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शनिवार, 11 अप्रैल 2015

Farmers need cost of his intire commitment in farm not ex gratia



किसान को हर दाने की कीमत चाहिए

पंकज चतुर्वेदी
PRAJATANTRA Live 12-4-15
0 पंद्रह फरवरी से जो बेमौसम बारिश , ओले  और आंधी का सिलसिला शुरू हुआ कि अप्रेल में अभी तक चल रहा है। अभी मौसम विभाग कह रहा है कि बारिश का यह कहर अप्रेल के तीसरे सप्ताह तक भी चल सकता है। जब खेत में फसल सूखने को तैयार होती है तो किसान के सपने हरे हो जाते हैं। किसान के ही नहीं देश भी खुषहाली, भोजन पर आत्मनिर्भरता, महंगाई जैसे मसलों पर निष्चिंत हो जाता है।  लेकिन इस बार प्रकृति जो खेल कर रही है, वह देश के सबसे बड़े रोजगार के साधन, हमारी सांस्कृति पहचान व अथ की रीढ़ को चकनाचूर करने वाला है। बीते डेढ़ महीने में देशभर में कम से कम 300 किसान इस सदमें से खुदकुशी कर चुके हैं कि उसकी महीनों की दिन रात की मेहनत के बाद भी अब वह कर्जा उतार नहीं पाएगा, उसे कहीं से कोई भरोसा नहीं मिला कि इस विपदा की घड़ी में समाज या सरकार उसके साथ है। अलग-अलग राज्यों व सरकारों ने कई हजार करोड़ की राहत की घोशणाएं, नेताओं के वायदे, अखबारों में छप रहे बड़े-बड़े इष्तेहार किसान को यह आष्वस्त नहीं कर पा रहे हैं कि वह अगली फसल उगाने लायक अपने पैरों पर खड़ा हो पाएगा।
0 वह था तो मेकेनिकल इंजीनियर, लेकिन नौकरी नहीं मिली तो पिता के साथ खेती करने लगा था। पांच बीघा में आलू बोए थे और जब बंपर फसल तैयार हुई तो मंडी में दाम इतने कम हो गए कि आलू खेत से उखाड़ने का खर्चा भी निकलना मुष्किल था। कर्जा था, आगे की जिंदगी भी थी, हताषा इतनी बढ़ी कि 24 साल के प्रोबीन कुमार लाहा ने मौत को गले लगा लिया। पष्चिम बंगाल के  वर्द्धमान जिले में यह बीते दो महीने में 12वीं खुदकुशी है। पष्चिमी उत्तर प्रदेश में किसानों ने जब आलू बोए थे तो प्रति बीघा की लागत ही 16 हजार रूपए आई। फसल बहुत बढि़या हुई और जब माल मंडी आया तो दाम 400 रूपए कुंटल से ज्यादा नहीं मिल रहे हैं। यदि किसान चाहे कि माल कोल्ड स्टोरजे में रख दे तो वह भी लबालब हैं। जहां थोड़ी सी जगह भी है तो 240 रूपए कुंटल से कम पर  कोई राजी नहीं हो रहा है। सनद रहे कि पिछले साल मार्च-अप्रैल में मंडी में आलू का भाव हजार रूपए कंुटल था।

क्या अजीब विरोधाभास है एक तरफ किसान फसल नश्ट हाने पर मर रहा है तो दूसरी ओर अच्छी फसल होने पर भी उसे मौत को गले लगाना पड़ रहा है। दोनों ही मसलों में मांग केवल मुआवजे, राहत की है। जबकि यह देश के हर गांव के हर किसान की शिकायत है कि गिरदावरी यानि नुकसान के जायजे का गणित ही गलत है। और यही कारण है कि किसान जब कहता है कि उसकी पूरी फसल चैपट हो गई तो सरकारी रिकार्ड में उसकी हानि 16 से 20 फीसदी दर्ज होती है और कुछ दिनों बाद उसे बीस रूपए से लेकर दौ सौ रूप्ए तक के चैक बतौर मुआवजे मिलते हैं। सरकार प्रति हैक्टर दस हजार मुआवजा देने के विज्ञापन छपवा रही है, जबकि यह तभी मिलता है जब नुकसान सौ टका हो और गांव के पटवारी को ऐसा नुकसान दिखता नहीं है।  यही नहीं मुआवजा मिलने की गति इतनी सुस्त होती है कि राशि आते-आते वह खुदकुशी के लिए मजबूर हो जाता हे। हाल की ही बानगी है कि असामयिक बारिश का पहला कहर 15 फरवरी का था लेकिन पूरे देश में डेढ़ महीने बाद भी किसी को फूटी छदाम का मुआवजा नहीं मिला है।  दूसरी ओर फसल का की वाजिब कीमत ना मिलने पर कोई संरक्षण का उपाय है ही नहीं।
अभी एक मोटा हिसाब है कि बीते पैतालिस दिनों में असामयिक बारिश व ओलों से 50 लाख एकड में फसल चैपट हुई है, जिसमें अधिकांश गेहू, चना, मसूर, सरसो की है। अनुमान है कि एक एकड में कम से कम 20 कुंटल गल्ला होता है, गेहूं का सरकारी दाम या एमएसपी 1450 रूप्ए प्रति कुंटल है, चने का 3175/, मसूर का 3075/ और सरसों का 3100/। इस तरह लगभग 10 करोड कुंटल अन्न का नाश हुआ, जिसमें 15 लाख से ज्यादा घरों के सपने, अरमान, हवन हो गए । कहीं बच्चे स्कूल जाने लायक नहीं रहे तो कही बच्ची की शादी रूक गई। हताष किसानों की मौतों का सिलसिला थम नहीं रहा है। मोटा अनुमान है कि इसका घाटा एक खरब, 45 अरब के आसपास है, सरकार गिरदावरी करवा रही है , यानि नुकसान का आकलन पटवारी से । इसके बाद नुकसान का आकलन होगा फिर मुआवजा राशि आएगी, फिर बंटेगी, जूतें में दाल की तरह । तब तक अगली फसल बोने का वक्त निकल जाएगा, किसान या तो खेती बंद कर देगा या फिर साहूकार के जाल में फंसेगा। हर गांव का पटवारी इस सूचना से लैस होता है कि किस किसान ने इस बार कितने एकड़ में क्या फसल बोई थी। होना तो यह चाहिए कि जमीनी सर्वे के बनिस्पत किसान की खड़ी-अधखड़ी-बर्बाद फसल पर सरकार को कब्जा लेना चाहिए तथा उसके रिकार्ड में दर्ज बुवाई के आंकड़ों के मुताबिक तत्काल अधिकतम खरीदी मूल्य यानि एमएसपी के अनुसार पैसा किसान के खाते ंमंे डाल देना चाहिए। इसके बाद गांवों में मनरेगा में दर्ज मजदूरों की मदद से फसल कटाई करवा कर जो भी मिले उसे सरकारी खजाने में डालना चाहिए। जब तक प्राकृतिक विपदा की हालत में किसन आष्वस्त नहीं होगा कि उसकी मेहनत, लागत का पूरा दाम उसे मिलेगा ही, खेती को फायदे का व्यवसाय बनाना संभव नहीं होगा।
 एक तरफ जहां किसान प्राकृतिक आपदा में अपनी मेहनत व पूंजी गंवाता है तो यह भी डरावना सच है कि हमारे देश में हर साल कोई 75 हजार करोड के फल-सब्जी, माकूल भंडारण के अभाव में नश्ट हो जाते हैं।  आज हमारे देश में कोई 6300 कोल्ड स्टोरजे हैं जिनकी क्षमता 3011 लाख मेट्रीक टन की है।  जबकि हमारी जरूरत 6100 मोट्रीक टन क्षमता के कोल्ड स्टोरेज की है। मोटा अनुमान है कि इसके लिए लगभग 55 हजार करोड रूप्ए की जरूरत है। जबकि इससे एक करोड़ 20 लाख किसानों को अपने उत्पाद के ठीक दाम मिलने की गारंटी मिलेगी। वैसे जरूरत के मुताबिक कोल्ड स्आरेज बनाने का व्यय सालाना हो रहे नुकसान से भी कम है। चाहे आलू हो या मिर्च या ऐसेी ही फसल, इनकी खासियत है कि इन्हें लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है। टमाटर, अंगूर आदि का प्रसस्करण कर वह प्र्याप्त लाभ देती हैं। सरकार मंडियों से कर वूसलने, वहां राजनीति करने में तो आगे रहती है, लेकिन वेयर हाउस या कोल्ड स्टोरेज स्थापित करने की उनकी जिम्मेदारिया पर चुप रहती हे। यही तो उनके द्वारा किसान के षोशण का हथियार भी बनता हे। भारत के सकल घरेलू उत्पाद का 31.8 प्रतिशत खेती-बाड़ी में तल्लीन कोई 64 फीसदी लोगों के पसीने से पैदा होता है । दुखद कि देश की अर्थ व्यवस्था की रीढ़ कहलाने वाली खेती के विकास के नाम पर बुनियादी सामाजिक सुधारों को लगातार नजरअंदाज किया जाता रहा है । पूरी तरह प्रकृति की कृपा पर निर्भर किसान के श्रम की सुरक्षा पर कभी गंभीरता से सोचा ही नहीं गया । फसल बीमा की कई योजनाएं बनीं, उनका प्रचार हुआ, पर हकीकत में किसान यथावत ठगा जाता रहा- कभी नकली दवा या खाद के फेर में तो कभी मौसम के हाथों । किसान जब ‘‘केष क्राप’’ यानी फल-सब्जी आदि की ओर जाता है तो आढ़तियों और बिचैलियों के हाथों उसे लुटना पड़ता है। पिछले साल उत्तर प्रदेश में 88 लाख मीट्रिक टन आलू हुआ था तो आधे साल में ही मध्यभारत में आलू के दाम बढ़ गए थे। इस बार किसानों ने उत्पादन बढ़ा दिया, अनुमान है कि इस बार 125 मीट्रिक टन आलू पैदा हो रहा है। कोल्ड स्टोरेज की क्षमता बामुष्किल 97 लाख मीट्रिक टन की है। जाहिर है कि आलू या तो सस्ते- मंदे दामों में बिकेगा या फिर फिर किसान उसे खेत में ही सड़ा देगा- आखिर आलू उखाड़ने, मंडी तक ले जाने के दाम भी तो निकलने चाहिए।
हर दूसरे-तीसरे साल कर्नाटक कंे कई जिलों के किसान अपने तीखे स्वाद के लिए मषहूर हरी मिर्चों को सड़क पर लावारिस फैंक कर अपनी हताषा का प्रदर्षन करते हैंे। तीन महीने तक दिन-रात खेत में खटने के बाद लहलहाती फसल को देख कर उपजी खुषी किसान के ओठों पर ज्यादा देर ना रह पाती है। बाजार में मिर्ची की इतनी अधिक आवक होती है कि खरीदार ही नहीं होते। उम्मीद से अधिक हुई फसल सुनहरे कल की उम्मीदों पर पानी फेर देती है- घर की नई छप्पर, बहन की षादी, माता-पिता की तीर्थ-यात्रा; ना जाने ऐसे कितने ही सपने वे किसान सड़क पर मिर्चियों के साथ फैंक आते हैं। साथ होती है तो केवल एक चिंता-- मिर्ची की खेती के लिए बीज,खाद के लिए लिए गए कर्जे को कैसे उतारा जाए? सियासतदां हजारेंा किसानों की इस बर्बादी से बेखबर हैं, दुख की बात यह नहीं है कि वे बेखबर हैं, विडंबना यह है कि कर्नाटक में ऐसा लगभग हर साल किसी ना किसी फसल के साथ होता है। सरकारी और निजी कंपनियां सपने दिखा कर ज्यादा फसल देने वाले बीजों को बेचती हैं, जब फसल बेहतरीन होती है तो दाम इतने कम मिलते हैं कि लागत भी ना निकले।
देश के अलग-अलग हिस्सों में कभी टमाटर तो कभी अंगूर, कभी मूंगफली तो कभी गोभी किसानों को ऐसे ही हताष करती है। राजस्थान के सिरोही जिले में जब टमाटर मारा-मारा घूमता है तभी वहां से कुछ किलोमीटर दूर गुजरात में लाल टमाटर के दाम ग्राहकों को लाल किए रहते हैं। दिल्ली से सटे पष्चिमी उत्तर प्रदेश के कई जिलों में आए साल आलू की टनों फसल बगैर उखाड़े, मवेषियों को चराने की घटनाएं सुनाई देती हैं। आष्चर्य इस बात का होता है कि जब हताष किसान अपने ही हाथों अपनी मेहनत को चैपट करता होता है, ऐसे में गाजियाबाद, नोएडा, या दिल्ली में आलू के दाम पहले की ही तरह तने दिखते हैं। राजस्थान, मध्यप्रदेश, महाराश्ट्र, और उप्र के कोई दर्जनभर जिलों में गन्ने की खड़ी फसल जलाने की घटनांए हर दूसरे-तीसरे साल होती रहती है। जब गन्ने की पैदावार उम्दा होती है तो तब षुगर मिलें या तो गन्ना खरीद पर रोक लगा देती हैं या फिर दाम बहुत नीचा देती हैं, वह भी उधारी पर। ऐसे में गन्ना काट कर खरदी केंद्र तक ढो कर ले जाना, फिर घूस दे कर पर्चा बनवाना और उसके बाद भुगतान के लिए दो-तीन साल चक्कर लगाना; किसान को घाटे का सौदा दिखता है। अतः वह खड़ी फसल जला कर अपने
कृशि प्रधान अर्थव्यवस्था वाले देश में कृशि उत्पाद के न्यूनतम मूल्य, उत्पाद खरीदी, बिचैलियों की भूमिका, किसान को भंडारण का हक, फसल-प्रबंधन जैसे मुद्दे, गौण दिखते हैं और यह हमारे लोकतंत्र की आम आदमी के प्रति संवेदनहीनता की प्रमाण है। सब्जी, फल और दूसरी कैष-क्राप को बगैर सोचे-समझे प्रोत्साहित करने के दुश्परिणाम दाल, तेल-बीजों(तिलहनों) और अन्य खाद्य पदार्थों के उत्पादन में संकट की सीमा तक कमी के रूप में सामने आ रहे हैं। आज जरूरत है कि खेतों में कौन सी फॅसल और कितनी उगाई जाए, पैदा फसल का एक-एक कतरा श्रम का सही मूल्यांकन करे; इसकी नीतियां तालुका या जनपद स्तर पर ही बनें। कोल्ड स्टोरेज या वेअर हाउस पर किसान का कब्जा हो, साथ ही प्रसंस्करण के कारखाने छोटी-छोटी जगहों पर लगें। यदि किसान रूठ गया तो ध्यान रहे, कारें तो विदेश से मंगवाई जा सकती हैं, एक अरब की आबादी का पेट भरना संभव नहीं होगा।

