My writings can be read here मेरे लेख मेरे विचार, Awarded By ABP News As best Blogger Award-2014 एबीपी न्‍यूज द्वारा हिंदी दिवस पर पर श्रेष्‍ठ ब्‍लाॅग के पुरस्‍कार से सम्‍मानित

रविवार, 13 फ़रवरी 2022

careless multi-Storey buildings

                                              बेपरवाही की बहुमंजिला इमारतें

पंकज चतुर्वेदी



जैसा कि हर हादसे के बाद होता हैं , गुरुग्राम में बहुमंजिला इमारत के फलते के छतें जिस तरह गिरीं , उसका डर नोयडा , गाज़ियाबाद  में भी देखने को मिला, आनन् फानन में कई आवासीय परिसरों के निवासी संघों ने मांग आकर दी कि उनकी इमारत की संरचना की मजबूती  की परख अर्थात स्ट्रक्चरल ऑडिट करवा दिया दिया जाए ? सवाल यह है कि हम इसके लिए किसी हादसे का इंतज़ार क्यों करते हैं ?  यह एक नियमित प्रक्रिया क्यों नहीं है ? खासकर दिल्ली एनसीआर का इलाका जो कि भूकम्प के प्रति बेहद संवेदनशील ज़ोन में आता है, यहाँ  जिस दिन धरती सलीके से डोल गई , तबाही मचना तय है, हालाँकि बाधित आबादी और जमीं की कमी और बेतहाशा कीमतों के चलते बहुमंजिला इमारतों का प्रचलन अब सुदूर जिला स्तर तक हो रहा है  लेकिन दुर्भाग्य है कि न तो निर्माण से पहले और न ही  उसके बाद भवन की मजबूती की जांच का कोई प्रावधान सरकारी दस्तावेजों में हैं .



गुरुग्राम के सेक्टर-109 चिंटल्स पैराडिसो सोसाइटी के डी टावर में हुए हादसे के बाद अन्य टावरों में रहने वाले लोग भी सहमे हुए हैं। उन्हें अब अपने और परिवार की सुरक्षा की चिंता सता रही है।  चिंता का कारण यह भी है कि अधिकाँश लोगों ने अपने जीवन भर की कमाई और कर्जा ले कर यह आशियाना बसाया है, यदि  बिल्डिंग के कमजोर होने के कारण उन्हें अन्यत्र कहीं जाना पडा तो वे क्या करेंगे? कहाँ जायेंगे ? जिस दिन गुरुग्राम में बिल्डिंग गिरी उसके अगले दिन ही दिल्ली में भी सन 2008 में गरीबों के लिए बने अपार्टमेंट  में से एक ढह गया . हालाँकि ये किसी को आवंटित नहीं हुए थे और खाली थे लेकिन वहां घूम रहे या बैठे चार लोगों की जान चली गई . यह घटना बानगी है कि निजी बिल्डरों के भवन जिन्हें आमतौर पर शिक्षित व् जागरूक लोग लेते हैं , में तो परीक्षण जैसी मांग उठाई जा सकती है लेकिन जब सरकारी भवन ही बेपरवाही की बानगी हों तो कस्से फ़रियाद हो ?

जरा याद करें नोएडा में नियम विरुध्ध निर्माण के कारण सुपरटेक एमराल्ड के दो गगनचुम्बी टावर को गिराने की आदेश सुप्रीम कोर्ट दे चुकी है लेकिन नोयडा प्रशासन उन 1757 इम्मार्तों पर मौन हैं जिन्हें खुद नोयडा विकास प्राधिकरण के सर्वे में चार साल पह्ले जर्जर और असुरक्षित घोषित किया गया था . हम भूल चुके हैं कि 17 जून 2018 को नोयडा की ग्रामीण इलाके शाहबेरी गांव में छह मंजिला इमारत भरभराकर गिर गई थी जिसमें नो लोग मारे गये थे . आज भी नोयडा से यमुना एक्सप्रेस वे तक गांवों में  हज़ारों छह मंजिल तक के मकान बन रहे हैं जिनका न नक्शा  पास होता है और न ही उनकी कोई जांच पड़ताल .


वैसे वैधानिक रूप से हर भवन की ओसी अर्थात ओक्युपेशन सर्टिफिकेट जारी करने से पहले इस तरह का जांच का प्रमाण्पत्र अनिवार्य होताहै . नगर योजनाकार विभाग या प्राधिकरण का एक निर्धारित प्रोफार्मा होता है जिसे बिल्डर ही विधिवत भर कर जमा करता है , उसमें स्ट्रक्चरल इंजीनियर अर्थात संरचनात्मक अभियंता की तस्दीक और मोहर होती हैं . इसतरह के इंजिनियर को बिल्डर ही  तय करता है , कहने की जरूरत नहीं कि यह सब एक औपचारिकता से अधिक होता नहीं .

आज जिस तरह से भूमिगत जल का इस्तेमाल बढ़ा है और साथ ही भूमिगत सीवर लायीं का प्रचालन भी , भवन निर्माण से पहले मिटटी की वहन – क्षमता मापना तो महज कागजों की खाना पूर्ति रह गया है , बहुमंजिला इमारत में गहरा खोद कर भूतल पर पार्किंग बनाना और उसमें जल भराव से निबटने की माकूल व्यवस्था न होना , जैसे अनेक कारण हैं जो चेतावनी है कि अपार्टमेंट में रहने वाले अपना तन – मन और धन सभी कुछ दांव पर लगाये हैं , जान लें कि  भूजल के इस्तेमाल और गहराई की लाईनों में रिसाव के चलते  ब्लोक स्ट्रक्चर पर कड़ी इमारतों में  धंसाव की संभावना बनी रहती हैं .



