My writings can be read here मेरे लेख मेरे विचार, Awarded By ABP News As best Blogger Award-2014 एबीपी न्‍यूज द्वारा हिंदी दिवस पर पर श्रेष्‍ठ ब्‍लाॅग के पुरस्‍कार से सम्‍मानित

गुरुवार, 9 जनवरी 2014

http://baalrachnakaar.blogspot.in/2012/10/blog-post_4176.html

पंकज चतुर्वेदी
(प्रसिद्ध बाल कथाकार)
 
पंकज चतुर्वेदी हिंदी के प्रसिद्ध लेखक हैं। वह बच्चों के लिए तो लिखते ही हैं, या यूं कहिए वह बाल मन के विशेषज्ञ हैं, परंतु बड़ों के लिए, खास तौर पर देश की ज्वलंत समस्याओं पर भी उनकी लेखनी का पैनापन सबको अपना बना लेने की क्षमता रखता है। शायद ही कोई अखबार हो, जिसके पृष्ठों पर पंकज की कभी न कभी नजर न आते हों।

पंकज चतुर्वेदी का जन्म 11 दिसंबर 1963 को मध्यप्रदेश के झबुआ में हुआ। उनके पिता श्री विद्यासागर चतुर्वेदी संस्कृत के प्रकांड विद्वान होने के साथ-साथ अर्थशास्त्र और अंग्रेजी में एमए थे। मां भी उस जमाने की ग्रेजुएट हैं, जब लोग अपने घर की महिलाओं को घर में बंद रखना पसंद करते थे। विद्यासागर चतुर्वेदी मध्यप्रदेश सरकार की नौकरी में थे।
चूकि परिवार पढ़ा-लिखा था, अत: पंकज चतुर्वेदी को शुरू से ही पढऩे लिखने का माहौल मिला।
रतलाम के जावरा के एम जी हाई स्कूल से पढ़ाई के बाद उन्होंने महाराजा कॉलेज छतरपुर से मैथ्स में एम. एससी किया। स्कूल कॉलेज के दिनों में एनसीसी में भी सक्रिय रहे और उन्हें इसमें 'एÓ सर्टिफिकेट हासिल है।
पंकज कॉलेज के दिनों से ही लिखने लगे थे। उनकी पहली नियुक्ति स्वामी परवानंद डिग्री कॉलेज छतरपुर (मध्यप्रदेश) में सहायक प्राध्यापक की थी। वहीं से वह डेपुटेशन पर जिला साक्षरता समिति में जिला समन्वयक के पद पर चले गए। हालाकि यह कार्य प्रौढ़ के लिए था। पर साक्षरता अभियान का मतलब ही है आरंभ से पढ़ाई की शुरुआत कराना, यानी बड़े भी पढ़ते समय किसी बच्चे की तरह ही होते हैं। पंकज जी के अनुसार शायद तभी से उनके मन में बच्चों के लिए कुछ करने की इच्छा जागी। उनका ध्यान बच्चों के लिए लिखने की ओर आकर्षित करने का श्रेय गुरबचन सिंह जी को भी जाता है जो टीकमगढ़ में बाल साहित्य केंद्र चलाते थे। उन्होंने डिग्री कॉलेज छतरपुर (मध्यप्रदेश) में गणित के एसिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में साढ़े सात वर्षों तक अध्यापन का कार्य किया।
बच्चों से पंकज का जुड़ाव और प्रगाढ़ तब हुआ, जब वह नेशनल बुक ट्रस्ट से जुड़े। वह 5 जुलाई 1994 का दिन था, जब पंकज ने नेशनल बुक ट्रस्ट में नौकरी शुरु की। मजेदार बात यह है कि कॉलेज के दिनों का उनके अनुभव को देखते हुए यहां भी उन्हें पहले प्रौढ़ शिक्षा से ही जोड़ा गया। उनका विधिवत बाल साहित्य से जुड़ाव 1996 में हुआ जब उनकी नियुक्ति नेशनल बुक ट्रस्ट के राष्ट्रीय बाल साहित्य केंद्र में हुई। उन्होंने ही वहां पाठक मंच बुलेटिन की नींव डाली। बाल पुस्तक मेलों के आयोजन में पहल की।
आज वह नेशनल बुक ट्रस्ट में सहायक संपादक के पद पर हैं। वह पुस्तकों को बच्चों तक पहुंचाने के लिए एनबीटी द्वारा लगाए जाने वाले पुस्तक मेलों में सक्रिय भूमिका निभाते हैं।
प्रसाशक के रूप मे

नेशनल बुक ट्रस्ट में होने के कारण वह शायद पूरे देश में और विदेश में भी पुस्तक मेले के आयोजन के सिलसिले में घूम चुके हैं। बच्चों की रुचि पर उनकी अच्छी और गहरी पकड़ है। अपने काम से अलग वह लिखने को भी पर्याप्त समय देते हैं। अब तक उनकी दो दर्जन से ज्यादा बाल पुस्तकें आ चुकी हैं। वह बच्चों के लिए बड़ी और क्लिष्ट भाषा की पुस्तकों के पक्ष में नहीं हैं। उनके अनुसार बच्चों को छोटी और सार्थक पुस्तकें चाहिएं जो उनके विकास में सहायक हों।

पंकज जी की पुस्तकें (उपन्यास और कहानियां)

1. खुशी
2. मैं भी कुछ करूं
3. यह मैं हूं
4. चंदा और खरगोश
5. रिमझिम
6. बस्ते से बाहर
7. साईकिल वाले भैया
8. ठगा गया राजा
9. ग्रामीण क्षेत्रों में यातायात
10. हैंडपंप की देखभाल
11. गोबर से सोना
12. बेर का पेड़
13. हमारे उपग्रह
14. कड़वी मिठास
15. भूत धुलाई केंद्र
16. भोंदू
17. नमक की खेती
18. पालतू पशुओं की देखभाल
19. ढेर सारे दोस्त
20. दूर की दोस्ती
21. कहां गए कुत्ते के सींग
22. लो गरमी आ गई
23. पहिया
24. पहिया और अन्य कहानियां
इसके अलावा पंकज चतुर्वेदी ने बहुत सी पुस्तकों का संपादन और अनुवाद किया है।

पंकज चतुर्वेदी
सहायक संपादक
नेशनल बुक ट्रस्ट
5 नेहरू भवन, वसंत कुंज इंस्टिट्यूशनल एरिया-२
नई दिल्ली-110070
फोन (घर) 0120-4241060
फोन(आ.) 011-26707758
मोब : 0-9891928376
ईमेल: pc7001010@gmail.com

