My writings can be read here मेरे लेख मेरे विचार, Awarded By ABP News As best Blogger Award-2014 एबीपी न्‍यूज द्वारा हिंदी दिवस पर पर श्रेष्‍ठ ब्‍लाॅग के पुरस्‍कार से सम्‍मानित

शुक्रवार, 9 सितंबर 2016

Why Malaria combat is going difficult


मुश्किल होता मलेरिया उन्मूलन 

मलेरिया उपचार की सर्वाधिक प्रचलित दवा ‘क्लोरोक्वीन’’है । आज यह पूरी तरह निष्प्रभावी है, उलटे इसके विषम असर हो रहे हैं। इसके बावजूद इसकी बिक्री और वितरण धड़े से हो रहा है। वर्ष 2000 में तो देश के 14 रायों के कई जिलों में बाकायदा इस पर रिसर्च हुआ था, जिसमें पाया गया था कि मछरों में पाया जाने वाला पी.फाल्सीपेरम परजीवी इस दवा का आदी हो चुका है


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बीते एक महीने के दौरान बड़ा अजीब सा मौसम रहा है। तेज गरमी होती है, कभी ठंड हो जाती है; फिर तेज बारिश। जाहिर है कि यह सीलनभरा गर्म मौसम मछरों के लिए उत्प्रेरक की तरह है और मछर है तो मलेरिया होना भी लाजिमी है। मलेरिया, डेंगू, जापानी बुखार और चिकनगुनिया जैसी बीमरियां जनता के लिए आफत बनती जा रही हैं। वहीं सरकारी महकमे पुराने नुस्खों को अपना कर अपने असफल होने का रोना रोते रहते हैं। यही नहीं हाथी पांव यानी फाईलेरिया के मरीजों की संख्या भी बढ़ रही है। विशेष रूप से राजस्थान के रेगिस्तानी इलाकों (जहां हाल के वर्षो में अप्रत्याशित रूप से पानी बरसा है), बिहार के बाढ़ग्रस्त जिलों, मध्य प्रदेश, पूवोर्ंत्तर के रायें व नगरीय-स्लम में बदल रहे दिी, कोलकाता जैसे महानगरों में जिस तरह मलेरिया का आतंक बढ़ा है, वह आधुनिक चिकित्या विज्ञान के लिए चुनौती है। सरकारी तंत्र पश्चिमी-प्रायोजित एड्स की काली छाया के पीछे भाग रहा है, जबकि मछरों की मार से फैले रोग को डॉक्टर लाइलाज मानने लगे हैं। उनका कहना है कि आज के मचछर मलेरिया की प्रचलित दवाओं को आसानी से हजम कर जाते हैं। दूसरी ओर घर-घर में इस्तेमाल हो रही मछर-मार दवाओं के बढ़ते प्रभाव के कारण मछर अब और जहरीला हो गया है। देश के पहाड़ी इलाकों में अभी कुछ साल पहले तक मछर देखने को नहीं मिलता था, लेकिन अब वहां रात में खुले में साने की कल्पना भी नहीं की जा सकती है।
सन् 1958 में अंतरराष्ट्रीय मानदंडों के अनुरूप शुरू हुए राष्ट्रीय मलेरिया उन्मूलन कार्यक्रम के शुरुआती दौर में खासी सफलता मिली थी। 1965 में तो मलेरियाग्रस्त रोगियों की सालाना संख्या महज एक लाख थी। सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक उस साल देशभर में कोई भी मलेरिया के कारण मरा नहीं । सनद रहे कि आजादी के समय हर साल साढ़े सात करोड़ लोगों के मलेरिया की चपेट में आने व आठ लाख लोगों की इससे मौत होने के सरकारी आंकड़े दर्ज हुए थे। साठ के दशक में ‘‘ना मछर रहेगा और ना ही मलेरिया’’ का नारा काफी हद तक सफल रहा । लेकिन सत्तर का दशक आते-आते इस नारे में कुछ बदलाव आ गया, ‘‘मछर तो रहेगा, लेकिन मलेरिया नहीं’’। देश के स्वास्थ्य विभाग के रजिस्टर बताते हैं कि 1976 में मलेरिया ने फिर रिकॉर्ड तोड़ दी थी। इस साल 64 लाख से अधिक लोग मलेरिया की चपेट में आए। सरकार एक बार फिर चेती और 1983 में मलेरियाग्रस्त लोगों की संख्या 16 लाख 65 हजार हो गई। 1992 में मलेरिया के 21.26 लाख मामले प्रकाश में आए। 1997 में यह संख्या बढ़ कर 25.53 लाख हो गई। यही नहीं, इस दौरान मलेरिया से मरने वालों की संख्या 422 से बढ़ कर 711 हो गई । 1998 में मरने वालों की संख्या 1010 और उसके आगे के सालों में इसमें सतत बढ़ोतरी होती रही है। अनुमान है कि इस साल (31 मार्च को समाप्त हुए वित्तीय वर्ष में) यह संख्या दो हजार के पार है। हालांकि पिछले दिनों इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च द्वारा पदम सिंह प्रधान की अध्यक्षता में गठित 16 सदस्यांे की कमेटी ने बेहद गंभीर चेतावनी देते हुए बताया है कि भारात में मलेरिया से मरने वालों की असल संख्या , सरकारी आंकड़ों के चालीस गुना अधिक होती है। इस समिति ने पाया कि भारत में हर साल औसतन चालीस हजार लोग मछर के कारण काल के गाल में समा जाते हैं। इन दिनों पश्चिम बंगाल में मलेरिया का आतंक यादा पसरा हुआ है। सन 2006 में वहां मलेरिया के 18 हजार से अधिक मामले और 55 मौतें दर्ज की गईं। 2015 में हमारे यहां चिकनगुनया के 27,553 अैर डेंगू के 99,913 मामले दर्ज हुए थे। इस साल तो जुलाई तक ही मलेरिया के 4,71,083 मरीज आए जिनमें से 119 की मौत हो गई। 31 अगस्त तक चिकनगुनया के 12,555 और डेंगेू के 27,889 मामले सामने आए, जबकि डेंगू से मरने वालों की संख्या 60 रही। 90 के दशक में भारत में औद्योगिकीकरण का विकास हुआ। नए कारखाने लगाने के लिए ऐसे इलाकों के जंगल काटे गए, जिन्हें मलेरिया-प्रभावित वन कहा जाता था। ऐसे जंगलों पर बसे शहरों में मछरों को बना-बनाया घर मिल गया।
जर्जर जल निकासी व्यवस्था, बारिश के पानी के जमा होने के आधिक्य और कम क्षेत्रफल में अधिक जनसंख्या के बसने के कारण नगरों में मलेरिया के जीवाणु तेजी से फल-फूल रहे हैं । प्रोटोजोआ परजीवियों से उत्पन्न संक्रामक रोगों में मलेरिया मानव जाति के लिए सर्वाधिक विनाशकारी रहा है। मलेरिया वास्तव में इतालवी शब्द है। ‘मले’ का अर्थ गंदी और ‘आरिया’ के मायने ‘हवा’ होता है । पहले यही धारणा थी कि यह रोग नम और दूषित हवाओं से होता है। सन् 1887 में डॉ. रोनाल्ड रास ने कबूतरों पर प्रयोग कर के पता लगाया था कि मलेरिया का कारण मछर है। साधारण मलेरिया ‘प्लाजमोडियम वाईवेक्स’ नामक परजीवी से होता है। मादा एनिफीलिज मछर जब किसी इंसान को काटता है तो उसकी लार मानव रक्त कोशिकाओं में आ जाती है। इसी लार में ‘‘स्पोरोवाईट’’ होते हैं, जो चक्र पूरा करने पर मलेरिया बुखार पैदा करते हैं ।
भारत में मलेरिया से बचाव के लिए सन् 1953 में राष्ट्रीय मलेरिया नियंत्रण कार्यक्रम शुरू किया गया था। गांव-गांव में डी.डी.टी. का छिड़काव और क्लोरोक्वीन की गोलियां बांटने के र्ढे में सरकारी महकमे भूल गए कि समय के साथ कार्यक्रम में भी बदलाव जरूरी है। धीरे-धीरे इन दवाओं की प्रतिरोधक क्षमता मछरों में आ गई। तभी यह छोटा सा जीव अब ताकतवर हो कर निरंकुश बन गया है । पिछले कुछ सालों से देश में कोहराम मचाने वाला मलेरिया सबटर्मियम या पर्निसियम मलेरिया कहलाता है । इसमें तेज बुखार के साथ लकवा, या बेहोशी छा जाती है। हैजानुमा दस्त, पेचिश की तरह शौच में खून आने लगता है। रक्त-प्रवाह रुक जाने से शरीर ठंडा पड़ जाती है। गांवों में फैले नीम-हकीम ही नहीं , बड़े-बड़े डिग्री से लैसे डॉक्टर भी भ्रमित हो जाते हैं कि दवा किस मर्ज की दी जाए। डॉक्टर लेबोरेट्री- जांच व दवाएं बदलने में लीन रहते हैं और मरीज की तड़प-तड़प कर मौत हो जाती है । इसे समझना बड़ा मुश्किल रहता है कि यह नए जमाने का मलेरिया है। मध्य प्रदेश में घर-घर में लोगों को चलने-फिरने से लाचार बनाने वाले चिकनगुनिया के इलाज में भी डॉक्टरों के साथ ऐसे ही संशय की स्थिति रहती है।
हालांकि ब्रिटिश गवर्नमेंट पब्लिक हेल्थ लेबोरेट्री सर्विस(पीएचएलसी) की एक अप्रकाशित रिपोर्ट में बीस साल पहले ही चेता दिया गया था कि दुनिया के गर्म होने के कारण मलेरिया प्रचंड रूप ले सकता है । गर्मी और उमस में हो रहा इजाफा खतरनाक बीमारियों को फैलाने वाले कीटाणुाओं व विषाणुओं के लिए संवाहक के माकूल हालात बना रहा है। कहा तो यह भी जाता है कि घरों के भीतर अंधाधुंध शौचालयों के निर्माण व शैाचालयों के लिए घर के नीचे ही टैंक खोदने के कारण मछरों की आबादी उन इलाकों में भी ताबड़तोड़ हो गई है, जहां अभी एक दशक पहले तक मछर होते ही नहीं थे ।
मलेरिया उपचार की सर्वाधिक प्रचलित दवा ‘‘क्लोरोक्वीन’’ है । आज यह पूरी तरह निष्प्रभावी है, उलटे इसके विषम असर हो रहे हैं। इसके बावजूद इसकी बिक्री और वितरण धड़े से हो रहा है। सन 2000 में तो देश के 14 रायों के कई जिलों में बाकायदा इस पर रिसर्च हुआ था, जिसमें पाया गया था कि मछरों में पाया जाने वाला पी.फाल्सीपेरम परजीवी इस दवा का आदी हो चुका है। धरती का गरम होता मिजाज जहां मलेरिया के माकूल है, वहीं एंटीबायोटिक दवाओं के मनमाने इस्तेमाल से लोगों की रोग-प्रतिरोधक क्षमता घट रही है । नीम व ऐसी ही वनोषधियों से मलेरिया व मछर उन्मूलन की दवाओं को तैयार करना हमारी प्राथमिकता होना चाहिए ।

