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शुक्रवार, 24 जनवरी 2014
मंगलवार, 21 जनवरी 2014
दाल की घटती मांग व् खेती पर आलेख राष्ट्रीय सहारा २२ जनवरी २०१४ http://www.rashtriyasahara.com/epapermain.aspx?queryed=9और राज एक्सप्रेस, भोपाल २३-१-१४
आम आदमी की थाली से दूर होती दाल
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मुद्दा पंकज चतुव्रेदी
इन दिनों आम आदमी के भोजन से दाल गायब हो रही है। इसका कारण है, मांग की तुलना में कम उत्पादन। डॉलर के मुकाबले रपए के कमजोर होने से घटता आयात और उसके आसमान छूते दाम। वह दिन अब हवा हो गए हैं जब आम मेहनतकश लोगों के लिए प्रोटीन का मुख्य स्रेत दालें हुआ करती थीं। देश की आबादी बढ़ी, लोगों की पौष्टिक आहार की मांग भी बढ़ी, लेकिन नहीं बढ़ा तो दाल बुवाई का रकबा। परिणाम सामने हैं- मांग की तुलना में दाल की आपूत्तर्ि कम है और इसी कारण बाजार भाव मनमाने हो रहे हैं। भारत में 20 मीट्रीक टन दाल की सालाना जरूरत है, जबकि देश में सन् 2012-13 में इसका उत्पादन हुआ महज 18.45 मीट्रिक टन। दाल की कमी होने के कारण ही इसके दाम बढ़ रहे हैं, नजीतन आम आदमी प्रोटीन की जरूरतों की पूर्ति के लिए दीगर अनाजों पर निर्भर हो रहा है। इस तरह दूसरे अनाजों की भी कमी और दामों में बढ़ोतरी हो रही है। हालात इतने खराब हैं कि पिछले 22-23 सालों से हम हर साल दालों का आयात तो कर रहे हैं, लेकिन दाल में आत्मनिर्भर बनने के लिए इसका उत्पादन और रकबा बढ़ाने की कोई ठोस योजना नहीं बन पा रही है । यहां यह जानना जरूरी है कि भारत दुनिया भर में दाल का सबसे बड़ा खपत कर्ता, पैदा करने वाला और आयात करने वाला देश है। दुनिया में दाल के कुल खेतों का 33 प्रतिशत हमारे यहां है जबकि खपत 22 फीसद है। इसके बावजूद अब वे दिन सपना हो गए हैं जब आम-आदमी को ‘दाल-रोटी खाओ, प्रभु के गुण गाओ’ कह कर कम में ही गुजारा करने की सीख दे दी जाती थी। आज दाल अलबत्ता तो बाजार में मांग की तुलना में काफी कम उपलब्ध है, और जो उपलब्ध है, उसकी कीमत चुकाना गरीब गुरबा और आम-आदमी के बूते से बाहर हो गया है। वर्ष 1965-66 में देश का दलहन उत्पादन 99.4 लाख टन था, जो 2006-07 तक आते-आते भी 145.2 लाख टन ही पहुंच पाया। सन 2008-09 में मुल्क के 220.9 लाख हेक्टेयर खेतों में 145.7 लाख टन दाल ही पैदा हो सकी। सनद रहे कि इस अवधि में देश की जनसंख्या में कई-कई गुणा बढ़ोतरी दर्ज हुई है। जाहिर है, अबादी के साथ दाल की मांग भी बढ़ी। इसी अवधि के दौरान गेंहू की फसल 104 लाख टन से बढ़ कर 725 लाख टन तथा चावल की पैदावार 305.9 लाख टन से बढ़ कर 901.3 लाख टन हो गई। हरित क्रांति के दौर में दालों की उत्पादकता दर, अन्य फसलों की तुलना में बेहद कम रही है। दलहन फसलों की बुवाई के रकबे में बढ़ोतरी न होना भी चिंता की बात है । सन 1965-66 में देश के 227.2 लाख हेक्टेयर खेतों पर दाल बोई जाती थी