बुधवार, 8 जनवरी 2014

सांप्रदायिक सौहार्द का प्रतीक हजरत गुलाब शाह बाबा

सांप्रदायिक सौहार्द का प्रतीक हजरत गुलाब शाह बाबा
कभी नौगांव बुंदेलखंड की राजधानी हुआ करता था, ऐ छोटा सा कस्‍बा सौ से ज्‍यादा चौराहों वालाा बुंदेलखंड की सभी रियासतों के 'हाउस' हुआ करते थे वहांा आज उसी नौगांव, बुंदेलखंड की एक ऐसी कहानी बता रहा हूं जो मुल्‍क में धर्म के नाम पर वितंडा खडा करने वालों की आंखें खोल देगाा यहां हर साल अक्‍तूबर में बाबा गुलाब शाह की मजार पर उर्स होता हैा हर जाति धर्म के लोग यहां आते हैंा दिलचस्‍प बात यह है कि एक इस्‍लामी सूफी की मजार पर 'बिस्‍मिल्‍लाह' यानी 786 और ओम नम- शिवय साथ साथ लखिा हैा मजार की दीवारों पर हर धर्म के चित्र, वाक्‍य खुदे हैंा यहां आने वाले किसी भी मुसलमान या हिंदू का कभी धर्म भ्रष्‍ट नहीं हुआा इसके बारे में कई चमत्‍कारी कहानियां भी हें जिन पर मैं भरोसा तो नहीं करता लेकिन यहां का सौहार्द एक शास्‍वत सत्‍य है और इसे किसी चमत्‍कार नहीं माना जाये क्‍योंकि हमारा मुल्‍क है ही ऐसा, मिलाजुला सांझा संस्‍क़ति वाला
हजरत बाबा गुलाब शाह रहमत उल्लाह अलैह का संबंध हजरत बाबा ताजूउद्दीन ओलिया सरकार नागपुर से है, वे इनके गुरु थे। बाबा गुलाब शाह नौगांव निवासी थे। उनका जन्म लगभग 1858 में हुआ था। उनका परदा 1966 में हुआ। करीब 108 वर्ष पूर्व मजार में भगवान कृष्ण की मूर्ति बाबा ने अपने सामने बनवाई। बाबा गुलाब शाह कृष्ण उपासक थे लेकिन वे सभी धर्मों को मानने वाले थे। आज भी इनकी दरगाह में सभी धर्मों के लोगों का आना होता है और सरीफ सभी लोगों की मनोकामनाएं पूर्ण होती है।

बाबा के चमत्कार:

यहां धारणा है कि इन्होंने मुर्दों को भी जिंदा किया। पहली घटना इनके शिष्य परसादी दादा (कुशवाहा) बाबा के सामने इनका स्वर्गवास हो गया था। लेकिन बाबा साहब ने इनको पुन: जीवित किया और इन्होंने 10 वर्ष तक जीवित रहे। दूसरी घटना नागौद के राजा को जिंदा करने की है। जिस दिन नागौद के राजा का निधन हुआ उसी दिन उनकी लडक़ी की शादी हुई थी। ग्रामीणों ने बताया कि नौगांव में एक बुजुर्ग फकीर है उनको लेकर जाए शायद कुछ उनकी कृपा से करिश्मा हो जाए। राजा के कुछ संतरी बाबा से मिलने आए, बाबा समझ गए और बाबा ने उन्हें फटकार लगाते हुए कहां कि कुआं प्यासे के पास आता है कि प्यासा कुआं के पास जाता है। फिर संतरी राजा को नौगांव लेकर आए नौगांव में बाबा के चरणों में डाल दिया। बाबा साहब अपनी मस्ती की जलाली हालात में आएं। बाबा ने राजा के पैर से ठोकर मारी और वे जीवित हो गए।और राजा ने आंखें खोली और बीड़ी वाले बाबा के नाम से पुकारने लगे।

बाबा गुलाबशाह के हाथ में हमेशा बीड़ी जलती रहती थी। बाबा ने कहां शादी करने के बाद हमारे पास आना। राजा ने यहां पर एक कुआं भी बनवाया जो आज भी है। और इसका पानी खारा निकला तो बाबा ने कुआं का पानी गिलास में लेकर पिया और उसी पानी को कुआं में डाला तो वह मीठा हो गया। आज भी पानी मीठा है। 


बाबा साहब ने मना किया कि न यहां धर्म पेटी लगाए, न चंदा करें, न कोई कमेटी बनाना। इस आदेश का पालन यहां आज भी हो रहा है। बाबा साहब का उर्स 8 अक्टूबर से 14 अक्टूबर में मनाया जाता है। जन्म उत्सव 8 जनवरी को मनाया जाता है। चांद की 26 तारीख को प्रत्येक माह भी छोटा उर्स मनाया जाता है।

मंगलवार, 7 जनवरी 2014

वरिष्‍ठ पत्रकार श्री शंभुनाथ शुक्‍ल के ब्‍लाग http://tukdatukdazindagi.blogspot.in/2014/01/blog-post.html पर

राहुल गाँधी ने कहा तो सही था



आखिर राहुल गांधी ने ऐसा क्या गलत कहा था ?

पंकज चतुर्वेदी

शामली के दो लड़कों ने दिल्ली की एक अदालत में बाकायदा धारा 164 के तहत  मजिस्ट्रेट के सामने कलमबद्ध बयान दर्ज कराए हैं कि लश्‍कर ए तैयबा के लोगों ने उनसे संगठन में शामिल होने के लिए संपर्क किया था। याद करें विधानसभा चुनाव के दौरान भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस उपध्यच राहुल गांधी के इस बयान पर बड़ा बवाल काटा था कि मुजफ्फरनगर के दंगा पीडि़तों से आर्इएसआर्इ के लोग संपर्क कर रहे हैं। सनद रहे दिल्ली पुलिस एक पूरे नेटवर्क को तलाश रही है जिसमें से दो लड़के हरियाणा के मेवात से दो महीने पहले पकड़े गए थे। याद करें भाजपा ने इस मामले की शिकायत चुनाव अरायोग को की थी और आयोग ने भी मामले की गंभीरता को समझे बगैर राहुल गांधी को चेतावनी दी थी।

बात दिसंबर-2007 की है, मैं एक पुस्तक मेला में भागीदारी के लिए कराची(पाकिस्तान) गया था, वहां बहुत बड़ा वर्ग बेहद सहयोगी व गर्मजोषी से स्वागत करने वाला था। पहले दिन से ही पुस्तक मेला में एक व्यकित हमारे पास आया व अपना नाम 'शाह' बताया। वह पूरे दिन साथ रहता, जहां जाता, साये की तरह साथ लगा रहता। खूब सेवा भी करता। वह अच्छी तरह से हिंदी लिख लेता था, पढ़ लेता था। उसे दिल्ली के जामिया नगर से ले कर गाजियाबाद के कैला भटटा तक और मुजफ्फरनगर के कैराना तक के चप्पे-चप्पे की जानकारी थी और वह वहां के बारे में मुझसे खूब बात करता रहा। बता रहा था कि वह कर्इ-कर्इ बार महीनों के लिए मुजफ्फरनगर में रहा है। उसने इलाके के कर्इ रूतबेदार नेताओं के नाम व उनके घर के इलों की भी खूब चर्चा की। कहने की जरूरत नहीं है कि मेरा क्या शक था उसके बारे में व वह कौन होगा ?? यह बात सभी जानते हैं कि पाकिस्तान मे ंजाने वाले हर भारतीय को, भले ही वह किसी भी जाति का हो, रा का आदमी मान कर शक किया जाता है और भारत में दूर-दूर तक केवल आर्इएसआर्इ ही नहीं दुनिया के कर्इ मुल्क के लोगों के लिए काम करने वाले स्लीपर सेल हैं जो व्यापर, सियासत, से ले कर विकास व टकराव तक की खबरें सहजता से अपने मुल्कों तक पहुंचाते हैं।