राष्ट्रीय  राजधानी क्षेत्र दिल्ली हो या लखनऊ या देहरादून या भोपा या पटना सभी जगह बसावट का लगभग चालीस फीसदी इलाका अनाधिकृत है तो 20 फीसदी के आसपास बहुत पुराने निर्माण। बाकी रिहाइशों  में से बमुश्किल  पांच प्रतिशत का निर्माण या उसके बाद यह सत्यापित किया जा सका कि यह भूकंपरोधी है। शेष  भारत  में भी आवासीय परिसरों के हालात कोई अलग नहीं है। एक तो लोग इस चेतावनी को गंभीरता से ले नहीं रहे कि उनका इलका भूकंप के आलोक में कितना संवेदनषील है, दूसरा उनका लोभ उनके घरों को संभावित मौत घर बना रहा है। बहुमंजिला मकान, छोटे से जमीन के टुकड़े पर एक के उपर एक डिब्बे जैसी संरचना, बगैर किसी इंजीनियर की सलाह के बने परिसर, छोटे से घर में ही संकरे स्थान पर रखे ढेर सारे उपकरण व फर्नीचर--- भूकंप के खतरे से बचने कीे चेतावनियों को नजरअंदाज करने की मजबूरी भी हैं और कोताही भी। सिस्मिक जोन-4 में आने वाली राजधानी दिल्ली भूकंप के बड़े झटके से खासा प्रभावित हो सकती है। अगर यहां 7 की तीव्रता वाला भूकंप आया तो दिल्ली की कई सारी इमारतें और घर रेत की तरह भरभराकर गिर जाएंगे। ऐसा इसलिए है, क्योंकि यहां की इमारतों में इस्तेमाल होने वाली निर्माण सामग्री ऐसी है, जो भूकंप के झटकों का सामना करने में पूरी तरह से सक्षम नहीं है। दिल्ली में मकान बनाने की निर्माण सामग्री ही आफत की सबसे बड़ी वजह है। इससे जुड़ी एक रिपोर्ट वल्नेबरिलिटी काउंसिल ऑफ इंडिया ने तैयार की थी, जिसे बिल्डिंग मैटीरियल एंड टेक्नोलॉजी प्रमोशन काउंसिल ने प्रकाशित किया है।


शिमला में दस हज़ार ऐसे मकान हैं जो अवैध तरीके से छ सात मंजिले बने हैं जबकि एन्जीती के आदेशानुसार यहाँ ढाई मंजिल से अधिक के मकान बन नहीं सकते . एक अन्य राजधानी और पहाड़ी शहर देहरादून में करीब 24 हजार अवैध निर्माण भी चिह्नित किए गए। जाहिर है इनमें भूकंपरोधी तकनीक की औपचारिकता भी पूरी नहीं हुई होगी। यही नहीं वर्ष 2011 की जनगणना के मुताबिक, नगर निगम व आसपास के क्षेत्र में 20886 ऐसे निर्माण भी खड़े हुए, जिनका रिकॉर्ड तक नहीं है। यानी कुल मिलाकर 43 हजार से अधिक निर्माण में तो नक्शों में भी यह खानापूर्ति नहीं की गई। सबसे खतरनाक हालात पूर्वोत्तर राज्यों में हैं जो कि भूकम्प के साथ साथ पहाड़ी नदियों के बहाव से भुरभुरी जमीन के कारण भारी भवन का वजन सहने में सक्षम नहीं हैं लेकिन वहां भी बहुमंजिला इमारतें बन रही हैं , असल में ये बहुमंजिला भवन आवास से ज्यादा रसूखदार लोगों के धन कमाने के माध्यम हैं और उनका आम लोगों के जीवन से कोई सरोकार् है नहीं , वहां निर्माण के नियम कागजो से ऊपर उठते नहीं .

 

शनिवार, 12 फ़रवरी 2022

First ever Indian official report on impact on climate change

 


जलवायु परिवर्तन पर  देशी रिपोर्ट

चेतावनी : भारत के वनों और शहरी हरियाली का संरक्षण जरुरी

पंकज चतुर्वेदी

 









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यह रिपोर्ट बताती है कि भारत में कई ऐसे इलाके हैं जो कि पेड़-पौधे व् प्राणियों की जैव विविधता की स्थानीय प्रजाति ही नहीं बल्कि वैश्विक प्रजातियों के लिए  भी संवेदनशील माने गए हैं | यदि जलवायु परिवर्तन की रफ़्तार तेज होती है तो इन प्रजातियों पर अस्तित्व का खतरा हो सकता है | पहली भारतीय  रिपोर्ट में चेतावनी दी  गयी है कि देश का औसत तापमान वर्ष 2100 के अंत तक 4.4 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ सकता है । तापमान में तेजी से बढौतरी के मायने हैं भारत के प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्र, कृषि उत्पादन और मीठे पानी के संसाधनों पर संकट में इजाफा होगा, जिसका गहरा विपरीत  प्रभाव जैव विविधता, भोजन, जल और ऊर्जा सुरक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर पडेगा ही । रिपोर्ट में भारतीय शहरों में पर्यावरण के प्रति लापरवाही से बचने और देश के जंगलों और शहरी हरियाली की रक्षा करने की दिशा में सशक्त नीति और अनुसन्धान की अनिवार्यता पर बल दिया है यह एक बेहद खतरनाक संकेत है कि हमारे देश में सन 1901-2018 की अवधि में ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के कारण औसत तापमान पहले ही लगभग 0.7 डिग्री सेल्सियस बढ़ गया है और अनुमान है कि यदि हमने माकूल कदम नहीं उठाये तो 2100 के अंत तक यह बढौतरी लगभग 4.4 डिग्री सेल्सियस हो जायेगी | औद्योगिक क्रांति के पहले वैश्विक औसत तापमान में लगभग एक डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हुई है। 2015 के  पेरिस समझौते में यह संकल्प किया गया कि औद्योगिक क्रांति के पहले के मानकों कि तुलना में ग्लोबल वार्मिंग को दो डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखा जाए और तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक रोका जाए लेकिन आज ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के जो हालात हैं उसके मुताबिक़ तो दुनिया के  औसत तापमान में 3 से 5 डिग्री सेल्सियस की बढौतरी को नियंत्रित करना असम्भव है भारत की रिपोर्ट में भी आगाह किया गया है कि 2100 के अंत तक, भारत में गर्मियों (अप्रैल-जून) में चलने वाली लू या गर्म हवाएं 3 से 4 गुना अधिक हो सकती हैं | इनकी औसत अवधि भी दुगनी होने का अनुमान है वैसे तो लू का असर सारे देश में ही बढेगा लेकिन घनी आबादी वाले भारत-गंगा नदी बेसिन के इलाकों में इसकी मार ज्यादा तीखी होगी । रिपोर्ट के अनुसार, उष्णकटिबंधीय हिंद महासागर के समुद्र की सतह का तापमान (एसएसटी) भी 1951–2015 के दौरान औसतन एक डिग्री सेल्सियस बढ़ा है, जो कि इसी अवधी के वैश्विक औसत वार्मिंग 0.7 डिग्री सेल्सियस से अधिक है

