My writings can be read here मेरे लेख मेरे विचार, Awarded By ABP News As best Blogger Award-2014 एबीपी न्‍यूज द्वारा हिंदी दिवस पर पर श्रेष्‍ठ ब्‍लाॅग के पुरस्‍कार से सम्‍मानित

रविवार, 18 मार्च 2018

India an open market for banned medicines

प्रतिबंधित दवाओं की खुली मंडी बनता भारत

पंकज चतुर्वेदी


इन दिनों बड़ा हल्ला है कि आक्सीटोसीन नामक इंजेक्शन से सब्जियां और दूध को जहरीला बना कर बेचा जा रहा है। संसद में भी इस पर चर्चा भी हुई। लेकिन यह कोई नहीं बता रहा है कि इस कथित जहरीले इंजेक्शन का उत्पादन करने, बेचने की मंजूरी इसी सरकार में बैठे लोग दे रहे हैं। क्या इंजेक्शन के कारखाने अवैध चल रहे हैं ? हकीकत तो यह है कि बाजार में बेची जा रही दवाओं के विपरीत प्रभावों के अध्ययन के लिए किसी संगठित व्यवस्था के अभाव में भारत का बाजार प्रतिबंधित दवाओं की मंडी बनता जा रहा है । यह दुर्भाग्य है कि कौन सी दवा उपयोगी है और कौन सी षरीर पर गलत असर डालती है, यह जानने के लिए भारत पूरी तरह पश्चिमी देशों पर निर्भर है । इसके बावजूद हम ऐसी कई दवाओं की धड़ल्ले से बिक्री कर रहे हैं, जिनके इस्तेमाल पर पश्चिमी देशों ने कड़ी पाबंदी लगा रखी है ।

नोवाल्जीन के नाम से बिकने वाले दर्दनिवारक का मूल तत्व एनाल्जीन है । इसकेा खाने से ‘‘अस्थि-मज्जा अवसाद ’’ की बीमारी होने की संभावना होती है । इस खतरे के कारण इसकी बिक्री पश्चिमी देशों में प्रतिबंधित है , लेकिन हमारे देश में तो इसे खरीदने के लिए डाक्टर के पर्चे की भी जरूरत नहीं है । इसी तरह एसीडीटी और कब्ज के लिए बाजार में बिक रही दवा सीजा व सिस्प्राईड(साईजाप्राईड), अवसाद-निरोधी दवा ड्रोपेराल(ड्रोपेराइडाल), भी प्रतिबंधित श्रेणी की दवाए हैं , जिनसे दिल की धड़कन अनियमित होने की संभावना होती है । पश्चिमी देशों के वैज्ञानिकों के षोध बताते हैं कि दस्त के लिए दी जाने वाली दवाएं फ्यूरोक्सन व लोमोफेन ; वेक्टेरिया से बचने के लिए लगाई जाने वाली क्रीम फ्यूरासीन(नाईट्रोफ्यूरोजोन) ; शिथिलता की बीमारी से बचने की दवाई एगारोल(फेनोल्फ्थेलीन) के इसत्ेमाल से कैंसर होने की संभावना प्रबल हो जाती है । इसी कारण समूचे विकसित देशों ने इन दवाओं की खरीद-बिक्री पर रोक लगा रखी है । लेकिन भारत में यह सभी दवाएं खुलेआम बेखौफ बिक रही है ।
nivan times ghaziabad 

निम्यूलीड व नाईस के नाम से बिकने वाली दर्दनिवारक व बुखार की दवा हमारे देश की सबसे अधिक बिकने वाली औशधियों में से एक है । इसमें मौजूद निमेस्यूलाईड लीवर खराब कर सकता है ।  पेट में कीड़े होने पर बच्चों को दी जाने वाली दवा पिपराजीन स्नायु-तंत्र को छिन्न-भिन्न कर देती है । इसके बावजूद हमारे देश में यह दूरस्थ अंचलों तक सुलभ है । दिमागी कमजोरी के इलाज में प्रयुक्त एरलाईडिन, क्लेंडल, कप्लेमाईना, साईक्लोपेस मोल, फ्लेक्साईटल, फ्लोपेंट, काईनेटाल 400, आर.बी.फ्लेक्स, सुपरोक्स, ट्रेंटल जैसी दवाओं के दिमागी इलाज में उपयोगी होने को आज तक किसी भी अधिकृत संस्था ने प्रमाणित नहीं किया है । इसी तरह सेरेसेटम, सेरेलोईंड, इनसेफेबाल, हाईडरजीन, गिंकोसर, नुट्रोपील 800, पाईरेटम, वेसोटोप आदि में कोई ऐसा तत्व नहीं हैं जो मानसिक रोगों में कुछ फायदा दे ।
बाजार में इन दिनों भूख बढ़ाने वाली दवाओं का बोलबाला है, जिनमें विशेष रूप से साईप्रोहेप्डीन तथा ब्यूसीजीन मुरव्य अवयव होता है । ऐसी 30 से अधिक दवाएं प्रचलित है, जो नवजात शिशुओं या समय से पूर्व पैदा बच्चों के लिए जानलेवा हो सकती हैं । इन दवाओं के इस्तेमाल से मतिभ्रम, ऐंठन और मौत तक संभव है । इससे मानसिक सक्रियता में कमी आने के भी असंख्य उदाहरण उपलब्ध हैं ।
अमेरिकी सरकार ने मोटापा घटाने वाली दो सर्वाधिक लोकप्रिय दवाओं पर पाबंदी लगा दी है । ‘रीडक्स’ एक ऐसी दवा है जिसका सेवन दुनिया भर में 50 लाख से अधिक लोग अपनी काया सुडोल बनाने के लिए करते हैं । इस दवा के कारगर होने की प्रक्रिया शरीर के ‘मूल आचार व्यवहार में परिवर्तन’ के माध्यम से संचालित होती है ।  मोटापा घटाने की एक और प्रचलित दवा ‘पांडीमीन’ के कारण जानलेवा ह्नदय रोग हो सकते हैं । इन दवाओं के कुप्रभावों पर जब हल्ला मचा तो ‘रीडक्स’ और ‘पांडीमीन’ को बाजार से हटा लिया गया । गौरतलब है कि ये दोनों दवाएं एफडीए (फूड एंड ड्रग्स एडमिनिस्ट्रेशन) से मंजूरी प्राप्त हैं । वास्तव में इन दवाओं को एफडीए की मंजूरी केवल ‘अतिस्थूल मरीजों’ के इलाज के लिए थी , जबकि डाक्टरों और सुडौल बनाने की दुकान चलाने वालों ने इसका इस्तेमाल थोड़ी सी चर्बी बढ़ने पर ही करना शुरू कर दिया था । यही नहीं इस ‘मेजिक मेडीसीन’ की अंधाधुंध खुराकें भी दी गईं, जिसके चलते फायदे के बनिस्पत नुकसान अधिक हुआ । सनद रहे पांडीमीन के दुष्प्रभाव की जानकारी उसकी खोज के 24 साल बाद हो पाई थी ।
1995 में ‘रीडक्स’ को मंजूरी के लिए एफडीए के पास भेजते समय ही पता चल गया था कि इस दवा के परीक्षण के दौरान जानवरों के दिमाग पर विपरित प्रभाव डाला था । पैसा कमाने की हवस में कंपनी ने इस तथ्य को छुपाए रखा । आज अकेले अमेरिका में सौ से अधिक ऐसे मामले प्रकाश में आए हैं, जिसमें इस दवा का सेवन करने वालों के ह्नदय वाल्व क्षतिग्रस्त हो गए हैं । साथ ही दवा खाने वाले 30 फीसदी लोगों में बगैर किसी पूर्व लक्षण के दिल का वाल्व खराब होने की संभावना देखी गई ।
सजीव इंद्रियों में क्रोमोजोस की संरचना में परिवर्तन कर खेती, औषधि आदि क्षेत्रों में क्रांतिकारी शोध करना आनुवांशिकी इंजीनियरिंग का उद्देश्य रहा हैं । लेकिन अमेरिका में ही पांच हजार से अधिक ऐसे लोग, जो ईएमएस (इस्नोफीलिया मायलजिया सिंड्राम) से पीड़ित हैं , आनुवांशिकी इंजीनियरिंग से लोक कल्याणकारी इरादों के सामने सवालिया निशान बने हुए हैं । इस बीमारी का मुरव्य कारण वैकल्पिक आहार के रूप में प्रयुक्त ‘एल ट्रायप्टफेन’ नामक दवा का इस्तेमाल बताया जा रहा है । आनुवांशिकी इंजीनियरिंग के तहत पुन संयोजित डी.एन.ए. तकनीकी से इंटरफेरोन, इंसुलिन, हार्मांेंस आदि चिकित्सीय प्रोटिनों का उत्पाद होता है । इंटरफेरोन का निर्माण मानव शरीर के ऊतकों और रक्त कोशिकाओं से किया जाता है । इसका प्रयोग शक्तिशाली प्रति-विषाणु कारक एजेंट के रूप में होता है । चूंकि इसे मानव शरीर से प्रप्त करने की प्रक्रिया खासी जटिल और महंगी है, सो इसके उत्पादन के लिए वेक्टेरिया प्रणाली अपनाने के प्रयोग हो रहे हैं । यहां जानना जरूरी है कि जिस मानव शरीर से इंटरफेरोन का संश्लेषण किया जाता है, उसके आनुवांशिकी जटिल रोगों का उससे निर्मित दवा खाने वाले पर गंभीर असर होता है । इसी प्रकार इंसुलिन का निष्कर्षण गाय और सुअर के अग्नाशय से किया जाता है । कई मामलों में पशु-इंसुलिन से एलर्जी हो जाने की शिकायत सामने आई है ।
अमेरिका ओर यूरोपीय देशों में जब ऐसी घातक दवाओं के उपयोग पर पाबंदी लगी तो पेंटेंटधारी बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने भारत जैसे विकासशील देशों को अपना बाजार बना लिया है । आज भारत के बाजार में सैंकड़ो ऐसे दवाएं धड़ल्ले से बिक रही हैं, जिनकी रोग निरोधक क्षमता संदिग्ध है । कई दवाओं पर सरकार ने पाबंदी लगा रखी है, और कई एक के घातक असर को देखते हुए उन पर रोक लगाना जरूरी है । कुछ ऐसी दवाएं भी बाजार में बिक रही हैं, जिनके माकूल होने की जांच आज तक किसी अधिकृत संस्था से नहीं हुई है ।
पंकज चतुर्वेदी
यू जी-1, 3/186, सेक्टर-2 राजेन््रदनगर
 साहिबाबाद
गाजियाबाद 201005

