My writings can be read here मेरे लेख मेरे विचार, Awarded By ABP News As best Blogger Award-2014 एबीपी न्‍यूज द्वारा हिंदी दिवस पर पर श्रेष्‍ठ ब्‍लाॅग के पुरस्‍कार से सम्‍मानित

शनिवार, 17 फ़रवरी 2024

Does Congress really want to stand again?

 

क्या सही में कांग्रेस फिर से खड़ी होना चाहती है ?

पंकज चतुर्वेदी



यह तो ते हो गया है कि कांग्रेस जिन दलों को लोकतंत्र बचाने के नाम पर एकत्र कर इंडिया गठबंधन बना रहा था, वह योजना फ्लॉप हो गई है और काँग्रेस में जिसने भी इस योजना को बनाया था, वह असल में चाहता ही नहीं था कि कांग्रेस अपने पैरों पर आए। इसमें कोई शक नहीं कि यदि आज भी देश के सबसे बड़े विपक्षी दल या हर राज्य में निर्णायक उपस्थिति रखने वाला कोई राजनैतिक दल है तो वह कांग्रेस ही है और यदि किसी की आस्था लोकतंत्र में है तो वह एक मजबूत विपक्ष की अपेक्षा रखेगा ही । 16वीं लोकसभा चुनाव के नतीजे हों या उसके बाद हुए विभिन्न राज्यों के विधान सभा चुनाव या फिर सत्ताधारी दलों के हमले , निर्विवाद है कि सत्ताधरी दल के बाद सबसे ज्यादा , और पूरे देश में, हर राज्य व जिले में वोट पाने वाला एकमात्र दल कांग्रेस ही है। अब स्पष्ट हो चुका है कि कांग्रेस के भीतर बैठे स्लीपर सेल ने इंडिया गठबंधन के नाम पर समूची कांग्रेस की आगामी लोकसभा चुनाव की तैयारियों को बहुत पीछे कर दिया है। कांग्रेस असल मने एक राजनीतिक दल से अधिक शासन चलें का तरीका है और जो भी दल सत्ता में आता है, कांग्रेस हो जाता है । यही कारण है कि कांग्रेस के अधिकांश छत्रप बगैर सत्ता के रह नहीं सकते और तभी बैचेनई में कांग्रेस छोड़ छोड़ कर जा रहे हैं ।



 कांग्रेस का नेता और संभावित उम्मीदवार , आम कार्यकर्ता अब ऊब गया कि अगले दो महीने बाद उसे किसका झण्डा  उठाना होगा, नीतीश कुमार, ममता बेनरजी, और अब केजरीवाल का रूख बताया चुका है कि वे ऐसे हालात में समझौता करने के प्रस्ताव देंगे जिससे बात भी न बने और न ही उन पर गठबंधन तोड़ने का आरोप लगे। बीते दो दशक में जिस तरह कांग्रेस के टुकड़े हुए है, यह नेतृत्व के प्रति  अविश्वास या  मजबूत पकड़ ना होने से ही हुए हैं और अधिकांश राज्य स्तर के दलों या बीजेपी द्वारा बनाए गए मुख्यमंत्री का मूल गौत्र कांग्रेस है।  कांग्रेस को सबसे पहले इस बिखराव के कारणों को खोजने तथा अपने बिछुड़े साथियों को वापिस लाने की योजना पर काम करना चाहिए। हो सकता है, इसमें पार्टी के कतिपय पुराने क्षत्रपों के कुछ निजी हित टकराएं, लेकिन संगठन को आधे दर्जन राज्यों  में मोर्चे पर वापिस लाने के लिए कांग्रेस यदि कोई भी कीमत चुका कर यह काम करती है तो मान कर चलें कि बिखरा, टूटा, जनाघार खो चुकी कांग्रेस आगमी चुनावों में मुकाबले में  दिखेगी ।


नेहरूजी से लेकर इंदिराजी तक और आज भी- कांग्रेस ताकतवर नेताओं की गणेश परिक्रमा वाली पार्टी है, और तभी दल में ना तो नया नेत्ृत्व उभर रहा है और ना ही कार्यकर्ता। ऐसे में बिखराव रोकने के लिए कांग्रेस को सबसे पहले “इंडिया” के सपने को यही मार कर अपने पुराने “ यू पी ए “ को एकजुट कर उम्मीदवारों की घोषणा के काम पर आगे बढ़ना होगा । एक बात और,  बीजेपी और आरएसएस अच्छी तरह से जानता हैं कि कांग्रेस पार्टी का ‘मेगनेट या गोंद’ नेहरू-गांधी परिवार ही है और इसी लिए पहले सोनिया गांधी के विदेशी मूल के और उसके बाद राहुल गांधी को पप्पू, बेवकूफ या असरहीन करार देने का अच्छा प्रचार किया गया। जाहिर है कि विपक्षी दल अपने विरोधी की सबसे बड़ी ताकत को ही कमजोर करना चाहती है। हकीकत यह है कि राहुल गांधी की राजनीति में कही कोई गलती नहीं है, लेकिन उन्हें यह सोचना चाहिए था कि जब एक तरफ लाखों की भीड़ के साथ  यात्रा और सभा की चर्चा होती है तो उसे वोट में बदलने में कांग्रेस कार्यकर्ता असफल क्यों रहता  है ?


कांग्रेस का एक और प्रयोग असफल रहा, जिसमें सरकार व पार्टी का चेहरा अलग-अलग दिखाना था। जबकि भारत  में जनता एक ही नेतृत्व देखना चाहती है। अपने पारंपरिक वोट को पाने के लिए अब पार्टी में राज्य स्तर के क्षत्रप तैयार कर केंद्र पर एक ही चैहरे के प्रयोग की तरफ लौटना होगा। इसके लिए अनिवार्य है कि कांग्रेस अब विभिन्न दलों को जोड़ने के बजाय केवल अपने पुराने साथियों को जोड़ कर टिकट घोषित करे ।

हाल के राज्यसभा चुनाव में जिस तरह बीजू जनता दल ने बीजेपी का समर्थन किया , यह इशारा मात्र है कि विभिन्न राज्यों में केवल कांग्रेस का वइरोध कर उभरे दल किसी भी हालत में कांग्रेस के साथी हो नहीं सकते । इसमें वे सभी दल शामिल हैं जो कभी न कभी बीजेपी की उंगली से शहद चाट चुके हैं । कांग्रेस को यह भी विचार करना होगा कि वे कौन से नेता थे जिन्होंने अन्ना आंदोलन से उपजे सरकार-विरोधी असंतोष  की पूरी योजना को नजरअंदाज किया या फिर उसकी प्रतिरोध-योजना नहीं बनाई। आज मोदीजी की प्रचंड जीत की भूमिका अन्ना आंदोलन से ही लिख दी गई थी, जिसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सीधी भूमिका थी, फिर बाबा रामदेव प्रसंग हुआ, बीच में निर्भया वाला विरोध प्रकरण..... और देखें आंदोलन से निकले वी के सिंह हों या फिर रामदेव या आम आदमी पार्टी के कई अन्य नेता, बाद में भाजपा के अग्रणी चेहरे बन गए। पहले भीड़ जोड़ना, उसमें सरकार की नाकामियों  को दिखा कर विरोध की भावना पैदा करना, फिर उसी भीड़ को मोदीजी की सभा में ले जा कर उसे अपना वोट बनाने की योजना भाजपा की उत्कृष्ट  योजना रही, और मदमस्त, जनता के सरोकारों से विमुख कांग्रेसी अपने संगठन के लिए कुछ योगदान नहीं कर पाए। यह विडंबना है कि बड़े से बड़ा कांग्रेसी सोनिया, राहुल या प्रियंका की पीठ पर चढ कर अपनी सफलता की इबारत लिखना चाहता है, जबकि वह अपने कार्यकर्ताओं तक से ना केवल दुर्व्यवहार करता है, जनता से दूर ही रहता है।