अपने दिन-रात, जमा पूंजी लगा कर देश का पेट भरने के लिए खटने वाला किसान की त्रासदी है कि ना तो उसकी कोई आर्थिक सुरक्षा है और ना ही  सामाजिक प्रतिश्ठा, तो भी वह अपने श्रम-कणों से मुल्क को सींचने पर तत्पर रहता है। किसान के साथ तो यह होता ही रहता है - कभी बाढ़ तो कभी सुखाड़, कहीं खेत में हाथी-नील गाय या सुअर ही घुस गया, कभी बीज-खाद-दवा नकली, तो कभी फसल अच्छी आ गई तो मंडी में अंधाधुंध आवक के चलते माकूल दाम नहीं। प्राकृतिक आपदाओं पर किसी का बस नहीं है, लेकिन ऐसी आपदाएं तो किसान के लिए मौत से बदतर होती हैं। किसानी महंगी होती जा रही है तिस पर जमकर बंटते कर्ज से उस पर दवाब बढ़ रहा है। ऐसे में आपदा के समय महज कुछ सौ रूपए की राहत राशि उसके लिए जले पर नमककी मांनिंद होती है। सरकार में बैठे लोग किसान को कर्ज बांट कर सोच रहे हैं कि इससे खेती-किसानी का दषा बदल जाएगी, जबकि किसान चाहता है कि उसे उसकी फसल की कीमत की गारंटी मिल जाए। भारत के सकल घरेलू उत्पाद का 31.8 प्रतिशत खेती-बाड़ी में तल्लीन कोई 64 फीसदी लोगों के पसीने से पैदा होता है । यह विडंबना ही है कि देश की अर्थ व्यवस्था की रीढ़ कहलाने वाली खेती के विकास के नाम पर बुनियादी सामाजिक सुधारों को लगातार नजरअंदाज किया जाता रहा है । कहने को सरकारी स्तर पर फसल के बीमा की कई लुभावनी योजनाएं सरकारी दस्तावेजों में मिल जाएंगी, लेकिन अनपढ़, सुदूर इलाकों में रहने वाले किसान इनसे अनभिज्ञा होते हैं। सबसे बड़ी बात कि योजनाओं के लिए इतने कागज-पत्तर भरने होते हैं कि किसान उनसे मुंह मोड लेता हैै।
एक बात जान लेना जरूरी है कि किसान को ना तो कर्ज चाहिए और ना ही बगैर मेहनत के कोई छूट या सबसिडी। इससे बेहतर है कि उसके उत्पाद को उसके गांव में ही विपणन करने की व्यवस्था और सुरक्षित भंडारण की स्थानीय व्यवस्था की जाए। किसान को सबसिडी से ज्यादा जरूरी है कि उसके खाद-बीज- दवा के असली होने की गारंटी हो तथा किसानी के सामानों को नकली बचने वाले को फंासी जैसी सख्त सजा का प्रावधान हो। अफरात फसल के हालात में किसान को बिचैलियों से बचा कर सही दाम दिलवाने के लिए जरूरी है कि सरकारी एजंेसिया खुद गांव-गांव जाकर  खरीदारी करे। सब्जी-फल-फूल जैसे उत्पाद की खरीद-बिक्री स्वयं सहायता समूह या सहकारी के माध्यम से  करना कोई कठिन काम नहीं है।  एक बात और इस पूरे काम में हाने वाला व्यय, किसी नुकसान के आकलन की सरकारी प्रक्रिया, मुआवजा वितरण, उसके हिसाब-किताब में होने वाले व्यय से कम ही होगा। कुल मिला कर किसान के उत्पाद के विपणन या कीमतों को बाजार नहीं, बल्कि सरकार तय करे।
किसान भारत का स्वाभिमान है और देश के सामाजिक व आर्थिक ताने-बाने का महत्वपूर्ण जोड़ भी इसके बावजूद उसका षोशण हो रहा है । किसान को उसके उत्पाद का सही मूल्य मिले, उसे भंडारण, विपणन की माकूल सुविधा मिले, खेती का खर्च कम हो व इस व्यवसाय में पूंजीपतियों के प्रवेष पर प्रतिबंध -जैसे कदम देश का पेट भरने वाले किसानों का पेट भर सकते हैं । विडंबना है कि हमारे आर्थिक आधार की मजबूत कड़ी के प्रति ना ही समाज और ना ही सियासती दल संवेदनषील दिख रहे हैं। काष कोई किसान को फसल की गारंटेड कीमत का आष्वासन दे पाता  तो किसी भी किसान कोे कभी जान ना देनी पड़ती।


पंकज चतुर्वेदी
साहिबाबाद गाजियाबाद 201005
9891928376




शुक्रवार, 10 अप्रैल 2015

Loud your voice against loudspeakers

शहरों के लिए आफत बनते भोंपू

 