Polythene ban needs a strong alternative

विकल्प के बिना बंद नहीं होगी पॉलीथिन


पिछले दिनों दिल्ली, गुड़गांव से ले कर चेन्नई, बंगलूर तक शहरों में हुए जलभराव का सबसे बड़ा कारण नालियों व सीवर में पॉलीथिन का फंसना सामने आया है। विडंबना है कि हर एक इंसान यह मानता है कि पॉलीथिन बहुत नुकसान कर रही है, लेकिन उसका मोह ऐसा है कि किसी न किसी बहाने से उसे छोड़ नहीं पा रहा है। नगर निगमों का बड़ा बजट सीवर व नालों की सफाई में जाता है और परिणाम शून्य ही रहते हैं और इसका बड़ा कारण पूरे मल-जल प्रणाली में पॉलीथिन का अंबार होना है। ऐसा नहीं है कि स्थानीय प्रशासन ने पॉलीथिन पर पाबंदी की पहल न की हो, पंजाब हो या कश्मीर या तिरुअनंतपुरम या चेन्नई या फिर रीवा, भुवनेश्वर, शिमला, देहरादून, बरेली, बनारस... देश के हर राज्य के कई सौ शहर यह प्रयास कर रहे हैं, लेकिन नतीजा अपेक्षित नहीं आने का सबसे बड़ा कारण विकल्प का अभाव है। पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट के दो सदस्यों गोपाल गौड़ा व आदर्श कुमार गोयल की बेंच ने केंद्र सरकार को एक ऐसी उच्च स्तरीय समिति के गठन के निर्देश दिए हैं, जोकि पूरे देश में प्लास्टिक थैलियों के इस्तेमाल, बिक्री और निबटान पर पर्यावरणीय कारणों से पूर्ण पाबंदी की योजना की रूपरेखा प्रस्ततु कर सके। यह आदेश एक जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए जारी किए गए हैं, जिसमें पूरे देश में पॉलीथिन थैलियों को खाने से मवेशियों के मरने की व्यथा बताई गई थी। 
असल बात तो यह है कि कच्चे तेल के परिशोधन से मिलने वाले डीजल, पेट्रोल आदि के साथ ही पॉलीथिन बनाने का मसाला भी पेट्रो उत्पाद ही है। और इससे बड़ा मुनाफा कमाने वाले इस पर पाबंदी लगाने में अड़ंगे लगाते हैं। हालांकि, पॉलीथिन प्रकृति, इंसान और जानवर सभी के लिए जानलेवा है। घटिया पॉलिथिन का प्रयोग सांस और त्वचा संबंधी रोगों तथा कैंसर का खतरा बढ़ाता है। पॉलीथिन की थैलियां नष्ट नहीं होती हैं और धरती की उपजाऊ क्षमता को नष्ट कर इसे जहरीला बना रही हैं। साथ ही मिट्टी में इनके दबे रहने के कारण मिट्टी की पानी सोखने की क्षमता भी कम होती जा रही है, जिससे भूजल के स्तर पर असर पड़ता है। पॉलीथिन खाने से गायों व अन्य जानवरों के मरने की घटनाएं तो अब आम हो गई हैं। फिर भी बाजार से सब्जी लाना हो या पैक दूध या फिर किराना या कपड़े, पॉलीथिन के प्रति लोभ न तो दुकानदार छोड़ पा रहे हैं, न ही खरीददार। मंदिरों, ऐतिहासिक धरोहरों, पार्क, अभ्यारण्य, रैलियों, जुलूसों, शोभा यात्राओं आदि में धड़ल्ले से इसका उपयोग हो रहा है। शहरों की सुंदरता पर इससे ग्रहण लग रहा है। पॉलीथिन न केवल वर्तमान, बल्कि भविष्य को भी नष्ट करने पर आमादा है।
 यह मानवोचित गुण है कि इंसान जब किसी सुविधा का आदी हो जाता है तो उसे तभी छोड़ पाता है, जब उसका विकल्प हो। यह भी सच है कि पॉलीथिन बीते दो दशक के दौरान बीस लाख से ज्यादा लोगों के जीविकोपार्जन का जरिया बन चुका है, जोकि इसके उत्पादन, व्यवसाय, पुरानी पन्नी एकत्र करने व उसे कबाड़ी को बेचने जैसे काम में लगे हैं। वहीं पॉलीथिन के विकल्प के रूप में जो सिंथेटिक थैले बाजार में आए हैं, वे एक तो महंगे हैं, दूसरे कमजोर और तीसरे वे भी प्राकृतिक या घुलनशील सामग्री से नहीं बने हैं और उनके भी कई विषम प्रभाव हैं। कुछ स्थानों पर कागज के बैग और लिफाफे बनाकर मुफ्त में बांटे भी गए, लेकिन मांग की तुलना में उनकी आपूर्ति कम थी।असल में प्लास्टिक या पॉलीथिन के कचरे को बढ़ाने का काम समाज ने ही किया है। अभी कुछ साल पहले तक स्याही वाला फाउंटेन पेन होता था, उसके बाद ऐसे बाल पेन आए, जिनकी केवल रिफिल बदलती थी। आज बाजार मे ऐसे पेनों को बोलबाला है, जो खत्म होने पर फेंक दिए जाते हैं। देश की बढ़ती साक्षरता दर के साथ ऐसे पेनों का इस्तेमाल और उसका कचरा बढ़ता गया। जरा सोचें कि तीन दशक पहले एक व्यक्ति साल भर में बमुश्किल एक पेन खरीदता था और आज औसतन हर साल एक दर्जन पेनों की प्लास्टिक प्रति व्यक्ति बढ़ रही है। इसी तरह शेविंग-किट में पहले स्टील या उससे पहले पीतल का रेजर होता था, जिसमें केवल ब्लेड बदले जाते थे और आज हर हफ्ते कचरा बढ़ाने वाले ‘यूज एंड थ्रो’ वाले रेजर ही बाजार में मिलते हैं। अभी कुछ साल पहले तक दूध भी कांच की बोतलों में आता था या फिर लोग अपने बर्तन लेकर डेयरी जाते थे। आज दूध तो ठीक ही है, पीने का पानी भी कचरा बढ़ाने वाली बोतलों में मिल रहा है। अनुमान है कि पूरे देश में हर रोज चार करोड़ दूध की थैलियां और दो करोड़ पानी की बोतलें कूड़े में फेंकी जाती हैं। मेकअप का सामान, घर में होने वाली पार्टी में डिस्पोजेबल बर्तनों का प्रचलन, बाजार से सामान लाते समय पॉलीथिन की थैलियां लेना, हर छोटी-बड़ी चीज की पैकिंग, ऐसे ही न जाने कितने तरीके हैं, जिनसे हम कूड़ा-कबाड़ा बढ़ा रहे हैं। यदि वास्तव में पॉलीथिन का विकल्प तलाशना है तो पुराने कपड़े के थैले बनवाना एकमात्र विकल्प है। सनद रहे पूरे देश में कोई दस हजार से ज्यादा पॉलीथिन थैलियां बनाने के छोटे-बड़े कारखाने में काम कर रहे हैं। जहां कोई 10 लाख टन थैलियां हर साल बनती व बाजार में आकर प्रकृति को दूषित करती हैं। यह सच है कि जिस तरह पॉलीथिन की मांग है, उतनी कपड़े के थैले की नहीं होगी, क्योंकि थैला कई-कई बार इस्तेमाल किया जा सकता है, लेकिन कपड़े के थैले की कीमत, उत्पादन की गति भी उसी तरह पॉलीथिन के मानिंद तेज नहीं होगी। इस तरह पॉलीथिन बनाने वाली यूनिटों को रोजगार व उतनी ही आय का एक विकल्प मिलेगा। सबसे बड़ी दिक्कत है दूध, जूस, बनी हुई करी वाली सब्जी आदि के व्यापार की। हालांकि, यह भयानक तथ्य है कि बाजार में उपलब्ध अधिकांश प्लास्टिक या पन्नी की भोजन पैकेजिंग खतरनाक है और उससे क्लोरीन जैसे पदार्थ खाने में जुटते हैं, परिणाम गुर्दे खराब होना। इस बारे में जागरूकता फैलाने के साथ-साथ विकल्प के तौर पर एल्यूमिनियम या अन्य मिश्रित धातु के खाद्य-पदार्थ के लिए माकूल कंटेनर बनाए जा सकते हैं। सबसे बड़ी बात घर से बर्तन ले जाने की आदत फिर से लौट आए तो खाने का स्वाद, उसकी गुणवत्ता, दोनों ही बनी रहेगी। कहने की जरूरत नहीं है कि पॉलीथिन में पैक दूध या गरम करी उसके जहर को भी आपके पेट तक पहुंचाती है। आजकल बाजार माइक्रोवेव में गरम करने लायक एयरटाइट बर्तनों से पटा पड़ा है, ऐसे कई-कई साल तक इस्तेमाल होने वाले बर्तनों को भी विकल्प के तौर पर विचार किया जा सकता है। प्लास्टिक से होने वाले नुकसान को कम करने के लिए बायोप्लास्टिक को बढ़ावा देना चाहिए। बायो प्लास्टिक चीनी, चुकंदर, भुट्टा जैसे जैविक रूप से अपघटित होने वाले पदाथोंर् के इस्तेमाल से बनाई जाती है। हो सकता है कि शुरुआत में कुछ साल पन्नी की जगह कपड़े के थैले व अन्य विकल्प के लिए कुछ सब्सिडी दी जाए तो लोग अपनी आदत बदलने को तैयार हो जाएंगे। लेकिन यह व्यय पॉलीथिन से हो रहे व्यापक नुकसान के तुलना में बेहद कम ही होगा। सनद रहे कि 40 माइक्रान से कम पतली पन्नी सबसे ज्यादा खतरनाक होती है। कचरे-कबाड़े से बीन-बीन कर एक पुरानी पन्नी को ही गलाकर नई पॉलीथिन बना दी जाती है, लेकिन एक सीमा ऐसी आती है, जब उसका पुनर्चक्रण संभव नहीं होता व वह महज धरती पर बोझ होती है। सरकारी अमलों को ऐसी पॉलीथिन उत्पादन करने वाले कारखानों को ही बंद करवाना पड़ेगा। वहीं प्लास्टिक कचरा बीनकर पेट पालने वालों के लिए विकल्प के तौर पर बंगलुरू के प्रयोग को विचार कर सकते हैं, जहां लावारिस फेंकी गई पन्नियों को अन्य कचरे के साथ ट्रीटमेंट करके खाद बनाई जा रही है। हिमाचल प्रदेश में ऐसी पन्नियों को डामर के साथ गला कर सड़क बनाने का काम चल रहा है। जर्मनी में प्लास्टिक के कचरे से बिजली का निर्माण भी किया जा रहा है। विकल्प तो और भी बहुत हैं, बस जरूरत है तो एक नियोजित दूरगामी योजना और उसके क्रियान्वयन के लिए जबरदस्त इच्छाशक्ति की।