एक बात समझ लें राम मंदिर मुद्दा अब धीरे धीरे शून्य की तरफ है और इसे बीजेपी भी चुनावी विषय बनाने से बचेगी। ऐसे में कांग्रेस को इस विषय पर मौन ही रहना होगा । यदि अब कांग्रेस चाहती है कि उसका अस्तित्व  बचा रहे तो उसे इस महीने के अंतिम दिनों तक पुराने यू पी ए के साथियों के साथ सीटें बाँट लेना चाहिए ।

कांग्रेस को अपने बूथ कार्यकर्ता को दल से जोड़ कर रखने के लिए कुछ करना होगा। जान लें कि कार्यकर्ता केववल निष्ठा  या विचारधारा के कारण दल से जुड़ता है, यदि उसे सम्मान नहीं मिलेगा तो वह  अपने व्यवसाय या परिवार का समय पार्टी को देने के बारे में सोचेगा भी नहीं। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में बीते विधान सभा चुनाव में कांग्रेस आखिरी हफ्ते में बूथ प्रबंधन में हार गई थी । कांग्रेस यदि वास्तव में अपन मटियामेट हो गई प्रतिष्ठा  को फिर से शिखर पर लाना चाहती है तो उसे नए गठबंधन के नाम पर भीड़ जोड़ने के बनिस्पत , आत्ममंथन, बिछड़े लोगों को वापिस लाने, कार्यकर्ता को सम्मान देने के कार्य तत्काल करने होंगे। हालांकि आज पार्टी जिस हाल में उसको देखते हुए तो मोदीजी को सन 2024  के चुनाव में भी कोई चुनौती नहीं दिख रही है।

 

बुधवार, 14 फ़रवरी 2024

Then where should the dogs go?

 

फिर कुत्ते कहाँ  जाएँ ?

पंकज चतुर्वेदी



दिल्ली में सत्ताधारी दल से जुड़े एक पूर्व केन्द्रीय मंत्री विजय गोयल लंबे समय से कुत्तों को ले कर अभियान चला रहे हैं राजधानी दिल्ली से सटे गाज़ियाबाद की एक बहुमंजिला इमारत के समाज अर्थात सोसायटी में धरने , मारापीटी – थाना – मुकदमे हुए- यहाँ तक कि विधायक  भी पहुँच गये . मसला था  सोसायटी के परिसर में  सड़क के कुत्तों को खाना खिलाने का . एक समूह का दावा था  कि ये कुत्ते बच्चों को काटते हैं, गंदगी भी करते हैं . धीरे  धीरे इलाके की कई अन्य सोसायटी से भी यह आवाज़ उठने लगी, बैनर बने, नारे लगे, मोमबत्ती जुलुस भी निकल गए . लोग थाली बजा  कर कुत्तों और कुत्तों को खाना खिलाने वालों का विरोध  कर रहे  हैँ । गौरतलब है कि जिस इलाके में यह सब हो रहा है वहां टूटी  सड़कें , जलभराव, ट्रेफिक जाम और अतिक्रमण , पेयजल खरीदना जैसे मसले सालों से हैं लेकिन कभी यह समाज इसके लिए आवाज़ उठाता नहीं दिखा . वैसे यह केवल राजनगर एक्स्टेंशन का ही विवाद नहीं है, दिल्ली एनसीआर में नोयडा हो या  गुरुग्राम  या फिर दिल्ली की संकरी गलियों में निम्न-माध्यम आर्थिक वर्ग के लोगों की बस्तियां , जयपुर , पटना, -- देश के हर ऐसे इलाके में जहां आबादी का विस्तार हो रहा है लेकिन जमीन काम पड़  रही है ।   हर जगह सडक के कुतों को खाना खिलाने वाले और कुत्तों से डरने वालों में टकराव साल- दर साल बढ़ रहा है. गाज़ियाबाद में तो आवारा बंदरों का बड़ा आतंक है , ये कपडे-खाने पीने की वस्तुओं- टीवी डिस्क से लेकर एसी तक का नुक्सान भी करते हैं, काटते  भी हैं और गाहे बगाहे इनके भी से नीचे कूदने से जान अजाने की खबरें भी आती हैं , लेकिन कभी कोई बंदरों के विरुद्द्ध आवाज़ उठाता नहीं दिखा. यायावर सांड तो कई जान ले चुके हैं लेकिन निशाने पर हैं कुत्ते ! सवाल यह है कि आखिर कुत्ते जाएँ कहाँ ?  युगीन से तो वे इंसान के साथ, बस्ती में ही रहते रहे हैं ।



यदि पौराणिक ग्रन्थों और अतीत में झांकें तो जानकारी मिलती है कि इंसान और कुत्ते का साथ कोई बारह हज़ार साल से है . मनुष्य ने अपने धरती पर पैदा होने के बाद सबसे पहले कुत्ता पालना शुरू किया था. हमे पाषाण काल {नव पाषाण काल लगभग 4000 ईसा पूर्व  से 2500 ईसा पूर्व} के मानव कंकाल के साथ कुत्ता दफनाने के साक्ष्य बुर्जहोम (जम्मू कश्मीर) से प्राप्त हुआ है . आदि काल में कुत्ता इन्सान को शिकार करने में मदद करता था , फिर वह घर व् फसल की सुरक्षा भी करता  था , सबसे बड़ी बात कम भोजन में भी वफादार बने रहने के उसके गुण ने आज कुत्ते को इन्सान द्वारा पाले जाने वाले सबसे विश्वस्त और सर्वाधिक संख्या का जानवर बना दिया .