Daily News Activist, Lucknow 11-4-15
 हाल ही में जबलपुर हाईकोर्ट ने जीवन में शोर के दखल पर गंभीर फैसला सुनाया है, जिसके तहत अब त्यौहारों पर सार्वजनिक मार्ग पर लाउडस्पीकरों को प्रतिबंधित कर दिया गया है। यही नहीं कोर्ट ने अब ट्रैफिक बाधित करने वाले पंडालों पर भी अंकुश लगाने के आदेश दिए हैं। इस आदेश के बाद प्रशासन भी लाउडस्पीकर और पंडालों की अनुमति नहीं दे सकेगा। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश अजय माणिकराव खानविलकर व जस्टिस शांतनु केमकर की डिवीजन बेंच ने समाजसेवी राजेंद्र कुमार वर्मा की जनहित याचिका पर सुनवाई के बाद यह आदेश दिए। इसमें साफ किया गया कि त्यौहार या सामाजिक कार्यक्रम के नाम पर अत्याधिक शोर मचाकर आम जनजीवन को प्रभावित करना अनुचित है। हाईकोर्ट मध्यप्रदेश कोलाहल निवारण अधिनियम-1985 की धारा-13 को असंवैधानिक करार दिया है। अभी इस धारा के प्रावधानों का दुरुपयोग करते हुए लोग डीजे आदि बजाने की अनुमति ले लेते हैं। हाईकोर्ट ने आने आदेश में कहा कि किसी के मकान या सड़क किनारे लाउडस्पीकर-डीजे आदि के शोर से न केवल मौलिक मानव अधिकार की क्षति होती है बल्कि आसपास रहने वालों को बेहद परेशानी होती है। लिहाजा, अधिनियम की जिस धारा में दिए गए प्रावधान का दुरुपयोग करते हुए लाउडस्पीकर आदि बजाए जाने की अनुमति हासिल कर ली जाती थी, उसे असंवैधानिक करार दिया जाता है।हाईकोर्ट के इस आदेश के साथ ही त्यौहारों और धार्मिक व सामाजिक समारोहों के दौरान उपयोग किए जाने वाले ध्वनि विस्तारकों व दूसरे उपकरणों को लेकर कोर्ट के फैसले से शोर से मुक्त जीवन जीने का आम जनता का सपना साकार हो गया है। दुर्भाग्य है कि भले ही कानून कुछ भी कहता हो, अदालतें कड़े आदेश देती हों, लेकिन धर्म के कंधे पर सवार हो कर शोर मचाने वाले लाउडस्पीकर हैं कि मानते ही नहीं हैं। गत दो सालों के दौरान अकेले उत्तर प्रदेश में हुए बीस से ज्यादा दंगों का मुख्य अभियुक्त यही लाउडस्पीकर ही रहा है। ये न केवल कानून-व्यवस्था के लिए चुनौती बने हैं, बल्कि आम लोगों की सेहत और पर्यावरण के भी दुश्मन बने हुए हैं। सभी लोग इनसे तंग हैं, लेकिन चुनौती यही है कि इन पर कानून सम्मत कार्रवाई कौन व कैसे करे। उत्तर प्रदेश में सन् 2014 के जून-जुलाई में मुरादाबाद के कांठ कस्बे में एक मंदिर पर लाउडस्पीकर लगाने को लेकर बवाल इतना बढ़ा था कि वहां कई दिन कर्फ्यू लगाना पड़ा था। उस मामले में इलाहबाद हाईकोर्ट ने साफ कर दिया था कि मंदिर पर भोंपू नहीं लगेगा, इसके बावजूद वहां हंगामा हुआ। मेरठ के मुंडाली क्षेत्र के नंगलामल गांव में रोजा इफ्तार के दौरान करीबी मंदिर पर भोंपू बजाने के कारण हुए झगड़े में दो लोग मारे गए थे। बरेली में तो लाउडस्पीकर बजाने को ले कर दो बार दंगे हो चुके हैं। दिल्ली में त्रिलोकपुरी में दीपावली के पहले जागरण के लिए लाउडस्पीकर बजाने पर हुआ बवाल पंद्रह दिनों तक चला था। धार्मिक जुलूस निकालने के दौरान कतिपय धार्मिक स्थल के सामने लाउडस्पीकर या डीजे बजाने को लेकर गत तीन सालों के दौरान देशभर में सौ से ज्यादा जगह फसाद हो चुके हैं। ये लाउडस्पीकर केवल दंगों के कारक ही नहीं बनते हैं, ये आग में घी का काम भी करते हैं। छोटे से विवाद पर अपने समाज के लोगों को एकत्र करने, अफवाहें फैलाने, लोगों को उकसाने में भी इन भोंपू की खलनायकी भूमिका होती है।यह त्रासदी है कि जहां अभी कुछ दशक पहले तक सुबह आंखें खुलने पर पक्षियों का कलरव हमारे कानों में मधु घोलता था, आज देश की बड़ी आबादी अनमने मन से धार्मिक स्थलों के बेतरतीब शोर के साथ अपना दिन शुरू करता है। यह शोर पक्षियों, प्रकृति प्रेमी कीट-पतंगों, पालतू जीवों के लिए भी खतरा बना है। बुजुर्गों, बीमार लोगों और बच्चों के लिए यह असहनीय शोर बड़ा संकट बन कर उभरा है। सारी रात तकरीर, जागरण या फिर शादी, जन्मदिन के लिए डीजे की तेज आवाज कई लोगों के लिए जानलेवा बन चुकी है। दुखद तो यह है कि अब यह बेकाबू रोग पूरी तरह निरंकुश हो चुका है। सनद रहे कि देशभर में इक्कीस लाख से ज्यादा गैरकानूनी धार्मिक स्थलों का आंकड़ा सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तुत किया गया है। ऐसा नहीं है कि इस बवाली भोंपू पर कानून नहीं है, लेकिन कमी है कि उन कानूनों-आदेशों का पालन कौन करवाए। अस्सी डेसीमल से ज्यादा आवाज न करने, रात दस बजे से सुबह छह बजे तक ध्वनि विस्तारक यंत्र का इस्तेमाल किसी भी हालत में न करने, धार्मिक स्थलों पर आठ फुट से ज्यादा ऊंचाई पर भोंपू न लगाने, अस्पताल-शैक्षिक संस्थाओं, अदालत व पूजा स्थल के 100 मीटर के आसपास दिन हो या रात, लाउडस्पीकर का इस्तेमाल न करने, बगैर पूर्वानुमति के पीए सिस्टम का इस्तेमाल न करने जैसे ढेर सारे नियम, उच्च अदालतों के आदेश सरकारी किताबों में दर्ज हैं, लेकिन गली-मुहल्ले के धार्मिक स्थलों में रोज आरती, तकरीर, प्रवचन, नमाज के नाम पर पूरी रात आम लोगों को तंग करने पर कोई रोक-टोक नहीं है। तेज ध्वनि के कारण झगड़े होना महज धार्मिक प्रयोजन तक ही सीमित नहीं हैं, आएदिन शादी-विवाह में डीजे बजाने, उसमें मनपसंद गाना चलाने, उसकी आवाज कम या ज्यादा करने को लेकर पारिवारिक आयोजन खूनी संघर्ष में बदल जाते हैं। समाज में संकट का बीज बोने वाले डीजे पर कहने को तो पूरी तरह रोक लगी है, लेकिन इसकी परवाह किसी को भी नहीं है। अब तो धार्मिक जुलूसों में छोटे ट्रकों पर डीजे की गूंजती आवाज दूसरों को भड़काने, चिढ़ाने का काम करती दिखती है। यह बात सभी स्वीकारते हैं कि दंगे-झगड़े देश व समाज के विकास के दुश्मन हैं। यह भी सभी मानते हैं कि हल्ला-गुल्ला या तेज आवाज में पूजा-अर्चना करने से भगवान न तो खुश होता है और न ही इससे धार्मिकता या परंपरा का कुछ लेना-देना है। यह भी सर्वसम्मत है कि यह सब गैरकानूनी व अवैध है। फिर इसे कड़ाई से रोकने में समस्या क्या है? इसके लिए सभी धार्मिक नेताओं, जन प्रतिनिधियों और कार्यपालिका को एकजुट होकर त्वरित कदम उठाने चाहिए।
= पंकज चतुर्वेदी


गुरुवार, 9 अप्रैल 2015

Tea estates gobble up Uraon Traditions

चाय बागानों में गुम हो रही उरांव परंपराए

पंकज चतुर्वेदी

भारतीय समाज की रंगबिरंगी विविधतापूर्ण जातीय संरचना का सर्वाधिक आकर्षक हिस्सा है यहां की जनजातियां । सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक और वैज्ञानिक उथल-पुथल से बेखबर ये वनवासी पूरी तरह प्रकृति पर निर्भर हो कर जीते हैं । इस बात पर देश में आम सहमति रही है कि सामाजिक पर्यावरण बनाए रखने के लिए यह महति जरूरी है कि आदिवासियों को उनके पारंपरिक परिवेश में ही जीवनयापन के भरपूर अवसर प्रदान किए जाएं । लेकिन मध्य भारत की एक प्रमुख जनजाति ‘उरांव’ इन दिनों अपनी पहचान बनाए रखने के लिए जूझ रही है । साम्यवादी सामाजिक संरचना के लिए चिर परिचित रहे उरांव लोगों का यह संकट चाय बागानों से उपजा है । पीढि़यों पहले वे पेट भरने के इरादे से चाय बागान गए थे, लेकिन आज उनके सामने पेट के साथ-साथ पहचान का संकट भी खड़ा हो गया है। उनकी भाशा, संस्कार, त्योहार सभी लुप्त होने की कगार पर हैं।
FORWARD PRESS , NEW DELHI, APRIL-2015



