My writings can be read here मेरे लेख मेरे विचार, Awarded By ABP News As best Blogger Award-2014 एबीपी न्‍यूज द्वारा हिंदी दिवस पर पर श्रेष्‍ठ ब्‍लाॅग के पुरस्‍कार से सम्‍मानित

मंगलवार, 18 अगस्त 2015

Non- textbook can change learning process of primary school

राष्ट्रीय सहारा , १९ अगस्त १५  

व्यावहारिक शिक्षा की ओर बढ़ें कदम


पंकज चतुर्वेदी 
सरकार में बैठे लोग यह समझ गए हैं कि जब तक देश की साक्षरता दर नहीं बढ़ेगी, तब तक हर साल की अरबों रपए की कल्याणकारी योजनाओं का पानी में जाना जारी रहेगा। सारे देश में प्राथमिक शिक्षा की पहुंच अधिक से अधिक लोगों तक करने के नए-नए प्रयोग चल रहे हैं। यह भी स्वीकार किया जाने लगा है कि हमारी पाठ्य पुस्तकों में कहीं न कहीं कोई कमी अवश्य है तभी बच्चा वाक्यों को ‘‘डिकोड’ करना तो सीख लेता है , लेकिन उसके व्यावहारिक प्रयोग से अनभिज्ञ रहता है। इसे भी स्वीकार किया जाने लगा है कि सरकारी स्कूलों की हालत सुधारे बगैर देश में प्राथमिक शिक्षा की गाड़ी सड़क पर लाना असंभव ही है। देश के लाखों लाख सरकारी स्कूल- कई लाख में भवन नहीं हैं, कई लाख में एक ही शिक्षक कई-कई कक्षाओं को पढ़ाता है, कई हजार में ब्लैक बोर्ड और चाक जैसी सुविधाएं नहीं हैं। ऐसे स्कूलों की संख्या भी हजारों में है, जो कि केवल कागजों पर हैं।इसके बावजूद जिला प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम (डीपीईपी), सर्व शिक्षा अभियान, जनशाला और ऐसी ही अन्य अनेक योजनाओं के माध्यम से सरकारी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता बनाए रखने के भरसक प्रयास हो रहे हैं। अब गांव-गांव के स्कूलों तक भी बच्चों की पुस्तकें पहुंच रही हैं- रंग-बिरंगी कहानियों की पुस्तकें, ज्ञानवर्धक और रोचक पुस्तकें, शिक्षकों के लिए प्रेरक व दिशा निर्देशक पुस्तकें! प्रत्येक शिक्षक को भी हर साल पांच सौ रपए दिए जा रहे हैं कि वे अपनी पसंद की शिक्षण-सहायक सामग्री खरीद लें। अधिकांश स्थानों पर शिक्षक पुस्तकें ही खरीद रहे हैं। यानी, हर स्कूल तक पुस्तकें पहुंचने का सिलसिला शुरू हो गया है।इतनी पुस्तकें हैं, लेकिन पाठक नहीं हैं । यह सत्य का दूसरा पहलू है। पढ़ने वाले तो हैं, लेकिन पुस्तकें पाठकों तक देने में कई व्यवधान भी हैं। समय नहीं हैं, साधन नहीं हैं और स्थान नहीं हैं। लेकिन इन तीन ‘‘स’ के बीच जिन शिक्षकों के पास चौथा ‘‘स’ है, वहां पुस्तकें पाठकों तक पहुंुंच रही हैं और बच्चे उनका मजा उठा रहे हैं। इससे उनका शैक्षिक व बौद्धिक स्तर भी ऊंचा हो रहा है। यह चौथा ‘‘ स’ है- संकल्प। कुछ नया करने व मिलने वाले वेतन को न्यायोचित ठहराने का संकल्प ।इसमें दो राय नहीं कि समूचे प्रशासनिक ढांचे को बदलना तत्काल संभव नहीं हैं, लेकिन उस बदलाव के इंतजार में वर्तमान और भविष्य दोनों को नष्ट कर देना भी समझदारी नहीं है। ऐसी स्थिति में अलग तरह की पुस्तकों के माध्यम से सरकारी स्कूल के शिक्षकों की व्यावहारिक परेशानियों को ध्यान में रखते हुए एक ऐसा गतिविधि केंद्र विकसित करने के सुझाव दिया जा सकता है जो कि बच्चों के लिए तो लाभदायक होगा ही, शिक्षक भी इससे बेहद लाभान्वित होंगे ।वास्तव में शिक्षा के निमित्त स्कूल महज एक तरफा संवाद का माध्यम नहीं होना चाहिए जिसमें शिक्षक केवल पाठय़ पुस्तक को पढ़ाते हुए बच्चों को समझा रहा है और बच्चे सुन रहे हों। स्कूल बच्चों के लिए घुटनभरा कमरा न बन कर रह जाए, इसके लिए छोटी-छोटी गतिविधियां बेहद लाभकारी हैं। स्कूल में एक ऐसा कोना अनिवार्यत: हो जहां बच्चा अपने मन की बात शिक्षक से कह सके। वह जो कुछ करना चाहता है- गाना, बजाना, चित्र बनाना, लिखना, प्रकृति को देखना-यानी जो कुछ वह चाहता है, उसे करने का अवसर मिले और वह अपने समाज व परिवेश को समझ सके। यदि थोड़ा सा प्रयास किया जाए तो स्कूल बच्चों का पसंदीदा मनोरंजक स्थल बन सकता है। साथ में गैर-पाठ्य पुस्तकें भी हों तो रचनात्मकता और सीखने की प्रक्रिया को सही दिशा मिलना तय है।आकस्मिक या मनमर्जी से समय का इस्तेमाल भी बच्चों की रचनात्मकता विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। इससे बच्चों को पारंपरिक पढ़ाई की एक तरह की दिनर्चया से छूट मिलती है और उनमें आत्मनिर्भरता बढ़ती है। मिशिगन विविद्यालय के सामाजिक शोध विभाग ने हाल में इस बारे में एक शोध भी किया था। बच्चों का जीवन स्कूल व घर दोनों जगह बड़ों द्वारा बनाए गए कानूनों व टाइम टेबिल में बंधा होता है। वह भी हर दिन एक सरीखा। यहां तक कि बच्चों के लिए बड़ों द्वारा बनाये खेल भी कहीं न कहीं उनको तनाव देते हैं, क्योंकि उनमें बड़ों के मानसिक स्तर के नियम, बंधन होते हैं, जीतने का अव्यक्त तनाव होता है। प्रयोग के तौर पर बच्चों को अपने खुद के खेल और कायदे-कानून बनाने का मौका दें। या फिर स्कूल में बच्चों की दिनर्चया में अचानक बदलाव करें। जैसे किसी दिन पहले गणित पढ़ाई तो अगले दिन की शुरुआत हिन्दी से की जा सकती है। खेल के समय, बाल सभा, बाहर घूमने, प्रकृति विचरण जैसे गतिविधियों के लिए बगैर किसी पूर्व सूचना के समय निकालने का भी बच्चों के व्यक्तित्व विकास पर अलग प्रभाव डालेगा। स्कूल में बच्चों को यह भी सिखाना जरूरी है कि क्रोध, खुशी, अनिच्छा जैसी भावनाओें पर जरूरत से ज्यादा प्रतिक्रिया देने से कैसे बचा जाए। सामाजिक जुड़ाव यानी बच्चे का अपने गांव, मुहल्ले, घर-परिवेश से भावनात्मक जुड़ाव बना रहे, इसके लिए भी व्यावहारिक स्तर पर शुरू से प्रयास जरूरी हैं ।आमतौर पर स्कूलों में खेल का समय बीच में या फिर आखिर में होता है जबकि 10-12 साल के बच्चों के लिए शारीरिक मेहनत उनके सीखने व याद करने की प्रक्रिया में ग्लूकोज जैसा काम करती है। अत: स्कूलों में खेलकूद जैसी गतिविधियां शुरू में ही रखी जानी चाहिए। इससे बच्चे का स्कूल में मन भी लगेगा, साथ ही वे शारीरिक रूप से बौद्धिक कार्य करने के लिए भी तैयार रहेंगे। एक प्राथमिक स्कूल के शिक्षक की भूमिका बच्चे को ज्ञान देने वाले या फिर मनोरंजन करने वाले से अधिक उसके सहयोगी की होना चाहिए। वह केवल यह देख्ेा कि बच्चा किस दिशा में जा रहा है। बच्चा जब पहले-पहल चलना सीखता है तो उसका लड़खड़ाना वाजिब है, इसी तरह सीखने-सिखाने की शुरुआती प्रक्रिया में बच्चे के लड़खड़ाने पर शिक्षक को उसे तत्काल संभालने की कोशिश से बचना चाहिए। बच्चे अपने अनुभव और प्रयोगों से जल्दी व ज्यादा सीखते हैं ।बच्चों की सृजनात्मकता विकसित करने के लिए उन्हें अपने परिवेश से ही उदाहरण चुनने के लिए प्रेरित करना चाहिए। खेत-खलिहान के काम, मवेशी चराने, गृहिणी की दिनर्चया या मकान या सड़क बना रहे मजदूर की गतिविधियों में भी सृजनात्मकता की स्थितियां समझी-बूझी जा सकती हैं। शिक्षक, समाज और बच्चों के बीच दिनों-दिन बढ़ रहे अविास को समाप्त करने के लिए कुछ छोटी-छोटी जिम्मेदारियों को साझा करने के प्रयोग शुरू करने चाहिए। इस कार्य में बच्चे और समुदाय दोनों को ही शामिल किया जाना चातहए गांव या मोहल्ले का छोटा सा पुस्तकालय स्कूल में शुरू करना इस दिशा में बड़ी रचनात्मक पहल हो सकता है।