जबकि सन 2005-06 तक आते-आते यह रकबा घट कर 223.1 लाख हेक्टेयर रह गया। वर्ष 1985-86 में विश्व में दलहन के कुल उत्पादन में भारत का योगदान 26.01 प्रतिशत था, लेकिन 1986-87 में यह आंकड़ा 19.97 पर पहुंच गया। हालांकि सन 2000 आते-आते इसमें कुछ बढ़ोतरी हुई और यह 22.64 फीसद हो गया लेकिन ये आंकड़े हकीकत में मांग से बहुत दूर रहे। हम गत 25 वर्षो से लगातार विदेशों (म्यांमार, कनाडा, आस्ट्रेलिया और टर्की) से दालें मंगवा रहे हैं। पिछले साल देश के बाजारों में दालों के रेट बहुत बढ़ गए थे। तब आम आदमी बहुत परेशानी में था और उसने अपने स्तर पर विरोध भी दर्ज कराया, लेकिन आलू-प्याज के लिए कोहराम मचाने वाले राजनीतिक दल इस मुद्दे पर चुप्पी साधे रहे थे । पिछले साल सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी एमएमटीसी ने नवम्बर तक 18,000 टन अरहर और मसूर की दाल आयात करने के लिए नियंतण्र टेंडर को मंजूरी दी थी। माल आया भी, उधर हमारे खेतों ने भी बेहतरीन फसल उगली। एक तरफ आयातित दाल बाजार में थी, सो किसानों को अपने उत्पादन का अपेक्षित रेट नहीं मिला। ऐसे में किसान के हाथ फिर निराशा लगी और अगली फसल में उसने एक बार फिर दालों से मुंह मोड़ लिया । दाल के उत्पादन को प्रोत्साहित करने के इरादे से केंद्र सरकार ने सन 2004 में इंटीग्रेटेड स्कीम फार आईल सीड, पल्सेज, आईल पाम एंड मेज (आईएसओपीओएम) नामक योजना शुरू की थी। इसके तहत दाल बोने वाले किसानों को सब्सिडी के साथ-साथ कई सुविधाएं देने की बात कही गई थी। लेकिन वास्तव में यह योजना नारों से ऊपर नहीं आ पाई। इससे पहले चौथी पंचवर्षीय योजना में ‘इंटेंसिव पल्सेस डिस्ट्रीक्ट प्रोग्राम’ के माध्यम से दालों के उत्पादन को बढ़ावा देने का संकल्प लाल बस्तों से उबर नहीं पाया। सन 1991 में शुरू हुई राष्ट्रीय दलहन विकास परियोजना भी आधे-अधूरे मन से शुरू की गई योजना थी। उसके भी कोई परिणाम नहीं निकले। जहां सन 1950-51 में हमारे देश में दाल की खपत प्रति व्यक्ति प्रति दिन 61 ग्राम थी जो 2009-10 तक आते-आते 36 ग्राम से भी कम हो गई। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) की मानें तो हमारे देश में दलहनों के प्रामाणिक बीजों हर साल मांग 13 लाख कुंतल है, जबकि उपलब्धता महज 6.6 लाख कुंतल। यह तथ्य इस बात की बानगी है कि सरकार दाल की पैदावार बढ़ाने के लिए कितनी गंभीर है। यह दुख की बात है कि भारत, जिसकी अर्थव्यवस्था का आधार कृषि है, वहां दाल जैसी मूलभूत फसलों की कमी को पूरा करने के लिए कोई ठोस कृषि-नीति नहीं है। एक ही उपाय है कि कमी हो तो बाहर से आयात कर लो। यह तदर्थवाद देश की परिपक्व कृषि-नीति का परिचायक कतई नहीं माना जा सकता है। नेशनल सैंपल सव्रे के एक सव्रेक्षण के मुताबिक आम भारतीयों के खाने में दाल की मात्रा में लगातार हो रही कमी का असर उनके स्वास्थ्य पर दिखने लगा है। इसके बावजूद दाल की कमी कोई राजनीतिक मुद्दा नहीं बन पा रहा है। शायद सभी सियासी पार्टियों की रुचि देश के स्वास्थ्य से कहीं अधिक दालें बाहर से मंगवाने में हैं। तभी तो इतने शोर-शराबे के बावजूद दाल के वायदा कारोबार पर रोक नहीं लगाई जा रही है। इससे भले ही बाजार भाव बढ़े, सटौरियों को बगैर दाल के ही मुनाफा हो रहा है।
