार्बन उत्सर्जन

पंकज चतुर्वेदी



हाल ही मेन नयी दिल्ली में सम्पन्न जी- 20 सम्मेलन में जलवायु परिवर्तन का मुद्दा उठा तो लेकिन इसके निराकरन के ठोस क्रियान्वयन पर कोई दिशा निर्देश आए नहीं , सभी देश सन 2030 तक कोले पर आधारित उद्यो व गतिविधियों पर  धीरे धीरे पूर्ण पाबंदी और  नैसर्गिक तरीकों से ऊर्जा के विकल्प के लिए कागज पर तो सहमत हुये लेकिन इसकी कोई रूपरेखा नहीं बन पाई । हकीकत तो यह हैं कि दुनिया भर के कार्बन उत्सर्जन का 80 फीसदी जी20 देशों से होता है. इससे पहले जुलाई में हुई बातचीत के दौरान 2025 तक उत्सर्जन कम करने या अक्षय ऊर्जा के इस्तेमाल को तेजी से बढ़ाने पर कोई सहमति नहीं बन पाई. 2015 से 2022 के दौरान जी20 देशों में प्रति व्यक्ति उत्सर्जन नौ फीसदी बढ़ गया. यह रिपोर्ट ऊर्जा मामलों पर काम करने वाले एक थिंकटैंक एंबर ने प्रकाशित की है. इस गुट के सदस्य देशों में से 12 देश ऐसे हैं जो अपना प्रति व्यक्ति उत्सर्जन कम करने में सफल रहे. इनमें ब्रिटेन, जर्मनी और अमेरिका शामिल हैं. हालांकि दूसरे देश ऐसा कर पाने में विफल रहे जिनमें इस बार जी20 की मेजबानी कर रहे भारत समेत इंडोनेशिया और चीन भी हैं. इन देशों का कार्बन उत्सर्जन कम होने के बजाए बढ़ा है. इंडोनेशिया को पिछले साल कोयले की जगह दूसरे ईंधन इस्तेमाल करने के लिए अमीर देशों से लाखों डॉलर की मदद भी मिली थी लेकिन उसका प्रति व्यक्ति उत्सर्जन 2015 के मुकाबले 56 फीसदी बढ़ा है.

इन्टरनेशनल मोनेटरी फण्ड, आईएमऍफ़, की एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2022 में वैश्विक स्तर पर जीवाश्म इंधन उद्योग को 7 खरब डॉलर की सब्सिडी दी गयी, यानी हरेक मिनट 1.3 करोड़ डॉलर की सब्सिडी। यह राशि वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद का 7 प्रतिशत है और वैश्विक स्तर पर शिक्षा के क्षेत्र में खर्च की जाने वाली राशि से लगभग दुगुनी अधिक है। जलवायु परिवर्तन और वायु प्रदूषण से जितना नुकसान पूरी दुनिया को उठाना पड़ता है, उसमें से 80 प्रतिशत नुकसान इसी सब्सिडी की देन है। विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार वैश्विक स्तर पर जितनी सब्सिडी जीवाश्म ईंधन और कृषि क्षेत्र में दी जाती है उसमें से 12 ख़राब डॉलर राशि प्रतिवर्ष ऐसे कार्यों में खर्च की जाती है जिनसे तापमान वृद्धि और पर्यावरण विनाश को बढ़ावा मिलता है।

इधर जी-20 की दिल्ली बैठक में कहा गया कि 2030 तक नेट- जीरों के लक्ष्य को पाने के लिए सालाना 5.8 ख़ाब डॉलर  सालाना की जरूरत होगी । इस पर सभी देशों की सहमति भी रही है  विदित हो हरित जलवायु कोष (जी सी एफ) हर साल महज 100 अरब  डॉलर ही एकत्र  कर पाता है जो अब नाकाफी है । आईएमऍफ़ की रिपोर्ट कहती है सबसे अधिक सब्सिडी देने वाले देशों में भारत सहित चीन, अमेरिका, रूस, यूरोपियन यूनियन शामिल हैं। सन 2009 में ही जी20 देशों ने जीवाश्म ईंधन  में सब्सिडी को ख़त्म करने का संकल्प लिया था। लेकिन यह छूट के बढ़ती गई जो वर्ष 2022 में 1.4 खरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर आ गई । इस रिपोर्ट के अनुसार यदि तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक ही नियंत्रित करना है तब वर्ष 2030 तक वर्ष 2019 के ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन की तुलना में 43 प्रतिशत कटौती करनी पड़ेगी, और यदि जीवाश्म इंधन पर सब्सिडी तत्काल प्रभाव से ख़त्म की जाती है तब ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में वर्ष 2030 तक 34 प्रतिशत की कमी आ जायेगी।