तापमान में वृद्धि का असर भारत के मानसून पर भी कहर ढा रहा है| सनद रहे हमारी खेती और अर्थ व्यवस्था का बड़ा दारोमदार अच्छे मानसून पर निर्भर करता है । रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत के ऊपर ग्रीष्मकालीन मानसून वर्षा (जून से सितंबर) में 1951 से 2015 तक लगभग छह प्रतिशत की गिरावट आई है, जो भारत-गंगा के मैदानों और पश्चिमी घाटों पर चिंताजनक हालात तक  घट रही है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि गर्मियों में मानसून के मौसम के दौरान सन 1951-1980 की अवधि की तुलना में वर्ष 1981–2011 के दौरान 27 प्रतिशत अधिक दिन सूखे दर्ज किये गए | इसमें चेताया गया है कि  बीते छः दशक के दौरान बढती गर्मी और मानसून में कम बरसात के चलते देश में सुखा-ग्रस्त इलाकों में इजाफा हो रहा है | खासकर मध्य भारत, दक्षिण-पश्चिमी तट, दक्षिणी प्रायद्वीप और उत्तर-पूर्वी भारत के क्षेत्रों में औसतन प्रति दशक दो से अधिक अल्प वर्षा और सूखे दर्ज किये  गए | यह चिंताजनक है कि  सूखे से प्रभावित क्षेत्र में प्रति दशक 1.3 प्रतिशत की वृद्धि हो रही है रिपोर्ट ने संभावना जताई है कि जलवायु परिवर्तन की मार के चलते ना केवल सूखे की मार का इलाका बढेगा, बल्कि अल्प वर्षा की आवर्ती में भी औसतन वृद्धि हो सकती है

हिमालय पर गंभीर प्रभाव
रिपोर्ट में कहा गया है कि हिंदू कुश हिमालय (एचकेएच) क्षेत्र में 1951-2014 के दौरान लगभग 1.3 डिग्री सेल्सियस तापमान वृद्धि दर्ज की गयी है । एचकेएच के कई क्षेत्रों में हाल के दशकों में बर्फबारी और ग्लेशियरों के पीछे हटने की घटनाओं  में गिरावट आई है। इसके विपरीतबहुत उंचाईवाले काराकोरम हिमालय में अधिक  हिमपात हो रहा  है, इसी के चलते वहां ग्लेशियर सिकुड़ नहीं पाए हैं । इक्कीसवीं सदी के अंत तक, एचकेएच पर वार्षिक औसत सतह के तापमान में लगभग 5.2 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि होने का अनुमान है| मानवजन्य गलतियों के कारण बढ़ते तापमान और जलवायु परिवर्तन के चलते  19512014 के दौरान प्रति दशक हिमालय और तिब्बती पठार के ताप में 0.2 डिग्री की दर से वृद्धि हुई है। 
रिपोर्ट में कहा गया है कि एचकेएच क्षेत्र में भविष्य में ,2100 के अंत तक तापमान में  2.6-4.6 डिग्री सेल्सियस  वृद्धि का अनुमान है | यदि ऐसा हुआ तो हिमपात कम होगा और इससे ग्लेशियर के आकार घटेंगे और इसका असर जलविद्युत परियोजना और खेती किसानी पर बहुत बुरा होगा ।
 
भारत की जल, खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा पर संकट 
केंद्रीय पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय की रिपोर्ट में कहा गया है कि मीठे पानी की उपलब्धता पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव भारत के लिए चिंता का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है और जलवायु परिवर्तन के कारण बरसात का स्वरुप बदल रहा है | इसके चलते बाढ़ और सुखाड दोनों की मार और तगड़ी होगी , साथ ही सतही और भूजल के रिचार्ज का गणित गडबड़ायेगा और यह देश की जल सुरक्षा के लिए खतरा है। 
इसी तरह बढ़ते तापमान, गर्मी और बरसात के चरम से , देश की खाद्य सुरक्षा पर भी दवाब रहेगा , क्योंकि इसके चलते वर्षा-आधारित खेती चौपट हो सकती है । जब गर्मी असहनीय होगी तो उससे बचने के लिए परिवेश को ठंडा करने के लिए ऊर्जा की मांग में वृद्धि होने की संभावना है, और यदि इसकी आपूर्ति के लिए अगर तापीय उर्जा (थर्मल पावर) पर निर्भर रहे तो जाहिर है कि ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में और वृद्धि होगी। यही नहीं बिजली पैदा करने के लिए तापीय उर्जा बिजलीघरों के शीतलन के लिए पानी की जरूरत में भी इजाफा होगा। इस तरह के पानी की मांग की आपूर्ति के लिए बांध के जलाशयों, नदियों और नहरों के मीठे पानी की खपत होगी और इसके चलते खेती , पेय जल आदि के लिए पानी कि खपत में कटौती करना होगा। पहले से ही जल संकट झेल रहे इलाकों में ये हालात तबाही ला देंगे । वहीँ समुद्री  तट के आसपास स्थापित बिजली संयंत्र, जो शीतलन के लिए समुद्री जल का उपयोग करते हैं, समुद्र जलस्तर में वृद्धि, चक्रवात और तूफान से नुकसान की चपेट में आयेगें |  रिपोर्ट बताती है कि जलवायु परिवर्तन के कारण देश की  देश की ऊर्जा संरचना और आपूर्ति की आत्मनिर्भरता प्रभावित हो सकती है। । 

वनों और शहरी हरियाली  को सहेजें

पृथ्वी विज्ञानं मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में  जलवायु परिवर्तन की निरंतर निगरानी, क्षेत्रीय इलाकों में हो रहे बदलावों का बारीकी से आकलन , जलवायु परिवर्तन के नुक्सान , इससे बचने के उपायों को शैक्षिक सामग्री में शामिल करने, आम लोगों को इसके बारे में जागरूक करने  के लिए अधिक निवेश करने की जरुरत है । जैसे कि देश के समुद्री तटों पर जीपीएस के साथ ज्वार-भाटे का अवलोकन करना , स्थानीय स्तर पर समुद्र के जल स्तर में आ रहे बदलावों के आंकड़ों को एकत्र करना आदि | इससे समुद्र तट के संभावित बदलावों का अंदाजा लगाया जा सकता है और इससे तटीय शहरों में रह रही आबादी पर संभावित  संकट से निबटने की तैयारी की जा सकती है | इसी प्रकार इस तरह के आंकड़ों का आकलन जिला और गांव-स्तर पर पानी के संचय , संभावित मानसून और गर्मी के अनुरूप फसल बोने, बीज के चयन आदि में भी मार्गदर्शक होगा ।
रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया है कि शहर और महानगरों में पर्यावरण को कम से कम नुकसान पहुँचाने वाली विकास योजनायें और “ग्रीन बिल्डिंग” बनायी जाएँ तो बढती गर्मी के प्रकोप और वायु प्रदुषण को कुछ कम किया जा सकता ।
समुद्र के उबलने पर चिंता करना जरुरी 
जलवायु परिवर्तन के कारण समुद्र बहुत अधिक प्रभावित हो रहे हैं, सनद रहे ग्लोबल वार्मिंग से उपजी गर्मी का 93 फीसदी हिस्सा समुद्र पहले तो उदरस्थ कर लेते हैं फिर जब उन्हें उगलते हैं तो ढेर सारी व्याधिया पैदा होती हैं, हम जानते ही हैं कि बहुत सी चरम प्राकृतिक आपदाओं जैसे कि बरसात, लू , चक्रवात, जल स्तर में वृद्धि आदि, का उद्गम स्थल महासागर या समुद्र  ही होते हैं | जब बाहर की गर्मी के कारण समुद्र का तापमान बढ़ता है तो अधिक बादल पैदा होने से भयंकर बरसात, गर्मी के केन्द्रित होने से चक्रवात , समुद्र की गर्म भाप के कारण तटीय इलाकों में बेहद गर्मी पढ़ना जैसी घटनाएँ होती हैं .  रिपोर्ट कहती है कि समुद्र में हो रहे परिवर्तनों की बारीकी से निगरानी, उन आंकड़ों का आकलन और अनुमान , उसके अनुरूप उनिलकों की योजनायें तैयार करना समय की मांग हैं |
 