सोमवार, 5 सितंबर 2016

Why Primary education is necesarry in mother toungh

स्थानीय बोली और शिक्षा


 पंकज चतुर्वेदी
हिंसा से बेहाल बस्तर में सुकमा जिले में दोरला जनजाति की बड़ी संख्या है। उनकी बोली है दोरली। बोली के मामले में बड़ा विचित्र है बस्तर। वहां द्रविड़ परिवार की बोलियां भी हैं, आर्य कुल की भी और मुंडारी भी। उनके बीच इतना विभेद है कि एक इलाके का गोंडी बोलने वाला दूसरे इलाके की गोंडी को भी समझने में दिक्कत महसूस करता है। दोरली बोलने वाले बहुत कम हुआ करते थे, पिछली जनगणना में शायद बीस हजार। फिर खून खराबे का दौर चला, पुलिस व नक्सली दोनों तरफ से पिसने वाले आदिवासी पलायन कर आंध्र प्रदेश के वारंगल जिले में चले गए। जब वे लौटे तो उनके बचों की दोरली में तेलुगु का घालमेल हो चुका था। एक तो बड़ी मुश्किल से दोरली बोलने वाला शिक्षक मिला था और जब उसने देखा कि उसके बचों की दोरली भी अपभ्रंश हो गई है तो उसकी चिंता असीम हो गई कि अब पढ़ाई कैसे आगे बढ़ाई जाए। यह चिंता है कोटां गांव के शिक्षक कट्टम सीताराम की।
ठेठ गांव के बचों को पढ़ाया जाता है कि ‘अ’ ‘अनार’ का, लेकिन ना तो उनके इलाके में अनार होता है और ना ही उन्होंने उसे देखा होता है। और ना ही उनके परिवार की हैसियत अनार को खरीदने की होती है। सारा गांव जिसे गन्ना कहता है, उसे ईंख के तौर पर पढ़ाया जाता है। यह स्कूल में घुसते ही बचे को दिए जाने वाले अव्यावहारिक ज्ञान की बानगी है। असल में रंग, आकृति, अंक, श}द की दुनिया में बचे का प्रवेश ही बेहद नीरस और अनमना-सा होता है। और मन और सीखने के बीच की खाई साल दर साल बढ़ती जाती है।
संप्रेषणीयता की दुनिया में बचे के साथ दिक्कतों का दौर स्कूल में घुसते से ही से शुरू हुआ-घर पर वह सुनता है मालवी, निमाडी, आओ, मिजो, मिसिंग, खासी, गढ़वाली, राजस्थानी, बुंदेली या भीली, गोंडी, धुरबी या ऐसी ही ‘अपनी’ बोली-भाषा। स्कूल में गया तो किताबें खड़ी हिंदी या अंग्रेजी या राय की भाषा में। और उसे तभी से बता दिया गया कि यदि असल में पढ़ाई कर नौकरी पाना है तो उसके लिए अंग्रेजी ही एकमात्र जरिया है-‘आधी छोड़ पूरी को जाए, आधी मिले ना पूरी पाए’। बचा इसी भ्रम की स्थिति में बचपना बिता देता है कि उसके ‘पहले अध्यापक’ मां-पिता को सही कहूं या स्कूल की पुस्तकों की भाषा को जो उसे सभ्य बनाने का वायदा करती है या फिर जिंदगी काटने के लिए जरूरी अंग्रेजी को अपनाऊं।
स्कूल में भाषा-शिक्षा सबसे महत्वपूर्ण व पढ़ाई का आधार होती है। प्रतिदिन के कार्य बगैर भाषा के सुचारू रूप से कर पाना संभव ही नहीं होता। व्यक्तित्व के विकास में भाषा एक कुंजी है। अपनी बात दूसरों तक पहुंचाना हो या फिर दूसरों की बात ग्रहण करना, भाषा के ज्ञान के बगैर संभव नहीं है। भाषा का सीधा संबंध जीवन से है और मात्र भाषा ही बचे को परिवार, समाज से जोड़ती है। भाषा शिक्षण का मुख्य उद्देश्य बालक को सोचने-विचारने की क्षमता प्रदान करना, उस सोच को निरंतर आगे बढ़ाए रखना, सोच को सरल रूप में अभिव्यक्त करने का मार्ग तलाशना होता है। अब जरा देखें कि मालवी व राजस्थानी की कई बोलियो में स का उचारण ह होता है और बचा अपने घर में वही सुनता है, लेकिन जब वह स्कूल में शिक्षक या अपनी पाठ्यपुस्तक पढ़ता है तो उसे संदेश मिलता है कि उसके माता-पिता गलत उचारण करते हैं। बस्तर की ही नहीं, सभी जनजातीय बोलियों में हिंदी के स्वर-व्यंजन में से एक चौथाई होते ही नहीं हैं। असल में आदिवासी कम में काम चलाना तथा संचयय ना करने के नैसर्गिक गुणों के साथ जीवनयापन करते हैं और यही उनकी बोली में भी होता है। लेकिन बचा जब स्कूल आता है तो उसके पास श}दों का अंबार होता है जो उसे दो नाव पर एक साथ सवारी करने की मानिंद अहसास करवाता है।