ऐसा भी नहीं है कि शहरों में कुछ कुत्ते हिंसक नहीं हो रहे हैं ,  लेकिन विचार करना ही होगा कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है . शहर में जमीन का संकट तो है ही फिर बहुमंजिला इमामर्तों ने कुत्तों से वह देहरी छीन ली जिस अपर बैठ कर वह बगैर पालतू बने ही चौकीदारी किया करता था . कथित सोसायटी में बगीचा, घूमने के स्थान, आदि को संकुचित किया जा रहा है और यदि वह बचे इंसान में कोई कुत्ता आ जाता है तो इन्सान को लगता है कि यह उसकी जगह पर कब्जा कर रहा है . समझना होगा कि हर कुत्ते का अपना इलाका होता है . जब कुत्तों की संख्या तेज़ी से बढती है तो उनका क्षेत्र कम हो जाता है और उसी के अनुसार उनका भोजन, सोने की जगह भी सिकुड़ती. ऐसे  में  कुत्ते असुरक्षित महसूस करते है कि इंसान उसके इलाक़े में घुस रहा है तो ऐसी स्थिति में वह आक्रामक हो जाते हैं.



यह भयावह है कि बकौल विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) दुनिया में 36 प्रतिशत कुत्ते के काटने से होने वाले रैबीज़ से मौत के मामले भारत में होते हैं.जो कि  18,000 से 20,000 है. रेबीज़ से  मौतों में से 30 से 60 प्रतिशत मामलों में पीड़ित की उम्र 15 साल से कम होती है. हालांकि कुत्ता इंसान पर निर्भर रहने वाला जानवर है लेकिन समझना होगा कि कुत्तों में पीछा करने की आदत होती है. ऐसे में कुत्ता देखा कर भागने वाले कुत्तों का शिकार बन जाते हैं .  अगर कुत्ते को लगता है कि आप बलवान हैं, तो वो शायद आप पर हमला न करें. तभी सडक के कुत्ते  बच्चों और बूढ़ों पर हमला कर सकते हैं.



 शहरीकरण के  चलते  शोर,  ट्रेफिक , प्रदूषण , बेतरतीब पड़े कचरे से मांसाहारी खाना  और फिर उसका चस्का लग जाना , वाहन और परिसरों में रौशनी की चकाचौंध  भी ऐसे कारण हैं जो कुत्ते को हिंसक बना रहे हैं .

सोशल मीडिया  पर यदा कदा ऐसे  वीडियो दिख जाते हैं जिनमें कुत्ते किसी बच्चे या बुजुर्ग पर हमला करते दिख जाते हैं. इसके बाद बहुत से लोग आशंका में ही आवारा कुत्तों पर चिल्लाते हैं, उन्हें लात मारते हैं, उन पर पत्थर फेंकते हैं, उन पर गर्म पानी या तेजाब फेंकते हैं, उन्हें जहर देते हैं या उन्हें अन्य तरीकों से दुर्व्यवहार करते हैं, तो कुत्ते खुद को या अपने पिल्लों की रक्षा करने की आवश्यकता महसूस करते हैं. समझना होगा कि शहर में बंदर या कस्बों में आवारा सांड अधिक नुक्सान और इंसान की मौत का कारक बन रहे हैं , इसके बावजूद उनके प्रति इतना रोष  या नफरत दिखती नहीं . क्या इंसान के लिए कुत्ता सबसे निरीह जानवर है जिस पर वह अपना गुस्सा निकाल सकता है ?

आवारा कुत्तों के संख्या न बढे , उन्हें  एंटीरेबीज , एंटी डिस्टेम्पर टीके सही समय पर लगें – इसके लिए स्थानीय निकाय लापरवाह हैं , वहीं समाज में बहुत से लोगों के लिए  ऊँची नस्ल का कुत्ता स्टेट्स सिम्बल है लेकिन वे उससे एक फीसदी कम खर्चे में पलने वाले देशी कुत्तों को पालने को राजी नहीं हैं। विदित हो केंद्र सरकार ने देशी नस्ल के कुत्तों को सुरक्षा बालों में स्थान दे कर संदेश भी दिया है कि हमारे कुत्ते किसी से कम नहीं हैं।

इन्सान की कुत्तों के प्रति बढ़ रही नफरत के मद्देनज़र उत्तराखंड हाई कोर्ट  का जुलाई-2018 में दिया गया वह आदेश महत्पूर्ण है जिसमें लिखा था –“जानवरों को भी इंसान की ही तरह जीने का हक है। वे भी सुरक्षा, स्वास्थ्य और क्रूरता के विरूद्ध इंसान जैसे ही अधिकार रखते  हैं .” वैसे तो हर राज्य ने अलग-अलग जानवरों को राजकीय पशु या पक्षी घोषित  किया है लेकिन असल में इनसे  जानवर बचते नहीं है। जब तक समाज के सभी वर्गों तक यह संदेश  नहीं जाता कि प्रकृति ने धरती पर इंसान , वनस्पति और जीव जंतुओं को जीने का समान अधिकार दिया, तब तक उनके संरक्षण को इंसान अपना कर्तव्य नहीं मानेगा। यह सही है कि जीव-जंतु या वनस्पति अपने साथ हुए अन्याय का ना तो प्रतिरोध कर सकते हैं और ना ही अपना दर्द कह पाते है। कुत्ता भी इन्सान और प्रकृति के बीच के चक्र का अनिवार्य अंग है . उसे नए तरह के शहर और इन्संके अनुरूप ढलने में समय लगेगा लेकिन तब तक इन्सान को ही उसके प्रति संवेदनशीलता दिखानी होगी .

 

सोमवार, 12 फ़रवरी 2024

Poaching of rhino on alarm

 

                एक सींग वाले गैंडे के अवैध शिकार के पीछे संगठित अपराधी

                                            पंकज चतुर्वेदी

 

 

इस साल का पहला महिना ही असम के दुर्लभ एक सींग वाले गैंडों  के लिए बुरा साबित  हुआ । 22 जनवरी को काँजीरंगा पार्क के  माकलुङ केंप के करीब एक युवा नर गैंडे  का शव मिल । फिर 26 जनवरी को इस स्थान से कोई एक किलोमीटर दूर ही दूसरे गैंडे  के अस्थि पंजर मिले। दोनों ही गैंडों  के सींग काट लिए गए थे जिससे स्पष्ट था कि ये शिकारियों के हाथ मारे गए हैं । हालांकि राज्य के सुरक्षा बालों ने दो दिन में ही शिकारी जोगु पेगु को एक ए के 47 राएफल और एक सींग के साथ गिरफ्तार कर लिया। जांच में पता चल कि शिकारी के तार मणिपुर के उन लोगों से जुड़े हैं  जो म्यांमार के रास्ते चीन तक इस संकतग्रत प्रजाति के जानवर के सींगों की तस्करी करते हैं ।

एक सींग वाला गैंडा दुनिया में संकटग्रत प्राणी घोषित  है। इसकी संख्या सारे संसार में बामुश्किल 4000 होगी और इनमें से 88 प्रतिशत  असम में ही हैं। कोई 2613 काजीरंगा पार्क में हैं तो पवित्र अभ्यारण में 107 और ओराङ्ग राष्ट्रीय उधयं में 125 गैंडे हैं। मानस संरक्षित वन में भी लगभग 45 एक सींग के गैंडे हैं ।