शनिवार, 15 अगस्त 2015

religion, independence and Bhagat Singh

आजादी के असली मायने क्‍या हैं , यह बात सरदार भगत सिंह के इस लेख की आखिरी पंक्ति में है , इसे पूरा पढें, मैं आपके ''लाईक'' का अचार नहीं डालूंगा, लेकिन यदि आप इसे पूरा बांचेगे व व इस पर चर्चा करेंगे तो मुझ पर अहसान होगा

धर्म और हमारा स्वतन्त्रता संग्राम


मई, 1928 के ‘किरती’ में यह लेख छपा। जिसमें भगत सिंह ने धर्म की समस्या पर प्रकाश डाला है।


अमृतसर में 11-12-13 अप्रैल को राजनीतिक कान्फ्रेंस हुई और साथ ही युवकों की भी कान्फ्रेंस हुई। दो-तीन सवालों पर इसमें बड़ा झगड़ा और बहस हुई। उनमें से एक सवाल धर्म का भी था। वैसे तो धर्म का प्रश्न कोई न उठाता, किन्तु साम्प्रदायिक संगठनों के विरुद्ध प्रस्ताव पेश हुआ और धर्म की आड़ लेकर उन संगठनों का पक्ष लेने वालों ने स्वयं को बचाना चाहा। वैसे तो यह प्रश्न और कुछ देर दबा रहता, लेकिन इस तरह सामने आ जाने से स्पष्ट बातचीत हो गयी और धर्म की समस्या को हल करने का प्रश्न भी उठा। प्रान्तीय कान्फ्रेंस की विषय समिति में भी मौलाना जफर अली साहब के पाँच-सात बार खुदा-खुदा करने पर अध्यक्ष पण्डित जवाहरलाल ने कहा कि इस मंच पर आकर खुदा-खुदा न कहें। आप धर्म के मिशनरी हैं तो मैं धर्महीनता का प्रचारक हूँ। बाद में लाहौर में भी इसी विषय पर नौजवान सभा ने एक मीटिंग की। कई भाषण हुए और धर्म के नाम का लाभ उठाने वाले और यह सवाल उठ जाने पर झगड़ा हो जाने से डर जाने वाले कई सज्जनों ने कई तरह की नेक सलाहें दीं।

सबसे ज़रूरी बात जो बार-बार कही गयी और जिस पर श्रीमान भाई अमरसिंह जी झबाल ने विशेष ज़ोर दिया, वह यह थी कि धर्म के सवाल को छेड़ा ही न जाये। बड़ी नेक सलाह है। यदि किसी का धर्म बाहर लोगों की सुख-शान्ति में कोई विघ्न डालता हो तो किसी को भी उसके विरुद्ध आवाज़ उठाने की जरूरत हो सकती है? लेकिन सवाल तो यह है कि अब तक का अनुभव क्या बताता है? पिछले आन्दोलन में भी धर्म का यही सवाल उठा और सभी को पूरी आज़ादी दे दी गयी। यहाँ तक कि कांग्रेस के मंच से भी आयतें और मंत्रा पढ़े जाने लगे। उन दिनों धर्म में पीछे रहने वाला कोई भी आदमी अच्छा नहीं समझा जाता था। फलस्वरूप संकीर्णता बढ़ने लगी। जो दुष्परिणाम हुआ, वह किससे छिपा है? अब राष्ट्रवादी या स्वतंत्राता प्रेमी लोग धर्म की असलियत समझ गये हैं और वही उसे अपने रास्ते का रोड़ा समझते हैं।

बात यह है कि क्या धर्म घर में रखते हुए भी, लोगों के दिलों में भेदभाव नहीं बढ़ता? क्या उसका देश के पूर्ण स्वतंत्राता हासिल करने तक पहुँचने में कोई असर नहीं पड़ता? इस समय पूर्ण स्वतंत्राता के उपासक सज्जन धर्म को दिमागी गु़लामी का नाम देते हैं। वे यह भी कहते हैं कि बच्चे से यह कहना किµईश्वर ही सर्वशक्तिमान है, मनुष्य कुछ भी नहीं, मिट्टी का पुतला हैµबच्चे को हमेशा के लिए कमज़ोर बनाना है। उसके दिल की ताव़$त और उसके आत्मविश्वास की भावना को ही नष्ट कर देना है। लेकिन इस बात पर बहस न भी करें और सीधे अपने सामने रखे दो प्रश्नों पर ही विचार करें तो हमें नज़र आता है कि धर्म हमारे रास्ते में एक रोड़ा है। मसलन हम चाहते हैं कि सभी लोग एक-से हों। उनमें पूँजीपतियों के ऊँच-नीच की छूत-अछूत का कोई विभाजन न रहे। लेकिन सनातन धर्म इस भेदभाव के पक्ष में है। बीसवीं सदी में भी पण्डित, मौलवी जी जैसे लोग भंगी के लड़के के हार पहनाने पर कपड़ों सहित स्नान करते हैं और अछूतों को जनेऊ तक देने की इन्कारी है। यदि इस धर्म के विरुद्ध कुछ न कहने की कसम ले लें तो चुप कर घर बैठ जाना चाहिये, नहीं तो धर्म का विरोध करना होगा। लोग यह भी कहते हैं कि इन बुराइयों का सुधार किया जाये। बहुत खूब! अछूत को स्वामी दयानन्द ने जो मिटाया तो वे भी चार वर्णों से आगे नहीं जा पाये। भेदभाव तो फिर भी रहा ही। गुरुद्वारे जाकर जो सिख ‘राज करेगा खालसा’ गायें और बाहर आकर पंचायती राज की बातें करें, तो इसका मतलब क्या है?

धर्म तो यह कहता है कि इस्लाम पर विश्वास न करने वाले को तलवार के घाट उतार देना चाहिये और यदि इधर एकता की दुहाई दी जाये तो परिणाम क्या होगा? हम जानते हैं कि अभी कई और बड़े ऊँचे भाव की आयतें और मंत्रा पढ़कर खींचतान करने की कोशिश की जा सकती है, लेकिन सवाल यह है कि इस सारे झगड़े से छुटकारा ही क्यों न पाया जाये? धर्म का पहाड़ तो हमें हमारे सामने खड़ा नज़र आता है। मान लें कि भारत में स्वतंत्राता-संग्राम छिड़ जाये। सेनाएँ आमने-सामने बन्दूकें ताने खड़ी हों, गोली चलने ही वाली हो और यदि उस समय कोई मुहम्मद गौरी की तरहµजैसी कि कहावत बतायी जाती हैµआज भी हमारे सामने गायें, सूअर, वेद-वु़$रान आदि चीज़ें खड़ी कर दे, तो हम क्या करेंगे? यदि पक्के धार्मिक होंगे तो अपना बोरिया-बिस्तर लपेटकर घर बैठ जायेंगे। धर्म के होते हुए हिन्दू-सिख गाय पर और मुसलमान सूअर पर गोली नहीं चला सकते। धर्म के बड़े पक्के इन्सान तो उस समय सोमनाथ के कई हजार पण्डों की तरह ठाकुरों के आगे लोटते रहेंगे और दूसरे लोग धर्महीन या अधर्मी-काम कर जायेंगे। तो हम किस निष्कर्ष पर पहंुचे? धर्म के विरुद्ध सोचना ही पड़ता है। लेकिन यदि धर्म के पक्षवालों के तर्क भी सोचे जायें तो वे यह कहते हैं कि दुनिया में अँधेरा हो जायेगा, पाप पढ़ जायेगा। बहुत अच्छा, इसी बात को ले लें।

रूसी महात्मा टॉल्स्टॉय ने अपनी पुस्तक (Essay and Letters) में धर्म पर बहस करते हुए उसके तीन हिस्से किये किये हैं —

1. Essentials of Religion, यानी धर्म की ज़रूरी बातें अर्थात सच बोलना, चोरी न करना, गरीबों की सहायता करना, प्यार से रहना, वगै़रा।

2. Philosophy of Religion, यानी जन्म-मृत्यु, पुनर्जन्म, संसार-रचना आदि का दर्शन। इसमें आदमी अपनी मर्जी के अनुसार सोचने और समझने का यत्न करता है।