जरा सन 2003 के मुबर्इ की ओर ले जाना चाहूंगा- उस साल वहां बम धमाकों की चार घटनांए हुर्इ , जिसमें कुल मिला कर 65 लोग मारे गए थे। 27 जनवरी 2003 को विले पार्ले में सार्इकिल पर रखे बम के फटने से एक व्यकित की मौत हुर्इ, 14 मार्च को मुलुंड में ट्रेन में बम फटा व 10 लोग मारे गए, 28 जुलार्इ को घाटकोपर में फटे एक बम ने चार लोगों की जान ली, 25 अगस्त को झवेरी बाजार व गेटवे आफ इंडिया पर टैक्सी में बम फटने से 50 लोग मारे गए। उस समय जब भारत ने राजनयिक स्तर पर जब पाकिस्तान को घेरने की कोषिश की गर्इ तब पाकिस्तान ने इसके लिए भारत के स्थानीय आतंकवाद को दोशी ठहराया था। इसके जवाब में भारत का यही दावा था कि भारत में आतंकवाद पाकिस्तान की देन है और इसमें कोर्इ भी भारतीय शामिल नहीं है। ठीक वही बिंदु था तब पाकिस्तान ने आपन भारत-विरोधी मुहिम की दिशा व दशा बदल दी थी। वो वक्त था तब पाकिस्तान की शैतान एजेंसी ने ऐसे मुसिलम युवाओं को टटोलना शुरू कर दिया था। कहने को सिमी यानी स्टुडेंट इस्लामिक मुवमेंट आफ इंडिया की स्थापना अप्रैल 1977 में अलीगढ में हो गर्इ थी व 1981 में सिमी के कार्यकर्ताओं ने फलीस्तीन के नेता यासेर अराफात के भारत दौरे पर विरोध दर्ज की अपने तेवर स्पष्‍ट कर दिए थे।

सिमी का असली चेहरा 2003 के आसपास ही सामने आना शुरू हुआ। गोरखपुर धाम के हिंदु अतिवादी रवैये और सटे हुए ''हिंदु राष्‍ट्र नेपाल में आर्इएसआर्इ के मजबूत गढ़ों ने आजमगढ में असंतोष के बीजों को पुशिपत-पलिलवत किया। इसमें कोर्इ शक नहीं कि शयद ही भारत का कोर्इ मुसलमान मिलेगा जो पाकिस्तान मेें अपना भविष्‍य देखता होगा, पाकिस्तान- एक असफल, लुटा-पिटा मुल्क । बिहार, कनार्टक या उ.प्र. के किसी मुसलमान को अलग कश्‍मीरसे कोर्इ वास्ता नहीं है। यहां जान लें कि कश्‍मीर के अलगाववादी, देश भारत के मुसलमानों के प्रति बेहद नफरत की भाव रखते हैं । गुजरात या देश के किसी दीगर हिस्से में दंगों में यदि मुसलमान मारा जाता था तो कश्‍मीरी उसकी परवाह नहीं करते थे। यहां तक कि गुजरात दंगों के बाद श्रीनगर की जामा मसिजद में जुमे की नमाज के बाद गुजरात में हलाक मुसलमानों की आत्मा की षांति के लिए दुआ करने से भी इस लिए मना कर दिया गया था कि जब कष्मीर में कर्इ हजार मुसलमान मर गए तो षेश हिंदुस्तान की किस मसिजद में दुआ हुर्इ। सनद रहे कि इस मसिजद के इमाम पाकिस्तान समर्थक अलगाववादी गुट के अगुआ नेता हैं। ठीक उसी तरह हिंदुस्तान के किसी भी हिस्से में कष्मीर की समस्या को मुसलमान की समस्या समझ कर कभी प्रतिक्रिया नहीं हुर्इ। लेकिन गुजरात में दंगों के बाद इंडियन मुजाहिदीन या ऐसे ही कतिपय नाम से कर्इ-कर्इ पढ़े-लिेखे मुसलमान भी सामने आए जिन्हे लगा कि सरकार के स्तर पर उनके साथ अन्याय व भेदभाव हुआ है। कहने की जरूरत नहीं है कि ऐसे असंतोश को हवा देने, उस गुस्से को गलत तरीके से प्रकट करने का हवा-पानी-खाद आर्इएसआर्इ ने ही मुहैया करवार्इ।

हमारी विडंबना है कि हम आतंकवाद जैसे मसले पर छिछोरी राजनीति करने से नहीं चूकते हैं। जब देष में एनसीटीसी के गठन की बात आर्इ तब मोदी-समर्थकों ने इस पर विरोध दर्ज किया। जब साध्वी प्रज्ञा व कर्नल पुराेंहित की बात आती है तो आडवाणीजी उनसे जेल में मिलने जाने पर कोर्इ लज्जा नहीं महसूस करते हैं व 'परिवार के लोग जाहिरा कहते हैं कि कोर्इ हिंदू आतंकवादी हो ही नहीं सकता, यानि तेरा बम आतंकवाद व मेरा बम सातिवक प्रतिरोध। यह रिकार्ड गवाह है कि गुजरात के दंगों के बाद ही उ.प्र. में काषी-लखनऊ, पुणे, जयपुर , दिल्ली आदि में हुर्इ आतंकवादी घटनाओं में सीधे-सीधे हमारे मुल्क के ही गुमराह युवकों का हाथ सामने आया है और उन्हें गुमराह करने वालों ने उनके साथ धर्म को ले कर होने वाले भेदभाव व दंगों के ही सच्चे-झूठे किस्से दिमांग में भरे थे।