सन 2022 गैंडों  के लिए सबसे शुभ रहा था क्योंकि इस साल शिकार की एक भए घटना नहीं हुई। यदि सरकारी आंकड़ों पर भरोसा करें तो सन 2009 में हुई गणना में कांजीरंगा में एक सींग वाले गेंडों की संख्या 2048 थी। सन 1980 से 1997 के सत्रह सालों में 550 गेंडों के शिकार की बात सरकार स्वीकार करती है, जिनमें सर्वाधिक 42 सन 1992 में मारे गए थे। उस दौर में काँजीरंगा का जंगल लगभग गैंडा विहीन हो गया था। 2000 और 2021 के बीच असम में कम से कम 191 गैंडों का शिकार किया गया। 2013 और 2014 में 27 गैंडों की मौत की सूचना मिली। 2020 और 2021 में दो-दो गैंडे मारे गए। पिछले साल भी दो गैंडों के शिकार की सूचना  है । 

भी

कहते हैं कि बीती सदी में एक सींग वाला गैंडा समूचे भारतीय उपमहाद्वीप में पाया जाता था यानी आज के पाकिस्तान के सिंध से ले कर नेपाल, भूटान और म्यांमार की सरहद तक। फिर किसी ने कह दिया कि इसका सींग यैनवर्धक होता है, कहीं इसके चमड़ें को गोली-तलवार का वार रोकने लायक मजबूत कह दिया गया।इन दिनों हल्ला है कि कैंसर की दवाई में गैंडे का सींग राम बाण है। वियतनाम और चीने के बाजार में इनकी खुलेआम मांग है।  फिर क्या था ? धड़ाधड़ मारा जाने लगा यह निरीह जानवर।  अब यह असम तक सीमित रह गया है। कोई 430 वर्ग किलोमीटर में फैले कांजीरंगा नेशनल पार्क का विकास गैंडो के लिए ही किया गयाथा, इसे यूनेस्को ने विस्त्र धरोहर घोशित कर रखा है, लेकिन कभी बाढ़ तो कभी शिकार के चलते इनका अस्तित्व ही खतरे में

गैंडा एक शांत  प्राणी है और उसका सींग काट कर मरने के लिए छोड़ देना बेहद अमानवीय और दर्दनाक अपराध है। भारतीय गैंडे की दृष्टि कमजोर होती है और इसके बजाय वह अपनी सुनने और सूंघने की बेहतर इंद्रियों पर निर्भर रहता है।

यहां ध्यान देना होगा कि बीते दो  दशक के दौरान समूचे कांजीरंगा पार्क के चारों ओर असंख्य बस्तियां बस गईं। असम गण परिषद  व भाजपा कहता रहा है कि ये सभी अवैध रूप से भारत में घुसे बांग्लादेशी हैं और ये ही लोग गैंडों के शिकार व उसके सींग की तस्करी में शामिल हैं। हांलाकि पुलिस ने ‘‘कार्बी पीपुल्स लिबरेशन टाईगर्स’’ नामक आतंकवादी संगठन के कई लोगों को समय-समय पर गैडे के सींग की तस्करी करते हुए रंगे हाथों पकड़ा है और यह बात खुफिया रिपोर्ट में दर्ज है कि उत्तर-पूर्वी राज्यों के कुछ आतंकवादी संगठन गैंडे के सींग के बदले मादक दवाआं और हथियार  लाने के लिए म्यांमार, थाईलैंड तक आते-जाते हैं। इस बात की पुष्टि होती भी है क्योंकि कई बार गैंडो की हत्या में एके-47 जैसे अत्याधुनिक हथियारों का इस्तेमाल किया गया है। चीन के बाजार में गैंडे के सींग की कीमत एक लाख रूपये प्रति किलो तक मिलती है। चीन में इसे दवा के तौर पर आधिकारिक रूप से इस्तेमाल किया जाता है।

यहां जानना जरूरी है कि संरक्षित पार्क से सट कर अवैध आवासीय गतिविधियां और सड़कें बनने से कांजीरंगा के नैसर्गिक स्वरूप के साथ बहुत छेड़छाड़ हुई है और इसी का दुष्परिणाम  है कि जब ब्रह्मपुत्र में पानी बढ़ता है तो जंगल में बाढ़ आ जाती है। असम में हर साल आने वाली बाढ़ भी गैंडों के लिए काल बनती है । जब काजीरंगा में जल स्तर बढ़त है और गैंडे सुरक्षित स्थानों पर भागते हैं । इसी फिराक में वे शिकारियों के हत्थे चढ़ जाते हैं । इंसानों की बस्ती बढ़ने से संरक्षित वन क्षेत्र की बाढ़बंदी भी प्रभावित हुई हे। गैंडों के मारे जाने के बड़े कारणो में ये दो बातें बेहद महत्वपूर्ण हैं। इसके अलावा जंगल में निगरानी की अत्याधुनिक व्यवस्था ना होना, क्षेत्रफल के लिहाज से वनरक्षकों की कमी और उनके पास नए उपकरणों का अभाव गैंडों की जान का दुश्मन बना हुआ हे। सबसे बड़ी बात सरकार इस गंभीर समस्या को गंभीरता से नहीं ले रही है।

समय-समय पर गैंडों के अवैध शिकार की सी बी आई जांच की मांग होती रही है । वैसे सितंबर-2012 में सीबीआई ने गेंडों के शिकार के तीन मुकदमें दर्ज भी किए थे, लेकिन आश्चर्यजनक तरीके से उन पर कोई कार्यवाही नहीं हुई। इसी तरह फरवरी-12 में असम के मुख्य वन सरंक्षक ने आश्वासन दिया था कि कांजीरंगा की रक्षा के लिए बीएसएफ को लगाया जाएगा, लेकिन उस के बाद यहां अवैध शिकार के कई मामले सामने आए थे ।

इसमें कोई शक नहीं कि बीते कुछ सालों में सरकार के कड़ी कदमों से जहां  गैंडों  के शिकार में कमी आई है वहीं सामूहिक प्रयासों से गैंडों की संख्या भी बढ़ी है । पूर्वोत्तर में म्यांमार से लागि सीमा पर बाधबन्दी और उन्मुक्त आवाजाही रुकने से संगठित शिकारी गिरोह काम नहीं कर पाएंगे। भारत के गैंडों के संरक्षण की कहानी सिर्फ उस जानवर के अस्तित्व की कहानी नहीं है, बल्कि हमारे धरती ग्रह की बहुमूल्य जैव विविधता के संरक्षण के लिए आशा की किरण है।

 

शुक्रवार, 9 फ़रवरी 2024

What is the meaning of late and less snowfall in the lap of Himalayas?

 

हिमालय की गोद में देर से और कम बर्फबारी के क्या मायने  हैं ?