 

 

वैसे तो भारत चार साल पहले ही संयुक्त राष्ट्र  को आश्वस्त कर चुका है कि 2030 तक  हमारा देकार्बन उत्सर्जन की मौजूदा मात्रा को 33 से 35 फीसदी घटा देगा, लेकिन असल समस्या तो उन देशों  के साथ है जो मशीनी  विकास व आधुनिकीकरण के चक्कर में पूरी दुनिया को कार्बन उत्सर्जन का दमघोंटू बक्सा बनाए दे रहे हैं और अपने आर्थिक प्रगति की गति के मंथर होने के भय से र्प्यावरण के साथ इतने बड़े दुष्कर्म को थामने को राजी नहीं हैं।

चूंकि भारत में अभी भी बड़ी संख्या में ऐसे परिवार हैं जो खाना पकाने के लिए लकड़ी या कोयले के चूल्हे इस्तेमाल कर रहे हैं, सो अंतर्राष्ट्रीय  एजेंसियां परंपरागत ईंधन के नाम पर भारत पर दबाव बनाती रहती हैं, जबकि विकसित देशों  में कार्बन उत्सर्जन के अन्य कारण ज्यादा घातक हैं ।

धरती में कार्बन का बड़ा भंडार जंगलों में हरियाली के बीच है। पेड़ , प्रका संश्लेषण के माध्यम से हर साल कोई सौ अरब टन यानि पांच फीसदी कार्बन वातावरण में पुनर्चक्रित करते है। आज दुनिया में अमेरिका सबसे ज्यादा 5414 मिलियन मीट्रिक टन कार्बन डाय आक्साईड उत्सर्जित करता है जो कि वहां की आबादी के अनुसार प्रति व्यक्ति 7.4 टन है।  उसके बाद कनाड़ा प्रति व्यक्ति 15.7 मिलियन मीट्रिक टन, फिर रूस मिलियन मीट्रिक 12.6 टन हैं । जापान, जर्मनी, द.कोरिया आदि औद्योगिक देषो में भी कार्बन उत्सर्जन 10 टन प्रति व्यक्ति से ज्यादा ही है। इसकी तुलना में भारत महज 2274 मिलियन मीट्रिक या प्रति व्यक्ति महज 1.7 टन कार्बन डाय आक्साईड ही उत्सर्जित करता है। अनुमान है कि यह 2030 तक तीन गुणा यानि अधिकतम पांच तक जा सकता है। इसमें कोई शक नहीं कि प्राकृतिक आपदाएं देशों की भौगोलिक सीमाएं देख कर तो हमला करती नहीं हैं। चूंकि भारत नदियों का दे हैवह भी अधिकां ऐसी नदियां जो पहाड़ों पर बरफ पिघलने से बनती हैं, सो हमें हरसंभव प्रयास करने ही चाहिए। हमारे देश में प्रकृति में कार्बन की मात्रा बढने का प्रमुख कारण है बिजली की बढती खपता। सनद रहे हम द्वारा प्रयोग में लाई गई बिजली ज्यादातर जीवाश्म ईंधन (जैसे कोयला, प्राकृतिक गैस और तेल जैसी प्राकृतिक चीजों) से बनती है। इंधनों के जलने से कार्बन डाइऑक्साइड निकलता है। हम जितनी ज्यादा बिजली का इस्तेमाल करेंगे, बिजली के उत्पादन के लिए उतने ही ज्यादा ईंधन की खपत होगी और उससे उतना ही ज्यादा कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जित होगा।