मुजफ्फरनगर में दंगे में मारे गए लोगों के सर ना गिने, जरा  वहां हुर्इ संपत्ति के नुकसान, औरतों की बेज्जती तथा आज भी गांवों में व्याप्त खौफ पर गौर करें। इदहुल जुहा जैसे त्योहार में धूलभरे मैदानेां में फटे टैंटों में रह रहे कर्इ हजार लोगों की आंखे चांद को और अपनी गुरबत व मुफलिसी को कोस रही थीं। जो कल तक दो मंजीला मकान, कारखानों के मालिक थे, आज कपडे व दूसरों की मेहरबानी से पहने रहे हैं।  जिनके साथ पीढि़यों के रिष्ते थे, उन्हें हिंसक बनते देखने के वाकिये वे भुला नहीं पाा रहे हें, उसके ऊपर पुलिस व सरकारी महकमे अभी भी उनके हालातों पर गैरसंवेदनषील हैं। दोशी नेता हीरो की तरह अदालतों मे ंसमर्पण कर रहे हैं । यह मानना पड़ेगा कि ऐसे हताष, बेरोजगार, अनिष्चित भविश्य वाले कर्इ सौ युवाओं में बेहद निराशा है। और ऐसे हताश, निराश युवकों को आर्इएसआर्इ अपना निशाना बनाता रहा है- बदले के नाम पर, धर्म के नाम पर और धन के नाम पर। इस जानकारी के लिए कोर्इ बहुत गोपनीय रपट या खुफियागिरी की जरूरत नहीं है। अपने घर जाने के लिए तड़प रहे और उनके घर के नाम पर महज राख पाने वाले किसी 18-20 साल के युवा से जरा दिल से बात कर देखें, उसका आक्रोष किस स्तर तक उफान पर है- इस बात को टटोलने के लिए एजेंट विनोद जैसी फिल्मी खुफियागिरी की नहीं, महज इंसान बन कर गुफ्तगु करने की जरूरत है। रही बची कसर उ.प्र सरकार नपे पूरी कर दी है - अने घर-गांव ना लौटने वालों को नगद पांच लाख के मुआवजे की घोशणा वैसे तो बेहद लुभावनी दिख रही है, लेकिन यह असल में गांवों के विविधतपूर्ण संस्Ñति की इतिश्री के लक्षण हैं। लोगों में विष्वास बहाली या घर वापिसी की कोशशिों के बनिस्पत उन्हें अलग रहने या अपने ही संप्रदाय के बीच ढकेलने में यह पैसा बहुत बड़ी भूमिका अदा करेगा और इसे अपनी जमीन से उखडे लोगों को बरगलाना सरल होता हे।

यह बात मोदी भी जानते हैं और उनकी 'मसितष्‍क-संस्था संघ भी कि दंगों में उजड़े, लुटे-पिटे मुसिलम युवकों को गुमराह करना बेहद सरल है और पिछले एक दषक में यह होता रहा है। चूंकि यह राहुल गांधी ने बोला है तो इसकी मजाक बनाना जरूरी है और यदि यही बात सुबह-सुबह षाखा में पढ़ार्इ जाए तो वह राष्‍ट्रवाद होता है ? ध्यान रहे हम इस तरह की बातों की जड़ में जाए बगैर महज इसे वोट से जोड़ कर देखेंगे तो अपने ही लोगों को भटकने से रोक नहीं पाएंगे।

सोमवार, 6 जनवरी 2014

महाराज बन गया एयर इंडिया अब मुल्‍क की वित्‍तीय व्‍यवस्‍था पर बोझ बन गया है, अब इसमें ताला लगाना जरूरी है , यह लेख छपा है आज के नेशनल दुनिया के संपादकीय पेज पर http://www.nationalduniya.com/# 07-01-2014