रिपोर्ट कहती है कि यदि हम वायु प्रदुषण पर काबू पा सके तो इन्सान और परिवेश, दोनों के पर्यावरण पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा और इससे कार्य दक्षता में सुधर होगा | रिपोर्ट कहती है कि तापमान बढ़ने से बरसात बढ़ सकती है और यदि हम चाहें तो इसे अवसर में बदल सकते हैं- जरूरत इस बात की होगी कि हम आसमान से गिरने वाली हर बूंद को सहेजने के लायक संरचनाएं तैयार कर सकें , इससे हमारी विद्युत उत्पादन क्षमता पर भी सकारात्मक असर होगा ।
आज जरूरत इस बात की हैं कि हम जलवायु परिवर्तन संकट निदान की दिशा में  “थिंक ग्लोबली- एक्ट लोकली “ की नीति पर चलें . वैश्विक  अनुबंध आमतौर पर विकसित देशों के हितों के अनुरूप हैं लेकिन हमारी रिपोर्ट हमारे स्थानीय खतरों और निदान पर विमर्श करती है , जाहिर है कि हमारी कार्य योजना इस देशी रिपोर्ट को आधार बना कर तैयार की जाए |

 

Enrico Fermi : Inventor of Atom bomb

 जो बचा ना सका बम का दुरूपयोग

एनरिको फेर्मि(1901-1954)
पंकज चतुर्वेदी



उसने कायनात के सबसे मासूम और छोटे कण की ताकत का जान लिया था, वह चाहता था कि इस असीम शक्ति  का इस्तेमाल मानवता की भलाई में हो; इसके लिए उसने देश छोड़ा, घर-बार छोड़ा लेकिन बम तो विध्ंवस के लिए ही होता  है। बस! हाथ बदले, अणु शक्ति  का दुरूपयोग नहीं बदला। 29 सितंबर 1901 को रोम में जन्मे एनरिको फेर्मि जब स्कूल में थे, तब उनकी रूचि गणित विषय  में अधिक थी। फेमि के बचपन का सबसे अच्छा दोस्त उनका बड़ा भाई था। वे दोनों साथ-साथ बिजली की मोटरें व मशीनें बनाते, । दोनों ने कई किताबें खंगालीं और हवाई जहाज  के नक्शें व माडल भी तैयार किए। दुर्भाग्य सन 1915 में फेर्मि के भाई ग्यूलियों की मौत हो गई । 16 साल के फेर्मि के लिए यह बहुत बड़ा सदमा था। लेकिन उसने अब किताबों को अपना साथी बना लिया।  19 साल की आयु में उन्हें ‘स्कूलो नार्मले सुपरिएरे’ फेलोशिप मिली। फेर्मि ने चार साल पीसा विश्वविद्यालय में बिताए और 1922 में भौतिकी में डाक्टरेट की डिगरी हांसिल की। 1927 में उन्हें पीसा यूनिवर्सिटी में भौतिकी के प्रोफेसर का पद मिला और वे इस पर सन 1838 तक रहे। सन 1928 में प्रोफेसर फेर्मि का विवाह लोरा केपान से हुआ । इनके एक बेटी नेल्ला व एक बेटा ग्लूडो हुआ।

आने वाले सालों में फेर्मि ने सांख्यिकी के एक महत्वपूर्ण सिद्धांत की ख्,ाोज की, लो आज भी ‘‘फेर्मि स्टेटिस्टीक’’ के नाम से माहूर है। एक तरफ फेर्मि जैसे वैज्ञानिक मानवता के विकास के लिए नई-नई खोाजेंा में लगे हुए थे तो दूसरी ओर हिटलर ने यहूदियों के सफाए की मुहिम चला रखी थी। 1934 में क्यरी और जोलिअट द्वारा रेडियो एक्टिव विकिरण कर अणु-शक्ति की दुनिया का नया अध्याय खुल चुका था। ठीक इसी समय फेर्मि ने ‘बीटा-क्षरण सिद्धांत’ का प्रतिपादन कर सबसे छोटे कण की ताकत के इस्तेमाल का मार्ग प्रशस्त कर दिया था।  अब पूरी दुनिया पर अपनी सत्ता कायम करने के लिए जर्मनी परमाणु बम की संभावनाओं पर काम कर रहा था। उधर रोम में मुसोलीन का फासीवाद भी चरम पर था। फेर्मि का अपने ही देश में दम घुट रहा था। एक सार्वजनिक आयेाजन में फेर्मि ने खुल कर कहा-‘‘विज्ञान की उन्नति के लिए हर तरह की स्वतंत्रता चाहिए, किसी तरह की पांबदी नहीं।’’ फासी-सत्ता को इस तरह के बयान कहां सहन होते ? वे दिन इस महान वैज्ञानिक के घुटन के थे। 