बुधवार, 14 मार्च 2018

Without better coordination forces can not win over naxalism

अविश्वास  पर टिके पुलिस-तंत्र के बस का नहीं है नक्सलवाद से निबटना। 

पंकज चतुर्वेदी 

पिछले एक साल के दौरान अकेले सुकमा जिले में यह सातवां हमला है सुरक्षा बलों पर जिसमें नौ जवान वीरगति को प्राप्त हुए। एक राज्य के एक छोटे से हिस्से में(हालांकि यह हिस्सा केरल राज्य के क्षेत्रफल के बराबर है ) स्थानीय पुलिस, एसटीएफ, सीआरपीएफ और बीएसएफ की कई टुकड़ियां मय हेलीकॉप्टर के तैनात हैं और हर बार लगभग पिछले ही तरीके से सुरक्षा बलों पर हमला होता है। नक्सली खबर रखते हैं कि सुरक्षा बलों की पेट्रोलिंग पार्टी कब अपने मुकाम से निकली व उन्हें किस तरफ जाना है। वे खेत की मेंढ तथा ऊंची पहाड़ी वाले इलाके की घेराबंदी करते हैं और जैसे ही सुरक्षा बल उनके घेरे के बीच पहुंचते है।, हमला कर देते हैं। इस बार यह हमला किस्टाराम से कोई तीन किलोमीटर दूर हुआ। सीआरपीएफ की 212वीं बटालियन के 9 जवान शहीद हुए व दो गंभीर रूप से घायल हैं। असल में इस  शहादत का कारण सिस्टम की लापरवाही और जवानों के पास मौजूद घटिया सामग्री है।
विडंबना यह है कि पिछले सात सालों में ठीक इसी तरह नक्सली छुप कर सुरक्षा बलों को फंसाते रहे हैं और वे खुद को सुरक्षित स्थानों पर ऊंचाई में अपनी जगह बना कर सुरक्षा बलों पर हमला करते रहे हैं। हर बार पिछली घटनाओं से सबक लेने की बात आती है, लेकिन कुछ ही हफ्ते में सुरक्षाबल पुराने हमलों को भूल जाते हैं व फिर से नक्सलियों के फंदे में फंस जाते हैं। इस बार एक तो इंटेलीजेंस की मजबूत खबर थी कि बीते तीन महीनों से नक्सली किसी बड़ी वारदात की फिराक में हैं। दूसरा उसी दिन सुबह  सुबह सात बजे पेट्रोलिंग पार्टी की मुठभेड़ नक्सालियों  से घटनास्थल के पास ही हुई व जवान इस झांसे में रहे कि नक्सली डर कर भाग गए। पुरानी गलतियों से सबक लिए बगैर यह पार्टी फिर से 12 बजे निकल पड़ी और चालबाज नक्सलियों की बारूदी सुरंग की चपेट में आ गई। इस बार जवान एमपीवी यानि माईंस प्रोटेक्टेड व्हीकल में थे। सनद रहे कि जो वाहन खासतौर पर लेंड माईन्य से निबटने को बना  हो और वही ध्माके में उड़ जाए, जाहिर है कि इस वाहन की गुणवत्ता संदिग्ध है। एक बात और कुछ ऐसी ही सुगबुगाहट के चलतें सन 2013 में इस वाहन के इस्तेमाल पर सरकार ने ही पाबंदी लगा दी थी, लेकिन बस्तर के जंगलो में सीआरपीएफ अभी भी इसे इस्तेमाल कर रहा है। यही नहीं जवान जवानों ने अपने शस्त्र से चार यूबीबीएल फायर किए और इनमें से एक भी गोला फटा नहीं। यदि एक भी गोला फटता तो कम से कम दस नक्सली मारे जाते। यह बानगी है कि घनघोर जंगलों में नक्सलियों से निबटने में लगे जवानों को उपलब्ध अस्त्र-शस्त्र किस दोयम दर्जे के हैं।
यहां एक बात और गौर करने वाली है कि बस्तर इलाके में नक्सली हमले में अक्सर सीआरपीएफ के जवान ही शहीद होते हैं। स्थानीय पुलिस बल जंगल की रपिस्थितियों, भाषा आदि से वाक्फि होता है सो वह उनके जाल में कम फंसता है। दुखद यह है कि केंद्रीय बलों व स्थानीय ुपलिस के बीच भयंकर अविश्वस है। केंद्रीय बल स्थानीय पुलिस पर भरोसा नहीं करते और स्थानीय ुपलिस वर्चस्व या श्रेय लेने की होड़ में जानकारियों को साझा करने में परहेज करती है। अभी तीन महीने पहले ही किस्टाराम से तीन किलोमीटर दूर पलाड़ी में एक नया कैंप स्थापित किया गया था। पहले उसमें जिला आरक्षित पुलिस बल तैनात था। अचानक ही उन्हें हटा कर यहां सीआरपीएफ को भेज दिया गया और उसके पचास दिन में ही यह हमला हो गया।
बदले, प्रतिहिंसा और प्रतिषोध की भावना केे चलते ही देष के एक तिहाई इलाके में लाल सलाम‘ की आम लोगों पर पकड़ सुरक्षा बलों से ज्यादा  है। बदला लेने के लिए गठित सलवा जुडुम पर सुपी्रम कोर्ट की टिप्पणी भी याद करें। बस्तर केे जिस इलाके में सुरक्षा बलों का खून बहा है, वहां स्थानीय समाज दो पाटों के बीच पिस रहा है और उनके इस घुटनभरे पलायन की  ही परिणति है कि वहां की कई लोक बोलियां लुप्त हो रही हैं। धुरबी बोलने वाले हल्बी वालों के इलाकों में बस गए हैं तो उनके संस्कार, लोक-रंग, बोली सबकुछ उनके अनुरूप हो रही है। इंसान की जिंदगी के साथ-साथ जो कुछ भी अकल्पनीय नुकसान हो रहे हैं, इसके लिए स्थानीय प्रषासन की कोताही ही जिम्मेदार है। नक्सलियों का अपना खुफिया तंत्र सटीक है जबकि प्रषासन खबर पा कर भी कार्यवाही नहीं करता। खीजे-हताष सुरक्षा बल जो कार्यवाही करते हैं, उनमें स्थानीय निरीह आदिवासी ही षिकार बनते हैं और यही नक्सलियों के लिए मजबूती का आधार होता है।
बस्तर के संभागीय मुख्यालय जगदलपुर से सुकमा की ओर जाने वाले खूबसूरत रास्ते का विस्तार आंध्र प्रदेष के विजयवाड़ा तक है। इस पूरे रास्ते में बीच का कोई साठ किलोमीटर का रास्ता है ही नहीं और यहां चलने वाली बसें इस रास्ते को पार करने में कई घंटे ले लेती हैं। सड़क से सट कर उडिसा का मलकानगिरी जिला पड़ता है जहां बेहद घने जंगल हैं। कांगेर घाटी और उससे आगे झीरम घाटी की सड़कों पर कई-कई सौ मीटर गहराई की घाटियों हैं, जहां पारंपरिक षीषम, साल के पेड़ों की घनी छाया है। कुछ दिन पहले ही दस नक्सिलियों को मार कर पुलिस बल ने दावा किया था कि अब जंगल में विद्रोही आतंकी बचे नहीं हैं। उधर राज्य की पुलिस पिछले कुछ महीनों से कथित आत्मसमर्पण करवा कर यह माहौल बनाने में लगी थी कि अब नक्सलियों की ताकत खतम हो गई है। इसके बावजूद पुलिस का खुफिया तंत्र उनकी ठीक स्थिति जानने में असफल रहा।यही नहीं केंद्र सरकार के गृृह विभाग ने भी चेतावनी भेजी थी कि नक्सली कुछ हिंसा कर सकते हैं। इसमें सुरक्षा बलों पर हमला, जेल पर हमला आदि की संभावना जताई गई थी। फिर भी चेतावनियों से बेपरवाह सुरक्षा बल लापरवाही से जंगल में घुस तो गए, लेकिन गहरे चक्रव्यू में फंस गए।
अब भारत सरकार के गृहमंत्रालय की 12 साल पुरानी एक रपट की धूल हम ही झाड़ देते हैं - सन 2006 की ‘‘आंतरिक सुरक्षा की स्थिति’’ विषय पर रिपोर्ट में स्पष्ट बताया गया था कि देश का कोई भी हिस्सा नक्सल गतिविधियों से अछूता नहीं है। क्योंकि यह एक जटिल प्रक्रिया है - राजनीतिक गतिविधियां, आम लोगों को प्रेरित करना, शस्त्रों का प्रशिक्षण और कार्यवाहियां। सरकार ने उस रिपोर्ट में स्वीकारा था कि देश के दो-तिहाई हिस्से पर नक्सलियों की पकड़ है। गुजरात, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर में भी कुछ गतिविधियां दिखाई दी हैं। दो प्रमुख औद्योगिक बेल्टों - ‘भिलाई-रांची, धनबाद-कोलकाता’ और ‘मुंबई-पुणे-सूरत-अहमदाबाद’ में इन दिनों नक्सली लोगों को जागरूक करने का अभियान चलाए हुए हैं। इस रपट पर कार्यवाही, खुफिया सूचना, दूरगामी कार्ययाोजना का कहीं अता पता नहीं है। बस जब कोई हादसा होता है तो सषस्त्र बलों को खूनखराबे के लिए जंगल में उतार दिया जाता है, लेकिन इस बात पर कोई जिम्मेदारी नहीं तय की जाती है कि तीन सौ नक्सली हथियार ले कर घंटों तक गोलियां चलाते हैं, सड़कों पर साठ किलो तक की लैंड माईन्स लगाई जाती है और मुख्य मार्ग पर हुई इतनी बड़ी योजना की खबर किसी को नहीं लगती है।
एक तरफ सरकारी लूट व जंगल में घुस कर उस पर कब्जा करने की बेताबी है तो दूसरी ओर आदिवासी क्षेत्रों के संरक्षण का भरम पाले खून बहाने पर बेताब ‘दादा’ लोग। बीच में फंसी है सभ्यता, संस्कृति, लोकतंत्र की साख। नक्सल आंदोलन के जवाब में ‘सलवा जुड़ुम’ का स्वरूप कितना बदरंग हुआ था और उसकी परिणति दरभा घाटी में किस नृषंसता से हुई ; सबके सामने है। बंदूकों को अपनों पर ही दाग कर खून तो बहाया जा सकता है, नफरत तो उगाई जा सकती है, लेकिन देष नहीं बनाया जा सकता। तनिक बंदूकों को नीचे करें, बातचीत के रास्तें निकालें, समस्या की जड़ में जा कर उसके निरापद हल की कोषिष करें- वरना सुकमा की दरभा घाटी या बीजापुर के आर्सपेटा में खून के दरिया ऐसे ही बहते रहेंगे। लेकिन साथ ही उन खुफिया अफसरों, वरिश्ठ अधिकारियों की जिम्मेदारी भी तय की जाए जिनकी लापरवाही के चलते सात सुरक्षाकर्मी के गाल में बेवहज समा गया। सनद रहे उस इलाके में खुफिया तंत्र विकसित करने के लिए पुलिस को बगैर हिसाब-किताब के अफरात पैसा खर्च करने की छूट है और इसी के जरिये कई बार बेकार हो गए या फर्जी लोगों का आत्मसमर्पण दिखा कर पुलिस वाहवाही लूटती हैं। एक बात और, अभी तक बस्तर पुलिस कहती रही कि नक्सली स्थानीय नहीं हैं और वे सीमायी तेलंगाना के हैं, लेकिन इस बार उनकी गोंडी सुन कर साफ हो जाता है कि विद्रोह की यह नरभक्षाी ज्वाला बस्तर के अंचलों से ही हैं।  गौरतलब है कि चार सौ से ज्यादा नक्सली मय हथियार के जमा होते रहे व खुफिया तंत्र बेखबर रहा, जबकि उस इलाके में फोर्स के पास मानवरहित विमान द्रोण तक की सुविधा है।
यह हमला उन कारणों को आंकने का सही अवसर हो सकता है जिनके चलते आम लोगों का सरकार या पुलिस से ज्यादा नक्सलियों पर विष्वास है, यह नर संहार अपनी सुरक्षा व्यवस्था व लोकतांत्रिक प्रक्रिया में आए झोल को ठीक करने की चेतावनी दे रहा है, दंडकारण्य में फैलती बारूद की गंध नीतिनिर्धारकों के लिए विचारने का अवसर है कि नक्सलवाद को जड से उखाडने के लिए बंदूक का जवाब बंदूक से देना ही एकमात्र विकल्प है या फिर संवाद का रास्ता खोजना होगा या फिर एक तरफ से बल प्रयोग व दूसरे तरफ से संवाद की संभावनाएं खोजना समय की मांग है। आदिवासी इलाकांे की कई करोड अरब की प्राकृतिक संपदा पर अपना कब्जा जताने के लिए पूंुजीवादी घरानों को समर्थन करने वाली सरकार सन 1996 में संसद द्वारा पारित आदिवासी इलाकों के लिए विषेश पंचायत कानून(पेसा अधिनियम) को लागू करना तो दूर उसे भूल ही चुकी है। इसके तहत ग्राम पंचायत को अपने क्षेत्र की जमीन के प्रबंधन और रक्षा करने का पूरा अधिकार था। इसी तरह परंपरागत आदिवासी अधिनियम 2006 को संसद से तो पारित करवा दिया लेकिन उसका लाभ दंडकारण्य तक नहीं गया, कारण वह बड़े धरानों के हितों के विपरीत है। असल में यह समय है उन कानूनों -अधिनियमों के क्रियान्वयन पर विचार करने का, लेकिन हम बात कर रहे हैं कि जनजातिय इलाकों में सरकारी बजट कम किया जाए, क्यांेकि उसका बड़ा हिस्सा नक्सली लेव्ही के रूप में वसूल रहे हैं।



मंगलवार, 13 मार्च 2018

Traditional water tank can fight with drought

 तालाबों को सहेजने की दरकार


अगर जल संकट ग्रस्त इलाकों के सभी तालाबों को मौजूदा स्थिति में भी बचा लिया जाए तो वहां के हर खेत को सिंचाई, सभी को पेयजल और लाखों हाथों को रोजगार मिल सकता है