ऐसे महाराज का तो पतन ही बेहतर होगा
पंकज चतुर्वेदी
दिनांक 23 दिसंबर 2013, दिल्ली से लखनऊ जाने वाले ‘‘महाराज’ में सात बजे तक सवारियां आ चुकी थीं। सात बजे दरवाजे बंद हो गए,उड़ने का निर्धारित समय सवा सात जो था। साढे सात हो चुके थे,जहाज उड़ा लखनऊ पहंुूच गया। फिर आवाज गूंजी कि चूंकि कोहरा ज्यादा है सो वापिस दिल्ली जाना पड़ रहा है। दिल्ली लौट कर जहाज तीन घंटे खड़ा रहा। भूखे-प्यासे यात्री हैरान-परेषान से जहाज-जेल में बंद रहे। साढे दस बजे यह फिर से लखनऊ उड़ कर गया। 25 दिसंबर 2013 दिल्ली से खजुराहो जाने वाले कम से कम दस यात्री काउंटर पर हल्ला कर रहे थ, क्योंकि उन्हें यह कह कर छोड़ दिया गया था कि सवारी पूरी हो गई हैं, हमने दस फीसदी ज्यादा बुकिंग ले ले ली थी। उन यात्रियों  को एक पांच सितारा होटल में ठहरा कर अगले दिन भेजने का वायदा किया गया। अभी 16 दिसंबर को ही मुंबई से उड़ने वाली एक उड़ान इस लिए पांच घंटे लेट हो गई क्योंकि पायलट व स्टाफ एक साथी की जन्मदिन मना रहे थे। कभी कू्र मेंबर नहीं पहुंचे तो कभी जहाज ही हवाई अड्डे नहीं पहुंचा, कभी पायलेट की कमी हो गई ..... भारत की सरकारी विमान कंपनी में यह आए रोज की बात है। बेचारे सरकारी कर्मचारियों पर पाबंदी है कि उन्हें अपने सरकारी दौरे इसी एयर लाईन्स से करने हैं , सो जहाज में लोग दिखते भी है। बेहद जर्जर प्रबंधन, लागातर घाटे व आम लोगों की अपेक्षाओं पर खरा उतरने में अक्षम रही एयर इंडिया को अब सरकारी इमदाद के बल पर जिंदा रखना हमारे संसाधनों का दुरूपयोग ही दिखता है।
कभी भारत सरकार के लिए गौरव रहे एयर इंडिया को जिलाने की सभी कोषिषें किस हद तक असफल रही हैं इसकी बानगी यह है कि पिछले साल एयर इंडिया का कुल घाटा सात हजार करोड़ पर पहुंच गया था। इस साल कई प्रयोग करने के बावजूद घाटा राषि 4270 करोड़ पर पहुंच गई है । यह राषि बिहार, छत्तीसगढ़ जैसे गरीब राज्यों  पर सालभर में खर्च महात्मा गांधी रोजगार गारंटी योजना पर व्यय राषि से कहीं ज्यादा है। सनद रहे कि बिहार की आबादी दस करोड़ है जबकि एयर इंडिया के कर्मचारियों की संख्या कोई 28 हजार। इन कर्मचारियों के वतन पर हर साल तीन हजार करोड खर्च किए जाते हैं।  जिस तरह सालाना घाटा बढ़ रहा है, साथ ही कर्मचारियों में असंतोश है कि उन्हें अपेक्षित सुख-सुविधाएं नहीं मिल पा रही है; इसको व्यापक तौर पर देखें तो बेहतर होगा कि सरकार कर्मचारियों को घर बैठा कर ऐसे ही वेतन देते रहे, कम से कम हजारों करोड के घाटे तो नहीं झेलने पडेंगे। सनद रहे कि सरकारी जहाज कंपनी 46 हजार करोड के घाटा-कर्ज में दबी हुई है। अभी-अभी सात ड्रीमलाईनर विमान बेच कर 84 करोड़ डालर जुटाने की जो बात प्रबंधन ने कही है, उससे भी और कर्ज उठाने की योजना है। दुनिया की सबसे घटिया एयर लाईंस में तीसरे नंबर पर षुमार एयर इंडिया का घाटा खतम करने के लिए सरकार पिछले नौसाल में तीस हजार करोड़ व्यय कर चुकी है। इस धन से कष्मीर से कन्याकुमारी तक और गुजरात से असम तक दो लेन के हाईवे बन सकते थे।
अपने खर्च घटाने के नाम पर एय इंडिया ने घरेलू उड़ानों में गीला टिषु पेपर, टाॅफी देना बंद ही कर दिया। स्वल्पाहार की  ‘क्वालिटी और क्वांटिटी’’ दोनो ही देायम दर्जें तक कम कर दी हैं। इसके बावजूद उने विमानों की कुर्सियां टूटी दिखती हैं, लगेज रखने के केबिन खराब पाए जाते हैं। एयर इंडिया में कुप्रबंधन का स्तर देखने लिए किसी भी दिन दिल्ली के हवाई अड्उे पर सुबह पांच से छह बजे के बीच एयर इंडिया की बोर्डिंग पास काउंटरों पर नजर डालें । यात्री एक से दो घंटे खड़े रहते हैं और उनका बोर्डिंग पास नहीं बनता - कभी सिस्टम खराब या स्लो हो जाता हे तो कभी स्टाफ कम पड़ जाता है।  इधर जहाज के उड़ने का समय हो जाता है तो इंडियन का स्टाफ हाय तौबा मचा कर एक साथ पूरे बोर्डिंग पास निकाल लेता है और फिर चूरन की पुडि़या की तरह आवाज लगा लगा कर बांट देता है - इससे बेपरवाह कि कोई दूसरे का पास ले सकता है या गलत पास ले सकता है।
सार्वजनिक क्षेत्र की विमानन कंपनी एयर इंडिया आईआईएम अमदाबाद के प्रो. रवीन्द्र ढोलकिया के अगुवाई में बने विषेश दल ने बचत बढ़ाने व खर्च घटाने के लिए निजी एयर लाईंस से सबक लेने की सलाह दी है। इस बीच धर्माधिकारी समिति  कर्मचारियों के वेतनमान व भत्तों को अंतिम रूप दे रही है। ढोलकिया कमेटी ने नागरिक उड्डयन मंत्रालय को एक रिर्पोट सौंपी है जिसमें कुल 46 सिफारिषें हैं। इसमें कहा गया है कि प्रति दिन 14 करोड़ के परिचालन घाटे को कम करने के लिए एयर लाईंस को कर्मचारियांे की संख्या और कम करनी होगी। सनद रहे कि जब इतने कर्मचरियों के हाने पर भी मानवीय कमियों के कारण परिचालन व प्रबंधन में इतनी अव्यवस्थाएं हैं तो कर्मचारी कम होने पर इसका क्या हाल होगा। यह समिति एयर इंडिया के कर मुक्ति 10 हजार करोड़ के बांड जारी करने की बात भी कहती है - जरा सोचंे कि इतने बड़े घाटे व कुव्यवस्था को झेल रही कंपनी के बांड कौन लेगा ?
ढोलकिया समिति का सुझाव है कि ट्रेवल एजेंट को दिया जाने वला एक प्रतिषत कमीषन बंद किया जाए, इसके ऐवज में  एजेंट ग्राहक से सुविधा षुल्क ले लें। यह किसी से छिपा नहीं है कि निजी एयर लाईंस एजेंटों को ज्यादा मुनाफा देती है।ं ऐसे में उनका एक फीसदी भी बंद हो जाने पर एयर इंडिया का टिकट कौन बेचना चाहेगा। यदि केवल सरकारी कर्मचारियों के बदौलत एयर लाईंस चलानी है तो सरकार के एक जेब से पैसा निकाल कर दूसरी जेब में देने की इस घाटे व घोटालों भरी प्रक्रिया पर विराम लग जाना ही बेहतर होगा ।  एयर इंडिया के अधिकांष उड़ानों के समय पर निजी एयर लाईंस पहले ही कब्जा किए हुए हैं,  निजी  कंपनियों का स्टाफ बेहद प्रोफेषनल तरीके से सवारियों से व्यवहार करता है उनके विमानों के देरी से उड़ने का प्रतिषत बहुत कम है- जाहिर है कि इनसे मुकाबला करना या पार पाना ‘‘महाराज’’ के बस का नहीं है, क्योंकि राजा तो कभी कुछ गलत करता ही नहीं है , सो उसके सुधरने की कोई गुजाईष नहीं है।

शनिवार, 4 जनवरी 2014

आज के सी एक्‍सप्रेस, आगरा में पढें ' जब प्राथमिक शिक्षा का बाजारीकरण एक अचूक बीमारी हो गया है तो फिर इसका राष्‍ट्रीयकरण ही एकमात्र निदान है http://theseaexpress.com/epapermain.aspx

फिर क्यों ना हो स्कूलों का राष्‍ट्रीयकरण ?