स्थानीय बोलियों में प्राथमिक शिक्षा का सबसे बड़ा लाभ तो यह होता है कि बचा अपने कुल-परिवार की बोली में जो ज्ञान सीखता है, उसमें उसे अपने मां-बाप की भावनाओं का स्वाद महसूस होता है। वह भले ही स्कूल जाने वाली या अक्षर ज्ञान वाली पहली पीढ़ी हो, लेकिन उसे पाठ से उसके मां-बाप बिल्कुल अनभिज्ञ नहीं होते। जब बचा खुद को अभिव्यक्त करना, भाषा का संप्रेषण सीख ले तो उसे खड़ी बोली या राय की बोली में पारंगत किया जाए। फिर साथ में करीबी इलाके की एक भाषा और अंग्रेजी को पढ़ाना कक्षा छह से पहले करना ही नहीं चाहिए। इस तरह बचे अपनी शिक्षा में कुछ अपनापन महसूस करेंगे। हां, पूरी प्रक्रिया में दिक्कतें भी हैं, हो सकता है कि दंडामी गोंडी वाले इलाके में दंडामी गोंडी बोलने वाला शिक्षक तलाशना मुश्किल हो, परंतु जब एक बार यह बोली भी रोजगार पाने का जरिया बनती दिखेगी तो लोग जरूर इसमें पढ़ाई करना पसंद करेंगे। इसी तरह स्थानीय आशा कार्यकर्ता, पंचायत सचिव जैसे पद भी स्थानीय बोली के जानकारों को ही देने की रीति से सरकार के साथ लोगों में संवाद बढ़ेगा व उन बोलियों में पढ़ाई करने वाले भी हिचकिचाएंगे नहीं।
कुछ ‘विकासवादी’ यह कहते नहीं अघाते हैं कि भाषाओं का नष्ट होना या ‘ज्ञान’ की भाषा में शिक्षा देना स्वाभविक प्रक्रिया है और इस पर विलाप करने वाले या तो ‘पागलपन’ से ग्रस्त होते हैं या फिर वे ‘शुद्ध नस्ल’ के फासीवादी। जरा विकास के चरम पर पहुंच गए मुल्कों की सामामजिक व सांस्कृतिक दरिद्रता पर गौर करें कि वहां इंसान महज मशीन बन कर रह गया है। मानवीय संवेदनाएं शून्य हैं और अब वे शांति, आध्यात्म के लिए ‘पूर्व’ की ओर देख रहे हैं। यदि कोई समाज अपने अनुभवों से सीखता नहीं है और वही रास्ता अपनाता है जो संवेदना-शून्य समाज का निर्माण करे तो जाहिर है कि यह एक आत्मघाती कदम ही होगा। इंसान को इंसान बना रहने के लिए स्थानीयता पर गर्व का भाव, भाषा-संस्कार में विविधत जरूरी है। और इसलिए भी प्राथमिक शिक्षा में स्थानीय बोली-भाषा को शामिल करना व उसे जीवंत रखना जरूरी है।
आए रोज अखबारों में छपता रहता है कि यूनेस्को बार-बार चेता रहा है कि भारत में बोली-भाषाएं गुम हो रही हैं और इनमें भी सबसे बड़ा संकट आदिवासी बोलियों पर है। अंग्रेजीदां-शहरी युवा या तो इससे बेपरवाह रहते हैं या यह सवाल करने से भी नहीं चूकते कि हम क्या करेंगे इन ‘गंवार-बोलियों’ को बचा कर। यह जान लेना जरूरी है कि गूगल बाबा या पुस्तकों में इतना ज्ञान, सूचना, संस्कृति, साहित्य उपल}ध नहीं हैं जितना कि हमारे पारंपरिक मूल निवासियों के पास हैं। उनका ज्ञान निहायत मौखिक है और वह भीली, गोंडी, धुरबी, दोरली, आओ, मिसिंग, खासी, जैसी छोटी-छोटी बोलियों में ही है। उस ज्ञान को जिंदा रखने के लिए उन बोलियों को भी जीवंत रखना जरूरी है और देश की विविधता, जीवन, ज्ञान, गीत, संगीत, हस्तकला को आने वाली पीढ़ियों तक मूल स्वरूप में पहुंचाने के लिए बोलियों को जिंदा रखना भी जरूरी है। यदि हम चाहते हैं कि स्थानीय समाज के बो स्कूल में हंसते-खेलते जाएं, उसे वहां कुछ अटपटा ना लगे तो उसकी अपनी बोली में भाषा का प्रारंभिक पाठ अनिवार्य होगा।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

शुक्रवार, 2 सितंबर 2016

Indian festivals are praying of ecology

पर्यावरण- मित्र बनाएं पर्वों को  

                                                                                                                           पंकज चतुर्वेदी
बारिश के बादल अपने घरों को लौट रहे हैं, सुबह सूरज कुछ देर से दिखता है और जल्दी अंधेरा छाने लगा है, मौसम का यह बदलता मिजाज असल में उमंगों. खुशहाली के स्वागत की तैयारी है । सनातन मान्यताओं की तरह प्रत्येक षुभ कार्य के पहले गजानन गणपति की आराधना अनिवार्य है और इसी लिए उत्सवों का प्रारंभ गणेश चतुर्थी से ही होता है। प्रधानमंत्री ‘मन की बात’ में अपील कर रहे हैं कि देव प्रतिमाएं प्लास्टर आफ पेरिस यानि पीओपी की नहीं बनाएं, मिट्टी की ही बनाए, लेकिन राजधानी दिल्ली में ही अक्षरधाम के करीब मुख्य एनएच-24 हो या साहिबााद में जीटी रेाड पर थाने के सामने ;धड़ल्ले से पीओपी की प्रतिमाएं बिक रही हैं। यह तो प्रारंभ है, इसके बाद दुर्गा पूजा या नवरात्रि, दीपावली से ले कर होली तक एक के बाद एक के आने वाले त्योहार असल में किसी जाति- पंथ के नहीं, बल्कि भारत की सम्द्ध सांस्कृतिक परंपराओं के प्रतीक हैं। विडंबना है कि जिन त्येाहरों के रीति रिवाज, खानपान कभी समाज और प्रकृति के अनुरूप हुआ करते थे, आज पर्व के मायने हैं पर्यावरण, समाज और संस्कृति सभी का क्षरण।