dainik jagran, national edition, 14-3-18

अब तो देश के 32 फीसद हिस्से को पानी की किल्लत के लिए गरमी के मौसम का इंतजार भी नहीं करना पड़ता है-बारहों महीने वहां जेठ ही रहता है। सरकार संसद में बता चुकी है कि देश की 11 फीसद आबादी साफ पीने के पानी से महरूम है। दूसरी तरफ यदि कुछ दशक पहले पलट कर देखें तो आज पानी के लिए हाय-हाय कर रहे इलाके अपने स्थानीय स्रोतों की मदद से ही खेत और गले दोनों के लिए अफरात पानी जुटाते थे। एक दौर आया कि अंधाधुंध नलकूप रोपे जाने लगे, जब तक संभलते जब तक भूगर्भ का कोटा साफ हो चुका था। समाज को एक बार फिर बीती बात बन चुके जल-स्रोतों जैसे-तालाब, कुंए, बावड़ी की ओर जाने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। 1विशेषज्ञों का कहना है कि तालाबों से सिंचाई करना आर्थिक दृष्टि से लाभदायक और अधिक उत्पादक होता है। उनका सुझाव है कि पुराने तालाबों के संरक्षण और नए तालाब बनाने के लिए ‘भारतीय तालाब प्राधिकरण’ का गठन किया जाना चाहिए। पूर्व कृषि आयुक्त बीआर भंबूला का मानना है कि जिन इलाकों में सालाना बारिश का औसत 750 से 1150 मिलीमीटर है, वहां नहरों की अपेक्षा तालाब से सिंचाई अधिक लाभप्रद होती है।1अभी एक सदी पहले तक बुंदेलखंड के इन तालाबों की देखभाल का काम पारंपरिक रूप से ढीमर समाज के लोग करते थे। वे तालाब को साफ रखते थे। उसकी नहर, बांध, जल आवक को सहेजते थे। बदले में तालाब की मछली, सिंघाड़े और समाज से मिलने वाली दक्षिणा पर उनका हक होता था। इसी तरह प्रत्येक इलाके में तालाबों को सहेजने का जिम्मा समाज के एक वर्ग ने उठा रखा था। तालाब तो लोक की संस्कृति का अभिन्न अंग हैं। इन्हें सरकारी बाबुओं के जिम्मे नहीं छोड़ा जा सकता। हकीकत में तालाबों की सफाई और गहरीकरण अधिक खर्चीला काम नहीं है, न ही इसके लिए भारीभरकम मशीनों की जरूरत होती है। यह सर्वविदित है कि तालाबों में भरी गाद सालों साल से सड़ रही पत्तियों और अन्य अपशिष्ठ पदार्थो के कारण ही उपजी है, जो उम्दा दर्जे की खाद है। रासायनिक खादों ने किस कदर जमीन को चैपट किया है? यह किसान जान चुके हैं और उनका रुख अब कंपोस्ट व अन्य देसी खादों की ओर है। किसानों को यदि इस खादरूपी कीचड़ की खुदाई का जिम्मा सौंपा जाए तो वे सहर्ष राजी हो जाएंगे। उल्लेखनीय है कि राजस्थान के झालावाड़ जिले में यह प्रयोग अत्यधिक सफल व लोकप्रिय रहा है। कर्नाटक में समाज के सहयोग से ऐसे कोई 50 तालाबों का कायाकल्प हुआ है, जिसमें गाद की ढुलाई मुफ्त हुई। यानी ढुलाई करने वाले ने इस बेशकीमती खाद को बेचकर पैसा कमाया। इससे एक तो उनके खेतों को उर्वरक मिलता है, साथ ही साथ तालाबों के रखरखाव से उनकी सिंचाई सुविधा भी बढ़ती है। सिर्फ आपसी तालमेल, समझदारी और तालाबों के संरक्षण की दिली भावना हो तो न तो तालाबों में गाद बचेगी, न ही सरकारी अमलों में घूसखोरी की कीच होगी।11944 में गठित ‘फेमिन इनक्वायरी कमीशन’ ने साफ निर्देश दिए थे कि आने वाले सालों में संभावित पेयजल संकट से जूझने के लिए तालाब ही कारगर होंगे। कमीशन की र्पिाट तो लाल बस्ते में कहीं दब गई। आजादी केबाद तालाबों की देखरेख तो दूर, उनकी उपेक्षा शुरू हो गई। चाहे कालाहांडी हो या फिर बुंदेलखंड या फिर तेलंगाना, देश के जल संकट वाले सभी इलाकों की कहानी एक ही है। इन सभी इलाकों में एक सदी पहले तक कई-कई सौ बेहतरीन तालाब होते थे। वहां के तालाब केवल लोगों की प्यास ही नहीं बुझाते थे, बल्कि अर्थव्यवस्था का मूल आधार भी होते थे। तालाब मछली, सिंघाड़ा, कुम्हार के लिए चिकनी मिट्टी और हजारों-हजार घरों के लिए खाना उगाहते रहे हैं। तालाबों का पानी कुओं का जल स्तर बनाए रखने में सहायक होते थे। शहरीकरण की चपेट में लोग तालाबों को ही पी गए और अब उनके पास पीने के लिए कुछ नहीं बचा है।1गांव या शहर के रुतबेदार लोग जमीन पर कब्जा करने के लिए बाकायदा तालाबों को सुखाते हैं। पहले इनके बांध फोड़े जाते हैं। फिर इनमें पानी की आवक के रास्तों को रोका जाता है-न भरेगा पानी, न रह जाएगा तालाब। गांवों में तालाब से खाली हुई उपजाऊ जमीन लालच का कारण होती है तो शहरों में कालोनियां बनाने वाले भूमाफिया इसे सस्ता सौदा मानते हैं। यह राजस्थान में उदयपुर से लेकर जैसलमेर तक, हैदराबाद में हुसैनसागर, हरियाणा में दिल्ली से सटे सुल्तानपुर लेक या फिर यूपी के चरखारी व झांसी हो या फिर तमिलनाडु की पुलिकट झील, सभी जगह एक ही कहानी है। हां, पात्र अलग-अलग हो सकते हैं। सभी जगह पारंपरिक जल-प्रबंधन के नष्ट होने का खामियाजा भुगतने और अपने किए या फिर अपनी निष्क्रियता पर पछतावा करने वाले लोग एकसमान ही हैं। कनार्टक के बीजापुर जिले की कोई बीस लाख आबादी को पानी की त्रहि-त्रहि के लिए गरमी का इंतजार नहीं करना पड़ता है। कहने को इलाके में चप्पे-चप्पे पर जल भंडारण के अनगिनत संसाधन मौजूद हैं, लेकिन हकीकत में बारिश का पानी यहां टिकता ही नहीं है। लोग नलों को कोसते हैं, जबकि उनकी किस्मत को आदिलशाही जल प्रबंधन के बेमिसाल उपकरणों की उपेक्षा का दंश लगा हुआ है। समाज और सरकार पारंपरिक जल स्रोतों-कुओं, बावड़ियों और तालाबों में गाद होने की बात करते हैं, जबकि हकीकत में गाद तो उन्हीं के माथे पर है। सदा नीरा रहने वाली बावड़ियों-कुओं को बोरवेल और कचरे ने पाट दिया तो तालाबों को कंक्रीट का जंगल निगल गया। 1यदि जल संकट ग्रस्त इलाकों के सभी तालाबों को मौजूदा स्थिति में भी बचा लिया जाए तो वहां के प्रति इंच खेत को सिंचाई, हर कंठ को पानी और हजारों हाथों को रोजगार मिल सकता है। एक बार मरम्मत होने के बाद तालाबों के रखरखाव का काम समाज को सौंपा जाए। इसमें महिलाओं के स्वयं सहायता समूह, मछली पालन सहकारी समितियां, पंचायत, गांवों की जल बिरादरी को शामिल किया जाए।1(लेखक पर्यावरण मामलों के जानकार हैं)

सोमवार, 5 मार्च 2018

consevation of traditional water KUNDI in Burhanpur needs to be immediate attention