,छत्तीसगढ़, झारखंड,बिहार और उड़ीसा के लगभग दो दर्जन जिलों में उरांवों का मूल वास है । यह एक दुर्भाग्य ही था कि उनके पुश्तैनी गांवों के आसपास दुर्लभ खनिजों का अकूत भंडार थे, जहां देश के विकास के नाम पर उनका खनन शुरू हुआ और इस अंधी दौड़ ने आदिवासियों की पीढि़यों पुरानी जमीन निगल ली । मजबूर वन पुत्र पेट भरने के लिए या तो खदानों में काम करने लगे या फिर कहीं दूर चले गए । इस तरह धीरे-धीरे उनका अपनी जमीन से नाता टूटता गया । आज हालात यह हैं कि उरांवों की जनजातिय अस्मिता पूरी तरह बाहरी प्रभाव के चपेट में आ कर खंडित हो रही है । पश्चिम बंगाल और असम के कोई दो हजार चाय बागानों में लगभग दस लाख आदिवासी पत्ती तोड़ने में लगे हुए हैं । इनमें अधिकांश महिलाएं हैं जो उरांव जनजाति से हैं । इनकी सांस्कृतिक और सामाजिक पहचान पूरी तरह धूमिल हो चुकी है । आर्थिक और शारीरिक शोषण को उन्होंने अपनी नियति मान लिया है ।
छोटा नागपुर क्षेत्र के आदिवासियों के भोजन व जीवकोपार्जन का मुख्य जरिया वहां के जंगलों में पैदा होने वाले पत्तीदार साग हुआ करते थे । तभी वहां की महिलाएं पत्ते चुनने में माहिर हुआ करती थीं । कोई डेढ़ सौ साल पहले जब अंग्रेजों ने आदिवासी अंचल में खनन शुरू किया तो उनकी निगाह मुंडा, खडि़या, संथाल, उरांव आदि आदिवासी औरतों की पत्ती चुनने की विशिष्ट शैली पर पड़ी । सन 1881 से 1891 के दौरान हर साल लगातार कोई 19 हजार अरण्य श्रमिक दक्षिण बिहार से असम के चाय बागानों में गए । बीते कुछ सालों के दौरान 27000 आदिवासी दार्जलिंग और जलपाईगुड़ी के चाय बागानों में गए । आज इन लोगों की तीसरी या चैथी पीढ़ी वहां काम कर रही है । अब वे लोग यह भूलते जा रहें हैं कि उनकी जनजाति की कोई अनूठी सांस्कृतिक या सामाजिक पहचान भी हुआ करती थी ।
उरांवों की मातृ भाषा ‘कुरक’ है । पर बागानों में काम कर रहे उरंाव अब ‘सादरी’ बोलते हैं । चूंकि बागानों में अलग-अलग इलाकों से आए विभिन्न जाति-जुबान के लोग हैं । सो उरांव बच्चों पर इन सभी का थोड़-थोड़ा असर हो रहा है । आज वहां रह रहे 18 साल उम्र के किसी भी उरांव को शायद ही ‘कुरक’ बोलना या समझना आता है । उरांवों के पारंपरिक नामों चेदों, मंकारी आदि की जगह बंगाली मिश्रित नामेां का बोलबाला है ।
बागान की आधुनिकता में उरांवों की सांस्कृतिक गतिविधियां भी गुम हो गई हैं । इनका मुख्य नृत्य ‘करमा’ है । चूंकि पहाड़ी इलाकों में करमा गाछ (पेड़) मिलता ही नहीं है, जाहिर है कि वहां करमा का आयोजन संभव नहीं है । ‘जनी शिकार’ को वहां की युवा उरांव महिलाएं जानती ही नहीं हैं । याद हो उरांवों ने रोहतास गढ़ में तीन बार मुगलों को हराया था । इसी जीत के यादगार स्वरूप हर 12 सालों में एक बार उरांव महिलाएं पुरुष का वेष रख कर झुंड में जंगल जाती हैं और शिकार करती हैं । पर चाय बागानों में पली-बढ़ी लड़कियों को ये समृद्ध परंपराएं कहां नसीब होंगी । जाति पंचायतों को भी ये भूल चुके हैं । पीढि़यों से चली आ रहीं लोक कथाओं को अपनी अगली पीढ़ी तक पहुचाने का तारतम्य टूट गया है । क्योंकि बागानों में काम करने वाली औरतों के पास इतना समय नहीं होता है कि वे अपने बच्चों को कहानियां सुना सकें । ठेठ उरांव महिला की पहचान ‘तीन गोदना’ (त्रिशूल) से होती है, जो यहां देखने को नहीं मिलता है ।
चाय बागानों में आदमियों को नौकरी बहुत कम दी जाती है । इसके चलते यहां के आदमी निकम्मे होते जा रहे है । ये जम कर शराब पीते है । सीमा पार से चोरी का सामान लाना, नशीली दवाएं बेचना इनका धंधा हो गया है । उधर औरतें भी भारी शोषण की शिकार हैं । उन्हें दिन भर में 25 पाउंड पत्ती तोड़ना जरूरी होता है । अतिरिक्त पत्ती पर मात्र 25 पैसे प्रति किलो ग्राम ही दिया जाता है । इस प्रकार सारे दिन खटने के बाद एक महिला को महीने भर में बामुश्किल चार-पांच सौ रुपए मिल पाते हैं । बागानों में जौंक काफी होते हैं ,जो इन औरतों को चिपक जाया करते हैं । इससे बचने के लिए उरांव महिलाएं अब तंबाकू खाने लगी हैं, जो कई बीमारियां उपजा रही है ।
उरांवों के हरेक पारंपरिक गांव में अलग से रात्रि घर हुआ करता है जिसे ‘धुमकुरिया’ कहते हैं । शाम होने पर उरांव युवक-युवतियां यहां जमा होते है और नाचते-गाते हैं । बागानों में रहने वाले युवाओं को अलबत्ता तो शाम को नाचने-गाने की सुध ही नहीं रहती है, फिर उन्हें ऐसे किसी सामाजिक क्लब के बारे में जानकारी ही नहीं है । इस जनजाति में लड़की की शादी की उम्र 21से 25 साल हुआ करती है, लेकिन यहां शादी 14 साल में ही की जा रही है । जवान बेटियों को शारीरिक शोषण से बचाने के लिए जल्दी शादियां की जा रहीं हैं । यही कारण है कि बागानों की आदिवासी बालाओं में पारंपरिक चमक और फुरती देखने को नहीं मिलती है ।
जनजातियों में हाथ से बनी मदिरा(हंडिया) पीने का चलन है । पर बागानों में इसकी जगह चिलैया या दारू ने ले ली है । बागान के दरवाजों पर ही दारू का ठेका मिल जाएगा । एक बगीचे में एक दिन दस हजार रुपए का बोनस बंटा । उस दिन वहां की चिलैया की दुकान की बिक्री सात हजार  की थी । यहां के दूषित माहौल से बच्चे भी अछूते नहीं है । जब पत्ती तोड़ने का चरम सीजन होता है तब ठेकेदार(स्थानीय बोली में सरदार) स्कूल से बच्चों  को भी खदेड़ लाता है । चंूकि वहां चप्पे-चप्पे पर वीडियो हाल और ड्रग्स के अड्डे खुले हैं, सो बच्चों को इनकी लत लग गई है । इसके लिए पैसे की पूर्ति के लिए वे बागानों में काम करना सहर्ष स्वीकार कर लेते हैं ।
भारतीय संविधान की यह कैसी विडंबना है कि बागान में काम करने वाले लोगों को आदिवासी नहीं माना जाता है । यानि जनजातियों को मिली आरक्षण व अन्य सुविधाओं से ये महरूम हैं । चाय बागानों में होम हो रही देश की बेशकीमती मौलिक संस्कृति और परंपराओं के संरक्षण हेतु सरकार और स्वयंसेवी संस्थाओं को जल्दी ही गंभीरता से सोचना होगा । क्योंकि पृथकतावादी ताकतों को फलने-फूलने का मौका ऐसे ही स्थानों पर होता है जहां सामाजिक और आर्थिक शोषण को नज़रअंदाज किया जाता है ।
पारंपरिक उरांवों के जीवन की सादगी और एकरसता यहां चुकती जा रही है । ऐसा कहा जाता है कि आदिवासी लोग धर्म और कलात्मक अनुभूतियों की गहराई में अपनी आत्मा को तलाशते हुए ही दैनिक जीवन के दुखों पर विजय पाते हैं । चाय बागानों की मशीनी जिंदगी में यह सब कहां मिल सकता है । शायद तभी अब वे उन्मुक्त प्रफुल्लित जीवन चाह कर भी नहीं जी पा रहे हैं ।

पंकज चतुर्वेदी
सहायक संपादक
नेषनल बुक ट्रस्ट इंडिया
 नेहरू भवन, वसंत कुंज इंस्टीट्यूषनल एरिया फेज-2
 वसंत कुंज, नई दिल्ली-110070
 संपर्क- 9891928376

रविवार, 5 अप्रैल 2015

save the Hindon

हिंडन, जो कभी नदी थी

                                                         पंकज चतुर्वेदी

देश की राजधानी दिल्ली के दरवाजे पर खड़े गाजियाबाद में गगनचुंबी इमारतों के नए ठिकाने
हिंडन का पुराना नाम हरनदी या हरनंदी है। इसका उद्गम सहारनपुर जिले में हिमालय क्षेत्र के ऊपरी षिवालिक पहाडि़यों में पुर का टंका गांव से है। यह बारिष पर आधारित नदी है और इसका जल विस्तार क्षेत्र सात हजार वर्ग किलोमीटर से ज्यादा है। यह गंगा और यमुना के बीच के देाआब क्षेत्र में मुजफ्फरनगर, मेरठ, बागपत, गाजियाबाद, गौतम बुद्ध नगर और ग्रेटर नोएडा का 280 किलोमीटर का सफर करते हुए दिल्ली से कुछ दूर तिलवाडा में यमुना में समाहित हो जाती है। रास्ते में इसमें कृश्णा, धमोला, नागदेवी, चेचही और काली नदी मिलती हैं। ये छोटी नदिया भीं अपने साथ ढेर सारी गंदगी व रसायन ले कर आती हैं और हिंडन को और जहरीला बनाती हैं। कभी पश्‍चिमी उत्तर प्रदेश की जीवन रेखा कहलाने वाली हिंडन का पानी इंसान तो क्या जानवरों के लायक भी नहीं बचा है। इसमें आक्सीजन की मात्रा बेहद कम है। लगातार कारखानों का कचरा, शहरीय नाले, पूजन सामग्री और मुर्दों का अवशेष मिलने से मोहन नगर के पास इसमें आक्सीजन की मात्र महज दो तीन मिलीग्राम प्रति लीटर ही रह गई है। करहेडा व छजारसी में इस नदी में कोई जीव-जंतु शेष नहीं हैं, हैं तो केवल काईरोनास लार्वा। सनद रहे दस साल पहले तक इसमें कछुए, मेंढक, मछलियां खूब थे।  बीते साल आईआईटी दिल्ली के सिविल इंजीनियरिंग विभाग के छात्रों ने यहां तीन महीने शोध किया था और अपनी रिपोर्ट में बताया था कि हिंडन का पानी इस हद तक विषैला होगा या है कि अब इससे यहां का भूजल भी प्रभािवत हो रहा है।
इधर उ.प्र. प्रदूशण नियंत्रण बोर्ड का दावा है कि हिंडन में जहर घुलने का काम गाजियाबाद में कम होता है, यह तो यहा पहले से ही दूशित आती हे। बोर्ड का कहना है कि जनपद में 316 जल प्रदूशणकारी कारखाने हैं जिसमं से 216 एमएलडी गंदा पानी निकलता है, लेकिन सभी इकाईयों में ईटीपी लगा है। इन दावों की हकीकत तो करहेडा गांव में आ रहे नाले से ही मिल जाती है, असल में कारखानों में ईटीपी लगे हैं, लेकिन बिजली बचाने के लिए इन्हे यदा-कदा ही चलाया जाता है। हिंडन का दर्द अकेले इसमें गंदगी मिलना नहीं है, इसके अस्तित्व पर संकट का असल कारण तो इसके प्राकृतिक बहाव से छेड़छाड़ रहा है। कभी पंटून पूल वाला रास्ता कहलाने वाले इलाके में करहेडा गांव के पास बड़ा पुल बनाया गया, ताकि नई बस रही कालोनी राजनगर एक्सटेंषन को ग्राहक मिल सकें।  इसके लिए कई हजार ट्रक मिट्टी-मलवा डाल कर नदी को संकरा किया गया और उसकी राह को मोड़ा गया। मामला नेषनल ग्रीन ट्रिब्यूनल(एनजीटी) में भी गया। एनजीटी ने एक पिलर बनाने के साथ-साथ कई निर्देष भी दिए। इस लडाई को लड़ने वाले धर्मेन्द्र सिंह बताते हैं कि बिल्डर लाॅबी इतनी ताकतवर है कि उसकी षह पर सरकारी महकमे भी दबे रहते हैं और एनजीटी के आदेषों को भी नहीं मानते हैं। यही नहीं बीते दस सालों में अकबरपुर-बहरामपुर, कनावनी गांव के आसपास नदी सूखी नहीं कि उसकी जमीन पर प्लाट काट कर बेचने वाले सक्रिय हो गए। कहने की जरूरत नहीं है कि ऐसे लोग रसूखदार होते हैं। आज कोई 10 हजार अवैध निर्माण हिंडन के डूब क्षेत्र में सिर उठाए हैं और सभी अवैध हैं । स्थानीय प्रषासन ने इन अवैध निर्माणों को जल-बिजली कनेक्षन दे रखा है। एनजीटी ने इन निर्माणों को हटाने के आदेष दिए हैं तो लोग इसके विरूद्ध हाई कोट से स्टे ले आए। करहेडा में तो सरकारी बिजलीघर का निर्माण भी डूब क्षेत्र में कर दिया गया।  जिले का हज हाउस भी नदी के डूब क्षेत्र में ही खड़ा कर दिया गया। प्र्यावरण के लिए काम कर रहे अधिवक्ता संजय कष्यप बताते हैं कि अभी कुछ साल पहले तक इसका जल प्रवाह देानेा सिरों पर चार-चार सौ मीटर था जो अब सिकुड कर कुल जमा दो सौ मीटर रह गया है।
प्रषांत वत्स ‘‘हरनंदी कहिन’’ नाम से एक मासिक पत्रिका निकालते हैं औ वे हिंडन नदी के कनिारे रहने वाले लोगों को इसके पर्यावरण के प्रति जागरूक बनाने की मुहिम चला रहे हैं। श्री वत्स बताते हैं कि हिंडन नदी के षुद्धिकरण का मसल हर चुनाव में उछाला जाता है, हर बार कुछ धन राषि भी व्यय होती है, लेकिन हिंडन की मूल समस्याओं को समझा नहीं जाता है। एक तो इसे नैसर्गिक मार्ग को बदलना,दूसरा इसमें षहरी व औद्योगिक नालों का मिलना, तीसरा इसके जलग्रहण क्षेत्र में अतिक्रमण- इन तीनों पर एकसाथ काम किए बगैर नदी का बचना मुष्किल है।
दिक्कत यह भी है कि कतिपय कारखानों का बचाव कर रही सरकार मानने को तैयार नहीं है कि हिंडन का पानी जहर से बदतर है।  पिछले दिनों देश की नदियों में प्रदूषण की जांच में जुटे केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) ने उत्तर प्रदेश की हिंडन नदी के पानी को नहाने लायक भी नहीं पाया है। बोर्ड ने यह जानकारी राष्ट्रीय हरित पंचाट (एनजीटी) के प्रमुख स्वतंत्र कुमार की अध्यक्षता वाली पीठ को सौंपे हलफनामे में दी है। सीपीसीबी ने राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के साथ मिलकर प्रदेश के सहारनपुर, मेरठ और गाजियाबाद में नदी के पानी की जांच की। हलफनामे में बताया कि नदी का पानी पर्यावरण अधिनियम, 1986 के तहत तय नहाने के पानी के मानकों के अनुरूप नहीं है। इसके समाधान के लिए बोर्ड ने ठोस अवशिष्ट को नदी किनारे और नदी में न फेंकने की हिदायत दी है। इसके अलावा बोर्ड ने कहा है कि अशोधित कचरा नदी में न फेंका जाए बल्कि नगर पालिका अवशिष्ट प्रबंधन अधिनियम, 2000 के तहत इसकी सही व्यवस्था की जाए। इससे पहले पंचाट ने केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार से एक याचिका पर सुनवाई करते हुए पश्चिमी यूपी की नदियों को प्रदूषण से बचाने के लिए किए गए प्रयासों की जानकारी मांगी थी। पंचाट एक एनजीओ की याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसके मुताबिक नदी में पड़ने वाले खतरनाक अवशिष्ट से गंगौली, दाहा, संकरोड जैसे गांवों के लोगों में कैंसर हो रहा है।
इसके विपरीत उत्तर प्रदेश सरकार ने हिंडन नदी के पानी को जहरीला बताए जाने के केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण समिति के दावे को झुठला दिया है। उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण समिति ने कहा है कि नदी के पानी में कोई जहरीला पदार्थ नहीं है। जबकि केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण समिति ने ट्रिब्यूनल में स्वीकार किया था कि सहारनपुर से लेकर गौतमबुद्ध नगर तक हिंडन नदी का पानी है दूषित हो गया है।