खूब हल्ला हुआ, निर्देश, आदेश का हवाला दिया गया, अदालतों के फरमान बताए गए, लेकिन गणपति का पर्व वही पुरानी गति से ही मनाया जा रहा है। महाराष्ट्र, उससे सटे गोवा, आंध््राप्रदेश व तेलगांना, छत्तीसगढ़, गुजरात व मप्र के मालवा-निमाड़ अंचल में पारंपरिक रूप से मनाया जाने वाला गणेशोत्सव अब देश में हर गांव-कस्बे तक फैल गया है। दिल्ली में ही हजार से ज्यादा छोटी-बड़ी मूर्तियां स्थापित हो रही हैं। यही नहीं मुंबई के प्रसिद्ध लाल बाग के राजा की ही तरह विशाल प्रतिमा, उसी नाम से यहां देखी जा सकती है। पारंपरिक तौर पर मूर्ति मिट्टी की बनती थी, जिसे प्राकृतिक रंगों, कपड़ों आदि से सजाया जाता था। आज प्रतिमाएं प्लास्टर आफ पेरिस से बन रही हैॅ, जिन्हें रासायनिक रंगों से पोता जाता है। कुछ राज्य सरकारों ने प्लास्टर आफ पेरिस की मूर्तियों को जब्त करने की चेतावनी भी, लेकिन ऐसा हो नहीं पाया और पूरा बाजार घटिया रासायनिक रंगों से पुती प्लास्टर आफ पेरिस की प्रतिमाओं से पटा हुआ है। इंदौर के पत्रकार सुबोध खंडेलवाल ने गोबर व कुछ अन्य जड़ी बूटियों को मिला कर ऐसी गणेश प्रतिमाएं बनवाई जो पानी में एक घंटे में घर में ही घुल जाती है, लेकिन बड़े गणेश मंडलों ने ऐसे पर्यावरण-मित्र प्रयोगों को स्वीकार नहीं किया। बंबई मे भी गमले में बीज के साथ गणपति प्रतिमा के प्रयोग हुए लेकिन लेागों को तो चटक रंग वाली विशाल, पीओपी की जहरीली प्रतिमा में ही भगवान का तेज दिख रहा है। पंडालों को सजाने में बिजली, प्लास्टिक आदि का इस्तमेाल होता है। सांस्कृतिक कार्यक्रमों में कला के नाम पर भौंडे प्रदर्शन प्रदर्शन व अश्लीलता का बोलबाला है।
अभी गणेशात्सव का समापन होगा ही कि नवरात्रि में दुर्गा पूजा शुरू हो जाएगी। यह भी लगभग पूरे भारत में मनाया जाने लगा है। हर गांव-कस्बे में एक से अधिक स्थानों पर सार्वजनिक पूजा पंडाल बन रहे हैं। बीच में विश्वकर्मा पूजा भी आ आ गई और अब इसी की प्रतिमाएं बनाने की रिवाज शुरू हो गई है। कहना ना होगा कि प्रतिमा स्थापना कई हजार करोड़ की चंदा वसूली का जरिया है। एक अनुमान है कि हर साल देश में इन तीन महीनों के दौरान 10 लाख से ज्यादा प्रतिमाएं बनती हैं और इनमें से 90 फीसदी प्लास्टर आफ पेरिस की होती है। इस तरह देश के ताल-तलैया, नदियों-समुद्र में नब्बे दिनों में कई सौ टन प्लास्टर आफ पेरिस, रासायनिक रंग, पूजा सामग्री मिल जाती है। पीओपी ऐसा पदार्थ है जो कभी समाप्त नहीं होता है। इससे वातावरण में प्रदूषण का मात्रा के बढ़ने की संभावना बहुत अधिक है। प्लास्टर आफ पेरिस, कैल्शियम सल्फेट हेमी हाइड्रेट होता है जो कि जिप्सम (कैल्शियम सल्फेट डीहाइड्रेट) से बनता है चूंकि ज्यादातर मूर्तियां पानी में न घुलने वाले प्लास्टर आफ पेरिस से बनी होती है, उन्हें विषैले एवं पानीे में न घुलने वाले नॉन बायोडिग्रेडेबेल रंगों में रंगा जाता है, इसलिए हर साल इन मूर्तियों के विसर्जन के बाद पानी की बॉयोलॉजिकल आक्सीजन डिमांड तेजी से घट जाती है जो जलजन्य जीवों के लिए कहर बनता है। चंद साल पहले मुम्बई से वह विचलित करने वाला समाचार मिला था जब मूर्तियों के धूमधाम से विसर्जन के बाद लाखों की तादाद में जुहू किनारे मरी मछलियां पाई गई थीं।
केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा दिल्ली में यमुना नदी का अध्ययन इस संबंध में आंखें खोलने वाला रहा है कि किस तरह नदी का पानी प्रदूषित हो रहा है। बोर्ड के निष्कर्षों के मुताबिक नदी के पानी में पारा, निकल, जस्ता, लोहा, आर्सेनिक जैसी भारी धातुओं का अनुपात दिनोंदिन बढ़रहा है।
इन आयोजनों में व्यय की गई बिजली से 500 से अधिक गांवों को सालभर निर्बाध बिजली दी जा सकती हे। नवरात्रि के दौरान प्रसाद के नाम पर व्यर्थ हुए फल, चने-पूड़ी से कई लाख लोगों का पेट भरा जा सकता है। इस अवधि में होने वाले ध्वनि प्रदूषण, चल समारोहों के कारण हुए जाम से फुंके ईंधन व उससे उपजे धुंऐ से होने वाले पर्यावरण के नुकसान का तो हिसाब लगाना ही मुश्किल है। दुर्गा पूजा से उत्पन्न प्रदूषण से प्रकृति संभल पाती नहीं है और दीपावली आ जाती है। आतिशबाजी का जहरीला धुआं, तेल के दीयों के बनिस्पत बिजली का बढ़ता इस्तेमाल, दीपावली में स्नेह भेट की जगह लेन-देन या घूस उपहार का बढ़ता प्रकोप, कुछ ऐसे कारक हैं जो सर्दी के मौसम की सेहत को ही खराब कर देते हैं। यह भी जानना जरूरी है कि अब मौसम धीरे -धीरे बदल रहा है और ऐसे में हवा में प्रदूषण के कण नीचे रह जाते हैं जो सांस लेने में भी दिक्कत पैदा करते हैं।
सबसे बड़ी बात धीरे-धीरे सभी पर्व व त्योहारों के सार्वजनिक प्रदर्शन का प्रचलन बढ़ रहा है और इस प्रक्रिया में ये पावन-वैज्ञानिक पर्व लंपटों व लुच्चों का साध्य बन गए हैं प्रतिमा लाना हो या विसर्जन, लफंगे किस्म के लडके मोटर साईकिल पर तीन-चार लदे-फदे, गाली गलौच , नशा, जबरिया चंदा वूसली, सडक पर जाम कर नाचना, लडकियों पर फब्तियों कसना, कानून तोड़ना अब जैसे त्योहारों का मूल अंग बनता जा रहा है। इस तरह का सामाजिक  व सांस्कृतिक प्रदूशण नैसर्गिक प्रदूशध से कहीं कम नहीं है।
सवाल खड़ा होता  है कि तो क्या पर्व-त्योहारों का विस्तार गलत है? इन्हें मनाना बंद कर देना चाहिए? एक तो हमें प्रत्येक त्योहर की मूल आत्मा को समझना होगा, जरूरी तो नहीं कि बड़ी प्रतिमा बनाने से ही भगवान ज्यादा खुश होंगे ! क्या छोठी प्रतिमा बना कर उसका विसर्जन जल-निधियों की जगह अन्य किसी तरीेके से करके, प्रतिमाओं को बनाने में पर्यावरण मित्र सामग्री का इस्तेमाल करने  जैसे प्रयोग तो किए जा सकते हैं पूजा सामग्री में प्लास्टिक या पोलीथीन का प्रयोग वर्जित करना, फूल- ज्वारे आदि को स्थानीय बगीचे में जमीन में दबा कर उसका कंपोस्ट बनाना, चढ़ावे के फल , अन्य सामग्री को जरूरतमंदों को बांटना, बिजली की जगह मिट्टी के दीयों का प्रयोग ज्यादा करना, तेज ध्वनि बजाने से बचना जैसे साघारण से प्रयोग हैंं ; जो पर्वो से उत्पन्न प्रदूषण व उससे उपजने वाली बीमारियांे पर काफी हद तक रोक लगा सकते हैं। पर्व आपसी सौहार्द बढ़ाने, स्नेह व उमंग का संचार करने के और बदलते मौसम में स्फूर्ति के संचार के वाहक होते हैं। इन्हें अपने मूल स्वरूप में अक्षुण्ण रखने की जिम्मेदारी भी  समाज की है।
भारतीय पर्व असल में प्रकृति को उसकी देन, के लिए धन्यवाद देने के लिए होते हैं, लेकिन इस पर बाजारवाद जो रंग चढ़ा है, उससे वे प्रकृति-हंता बन कर उभरे है। प्रशासन के लिए भी प्रधानमंत्री की अपील काफी है कि वह बलात पीओपी की प्रतिमाओं के निर्माण पर पाबंदी लगाए। समाज को भी गणपति या देवी प्रतिमाओं को पानी में विसर्जित करने के बजाए जमींदोज करने के विकल्प पर विचार करना चाहिए।