3. Rituals of Religion, यानी रस्मो-रिवाज़ वगै़रा। मतलब यह कि पहले हिस्से में सभी धर्म एक हैं। सभी कहते हैं कि सच बोलो, झूठ न बोलो, प्यार से रहो। इन बातों को कुछ सज्जनों ने Individual Religion कहा है। इसमें तो झगड़े का प्रश्न ही नहीं उठता। वरन यह कि ऐसे नेक विचार हर आदमी में होने चाहिये। दूसरा फिलासफी का प्रश्न है। असल में कहना पड़ता है कि Philosophy is the out come of Human weakness, यानी फिलासफी आदमी की कमजोरी का फल है। जहाँ भी आदमी देख सकते हैं। वहाँ कोई झगड़ा नहीं। जहाँ कुछ नज़र न आया, वहीं दिमाग लड़ाना शुरू कर दिया और ख़ास-ख़ास निष्कर्ष निकाल लिये। वैसे तो फिलासफी बड़ी जरूरी चीज़ है, क्योंकि इसके बगै़र उन्नति नहीं हो सकती, लेकिन इसके साथ-साथ शान्ति होनी भी बड़ी ज़रूरी है। हमारे बुजुर्ग कह गये हैं कि मरने के बाद पुनर्जन्म भी होता है, ईसाई और मुसलमान इस बात को नहीं मानते। बहुत अच्छा, अपना-अपना विचार है। आइये, प्यार के साथ बैठकर बहस करें। एक-दूसरे के विचार जानें। लेकिन ‘मसला-ए-तनासुक’ पर बहस होती है तो आर्यसमाजियों व मुसलमानों में लाठियाँ चल जाती हैं। बात यह कि दोनों पक्ष दिमाग को, बुद्धि को, सोचने-समझने की शक्ति को ताला लगाकर घर रख आते हैं। वे समझते हैं कि वेद भगवान में ईश्वर ने इसी तरह लिखा है और वही सच्चा है। वे कहते हैं कि कुरान शरीप़$ में खु़दा ने ऐसे लिखा है और यही सच है। अपने सोचने की शक्ति, (Power of Reasoning) को छुट्टी दी हुई होती है। सो जो फिलासफी हर व्यक्ति की निजी राय से अधिक महत्त्व न रखती हो तो एक ख़ास फिलासफी मानने के कारण भिन्न गुट न बनें, तो इसमें क्या शिकायत हो सकती है।

अब आती है तीसरी बात – रस्मो-रिवाज़। सरस्वती-पूजावाले दिन, सरस्वती की मूर्ति का जुलूस निकलना ज़रूरी है उसमें आगे-आगे बैण्ड-बाजा बजना भी ज़रूरी है। लेकिन हैरीमन रोड के रास्ते में एक मस्जिद भी आती है। इस्लाम धर्म कहता है कि मस्जिद के आगे बाजा न बजे। अब क्या होना चाहिये? नागरिक आज़ादी का हक (Civil rights of citizen) कहता है कि बाज़ार में बाज़ा बजाते हुए भी जाया जा सकता है। लेकिन धर्म कहता है कि नहीं। इनके धर्म में गाय का बलिदान ज़रूरी है और दूसरे में गाय की पूजा लिखी हुई है। अब क्या हो? पीपल की शाखा कटते ही धर्म में अन्तर आ जाता है तो क्या किया जाये? तो यही फिलासफी व रस्मो-रिवाज़ के छोटे-छोटे भेद बाद में जाकर (National Religion) बन जाते हैं और अलग-अलग संगठन बनने के कारण बनते हैं। परिणाम हमारे सामने है।

सो यदि धर्म पीछे लिखी तीसरी और दूसरी बात के साथ अन्धविश्वास को मिलाने का नाम है, तो धर्म की कोई ज़रूरत नहीं। इसे आज ही उड़ा देना चाहिये। यदि पहली और दूसरी बात में स्वतंत्रा विचार मिलाकर धर्म बनता हो, तो धर्म मुबारक है।

लेकिन अगल-अलग संगठन और खाने-पीने का भेदभाव मिटाना ज़रूरी है। छूत-अछूत शब्दों को जड़ से निकालना होगा। जब तक हम अपनी तंगदिली छोड़कर एक न होंगे, तब तक हमें वास्तविक एकता नहीं हो सकती। इसलिए ऊपर लिखी बातों के अनुसार चलकर ही हम आजादी की ओर बढ़ सकते हैं। हमारी आज़ादी का अर्थ केवल अंग्रेजी चंगुल से छुटकारा पाने का नाम नहीं, वह पूर्ण स्वतंत्राता का नाम हैµजब लोग परस्पर घुल-मिलकर रहेंगे और दिमागी गुलामी से भी आज़ाद हो जायेंगे।