समिति ने कहा था कि हिंडन की सहायक नदियां कृष्णा और काली नदी का पानी भी पूरी तरह से दूषित है। साथ ही कहा था कि हिंडन नदी का पानी इतना दूषित है कि अब यह नहाने धोने के योग्य भी नहीं रहा है। सीपीसीबी ने यह हलफनामा बागपत के गांव में दूषित पानी पीने से लोगों में हो रही कैंसर और अन्य जानलेवा बीमारियों पर रोकथाम लगाने की मांग को लेकर दाखिल याचिका पर दिया था। अब उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण समिति ने कहा है कि सबकुछ ठीक है और औद्योगिक इकाईयों में ईटीपी लगा हुआ है।
यदि यमुना में हिंडन का काला जल मिलजने से रोकना है तो ग्रेटर नोएडा के मध्य से होकर गुजरने वाले घोर प्रदूषित लोहिया ड्रेन की अतिशीघ्र सफाई कराने के साथ साथ प्रदूषित इकाइयों को चिन्हित कर उनके प्रदूषित औधोगिक उत्प्रवाहों के निस्तारण पर रोक लगाना जरूरी है। लोहिया ड्रेन गांव इस्लामाबाद कालदा(ग्रेटर नोएडा) से निकलकर कैंसर प्रभावित क्षेत्र से होते हुए ग्रेटर नोएडा के नालेज पार्क से होकर हिंडन नदी से मिलता है। ग्रेटर नोएडा के इकोटेक-3,उद्योग केंद-2 एवं साईट ए,बी-सी की औधोगिक इकाइयों सहित कई बड़ी इकाइयों के गेर शोधित औधोगिक उत्प्रवाहों का निस्तारण निकटवर्ती लोहिया ड्रेन में होता है। परिणामस्वरूप ये नाला गंदगी और सडांध से भरा रहता हे जबकि यह सूरजपुर,गामा-1,नालेज पार्क-1-2-3,ओमेगा-2,सेक्टर पाई आदि आवासीय सेक्टरों के मध्य व बराबर से गुजरता है।  परिणामस्वरूप भयंकर दुर्गन्ध तथा मक्खी-मच्छरों की भरमार के कारण लोग नारकीय जीवन जीने के लिए मजबूर हे साथ ही यह सेक्टरों के साथ साथ गांवों के भूगर्भ जल स्तर पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रहा है ।
हां, यह तय है कि जिस तरह से हिंडन नदी के इलाके में कंक्रीट की लहरें पिरोई जा रही हैं, वे जल्द ही बड़े संकट का इषारा कर रही हैं। एक तो नदी के डूब क्षेत्र की जमीन भीतर से दलदली होती है, दूसरा नदी अपने प्राकृतिक मार्ग पर हर समय टकराती रहती है। अब यहां बीस-बीस मंजिल की खड़ी इमारतें एक फुसफुसी, कीचड़ वाली जमीन पर तनी हैं, जिन्हे ंनीचे से गहराई में पानी की चोट भी लग रही हैं। यह इलाका भूकंप के लिए बेहद संवेदनषील है। दिल्ली के गांधी नगर व यमुना पार की कई कालोनियों के उदाहरण साामने हैं जहां, यमुना का जल स्तर बढ़ने पर बेसमेंट में सीलन आई व भवन गिर गए। साथ ही यहां के भूजल का स्तर नीचे गिरने व उसके जहरीले होने की जो रफ्तार है उससे साफ जाहिर है कि भले ही नदी की जमीन घेर कर भवन बना लो, लेकिन इंसानी जीवन के लिए जरूरी जल कहां से लाओगे।
इंसान के लालच, लापरवाही ने हिंडन को ‘हिडन’ बना दिया है लेकिन जब नदी अपना रौद्र रूप दिखाएगी तब मानव जाति के पास बचाव के कोई रास्ते नहीं मिलेंगे। एक बात और सरकार भले ही यमुना के प्रदूशण निवारण की बडी-बडी योजनाएं बनाए, जब तक उसमें मिलने वाली हिंडन जैसी नदियां पावन नहीं होंगी, सारा श्रम व धन बेमानी ही होगा।
राजनगर एक्सटेंशन को दूर से देखो तो एक समृद्ध, अत्याधुनिक उपनगरीय विकास का आधुनिक नमूना दिखता है, लेकिन जैसे-जैसे मोहन नगर से उस ओर बढ़ते हैं तो अहसास होने लगता है कि समूची सुंदर स्थापत्यता एक बदबूदार गंदे नाबदान के किनारे है। जरा और ध्यान से देखें तो साफ हो जाता है कि यह एक भरपूर जीवित नदी का बलात गला घोंट कर कब्जाई जमीन पर किया गया
प्रभात, मेरठ 5 अप्रेल 2015
विकास है, जिसकी कीमत फिलहाल तो नदी चुका रही है, लेकिन वह दिन दूर नहीं जब नदी के असामयिक काल कवलित होने का खामियाजा समाज को भी भुगतना होगा।  गांव करहेडा के लोगों से बात करें या फिर सिंहानी के, उन सभी ने कोई तीन दशक पहले तक इस नदी के जल से सालभर अपने घर-गांव की प्यास बुझाई है। यहां के खेत सोना उगलते थे और हाथ से खोदने पर जमीन से शीतल-निर्मल पानी निकल आता था।  हिंडन की यह दुर्गति गाजियाबाद में आते ही षुरू हो जाती है और जैसे-जैसे यह अपने प्रयाण स्थल तक पहुंचती है, हर मीटर पर विकासोन्मुख समाज इसकी सांसें हरता जाता है।