खतरे में पड़ गया पारंपरिक ज्ञान का एक अनूठा स्रोत


सतपुड़ा की सघन जंगलों वाली पहाड़ियों के भूगर्भ में धीरे-धीरे पानी रिसता है, फिर यह पानी प्राकृतिक रूप से चूने से निर्मित नालियों के माध्यम से सुरंगनुमा नहरों से होते हुए आम उपयोग के लिए कुइयों में एकत्र हो जाता है। दो दशक पहले तक इस संरचना के माध्यम से लगभग चालीस हजार घरों तक बगैर किसी मोटर पंप के पाइप के जरिये पानी पहुंचता था। कुछ आधुनिकता की हवा, कुछ कोताही और कुछ पारंपरिक तकनीकी ज्ञान के बारे में अल्प सूचना, अपने तरीके की विश्व की एकमात्र ऐसी जल-प्रणली को अब अपने अस्तित्व के लिए जूझना पड़ रहा है। उस समाज से जूझना पड़ रहा है, जो खुद पानी की एक-एक बूंद के लिए प्रकृति से जूझ रहा है। मुगलकाल की बेहतरीन इंजीनिर्यंरग का यह नमूना मध्य प्रदेश में ताप्ती नदी के किनारे बसे बुरहानपुर शहर में है। पिछले साल इस संरचना का नाम विश्व विरासत के लिए भी यूनेस्को को भेजा गया था। ठीक इसी तरह की एक जल-प्रणाली कभी ईरान में हुआ करती थी, वहां भी यह प्रणाली लापरवाही के कारण बीते दिनों की बात हो गई है। 
बुरहानपुर उन दिनों मुगल सेना की एक बड़ी छावनी था। ताप्ती नदी के पानी पर पूरी तरह निर्भरता को तब के सूबेदार अब्दुल रहीम खान ने असुरक्षित माना और उनकी निगाह इस प्राकृतिक जल-स्रोत पर पड़ी। सन 1615 में फारसी भूतत्ववेत्ता तबकुतुल अर्ज ने ताप्ती के मैदानी इलाके, जो सतपुड़ा की पहाड़ियों के बीच स्थित है, के भूजल स्रोतों का अध्ययन किया और शहर में जलापूर्ति के लिए भूमिगत सुरंगें बिछाने का इंतजाम किया। कुल मिलाकर ऐसी आठ प्रणालियां बनाई गईं। आज इनमें से दो तो पूरी तरह समाप्त हो चुकी हैं। शेष रह गई प्रणालियों में से तीन से बुरहानपुर  शहर और बाकी तीन का पानी पास के बहादुरपुर गांव और राव रतन महल को जाता है, जहां वह लोगों की प्यास बुझाने के अलावा उनके दैनिक आवश्यकताओं को पूरा करता था।
जल प्रवाह और वितरण का यह पूरा सिस्टम गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत पर आधारित है। भूमिगत नालिकाओं को भी हल्की ढलान दी गई है। सुख भंडारा जमीन से तीस मीटर नीचे है और वहां से पानी इस सुरंग में आता है। गरमियों में भी यहां डेढ़ मीटर पानी होता है। चट्टानों वाली इस व्यवस्था को पक्का करने के लिए करीब एक मीटर मोटी दीवार भी डाली गई है। भूजल का रिसाव इसके अंदर होता रहे, इसके लिए दीवार में जहां-तहां जगह छोड़ी गई है। मूल भंडारा तो शहर से 10 किमी दूर एक सोते के पास स्थित है। यह खुले हौज की तरह है और इसकी गहराई 15 मीटर है। इसकी दीवारें पत्थर से बनी हैं। इसके चारों तरफ 10 मीटर ऊंची दीवार भी बनाई गई है। चिंताहरण मूल भंडारा के पास ही एक सोते के किनारे है और इसकी गहराई 20 मीटर है। खूनी भंडारा शहर से पांच किमी दूर लाल बाग के पास है। इसकी गहराई करीब 10 मीटर है। 
अपने निर्माण के तीन सौ पचास वर्ष बाद भी यह व्यवस्था बिना किसी लागत या खर्च के काम दिए जा रही है। बीते कुछ सालों से इसमें पानी कुछ कम आ रहा है। सन 1985 में जहां यहां का भूजल स्तर 120 फुट था, वह 2010 में 360 और आज 470 फुट लगभग हो गया है। असल में, जिन सुरंगों के जरिए पानी आता है, उनमें कैल्शियम व अन्य खनिजों की परतें जमने के कारण उनकी मोटाई कम हो गई और उससे पानी कम आने लगा। इसके अलावा सतपुड़ा पर जंगलों की अंधाधुंध कटाई, बरसात के दिन कम होना और इन नालियों व सुरंगों में कूड़ा आने के चलते यह संकट बढ़ता जा रहा है। सन 1992 में भूवैज्ञानिक डॉ यूके नेगी के नेतृत्व में इसकी सफाई हुई थी, उसके बाद इनको साफ करने पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। हालांकि डॉ नेगी ने उसी समय कह दिया था कि इस संवेदनशील संरचना की सफाई हर दस साल में होनी चाहिए। 
 
बुरहानपुर के जल-भंडार ऐतिहासिक ही नहीं, भूगर्भ और भौतिकी विज्ञान के हमारे पारंपरिक ज्ञान के अनूठे उदाहरण हैं। इनका संरक्षण महज जल प्रदाय व्यवस्था के लिए नहीं, बल्कि विश्व की अनूठी जल प्रणाली को सहेजने के लिए भी अनिवार्य है।

रविवार, 4 मार्च 2018

cow dunk can be gold for farmers

जमीन पर उतरे गोबरधन योजना

गोबर का इस्तेमाल ग्रामीण जीवन की तकदीर बदलने के साथ खेती को भी लाभकारी बना सकता है

पंकज चतुर्वेदी




हाल में प्रधानमंत्री ने मन की बात रेडियो कार्यक्रम में गोबर के सदुपयोग की अपील की। उन्होंने गोबरधन (गल्वानाइजिंग आर्गेनिक बायो एग्रो र्सिोस फंड स्कीम)योजना की भी चर्चा करते हुए कहा कि मवेशियों के गोबर से बायो गैस और जैविक खाद बनाई जाए। उन्होंने लोगों से कचरे और गोबर को आय का स्नोत बनाने की अपील की। इस योजना की घोषणा इसी आम बजट में की गई है। इसके तहत गोबर और खेतों के ठोस अपशिष्ट पदाथोर्ं को कम्पोस्ट, बायो-गैस और बायो-सीएनजी में परिवर्तित किया जाएगा। असल में गोबर न केवल ग्रामीण जीवन की तकदीर बदल सकता है, बल्कि खेती को लाभ का व्यवसाय बनाने और ग्रामीण जीवन को प्रदूषण मुक्त बनाने में भी बड़ी भूमिका निभा सकता है। खेतों में गोबर डाला जाए और मिट्टी की उर्वरा शक्ति बढ़ाने के लिए केंचुओं का इस्तेमाल किया जाए तो हारी-थकी धरती को नया जीवन मिल सकता है। आधुनिक खेती के तहत रासायनिक खाद और दवाओं के इस्तेमाल से बांझ हो रही जमीन को राहत देने के लिए फिर से पलट कर देखना होगा। 