फेर्मि ने परमाणु आंतरिक संरचना, नाभिकीय अभिक्रियाओं और न्यूट्रान की बौछारों से एक तत्व को दूसरे में परिवर्तित करने का महत्वपूर्ण काम  किया । इस खोज पर उन्हें 1938 में नोबेल पुरस्कार मिला। नोबेल सम्मान लेने के नाम पर उन्होंने देश से बाहर जाने की अनुमति ली और सपरिवार रोम से बाहर आ गए। बाद में वे अमेरिका में बस गए। सन 1938 से 1942 तक वे कोलंबिया यूनिवर्सिटी में भौतिकी के प्रोफेसर रहे।  वे परमाणु बम बनाने की पहली मेनहट्टन परियोजना के प्रमुख बनाए गए। तभी उन्होंने अल्बर्ट आईन्स्टीन को बताया कि किस तरह युद्ध पर आमादा जर्मनी अणु बम बनाने की कोशिशें कर रहा है। आईन्स्टीन ने इसकी जानकारी अमेरिका केे राश्ट्रपति रूजवेल्ट को दी। इधर फेर्मि  परमाणु की ताकत की चरम ताकत के इस्तेमाल की विधि को जान चुके थे। 02 दिसंबर 1942 को शिकागो यूनिवर्सिटी में परमाणु की नियंत्रित श्रृंखला का परीक्षण किया गया और इस तरह अमेरिका ने परमाणु बम बना लिया। 

 यह दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि विश्व षांति के लिए अपना देश छोड़ने वाले वैज्ञानिक की महानतम खोज का दुरूपयोग 16 अगस्त 1946 को जापान के हिरोशिमा और इसके तीन दिन बाद नागासाकी पर किया गया। षायद दूसरे विश्व युद्ध का अंत इसी तरह होना था। घूमने, पहाड़ो पर चढ़ने जैसे रोमांचक खेलों के षौकीन  फेर्मि इस दुरूपयोग से बेहद दुखी थे। वे परमाणु षक्ति का प्रयोग षांतिपूर्ण कार्यों में करने के हिमायती थे। 28 नवंबर 1954 में शिकागो में उनका देहांत हो गया। 

पंकज चतुर्वेदी


बुधवार, 2 फ़रवरी 2022

Hindu Minority are in Trouble in Pakistan

 बहुत मुश्किल है पाकिस्तान में हिन्दू होना

पंकज चतुर्वेदी

 


साल के शुरू होते ही दो  जनवरी को सिंध प्रान्त के खैरपुर  कसबे के “पीर जो गोठ” बाज़ार में दिन दहाड़े व्यापारी सुनील  को चाकुओं से गोद कर मार डाला गया , उसकी लाश दो घंटे सडक पर पड़ी रही. तीन जनवरी को बदीन जिले के गोलिरच  कसबे से पन्द्रह साल की रजनी का अपरहण 41 साल के मनुल्लाह ने किया, लड़की के परिवार वाले थाने जाते तब तक उसने लडकी का धर्म बदलवा कर नाम फातिमा शेख किया व् निकाह कर लिया . 15 जनवरी को सिंध के मोड़ कस्बे में दीवान कमलेश कुमार का अपरहण हुआ और दो दिन बाद उसकी लाश मिली. 17 जनवरी को कराची के सबसे पोश इलाके क्लिफ्टन  में बेंक से 74 ल्कः रूपये निकलवा कर  आ रहे व्यापारी वीरभान को दिन दहाड़े चाकुओं से गोद कर पैसे लूट लिए गए . 19 जनवरी कि सिंध में ही आठ साल के कान्हा के साथ दुष्कर्म किया गया और फिर पत्थरों से कुचल कर निर्ममता से मार डाला गया . पाकिस्तान में इस महीने में यह पांचवे हिन्दू की ह्त्या है . अभी 23 जनवरी को ही जिला थारपारकर की  मिट्ठी तहसील में खत्री मोहल्ला के हिंगलाज भवानी के मंदिर  को ध्वस्त कर दिया गया  इस कसबे में हिन्दू आबादी 76.3 प्रतिशत है . यह एक गंभीर मसला है की बीते 22 महीनों में यह हिन्दू मंदिरों पर 11 वां बड़ा हमला है .

भले ही पाकिस्तान में गुरुनानक देव से जुड़े स्थानों के लिए करतारपुर साहेब गलियारे के माध्यम से अल्पसंख्यक सिखों को खुश करने के लिए पाकिस्तान प्रयास करता दिखता हो लेकिन बीता साल पाकिस्तान में हिन्दुओं के लिए तबाही  ले कर आया है . यह तय है कि यदि पाकिस्तान में यही हालात रहे तो आगामी एक दशक में वहां हिन्दुओं का नामोनिशान मिट जाएगा , सन 2021 में वहां बीस हज़ार हिन्दुओं का धर्म परिवर्तन करवाया गया , 11 मंदिर तोड़े गए , 28 हिन्दुओं की ह्त्या की गई और 18 ने धार्मिक प्रताड़ना के चलते ख़ुदकुशी कर ली , सबसे बड़ी बात शायद यह दुनिया का ऐसा विरला देश हो जहां अपने यहाँ अल्पसंख्यक आबादी के आंकड़े छुपाये जाते हैं .


सन 2017 की जनगणना के मुताबिक पाकिस्तान की आबादी कोई 20.77 करोड़ है जिसमें से 22 लाख के करीब  हिन्दू हैं . पाकिस्तान में सन 1951 में 1.60 फीसदी , 1961 में 1.45, सन 72 में 1.11 , सन  1981 में 1.85 और २०१७ में 1.73 प्रतिशत हिन्दू आबादी का आंकडा है . हालांकि पाकिस्तान में हिन्दू नेताओं का कहना है कि देश में कोई एक करोड़ हिन्दू हैं और चूँकि अधिकाँश  के पास  राष्ट्रीय पहचान पत्र (एन आई सी ) है नहीं सो उनकी गणना  होती नहीं . देश में सबसे ज्यादा हिन्दू  सिंध में, कुल आबादी का 8.73 फीसदी हैं . पंजाब राज्य में ०.19, खैबर पख्तुन्बा में ०.02, बलोचिस्तान में ०.40 और इस्लामाबाद में ०.04 प्रतिशत हिन्दू आबादी का सरकारी आंकडा है .  राजस्थान से सटे थारपारकर जिले  में  सात लाख 14 हज़ार,६९८  हिन्दू रहते हैं तो मीरपुरखास में पांच लाख के करीब, सग्घर में चार लाख 46 हज़ार हैं तो बदिन, हैदराबाद , टंडो मुहम्मद खान और रहीम यार खान जिलों में एक से डेढ़ लाख हिन्दू रहते हैं यहाँ उमरकोट जिले की आबादी का 52.15 फीसदी हिन्दू है और यहाँ के राजपूत शासक बड़े ताक़तवर हैं .  विडम्बना यह है कि हिन्दू बाहुल्य इलाकों से भी कभी हिन्दू सांसद या विधायक चुने नहीं जाते क्योंकि इस आबादी के नाम ही वोटर लिस्ट में होते नहीं या उनके वोट और कोई डालता  है .