रविवार, 9 अगस्त 2015

murder of women on the name of witch hunting


         
             औरत को मारने के बहाने
                     पंकज चतुर्वेदी
Jagran 10-8-15
यह घटना है  राज्य की राजधानी रांची से सटे मांडल ब्लाक के कंजिया टोली की। महज 80 घरों वाला गांव है यह। बीते कुछ महीनों में गांव के चार बच्चे बीमारी से मरे। गांव के कुछ लोगों ने पंचायत की और निर्णय ले लिया कि यह सब उन पांच औरतों के कारण हो रहा है जो ‘‘डायन’’ हैं। जब यह चल रहा था तो पुलिस का गष्ती दल गांव में पहुंचा, उन्होंने नियंत्रण का प्रयास किया, लेकिन हथियारबंद गांववालों ने पुलिस टुकड़ी को ही खदेड़ दिया। पांच औरतों, जिनमें एक मां-बेटी भी थी, घर से निकाला गया, उनके कपड़े उतार कर घसीटा गया, फिर भालों से गोद कर व पत्थर से कुचल कर मौत के घाट उतार दिया गया। जब तक बड़ी पुलिस टुकड़ी आती, पांचों औरतें मांस का निर्जीव लोथड़ा बन गई थीं। यही नहीं जब पुलिस ने इन हत्या के आरोप में कुछ लोगों को पकड़ा तो भारी भीड़ इसका विरोध करने थाने पहुंच गई। मारी गई एक औरत 40 साल की है, षेश 55 से 60 के बीच की हैं। विडंबना है कि औरतों की इस नृषंस हत्या के पर्व में स्वयं कई औरतें भी षामिल थीं। झारखंड में गत एक दषक में कोई 1200 औरतों को इसी तरह मध्यकालीन बर्बरता का षिकार बनाए जाने की बात सरकरी रिकार्ड कहता है। महिला सषक्तीकरण की तकरीर करने वालों को षायद यह पता भी नहीं हैं कि पूरे देष के कोई आधा दर्जन राज्यों में ऐसे ही हर साल सैंकड़ों औरतों को बर्बर तरीके से मारा जा रहा है । वह भी ‘डायन’ के अंधविश्वास की आड़ में ।
देष के आदिवासी अंचलों में जमीन हदबंदी कानूनों के लचरपन और पंचायती राजनीति के नाम पर शुरू हुईं जातीय दुश्मनियों की परिणति महिलाओं की हत्या के रूप में हो रही है । कुछ साल पहले सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर राज्य शासन ने एक जांच रिर्पोट तैयार की है जिसमें बताया गया है कि अंधविश्वास , अझान और अशिक्षा के कारण टोनही या डायन करार दे कर किस तरह निरीह महिलाओं की आदिकालीन लोमहर्षक ढ़ंग से हत्या कर दी जाती है । औरतों को ना केवल जिंदा जलाया जाता है, बल्कि उन्हें गांव में नंगा घुमाना, बाल काट देना, गांव से बाहर निकाल देना जैसे निर्मम कृत्य भी डायन या टोनही के नाम पर होते रहते हैं। इन शर्मनाक घटनाओं का सर्वाधिक अफसोसजनक पहलू यह है कि इन महिला प्रताडनाओं के पीछे ना सिर्फ महिला की प्रेरणा होती है,बल्कि वे इन कुकर्मों में बढ़-चढ़ कर पुरूषों का साथ भी देती हैं ।
आदिवासी बाहुल्य छत्तीसगढ़ राज्य में बेगा, गुनियाओं और ओझाओं के झांसे मंे आ कर पिछले तीन वर्षों में तीन दर्जन से अधिक औरतों को मार डाला गया है । कोई एक दर्जन मामलों में आदमियों को भी ऐसी मौत झेलनी पड़ी है । मरने वालों में बूढ़े लोगों की संख्या ज्यादा है । किसी को जिंदा जलाया गया तो किसी को जीवित ही दफना दिया गया । किसी का सिर धड़ से अलग करा गया तो किसी की आंखें निकाल ली गईं । ये आंकड़े मात्र वही हैं जिनकी सूचना पुलिस तक पहुंची । खुद पुलिस भी मानती है कि दर्ज नहीं हो पाए मामलों की संख्या सरकारी आंकड़ों से कहीं अधिक है । प्रशासन के रिकार्ड मुताबिक बीते तीन सालों के दौरान सरगुजा में आठ, बिलासपुर में सात, रायपुर में पांच, रायगढ़ में चार, राजनांदगांव व दंतेवाडा में दो-दो और बस्तर में एक ऐसा मामला कायम हुआ है । यहां जानना जरूरी है कि बस्तर, दंतेवाडा के बड़े हिस्से में पुलिस या नागरिक प्रशासन अभी तक नहीं पहुंच पाया है । यही वे क्षेत्र हैं जहां अंधविश्वास का कुहासा सर्वाधिक है ।  लोग भूल गए होंगे कि पिछले साल असम में जनजातिय बाहुल्य कार्बी आंगलांग जिले में एक राश्ट्रीय स्तर की एथेलेटिक को कुछ लेाग डायन बता कर निर्ममता से पीटा था। कहते हैं कि गांव में कुछ षराब मर गए और एक युवक ने आत्महत्या कर ली। देवजानी नामक जेवलिन थ्रो की राश्ट्रीय स्तर पर स्वर्ण पदक विजेता व भारत का अंतरराश्ट्रीय प्रतियोगिता में प्रतिनिधित्व कर चुकी देवजानी को मछली पकड़ने के जाल में बांध कर तब तक पीटा गया, जब तक वह अधमरी नहीं हो गई। देवजानी तीन बच्चों की मां थी। असम राज्य में गत पांच सालों के दौरान ऐसे कोई 90 मामले सामने आए हैं जब किसी औरत को डायन बता कर जलाया, गला काटा या प्रताडि़त किया गया हो। किसी गांव में कोई बीमारी फैले या मवेशी मारे जाएं या फिर किसी प्राकृतिक विपदा की मार हो, आदिवासी इलाकों में इसे ‘टोनही’ का असर मान लिया जाता है । भ्रांति है कि टोनही के बस में बुरी आत्माएं होती हैं, इसी के बूते पर वह गांवों में बुरा कर देती है । ग्रामिणों में ऐसी धारणाएं फैलाने का काम नीम-हकीम, बेगा या गुनिया करते हैं । छत्तीसगढ़ हो या निमाड़, या फिर झाखंड व ओडिषा ; सभी जगह आदिवासियों की अंधश्रद्धा इन झाड़-फंूक वालों में होती है । इन लोगों ने अफवाह उड़ा रखी है कि ‘टोनही’ आधी रात को निर्वस्त्र हो कर शम्सान जाती है और वहीं तंत्र-मंत्र के जरिए बुरी आत्माओं को अपना गुलाम बना लेती है । उनका मानना है कि देवी अवतरण के पांच दिनों- होली,हरेली,दीवाली और चैत्र व शारदीय नवरात्रि के मौके पर ‘टोनही’ सिद्धी प्राप्त करती है । गुनियाओं की मान्यता के प्रति इस इलाके में इतनी अगाध श्रद्धा है कि ‘देवी अवतरण’ की रातों में लोग घर से बाहर निकलना तो दूर, झांकते तक नहीं हैं । गुनियाओं ने लोगों के दिमाग में भर रखा है कि टोनही जिसका बुरा करना चाहती है, उसके घर के आस-पास वह अभिमंत्रित बालों के गुच्छे, तेल, सिंदूर, काली कंघी या हड्डी रख देती है ।
अधिकांश आदिवासी गांवों तक सरकारी स्वास्थ महकमा पहुंच नहीं पाया है । जहां कहीं अस्पताल खुले भी हैं तो कर्मचारी इन पुरातनपंथी वन पुत्रों में अपने प्रति विश्वास नहीं उपजा पाए है । तभी मवेशी मरे या कोई नुकसान हो, गुनिया हर मर्ज की दवा होता है । उधर गुनिया के दांव-पेंच जब नहीं चलते हैं तो वह अपनी साख बचाने कि लिए किसी महिला को टोनही घोषित कर देता है । गुनिया को शराग, मुर्गे, बकरी की भेंट मिलती है; बदले में किसी औरत को पैशाचिक कुकृत्य सहने पड़ते हैं । ऐसी महिला के पूरे कपड़े उतार कर गांव की गलियों में घुमाया जाता है, जहां चारों तरफ से पत्थर बरसते हैं । ऐसे में हंसिए से आंख फोड़ दी जाती है ।
मप्र के झाबुआ-निमाड़ अंचल में भी महिलाओं को इसी तरह मारा जाता है ; हां, नाम जरूर बदल जाता है - डाकन । गांव की किसी औरत के शरीर में ‘माता’ प्रविष्ठ हो जाती है । यही ‘माता’ किसी दूसरी ‘माता’ को डायन घोषित कर देती है । और फिर वही अमानवीय यंत्रणाएं शुरू हो जाती हैं । अकेले झाबुआ जिले में हर साल 10 से 15 ‘डाकनों’ की नृशंस हत्या होती हैं । इसी तरह के अंधविष्वास और त्रासदी से झारखंड, ओडिषा, बिहार, बंगाल और असम के जनजातिय इलाके भी ग्रस्त हैं। सन 2011 में 243 औरतों को डाकन बता कर मार देने की बात राश्ट्रीय अपराध रिकार्ड्स ब्यूरो बताता हे। सन 2012 में इसी आरोप में माारी गई दौ सैंकडा से ज्यादा औरतों में से कोई पचास अकेले रहती थीं।
रूरल लिटिगेषन एंड एंटाइटिलमेंट केंद्र नामक गैरसरकारी संगठन की ओर से सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दे कर डायन-कुप्रथा पर रोक लगाने की मांग की गई थी, जिसे गत 12 मार्च 2010 को सुप्रीम कोर्ट ने यह कहते हुए निरस्त कर दिया कि इस याचिका को हाईकोर्ट में लगाना चाहिए। संस्था ने आकंडे पेष किए कि गत 15 सालों से देष के विभिन्न राज्यों में 2500 से अधिक औरतों को डायन करार दे कर मारा जा चुका है।
ठेठ आदिम परंपराओं में जी रहे आदिवासियों के  इस दृढ़ अंध विश्वास का फायदा इलाके के असरदार लोग बड़ी चालाकी से उठाते है । अपने विरोधी अथवा विधवा-बूढ़ी औरतों की जमीन हड़पने के लिए ये प्रपंच किए जाते हैं । थोड़े से पैसे या शराब के बदौलत गुनिया बिक जाता है और किसी भी महिला को टोनही घोषित कर देता है । अब जिस घर की औरत को ‘दुष्टात्मा’ बता दिया गया हो या निर्वस्त्र कर सरेआम घुमाया गया हो, उसे गांव छोड़ कर भागने के अलावा कोई चारा नहीं बचता है । कई मौकों पर ऐसे परिवार की बहु-बेटियों के साथ गुनिया या असरदार लोग कुकृत्य करने से बाज नहीं आते हैं । यही नहीं अमानवीय संत्रास से बचने के लिए भी लोग ओझा को घूस देते हैं ।
मप्र शासन की जांच रपट में कई रोंगटे खड़े कर देने वाले हादसों का जिक्र है । लेकिन अब अधिकारी सांसत में हैं कि अनपढ़ आदिवासियों को इन कुप्रथाओं से बचाया कैसे जाए । एक तरफ आदिवासियों के लिए गुनिया-ओझा की बात पत्थर की लकीर होती है, तो दूसरी ओर इन भोले-भाले लोगों के वोटों के ठेकेदार ‘परंपराओं’ में सरकारी दखल पर भृकुटियां तान कर अपना उल्लू सीधा करने में लगे रहते हैं । गुनिया-ओझा का कोप भाजन होने से अशिक्षित आदिवासी ही नहीं, पढ़े-लिखे समाज सुधारक व धर्म प्रचारक भी डरते हैं । तभी इन अंचलों में सामुदायिक स्वास्थ, शिक्षा या धर्म के क्षेत्र में काम कर रहे लोग भी इन कुप्रथाओं पर कभी कुछ खुल कर नहीं बोलते हैं  कारण- गुनिया की नाराजगी मोल ले कर किसी का भी गांव में घुस पाना नामुमकिन ही है । कहने को झारंखंड सरकार ने इस कुप्रथा के खिलाफ एक डोक्यूमेंट्री फिल्म भी बनवाई थी, लेकिन गुनिया-ओझा के डर से उसका सही तरीके से प्रदर्षन भी नहीं हुआ।
मिथ्या धारणाओं से ओतप्रोत जनजातीय लोगों में औरत के प्रति दोयम नज़रिया वास्तव में उनकी समृद्ध परंपराओं का हिस्सा नहीे हैं । यह तो हाल के कुछ वर्षों में उनके बीच बढ़ रहे बाहरी लोगों के दखल और भौतिक सुखों की चाहत से उपजे हीन संस्कारों की हवस मात्र है ।

पंकज चतुर्वेदी
नेषनल बुक ट्रस्ट, इंडिया
5 नेहरू भवन वसंत कुंज इंस्टीट्यूषनल एरिया फेज-2
नई दिल्ली-110070