1कुछ विदेशी किसानों ने भारत की सदियों पुरानी पारंपरिक कृषि प्रणाली को अपनाकर चमत्कारी नतीजे प्राप्त किए हैं। जब यह कहा जाता है कि भारत सोने की चिड़िया था तब हम यह अनुमान लगाते हैं कि हमारे देश में पीले रंग की धातु सोने का अंबार रहा होगा। वास्तव में हमारे खेत और हमारे मवेशी हमारे लिए सोने से अधिक कीमती थे। इसी रूप में सोना अभी भी यहां के चप्पे-चप्पे में बिखरा हुआ है। दुर्भाग्य है कि उसे या तो चूल्हों में जलाया जा रहा है या फिर उसकी अनदेखी हो रही है। एक ओर ऐसा हो रहा है तो दूसरी ओर अन्नपूर्णा जननी धरा तथाकथित नई खेती के प्रयोगों से कराह रही है। रासायनिक खाद से उपजे विकार अब तेजी से सामने आने लगे हैं। दक्षिणी राज्यों में सैंकड़ों किसानों की खुदकुशी करने के पीछे रासायनिक दवाओं की खलनायकी उजागर हो चुकी है। इस खेती से उपजा अनाज जहर हो रहा है। रासायनिक खाद डालने से एक दो साल तो खूब अच्छी फसल मिलती है, फिर जमीन बंजर होती जाती है। बेशकीमती मिट्टी की ऊपरी परत का एक इंच तैयार होने में दशकों लगते हैं जबकि खेती की आधुनिक प्रक्रिया के चलते यह परत 15-16 वर्ष में नष्ट हो जा रही है। रासायनिक उर्वरकों के इस्तेमाल के कारण मिट्टी सूखी और बेजान हो जाती है। यही भूमि के क्षरण का मुख्य कारण है। 1वहीं गोबर से बनी कंपोस्ट या प्राकृतिक खाद से उपचारित भूमि की नमी की अवशोषण क्षमता पचास फीसद बढ़ जाती है। फलस्वरूप मिट्टी नम रहती है और उसका क्षरण भी रुकता है। कृत्रिम उर्वरक यानी रासायनिक खादें मिट्टी में मौजूद प्राकृतिक खनिज लवणों को नष्ट करती हैं। इसके कारण कुछ समय बाद जमीन में जरूरी खनिज लवणों की कमी आ जाती है। जैसे नाइट्रोजन के उपयोग से भूमि में प्राकृतिक रूप से उपलब्ध पोटेशियम का तेजी से क्षरण होता है। इसकी कमी पूरी करने के लिए जब पोटाश प्रयोग में लाते हैं तो फसल में एस्कोरलिक एसिड (विटामिन सी) और केरोटिन की काफी कमी आ जाती है। इसी प्रकार सुपर फास्फेट के कारण मिट्टी में तांबा और जस्ता चुक जाता है। जस्ते की कमी के कारण शरीर की वृद्धि और लैंगिक विकास में कमी, घावों के भरने में अड़चन आदि रोग फैलते हैं। नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश उर्वरकों से संचित भूमि में उगाए गेहूं और मक्का में प्रोटीन की मात्र 20 से 25 प्रतिशत कम होती है। रासायनिक दवाओं और खाद के कारण भूमिगत जल के दूषित होने की गंभीर समस्या भी खड़ी हो रही है। 1अभी तक ऐसी कोई तकनीक विकसित नहीं हुई है जिससे भूजल को रासायनिक जहर से मुक्त किया जा सके। ध्यान रहे कि अब धरती पर जल संकट का एक मात्र निदान भूमिगत जल ही बचा है। न्यूजीलैंड एक विकसित देश है। यहां आबादी के बड़े हिस्से का जीवनयापन पशु पालन से होता है। इस देश में कृषि वैज्ञानिक पीटर प्राक्टर पिछले 30 वर्षो से जैविक खेती के विकास में लगे हैं। पीटर का कहना है कि रासानयिक खादों का प्रयोग पर्यावरणीय संकट पैदा कर रहा है। जैसे एक टन यूरिया बनाने के लिए पांच टन कोयला फूंकना पड़ता है। 1कुछ साल पहले हालैंड की एक कंपनी ने भारत को गोबर निर्यात करने की योजना बनाई थी तो खासा बवाल मचा था, लेकिन यह दुर्भाग्य है कि इस बेशकीमती कार्बनिक पदार्थ की हमारे देश में कुल उपलब्धता आंकने के आज तक कोई प्रयास नहीं हुए। अनुमान है कि देश में कोई 13 करोड़ मवेशी हैं जिनसे हर साल 120 करोड़ टन गोबर मिलता है। इसमें से आधा उपलों के रूप में चूल्हों में जल जाता है। यह ग्रामीण उर्जा की कुल जरूरत का 10 फीसदी भी नहीं है। बहुत पहले राष्ट्रीय कृषि आयोग की एक रिपोर्ट में कहा गया था कि गोबर को चूल्हे में जलाया जाना एक अपराध है। ऐसी और कई रिपोर्ट सरकारी बस्तों में बंधी होंगी, लेकिन इसके व्यावहारिक इस्तेमाल के तरीके गोबर गैस प्लांट की दुर्गति यथावत है। राष्ट्रीय कार्यक्रम के तहत निर्धारित लक्ष्य के 10 फीसदी प्लांट भी नहीं लगाए गए हैं। ऐसे कई प्लांट तो सरकारी सब्सिडी गटकने का माध्यम बन रहे हैं। ऊर्जा विशेषज्ञ मानते हैं कि हमारे देश में गोबर के जरिये 2000 मेगावाट ऊर्जा पैदा की जा सकती है। सनद रहे कि गोबर के उपले जलाने से बहुत कम गर्मी मिलती है। इस पर खाना बनाने में बहुत समय लगता है यानी गोबर को जलाने से बचना चाहिए। 1यदि इसका इस्तेमाल खेतों में किया जाए तो अच्छा होगा। इससे एक तो महंगी रासायनिक खादों और दवाओं का खर्चा कम होगा, साथ ही जमीन की ताकत भी बनी रहेगी। सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि फसल रसायनहीन होगी। यदि गांव के कई लोग मिल कर गोबर गैस प्लांट लगा लें तो उसका उपयोग रसोई में अच्छी तरह होगा। देश के कई हिस्सों में ऐसे प्लांट सफलता से चल रहे हैं। ये प्लांट रसोई गैस सिलेंडर के मुकाबले काफी कम कीमत में खाना पकाने की गैस उपलब्ध करा रहे हैं। गोबर गैस प्लांट से निकला कचरा बेहतरीन खाद का काम करता है। दरअसल यही है कि वेस्ट से वेल्थ की अवधारणा। गोबर का सदुपयोग एक बार फिर हमारे देश को सोने की चिड़िया बना सकता है। जरूरत तो बस इस बात की है कि इसका उपयोग ठीक तरीके से किया जाए। अच्छा होगा कि सरकार गोबरधन योजना को साकार करने के लिए ठोस कदम उठाए।1(लेखक पर्यावरण मामलों के विशेषज्ञ एवं स्तंभकार हैंैं)11ी2स्रल्ल2ीAं¬1ंल्ल.ङ्घे