                          पंकज चतुर्वेदी

दिल्ली में नर्सरी स्कूलों में एडमिशन को ले कर बवाल हो रहा है। कहीं फार्म की मनमानी कीमतों को ले कर असंतुष्‍टि है तो कोई सरकार द्वारा तय मानदंडों का पालन ना होने से रूष्‍ट। हालत इतने बदतर हैं कि तीन साल के बच्चे को स्कूल में दाखिल करवाना आईआईटी की फीस से भी महंगा हो गया है। माहौल ऐसा हो गया है कि बच्चों के मन में स्कूल या शिक्षक के प्रति कोई श्रद्धा नहीं रह गई है। वहीं स्कूल वालों की बच्चों के प्रति ना तो संवेदना रह गई है और ना ही सहानुभूति। ऐसा अविश्‍वास का का माहौल बन गया है जो बच्चे का जिंदगीभर साथ नहीं छोड़ेगा। षिक्षा का व्यापारीकरण कितना खतरनाक होगा, इसका अभी किसी को अंदाजा नहीं है। लेकिन मौजूदा पीढ़ी जब संवेदनहीन हो कर अपने ज्ञान को महज पैसा बनाने की मशीन बना कर इस्तेमाल करना शुरू करेगी, तब समाज और सरकार को इस भूल का एहसास होगा।
कहा जाता है कि उन दिनों ज्ञानार्जन का अधिकार केवल उच्च वर्ग के लोगों के पास हुआ करता था। इस ‘तथाकथित’ मनुवाद को कोसने का इन दिनों कुछ फैशन-सा चला है, या यों कहें कि इसे सियासत की सहज राह कहा जा रहा हैं। लेकिन आज की खुले बाजार वाली मुक्त अर्थव्यवस्था से जिस नये ‘मनीवाद’ का जन्म हो रहा है, उस पर चहुं ओर चुप्पी है। लक्ष्मी साथ है तो सरस्वती के द्वार आपके लिए खुले हैं, अन्यथा सरकार और समाज दोनों की नजर में आपका अस्तित्व शून्य है। इस नये ‘मनुवाद’, जो मूल रूप से ‘मनी वाद’ है, का सर्वाधिक शिकार प्राथमिक शिक्षा ही रही हैं। यह सर्वविदित है कि प्राथमिक षिक्षा किसी बच्चे के भविश्य की बुनियाद है। हमरे देष में प्राथमिक स्तर पर ही षिक्षा लोगों का स्तर तय कर रही है। एक तरफ कंप्यूटर, ए.सी., खिलौनो से सज्जित स्कूल हैं तो दूसरी ओर ब्लेक बोर्ड, षौचालय जैसी मूलभूत जरूरत को तरसते बच्चे।
देश की राजधानी दिल्ली में दो-ढाई साल के बच्चों का प्री-स्कूल प्रवेश चुनाव लड़ने के बराबर कठिन माना जाता हैं। यदि जुगाड़ लगा कर कोई मध्यम वर्ग का बच्चा इन बड़े स्कूलों में पहुंच भी जाए तो वहां के ढंकोसले-चोंचले झेलना उसके बूते के बाहर होता है। ठीक यही हालात देश के अन्य महानगरों का भी है। बच्चे के जन्मदिन पर स्कूल के सभी बच्चों में कुछ वितरित करना या ‘ट्रीट’ देना, सालाना जलसों के लिए स्पेशल ड्रेस बनवाना, साल भर में एक-दो पिकनिक या टूर ये ऐसे व्यय हैं, जिन पर हजारों का खर्च यूं ही हो जाता है। फिर स्कूल की किताबें, वर्दी, जूते, वो भी स्कूल द्वारा तयशुदा दुकानों से खरीदने पर स्कूल संचालकों के वारे-न्यारे होते रहते हैं।
इन दिनों राजधानी और एनसीआर में दो हजार से अधिक पब्लिक स्कूल चल रहे हैं, जिनमें लगभग 40 लाख बच्चे पढ़ते है। 18 साल पहले दिल्ली सरकार ने फीस बढ़ोतरी के मुद्दे पर मानव संसाधन विकास मंत्रालय से अवकाश प्राप्त सचिव जे.वी. राघवन की अध्यक्षता में नौ सदस्यों की एक कमेटी गठित की थी। इस समिति ने दिल्ली स्कूल एक्ट 1973 में संशोधन की सिफारिष की थी। समिति का सुझाव था कि पब्लिक स्कूलों को बगैर लाभ-हानि के संचालित किया जाना चाहिए। कमेटी ने पाया था कि कई स्कूल प्रबंधन, छात्रों से उगाही फीस का इस्तेमाल अपने दूसरे व्यवसायों में कर रहे हैं। वीराराघवन कमेटी ने ऐसे स्कूलों के प्रबंधन के खिलाफ कड़ी कार्यवाही की अनुशंसा भी की थीं। कमेटी ने सुझाव दिया था कि छात्रों से वसूले धन का इस्तेमाल केवल छात्रों और शिक्षकों की बेहतरी पर ही किया जाए। राघवन साहब की सिफारिषें तो 18 सालों में कभी मूर्त रूप ले नहीं पाईं, फिर चार साल पहले बंसल कमेटी ने भी ऐसे ही सुझाव दे डाले।
इन दोनों कमेटियों की रिपोर्ट बानगी हैं कि स्कूली-षिक्षा अब एक नियोजित ध्ंाधा बन चुका है। बड़े पूंजीपति, औद्योगिक घराने, माफिया, राजनेता अपने धन को काला-गोरा करने के लिए स्कूल खोल रहे हैं। वहां किताबों, वर्दी की खरीद, मौज-मस्ती की पिकनिक या हाॅबी क्लास, सभी मुनाफे का व्यापार बन चुका है। इसके बावजूद इन अनियमितताओं की अनदेखी केवल इसी लिए है क्योंकि स्कूल-माफिया में नेताओं की सीधी साझेदारी है। तिस पर सरकार षिक्षा को मूलभूत अधिकर देने के प्रस्ताव सदन में पारित कर चुकी है।