ban on porn site is necessary

प्रतिबंध पर इतना हंगामा क्यों!
                                                                                                                                                                 पंकज चतुर्वेदी
LOKMAT SAMACHAR, AMHARASHTRA 10-8-15
 य ह तसल्ली कुछ ही घंटे की रही कि चलो अब इंटरनेट पर कुछ सौ अश्लील वेबसाइट नहीं खुलेंगी. एक तरफ कुछ 'अभिव्यक्ति की आजादी' का नारा लगा कर इन साइटों पर पाबंदी की मुखालफत करते दिखे तो दूसरी ओर ऐसी साइटों से करोड.ों पीटने वाले सुप्रीम कोर्ट के आदेश का छिद्रान्वेषण कर अपनी दुकान बचाने पर जुट गए.
एक दिन भी नहीं बीता और अश्लीलता परोसने वाली अधिकांश साइट फिर बेपर्दा हो गईं. कुल मिला कर केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के सामने हाथ खडे. कर दिए कि सभी अश्लील वेबसाइटों पर रोक लगाना संभव नहीं है. संचार के आधुनिक साधन इस समय जिस स्तर पर अश्लीलता का खुला बाजार बन गए हैं, यह किसी से दबा-छुपा नहीं है. कुछ ही महीने पहले ही देश के सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ने भी नेट पर परोसे जा रहे अश्लील बाजार पर चिंता जताई थी. यह विश्‍वव्यापी है और जाहिर है कि इस पर काबू पाना इतना सरल नहीं होगा. लेकिन दुर्भाग्य है कि हमारे देश के संवाद और संचार के सभी लोकप्रिय माध्यम देह-विर्मश में लिप्त हैं, सब कुछ खुला-खेल फरुखाबादी हो रहा है.
अखबार, मोबाइल फोन, विज्ञापन सभी जगह तो नारी-देह बिक रही है. अब नए मीडिया यानी वॉट्स एप, वी चैट जैसी नई संचार तकनीकों ने वीडियो व चित्र भेजना बेहद आसान कर दिया है और कहना होगा कि इस नए संचार ने देह मंडी को और सुलभ कर दिया है.
नंगेपन की तरफदारी करने वाले आखिर यह क्यों नहीं समझ रहे कि देह का खुला व्यापार युवा लोगों की कार्य व सृजन-क्षमता को जंग लगा रहा है. जिस वक्त उन्हें देश-समाज के उत्थान पर सोचना चाहिए, वे अंग-मोह में अपना समय व शरीर बर्बाद कर रहे हैं. आज मोबाइल हैंड सेट में इंटरनेट कनेक्शन आम बात हो गई है और इसी राह पर इंटरनेट की दुनिया भी अधोपतन की ओर है.
मजाक, हंसी और मौज मस्ती के लिए स्त्री देह की अनिवार्यता का संदेश आधुनिक संचार माध्यमों की सबसे बड.ी त्रासदी बन गया है. यह समाज को दूरगामी विपरीत असर देने वाले प्रयोग हैं. चीन, पाकिस्तान के उदाहरण हमारे सामने हैं, जहां किसी भी तरह की अश्लील साइट खोली नहीं जा सकती. यदि हमारा सर्च इंजन हो तो हमें गूगल पर पाबंदी या नियंत्रित करने में कोई दिक्कत नहीं होगी और हम वेबसाइटों पर अपने तरीके से निगरानी रख सकेंगे. कहीं किसी को तो पहल करनी ही होगी, सो सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश पहल कर चुके हैं. अब आगे का काम नीति-निर्माताओं का है. 

Stop wastage of food


असमानता के बीच अन्न की बर्बादी

= पंकज चतुर्वेदी
जिस देश में नए अनाज को रखने के लिए गोदामों में जगह नहीं है, जहां सामाजिक जलसों में परोसा जाने वाला आधे से ज्यादा भोजन कूड़ाघर का पेट भरता है, वहां ऐसे भी लोग हैं जो अन्न के एक दाने के अभाव में दम तोड़ देते हैं। पिछले महीने छत्तीसगढ़ में एक बच्चा भूख से मर गया। विकास, विज्ञान, संचार व तकनीक में हर दिन कामयाबी की नई ऊंचाई छूने वाले मुल्क में इस तरह बेरोजगारी व खाना न मिलने से होने वाली मौतें मानवता व हमारे ज्ञान के लिए भी कलंक हैं...


पिछले महीने 80 साल बाद जारी किए गए सामाजिक, आर्थिक और जातीय जनगणना के आंकड़े भारत की चमचमाती तस्वीर के पीछे का विद्रूप चेहरा उजागर करने के लिए काफी हैं। देश के 51.14 प्रतिशत परिवारों की आय का जरिया महज अस्थाई मजदूरी है। 4.08 लाख परिवार कूड़ा बीनकर तो 6.68 लाख परिवार भीख मांग कर अपना गुजारा करते हैं। गांव में रहने वाले 39.39 प्रतिशत परिवारों की औसत मासिक आय दस हजार रुपए से भी कम है। आय और व्यय में असमानता की हर दिन गहरी होती खाई का ही परिणाम है कि कुछ दिनों पहले ही संयुक्त राष्ट्र के खाद्य व कृषि संगठन द्वारा जारी की गई रपट में बताया गया है कि भारत में 19.4 करोड़ लोग भूखे सोते हैं, हालांकि सरकार के प्रयासों से पहले से ऐसे लोगों की संख्या कम हुई है। हमारे यहां बीपीएल यानी गरीबी की रेखा से नीचे जीवन यापन करने वालों की संख्या को लेकर भी गफलत है, हालांकि यह आंकड़ा 29 फीसदी के आसपास सर्वमान्य है। भूख, गरीबी, कुपोषण व उससे उपजने वाली स्वास्थ्य, शिक्षा, मानव संसाधन प्रबंधन की दिक्कतें देश के विकास में सबसे बड़ी बाधक हैं। हमारे यहां न तो अन्न की कमी है और न ही रोजगार के लिए श्रम की। कागजों पर योजनाएं भी हैं, नहीं है तो उन योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए जिम्मेदार स्थानीय स्तर की मशीनरी में जिम्मेदारी व संवेदना की। जिस देश में नए खरीदे गए अनाज को रखने के लिए गोदामों में जगह नहीं है, जहां सामाजिक जलसों में परोसा जाने वाला आधे से ज्यादा भोजन कूड़ाघर का पेट भरता है, वहां ऐसे भी लोग हैं जो अन्न के एक दाने के अभाव में दम तोड़ देते हैं। पिछले महीने छत्तीसगढ़ में एक बच्चा भूख से मर गया। सनद रहे कि छत्तीसगढ़ की सार्वजनिक वितरण प्रणाली की मिसाल देश-दुनिया में दी जाती