पंकज चतुर्वेदी



क्या हिमालय की गोद में बसे भारत, के कई राज्य, नेपाल और  पाकिस्तान के गिलगित-बाल्टिस्तान क्षेत्र में देर से हुई बर्फबारी महज एक असामान्य घटना है या फिर जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का संकेत ? यह बात गौर करने की है कि बीते कुछ सालों में हिमालय  लगातार असामान्य और चरम मौसम की चपेट में है, इस बार बरसात ने हिमाचल प्रदेश से ले कर उत्तराखंड तक जबरदस्त कहर ढाया था। लेकिन इस बार लगातार 45 दिन  तक पहाड़ों पर बर्फ न गिरने ने  अकेले उन राज्यों ही नहीं शेष भारत के लिए भी संकट खड़ा आकार दिया है । जान लें  देर से हुई बर्फबारी से राहत तो है लेकिन इससे उपजे खतरे भी हैं ।

धरती का स्वर्ग कहलाने वाले कश्मीर को सुंदर , हरा भरा और वहाँ के वाशिंदों के लिए जीवकोपार्जन का मूल आधार है – जाड़े का मौसम । यहाँ जाड़े के कुल  70 दिन गिने जाते हैं । 21 दिसंबर से 31 जनवरी तक “ चिल्ला – ए –कलाँ “ यानि शून्य से कई डिग्री नीचे वाली ठंड । इस बार यह समय बिल्कुल शून्य बर्फबारी का रहा । उसके बाद बीस दिन का “चिल्ला-ए – खुर्द” अर्थात छोटा जाड़ा  , यह होता है -31 जनवरी से 20 फरवरी। इस दौर में बर्फ शुरू हुई लेकिन उतनी नहीं जीतने अपेक्षित है । और उसके बाद 20 फरवरी से 02 मार्च  तक बच्चा जाड़ा  यानि “चिल्ला ए बच्चा “। कह सकते हैं कि समूचे हिमालय में इस बार बर्फ का स्तर “चिल्ला ए बच्चा “ का ही रहा है ।

सत्तर दिन की बर्फबारी 15 दिन में सिमटने से दिसंबर और जनवरी में हुई लगभग 80-90 प्रतिशत कम बर्फबारी  की भरपाई तो हो नहीं सकती । उसके बाद गर्मी शुरू हो जाने से साफ जाहिर है कि जो थोड़ी सी बर्फ पहाड़ों पर आई है , वह जल्दी ही पिघल जाएगी । अर्थात आने वाले दिनों में एक तो ग्लेशियर पर निर्भर नदियों में अचानक बाढ़ या आसक्ति है और फिर अप्रेल में गर्मी आते-आते वहाँ पानी का अकाल हो सकता है ।

भारत में हिमालयी क्षेत्र का फैलाव 13 राज्यों व  केंद्र शासित प्रदेशों (अर्थात् जम्मू और कश्मीर, लद्दाख, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, सिक्किम, त्रिपुरा, असम और पश्चिम बंगाल) में है, जो लगभग 2500 किलोमीटर। भारत के मुकुट कहे जाने वाले हिमाच्छादित पर्वतमाला की गोदी में कोई पाँच करोड़ लोग  सदियों से रह रहे हैं । चूंकि यह क्षेत्र अधिकांश भारत के लिए पानी उपलब्ध करवाने वाली नदियों का उद्गम है , साथ ही यहाँ के ग्लेशियर  धरती के गरम होने को नियंत्रित करते हैं, सो  जलवायु परिवर्तन की दृष्टि से यह सबसे अधिक संवेदनशील है ।

जलवायु परिवर्तन की मार से सर्वाधिक प्रभावित उत्तराखंड के पहाड़ जैसे अब अपना संयम खो रहे हैं -देश को सदानीरा गंगा-यमुना जैसे नदिया देने वाले पहाड़ के करीब 12 हजार प्राकृतिक स्रोत या तो सूख चुके हैं या फिर सूखने की कगार पर हैं। इस सर्दी में हिमालय, हिंदू कुश और काराकोरम में बर्फबारी की असामान्य अनुपस्थिति के चलते गर्म तापमान रहा  है। चरम ला नीना-अल नीनो स्थितियों और पश्चिमी विक्षोभ मौसम इस तरह असामान्य रहा । जलवायु संकट के प्रतीक ये बदलाव पर्वतीय समुदायों और हिंदूकुश-हिमालयी क्षेत्र में जल सुरक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण खतरा पैदा करते हैं। यह समझना होगा कि सर्दियों में कम बर्फबारी का कारण  अल नीनो नहीं है। अल- नीनो के कारण केवल गर्मियों और मानसून की बारिश प्रभावित होती  है।  महज एक या दो साल बर्फ रहित सर्दी का जिम्मेदार   'जलवायु परिवर्तन' को ठहरना भी जल्दबाजी होगा। यह अभी वैज्ञानिक कसौटी पर सिद्ध होना बाकी है ।   विदि त हो कि पहाड़ों पर रहने वाले लोग आजीविका के लिए प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर हैं । वे अपना निर्वाह खेती और पशुधन पालन से करते हैं । उनके खेत छोटे होते हैं। लगभग बर्फ रहित या देर से सर्दी का प्रभाव उन  लोगों के लिए विनाशकारी हो सकता है। 

 ऊंचे पहाड़ों पर खेतों में बर्फ का आवरण आमतौर पर एक इन्सुलेशन कंबल के रूप में कार्य करता है। बर्फ की परत से उनके फसलों की रक्षा होती है, कांड-मूल जैसे उत्पादों की वृद्धि होती है, पाले का प्रकोप नहीं हो पाता । साथ ही बर्फ से मिट्टी का  कटाव भी रुकता है। पूरे हिमालय क्षेत्र में कम बर्फबारी और अनियमित बारिश से क्षेत्र में पानी और कृषि वानिकी सहित प्रतिकूल पारिस्थितिक प्रभाव पड़ने की संभावना है।

अगर तापमान जल्दी ही बढ़ जाता है तो तो देर से होने वाली बर्फबारी और भी अधिक त्रासदी दायक होगी । इससे जीएलओएफ (हिमनद झील के फटने से होने वाली बाढ़) अचानक बाढ़ आएगी और घरों, बागानों  और मवेशियों को बहा ले जाएगी।  गर्मी से यदि ग्लेशियर अधिक पिघले तो आने वाले दिनों में पहाड़ी राज्यों में स्थापित सैंकड़ों मेगा वाट की जल विद्धुत परियोजनाओं पर भी संकट या सकता है । लंबे समय तक सूखे के कारण झेलम और अन्य नदियों का जल स्तर अभी से नकारात्मक सीमा में है ।

कश्मीर में जल शक्ति विभाग के मुख्य अभियंता संजीव मल्होत्रा नस्वीकार करते हैं कि  “समय पर बर्फबारी और बारिश की कमी के कारण सतही जल स्रोतों के जल स्तर में उल्लेखनीय कमी आई है। इससे आने वाले हफ्तों में

प्रसिद्ध भूवैज्ञानिक और इस्लामिक यूनिवर्सिटी ऑफ साइंसेज एंड टेक्नोलॉजी कश्मीर के कुलपति, शकील अहमद रोमशू का कम और बेमौसम बर्फ को लेकर अलग ही आकलन है । उनका कहना है इससे कश्मीर घाटी में प्रदूषण  स्तर बढ़ेगा और स्वास्थ्य जोखिम भी  पैदा होंगे ।