शनिवार, 3 मार्च 2018

Industries should be make responsible for disposing garbage produce from there product

उत्पादक का उत्तरदायित्व तय किए बगैर नहीं बचेगा पर्यावरण

पंकज चतुर्वेदी


भारत  में हर साल कोई 4.4 खरब लीटर पानी को प्लास्टिक की बोतलों में पैक कर बेचा जाता है। यह बाजार 7040 करोड़ रूपए सालाना का हे। जमीन के गर्भ से या फिर बहती धारा से प्रकृति के आर्शीवाद स्वरूप निशुल्क मिले पान को कुछ मशीनों से गुजार कर बाजार में लागत के 160 गुणा ज्यादा भाव से बेच कर मुनाफे का पहाड़ खड़ा करने वाली ये कंपनियां हर साल देश में पांच लाख टन प्लास्टिक बोतलों का अंबार भी जोड़ती हैं। षीतल पेय का व्यापार तो इससे भी आगे है और उससे उपजा प्लास्टिक कूड़ा भी यूंह ी इधर-उधर पड़ा रहता है। चूंकि ये बोतलें इस किस्म की प्लास्टिक से बनती हैं जिनका पुनर्चकण हो नहीं सकता, सो कबाड़ी इन्हें लेते नहीं हैं। या तो यह प्लास्टिक टूट-फूट कर धरती को बंजर बनाता है या फिर इसे एकत्र कर ईंट भट्टे या ऐसी ही बड़ी भट्टियों में झोंक दिया जाता है, जिससे निकलने वाला धुआं दूर-दूर तक लेागांे का दम घोंटता है। ठीक यही हाल हर दिन लाखों की संख्या में बिकने वाली कोल्ड ड्रिंक्स की बोतलों , दूध की थैलियों, चिप्स आदि के पैकेट का है।  हमारे देश के नीति निर्धारक बढ़ते प्रदूषण के कारक, कारण निदान पर बड़े-बड़े आयोजन, परियोजनाएं और भाषण देते हैं, लेकिन पानी की बोतलों का छोटा सा तथ्य बानगी हैं कि देश के जल-जंगल-जमीन को संकट में डालने वाले उत्पादों को मुनाफा कमाने की तो छूट है लेकिन उनके उत्पाद से उपजे जहरीले कचरे के प्रति उनकी केाई जिम्मेदारी नहीं हैं।
असल में प्रकृति के साथ छेड़छाड़ के चलते नैसर्गिकता में आए बदलाव का मूल कारण हमारा प्रकृति पर निर्भरता से दूर होना है। विउंबना है कि कुछ संगठन व व्यापारी यह कहते नहीं अघाते कि प्लास्टिक के आने से पेड़ बच गए। हकीकत यह है कि पेड़ से मिलने वाले उत्पाद, चाहे वे रस्सी हों या जूट या कपड़ा, या कागज, इस्तेमाल के बाद प्रकृति को नुकसान नहीं पहुंचाते थे। पेड़ का देाहन करें तो उसे फिर से उगा कर उसकी पूर्ति की जा सकती है, लेकिन एक बार प्लास्टिक धरती पर किसी भी स्वरूप में आ गई तो उसका नष्ट होना असंभव है और वह समूचे पर्यावरणीय-तंत्र को ही हानि पहुंचाती है। यह मसला अकेले पानी की बेातलों का ही नहीं है, खाने-पीने की वस्तुओं से ले कर हर तरह के सामान की पैकिंग में प्लास्टिक या थर्मोकाले का इस्तेमाल बेधडक है, लेकिन कोई भी निर्माता यह जिम्मेदारी नहीं लेता कि इस्तेमाल होने वाली वस्तु के बाद उससे निकलने वाले इस जानलेवा कचरे का उचित निबटान करने कौन करेगा।
मोबाईल, कंप्यूटर व अन्य इलेक्ट्रानिक उपकरणें की कंपनियों का मुनाफा असल उत्पादन लागत का कई सौ गुणा होता है लेकिन करोड़ो-करोड़ विज्ञापनों में खर्च करने वाली ये कंपनियां इसे उपजने वाले ई-कचरे की जिम्मेदारी लेने को राजी नहीं होतीं। एक कंप्यूटर का वजन लगभग 3.15 किलो ग्राम होता है। इसमें 1.90 किग्रा सीसा और 0.693 ग्राम पारा और 0.04936 ग्राम आर्सेनिक होता हे। जो जलाए जाने पर सीधे वातावरण में घुलते हैं। इनका अवशेष पर्यावरण के विनाश का कारण बनता है। षेश हिस्सा प्लास्टिक होता है। इसमें से अधिकांश सामग्री गलती-’सड़ती नहीं है और जमीन में जज्ब हो कर मिट्टी की गुणवत्ता को प्रभावित करने  और भूगर्भ जल को जहरीला बनाने  का काम करती है। ठीक इसी तरह का जहर बैटरियों व बेकार मोबाईलो ंसे भी उपज रहा है। इनसे निकलनेवाले जहरीले तत्व और गैसें मिट्टी व पानी में मिलकर उन्हें बंजर और जहरीला बना देते हैं। फसलों और पानी के जरिए ये तत्व हमारे शरीर में पहुंचकर बीमारियों को जन्म देते हैं।
रंगीन टीवी, माईक्रोवेव ओवन, मेडिकल उपकरण, फैक्स मशीन , टेबलेट, सीडी, एयर कंडीशनर, आदि को भी जोड़ लें तो हर दिन ऐसे उपकरणो में से कई हजार खराब होते हैं या पुराने होने के कारण कबाड़े में डाल दिए जाते हैं। ऐसे सभी इलेक्ट्रानिक्स उपकरणों का मूल आधार ऐसे रसायन होते हैं जो जल, जमीन, वायु, इंसान और समूचे पर्यावरण को इस हद तक नुकसान पहुंचाते हैं कि उससे उबरना लगभग नामुमकिन है। इस कबाड़ को भगवान भरोसे प्रकृति को नष्ट करने के लिए छोड़ दिया जाता है। यही नहीं ऐसे नए उपकरण खरीदने के दौरान पैकिंग व सामान की सुरक्षा के नाम पर कई किलों थर्मोंकोल व पॉलीथीन का इस्तेमाल होता है जोकि उपभोक्ता कूड़े में ही फैंकता है। क्या यह अनिवार्य नहीं किया जाना चाहिए  िकइस तरह का पैकेजिंग मटेरियल कंपनी  खुद तत्काल उपभौकता से वापिस ले ?
इन दिनों बड़े जोर-शोर से ई-रिक्शे को पर्यावरण-मित्र बता कर प्रचरित किया जा रहा हे। इसने साईकिल रिक्शों को निगलना भी शुरू कर दिया है। यह बात दीगर है कि ई-रिक्श को विदेश से मंगवाने व उसे बेचने में चूंकि कई ताकतवर राजनेतओं के व्यावसायिक हित है सो यह नहीं बताया जा रहा कि ई-रिक्शेे के महत्वपूर्ण तत्व बैटरी के कारण देश का जल और जमीन तेजी से बंजर हो रही हे। औसतन हर साल एक रिक्शे की बैटरी के चलते दो लीटर तेजाब वाला पानी या तो जमीन पर या फिर नालियों के जरिये नदियों तक जा रहा है। हर साल खराब बैटरियों के कारण बड़ी मात्रा में सीसा धरती को बेकार कर रहा है। ई7रिक्श बे कर खासी कमाई करने वले उस रिक्शे की चार्जिंग, उसकी बैटरी की पर्यावरण-मित्र देखभाल की कहीं जिम्मेदारी नहीं लेते। ठीक यही हाल देश के सबसे बड़े व्यवसायों में से एक ‘आटोमोबाईल क्षेत्र’ का है। कंपनियों जमे कर वाहन बेच रही हैं, लेकिन ईंधन से उपजने वाले प्रदूषण, खराब वाहनों  या पुराने वाहनों को चलने से प्रतिबंधित करने जैसे कार्यों के लिए कोई कदम नहीं उठातीं । हर साल करोड़ों टायर बेकार हो कर जलाए जा रहे हैं और उनका जहरीला धुआं परिवेश को दूषित कर रहा है, लेकिन केाई भी टायर कंपनी पुराने टायरों के सही तरीके से निबटान को आगे नहीं आती।
यह तो किसी छिपा नहीं है कि विभिन्न सरकारों द्वारा पर्यावरण बचाने के लिए लिए करों से उनका खजाना जरूर भरा हो, कभी पर्यावरण संरक्षण के ठोस कदम तो उठे नहीं। भारत जैसे विशाल और दिन-दुगनी, रात चैागुनी प्रगति कर रहे उपभोक्तावादी देश में अब अनिवार्य हो गया है कि प्रत्येक सामान के उत्पादक या निर्यातक को यह जिम्मेदारी लेने को बाध्य किया जाय कि उसके उत्पाद से उपजे कबाड़ या प्रदूषण के निबटारे की तकनीकी और जिम्मेदारी वह स्वयं लेगा। यह कहां तक नैतिक व न्यायोचित है कि कंपनियां मोबाईल, कार, पानी बेच कर मुनाफा कमाएं और उससे निकले प्रदूषण से समाज व सरकार जूझे ।