घूम-फिर कर बात एक बार फिर विद्यालयों के दुकानीकरण पर आ जाती है। शिक्षा का सरकारी सिस्टम जैसे जाम हो गया है। निर्धारित पाठ्यक्रम की पुस्तकें मांग के अनुसार उपलब्ध कराने में एनसीईआरटी सरीखी सरकारी संस्थाएं बुरी तरह फेल रही हैं । जबकि प्राइवेट या पब्लिक स्कूल अपनी मनमानी किताबें छपवा कर कोर्स में लगा रहे हैं। यह पूरा धंधा इतना मुनाफे वाला बन गया है कि अब छोटे-छोटे गांवों में भी पब्लिक या कानवेंट स्कूल कुकुरमुत्तों की तरह उग रहे हैं। कच्ची झोपडि़यों, गंदगी के बीच, बगैर माकूल बैठक व्यवस्था के कुछ बेरोजगार एक बोर्ड लटका कर प्राइमरी स्कूल खोल लेते हैं। इन ग्रामीण स्कूलों के छात्र पहले तो वे लोग होते हैं, जिनका पालक पैसे वाले होते हैं और अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में भेजना हेठी समझते हैं। फिर कुछ ऐसी अभिभावक, जो खुद तो अनपढ़ होते हैं लेकिन अपने बच्चों को अंग्रेजी पढ़ाने की महत्वाकांक्षा पाले होते हैं, अपना पेट काट कर ऐसे पब्लिक स्कूलों में अपने बच्चों को भेजने लगते हैं। कुल मिला कर दोष जर्जर सरकारी शिक्षा व्यवस्था के सिर पर जाता है। जो आम आदमी का विश्वास पूरी तरह खो चुकी है। अपने बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के लिए पालक मजबूरीवश इन शिक्षा की दुकानों पर खुद लुटने को पहुंच जाते हैं। लोग भूल चुके हैं कि दसवीं पंचवर्शीय योजना के समापन तक यानी सन 2007 तक षत-प्र्रतिषत बच्चों को प्राथमिक षिक्षा का सपना बुना गया था जिसे ध्वंस्त हुए छह साल बीत चुके हैं।
वैसे स्कूलरूपी दुकानों का रोग कोई दो दशक पहले महानगरों से ही शुरु हुआ था, जो अब शहरों, कस्बों से संक्रमित होता हुआ अब दूरस्थ गांवों तक पहुंच गया है। समाजवाद की अवधारणा पर सीधा कुठाराघात करने वाली यह शिक्षा प्रणाली शुरुआत से ही उच्च और निम्न वर्ग तैयार कर रही है, जिसमें समर्थ लोग और समर्थ होते हैं, जबकि विपन्न लोगों का गर्त में जाना जारी रहता हैं। विश्व बैंक की एक रपट कहती है कि भारत में छह से 10 साल के कोई तीन करोड़ बीस लाख बच्चे स्कूल नहीं जा पा रहे हैं। रपट में यह भी कहा गया है कि भारत में शिक्षा को ले कर बच्चों-बच्चों में खासा भेदभाव है। लडकों-लड़कियों, गरीब-अमीर और जातिगत आधार पर बच्चों के लिए पढ़ाई के मायने अलग-अलग हैं। रपट के अनुसार 10 वर्ष तक के सभी बच्चों को स्कूल भेजने के लिए 13 लाख स्कूली कमरे बनवाने होंगे और 740 हजार नये शिक्षकों की जरूरत होगी।  सरकार के पास खूब बजट है और उसे निगलने वाले कागजी षेर भी। लेकिन मूल समस्या स्कूली षिक्षा में असमानता की है।
प्राथमिक स्तर की शिक्षण संस्थाओं की संख्या बढ़ना कोई बुरी बात नहीं है, लेकिन ‘देश के भविष्य’ की नैतिक शिक्षा का पहला आदर्श शिक्षक जब तीन हजार पर दस्तखत कर बामुश्किल डेढ़-दो सौ रुपये का भुगतान पा रहा हो तो उससे किस स्तर के ज्ञान की उम्मीद की जा सकती है। जब पहली कक्षा के ऐसे बच्चे को, जिसे अक्षर ज्ञान भी बामुश्किल है, उसे कंप्यूटर की ट्रेनिंग दी जाने लगे, महज इसलिए कि पालकों से इस नाम पर अधिक फीस घसीटी जा सकती है, तो किस तरह तकनीकी शिक्षा प्रसार की बात सोची जा सकती है? प्राइवेट स्कूलों की आय की जांच, फीस पर सरकारी नियंत्रण, पाठ्यक्रम, पुस्तकों आदि का एकरूपीकरण, सरकारी स्कूलों को सुविधा संपन्न बनाना, आला सरकारी अफसरों और जनप्रतिनिधियों के बच्चों की सरकारी स्कूलों में शिक्षा की अनिवार्यता, निजी संस्था के शिक्षकों के सुरक्षित वेतन की सुनिश्चित व्यवस्था सरीखे सुझाव समय-समय पर आते रहे और लाल बस्तों में बंध कर गुम होते रहे हैं।
अतुल्य भारत के सपने को साकार करने की प्राथमिक जरूरत स्तरीय प्राथमिक षिक्षा का लक्ष्य पाने क केवल एकमात्र तरीका है- स्कूली षिक्षा का राश्ट्रीयकरण। अपने दो या तीन वर्ग किलोमीटर के दायरे में आने वाले स्कूल में प्रवेष पाना सभी बच्चों का हक हो, सभी स्कूलों की सुविधाएं, पुस्तकें, फीस एकसमान हो, मिड डे मील सभी को एक जैसा मिले अैार कक्षा आठ तक के सभी स्कूलों में षिक्षा का माध्यम मातृ-भाशा होे। फिर ना तो भगवा या लाल किताबों का विवाद होगा और ना ही मदरसों की दुर्दषा पर चिंता। यह सब करने में खर्चा भी अधिक नहीं है, बस जरूरत होगी तो इच्छा षक्ति की। षायद यह चुनाव इसका मार्ग प्रषस्त करे, बस जरूरत है कि सड़कों पर प्रदर्षन करने के बनिस्पत अभिभावक राश्ट्रीय पार्टियों के नेतोंओं की इस दिषा में जवाबदारी तय करें।
पंकज चतुर्वेदी
9891928376
सहायक संपादक नेषनल बुक ट्रस्ट इंडिया