उत्तराखंड में मसूरी से ऊपर बर्फबारी और बारिश न होने से मौसम खुश्क बना हुआ था , बारिश की कमी और पाले की मार से किसानों की फसलें दम तोड़ गई । जिसके चलते पहाड़ी क्षेत्र चकराता में जहां किसान कैश क्रॉप कहीं जाने वाली फसल अदरक, टमाटर, लहसन, मटर पर ही अपनी आजीविका के लिए निर्भर रहता है, ये सभी फसलें इन दिनों बदहाली के दौर से गुजर रही हैं। वहीं पहाड़ी क्षेत्र में समय से बर्फ ना गिरने की वजह से सेब,आडू और खुमानी की पैदावार कमजोर हो गई ।

हमारे देश के सम्पन्न अर्थ व्यवस्था का आधार खेती है और  खेती बगैर सिंचाई के हो नहीं सकती । सिंचाई के लिए अनिवार्य है कि नदियों में जल-धारा अविरल रहे लेकिन नदियों में जल लाने की जिम्मेदारी तो उन बर्फ के  पहाड़ों की है जो गर्मी होने पर धीरे धीरे पिघल कर देश को पानीदार बनाते हैं । साफ है कि आने वाले दिनों में न केवल कश्मीर या हिमाचल, बल्कि सारे देश में जल संकट खड़ा होगा ही । जल संकट अपने साथ

सवाल यह उठता है कि इस अनियमित मौसम से कैसे बचा जाए ? ग्लोबल वार्मिंग या अल –नीनो को दोष देने से पहले हमें स्थानीय ऐसे कारकों पर विचार करना होगा जिससे प्रकृति कूपित है। जून 2022 में गोविंद बल्लभ पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान (जीबीएनआईएचई) द्वारा जारी रिपोर्ट 'एनवायर्नमेंटल एस्सेसमेन्ट ऑफ टूरिज्म इन द इंडियन हिमालयन रीजन' में कड़े शब्दों मे कहा गया था कि हिमालयी क्षेत्र में बढ़ते पर्यटन के चलते हिल स्टेशनों पर दबाव बढ़ रहा है। इसके साथ ही पर्यटन के लिए जिस तरह से इस क्षेत्र में भूमि उपयोग में बदलाव आ रहा है वो अपने आप में एक बड़ी समस्या है। जंगलों का बढ़ता विनाश भी इस क्षेत्र के इकोसिस्टम पर व्यापक असर डाल रहा है। यह रिपोर्ट नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के आदेश पर पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (एमओईएफ और सीसी) को भेजी गई थी । इस रिपोर्ट में हिमाचल प्रदेश में पर्यटकों के वाहनों और इसके लिए बन रही सड़कों के कारण वन्यजीवों के  आवास नष्ट होने और जैवविविधता पर विपरीत असर की बात भी कही गई थी॰

 

गुरुवार, 8 फ़रवरी 2024

Patri Bazar becomes New Delhi World Book Fair

 

पटरी बाजार बनता नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेला

पंकज चतुर्वेदी

 

‘बात करती हैं किताबें, सुनने वाला कौन है ?

सब बरक यूं ही उलट देते हैं पढ़ता कौन है ?’ अख्तर नज्मी

 


लेखकों, प्रकाशकों, पाठकों को बड़ी बेसब्री से इंतजार होता है हर सर्दियों में साल लगने वाले नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेला का। इसे दुनिया के सबसे बड़े पुस्तक मेलों में गिना जाता है . हालांकि फेडरेशन आफ इंडियन पब्लिशर्स(एफआईपी) हर साल अगस्त में दिल्ली के प्रगति मैदान में ही पुस्तक मेला लगा रहा है और इसमें लगभग सभी ख्यातिलब्ध प्रकाशक आते हैं, बावजूद इसके नेशनल बुक ट्रस्ट के पुस्तक मेले की मान्यता अधिक है। क्योंकि यह मेला किताब खरीदने- बेचने के स्थान से कहीं अधिक एक साहित्यिक और सांस्कृतिक उत्सव और लेखकों के मेलमिलाप की तरह होता है . वैश्वीकारण के दौर कें हर चीज बाजार बन गई है, लेकिन पुस्तकें अभी इस श्रेणी से दूर हैं। इसके बावजूद पिछले कुछ सालों से नई दिल्ली पुस्तक मेला पर वैश्वीकरण का प्रभाव देखने को मिल रहा है।  हर बार 1300 से 1400 प्रकाशक/विकेंता भागीदारी करते हैं, लेकिन इनमें बड़ी संख्या पाठ्य पुस्तकें बेचने वालों की होती हे। दरियागंज के अधिकांश विक्रेता यहां स्टाल लगाते हैं। परिणामतः कई-कई स्टालों पर एक ही तरह की पुस्तकें  दिखती हैं।



यह बात भी तेजी से चर्चा में है कि इस पुस्तक मेले में विदेशी भागीदारी लगभग ना के बराबर होती जा रही है। यदि श्रीलंका और नेपाल को छोड़ दें तो विश्व बैंक, विश्व श्रम संगठन, विश्व स्वास्थ्य संयुक्त राश्ट्र, यूनीसेफ आदि के स्टाल विदेशी मंउप में अपनी प्रचार सामग्री प्रदर्शित करते दिखते हैं। फै्रंकफर्ट और अबुधाबी पुस्तक मेला के स्टाल भागीदारों को आकर्शित करने के लिए होते हैं।  अरब और ईरान के स्टाल दिल्ली स्थित उनके दूतावास लगाते हैं और वहन अधिकांश धार्मिक पुस्तकें होती हैं. कुछ साल पहले तक विदेशी मंडप में पाकिस्तान की आमद ताक़तवर होती थी. आठ से दस प्रकाशक आते थे और ख़ूब बिक्री भी होती थी. दोनों देशों के बीच ताल्लुकात खराब हुए तो बाकी तिजारत तो जारी रही, बस एक दुसरे के पुस्तक मेलों में सहभागिता बंद हो गई. “विशेष अतिथि देश” के मंडप में जरुर किताबें होती है लेकिन केवल प्रदर्शनी के लिए वह भी कुछ ही दिन को . इक्का-दुक्का स्टालों पर विदेशी पुस्तकों के नाम पर केवल ‘रिमेंडर्स’ यानी अन्य देशों की फालतू या पुरानी पुस्तकें होती हैं। ऐसी पुस्तकों को प्रत्येक रविवार को दरियागंज में लगने वाले पटरी-बाजार से आसानी से खरीदा जा सकता है।