कार्बन उत्सर्जन की मात्रा कम करने के लिए हमें एक तो स्वच्छ इंर्धन को बढ़ावा देना होगा। हमारे दे में रसोई गैसे की तो कमी है नहीं, हां सिलेंडर बनाने के लिए जरूरी स्टील, सिलेंडर वितरण के लिए आंचलिक क्षेत्रों तक नेटवर्क को विकसित करना और गरीब लोगों को बेहद कम दाम पर गैस उपलब्ध करवाना ही बड़ी चुनौती है। कार्बन उत्सर्जन घटाने में सबसे बड़ी बाधा वाहनों की बढ़ती संख्या, मिलावटी पेट्रो पदार्थों की बिक्री, घटिया सड़केंव आटो पार्टस की बिक्री व छोटे कस्बों तक यातायात जाम होने की समस्या है। दे में बढ़ता कचरे का ढेर व उसके निबटान की माकूल व्यवस्था ना होना भी कार्बन उत्सर्जन नियंत्रण की बड़ी बाधा है। सनद रहे कि कूड़ा जब सड़ता है तो उससे बड़ी मात्रा में मीथेन, कार्बन मोनो व डाय आक्साईड गैसें निकल कर वायुमंडल में कार्बन के घनत्व को बढ़ाती हैं। साथ ही बड़े बांध, सिंचाई नहरों के कारण बढ़ते दल-दल भी कार्बन डाय आक्साईड पैदा करते हैं

अभी तक यह मान्यता रही है कि पेड़ कार्बन डाय आक्साईड को सोख कर आक्सीजन में बदलते रहते है। सो, जंगल बढ़ने से कार्बन का असर कम होगा। यह एक आंषिक तथ्य है। कार्बन डाय आक्साईड में यह गुण होता है कि यह पेड़े की वृद्धि में सहायक है। लेकिन यह तभी संभव होता है जब पेड़ो को नाईट्रोजन सहित सभी पोषक तत्व सही मात्रा में मिलते रहें। यह किसी से छिपा नहीं है कि खेतों में बेशुमार रसायनों के इस्तेमाल से बारि का बहता पानी कई गैरजरूरी तत्वों को ले कर जंगलों में पेड़ो तक पहुचता है और इससे वहां की जमीन में मौजूद नैसर्गिक तत्वों की गणित गड़बड़ा जाती है। तभी हरी पेड़ या आबादी के पास के जंगल कार्बज नियंत्रण में बेअसर रहते है। यह भी जान लेना जरूरी है कि जंगल या पेड़ वातावरण में कार्बन की मात्रा को संतुलित करने भर का काम करते हैं, वे ना तो कार्बन को संचित करते हैं और ना ही उसका निराकरण। दो दषक पहले कनाड़ा में यह सिद्ध हो चुका था कि वहां के जंगल उल्टे कार्बन उत्सर्जित कर रहे थे।

कार्बन की बढ़ती मात्रा दुनिया में भूख, बाढ़, सूखे जैसी विपदाओं का न्यौता है। जाहिर है कि इससे जूझना सारी दुनिया का फर्ज है, लेकिन भारत में मौजूद प्राकृतिक संसाधन व पारपंरकि ज्ञान इसका सबसे सटीक निदान है। छोटे तालाब व कुंए, पारंपरिक मिश्रित जंगल, खेती व परिवहन के पुराने साधन, कुटी उद्योग का सषक्तीकरण कुछ ऐसे प्रयास हैं जो बगैर किसी मषीन या बड़ी तकनीक या फिर अर्थ व्यवस्था को प्रभावित किए बगैर ही कार्बन पर नियंत्रण कर सकते हैं और इसके लिए हमें पष्चिम से उधार में लिए ज्ञान की जरूरत भी नहीं है। सनद रहे कि बड़े बांध कार्बन को बढाते हैं जबकि छोटी जल योजनाएं या पारंपरिक सिंचाई तीके कम पानी में बेहतर काम करते है।। ठीक इसी तरह खेती में रसायनों व कीटनाषकों का इस्तेमाल भी वातावरण में कार्बन डाय आक्साईड में इजाफा करता है। चूंकि भारत बड़ी आबादी वाला देष है अतः यहां पेट भरते के लिए अधिक खेती होना लाजिमी है। कई बार खेतों के लिए हरियाली को भी उजाड़ा जा रहा है।अतः हमें उर्जा के इस्तेमाल से कही ज्यादा खेती के तरीकों पर गंभीरता से विचार करना होगा।

 

 

क्या है ग्लोबल वॉर्मिंग ?