गुरुवार, 1 मार्च 2018

overloaded judiciary system may collapsed

सावधान ! यह चेतावनी न्यायपालिका के लिए भी है 

पंकज चतुर्वेदी


बीते एक साल में तीन बार देश की सर्वोच्च अदालत के मुख्य न्यायाधीश ने सरकार से अदालतों में बढते मुकदमे के बोझ तथा जजों की कमी पर गंभीरता से गौर करने के लिए सार्वजनिक बयान दिया है। देश की सबसे बड़ी अदालत- सुप्रीम कोर्ट , लंबित मामलों की संख्या 54,864, हाई कोर्ट - पेंडिंग मुकदमें - 40 लाख साठ हजार 709। देश में सर्वाधिक मामले निचली अदालतों में लंबित है, जहां इनकी संख्या करीब पौने तीन करोड़ है। यदि इसी गति से मुकदमों का निबटान होता रहा तो 320 साल चाहिए।इस बीच अदालतों में भ्रश्टाचार का मामला भी खूब उछल रहा है।  दूसरी तरफ आए रोज ऐसे मामले सामने आ रहे हैं जिसमें शिक्षित लोग कानून अपने हाथेां में ले कर खुद ही न्याय करनाचाहते है।। कोयला घोटाले में अभियुक्त एक केबिनेट सचिव स्तर से रिटायर्ड अफसर ने तो अदालत में यह कह दिया कि वह इतनी लंबी न्यायिक प्रक्रिया से हार गया है और वह ना तो अब जमानत चाहता है और ना ही गवाहों से जिरह। अदालत उसे वैसे ही जेल भेज दे क्योंकि मुकदमों के चलते उसकी आर्थिक स्थिति खराब हो चुकी हे। लोकतंत्र में न्यायवयवस्था तीसरा स्तंभ ह और उसकी ऐसी जर्जर हालत पूरे तंत्र को कमजोर कर रही है। ऐसे में अदालतों के सामाजिक सरोकार पर विचार होना जरूरी है।
यदि विधि मंत्रालय के आंकड़ों पर ही भरोसा करें तो हमारे यहां आबादी की तुलना में न्यायाधीशों का अनुपात प्रति 10 लाख पर 17.86 न्यायाधीशों का है। मिजोरम में यह अनुपात सर्वाधिक है। वहां प्रति 10 लाख पर 57.74 न्यायाधीश हैं। दिल्ली में यह अनुपात 47.33 है और देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में प्रति 10 लाख आबादी पर मात्र 10.54 न्यायाधीश हैं। पश्चिम बंगाल में न्यायाधीशों का यह अनुपात सबसे कम है। वहां प्रति 10 लाख की आबादी पर सिर्फ 10.45 न्यायाधीश हैं। कोई भी जज हर साल 2600 से ज्यादा मुकदमों का निबटारा नहीं कर पाता , जबकि नए दर्ज मालों की संख्या इससे कहीं अधिक होती है। दरअसल, ऊपरी अदालतों में न्यायाधीशों की संख्या संसद द्वारा कानून बनाकर ही बढ़ाई जा सकती है। विडंबना तो यह है कि काम के बोझ को देखते हुए नई नियुक्तियां तो हो नहीं रहीं, हां कुल स्वीकृत पदों पर भी जज आसीन नहीं है। देश के 24 उच्च न्यायालयों में फिलहाल 43 फीसद नियुक्तियां खाली पड़ी हैं। जहां इन अदालतों में जजों की संख्या 1044 होनी चाहिए थी, वहीं अभी यह संख्या केवल 599 है। सर्वाेच्च न्यायलय में 3 पद रिक्त हैं। इन रिक्तियों के बढ़ने का एक कारण एनजेएसी के गठन पर विवाद भी रहा, क्योंकि जब तक यह मामला लंबित रहा, तब तक कोई भी नियुक्ति नहीं हुई और जब कोलेजियम प्रणाली बहाल कर दी गई, तब भी समन्वय की कमी के चलते नियुक्तियां लटक जाती हैं। सर्वाेच्च न्यायलय में 2008 के संशोधन अधिनियम के द्वारा संख्या बढाकर 30 कर दी गई थी, लेकिन वर्तमान में सर्वाेच्च न्यायलय में 27 न्यायाधीश ही नियुक्त हैं, हालांकि पिछले कुछ समय से सर्वाेच्च अदालत पर मुकदमों का बोझ कम करने के लिए एक राष्ट्रीय अपील न्यायालय के गठन पर विचार चल रहा है, लेकिन यदि इस अपीलीय न्यायलय का गठन किया गया तब भी अतिरिक्त न्यायाधीशों की नियुक्ति करनी होगी।