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शनिवार, 18 जनवरी 2014
KANGER VALLY, BASTAR,KUTUMSAR LIME CAVES
बस्तर में सुकमा वाले मार्ग पर कांगेर संरक्षित वन क्षेत्र है , वहां कुटुमसर में चूने
और पानी के मिलन से बनने वाली गुफाओं और उसके भीतर की अजब दुनिया को देखना
विलक्षण अनुभव हेा आप अचानक कई लाख साल पीछे की दुनिया में चले जाते हैं ,
इस गुफा में नीचे उतरने के लिए सबसे पहले आपका मोटापा आडे आ सकता है
क्योंकि पहला ही मार्ग बामुश्किल तीन फुट रेडियस का हैा भीतर पतली सी
पट्रटी पर चलना है कोई 370 मीटर गहराई में घुप्प अंधेरा, हवा की गुंजाईश
नहीं बस एक गाईड के हाथ में ली हुई सोलर लालटेन के सहारे चूने
की कठोर हो गई आक़तियों को देखें, यहां एक चित्र में वे छोटी छोटी मछली भी
दिखेंगी जिनकी आंखें नहीं होती, क्योंकि वे पीढियों से घुप अंधेरे में
हैंा यहां नई बन रही आक़तियां भी हैं और सदियों पुरानी संगमरमर की तरह
चिकनी हो गई भीा लगातार लोगों के आवागमन और रोशनी के कारण कार्बन डाय
आक्साईड व मोनो आक्साईड का प्रभाव इन धवल आक़तियों पर दिखने लगा हेा ये
सफेद उजली से धुंधली हो रही हैं ा मैंने यहां पत्थरों की देा लेयर में बीच
करैत सांप का बच्चा सोते हुए देखा ा एक अध्ययन से पता चला है कि करोड़ों वर्ष पूर्व प्रागैतिहासिक काल में बस्तर की कुटुमसर की गुफाओं में मनुष्य रहा करते थे।
फिजिकल रिसर्च लेबोरेटरी अहमदाबाद, इंस्टीट्यूट आफ पेलको बाटनी लखनऊ तथा भूगर्भ अध्ययन शाला लखनऊ ने यह जानकारी दी है।
विश्व प्रसिद्ध बस्तर की कुटुमसर की गुफाएँ कई रहस्यों को अभी भी अपने में समेटे हुए है जिनका भूगर्भ शास्त्रियों द्वारा लगातार अध्ययन किया जा रहा है।
भूगर्भशास्त्रियों का कहना है कि करोड़ों वर्ष पूर्व क्षेत्र में कुटुमसर की गुफाऐं स्थित हैं वह क्षेत्र पूरा पानी में डूबा हुआ था। गुफाओं का निर्माण प्राकृतिक परिवर्तनों साथ साथ पानी के बहाव के कारण हुआ।
कुटुमसर की गुफाऐं जमीन से 55 फुट नीचे हैं । इनकी लंबाई 330 मीटर है। इस गुफा के भीतर कई पूर्ण विकसित कक्ष हैं जो 20 से 70 मीटर तक चौड़े हैं। फिजिकल रिसर्च लेबोरेटरी अहमदाबाद के शोधकर्त्ताओं ने इन्हीं कक्षों के अध्ययन के बाद निष्कर्ष पर पहुँचे है कि करोड़ों वर्ष पूर्व यहाँ के आस पास के लोग इन गुफाओं में रहा करते थे। संभवत: यह प्रागैतिहासिक काल था।