हमारी धरती को प्राकृतिक तौर पर सूर्य की किरणों से गरमी मिलती है। ये किरणें वायुमंडल से गुजरते हुए पृथ्वी की सतह से टकराती हैं और फिर वहीं से परावर्तित होकर लौट जाती हैं। धरती का वायुमंडल कई गैसों से मिलकर बना है जिनमें कुछ ग्रीनहाउस गैसें भी शामिल हैं। इनमें से ज्यादातर धरती के ऊपर एक प्राकृतिक आवरण बना लेती हैं। यह आवरण लौटती किरणों के एक हिस्से को रोक लेता है और इस तरह धरती को गरम बनाए रखता है। इंसानोंदूसरे प्राणियों और पौधों के जीवित रहने के लिए कम से कम 16 डिग्री सेल्सियस तापमान की जरूरत होती है। वैज्ञानिकों का मानना है कि ग्रीनहाउस गैसों में बढ़ोतरी होने पर यह आवरण और भी मोटा होता जाता है। ऐसे में यह आवरण सूर्य की ज्यादा किरणों को रोकने लगता है और फिर यहीं से शुरू होते हैं ग्लोबल वॉर्मिंग के दुष्प्रभाव मसलन समद्र स्तर ऊपर आनामौसम में एकाएक बदलाव और गर्मी बढ़नाफसलों की उपज पर असर पड़ना और ग्लेशियरों का पिघलना। यहां तक कि ग्लोबल वॉर्मिंग की वजह से प्राणियों की कई प्रजातियां भी लुप्त हो चुकी हैं।

यह वैज्ञानिक तथ्य है कि बीते सौ सालों के दौरान सन 1900 से 2000 तक पृथ्वी का औसत तापमान एक डिग्री फैरेनहाइट बढ़ गया है। सन 1970 के मुकाबले आज धरती का तापमान तीन गुणा तेजी से बढ़ रहा है। इस बढ़ती वैश्विक गर्मी का असल कारण इंसान व उसकी भौतिक सुविधाओं की जरूरतें ही हैं। ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जनगाड़ियों से निकलने वाला घुँआ और जंगलों में लगने वाली आग इसकी मुख्य वजह हैं। इसके अलावा घरों में लक्जरी वस्तुएँ मसलन एयरकंडीशनररेफ्रिजरेटरओवन आदि भी इस गर्मी को बढ़ाने में प्रमुख भूमिका निभाते हैं।

ग्रीन हाउस गैस पृथ्वी के वातावरण में प्रवेश तो कर लेती हैं लेकिन यहाँ से वापस अंतरिक्षमें नहीं जातीं और यहाँ का तापमान बढ़ाने में कारक बनती हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार इन गैसों का उत्सर्जन अगर इसी प्रकार चलता रहा तो 21वीं शताब्दी में पृथ्वी का तापमान 3 से 8 डिग्री तक बढ़ सकता है। अगर ऐसा हुआ तो इसके परिणाम बहुत घातक होंगे। विश्व के कई हिस्सों में बिछी बर्फ गल जाएगीइससे जल का आगमन बढ़ेगा व समुद्र का जल स्तर कई फीट ऊपर तक बढ़ जाएगा। समुद्र के इस बर्ताव से विश्व के कई हिस्से जलमग्न हो जाएँगे। भारी तबाही मचेगी।