बुधवार, 1 जनवरी 2014

दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में ०२-०१-२०१४

मौतघर बनते सीवर !
पंकज चतुर्वेदी
दिल्ली में विधानसभा के वोट पड गए थे और लोग यह हिसाब-किताब लगाने में मस्त थे कि किसके हाथ सत्ता होगी, तभी नरेला में गहरे सीवर की सफाई के दौरान पच्चीस से तीस साल के तीन युवक  दम घुटने के कारण मारे गए। यह विडंबना है कि सरकार व सफाईकर्मचारी आयोग सिर पर मैला ढ़ोन की अमानवीय प्रथा पर रोक लगाने के नारों से आगे इस तरह से हो रही मौतों पर ध्यान ही नहीं देता है। सीवर की सफाई निहायत गैरतकीनीकी तरीेके से और इंसान की जान की कीमत पर पूरे देष में की जा रही है और इस काम में लगी संस्थाएं किसी भी कायदे-कानून का पालन नहीं करती है।ं असल में नरक कुंड की गाद निकालने वाले ठेके के कर्मचारी होते हैं, जिनकी मौत के साथ ही उनका खाता भी बंद हो जाता है।
कहने को राश्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और मुंबई हाईकोर्ट ने सात साल पहले सीवर की सफाई के लिए दिषा-निर्देषा जारी किए थे, जिनकी परवाह और जानकारी किसी को नहीं है। नरेला में मारे गए युवकों के पास भी टोपी, दस्ताने, टार्च, आक्सीजन जैसे अत्यावष्क चीजों में से कुछ भी नहीं था और वे सुलभ इंटरनेषनल द्वारा ठेके पर लिए गए कर्मचारी थे। सनद रहे दिल्ली हो या चैन्ने वैसे तो करोड़ों रूपए बजट वाला यह काम कागजों पर ही अधिक होता है । जहां हकीकत में सीवर की सफाई होती भी है तो कई सरकारी कागजों कोे रद्दी का कागज मान कर होती है । तभी आंकड़े गवाह हैं कि पिछले पांच सालों में अकेले दिल्ली में ही सीवर सफाई के दौरान 80 लोगों की मौत हो चुकी है । नरक कुंड की सफाई का जोखिम उठाने वाले लेागों की सुरक्षा-व्यवस्था के कई कानून हैं और मानव अधिकार आयोग के निर्देष भी । चूंकि इस अमानवीय त्रासदी में मरने वाले अधिकांष लोग असंगठित दैनिक मजदूर होते हैं,, अतः ना तो इस पर विरोध दर्ज होता है और ना ही भविश्य में ऐसी दुघटनाएं रोकने के उपाय ।
कोर्ट के निर्देषों के अनुसार सीवर की सफाई करने वाली एजंेसी के पास सीवर लाईन के नक्षे, उसकी गहराई से संबंधित आंकड़े होना चाहिए। सीवर सफाई का दैनिक रिकार्ड, काम में लगे लोगों की नियमित स्वास्थ्य की जांच, आवष्यक सुरक्षा उपकरण मुहैया करवाना, काम में लगे कर्मचारियों का नियमित प्रषिक्षण, सीवर में गिरने वाले कचरे की नियमित जांच कि कहीं इसमें कोई रसायन तो नहीं गिर रहे हैं; जैसे निर्देषों का पालन होता कहीं नहीं दिखता है।
भूमिगत सीवरों ने भले ही षहरी जीवन में कुछ सहूलियतें दी हों, लेकिन इसकी सफाई करने वालों के जीवन में इस अंधेरे नाले में और भी अंधेरा कर दिया है । अनुमान है कि हर साल देष भर के सीवरों में औसतन 200 से 300 लोग दम घुटने से मरते हैं । जो दम घुटने से बच जाते हैं उनका जीवन सीवर की विशैली गंदगी के कारण नरक से भी बदतर हो जाता है । देष में दो लाख से अधिक लोग जाम हो गए सीवरों को खोलने , मेनहोल में घुस कर वहां जमा हो गई गाद, पत्थर को हटाने के काम में लगे हैं । कई-कई महीनों से बंद पड़े इन गहरे नरक कुंडों में कार्बन मोनो आक्साईड, हाईड्रोजन सल्फाईड, मीथेन जैसी दमघोटू गैसें होती हैं ।
मजदूरों के लिए काम करने वाली संस्था ‘बिगुल’ के ताजा बुलेटिन में चैन्ने षहर के 5.63 घरों के 2671 किलोमीटर लंगे सीवर लाईन पर एक रौंगटे खड़े करने वाली रपट है। जिसमें बताया गया है कि 78,861 मैने हाॅल वाले इस नेटवर्क की देख रख्ेा के लिए महज 400 कर्मचारी है। जो दस्त, टाईफाईड, अैटनस जैसी बीमारियों के षिकार है। यह रपट बताी है कि ऊपर से खूबसूरत दिख रहे षहरों की भीतरी दुनिया कितनी विद्रूप है।
यह एक षर्मनाक पहलू है कि यह जानते हुए भी कि भीतर जानलेवा गैसें और रसायन हैं, एक इंसान दूसरे इंसान को बगैर किसी बचाव या सुरक्षा-साधनों के भीतर ढकेल देता है । सनद रहे कि महानगरों के सीवरों में  महज घरेलू निस्तार ही नहीं होता है, उसमें ढ़ेर सारे कारखानों की गंदगी भी होती है । और आज घर भी विभिन्न रसायनों के प्रयोग का स्थल बन चुके हैं । इस पानी में ग्रीज-चिकनाई, कई किस्म के क्लोराईड व सल्फेट, पारा, सीसा के यौगिक, अमोनिया गैस और ना जाने क्या-क्या होता है । सीवरेज के पानी के संपर्क में आने पर सफाईकर्मी  के षरीर पर छाले या घाव पड़ना आम बात है । नाईट्रेट और नाईट्राईड के कारण दमा और फैंफड़े के संक्रमण होने की प्रबल संभावना होती है । सीवर में मिलने वाले क्रोमियम से षरीर पर घाव होने, नाक की झिल्ली फटने और फैंफड़े का कैंसर होने के आसार होते हैं । भीतर का अधिक तापमान इन घातक प्रभावों को कई गुना बढ़ा देता है । यह वे स्वयं जानते हैं कि सीवर की सफाई करने वाला 10-12 साल से अधिक काम नहीं कर पाता है, क्योंकि उनका षरीर काम करने लायक ही नहीं रह जाता है ।
ऐसी बदबू ,गंदगी और रोजगार की अनिष्चितता में जीने वाले इन लोगों का षराब व अन्य नषों की गिरफ्त में आना लाजिमी ही है और नषे की यह लत उन्हें कई ग्रभीर बीमारियों का षिकर बना देती है ।  आमतौर पर ये लोग मेनहोल में उतरने से पहले ही षराब चढ़ा लेते हैं, क्योंकि नषे के सरूर में वे भूल पाते हैं कि काम करते समय उन्हें किन-किन गंदगियों से गुजरना है । गौरतलब है कि षराब के बाद षरीर में आक्सीजन की कमी हो जाती है, फिर गहरे सीवरों में तो यह प्राण वायु होती ही नहीं है । तभी सीवर में उतरते ही इनका दम घुटने लगता है । यही नहीं सीवर के काम में लगे लोगों को सामाजिक उपेक्षा का भी सामना करना होता है ।, इन लोगों के यहां रोटी-बेटी का रिष्ता करने में उनके ही समाज वाले परहेज करते हैं ।
दिल्ली में सीवर सफाई में लगे कुछ श्रमिकों के बीच किए गए सर्वे से मालूम चलता है कि उनमें से 49 फीसदी लोग सांस की बीमारियों, खांसी व सीने में दर्द के रोगी हैं । 11 प्रतिषत को डरमैटाइसिस, एक्जिमा और ऐसे ही चर्म रोग हैं । लगातार गंदे पानी में डुबकी लगाने के कारण कान बहने व कान में संक्रमण, आंखों में जलन व कम दिखने की षिकायत करने वालों का संख्या 32 फीसदी थी । भूख ना लगना उनका एक आम रोग है । इतना होने पर भी सीवरकर्मियों को उनके जीवन की जटिलताओं की जानकारी देने के लिए ना तो सरकारी स्तर पर कोई प्रयास हुए हैं और ना ही किसी स्वयंसेवी संस्था ने इसका बीड़ा उठाया है ।  अहमदाबाद की एक संस्था कामगार स्वास्थ्य सुरक्षा मंडल ने कुछ वर्श पहले इस दिषा में मामूली पहल अवष्य की थी ।
वैसे यह सभी सरकारी दिषा-निर्देषों में दर्ज हैं कि सीवर सफाई करने वालों को गैस -टेस्टर(विशैली गैस की जांच का उपकरण), गंदी हवा को बाहर फैंकने के लिए ब्लोअर, टार्च, दस्ताने, चष्मा और कान को ढंकने का कैप, हैलमेट मुहैया करवाना आवष्यक है । मुंबई हाईकोर्ट का निर्देष था कि सीवर सफाई का काम ठेकेदारों के माध्यम से कतई नहीं करवाना चाहिए। यहां जान लेना होगा कि अब दिल्ली व अन्य महानगरों में सीवर सफाई का अधिकांष काम ठेकेदारें द्वारा करवाया जला रहा है, जिनके यहां दैनिक वेतन पर कर्मचारी रखे जाते हैं ।
सफाई का काम करने के बाद उन्हें पीने का स्वच्छ पानी, नहाने के लिए साबुन व पानी तथा स्थान उपलब्ध करवाने की जिम्मेदारी भी कार्यकारी एजेंसी की है । राश्ट्रीय मानवाधिकार आयोग भी इस बारे में कड़े आदेष जारी कर चुका है । इसके बावजूद ये उपकरण और सुविधाएं गायब है ।
आज के अर्थ-प्रधान और मषीनी युग में सफाईकर्मियों के राजनीतिक व सामाजिक मूल्यों के आकलन का नजरिया बदलना जरूरी है । सीवरकर्मियों को देखें तो महसूस होता है कि उनकी असली समस्याओं के बनिस्पत भावनात्मक मुद्दों को अधिक उछाला जाता रहा है । केवल छुआछूत या अत्याचार जैसे विशयों पर टिका चिंतन-मंथन उनकी व्यावहारिक दिक्कतों से बेहद दूर है ।सीवर में काम करने वालों को आर्थिक संबल और स्वास्थ्य की सुरक्षा मिल जाए जो उनके बीच नया विष्वास पैदा किया जा सकता है ।

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