Easter the festival of faith in supreme power

वसंत का पर्व है ईस्टर

 ईसाइयों के सबसे महत्वपूर्ण पर्वों में एक है ईस्टर। यह हमेशा 22 मार्च से 25 अपै्रल के बीच किसी रविवार के दिन मनाया जाता है। वसंत ऋतु की पहली पूर्णमासी के बाद आनेवाला पहला रविवार। शुरुआत में इस बात पर
डेली न्‍यूज एक्‍टीविस्‍ट, लखनउ 5.4.15
बड़ा विवाद था, क्योंकि ईस्टर का आरंभ यहूदी फसह पर्व से जुड़ा हुआ था, जो महीने के 14वें दिन मनाया जाता था। 325वें रोमन कैथोलिक सम्राट कांस्टेंटाइन ने नीकिया में अपने साम्राज्य के सारे धर्मगुरुओं का महाअधिवेशन बुलाया और यह प्रस्ताव रखा कि मध्य वसंत की पहली पूर्णमासी के बाद आनेवाले रविवार को ईस्टर घोषित करें। 1752 में ब्रिटिश संसद ने इस तिथि को धर्मनियम की संसद के जरिए कानूनी जामा पहनाया।ईस्टर दरअसल ईसामसीह के दुखों, सलीब पर मृत्यु और तीसरे दिन उनके पुनर्जीवन की याद में मनाया जाता है। ईस्टर का मतलब पुरानी ऐंग्लो-सेक्शन जाति की वसंत की देवी ओस्टर है, जिसके नाम पर ईस्टर का महीना यानी अपै्रल का महीना था। नार्वे की भाषा में वसंत ऋतु में फसल का पर्व मनाते थे- यह यहूदियों के मिस्र की गुलामी से मुक्ति तथा फसल कटाई दोनों का प्रतीक था। फसह के दिन करीब तीन बजे ईसामसीह को सलीब पर लटकाया गया था। लेकिन वे तीसरे दिन पुनर्जीवित हो गए थे। यह इजरायली नबियों की प्राचीन नबूवतों के अनुसार हुआ। इस तरह यहूदी फसह पर्व में ईसा के पुनर्जीवन का नया तत्व जुड़ गया। शुरुआत में यहूदी ही ईसा के मानने वाले बने थे।फसह की तरह ही ईसामसीह के पुनर्जीवन की याद में ईस्टर मनाया जाने लगा। प्राचीन यूनानी और पूर्वी यूरोप के ईसाई ईस्टर को पवित्र और महान मानते हैं और इस दिन एक-दूसरे का ‘ईसा जी उठे हैं’ कहकर अभिवादन करते हैं। निस्संदेह वह जी उठे हैं। कहकर उत्तर दिया जाता है। शुरू में ईस्टर शनिवार के उपवास के बाद शनिवार शाम से रविवार सूर्योदय तक मनाया जताा था। रात के अंधकार के बाद सूर्योदय का प्रकाश नवजीवन का प्रतीक है, इसलिए चर्चों में रविवार की सुबह बपतिस्मा संस्कार किया जाता है। ईस्टर रात में मनाया जाता था, इसलिए ज्योति पर्व के रूप में मनाया जाने लगा। ईस्टर पर गिरजाघर, गांव और शहर, मोमबत्तियों, बिजली के लट्टुओं से प्रकाशित किए जाते हैं। यरूशलम के गिरजाघरों में आठ दिन तक मोमबत्तियां जलाई जाती हैं। लोककथाओं में खरगोश का निवास चंद्रमा को बताया जाता है। चीन में इन राजवंश के युग कौंसे का एक आईना खुदाई में मिला, जिस पर यह चित्र अंकित है- खरगोश चंद्रमा में ऊखल में मूसल से अमृत की औषधि कूट रहा है। दक्षिण अफ्रीका की खोइ और सन् जनजातियों की संस्कृति में भी खरगोश का निवास चंद्रमा माना गया है। यूनानी-रोमन संस्कृति में खरगोश की कई उपयोगिताएं हैं। वह कामुकता का प्रतीक माना जाता है। वह उभयलिंगी होता है और उसका मांस खाने से कामोत्तेजना बढ़ती है। काम देवता इरोस को, जो पशुओं का शिकार करता है, उसका मांस प्रिय है। सबसे महत्वपूर्ण संबंध है डायोनिस देवता के साथ- यह प्रेम उर्वरता, जीवन, मृत्यु तथा अमरत्व का देवता है। यूनानी रोमन खरगोश का शिकार करते, उसके टुकड़े-टुकड़े करते, उसको खाते और एक-दूसरे के प्रति प्रेम प्रकट करने के लिए मांस का उपहार देते थे।अंडा नवजीवन का प्रतीक है। नवजीवन बड़े यानी मृत्यु के अंडकवच को तोड़कर बाहर निकलता है। यह ईसाई धर्म के शुरू होने से बहुत पहले शायद सारी दुनिया की संस्कृतियों में प्रचलित था। शुरुआत से ही अंडा मनुष्य को आश्चर्यचकित करता रहा है कि इस कठोर जीवनरहित चिकनी वस्तु में से कैसे जीवित चूजा निकल पड़ता है। वह यह रचनात्मक प्रक्रिया जानना चाहता था। जानना चाहता था कि सृष्टि की रचना कैसे हुई?ईसा पूर्व 1569-1085 में लिखित और मिस्र में प्राप्त पपीरस यानी पटेरा- तालपत्र की पांडुलिपि में बताया गया है कि धरती एक अंडा थी, जो आदिम जलाशय में से ऊपर निकलता है। भारतीय ग्रंथों में उपनिषद में सृष्टि रचना का प्रथम कार्य अंडे का दो भागों में विभाजन है। ऋग्वेद में सृष्टिकर्ता प्रजापति सृष्टि-जल को उर्वर बनाते हैं और वह स्वर्ण अंडे में परिवर्तित हो जाता है। उसके भीतर ब्रह्मा शयन करते हैं और उनके साथ भूमि, सागर, पर्वत, नक्षत्र, देवता तथा समस्त मानवजाति है। ऐसी कथाएं चीन और बौद्ध जातकों में भी पाई जाती हैं। यहूदी परंपरा में अंडे का महत्व उल्लेखनीय है। फसह पर्व तथा पेंतिकुस्त पर्वों के मध्य 33वें दिन रब्बी शिमौन बार मौखई की स्मृति में ‘लग-बा-उमेर’ नामक आनंद उल्लास का एक पर्व मनाया जाता है। माता-पिता अपने बच्चों के साथ खुले मैदान में पिकनिक मनाते हैं और रंगीन अंडे खाते हैं। फसह के भोजन में उबला अंडा खाया जाता है, जो पुनर्जन्म का प्रतीक माना गया है।ईसाइयों के लिए ईस्टर अंडा ईसा के मृतकोत्थान का प्रतीक है। जैसे चूजा अंडा फोड़कर बाहर निकलता है, वैसे ही ईसामसीह कब्र के बाहर पुनर्जीवित होकर निकल आते हैं। किसी-किसी गिरजाघर में कब्र की अनुकृति बनाकर उस पर अंडा रखा जाता है और पुरोहित, आराधकों का अभिवादन करता है- ईसा फिर जीवित हो गए हैं’ आराधक उत्तर देते हैं, ‘निश्चय ही ईसा जीवित हो गए हैं।’ सच तो यह है कि सारी दुनिया की संस्कृतियों में अंडा जीवन, सृष्टि, उर्वरता और पुनरुत्थान का प्रतीक है। जीवन चक्र की संपूर्ण घटनाओं से यह जुड़ा है- जन्म, प्रेम, विवाह, बीमारी और मृत्यु। अंडे से शक्ति प्राप्त होती है, क्योंकि अंडे में जीवन का बीज है। चर्च के शुरुआती वर्षों में मृतक के साथ कब्र में अंडे रख दिए जाते थे। बाद में अंडे को ईस्टर से जोड़ दिया गया। चर्च ने इस गैर-ईसाई प्रथा का विरोध नहीं किया, क्योंकि अंडा पुनरुत्थान का एक सशक्त प्रतीक था। वह मृत्यु को जीवन में परिवर्तित करता था।

NE terrosrism seeks more attantion of government

क्यों अनदेखा कर रहे हैं पूर्वोत्तर के आतंकवाद को

प्रजातंत्र लाईव, 5.4.15
                                                         पंकज चतुर्वेदी