आखिर क्यों तप रही है धरती

इसे समझने के लिए वातावरण और ग्रीन हाउस गैसों के बारे में जानकारी लेना जरूरी है। इन्हें सीएफसी या क्लोरो फ्लोरो कार्बन भी कहते हैं. इनमें कार्बन डाई ऑक्साइड हैमीथेन हैनाइट्रस ऑक्साइड है और वाष्प है। इनमें भी सबसे अधिक उत्सर्जन कार्बन डाइऑक्साइड का होता है। इस गैस का उत्सर्जन सबसे अधिक ईंधन के जलने से होता हैखासतौर पर कोयलाडीजल-पेट्रोल जैसो इंर्धन। ये गैसें वातावरण में बढ़ती जा रही हैं और इससे ओजोन परत की छेद का दायरा बढ़ता ही जा रहा है। पृथ्वी के चारों ओर का वायुमंडल मुख्यतः नाइट्रोजन (78ः)ऑक्सीजन (21ः) तथा    शेष 1ः में सूक्ष्ममात्रिक गैसों (ऐसा इसलिए कहा जाता है क्योंकि ये बिल्कुल अल्प मात्रा में उपस्थित होती हैं) से मिलकर बना हैजिनमें ग्रीन हाउस गैसें कार्बन डाईऑक्साइडमीथेनओजोनजलवाष्पतथा नाइट्रस ऑक्साइड भी शामिल हैं। ये ग्रीनहाउस गैसें आवरण का काम करती है एवं इसे सूर्य की पैराबैंगनी किरणों से बचाती हैं। पृथ्वी की तापमान प्रणाली के प्राकृतिक नियंत्रक के रूप में भी इन्हें देखा जा सकता है।

ओजोन की परत ही सूरज और पृथ्वी के बीच एक कवच की तरह है। यह भी साबित हो चुका है कि ग्रीन हाउस जब वायुमंडल में मौजूद होती हैं तो वे सूरज की गर्मी को अवशोषित करती हैं। जिससे कि हमारे वातावरण का तापमान बढ़ता ही है। पृथ्वी सूर्य से ऊर्जा प्राप्त करती है जो पृथ्वी के धरातल को गर्म करता है। चूंकि यह ऊर्जा वायुमंडल से होकर गुजरती हैइसका एक निश्चित प्रतिशत (लगभग 30) तितर-बितर हो जाता है। इस ऊर्जा का कुछ भाग पृथ्वी एवं सूर्य की सतह से वापस वायुमंडल में परावर्तित हो जाता है। पृथ्वी को ऊष्मा प्रदान करने के लिए शेष (70ः) ही बचता है। संतुलन बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है कि पृथ्वी ग्रहण किये गये ऊर्जा की कुछ मात्रा को वापस वायुमंडल में लौटा दे। चूँकि पृथ्वी सूर्य की अपेक्षा काफी शीतल हैयह दृष्टव्य प्रकाश के रूप में ऊर्जा उत्सर्जित नहीं करती है। यह अवरक्त किरणों अथवा ताप विकिरणों के माध्यम से उत्सर्जित करती है। तथापिवायुमंडल में विद्यमान कुछ गैसें पृथ्वी के चारों ओर एक आवरण-जैसा बना लेती हैं एवं वायुमंडल में वापस परावर्तित कुछ गैसों को अवशोषित कर लेते हैं। इस आवरण से रहित होने पर पृथ्वी सामान्य से 300ब् और अधिक ठंडी होती। जल वाष्प सहित कार्बन डाइआक्साइडमिथेन एवं नाइट्रस ऑक्साइड जैसी इन गैसों का वातावरण में कुल भाग एक प्रतिशत है। इन्हें ग्रीनहाउस गैसकहा जाता है क्योंकि इनका कार्य सिद्धांत ग्रीनहाउस जैसा ही है। जैसे ग्रीनहाउस का शीशा प्राचुर्य उर्जा के विकिरण को रोकता हैठीक उसी प्रकार यह गैस आवरणउत्सर्जित कुछ उर्जा को अवशोषित कर लेता है एवं तापमान स्तर को अक्षुण्ण बनाए रखता है। एक फ्रेंच वैज्ञानिक जॉन-बाप्टस्ट फोरियर द्वारा इस प्रभाव का सबसे पहले पता लगाया गया था जिसने वातावरण एवं ग्रीनहाउस की प्रक्रियाओं में समानता को साबित किया और इसलिए इसका नाम ग्रीनहाउस प्रभावपड़ा।