है। मारे गए बच्चे का बाप बेरोजगार था व उसके पास मनरेगा का जॉब कार्ड भी नहीं था। बंगाल के बंद हो गए चाय बागानों में आए रोज मजूदरों के भूख के कारण दम तोड़ने की बात हो या फिर महाराष्ट्र में अरबपति शिरडी मंदिर के पास ही मेलघाट में हर साल हजारों बच्चों की कुपोषण से मौत की खबर या फिर राजस्थान का बारां जिला हो या मध्यप्रदेश का शिवपुरी जिला, सहरिया आदिवासियों की बस्ती में पैदा होने वाले कुल बच्चों में अस्सी फीसदी के उचित खुराक न मिल पाने के कारण कम उम्र में ही मर जाने के मामले इस देश में हर रोज हो रहे हैं, लेकिन विज्ञापन में मुस्कुराते चेहरों, दमकती सुविधाओं के फेर में वास्तविकता से परे उन्मादित भारतवासी तक ऐसी खबरें या तो पहुंच नहीं रही हैं या उनकी संवेदनाओं को झकझोर नहीं रही हैं। देशभर के शहरों-कस्बों से आए रोज गरीबी, कर्ज व भुखमरी के कारण आत्महत्या की खबरें आती हंै, लेकिन वे किसी अखबार की छोटी सी खबर बन कर समाप्त हो जाती हैं। भूख से मौत वह भी उस देश में जहां खाद्य और पोषण सुरक्षा की कई योजनाएं अरबों रुपए की सब्सिडी पर चल रही हैं, जहां मध्यान्य भोजन योजना के तहत हर दिन 12 करोड़ बच्चों को दिन का भरपेट भोजन देने का दावा हो, जहां हर हाथ को काम व हर पेट को भोजन के नाम पर हर दिन करोड़ों का सरकारी फंड खर्च होता हो, दर्शाता है कि योजनाओं व पात्रों के बीच अभी भी पर्याप्त दूरी है। वैसे भारत में हर साल पांच साल से कम उम्र के 10 लाख बच्चों के भूख या कुपोषण से मरने के आंकड़े संयुक्त राष्ट्र संगठन ने जारी किए हैं। ऐसे में नवरात्रि पर गुजरात के गांधीनगर जिले के एक गांव में माता की पूजा के नाम पर 16 करोड़ रुपए दाम के साढ़े पांच लाख किलो शुद्ध घी को सड़क पर बहाने, मध्यप्रदेश में एक राजनीतिक दल के महासम्मेलन के बाद नगर निगम के सात ट्रकों में भर कर पूड़ी व सब्जी कूड़ेदान में फेंकने की घटनाएं बेहद दुभाग्यपूर्ण व शर्मनाक प्रतीत होती हैं।हर दिन कई लाख लोगों के भूखे पेट सोने के गैर सरकारी आंकड़ों वाले भारत देश के ये आंकड़े भी विचारणीय हैं। देश में हर साल उतना गेहूं बर्बाद होता है, जितना आस्ट्रेलिया की कुल पैदावार है। नष्ट हुए गेहूं की कीमत लगभग 50 हजार करोड़ होती है और इससे 30 करोड़ लोगों को सालभर भरपेट खाना दिया जा सकता है। हमारा 2.1 करोड़ टन अनाज केवल इसलिए बेकार हो जात है, क्योंकि उसे रखने के लिए हमारे पास माकूल भंडारण की सुविधा नहीं है। देश के कुल उत्पादित सब्जी-फल का 40 फीसदी कोल्ड स्टोरेज व समय पर मंडी तक नहीं पहुंच पाने के कारण सड़ जाता है। औसतन हर भारतीय एक साल में 6 से 11 किलो अन्न बर्बाद करता है। जितना अन्न हम एक साल में बर्बाद करते हैं, उसकी कीमत से ही कई सौ कोल्ड स्टोरेज बनाए जा सकते हैं जो फल-सब्जी को सड़ने से बचा सके। एक साल में जितना सरकारी खरीदी का धान व गेहूं खुले में पड़े होने के कारण मिट्टी हो जाता है, उससे ग्रामीण अंचलों में पांच हजार वेयर हाउस बनाए जा सकते हैं। यह आंकड़ा किसी से दबा-छुपा नहीं है, बस जरूरत है तो एक प्रयास करने की। यदि पंचायत स्तर पर ही एक कुंटल अनाज का आकस्मिक भंडारण व उसे जरूरतमंद को देने की नीति का पालन हो तो कम से कम कोई भूखा तो नहीं मरेगा। बुंदेलखंड के पिछड़े जिले महोबा के कुछ लेागों ने ‘रोटी बैंक’ बनाया है। बैंक से जुड़े लोग भोजन के समय घरों से ताजा बनी रोटियां एकत्र करते हैं और उन्हें अच्छे तरीके से पैक कर भूखे तक पहुंचाते हैं। बगैर किसी सरकारी सहायता के चल रहे इस अनुकरणीय प्रयास से हर दिन 400 लेागों को भोजन मिल रहा है। बैंक वाले बासी या ठंडी रोटी लेते नहीं हैं, ताकि खाने वाले का आत्मसम्मान भी जिंदा रहे। यह बानगी है कि यदि इच्छा शक्ति हो तो छोटे से प्रयास भी भूख पर भारी पड़ सकते हैं। विकास, विज्ञान, संचार व तकनीक में हर दिन कामयाबी की नई ऊंचाई छूने वाले मुल्क में इस तरह बेरोजगारी व खाना न मिलने से होने वाली मौतें मानवता व हमारे ज्ञान के लिए भी कलंक हैं। हर जरूरतमंद को अन्न पहुंचे इसके लिए सरकारी योजनाओं को तो थोड़ा चुस्त-दुरुस्त होना होगा, समाज को भी थोड़ा संवेदनशील बनना होगा। हो सकता है कि हम इसके लिए पाकिस्तान से कुछ सीख लें, जहां शादी व सार्वजनिक समारोह में पकवान की संख्या, मेहमानों की संख्या तथा खाने की बर्बादी पर सीधे गिरफ्तारी का कानून है। जबकि हमारे यहां होने वाले शादी समारोह में आमतौर पर 30 प्रतिशत खाना बेकार जाता है। गांव स्तर पर अन्न बैंक, प्रत्येक गरीब, बेरोजगार के आंकड़े रखना जैसे कार्य में सरकार से ज्यादा समाज को अग्रणी भूमिका निभानी होगी। बहरहाल हमें एकमत से स्वीकार करना होगा कि अंबिकापुर जिले में एक आदिवासी बच्चे की ऐसी मौत हम सभी के लिए शर्म की बात है। यह विडंबना है कि मानवता पर इतना बड़ा धब्बा लगा और उस इलाके के एक कर्मचारी या अफसर को सरकार ने दोषी नहीं पाया, जबकि ये अफसरान इलाके की हर उपलब्धि को अपनी बताने से अघाते नहीं हैं। भूख व कुपोषण जैसे मसलों पर अफसरान की जिम्मेदारी तय करने में कड़ाई, मुफ्त बंटने वाले भोजन की गुणवत्ता से समझौता न करने और ग्रामीण स्तर पर खाद्य सुरक्षा की येाजना व क्रियान्वयन हमें भूख से मौत जैसे सामाजिक कलंक से मुक्ति दिलवा सकता है।