मंगलवार, 30 अगस्त 2016

traffic jam : silent killer

जानलेवा जाम बड़ी चुनौती

                                                           पंकज चतुर्वेदी

 सोमवार को एक घंटा पानी क्या बरसा, दिल्ली-जयपुर मार्ग कई घंटे तक जाम रहा, बिल्कुल वैसे ही जैसा एक महीने पहले हुआ था। घुटनों तक पानी, फंसे वाहन, हताश-बीमार लोग और बच्चे। सब कुछ अनियंत्रित यह बेहद गंभीर चेतावनी है कि आने वाले दशक में दुनिया में वायु प्रदूषण के शिकार सबसे ज्यादा लोग दिल्ली में होंगे। एक अंतरराष्ट्रीय शोध रिपोर्ट में बताया गया है कि अगर प्रदूषण स्तर को काबू में नहीं किया गया तो साल 2025 तक दिल्ली में हर साल करीब 32,000 लोग जहरीली हवा से असामयिक मौत के मुंह में जाएंगे। ‘‘नेचर’ पत्रिका में प्रकाशित ताजा शोध के मुताबिक दुनियाभर में 33 लाख लोग हर साल वायु प्रदूषण के शिकार होते हैं। यही नहीं सड़कों में बेवहज घंटों फंसे लोग मानसिक रूप से भी बीमार हो रहे हैं व उसकी परिणति के रूप में आए रोज सड़कों पर ‘‘रोड रेज’ के तौर पर बहता खून दिखता है। यह हाल केवल देश की राजधानी के ही नहीं है, सभी छह महानगर, सभी प्रदेशों की राजधानियों के साथ-साथ तीन लाख आबादी वाले 600 से ज्यादा शहरों-कस्बों के हैं। दुखद है कि दिल्ली और कोलकता में हर पांचवा आदमी मानसिक रूप से अस्वस्थ है। यह तो सभी स्वीकार करते हैं कि बीते दो दशकों के दौरान देश में आटोमोबाइल उद्योग ने बेहद तरक्की किया है और साथ ही बेहतर सड़कों के जाल ने परिवहन को काफी बढ़ावा दिया है। यह किसी विकासशील देश की प्रगति के लिए अनिवार्य भी है कि वहां संचार व परिवहन की पहुंच आम लोगों तक हो। विडंबना है कि हमारे यहां बीते इन्हीं सालों में सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था की उपेक्षा हुई व निजी वाहनों को बढ़ावा दिया गया। रही-सही कसर बैंकों ने आसान कर्ज ने पूरी कर दी और अब इंसान दो कदम पैदल चलने के बनिस्पत दुपहिया ईधन वाहन लेने में संकोच नहीं करता है। असल में सड़कों पर वाहन दौड़ा रहे लोग इस खतरे से अंजान ही हैं कि उनके बढ़ते तनाव या चिकित्सा बिल के पीछे सड़क पर रफ्तार के मजे का उनका शौक भी जिम्मेदार है। शहर हों या हाईवे-जो मार्ग बनते समय इतना चौड़ा दिखता है, वही दो-तीन सालों में गली बन जाता है। यह विडंबना है कि महानगर से ले कर कस्बे तक और सुपर हाईवे से लेकर गांव की पक्की हो गई पगडंडी तक, सड़क पर मकान व दुकान खोलने व वहीं अपने वाहन या घर की जरूरी सामन रखना लोग अपना अधिकार समझते हैं। दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट कह चुका है कि लुटियन दिल्ली में कहीं भी वाहनों की सड़क पर पार्किंग गैरकानूनी है, लेकिन सबसे ज्यादा सड़क घेर कर वाहन खड़ा करने का काम पटियाला हाउस अदालत, नीति आयोग या साउथ ब्लाक के बाहर ही होता है। जाहिर है कि जो सड़क वाहन चलने को बनाई गई उसके बड़े हिस्से में बाधा होगी तो यातायात प्रभावित होगा ही। यातायात जाम का बड़ा कारण सड़कों की त्रुटिपूर्ण डिजाइन भी होता है, जिसके चलते थोड़ी सी बारिश में वहां जलभराव या फिर मोड़ पर अचानक यातायात धीमा होने या फिर आए रोज उस पर गड् ढे बन जाते हैं। पूरे देश में सड़कों पर अवैध और ओवरलोड वाहनों पर तो जैसे अब कोई रोक है ही नहीं। पुराने स्कूटर को तीन पहिये लगा कर बच्चों को स्कूल पहुंचाने से ले कर मालवाहक बना लेने या फिर बमुश्किल एक टन माल ढोने की क्षमता वाले छोटे स्कूटर पर लोहे की बड़ी बॉडी कसवा कर अंधाधुंध माल भरने, तीन सवारी की क्षमता वाले टीएसआर में आठ सवारी व जीप में 25 तक सवारी लादने फिर सड़क पर अंधाधुंध चलने जैसी गैरकानूनी हरकतें कश्मीर से कन्याकुमारी तक स्थानीय पुलिस के लिए ‘‘सोने की मुरगी’ बन गए हैं। देश भर में स्कूलों व सरकारी कार्यालयों के खुलने और बंद होने के समय लगभग एक समान है। इसका परिणाम हर छोटे-बड़े शहर में सुबह से सड़कों पर जाम के रूप में दिखता है। ठीक यही हाल दफ्तरों के वक्त में होता है। सबसे बड़ी बात बड़े शहरों में जो कार्यालय जरूरी ना हों, या राजधानियों में-जिनका मंत्रालयों से कोई सीधा ताल्लुक ना हों-उन्हें सौ-दो सौ किलोमीटर दूर के शहरों में भेजना भी एक परिणामकारी कदम हो सकता है। इससे नए शहरों में रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे और लोगों का दिल्ली की तरफ पलायन भी कम होगा। सबसे बड़ी बात, जितना छोटा शहर उतना ही काम के लिए जाने में परिवहन में समय कम और इसका सीधा अर्थ पर्यावरण संरक्षण, मानसिक व शारीरिक स्वास्य की रक्षा।