देश की सड़कों पर आए रोज अपराध होने के बाद न्याय दिलवाने के लिए सड़कों पर गुस्सा भले ही महज पुलिस या व्यवस्था का विरोध नजर आ रहा हो, हकीकत में यह हमारी न्याय व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती है - लोग अब महसूस कर रहे हैं कि देर से मिला न्याय अन्याय के बराबर ही है। यह बात भी लोग अब महसूस कर रहे हैं कि हमारी न्याय व्यवस्था में जहां अपराधी को बचने के बहुत से रास्ते खुले रहते हैं , वहीं पीड़ित की पीड़ा का अनंत सफर रहता है। हाल ही में देश की सुप्रीम कोर्ट ने हमारी आपराधिक न्याय प्रणाली पर ही सवाल खड़े करते हुए कहा है कि  निचली अदालतों के दोशी को दी जाने वाली सजा के निर्धारण के लिए कोई विधायी या न्यायिक दिशा-निर्देश ना होना हमारी न्याय प्रणाली की सबसे कमजोर कड़ी है। कई मामाले पहले दस साल या उससे अधिक निचली अदालत में चलते हैं फिर उनकी अपील होती रहती है। कुछ मिला कर एक उम्र बीत जाती है, न्याय की आस में वहीं लंपट और पेश्ेावर अपराधी न्याय व्यवस्था की इस कमजोरी का फायदा उठा कर कानून से बैखोफ बने रहते हैं।
देशभर में हो रहे मौजूदा प्रदर्शनों में फास्ट-ट्रैक अदालतों या जल्दी फैसले का जिक्र हो रहा है। अभी पिछले साल ही मध्यप्रदेश के धार जिले में हत्या के एक ममाले में एक महीने के भीतर आरोपियों को सजा सुना दी गई। राजस्थान में भी 21 दिन में फैसले हुए हैं। जाहिर है कि अदालतों में जल्दी फैसले आ सकते हैं। साफ नजर आता है कि आखिर मामलों को लंबा ख्,ाींचने में किसके स्वार्थ निहित होते हैं। अब अदालतों से क्या उम्मीद की जाए जब देश के सर्वोच्च पद राश्ट्रपति एक पास ही 13 केदियों की दया याचिकाएं सालों से लंबित हैं। तकनीकी रूप से इन पर गृह और विधि मंत्रालयों की राय दर्ज है और महामहिम को इस पर फैसला लेने में कुछ ही घंटे लगने चाहिए। आजादी के बाद चुने हुए प्रतिनिधियों, नौकरशाही ने किस तरह आम लोगों को निराश किया,इसकी चर्चा अब मन दुखाने के अलावा कुछ नहीं करती है । यह समाज ने मान लिया है कि ढर्रा उस हद तक बिगड़ गया है कि उसे सुधरना नामुमकिन है । भले  ही हमारी न्याय व्यवस्था में लाख खामियां हैं, अदालतों में इंसाफ की आस कभी-कभी जीवन की संास से भी दूर हो जाती है । इसके बावजूद देश को विधि सममत तरीके से चलाने के लिए लोग अदालतों को उम्मीद की आखिरी किरण तो मानते ही हैं । बीते कुछ सालों से देश में जिस तरह अदालत के निर्देशों पर सियासती दलों का रूख देखने को मिला हैै, वह न केवल शर्मनाक है, बल्कि इससे संभावना जन्म लेती है कि कहीं पूरे देश का गणतंत्रात्मक ढ़ांचा ही पंगु न हो जाए ।
यह विडंबना है कि देश का बहुत बड़ा तबका थोडे़ से भी न्याय की उम्मीद न्यायपालिका से कर ही नहीं पाता है। गरीब लोग तो न्यायालय तक पहुंच ही नहीं पाते। इसकी औपचारिकताओं और जटिल प्रक्रियाओं के कारण केवल वकीलों द्वारा ही न्यायालय में बात कही जा सकती है, लेकिन गरीब लोग वकीलों की बड़ी-बड़ी फीसें नहीं दे सकते, वे न्याय से वंचित रह जाते हैं। जो कुछ लोग न्यायालय तक पहुंच पाते हैं उन्हें यह उम्मीद नहीं होती कि एक निश्चित समयावधि में उनके विवाद का निपटारा हो पाएगा। मुकदमे के निर्णय में जितने समय की सजा दी जाती है उससे ज्यादा समय तो मुकदमों की सुनवाई में ही लग जाता है। अगर इस दौरान मुवक्किल जेल से बाहर हुआ तो इस सारे मुकद्मे के दौरान अपने को बचाने की कवायद की परेशानी और सजा से ज्यादा खर्चे और जुर्माना ही कष्टदायी हो जाता है। पुलिस और प्रभावशाली लोग न्यायिक प्रक्रिया को और भी ज्यादा दूरूह बना रहे हैं क्योंकि प्रभावशाली लोग पुलिस को अपने इशारों पर नचाते हैं और उन लोगों को डराने धमकाने और चुप कराने के लिए पुलिस का इस्तेमाल करते हैं जो अत्याचारी और शोषणपूर्ण व्यवस्था को बदलने का प्रयास कर रहे हैं। एक तरफ न्याय प्रक्रिया जटिल है तो दूसरी ओर वकील या अदालतों पर कोई जिम्मेदारी या समयबद्धता का दवाब नहीं है। देशभर की अदालतों में वीकल साल में कई दिन तो हडताल पर ही रहते हैं, यह जाने बगैर कि एक पेशी चूकने से उनके मुवक्किल की न्याय से दूरी कई साल की बढ़ जाती है। यह भी कहना गलत ना होगा कि बहुत से मामलों में वकील खुद ज्यादा पेशी की ज्यादा फीस के लालच में केस को खींचते रहते हैं।
देश की बड़ी और घनी आबादी, भाशाई, सामाजिक और अन्य विविधताओं को देखते हुए मौजूदा कानून और दंड देने की प्रक्रिया पूरी तरह असफल रही है। ऐसे में कुछ सिनेमा याद आते हैं- 70 के दशक में एक फिल्म में हत्या के लिए दोशी पाए गए राजेश खन्ना को फरियादी के घर पर देखभाल करने के लिए रखने पर उसका ह्दय परिवर्तन हो जाता है। अभिशेक बच्चन की एक फिल्म में बड़े बाप के बिगड़ैल युवा को एक वृद्धाश्रम में रह कर बूढ़ों की सेवा करना पड़ती है।  वैसे पिछले साल दिल्ली में एक लापरवाह ड्रायवर को सड़क पर खड़े हो कर 15 दिनों तक ट्राफिक का संचालन करने की सजा वाला मामला भी इसी श्रंखला में देखा जा सकता है, लेकिन दुर्भाग्य कि ऐसी व्यावहारिक सजा को बाद में बड़ी अदालत ने कानूनसम्मत ना मानते हुए रोक लगा दी थी। मोटर साईकलों पर उपद्रव काटने वाले सिख युवकों को कुछ दिनों के लिए गुरूद्वारे में झाड़ू-पोंछा करने का सजा की भी समाज में बेहद तारीफ हुई थी।
क्या यह वक्त नही आ गया है कि लिखे कानून के बनिस्पत सुधार के लिए जरूरी कदमों या अपराध-निवारण को अपनाया जाए ?आज की न्यायीक व्यवस्था बेहद महंगी, डरावनी, लंबी खिंचने वाली है। गरीब लोग तो अदालतों की प्रक्रिया में सहभागी ही नहीं हो पाते हैं। उनके लिए न्याय की आस बेमानी है। साक्ष्य अधिनियम को सरल बनाना, सात साल से कम सजा वाले मामालों में सयब़ नीति बनाना, अदालतों में बगैर वकील की प्रक्रिया को प्रेरित करना, हडताल जैसी हालत में तारीख आगे बढत्राने की जगह वकील को दंडित करना जैसे कदम अदालतों के प्रति आम आदमी के विश्वास को बहाल करने में मददगार हो सकते हैं। ऊंची फीस लेने वाले वकीलों का एक वर्ग ऐसी सिफारिशों को अव्यावहारिक और गैरपारदर्शी या असंवदेनशील करार दे सकता है, लेकिन देशभर में सड़कों पर उतरे लोगों की भावना ऐसी ही है और लोकतंत्र में जनभावना ही सर्वोपरि होती है।
पंकज चतुर्वेदी
यू जी-1, 3/186 राजेन्द्र नगर, सेक्टर-2
साहिबाबाद, गाजियाबाद
201005
गाजियाबाद 201005




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