बुधवार, 5 अगस्त 2015

THINK FOR ALTERNATIVE OF ATOMIC POWER FOR ELECTRICITY

6 अगस्त हीरोशिमा अणु बम की 70वी बरसी पर खास

कई फुकुशीमा  पनप रहे हैं भारत में!

पंकज चतुर्वेदी

 बीते कुछ सालों से मुल्क की सियासत के केंद्र में बिजली है - कहीं सस्ती या मुफ्त बिजली के वायदे हैं तो कहीं ज्यादा बिजी बिलों को ले कर तकरार। यूपीए-1 तो बिजली के लिए अमेरिका के साथ परमाणु समझौते को ले कर पूरी सरकार को दांव पर लगा चुका था। लेकिन बिजली की लालसा में लोग चार साल पहले जापान में आई सुनामी के बाद फुकुषिमा के परमाणु बिजली संयंत्र का रिसाव अकेले जापान ही नहीं आधा दर्जन देषों के अस्तित्व पर संकट बन गया था। उस समय सारी दुनिया में बहस चली थी कि परमाणु उर्जा कितनी उपयोगी और खतरनाक है। सभी ने माना था कि परमाणुु षक्ति को बिजली में बदलना षेर पर सवारी की तरह है- थोड़ा चूके तो काल का ग्रास बनना तय है। लेकिन विडंबना है कि भारत में देष के भाग्यविधात उन लाखों लोगों के प्रति बेखबर हैं जो कि देष का परमाणु-संपन्न बनाने की कीमत पीढि़यों से विकिरण की त्रासदी सह कर चुका रहे हैं। एटमी ताकत पाने के तीन प्रमुख पद हैं - यूरेनियम का खनन, उसका प्रसंस्करण और फिर विस्फोट या परीक्षण। लेकिन जिन लोगों की जान-माल की कीमत पर इस ताकत को  हासिल किया जा रहा है; वे नारकीय जीवन काट रहे हैं ?
परमाणु उर्जा से बनने वाली बिजली का उपभोग करने वाले नेता व अफसर तो दिल्ली या किसी शहर में सुविधा संपन्न जीवन जी रहे हैं , परंतु हजारों लोग ऐसे भी हैं जो इस जुनून की कीमत अपना जीवन दे कर चुका रहे हैं । जिस जमीन पर परमाणु ताकत का परीक्षण किया जाता रहा है, वहां के लोग पेट के खातिर अपने ही बच्चों को अरब देशों में बेच रहे हैं । जिन इलाकों में एटमी ताकत के लिए रेडियो एक्टिव तत्व तैयार किए जा रहे हैं, वहां की अगली पीढ़ी तक का जीवन अंधकार में दिख रहा है । जिस जमीन से परमाणु बम का मुख्य मसाला खोदा जा रहा है, वहां के बाशिंदे तो जैसे मौत का हर पल इंतजार ही करते हैं ।
PRABHAT MEERUT , 9-8-15
झारखंड के पूर्वी सिंहभूम जिले के जादुगोड़ा में भारत की पहली और एकमात्र यूरेनियम की खान है । यहां से अयस्क का खनन किया जाता है और उसे परिशोधन के लिए हजार किमी दूर हैदराबाद भेजा जाता है । इस प्रक्रिया में शेष बचे जहरीले कचरे को एक बार फिर जादुगोड़ा ला कर आदिवासी गांवों के बीच दफनाया जाता है । यूरेनियम कारपोरेशन आफ इंडिया (यूसिल) लाख दावा करे कि खनन या कचरे का जन-जीवन पर कोई असर नहीं पड़ रहा है । पर हकीकत यह है कि पिछले तीन-चार सालों में यहां एक सैंकड़ा से अधिक असामयिक मौतें हुई हैं । खुद युसिल का रिकार्ड बताता है कि यूरेनियम खनन और उसके कचरे के निबटारे में लगे 21 लोग सन 1996 में मारे गए । ऐसे ही मरने वालों की संख्या 1995 में 14 और 1994 में 21 थी । ये सभी मौतें टीबी, ल्यूकेमिया, केंसर जैसी बीमारियों से हुई हैं और इसके मूल में रेडियो विकिरण ही था । उसके बाद कंपनी ने रिकार्ड को उजागर करना ही बंद कर दिया है, लेकिन गैरसरकारी आंकड़े बता रहे हैं कि साल का अंक बढ़ने के साथ-साथ मौत के आंकड़े भी बढ़ रहे हैं।
सिंहभूम जिले के सिविल सर्जन ने विकिरण से प्रभावित कई लोगों की पहचान भी की है । इलाके के आदिवासी विकिरण-मुक्त जीवन के लिए लगातार संघर्ष कर रहे हैं । पिछले कई सालों से आंदोलन, लाठीचार्ज, धरने, गिरफ््तारियां, उत्पीड़न यहां के बाशिंदों की नियति बन गया है । जब कोई मौत होती है तो गुस्सा भड़कता है । प्रशासन के आश्वासन मिलते हैं । ‘राष्ट्र गौरव’ की बेदी पर बलि होने के लिए एक बार फिर भूखे-मजबूर आदिवासियों की नई जमात खड़ी हो जाती है ।
रावतभाटा(राजस्थान) में परमाणु शक्ति से बिजली बनाने का संयत्र लगा है , लेकिन एटमी ताकत को बम में बदलने के लिए जरूरी तत्व जुटाने का भी यह मुख्य जरिया है । कुछ साल पहले गुजरात इंस्टीट्यूट आफ डेवलपमेंट रिसर्च ने रावतभाटा के आसपास 17 दिन तक विस्तृत अध्यन किया था । संस्था के लोगों ने कोई छह हजार घरों पर पड़ताल की थी । इन्होंने पाया कि रावतभाटा के करीबी गांवों में अन्य गांवों की तुलना में जन्मजात विकलांगता की दर तीन गुना अधिक है । गर्भपात, मरे हुए बच्चे पैदा होना, स्त्रियों में बांझपन आदि का प्रतिशत भी बहुत उंचा है । इस बिजली घर से पांच किमी दूर स्थित तमलाव गांव में बोन ट्यूमर, थायराइड ग्लैंड, सिस्टिक ट्यूमर जैसी बीमारियां हर घर की कहानी है । केंद्र के कर्मचारियों और वहां रहने वालों के बच्चे टेढ़े-मेढ़े हाथ-पांव और अविकसित अंग पैदाइशी होना आम बात हो गई है । यहां तक कि पशुओं की संख्या भी कम होती जा रही है । बकरियों में विकलांगता और गर्भपात की घटनाएं बढ़ी हैं ।
इस सर्वेक्षण में कई डाक्टर भी थे । उन्होंने स्पष्ट चेतावनी दी है कि विकिरण की थोड़ी सी मात्रा भी शरीर में परिवर्तन के लिए काफी होती है । विकिरण जीव कोशिकाओं को क्षति ग्रस्त करता है । इससे आनुवांशिकी कोशिकाओं में भी टूट-फूट होती है । आने वाली कई पीढि़यों तक अप्रत्याशित बीमारियों की संभावना बनी रहती है ।
शौर्य भूमि पोकरण में भव्य स्मृति स्थल बनाने के लिए करोड़ों का खर्चा करने के लिए आतुर संगठनों ने कभी यह जानने की जुर्रत नहीं की कि तपती मरूभूमि में जनजीवन होता कैसा है । परीक्षण-विस्फोट से डेढ़ सौ मकान पूरी तरह बिखर गए थे । साल भर के लिए पानी इकट्ठा रखने वाले ‘टांकों’ के टांके टूट गए । ऐवज में सरकार ने जो मुआवजा बांटा था उससे एक कमरा भी खड़ा नहीं होना था । धमाके के बाद जब इलाके में नाक से खून बहने और अन्य बीमारियों की खबरें छपीं तो खुद प्रधानमंत्री ने किसी भी तरह के विकिरण कुप्रभाव ना होने के बयान दिए थे । जबकि भूगर्भीय परीक्षण के बाद रेडियोधर्मी जहर के रिसाव की मात्रा और उसके असर पर कभी कोई जांच हुई ही नहीं है । राजस्थान विश्वविद्यालय के एक शोधकर्ता डा अग्रवाल ने पाया था कि 1974 में विस्फोट के बाद पोकरण व करीबी गांवों में केंसर के रोगियों की संख्या में बढ़ौतरी हुई है ।
पोकरण क्षेत्र सरकारी उपेक्षा का किस हद तक शिकार है, इसकी बानगी है कि यहां पेट पालने के लिए लोग अपने बच्चों को बेच रहे हैं । पोकरण और इसकी पड़ौसी पंचायत शिव के कोई एक दर्जन गांव-ढ़ाणियों से हर साल सैंकड़ों बच्चे ऊंट दौड़ के लिए खाड़ी देशों को जाते हैं । ये बच्चे 12 से 14 साल उम्र और 30-35 किलो वजन के होते हैं । इनका वजन नहीं बढ़े इसके लिए उन्हें खाना-पीना कम दिया जाता है । जेसलमेर जिले के भीखोडोई , फलसूंड , बंधेव , फूलोसर व राजमथाई और बाडमेर के उंडू , कानासर , आरंग , रतेउ ,केसुआ आदि गांवों के लड़के अरब देशों को गए हैं । ये गरीब मुसलमान , सुतार , राजपूत और जाट बिरादरी के हैं ।
अपने घरों के लिए पेट की जुगाड़ बने ये बच्चे जब विदेश से लौटे तो पैसा तो खूब लाए पर असामान्य हो गए । वे तुतलाने और हकलाने लगे । कई बच्चे शारीरिक और मानसिक रूप से विकलांग हो गए । हर समस्या की तरह इस पर भी सरकार का तो यही कहना है कि इलाके से कोई बच्चा नहीं गया है । पर वास्तविकता को यी बात उजागर करती है कि अकेले पोकरण से हर साल 30 से 50 पासपोर्ट बन रहे हैं । जेसलमेर जिले में हर साल डेढ़ हजार पासपोर्ट बन रहे हैं ।
‘जय जवान-जय किसान’  के साथ ‘‘जय विज्ञान ’’ के नारे की प्रासंगिकता पोकरण  के इस पहलू से संदिग्ध हो जाती है । इस घोर रेगिस्तान में ना तो उद्योग-धंधे खुल सकते हैं और ना ही व्यापार की संभावनाएं हैं । ऊपर से एक तरफ प्रकृति की मार है तो दूसरी ओर ‘जय विज्ञान’ का आतंक । आखिर किस बात का गौरव है ?
यह विडंबना ही है कि भारत में इन तीनों स्तर पर जन-जीवन भगवान भरोसे है । षायद इस बात का आकलन किसी ने किया ही नहीं कि परमाणु ताकत से बिजली बना कर हम जो कुछ पैसा बचाएंगे या कमाएंगे; उसका बड़ा हिस्सा जन-स्वास्थ्य पर खर्च करना होगा या फिर इससे अधिक धन का हमारा मानव संसाधन बीमारियों की चपेट में होगा।
आने वाली पीढ़ी के लिए उर्जा के साधन जोड़ने के नाम पर एटमी ताकत की तारीफ करने वाले लोगों को यह जान लेना चाहिए कि क्षणिक भावनात्मक उत्तेजना से जनता को लंबे समय तक बरगलाया नहीं जा सकता है । यदि हमारे देश के बाशिंदे बीमार, कुपोषित और कमजोर होंगे तो लाख एटमी बिजली घर या बम भी हमें सर्वशक्तिमान नहीं बना सकते हैं ।