रविवार, 28 अगस्त 2016

The soul of Indian Islam is Sufism which needs to be save

 अब  सूफी-सौहार्द है कट्टरपंथियों के निशाने पर 

                                                                                                                           पंकज चतुर्वेदी
मुंबई की हाजी अली दरगाह में  भीतर तक महिलाओं के जाने केो उनका मौलिक अधिकार बताने वाले अदालती के आदेश के बावजूद कुछ कठमुल्ले बड़े ही षातिराना अंदाज में ऐसी मजारों पर षरीयत के नाम पर फरमान जारी कर इसे धार्मिक मामलों पर बेवजह दखल बता रहे हैं। जब देश में पर्सनल लॉ के अलावा कहीं षरीयत का पालन नहीं होता है तो लोक-मान्यता, आस्था के केंद्रों पर शरीयत के नाम पर औरतों पर पाबंदी लगाना कहां तक लाजिमी है। हालांकि शिया समुदाय के गुरू कल्बे जब्बाद ने कई साल पहले औरतों को दरगाह पर जाने से मना करने को गैरइस्लामी बताया था।  जबकि औरतों को वहां जाने से रोकने की हिमायत करने वाले हदीस के उस कानून का हवाला दे रहे हैं जिसमें औरतों के कब्रिस्तान पर जाने को रोका गया है और वे मजार-दरगाह को कब्रिस्तान कह रहे हैं। पाबंदी की हिमायत करने वाले अब कह रहे हैं कि रोक दरगाह को छूने पर है, दूर से दुआ करने पर कहीं पाबंदी नहीं है। वास्तव में यह महज मुसलमनों का आंतरिक मामला नहीं है, यह वाकिया एक चेतावनी है देश की साझा-संस्कृति से भयभीत लोगों की साजिशों के प्रति।
यह बात सभी स्वीकार करते हैं कि भारत में इस्लाम सहिष्‍णुता, सौहार्द और सूफीवाद के जरिए आया था। दिल्ली में निजामुद्दीन औलिया हो या फिर अजमेर या लखनउ के पास देवा शरीफ या किसी सुदूर कस्बे की छोटी सी मजार ;  हारमोनियम, बैंजो पर गीत-कव्वाली, हिंदू पूजा पद्धति की तरह हाथ जोड कर प्रसाद चढाते सभी धर्म के लोग भारत में इस्लाम की पहचान रहे हैं। मुहर्रम के ताजयिो में मीठा जल चढन और ताबिज बंधवाने को लेाग अपने पूरे साल की सुरक्षा की गारंटी माननते रहे हैं। मुंबई की हाजी अली व माहिम दरगाह में जिस तरह औरतों के दर्शन करने पर रोक लगाने की हिमायत अदालती आदेश के बावजूद भी हो रही है, उससे साफ है कि अब कठमुल्लों ने उन स्थानों पर धर्म के नाम पर तालीबानी फरमान जारी करना चाहते  हैं जो भारत के सांप्रदायिक -सदभाव की मिसाल रहे हैं। यह भी जान लें कि यह मसला अकेले भारत का नहीं है, पाकिस्तान में भी इसी तरह दो किस्म के इस्लाम की टकराव है। सिंध, कश्मीर जैसे इलाकों में सूफीवाद का जोर है तो षेश में कट्टरपंथियों का। वहां सिंधी खुद को शोषित महसूस करते हैं क्योंकि सत्ता में बड़ी संख्या में बहावी किस्म के लोग हैं।
मुंबई हमले के समय भारत अंतरराष्‍ट्रीय स्तर पर यह दावा करता रहा था कि भारत का कोई भी मुसलमान आतंकवादी गतिविधियों में षामिल नहीं है और हमारे यहां होने वाल सभी हरकतों में पाकिस्तानी शामिल होते हैं । ठीक उसके बाद आईएसआई ने भारत के युवाओं को गुमराह कर आतंकवाद के रास्ते पर मोड दिया। रियाज भटकल व आईएम उसका प्रमाण है। यह भी सही है कि लश्कर अब भारत के स्थानीय लोगों को मोहरा बना कर ही अपना खेल खेल रहा है। इस बात को भी गौर करना होगा कि आतंक के खेल में शामिल युवा न तो दाढ़ी, पजामा वाले कट्टर मुसलमान हैं और ना ही उनकी पाकिस्तान के प्रति कोई श्रद्धा है। वे क्लीन शेव, फर्राटेदार अंग्रेजी बोलने वाले पढ़े-लिखे मध्यम वर्ग से आए हैं। ऐसे गुमराहों को धर्म के बनिस्पत गुजरात या ऐसे ही वीभत्स दंगों के नाम पर बरगलाया जाता है। जान कर आश्चर्य होगा कि गुजरात के कच्छ इलाके तक में तबलीगी जमात और आहले हदीस तंजीमों के मदरसे है। और इनमें कश्मीर से युवा पढ़ने आते हैं। इन्हीं में से कुछ असामाजिक तत्वों के हाथों की कठपुतली बन कर देश-विरोधी हरकतें करते हैं। सफदर नागौरी का संगठन ‘सिमी’ भी पढ़े-लिखे लोगों का मजमा था। एक बात बड़ी चौंकाने वाली है कि हमारे देश में आतंकवादी गतिविधियों में पकड़े गए मौलवी, धर्म प्रचारक या युवा अधिकांश बहावी विचारधारा में पूरी तरह पगे-बढ़े हैं। ये लोग इस्लाम के हिंदुस्तानी स्वरूप यानी सूफी, मजार, ताजिये आदि के घोर विरोधी होते हैं। इन लोगों का मानना है कि पैगंबर देवदूत तो है। लेकिन उनकी पूजा नहीं की जा सकती। देवबंदी जमात के तबलीगी अनुयायी लंबी दाढ़ी, सिर पर पगड़ी और सफेद चोले से पहचाने जाते हैं। जिस इंदौर में  दंगे होते रहते हैं वहां कई साल पहले तक मुहर्रम के ताजियों के समय यह भंापना मुश्किल होता था कि यह पर्व हिंदुओं का है या मुसलमानों का। असल में हिंदुस्तान में इस्लाम के स्थापित होने और उसके देश की आजादी के आंदोलन से ले कर शिक्षा, विकास में षामिल रहने का मूल कारण उसकी मिली-जुली परंपरा ही थी। जान कर आश्चर्य होगा कि भारत के केरल में इस्लाम हजरत मुहम्मद साहब के जीवनकाल में ही आ गया था और आज भी दुनिया की सबसे पुरानी दूसरे नंबर की मस्जिद भारत में ही है। उस मस्जिद का स्थापत्य केरल की स्थानीय संस्कृति के अनुरूप ही है। भारत का मुसलमान गीत-संगीत, अभिनय में शीर्ष  पर है, लेकिन कट्टरपंथी इससे नाखुश हैं।
भारत में 19 करोड़ मुसलमानों में से कोई दो तिहाई बरेलवी हैं। इस मत के लोग स्थानीय संस्कृति व विचारधारा से प्रभावित हो कर इस्लाम की पद्धति का पालन करते हैं। इन लोगों के लिए पैगंबर पूजनीय है और मजार, कव्वाली, सूफी, रहस्यवाद, संगीत में उनकी आस्था है। 19वीं सदी में उत्तर प्रदेश के दो शहरों- देवबंद और बरेली से इस्लाम की दो विचारधाराओं का जन्म हुआ। दोनों ने इस्लाम की व्याख्या अपने-अपने तरीके से करना प्रारंभ किया। बात टकराव तक पहुंच गई और आज भी यदा-कदा दोनों मतों को मानने वाले लड़ते-भिड़ते रहते हैं। बरेलवी यह सवाल खड़ा करते हैं कि भारत में हो रहे आतंवादी हमलों को इस्लामिक आतंकवाद क्यों कहा जाता है? उसे बहावी-आतंकवाद कहना चाहिए। कहने को देश में बरेलवियों की बहुतायत है, लेकिन पैसे के नाम देवबंदी मजबूत हैं और इसी ताकत से वे देश में मस्जिदों पर कब्जे की मुहिम चलाए हुए हैं।’
देश में ज्यादातर बरेलवी मस्जिदें जर्जर हालत में हैं। कट्टरपंथी इनकी हालत सुधारने के नाम पर इमदाद देते हैं, फिर धीरे से अपना मौलवी वहां बैठा देते हैं। इस प्रकार सूफीवाद के समर्थकों की जगह कट्टरपंथी जम जाते हैं। हालांकि अब देवबंदी जुलूस-जलसे व फतवे निकाल कर खुद को खून-खराबे और आतंकवादी घटनाओं का विरोधी सिद्ध करने में जुट गए हैं। लेकिन इस बात को मानना ही होगा कि सन 1941 में लाहौर में मौलाना मौदूदी द्वारा स्थापित जमात-ए-इस्लामी और उससे प्रभावित तबलीगी, अहले हदीस आदि द्वारा इस्लाम की कट्टरपंथी व्याख्या से युवाओं को गुमराह होने का उत्प्रेरक मिलता रहता है। यह भी नहीं भूलना चाहिए कि बहावियों व देवबंदियों ने अंग्रेजों के खिलाफ खासा मोर्चा लिया था। प्रसिद्ध पुस्तक ‘‘ गाड्स टेरेरिस्ट: दि बहावी कल्ट एंड दि हिडेन रूट्स आफ मार्डन जेहाद’’ के लेखक चार्ल्स एलन का कहना है कि तालीबान का लगभग प्रत्येक प्रमुख सदस्य देवबंदी मदरसे में पढ़ा है। पुस्तक में सिद्ध किया गया है कि देवबंदी नजरिया मूलतः अलगाववादी है और समाज को दो तरह से तोड़ता है - एक तो मुसलमानों में फूट पैदा करता है और दूसरे गैर-मुसलमानों के बीच दरार पदा करता है।
यह देश के मुस्लिम नेतृत्व की त्रासदी है कि वह युवा पीढ़ी को सहिष्णु, सूफी इस्लाम की ओर मोड़ने में बहुत हद तक असफल रहा है। बहावी और देवबंदियों का असली संकट पहचान को ले कर खतरा है, जिसका सामाजिक हल संभव है। काश, ऐसा हो पाता तो एक बड़े वर्ग की उर्जा का सकारात्मक इस्तेमाल हो पाता। मुंबई की हाजी अली दरगाह का फैसला महज औरतों या इस्लाम के लिए नहीं बल्कि भारत की साझा संस्कृति की नीव को मजबूत करने का एक सकारात्मक प्रयास है।