दुर्भाग्य है कि कट्टरपंथी, आतंकी गिरोहों से समर्थन  प्राप्त और राजनितिक रूप से ताक़तवर लोग पाकिस्तान में हिदुओं की आबादी को पूरी तरह मिटाने के लिए निरंकुश काम आकर रहे हैं . इसी साल सर्वाधिक हिन्दू जनसंख्या वाले सिंध प्रान्त के  हरुनाबाद जिले के मिठ्ठी कसबे में 3700  और जैकबाबाद जिले के सगर कसबे के 5700 लोगों का सामूहिक धर्म परिवर्तन  करवा कर वहां के मंदिरों में ताले डाल दिए गए .

पाकिस्तान में भारत से जाने वालों को स्थानीय  ख़ुफ़िया दफ्तर में अपनी आमद के लिए जाना होता हा लेकिन यदि यात्री हिन्दू है तो उसका रिकार्ड अलग से होता है, उसकी डेस्क अलग से है और उससे पूछताछ भी कुछ ज्यादा होती है . पाकिस्तान की जेलों में बंद सैंकड़ों गैर मुस्लिम नाविकों या कथित जासूसी में पकड़े गए लोगों को इस तरह रतादित किया जाता है कि वे जेल में इस्लाम काबुल करलेते हैं . हिन्दू कैदी को कैद से बाहर ना निकालना, भोजन देने  में  भेदभाव , जैसे कई ऐसे मसले होते हैं कि कैदी मजबूर हो कर इस्लाम कबूल  करता है . शायद इसका कारण है कि वहां लोगों के दिल में बैठा दिया गया है हिन्दू, वह भी भारत से , देश के लिए संदिग्ध ही है .


पाकिस्तान में धर्म परिवर्तन विरोधी कानून बनाते हैं लेकिन कट्टरपंथी  जमात के विरोध के चलते ठन्डे बसते में चले जाते हैं , बीते साल वहां 18 साल से कम के लोगों के धर्म परिवर्तन पर पाबंदी का कानून आया लेकिन मुल्ला- मौलवियों के विरोध के चलते उसे वापिस ले लिया गया . वहां धर्म परिवर्तन को सबाव अर्थात पुण्य का काम कहा  जाता है और इस्लामिक कानून के तहत ऐसी पाबंदी धर्म विरोधी कह कर गवर्नर ने कानून रद्द कर दिया था . पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग की बीते साल की रिपोर्ट बेशर्मी से स्वीकार करती है कि देश में हर साल अल्पसंख्यक समुदाय की कोई एक हजार लड़कियों का धर्म परिवर्तन करवाया जाता है और ये 12 से 25 साल उम्र की होती हैं . सन 2004 से 2018 के बीच अकेले सिंध प्रान्त में 7430 हिन्दू लड़कियों के अपरहण के मामले दर्ज किये गये , कहनी की जरूरत नहीं कि वहां बड़ी संख्या में मामले थाना पुलिस तक जाते ही नहीं हैं , चूँकि सिंध के बड़े जागीरदारों के यहा अधिकांश  हिन्दू  मजदुर हैं और वह भी तीन तीन पीढ़ियों से लगभग बंधुआ मजदुर की तरह, सो उनकी कोई आवाज़ नहीं होती .  धर्म बदलने के पीछे  गरीबी, अशिक्षा और वैधानिक असुरक्षा भी बड़ा कारण है . कराची शहर में  हाट-बाज़ार में सब्जी बेचने वाले , छोटे मोटे धंधे करने वाले अधिकाँश हिन्दू ही होते है जो हवाई अड्डे के पास मलेर और लालुखेत जैसे  झोपड़-झुग्गी वाले इलाकों में रहते हैं, जहां मुस्लिम माफिया का राज चलता  है .हालाँकि इस महानगर में बड़ी संख्या में डोक्टर हिन्दू हैं और उनकी खासी इज्जत है.

सबसे बड़ी समस्या पाकिस्तान के शिक्षा तन्त्र में है , वहां की स्कूली किताबों में  हिन्दुओं को खलनायक बताया जाता है और आज़ादी की लड़ाई में मुस्लिम लीग और कांग्रेस की भूमिका को हिन्दू-मुस्लिम टकराव , वहां की किताबों में देश के हिन्दुओं की वफादारी को भारत के साथ जोड़ा जाता है , वहां किसी भी किताब में किसी हिन्दू चरित्र की तारीफ़ की ही नहीं जाती . पाकिस्तान के संविधान के आर्टिकल 20-22 में धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लेख था लेकिन जुलाई  1977 में जिया उल हक ने  देश में मार्शल ला घोषित किया और संविधान में बदलाव कर  गैर मुस्लिमों की धार्मिक स्वतंत्रता पर कई पाबंदियां लगा दीं , पाकिस्तान में राष्ट्रपति केवल मुस्लिम ही बन सकता है और सभी उच्च पदों पर  मुस्लिम आयतों के साथ शपथ लेना अनिवार्य है . इसके कारण वहां हिन्दुओं को सदैव दोयम माना जाता है .  पाकिस्तान में हिन्दुओं पर सबसे बड़ा खतरा वहां का ईश निंदा कानून है जिसकी आड़ में भीड़ हिंसा में किसी को भी मार देने पर कोई खास कार्यवाही नहीं होती , अभी ढेढ़ महीने पहले ही एक श्रीलंका के निवासी कपड़ा मिल के मेनेजर को इसी तरह के आरोप लगा कर निर्ममता  मार दिया गया था .

हिन्दू या सनातन धर्म का कम से कम तीन हजार साल पुराना अतीत सरहद पार है- मोईन जोद्रो या हड़प्पा के रूप में और हिंगलाज और कटासराज मंदिर सहित कई प्राचीन इमारतों के रूप में , दुर्भाग्य है कि पाकिस्तान बनते समय मुहम्मद अली जिन्ना  ने वहां धार्मिक आज़ादी की बात की थी लेकिन अब पाकिस्तान “जिन्ना के पाकिस्तान से जेहाद के पाकिस्तान” में तब्दील हो गया है  और इसका सबसे बड़ा खामियाजा हिन्दू आबादी को उठा पड रहा है . जरूरत है कि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय  पाकिस्तान में हिन्दू धर्म और उससे जुड़े  चिन्हों को सहेजने, वहां की हिन्दू आबादी को शैक्षिक और आर्थिक रूप से सशक्त करने के लिए पाकिस्तान सरकार पर दवाब बनाए .