नई दिल्ली पुस्तक मेला में बाबा-बैरागियों और कई तरह के धार्मिक संस्थाओं के स्टालों में हो रही अप्रत्याशित बढ़ौतरी भी गंभीर पुस्तक प्रेमियों के लिए चिंता का विषय  है। इन स्टालों पर कथित संतों के प्रवचनों की पुस्तकें, आडियों कैसेट व सीडी बिकती हैं। कुरान शरीफ और बाईबिल से जुड़ी संस्थाएं भी अपने  प्रचार-प्रसार के लिए विश्व पुस्तक मेला का सहारा लेने लगी हैं। दुखद यह है कि पिछले पांच सालों में ऐसे स्टाल झगड़े और टकराव के स्थान बन गए हैं . आये रोज वहां कोई संगठन आ कर उधम करता है . सबसे बड़ी बात ऐसे स्टाल पर दिन भर तेज आवाज़ में ऑडियो- विडियो चलते हैं और धर्म के कारण उस पर कोई दखल देता नहीं, लेकिन उससे बाकी भागीदारों को दिक्कतें होती हैं



पुस्तक मेला के दौरान बगैर किसी गंभीर योजना के सेमिनारों, पुस्तक लोकार्पण आयोजनों का भी अंबार होता है।  कई बार तो ऐसे कार्यक्रमों में वक्ता कम और श्रोता अधिक होते है। यह बात भी अब किसी से छिपी नहीं है कि अब लेखक अमनच पर एक ख़ास विचारधारा के लोगों का कब्जा है, जबकि ये स्थान  पुस्तक मेले में भागीदारी करने वाले प्रकाशकों के लिए बनाए गए थे, ताकि वे अपने स्टाल पर पुस्तक विमोचन ना करें, जिससे आवागमन के रास्ते बंद हो जाते हैं. जान कर आश्चर्य होगा कि पिछले साल अंग्रेजी के आथर्स  कोर्नर में एक ऐसा सेमिनार हुआ जिसमें कठुआ में एक छोटी बच्ची के साथ बलात्कार और हत्या के मामले में आरोपियों का बचाव किया जा रहा था.

पुस्तक मेला के दौरान प्रकाशकों, धार्मिक संतों, विभिन्न एजेंंसियों द्वारा वितरित की जाने वाली निशुल्क सामग्री भी एक आफत है। पूरा प्रगति मैदान रद्दी से पटा दिखता है। कुछ सौ लोग तो हर रोज ऐसा ‘‘कचरा’’ एकत्र कर बेचने के लिए ही पुस्तक मेला को याद करते हैं। एक बात और बुद्धिजीवियों को खटक रही है कि पुस्तक मेले को राजनितिक दलों के नेताओं के होर्डिंग –पोस्टरों से पाट दिया जाता है , दुनिया के किसी भी पुस्तक मेले में वहां के मंत्री या एताओं के प्रचार की सामग्री नहीं लगी जाती है . छुट्टी के दिन मध्यवर्गीय परिवारों का समय काटने का स्थान, मुहल्ले व समाज में अपनी बौद्धिक ताबेदारी सिद्ध करने का अवसर और बच्चों को छुट्टी काटने का नया डेस्टीनेशन भी होता है- पुस्तक मेला। यह बात दीगर है कि इस दौरान प्रगति मैदान के खाने-पीने के स्टालों पर पुस्तक की दुकानों से अधिक बिक्री होती है।

बीते साल से नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेला नए प्रगति मैदान में लगने लगा है लेकिन आयोजन और स्टाल  डिजाइन की प्रक्रिया वही पुरानी है . आम लोगों को स्टाल  नम्बर से अपना पसंदीदा प्रकाशक तलाशने में दिक्कत होती है . वहीँ शोर और आने और जाने के एक ही रस्ते से भीड़ में दुविधाएं भी . यह समय आ गया है कि आय्ज्कों को प्रकाशक या आगंतुकोंकी भीड़ बढ़ने के स्थान पर इसके वैश्विक स्वरुप में सुधर के लिए काम करना चाहिए .

 

मंगलवार, 6 फ़रवरी 2024

New Delhi World Book Fair - Need improvement to be claimed as world book fair

 

नई दिल्ली पुस्तक मेले को “विश्व स्तर” का बनना होगा

पंकज चतुर्वेदी



 

52 साल पहले 18 मार्च से 04 अप्रेल 1972 तक   नई दिल्ली के विंडसर पेलेस के मैदान में कोई 200 भागीदारों के साथ शुरू हुआ  नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेला अब दुनिया के सराधिक बड़े पुस्तक मेलों में शामिल है । सन 2013 तक यह हर दो साल में  लगता था , फिर यह सालाना जलसा हो गया । लेखकों, प्रकाशकों, पाठकों को बड़ी बेसब्री से इंतजार होता है नई दिल्ली विश्व  पुस्तक मेला का। इस बार यह 10  से 18 फरवरी 2024 तक है ।  हालांकि फेडरेशन आफ इंडियन पब्लिषर्स(एफआईपी) भी हर साल अगस्त में दिल्ली के प्रगति मैदान में ही पुस्तक मेला लगा रहा है और इसमें लगभग सभी ख्यातिलब्ध प्रकाशक आते हैं, बावजूद इसके नेशनल बुक ट्रस्ट के पुस्तक मेले की मान्यता अधिक है। वैश्वीकरण  के दौर कें हर चीज बाजार बन गई है, लेकिन पुस्तकें, खासकर हिन्दी की, अभी इस श्रेणी से दूर हैं। पिछले कुछ सालों से नई दिल्ली पुस्तक मेला पर बाजार का असर देखने को मिल रहा है। किताबों के स्वत्वाधिकार के आदान-प्रदान के लिए दो दिन “राइट्स टेबल” का विशेष आयोजन होता है । यह बड़ी बात है कि केवल किताब खरीदने के लिए तो  दर्जनों वेबसाईट उपलब्ध हैं जिस पर घर बैठे आदेश दो और घर बैठे डिलेवरी लो, इसके बावजूद इसके बावजूद यहाँ 1200 से 1400 प्रतिभागी होते हैं और कई चाह कर भी हिस्सेदारी नहीं कर पाते क्योंकि जगह नहीं होती ।



असल में पुस्तक भी इंसानी प्यार की तरह होती है जिससे जब तक बात ना करो, रूबरू ना हो, हाथ से स्पर्ष ना करो, अपनत्व का अहसास देती नहीं हे। फिर तुलनातमकता के लिए एक ही स्थान पर एक साथ इनते सजीव उत्पाद मिलना एक बेहतर विपणन विकल्प व मनोवृति भी है। हालांकि यह पुस्तक मेल एक उत्सव की तरह होता है, जहां किताब का व्यापार मात्र नहीं, कई तरह के समागम होते हैं । लेकिन यह नई दिल्ली पुस्तक मेले का 31 वां  आयोजन है और इसे अब बदलना होगा ।