बीते गुरूवार को अरूणाचल प्रदेश  की राजधानी ईटानगर से कोई 530 किलोमीटर दूर भारतीय सेना की राजपुताना राईफल्स के चार वाहनों पर उग्रवादियों ने अंधाधुंध गोलियां चलाईं व तीन जवानों को मार डाला। इस हमले में चार अन्य बेहद गंभीर घायल भी हुए है।। अभी 06 फरवरी को ही इसी राज्य में म्यांमार से सटी सीमा के करीब चांग्लोंग जिले में सेना की असम राईफल्स की बटालियन के दस जवान एक बम धमाके में जख्मी हो गए थे। इन दोनों हमलों का षक नगालैंउ के पृथकता वादी संगठन नेशनलिस्ट सोशलिस्ट काउंसिल आफ नगालैंड के खपलांग गुट पर है। मुल्क में जब कभी आतंकवाद से निबटने का मुद्दा सामने आता है तो क्या आम लोग और क्या नेता और अफसरान भी ; कश्‍मीर पर आंसू बहाने लगते हैं पाकिस्तान को पटकने के नारे उछालने लगते हैं, लेकिन लंबे समय से यह बात बड़ी साफगोई से नजरअंदाज की जाती रही है कि हमारे ‘‘सेवन सिस्टर्स’’(हालांकि अब ये एट यानि आठ हो गई हैं ) राज्यों में अलगाववाद, आतंक और देषद्रोही कष्मीर से कहीं ज्यादा है और उससे सटी सीमा के देषों - चीन,म्यंामार, भूटान, नेपाल, बांग्लादेष ही नहीं थाईलैंड, जापान तक इन संगठनों के आका बैठ कर अपनी समानांतर हुकुमत चला रहे हैं। उत्तर-पूर्वी राज्यों में मणिपुर, असम, नगालैंड, त्रिपुरा, अरूणाचल प्रदेष और मिजोरम में कोई पच्चीस उग्रवादी संगठन सक्रिय हैं। यहां बीते बारह सालों के दौरान कोई बीस हजार लोग मारे गए जिनमें चालीस फीसदी सुरक्षा बल वाले हैं। जब किसी राज्य में कुछ महीने षांति रहती है तो माना जाता है कि सरकार ने उग्रवादी संगठनों को मनमाने तरीके से उगाही की छूट दे दी है।
असम में उल्फा, एनडीबीएफ, केएलएनएलएफ और यूपीएसडी के लड़ाकों का बोलबाला है। अकेले उल्फा के पास अभी भी 1600 लड़ाके हैं जिनके पास 200 एके राईफलें, 20आरपीजी और 400 दीगर किस्म के असलहा हैं। राजन दायमेरी के नेतृत्व वाले एनडीबीएफ के आतंकवादियों की संख्या 600 है जोकि 50 एके तथा 100 अन्य किस्म की राईफलों से लैसे हैं। बीते साल असमें देा बड़े नरसंहार करने वाले एनडीबीएफ के सांगबीजित गुट का मुखिया आईके संगबीजिहत म्यांमार में रह कर अपने व्यापाा करता है। आष्चर्य यह जान कर होगा कि बोडो के नाम पर खून खराबा करने वाला यह अपराधी खुद बोडो नहीं है। नगालैंड में पिछले एक दषक के दौरान अलग देष की मांग के नाम पर डेढ हजार लोग मारे जा चुके हैं। वहां एनएससीएन के दो घटक - आईएम और खपलांग बाकायदा सरकार के साथ युद्ध विराम की घोशणा कर जनता से चैथ वसूलते हैं। इनके आका विदेष में रह कर भारत सरकार के आला नेताओं से संपर्क में रहते हैं और इनके गुर्गों को अत्याधुनिक प्रतिबंधित हथियार ले कर सरेआम घूमने की छूट होती है। यहां तक कि राज्य की सरकार का बनना और गिरना भी इन्हीं उग्रवादियों के हाथों में होता है। यह बात हाल ही में संपन्न विधान सभा चुनावों में सामने आ चुकी है। कांग्रेस बहुत प्रचार कर रही थी थी कि आईएम गुट के साथ जल्दी ही षांति-समझौता हो जाएगा, लेकिन सत्ताधारी नगा नेषनल फ्रंट आईएम गुट को यह विष्वास दिलवाने में सफल रहा कि उनकी सरकार फिर से बनने पर उनके लिए राहत होगी। बांग्लादेष की सीमा से सटे त्रिपुरा में एनएलएफटी और एटीटीएफ नामक दो संगठनों की तूती बोलती है। रंजीत देब वर्मन द्वारा गठित आल त्रिपुरा टाईगर फोर्स के पास 50 एक राईफलें व 200लड़ाके हें तो नयबंसी जमातिया के संगठन नेशनल लिबरेशन फोर्स आफ त्रिपुरा के 150 समर्पित उग्रवादी भी अत्याधुनिक हथियारों से लैस हैं इन दोनों संगठनों के मुख्यालय, ट्रैनिंग कैंप और छिपने के ठिकाने बांग्लादेश में हैं। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि इन संगठनों को उकसाने व मदद करने का काम हुजी व हरकत उल अंसार जैसे संगठन करते हैं।
छोटे राज्य मणिपुर में स्थानीय प्रशासन पूरी तरह पीएलए, यूएनएलएफ और पीआरईपीएके जैसे संगठनों का गुलाम हैं। यहां सरकारी कर्मचारियों को अपने वेतन का एक हिस्सा आतंकवादियों को देना ही होता है। बाहरी लोगों की यहां खैर नहीं है।  बीते दस सालों के दौरान यहां पांच हजार से ज्यादा लोग अलगाववाद के शिकार हो चुके हैं। इसके अलावा नगा-कुकी तथा कुकी-जोमियो संघर्श में सात सौ से ज्यादा जानें गई हैं । यहां सबसे ज्यादा ताकतवर संगठन यूनाईटेड नेषनलिस्ट लिबरेषन फ्रंट है जिसके पास 1500 लोग हैं। दूसरे सबसे खतरनाक संगठन पीपुल लिबरेषन आर्मी में 400 करीबन लड़के हैं ये सभी संगठन अत्याधुनिक हथियारों व संचार उपकरणों से लैस हैं। मेघालय में एएनयूसी और एचएनएलएल नामक संगठन अलगाववाद के झंडाबरदार हैं वहीं मिजोरम में एनपीसी और बीएनएलएफ राश्ट्र की मुख्य धार से अलग हैं। इसके अलावा असम को आधार बना कर कई गुमनाम संगठन भी अलगाववाद की रट लगाए हैं, इनमें से कई सीधे-सीधे पाकिस्तानी आईएसआई की पैदाईष है। असम में छोटे-बड़े 36 आतंकवादी संगठनों का अस्तित्व सरकारी रिकार्ड स्वीकार करता है। मणिपुर में 39, मेघालय में पांच, मिजोरम में दो, नगालैंड में तीन, त्रिपुरा में 30 और अरूणाचल प्रदेष में महज एक अलगवावादी संगठन है। इनमें से अधिकांष को पाकिस्तान से बांग्लादेष में बने बेस कैंप से खाद-पानी मिलता है, ऐसे कुछ संगठन हैं -
डिमा हालिम डाओगा (डीएचडी), कार्बी लांग्री नेशनल लिबरेशन फ्रंट (केएलएनएलएफ),कार्बी नेशनल वॉलियंटर्स (केएनवी), राभा नेशनल सिक्योरिटी फोर्स (आएनएसएनफ), कोच राजवंशी लिबरेशन आर्गनाइजेशन (केआरएलओ), हमार पीपुल्स कोन्वेशन (एचपीसी-डी), कार्बी पीपुल्स फ्रंट (केपीएफ), तिवा नेशनल रिवोल्यूशनरी फोर्स (टीएनआरएफ), बिरसा कमांडो फोर्स (बीसीएफ), बंगाली टाइगर फोर्स (बीटीएफ), आदिवासी टाइगर फोर्स (एटीएफ), आदिवासी नेशनल लिबरेशन आर्मी ऑफ असम (आनला), गोरखा टाइगर फोर्स (जीटीएफ), बराक वेली यूथ लिबरेशन फ्रंट (बीवीवाइएलएफ), युनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ बराक वेली, मुसलिम युनाइटेड लिबरेशन टाइगर्स ऑफ असम (मुल्टा, मुसलिम युनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम (मुल्फा), मुसलिम सिक्योरिटी काउंसिल ऑफ असम (एमएससीएफ), युनाइटेड लिबरेशन मिलिशिया ऑफ असम (उल्मा), इसलामिक आदि। ये सभी संगठन उत्तर-पूर्व के अन्य राजयों में सक्रिय अवैध संगठनों के नेटवर्क में रहते हैं और जरूरत पड़ने पर हमला, वसूली आदि के लिए एक-दूसरे को हथियार व आदमियों की मदद करते हैं।
आंकडे गवाह हैं कि सन 2009 से 2011 के बीच इन राज्यों में क्रमषः 531,237 और 114 आतंकवादी मारे गए। वहीं सन 2009 में 44 सुरक्षाकर्मी, 2010 में 28 और 2011 में 32 सुरक्षा बल के लोग षहीद हुए। इन सालों में मारे गए आम लोग क्रमषः 264,94 और 70 हैं। यदि इन्ही सालों में कष्मीर के आंकड़े देखें तो 2009 में 71 आम लोग, 2010 में 47 और 2011 में 31 लोग मारे गए। जबकि सुरक्षा बलों की मौत के आंकडे क्रमषः 79,69 और 33 हैं।  साफ जाहिर है कि उत्तर-पूर्वी राज्यों में बहुत से संगठन सक्रिय हैं और वहां उग्रवाद कष्मीर से कहीं ज्यादा है। इसके बावजूद श्रीनगर में हथगोला फटने की खबर टीवी व अखबारों पर पहली  सचित्र होती है, जबकि उत्तर-पूर्व के भीशण नरसंहार बामुष्किल जगह पाते हैं। यहां यह भी जानना जरूरी है कि  बांग्लादेष से लगी सीमा के 4096.7 किलोमीटर पर भारत सरकार पहले ही कंटीले तारों की बाड़ लगा चुकी हैं, जबकि म्यांमार से सटी सीमा पर 1643 किलामीटर पर गहरी खाई हैं। इसके अलावा सीमा सुरक्षा बल, सषस्त्र सीमा बल आदि के हजारों जवान भी लगे हैं। साफ जाहिर है कि इन राज्यों में आतंकावादियों को सीमा पार आने के लिए सीमा से आंख चुरा कर आने कीज रूरत नहीं पड़ती है। वे कई बार फर्जी पासपोर्ट या अन्य जरियों से भीतर आते व जाते रहते हैं।
अनूप चेतिया और परेष बरूआ के मामले में सामने आ चुका है कि इन लोगों ने बैंकाक और ढाका में पांच सितारा होटल स ेले कर जहाज कंपनी तक के व्यापार विधिवत ,खोल रखे हैं। यह तथ्य भारत सरकार की खुफिया एजेंसियों को कई साल पहले पता था कि बांग्लादेष का काक्स बाजार बंदरगाह हथियारों के सौदागरों का प्रमुख अड्डा बना हुआ है और वहां पहुंचने के लिए अंडमान सागर का इस्तेमाल किया जाता है। एक अमेरिकी खुफिया रपट बताती है कि गोल्डन ट्राईंगल से म्यामार के रास्ते हथियारों के बदले नषीली दवाओं के व्यापार पर भारत सरकार ना जाने क्यों कड़ी कार्यवाही करने से बचती है। यह वही जगह है जहां से श्रीलंका में खून खराबे के दिनो में लिट्टे तक हथियारों की खेप पहुंचती थी।
जिस तरह से उत्तर-पूर्वी राज्यों के उग्रवादी अत्याधुनिक हथियारों तथा सके लिए जरूरी गोला-बायद से लैस रहते हैं इससे यह तो साफ है कि कोई तो है जो दक्षिण-पूर्व एषिया में अवैध संवेदनषील हथियारों की खपत बनाए रखे हुए है। बंदूक के बल पर लोकतंत्र को गुलाम बनाने वालों को हथियार की सप्लाई म्यांमार, थाईलैंड, भूटान, बांग्लादेष से हो रही है। मणिपुर, जहां सबसे ज्यादा उग्रवाद है, नषे  की लत से बेहाल और उससे उपजे एड्स के लिए देष का सबसे खतरनाक राज्य कहा जाता है। कहना गलत ना होगा कि यहां नारकोटिक्स व्यापर के बदले हथियार की खेप पर कड़ी नजर रखना जरूरी है।
यह दुर्भाग्य है कि दिल्ली में बैठे लोग उत्तर-पूर्वी राज्यों को सतही दूरी ही नहीं, बल्कि दिलों से भी दूर मानते रहे हैं। इस बात की बानगी है पिछले दिनों वहां के तीन राज्यों में संपन्न विधन सभा चुनाव। वहां के चुनाव परिणाम आए तो दिल्ली के किसी भी हिंदी चैनल पर नतजों की खबर गायब थी, कारण- उस दिन आम बजट आ रहा था। यह बात हमारी मानसिकता को उजागर करती है कि हम उन कोई 200 विधान सभा सीटों के मतदाताओं की भावनाओं से अपना तारतम्य ही नहीं स्थापित कर पाए हैं। आज वहां के हालात इस मुकाम पर पहंुच गए है कि अलगाववादी कदमों पर काबू नहीं किया गया तो पृथकतावादियों पर नियंत्रण करना असंभव हो जाएगा।
पंकज चतुर्वेदी  यूजी-1 ए 3/186 राजेन्द्र नगर सेक्टर-2, साहिबाबाद गाजियाबाद 201005 संपर्क - 9891928376, 0120-4241060



गुरुवार, 2 अप्रैल 2015

PERSERVATION OF AGRICULTURE LAND IS MUST


खेत को उजाड़ने पर लगे पूर्ण पाबंदी

PRABHAT, MEERUT, 28-3-2015
                                                                 पंकज चतुर्वेदी