गुरुवार, 25 अगस्त 2016

scorpine leak : worst example of business-war

व्यापारिक ढाह की बानगी है स्कॉर्पीन पनडुब्बी लीक

                                                                  पंकज चतुर्वेदी
भारत की सीमाएं बर्फीले पहाड़, दुर्गम घाटियों, मरूस्थल, गहरे समुद्र और ढेर सरे दुश्मनों से घिरी हुई हैं। हमारे जांबाज सैनिकों के बदौलत उसकी निगहबानी उतना कठिन काम नहीं है जितना कि प्रतिरक्षा के लिए अनिवार्य आयुध सामानों की खरीद। आजादी के बाद से हमारे रक्षा सौदे विवादों में रहे। इससे उछले छींटों से प्रधानमंत्री की कुर्सी भी नहंी बच पाई। गत एक दशक के दौरान तो रक्षा सौदे इतने बदनाम व संवेदनशील हो गए कि अफसर इसमें हाथ उालने से ही बचते रहे। हालांकि विदेशी कंपनियों के सहयोग से पहले ब्रहमोस और उसके बाद स्कॉर्पीन पनडुब्बी का भारत में ही उत्पादन ऐसे प्रयाग रहे हैं जिसके चलते रक्षा उपकरणेां की खरीद में लिप्त महकमों में भरोसा जाग्रत हुआ। इसी बीच आस्ट्रेलिया के एक अखबार ‘‘ द आस्ट्रेलियन’’ ने भारतीय नौसेना और फ्रांसीसी कंपनी डीसीएनएस के बीच हुए स्कॉर्पीन पनडुब्बी समझौते की जानकारियांे के कोई बाईस हजार पन्ने सार्वजनिक कर दिए। इन दस्तावेजों में कई बेहद संवेदनशील और गोपनीय मसले हैं जो पनडुब्बी की मारक क्षमता और कई तकनीकी खूबियों पर प्रकाश डालते हैं। इसमें काई षक नहीं कि इस खुलासे से भारत की समुद्री प्रतिरक्षा की येाजना, फ्रांसिसी कंपनी की विश्वसनीयता पर अमिट धब्बा लगा है, लेकिन असल खेल तो आस्ट्रेलिया में खेला गया है और उसका असल उद्देश्य आस्ट्रेलियाई सरकार के इसी साल अप्रैल मंे किए गए ऐसी ही पनडुब्बी से संबंधित एक सौदे को पलीता लगाना था।
भारत सरकार ने फ्रांसीसी शिप बिल्डर डीसीएनएस के साथ सन 2005 में साढे तीन अरब अमेरिकी डॉलर का सौदा किया था जिसके तहत बनने वाली कुल छह पनडुब्बियों में से पहली आईएनएस कलवरी इस समय मुंबई के मझगांव डॉक में बनाई जा रही है। अखबार में लीक हुई जानकारी में पनडुब्बी किस फ्रीक्वेंसी को पकड़ती है, वह अलग अलग स्पीड के दौरान किस तरह का शोर करती है, उसकी गहराई क्षमता, रेंज और मजबूती जैसी बातें शामिल है। पनडुब्बी पर मौजूद क्रू किस जगह से सुरक्षित बात कर सकता है ताकि उसकी बातचीत दुश्मन की पकड़ में ने आए। मैग्नेटिक, इलेक्ट्रोमैग्नेटिक और इंफ्रा-रेड डाटा और साथ ही पनडुब्बी के तारपीडो लॉन्च सिस्टम और कॉम्बैट सिस्टम की खासियतें, पेरिस्कोप के लिए किस तरह की रफ्तार और स्थिति की जरूरत होती है, शोर को लेकर विवरण और पनडुब्बी के पंखे और रेडिएशन के शोर के स्तर जब पनडुब्बी सतह पर होती है, ऐसे तथ्य भी उजागर हुए हैं। इसमें कोई षक नहीं कि ऐसी जानकारियां सार्वजनिक होने से हमारे दुश्मन इसकी काट खोजने में प्रयास कर सकजे हैं या सतक््र हो सकते हें, लेकिन यह भी तय है कि अंतरराश्ट्रीय बाजार में यह जानकारियां होती ही हैं। इस तरह की सबमेरिन मलेशिया, चिली और ब्राजील के पास हैं । सो यह मान लेना कि हमारी पनडुब्बी बेकार हो गई या प्रभावी नहीं रही, बेमानी है। जब तक हम भारत में खुद स्वदेशी तकनीक से पनडुब्बी नहीं बनाते तब तक जानकारियों के लीक होने या सार्वजनिक होने का ख़तरा मौजूद रहेगा.। सबसे बड़ी बात युद्ध में मशीन से ज्यादा व्यक्तिगत षौर्य व नीति कौशल काम आता ह जिसकी भारत में कोई कमी नहीं है।
बहरहाल सामरिक दृश्टि से भले ही इस लीक का ज्यादा असर भारत पर ना हो, लेकिन इतनी बड़ी संख्या में दस्तावेजों का लीक होना ज्यादा चिंता की बात है। भारत का मानना है कि यह लीक फ्रांसीसी शिप बिल्डर डीसीएनएस के कंप्यूटरों से  हुआ है, जबकि भारत इसका आरोप डीसीएनएस पर मढ़ रहा है। फिलहाल अनुमान यह है कि दस्तावेजों की यह चेारी सन 2011 के आसपास षुरू हुई थी और इसमें फा्रंसिसी सेना का एक पूर्व अधिकारी , जो कि इन दिनों डीसीएनएस का ठेकेदार है, ने यह कांड किया है। यह तो जांच से पता चलेगा कि लीक कहां से हुआ व इसका असल इरादा क्या था।, ंलेकिन गौरतलब है कि आस्ट्रेलियाई मीडिया में यह भी खबर तैर रही है कि इसी अप्रैल में ‘‘केनबेरा’’ ने इसी फ्रांसीसी कंपनी को 50 अरब डालर का 12 षार्टफिन बरकुडा ए-1 पनडुब्बी का आदेश दिया था। हालांकि यह पनडुब्बी का डिजाईन व क्षमता भारत वाली से अलग है, लेकिन वहां कतिपय लॉबी फ्रांस को यह ठेका देने की जगह किसी अन्य कंपनी के लिए लॉबिंग कर रही थी और उन्हीं लोगों ने हैकिंग के जरिये इन दस्तावेजों को सार्वजनिक किया है।  लेकिन इस खुलासे के बाद आस्ट्रेलिया का रक्षा मंत्रालय फ्रांस की कंपनी की गोपनीयता बरकारार रखने की व्यवस्था पर उंगली उठा रहा है। याििन एक खुलासे से कई देशों के बीच आपसी संबंधो ंपर षक के बादल छा गए हैं। यह भी सब जानते हें कि आस्ट्रेलिया में आईएसआई इतना मजबूत नहीं है कि भारत के खिलाफ इतना बड़ा लेख कर ले, लेकिन समुद रक्षा के मामले में चीन की साजिश को नजरअंदाज नहीं किया जा कसता। चीन वैेसे भी ब्रहमोस के प्रयोग से खफाा है और उससे ज्यादा उसकी नाराजी इस भारतीय उत्पाद को वियेतनाम द्वारा खरीदने की संभावना से है।
वैसे इस पूरे ख्,ाुलासे से सबसे बड़ा संकट तो 380 से ज्यादा साल पुरानी कंपनी ‘‘डायरेक्शन देस कन्स्ट्रक्शन एट आर्मेस नवेल्स’’ या डीसीएएन पर मंडरा रहा हे। इस कंपनी के 10 देशों में कार्यालय है व कोई 13 हजार कर्मचारी इसमें काम करते हैं। हाल ही में इस कंपनी ने जर्मनी थायसेनउन समूह, जापान के मित्सुबिसी व कावासाकी से मुकाबला कर नार्वें और पौलेंड में भी बड़े ठेके पाए थे। यदि यह बात सामने आ जताी है कि कंपनी रक्षा तकनीक की गोपनीयता बना कर रखने में सक्षम नहीं है तो विश्वसनीयत के संकट के चलते उसका ढांचा गिर सकता है। अब कंपनी भी कह रही है कि यह लीक ‘‘ वित्तीय छद्म-युद्ध’’ का हिस्सा है और इसमें कई प्रतिद्वंदी कंपनियों की साजिश हो सकती है।
बहरहाल भातर के लिए यह चिंता की बात तो है, लेकिन अभी भी हमारे पास वक्त है कि षेश बची पांच पनडुब्ब्यिों में लीक हो गई जानकारी से अलग खासियतों का समावेश किया जा कसता हे। यह भी सोचने की बता है कि यदि यह महज व्यापारिक रंजिश है तो इसका गलत लाभ आतंकवादी भी सहजता से लगा सकते हें व इससे पैदा हुई गलतफहमी ुदनिया को व्यापक युद्ध में झोंक सकती है। अतः पूरे मामले की जांच व आरेपी को उजागर करना भी जरूरी है।

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