 पिछले साल से यह मेल प्रगति मैदान के नए बने हॉल  में हो रहा है और इतने विशाल परिसर में कोई स्टाल तलाशना बहुत जटिल है । पेइचिंग पुस्तक मेले में बड़े बड़े हाल्स को चौराहों की तरह विभाजित किया जाता है और बीच के रास्ते पर बड़े बड़े प्लेट लटकते हैं जो पंक्ति और स्तम्भ में शामिल विक्रेताओं के नंबर स्पष्ट दिखाते हैं । असल में अधिक लोगों की संख्या बढ़ाने के लिए नई दिल्ली पुस्तक मेले में कतार ठीक से बन नहीं पाती हैं। एक बात और यहाँ दरियागंज के अधिकांश  वितरक और विक्रेता स्टाल लगाते हैं, परिणामतः कई-कई स्टालों पर एक ही तरह की पुस्तकें  दिखती हैं। अंग्रेजी के हिस्से में की लोग विदेश से आए रद्दी में से किताबों को बेहद कम दाम अपर बेचते हैं, उनके यहाँ भीड़ भी होती है लेकिन ऐसे दृश्य किसी मेले के “विश्व” होने पर सवाल उठाते हैं ।



यह बात भी तेजी से चर्चा में है कि इस पुस्तक मेले में विदेशी  भागीदारी लगभग ना के बराबर होती जा रही है। यदि श्रीलंका और नेपाल को छोड़ दें तो विश्व  बैंक, संयुक्त राष्ट्र श्रम संगठन,  स्वास्थ्य, यूनीसेफ आदि के स्टाल विदेशी मंडप  में अपनी प्रचार सामग्री प्रदर्षित करते दिखते हैं। फै्रंकफर्ट और अबुधाबी पुस्तक मेला के स्टाल भागीदारों को आकर्शित करने के लिए होते हैं। इक्का-दुक्का स्टालों पर विदेशी  पुस्तकों के नाम पर केवल ‘रिमेंडर्स’ यानी अन्य देषों की फालतू या पुरानी पुस्तकें होती हैं। ऐसी पुस्तकों को प्रत्येक रविवार को दरियागंज में लगने वाले पटरी-बाजार से आसानी से खरीदा जा सकता है। पहले पाकिस्तान से दस प्रकाशक आते थे लेकिन बीते एक दशक से पाकिस्तान के साथ बाकी तिजारत तो जारी है लेकिन एक दूसरे के पुस्तक  मेलों में भागीदारी बंद हो गई।हर बार किसी देश को  “ विशेष अतिथि देश “  का समान दिया जाता है , वहाँ से लेखक, कलाकार भी आते हैं लेकिन उनके आयोजनों में बीस लोग भी नहीं होते। एक तो उनका प्रचार काम होता है , फिर प्रगति मैदान में घूमना और किसी सेमीनार में भी बैठना किसी के लिए शायद ही संभव हो। हालांकि विदेशी तो बहुत दूर है , हमारे मेले में संविधान में अधिसूचित सबबही 22 भारतीय भाषाओं के स्टालस भी नहीं होते। पहले राज्यों के प्रकाशक संघों को निशुल्क स्टाल और आवास की व्यवस्था की जाती थी तो ढेर सारे भाषाई प्रकाशक यहाँ आते थे ।

नई दिल्ली पुस्तक मेला की छबि पर एक  दाग वहाँ हर हाल में  बजने वाले प्रवचन और हल्ला-गुल है । बाबा-बैरागियों और कई तरह के धार्मिक संस्थाओं के स्टालों में हो रही अप्रत्याषित बढ़ौतरी भी गंभीर पुस्तक प्रेमियों के लिए चिंता का विषय  है। इन स्टालों पर कथित संतों के प्रवचनों की पुस्तकें, आडियों कैसेट व सीडी बिकती हैं। कुरान शरीफ और बाईबिल से जुड़ी संस्थाएं भी अपने  प्रचार-प्रसार के लिए विश्व  पुस्तक मेला का सहारा लेने लगी हैं। बीते कुछ सालों से हर बार वहाँ कुछ संगठन उधम करते हैं और सारा साहित्यिक जगत सांप्रदायिक विवाद में धूमिल हो जाता है । समझना होगा कि किताबें लोकतंत्र की तरह हैं – आपको अपनी पसंद का विषय, लेखक, भाषा चुनने का हक देती हैं । यह मेल ही है तो है जहां गांधी- और सावरकर, चे-गोवएरा  और भागवत गीता  साथ साथ रहते हैं और पाठक निर्णय लेता है कि वह किसे पसंद करे। या तो इस तरह के धार्मिक स्टालस को लगाने ही नहीं देना चाहिए या फिर उन्हे किसी एक जगह एक साथ कर देना चाहिए ।

पुस्तक मेला के दौरान बगैर किसी गंभीर योजना के सेमिनारों, पुस्तक लोकार्पण आयोजनों का भी अंबार होता है।  कई बार तो ऐसे कार्यक्रमों में वक्ता कम और श्रोता अधिक होते है। यह बात भी अब किसी से छिपी नहीं है कि अब एक ही तरह की विचारधारा के लोगों को  आयोजक द्वारा निर्धारित “लेखक मंच” में समय दिया जाता है । असल में यह स्थान भागीदार प्रकाशकों के लिए बना था कि वे अपने स्टाल पर लोकार्पण आदि न करें  और इससे वहाँ भीड़ न जमा हो । लेकिन  लेखक मंच राजनीतिक मंच बन गया और प्रकाशक यथावत अपने स्टाल पर आयोजन करते हैं । बाल अमंडप में भी बच्चे स्कूल्स से बुलाए जाते हैं जबकि यह स्थान इस तर्क का होना चाहिए कि मेले में आए बच्चे स्वतः यहाँ कि गतिविधियों में शामिल हों।

पुस्तक मेला के दौरान प्रकाशकों, धार्मिक संतों, विभिन्न एजंेंसियों द्वारा वितरित की जाने वाली निषुल्क सामग्री भी एक आफत है। पूरा प्रगति मैदान रद्दी से पटा दिखता है। कुछ सौ लोग तो हर रोज ऐसा ‘‘कचरा’’ एकत्र कर बेचने के लिए ही पुस्तक मेला को याद करते हैं। छुट्टी के दिन मध्यवर्गीय परिवारों का समय काटने का स्थान, मुहल्ले व समाज में अपनी बौद्धिक ताबेदारी सिद्ध करने का अवसर और बच्चों को छुट्टी काटने का नया डेस्टीनेशन भी होता है- पुस्तक मेला। यह बात दीगर है कि इस दौरान प्रगति मैदान के खाने-पीने के स्टालों पर पुस्तक की दुकानों से अधिक बिक्री होती है।

पार्किंग , मैदान के भीतर खाने-पीने की चीजों के बेतहाशा दाम, हाल के भीतर मोबाईल का नेटवर्क कमजोर होने , भीड़ के आने और जाने के रास्ते एक ही होने जैसी कई ऐसी दुविधाएं हैं जिनसे यदि निजात पा ले तो सही मायने में नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेल “विश्व” स्तर का होगा ।

 

The right to a dignified farewell and a new standard in medical world

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