मंगलवार, 1 फ़रवरी 2022

Debt-burdened Agriculture

 कर्जे के बोझ में दबी खेती किसानी

पंकज चतुर्वेदी


महाराष्ट्र सरकार ने बीते तीन सालों  के दौरान किसानों के 39 हज़ार करोड़ के कर्जे माफ़ किये , बावजूद इसके वहां बीते साल जनवरी से नवम्बर के ग्यारह महीनों में 2498 किसानों ने आत्महत्या की. सं 2020 में यह आंकडा 2547 था. यह सरकारी आंकडा है कि औसतन हर दिन दो हज़ार किसान खेती से मुंह मोड़ रहे हैं . देश के आधे से अधिक किसान परिवार कर्जे में दबे हैं और औसतन 74 ,121 रूपये प्रति परिवार कर्जा है . इसमें से 69.9 प्रतिशत  कर्ज बेंक या सहकारी समितियों से है जबकि 20.5 फीसदी साहूकारों से . हालांकि भारत की अर्थ  व्यवस्था में खेती अक योगदान 14 % है लेकिन इससे कुल रोजगार का 42 % सृजित होता है .  एक तरफ जलवायु परिवर्तन के कारण अनियमित और चरम मौसम ने देश में दस्तक दे दी है , दूसरी तरफ बढती आबादी का पेट भरने के लिए आत्म निर्भरता अनिवार्य है . जब देश में खेती का 55 फीसदी  बरसात पर निर्भर हो  तो जाहिर है कि खेती- किसानी से कोताही देश की सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा हो सकता है .

एक साल तक चले किसान आन्दोलन में सबसे बड़ी भूमिका निभाने वाले पंजाब में अभी दिसम्बर 21 में 1200 करोड़ के किसानी कर्जे माफ़ किये गये  लेकिन देखते ही देखते 14 हजार हेक्टेयर अर्थात कुल जमीन का 0.33 प्रतिशत पर खेती बंद हो गई। पश्चिम बंगाल में 62 हजार हेक्टेयर खेत सूने हो गए तो केरल में 42 हजार हेक्टेयर से किसानों का मन उचट गया। देश के सबसे बड़े खेतों वाले राज्य उत्तर प्रदेश का यह आंकड़ा अणु बम से ज्यादा खतरनाक है कि राज्य में विकास के नाम पर हर साल 48 हजार हेक्टेयर खेती की जमीन को उजाड़ा जा रहा है। मकान, कारखानों, सड़कों के लिए जिन जमीनों का अधिग्रहण किया जा रहा है वे अधिकांश अन्नपूर्णा रही हैं। इस बात को भी नजरअंदाज किया जा रहा है कि कम होते खेत एक बार तो मुआवजा मिलने से प्रति व्यक्ति आय का आंकड़ा बढ़ा देते हैं, लेकिन उसके बाद बेरोजगारों की भीड़ में भी इजाफा करते हैं। यह भी सच है कि मनरेगा में काम बढ़ने से खेतों में काम करने वाले मजदूर नहीं मिल रहे हैं और मजदूर ना मिलने से किसान खेती को तिलांजलि दे रहे हैं। नेशनल सैंपल सर्वे के आंकड़े बताते हैं कि आंध्र प्रदेश के 82 फीसदी किसान कर्ज से दबे हैं। पंजाब और महाराष्ट्र में यह आंकड़ा औसतन 65 प्रतिशत है। इन राज्यों में ही किसानों की खुदकुशी की सबसे अधिक घटनाएं प्रकाश में आई हैं।

 राजस्थान में 61.8 फीसद किसान-परिवार कर्जदार हैं तो उत्तरप्रदेश में आधे से अधिक(50.8 प्रतिशत) किसान-परिवारों पर कर्जा है। मघ्यप्रदेश के 45.7 फीसद किसान-परिवारों पर कर्ज की रकम चढ़ी है तो उत्तराखंड में ऐसे किसान-परिवारों की संख्या 43.8 प्रतिशत हैं।

राष्ट्रीय सांख्यिकीय कार्यालय की रिपोर्ट से यह भी झांकता है कि 2013 से 2019 के बीच कई राज्यों में किसान-परिवारों पर मौजूद कर्जे में बेतहाशा बढ़ोत्तरी हुई है। मिसाल के लिए, असम के किसानों पर छह साल की अवधि में कर्जा 382 प्रतिशत बढ़ा है तो त्रिपुरा के किसानों पर कर्जे की रकम में 378 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है। मिजोरम में तो किसान-परिवारों पर कर्जे की रकम में 709 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है।

छह सालों में किसान-परिवारों पर कर्जे की रकम में शत-प्रतिशत से ज्यादा बढ़ोत्तरी वाले अन्य राज्यों में प्रमुख हैं छत्तीसगढ़ (110.2 प्रतिशत), हरियाणा (131.5 प्रतिशत), हिमाचल प्रदेश (206.5 प्रतिशत), मध्यप्रदेश (131.8 प्रतिशत), नगालैंड (191.7 प्रतिशत) और सिक्किम (225.1 प्रतिशत)।

 

अब हरियाण को ही लें , जिस राज्य की 81 फीसदी जमीन खेती लायक हो, जहां की दो तिहाई आबादी खेती पर निर्भर हो , जहां 65 प्रतिशत लोग गाँव में रहते हों और वहां की कृषि विकास साल दर साल  साल घटती जाए तो यह न केवल बड़े आरती संकट बल्कि सामजिक विग्रह की तरफ  भी इशारा है . हाल ही में समाप्त हुए कृषि कानून विरोधी आन्दोलन का असर हरियाणा के गाँवों में गहराई से देखा गया, उसके राजनितिक कारक भले ही अन्य कई हों लेकिन जमीनी हकीकत तो यह है कि देश में कृषि आय के मामले में तीसरे स्थान पर रहने की बावजूद यहा किसान साल भर में औसतन एक चपरासी के वेतन से भी कम मुनाफ़ा निकाल पाता है , एक तो विभिन्न विकास कार्य में जमीन का अधिग्रहण और फिर बढ़ते परिवार के साथ जोत का आकार बहुत कम होना, खेती में लागत बढ़ने , कर्ज के चस्के में फंसा किसान और गैर पारम्परिक फसलों के जरिये जल्दी पैसा कमाने की चाहत ने हरियाणा में खेती के अस्तित्व पर ही संकट खड़ा कर दिया है .