वायुमंडल में दूसरी महत्वपूर्ण गैस मीथेन है। माना जाता है कि मीथेन उत्सर्जन का एक-चौथाई भाग पालतू पशुओं जैसे डेरी गायबकरियोंसुअरोंभैसोंऊँटोंघोड़ों एवं भेड़ों से होता है। ये पशु चारे की जुगाली करने के दौरान मीथेन उत्पन्न करते हैं। मीथेन का उत्पादन चावल और धान के खेतों से भी होता है जब वे बोने और पकने के दौरान बाढ़ में डूबे होते हैं। जमीन जब पानी में डूबी होती है तो ऑक्सीजन-रहित हो जाती है। ऐसी परिस्थितियों में मीथेन उत्पन्न करने वाले बैक्टीरिया एवं अन्य जंतु जैव सामग्री को नष्ट कर मीथेन उत्पन्न करते हैं। संसार में धान उत्पन्न करने वाले क्षेत्र का 90ः भाग एशिया में पाया जाता हैचूंकि चावल यहाँ मुख्य फसल है। संसार में धान उत्पन्न करने वाले क्षेत्र का 80-90ः भाग चीन एवं भारत में है।

भूमि को भरने तथा कूड़े-करकट के ढ़ेर से भी मीथेन उत्सर्जित होता है। यदि कूड़े को भट्टी में रखा जाता है अथवा खुले में जलाया जाता है तो कार्बन डाइआक्साइड उत्सर्जित होती है। तेल शोधनकोयला खदान एवं गैस पाइपलाइन से रिसाव (दुर्घटना एवं घटिया रख-रखाव) से भी मीथेन उत्सर्जित होती है। उर्वरकों के उपयोग को नाइट्रस आक्साइड के विशाल मात्रा में उत्सर्जन का कारण माना गया है। यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि किस प्रकार के उर्वरक का उपयोग किया किया हैकब और किस प्रकार उपयोग किया गया है तथा उस के बाद खेती की कौन सी पद्धति अपनाई गई है। लेग्युमिनस पौधों जैसे बीन्स एवं दलहनजो मिट्टी में नाइट्रोजन की मात्रा को बढ़ाते हैंभी इसके लिये जिम्मेवार हैं।

 पृथ्वी की उत्पति के समय से ही यह गैस आवरण अपने स्थान पर स्थित है। औद्योगिक क्रांति के उपरांत मनुष्य अपने क्रिया-कलापों से वातावरण में अधिक-से-अधिक ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कर रहा है। इससे आवरण मोटा हो जाता है एवं प्राकृतिक ग्रीनहाउस प्रभावको प्रभावित करता है। ग्रीनहाउस गैसें बनाने वाले क्रिया-कलापों को स्रोतकहा जाता है एवं जो इन्हें हटाते हैं उन्हें नालीकहा जाता है। स्रोतएवं नालीके मध्य संतुलन इन ग्रीनहाउस गैसों के स्तर को बनाए रखता है।

 मानवजाति इस संतुलन को बिगाड़ती हैजब प्राकृतिक नालियों से हस्तक्षेप करने वाले उपाय अपनाए जाते हैं। कोयलातेल एवं प्राकृतिक गैस जैसे इंधनों को जब हम जलाते हैं तो कार्बन वातावरण में चला जाता है। बढ़ती हुई कृषि गतिविधियांभूमि-उपयोग में परिवर्तन एवं अन्य स्रोतों से मिथेन एवं नाइट्रस आक्साइड का स्तर बढ़ता है। औद्योगिक प्रक्रियाएं भी कृत्रिम एवं नई ग्रीनहाउस गैसें जैसे सी0एफ0सी0 (क्लोरोफ्लोरोकार्बन) उत्सर्जित करती है जबकि यातायात वाहनों से निकलने वाले धुंए से ओजोन का निर्माण होता है। इसके परिणामस्वरूप ग्रीनहाउस प्रभाव को साधारणतः भूमंडलीय तापन अथवा ऋतु परिवर्तन कहा जाता है।

 

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