तमिलनाडु से श्रीलंका की दूरी कम कर सालाना हजारों करोड़ की बचत करने वाले सेतुसमुद्रम प्रोजेक्ट की घेाषण 10 साल पहले हुई थी। हालांकि वैज्ञानिकों की इस बात से सहमति नहीं है कि यह रामायण में उल्लिखित नल-नील द्वारा निर्मित वह पुल है जिसे पारकर रामचंद्रजी रावण को हराने लंका गए थे । चूंकि  मामला आस्था का है सो किसी ने परवाह नहीं की कि इस परियोजना के लटकने से हर साल पांच हजार करोड़ से अधिक का संभावित लाभ थम गया है। लेकिन विकास के लिए सड़क, औद्योगिक क्षेत्र, बांध, पुल बनाने जैसे कामों के लिए लहलहाती फसल वाले खेत को अधिसूचना जारी कर कब्जा करने पर ना तो किसी की श्रद्धा आहत हो रही है और ना ही संवेदना। केंद्र सरकार के भूमि अधिग्रहण संशोधन पर घमासान मचा है, लेकिन सभी उचित मुआवजे व जमीन पर कब्जे की शर्तों पर उलझें हैं, जबकि होना तो यह चाहिए कि फसल देने वाली किसी भी जमीन का भू-उपयोग बदलने  या खेत को उजाड़ने पर ही पूरी तरह पाबंदी लगना चाहिए। खेत , किसान, फसल हमारे  लोक व सामाजिक जीवन में कई पर्व, त्योहार, उत्सव का केंद्र हैं, लेकिन विडंबना है कि किसान के लिए खेती घाटे का सौदा बन गई है।  अब जमीन की कीमत देकर खेत उजाड़ने की गहरी साजिश को हम समझ नहीं पा रहे हैं। यह जान लें कि कार, भवन, जैसे उत्पादों की तरह पेट भरने के लिए अनिवार्य अन्न किसी कारखाने में नहीं उगाया जा सकता है और जब तक खेत है तभी तक हम खाद्यान के मामले में आत्मनिर्भर हैं । एक तरफ देष की आबादी बढ़ रही है, लोगों की आय बढ़ने से भोजन की मात्रा बढ़ रही है, दूसरी ओर ताजातरीन आंकड़ा बताता है कि बीते साल की तुलना में इस बार गेहुं की पैदावार ही 10 फीसदी कम हुई है।
भारत में कारें बढ़ रही हैं, मोटर साईकिल की बिक्री किसी भी विकासषील देष में  सबसे अधिक है, मोबाईल क्रांति हो गई है, षापिंग माॅल कस्बों-गांवों की ओर जा रहे हैं । कुल मिला कर लगता है कि देष प्रगति कर रहा है।  सरकार मकान, सड़के बना कर आधारभूत सुविधाएं विकसित करने का दावा कर रही है। देष प्रगति कर रहा है तो जाहिर है कि आम आदमी की न्यूनतम जरूरतों का पूर्ति सहजता से हो रही है । तस्वीर का दूसरा पहलू भारत के बारे में चला आ रहा पारंपरिक वक्तव्य है - भारत एक कृशि-प्रधान देष है । देष की अर्थ व्यवस्था का मूल आधार कृशि है । आंकड़े भी यही कुछ कहते हैं। देष की 67 फीसदी आबादी और काम करने वालों का 55 प्रतिषत परोक्ष-अपरोक्ष रूप से खेती से जुड़ा हुआ है। एक अनुमान है कि चाूल वित्त वर्ष में पिछले साल की तुलना में कोई तीन प्रतिशत कम, लगभग 85 लाख टन अनाज कम पैदा होगा। पिछले दो दशक के दौरन तीन लाख से ज्यादा किसान इस लिए खुदकुशी कर चुके है क्योंकि देश का पेट भरने के चक्कर में उन पर कर्जा चए़ गया या फिर मौसम दगा दे गया या फिर मेहनत की फसल जब ले कर मंडी गया तो वाजिब दाम नहीं मिला। सनद रहे किसान का खेत केवल अपना पेट भरने के लिए नहीं होता है, वह आधुानिक अर्थषास्त्र के सिद्धांतों से पूरे देष तकदीर लिखता है । हमारे भाग्यविधाता अपने अनुभवों से सीख नहीं ले रहे हैं कि किसान को कर्ज नहीं बेहतर बाजार चाहिए। उसे अच्छे बीज, खाद और दवाएं चाहिए। कृशि में सुधार के लिए पूंजी से कहीं ज्यादा जरूरत गांव-खेत तक संवेदनषल नीति की है। यह क्यों नहीं हो सकता कि एक एकड़ ख्ेात बचाने के लिए कोई सड़क पांच किलोमीटर घुमा कर बनाई जाए या वहां पुल बना दिया जाए। यह क्यों नहीं हो सकता कि कल-कारखाने बंजर पड़ी जमीन पर बनाए जाएं।
नकली खाद, पारंपरिक बीजों की जगह बीटी बीजों की खरीद की मजबूरी, फसल आने पर बाजार में उचित दाम नहीं मिलना, बिचैलियों की भूमिका, किसान के रिस्क-फैक्टर के प्रति प्रषासन की बेरूखी- कुछ ऐसे कारण हैं जिसके चलते आज देष के किसान खेती से विमुख हो रहे हैं यदि हालात ऐसे ही रहे तो आने वाले कुछ ही सालों में हमें पेट भरने के लिए जरूरी अन्न जुटाने के लिए भी विदेषों पर आश्रित होना पड़ेगा ।  देष के सबसे बड़े खेतों वाले राज्य उत्तर प्रदेष का यह आंकड़ा अणु बम से ज्यादा खतरनाक है कि राज्य में विकास के नाम पर हर साल 48 हजार हैक्टर खेती की जमीन को उजाड़ा जा रहा है। सरकारी आंकड़ों के चष्में से यदि उप्र को देखें तो प्रदेष में 24202000 हेक्टेयर भूमि है जिसमें से षुद्ध बुवाई वाला(यानी जहां खेती होती है) रकवा 16812000 हेक्टेयर है जो कुल जमीन का 69.5 फीसदी है। जाहिर है कि राज्य के निवासियों की चूल्हा-चैका का सबसे बड़ा जरिया खेती ही है। राज्य में कोई ढाई फीसदी जमीन उसर या खेती के अयोग्य भी है।  प्रदेष के 53 प्रतिषत लोग किसान हैं और कोई 20 प्रतिषत खेतिहर मजदूर। यानी लगभग तीन-चैथाई आबादी इसी जमीन से अपना अन्न जुटाती है। एक बात और गौर करने लायक है कि 1970-1990 के दो दषकों के दौरान राज्य में नेट बोया गया क्षेत्रफल 173 लाख हेक्टेयर स्थिर रहने के पष्चात अब लगातार कम हो रहा है।  सन 2001-02 की गणना में यह 268.50 लाख हेक्टेयर पर आ गया। एक राज्य जिसकी पूरी अर्थ व्यवस्था खेती पर निर्भर हो, वहां खेत घट रहे हैं और किसी को चिंता नहीं है ? अब खेत कोई ऐसी चीज तो है नहीं कि कहीं कोई चुरा कर ले जाए ! विकास के नाम पर सोना उगलने वाली जमीन की दुर्दषा इस आंकड़े से आंसू बहाती दिखती है कि उत्तर प्रदेष में सालाना कोई 48 हजार हेक्टेयर खेती की जमीन  कंक्रीट द्वारा निगली जा रही है।
उत्तरप्रदेष की सालाना राज्य आय का 31.8 प्रतिषत खेती से आता है। हालांकि यह प्रतिषत सन 1971 में 57, सन 1981 में 50 और 1991 में 41 हुआ करता था। साफ नजर आ रहा है कि लोगों से खेती दूर हो रही है - या तो खेती ज्यादा फायदे का पेषा नहीं रहा या फिर दीगर कारणों से लोगों का इससे मोहभ्ंाग हो रहा है। एक और आंकड़ा चैंकाने वाला है कि राज्य में एक हैक्टेयर से कम जोत वाले किसानों का प्रतिषत 75.4 है, जबकि यह आंकड़ा पूरे देष के स्तर पर 61.6 ही है। यही नहीं प्रति व्यक्ति षुद्ध बोया क्षेत्र का आंकड़ा राज्य में राश्ट्रीय आंकड़े से बेहद दूर है। ये सभी आकंड़े गवाह हैं कि उप्र में खेती किस तरह उपेक्षा व षोशण की षिकार है। दिल्ली से सटे जिलों- गाजियाबाद, बागपत, गौतम बु़द्ध नगर जिले से बीते तीन दषकों से खेत उजड़ने का जो सिलसिला षुरू हुआ , उससे भले ही कुछ लोगों के पास पैसा आ गया हो , लेकिन वह अपने साथ कई ऐसी बुराईयां व अपराध लाया कि गांवों की संस्कृति, संस्कार और सभ्यता सभी कुछ नश्ट हो गई। जिनके खेत थे, उन्हें तो कार, मकान और मौज-मस्ती के लिए पैसे मिल गए, लेकिन उनके खेतों में काम करने वाले तो बेरोजगार हो गए। उनके लिए करीबी महानगर दिल्ली में आ कर रिक्षा चलाने या छोटी-मोटी नौकरी करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा। जिनके पास बंदूकों के लाइसेंस थे वो गार्ड की नौकरी कर रहे हैं। जो गांव में आधा पेट रह कर भी ख्ुाष थे, वे आज दिल्ली या लखनउ में ना तो खुद खुष है और ना ही दूसरों की खुषी के लिए कुछ कर पा रहे हैं। देष के अन्न भंडार भरने वाले खेतों पर जो आवासीय परिसर खड़े हो रहे हैं, वे बगैर घर वाले लोगों की जरूरत पूरा करने के बनिस्पत निवेष का कम ज्यादा कर रहे हैं। वहीं अधिगृहित भूमि पर लगने वाले कारखानों में स्थानीय लोगों के लिए मजदूर या फिर चैकीदार से ज्यादा रोजगार के अवसर नहीं । इन कारखानों में बाहर से मोटे वेतन पर आए लोग स्थानीय बाजार को महंगा कर रहे है।, जोकि स्थानीय लोगों के लिए नए तरीके की दिक्कतें पैदा कर रहा है।
मकान, कारखानों, सड़कों के लिए जिन जमीनों का अधिग्रहण किया जा रहा है वे अधिकांष अन्नपूर्णा रही हैं। इस बात को भी नजरअंदाज किया जा रहा है कि कम होते खेत एक बार तो मुआवजा मिलने से प्रति व्यक्ति आय का आंकड़ा बढ़ा देते हैं, लेकिन उसके बाद बेरोजगारों की भीड़ में भी इजाफा करते हैं। यही नहीं मनरेगा भी खेत विरेाधी है। नरेगा में काम बढ़ने से खेतों में काम करने वाले मजदूर नहीं मिल रहे है और  मजदूर ना मिलने से हैरान-परेषान किसान खेत को तिलांजली दे रहे हैं।
गंभीरता से देखें तो इस साजिष के पीछे कतिपय वित्त संस्थाएं हैं जोकि ग्रामीण भारत में अपना बाजार तलाष रही हैं । खेती की बढ़ती लागत को पूरा करने के लिए कर्जे का बाजार खोल दिया गया है और सरकार इसे किसानों के प्रति कल्याणकारी कदम के रूप में प्रचारित कर रही है । हकीकत में किसान कर्ज से बेहाल है । नेषनल सैंपल सर्वें के आंकड़े बताते हैं कि आंध्रप्रदेष के 82 फीसदी किसान कर्ज से दबे हैं । पंजाब और महाराश्ट्र जैसे कृशि प्रधान राज्यों में यह आंकड़ा औसतन 65 प्रतिषत है । यह भी तथ्य है कि इन राज्यों में ही किसानों की खुदकुषी की सबसे अधिक घटनाएं प्रकाष में आई हैं । यह आंकड़े जाहिर करते हंै कि कर्ज किसान की चिंता का निराकरण नहीं हैं ।  परेषान किसान खेती से मुंह मोड़ता है, फिर उसकी जमीन को जमीन के व्यापारी खरीद लेते हैं।। मामला केवल इतना सा नहीं है, इसका दूरगामी परिणाम होगा अन्न पर हमारी आत्मनिर्भरता समाप्त होना तथा, जमीन-विहीन बेराजगारों की संख्या बढ़ना।
किसान को सम्मान चाहिए और यह दर्जा चाहिए कि देष के चहुंमुखी विकास में वह महत्वपूर्ण अंग है।
किसान भारत का स्वाभिमान है और देष के सामाजिक व आर्थिक ताने-बाने का महत्वपूर्ण जोड़ भी इसके बावजूद उसका षोशण हर स्तर पर है। किसान को उसके उत्पाद का सही मूल्य मिले, उसे भंडारण, विपणन की माकूल सुविधा मिले, खेती का खर्च कम हो व इस व्यवसाय में पूंजीपतियों के प्रवेष पर प्रतिबंध -जैसे कदम देष का पेट भरने वाले किसानों का पेट भर सकते हैं । चीन में खेती की विकास की सालाना दर 7 से 9 प्रतिषत है ,जबकि भारत में यह गत 20 सालों से दो को पार नहीं कर पाई है। अब तो विकास के नाम पर खेत उजाड़ने के खिलाफ पूरे देष में हिंसक आंदोलन भी हो रहे हैं। यह वक्त है कि हम खेती का रकबा बढ़ाने पर काम करें, इसे लिए जरूरी है कि उत्पादक जमीन पर हर तरह के निर्माण पर पाबंदी हो।  किसान को फसल के सुनिश्चित दाम, उसके परिवार के लिए शिक्षा व  स्वास्थय की गारंटी हो और खेत व खेती को पावन कार्य घोषित किया जाए।

पंकज चतुर्वेदी
साहिबाबाद गाजियाबाद 201005
9891928376

The right to a dignified farewell and a new standard in medical world

  गरिमापूर्ण विदाई का अधिकार और चिकित्सा की नई मर्यादा पंकज चतुर्वेदी लगभग  12 साल असीम और अव्यक्त पीड़ा के साथ  जीवन जी रहे हरीश राणा अं...