पंकज चतुर्वेदी


Karnataka on atomic warning

कर्णाटक पर मंडराता परमाणु खतरा 


पिछले दिनों कर्नाटक पुलिस ने आतंकवादियों के ऐसे गिरोह को पकड़ा है, जो राज्य के कैगा स्थित परमाणु सयंत्र में धमाके करना चाहते थे। वैसे तो यह बात आम लोगों को समझ आने लगी है कि परमाणु ऊर्जा से बिजली पाना एक महंगा सौदा है, लेकिन कर्नाटक राज्य में परमाणु परियोजनाओं के लिए इस साजिश का खुलासा एक खतरे की घंटी है। यह खतरा अब आम लोग समझने लगे हैं कि यदि परमाणु बिजली घर से हो रहा रिसाव समुद्र में मिल गया तो कई-कई हजार किलोमीटर दूर तक के देशों में रेडिएशन की त्रासदी होना तय है। विडंबना है कि हमारा देश इस खतरे के प्रति आंखें मूंदे हुए है और अकेले कर्नाटक में 16 परमाणु रिएक्टर लगा दिए गए हैं। ऐसा भी नहीं कि राज्य के बिजली घरों पर पहले खतरे नहीं आए हों। कुछ साल पहले कैगा के परमाणु रिएक्टर के कोई 50 कर्मचारी बीमार हुए थे और तब पता चला था कि रिएक्टर कर्मचारियों के पानी में रेडियोएक्टिव जहर मिलाया गया था। पहले तो आम नागरिक ही नहीं राजनेता भी गदगद थे कि केंद्र सरकार उनके राज्य के विकास के लिए कितना क्या कर रही है। बड़े-बड़े सयंत्र लग रहे हैं, जिनसे बिजली के साथ-साथ रोजगार भी मिलेगा। जापान त्रासदी के बाद जब नींद खुली तो बहुत देर हो चुकी थी। आज अपने दुखद भविष्य की संभावनाओं से सिहर उठते कर्नाटकवासियों का यह सवाल अनुत्तरित ही है कि परमाणु परियोजनाओं का जखीरा उनके यहां जमा करने के लिए आखिर सरकार इतनी मेहरबान क्यों है। कुछ साल पहले समुद्र के भीतर कई किलोमीटर गहराई में आए भूचाल ने दक्षिणी राज्यों में प्रलय ला दिया था। हालांकि कर्नाटक इस तबाही से बचा रहा, लेकिन सुनामी के कारण तमिलनाडु के कलपक्कम परमाणु बिजलीघर की सुरक्षा को लेकर जो सवाल खड़े हुए हैं, उनसे कर्नाटक भी अछूता नहीं है। यही नहीं कर्नाटक जिस तरह से आतंकवादियों के लगातार निशाने पर है, उससे यहां के परमाणु रिएक्टर यहां के बाशिंदों के लिए खतरे का आगाज ही हैं। हमारे देश के परमाणु ऊर्जा विभाग की मौजूदा कुल 55 परियोजनाओं में से 16 कर्नाटक में हैं। आने वाले दिनों में देश की परमाणु ऊर्जा निर्भरता पूरी तरह इस राज्य पर होगी। हालात इतने दूभर होंगे कि दुर्भाग्यवश किसी एक परियोजना में कोई दुर्घटना हो गई या फिर बाहरी हमला हो गया तो समूचे दक्षिणी भारत का नामोनिशान मिट जाएगा। परमाणु उर्जा केंद्रों की स्थापना भले ही शांतिपूर्ण कायोंर् के लिए की गई हो पर वे हमारी सुरक्षा व्यवस्था के लिए तो खतरा होते ही हैं। इससे अधिक भयावह यह है कि समूचे राज्य में हवाई हमलों से बचने के लिए न तो सुरक्षित बंकर हैं और न ही परमाणु विस्फोट से आहतों की देखभाल के लिए विशेष अस्पताल। और फिर सुनामी ने खतरों की नई चुनौती खड़ी कर दी है।कैगा में परमाणु रिएक्टरों की संख्या छह हो गई है। प्रदेश के उत्तरी कन्नड़ा क्षेत्र में यूरेनियम का खनन होता है। इसकी पीले रंग की टिकिया बना कर परिष्करण के लिए हैदराबाद भेजा जाता है। वहां से प्राप्त धातु का इस्तेमाल कैगा में बिजली बनाने के लिए होता है। हालांकि सरकारी तौर पर कभी नहीं स्वीकारा जाता है कि हैदराबाद से आए परिष्कृत यूरेनियम को रतनहल्ली स्थित ‘अतिगोपनीय’ रेयर अर्थ मटेरियल प्लांट में भी भेजा जाता है। बंगलुरु में एटोमिक रिसर्च लेबोरेट्री है और गौरीबिडनूर में भूकंप अनुसंधान केंद्र। कोलार स्वर्ण खान यानी केपीएफ की बेकार हो गई जमीन में परमाणु सयंत्रों से निकले कचरे को दफनाने के निर्णय ने तो इलाके में दहशत फैला दी है। परमाणु कचरे को कांचन तकनीक यानी विट्रीफीकेशन के जरिए कांच में मिलाया जाएगा फिर इसे तहखानों में गाड़ेंगे। बहरहाल वैज्ञानिक इस प्रक्रिया को पूरी तरह निरापद बताते हैं, लेकिन सदियों तक सक्रिय रहने वाले रेडियो एक्टिव संक्रमण का खौफ तो बरकरार रहेगा ही। यह एक कड़वा सच है कि हमारे वैज्ञानिकों ने इस तरह परमाणु कचरे के निबटान के दूरगामी परिणामों पर ढंग से सोचा ही नहीं है।गोगी-गुलबर्गा, अराबाइलु-बिस्कोडउत्तरी कन्नड़ा और भरमसागर-चिकमंगलूर में यूरेनियम की खोज के लिए खुदाई चल रही है। यूरेनियम कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया यानी यूसिल ने बलकुंज-दक्षिण कन्नड़ा, अदवी-धारवाड़ और देवगंधनहल्ली-चिकमंगलूर में कुछ स्थानों को यूरेनियम खनन के लिए चुना है। सनद रहे यूरेनियम खनन के गंभीर खतरों के मद्देनजर कनाडा, स्वीडन जैसे देशों ने अपनी जमीन पर ऐसे खनन पर पूर्णतया पाबंदी लगा रखी है। ये देश परमाणु ऊर्जा के इस ईंधन को पाने के लिए कांगों सरीखे तीसरी दुनिया के विपन्न देशों को आसरा बनाए हुए हैं। याद हो यूरेनियम की खुदाई का महज एक फीसदी ही इस्तेमाल होता है। शेष रह गए जानलेवा रेडियोधर्मी खनिज को हवा, पानी और प्रकृति के भरोसे लावारिस छोड़ दिया जाता है। भारत में अभी तक यूरेनियम खनन के दौरान सुरक्षा के उपायों पर गंभीरता से विचार ही नहीं किया गया है। कैगा के बिजलीघर के विकास के अगले चरण में तीन और रिएक्टर लगाए जा रहे हैं। समाज के हर तबके से इसके विरोध में आवाजें उठ रही हैं। प्रसिद्ध लेखक व पर्यावरणविद् डॉ. शिवराम कारंत ने कैगा में परमाणु सयंत्र लगाने के औचित्य पर याचिका अदालत में लगाई थी। भूगर्भ वैज्ञानिकों के अनुसार कैगा भूकंप संभावित क्षेत्र में आता है। यह क्षेत्र प्राकृतिक वैविध्य से भरपूर, सदाबहार समसीतोष्ण वर्षा जंगल के ठीक बीच में स्थित है। इन जंगलों में सुपारी और इलायची का खेती होती है, जो हजारों किसानों के जीवनयापन का जरिया है। यहां मध्यम और बड़ी कुल आठ पन बिजली परियोजनाएं हैं, जिनमें से कुछ तो ठीक जल उदगम स्थल पर हैं। करीब ही स्थित कालिंदी नदी पेय जल का स्रोत है। दुर्भाग्य यह है कि इतना सबकुछ महाराष्ट्र के लिए हो रहा है। यहां तक कि इसके निर्माण कार्य में कर्नाटक सरकार की कोई भूमिका नहीं है। हां, इन परियोजनाओं के लिए सड़क, पानी सरीखी आधारभूत सुविधाएं जुटाने की जिम्मेदारी जरूर प्रदेश शासन पर है। उदाहरण के लिए काली नदी पर बनाए गए कद्रा बांध को ही लें। इसका निर्माण महज इसलिए किया गया है कि कैगा परमाणु सयंत्रों के टावरों को ठंडा रखने के लिए आवश्यक पानी लगातार मिलता रहे। भगवान न करे यदि रिसाव या लीकेज हो गया तो मंगलौर से ले कर गोवा तक के अरब सागर तट पर रहने वाले लाखों लोगों का जीवन नरक हो जाएगा। गोपनीय और रहस्यमयी रेयर अर्थ मटेरियल प्लांट, रतनहल्ली को ही लें। यह बात प्रशासन सदैव छिपाता रहा है कि कावेरी नदी पर बने केआरएस बांध की झील के जलग्रहण क्षेत्र पर स्थित इस कारखाने में बनता क्या है। लेकिन दबी जुबान चर्चा यही है कि यहां परमाणु बम का मूल मसाला बनता है। हो सकता है कि सामरिक महत्व के कारण इस सयंत्र का खुलासा करना संभव न हो। पर इस गोपनीयता की आड़ में लाखों लोगों के जीवन के साथ खिलवाड़ करना कहां तक उचित है। यहां का रेडियो एक्टिव प्रदूषण हवा, पानी और मिट्टी के जरिए लोगों के शरीर को खोखला बना रहा है। संयंत्र में उपजे भारी ताप को शांत करने के लिए केआरएस बांध से ही पानी लिया जाता है और फिर उसे यहीं बहा भी दिया जाता है। जबकि यह बात सर्वविदित है कि संयंत्र की निकासी में यूरेनियम-235, 238 और 239 के लेथल आईसोटोप्स की बड़ी मात्रा होती है। इस बांध से मांडया और मैसूर में लाखों एकड़ खेत सींचे जाते हैं, बंगलुरु शहर को पेय जल का आपूर्ति भी होती है।कर्नाटक में यूरेनियम की उपलब्धता के अलावा और क्या कारण हैं कि इसे परमाणु सरीखे संवेदनशील मामले के लिए निरापद माना गया? सरकारी जवाब है कि यह प्रदेश भारत के पारंपरिक दुश्मन राष्ट्रों चीन और पाकिस्तान से पर्याप्त दूरी पर है। लेकिन कभी यह नहीं विचारा गया कि अंतरराष्ट्रीय समग्र परिदृश्य में पड़ोसी देशों के बनिस्पत अमेरिका भारत के लिए बड़ा खतरा है। भौगोलिक रूप से अमेरिका समुद्री तटों से लाखों किमी दूरी पर बेहद सुरक्षित है। लेकिन उसके दियागो-गार्सिया स्थित फौजी छावनी की कन्याकुमारी से दूरी मात्र 1500 किमी है। इस छावनी में कम से कम 35 एटमी मिसाइलें भारत के प्रमुख शहरों को निशाना बना कर तैनात हैं। जाहिर है कि इनमें से कई एक का निशाना कर्नाटक के परमाणु सयंत्र होंगे ही। गौरतलब है कि कोई भी पड़ोसी देश परमाणु हथियार का इस्तेमाल कर खुद भी उसके प्रकोप से बच नहीं सकता है। इस तरह के खतरे दूरस्थ दुश्मनों से ही अधिक हैं।कर्नाटकवासी मानते हैं कि उनका सीधा-साधा स्वभाव इस आफत का बड़ा कारण है। याद हो केरल की समुद्री रेत में मौजूद मोनाजाइट से ‘थोरियम’ के प्रसंस्करण की अच्छी संभावनाएं हैं। लेकिन वहां के जागरूक लोगों के विरोध के चलते ऐसा नहीं हो पा रहा है। आंध्र प्रदेश में नार्गाजुन बांध के समीप परमाणु संयंत्र लगाने की योजना 1980 में भारी विरोध के कारण निरस्त करनी पड़ी थी। भारत में परमाणु ऊर्जा के प्रारंभिक योजनाकार और परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष रहे डॉ. राजा रामन्ना मूल रूप से कर्नाटक के ही थे। इस राज्य में परमाणु ऊर्जा की इतनी अधिक योजनाओं का एक कारण यह भी माना जाता है।1986 में इंग्लैंड के एक सांसद टोनी बेन ने कहा था कि परमाणु ऊर्जा वह तकनीक है, जिस पर पूर्ण नियंत्रण रख पाना मानव समाज के बस की बात नहीं है। प्राकृतिक संपदाओं और नैसर्गिक खूबसूरती के बीच पारंपरिक जीवन जीने के आदी कर्नाटकवासियों को विकास के नाम पर मौत की सौगात देने वाले योजनाकारों को पिछले दिनों आए समुद्री कहर को दृष्टिगत रख कर्नाटक में इतनी सारी परमाणु परियोजनाओं पर पुनर्विचार करना चाहिए।

The right to a dignified farewell and a new standard in medical world

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