नेशनल सेम्पल सर्वे ओर्गेनाजेशन की ताजा सालाना रिपोर्ट बताती है कि हरियाणा के किसान की मासिक आय औसतन 22 , 841 रूपये है . यह तब है जब इस आय में परिवार द्वारा खेती के लिए  कए गए श्रम-मजदूरी की गणना की नहीं गई है – जाहिर है कि यह कमाई एक सबसे नीचे पायदान के सरकारी कर्मचारी से भी बहुत कम है . हरियाण में कोई 24.8 लाख किसान हैं और 15 .28 लाख खेतिहर मजदूर . किसानो के 49 .32  प्रतिसह्त के पास  जोत की जमीन एक हेक्टेयर से भी कम है  , जबकि एक से दो हेक्टेयर वाले किसान 19 .29 फीसदी हैं . 17 . 79 प्रतिशत किसानो के पास चार से दस हेक्टेयर जमीन का मालिकाना हक है  और महज 2 .52 फीसदी किसान ही 10 हेक्टेयर से अधिक के मालिक हैं. शायद तभी राज्य में खेती छोड़ने वालों की संख्या भी बढ़ रही है, जहां सन 1983 में राज्य में 71% पुरुष किसान थे , आज ये घट कर 35 % रह गए हैं इस अवधी में महिला किसानों की संख्या 90 से कम हो कर 61% रह गई .

यही कारण है कि हरियाणा का किसान हर दिन कर्ज के दल दल में धंसता जा रहा हैं , राज्य के 45 लाख 95 ,805 धरती पुत्रों पर इस समय 79,31 हज़ार करोड़ कर्ज की देनदारी है   एक बारगी लगता है कि कर्जदार की संख्या किसान स ज्यादा क्यों है ? असल में कई किसानों पर दो- तीन किस्म के कर्जे चढ़े हैं – बीज , खाद,  बागवानी, पशु या मछली पालन  या सिंचाई के लिए , इस दुश्चक्र में फंसे लगभग ढाई लाख किसान हर साल  बेंक में डिफाल्टर हो जाते हिन् . इसके अलावा आढती या स्थानीय सूद खोर का कर्जा अलग होता है .जान लें सन 2015 में महज 8.75 लाख किसानो पर  राष्ट्रीकृत , भूमि विका या सहकारी बेंक का 56 .336 करोड़ का कर्जा  था . किसानी को चट करते कर्जे की  भयानक तस्वीर यह है कि हरियाणा के 75 फीसदी किसानों की जमीनें सहकारी समिति के पास गिरवी रखी हैं . किसान कर्ज का मूल चूका नहीं पाता  और हर साल उस पर 14  फीसदी सालाना ब्याज बढ़ रहा है और साथ में कर्ज का भार भी . यह तब है कि  विभिन्न सरकारी योजना के तहत कोई 42 लाख हितग्राहियों को 11 हजार करोड़ का लाभ – किसान सम्मान निधि, आप्दमें खराब फसल का मुआवजा आदि के रूप में किसान को दिया जाता है . सरकार ब्याज माफ़ी योजना की भी घोषणा कर चुकी है लेकिन यह तभी संभव है जब किसान मूल की रकम जमा करा सके . राज्य के फतेहाबाद जैसे सबसे छोटे जिले में 95 प्रतिशत  किसान सहकारी समिति और  बेंक दोनों के कर्जे से दबे हैं  कोई 97 हज़ार कर्जाधारी किसानों  में से 70 प्रतिशत डिफाल्टर घोषित हैं  और उनकी जमीन जब्त होने की स्थिति में हैं .

हरियाणा में किसान का संकट खाद –बीज से ले कर सिंचाई और मंडी तक अनंत है , बीज  घटिया मिलते हैं तो कहीं यूरिया के लिए लम्बी कतारें, उस पर भी महंगाई की मार .किसानों के ट्रेक्टर  पर दस साल में कबाड़ा हो जाने के एन जी टी के आदेश की मार ने भी असर डाला है फिर डीज़ल की बेतहाशा कीमतों ने  लागत बढ़ा दी. राज्य के 14 जिलों के 141 विकास खण्डों में से 85  भू जल के मामले में “लाल निशान “ से चिन्हित हैं जबकि 64  विकास खंड को डार्क ज़ोन में दर्ज किया गया है तेजीसे गिर रहे भूजल और धन की खेती की बढती चाहत ने पानी उगाहने के मद में व्यय बढ़ा दिया है, गहरा कुना हो तो पानी उलीचने में ज्यादा बिजली या डीज़ल लगता है . अधिक सिंचाई और जंगल व् अरावली पर हो रहे लगातार हमलों के चलते राज्य में हर साल बंजर और  रेतीली धरती का दायरा भी बढ़ रहा है .

एक बात जान लेना जरूरी है कि किसान को ना तो कर्ज चाहिए और ना ही बगैर मेहनत के कोई छूट या सबसिडी। इससे बेहतर है कि उसके उत्पाद को उसके गांव में ही विपणन करने की व्यवस्था और सुरक्षित भंडारण की स्थानीय व्यवस्था की जाए। किसान को सबसिडी से ज्यादा जरूरी है कि उसके खाद-बीज- दवा के असली होने की गारंटी हो तथा किसानी के सामानों को नकली बचने वाले को फंासी जैसी सख्त सजा का प्रावधान हो। अफरात फसल के हालात में किसान को बिचौलियों से बचा कर सही दाम दिलवाने के लिए जरूरी है कि सरकारी एजंेसिया खुद गांव-गांव जाकर  खरीदारी करे। सब्जी-फल-फूल जैसे उत्पाद की खरीद-बिक्री स्वयं सहायता समूह या सहकारी के माध्यम से  करना कोई कठिन काम नहीं है।  एक बात और इस पूरे काम में हाने वाला व्यय, किसी नुकसान के आकलन की सरकारी प्रक्रिया, मुआवजा वितरण, उसके हिसाब-किताब में होने वाले व्यय से कम ही होगा। कुल मिला कर किसान के उत्पाद के विपणन या कीमतों को बाजार नहीं, बल्कि सरकार तय करे।

खेती को कर्ज के संकट से उबारने के लिए  धान या नगदी फसल  जैसे उत्पाद के बनिस्पत कम लागत और सिंचाई वाले  मोटे अनाज को बढ़ावा देना , बीज की गुणवता और खाद की जरुरी सप्लाई सुनिश्चित करना, कर्ज और ब्याज के सही आकलन . मंडी  में वाजिब दाम और तत्काल भुगतान , किसान को सरकारी गोदाम का मामूली लागत में इस्तेमाल, छोटे किसान का उत्पाद गाँव में ही खरीदने की योजना आज समय की मांग है .

 

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