चूना पत्थर से बनी कुटुमसर की गुफाओं के आंतरिक और बाह्य रचना के अध्ययन के उपरांत भूगर्भशास्त्री कई निष्कर्षों पर पहुँचे हैं। उदाहरण के लिए चूना पत्थर के रिसाव, कार्बनडाईक्साइड तथा पानी की रासायनिक क्रिया से सतह से लेकर छत तक अद्भूत प्राकृतिक संरचनाएँ गुफा के अंदर बन चुकी हैं।ये वर्ष १९०० में खोजी गई तथा वर्ष १९५१ में डॉ. शंकर तिवारी ने सर्वेक्षण किया । इसका मुख्य मार्ग ३३० मीटर लम्बा है तथा २० से ७२ मीटर चौड़ा है । इसकी दीवारों पर हाथी की सूंड सी रचनायें (ड्रिप स्टोन) जमीन से उठती (स्टेलेग्माइट) एवं छत से लटकती (स्टेलेक्टाइट) शुभ्र धवल चूने के पत्थर की संरचनायें प्रमुख आकर्षण का केन्द्र है । ये संरचनायें अत्यंत धीमी गति से बनती है तथा इनका बनना अभी भी जारी है । गुफा के निर्माण में प्रकृति को कितना समय लगा होगा, बता पाना कठिन है । गुफा के कई साइड कम्पार्टमेंट है । गुफा के धरातल में कई छोटे-छोटे पोखर है । जिनमें प्रसिद्ध अंधी मछलियां एवं मेंढक पाये जाते है । इसके अतिरिक्त गुफा में अंधेरे में पलनेवाले झींगुर, सांप, मकडी, चमगादड, दीमक आदि पाये जाते है । गुफा के अंत में स्टेलेग्माइट शिवलिंग है । गुफा में सोलार लेम्प एवं गाइड की सहायता से घूमा जाता है ।
कांगेर घाटी के जंगल में उडने वाली
गिलहरी और बोलने वाली मैनेा नहीं देख पाया, ये दोनो जीव अल्सुबह ही दिख
पाते हैं, यहां के जल प्रपातों की चर्चा आगे कभी करूंगाफिजिकल रिसर्च लेबोरेटरी अहमदाबाद, इंस्टीट्यूट आफ पेलको बाटनी लखनऊ तथा भूगर्भ अध्ययन शाला लखनऊ ने यह जानकारी दी है।
विश्व प्रसिद्ध बस्तर की कुटुमसर की गुफाएँ कई रहस्यों को अभी भी अपने में समेटे हुए है जिनका भूगर्भ शास्त्रियों द्वारा लगातार अध्ययन किया जा रहा है।
भूगर्भशास्त्रियों का कहना है कि करोड़ों वर्ष पूर्व क्षेत्र में कुटुमसर की गुफाऐं स्थित हैं वह क्षेत्र पूरा पानी में डूबा हुआ था। गुफाओं का निर्माण प्राकृतिक परिवर्तनों साथ साथ पानी के बहाव के कारण हुआ।
कुटुमसर की गुफाऐं जमीन से 55 फुट नीचे हैं । इनकी लंबाई 330 मीटर है। इस गुफा के भीतर कई पूर्ण विकसित कक्ष हैं जो 20 से 70 मीटर तक चौड़े हैं। फिजिकल रिसर्च लेबोरेटरी अहमदाबाद के शोधकर्त्ताओं ने इन्हीं कक्षों के अध्ययन के बाद निष्कर्ष पर पहुँचे है कि करोड़ों वर्ष पूर्व यहाँ के आस पास के लोग इन गुफाओं में रहा करते थे। संभवत: यह प्रागैतिहासिक काल था।
चूना पत्थर से बनी कुटुमसर की गुफाओं के आंतरिक और बाह्य रचना के अध्ययन के उपरांत भूगर्भशास्त्री कई निष्कर्षों पर पहुँचे हैं। उदाहरण के लिए चूना पत्थर के रिसाव, कार्बनडाईक्साइड तथा पानी की रासायनिक क्रिया से सतह से लेकर छत तक अद्भूत प्राकृतिक संरचनाएँ गुफा के अंदर बन चुकी हैं।ये वर्ष १९०० में खोजी गई तथा वर्ष १९५१ में डॉ. शंकर तिवारी ने सर्वेक्षण किया । इसका मुख्य मार्ग ३३० मीटर लम्बा है तथा २० से ७२ मीटर चौड़ा है । इसकी दीवारों पर हाथी की सूंड सी रचनायें (ड्रिप स्टोन) जमीन से उठती (स्टेलेग्माइट) एवं छत से लटकती (स्टेलेक्टाइट) शुभ्र धवल चूने के पत्थर की संरचनायें प्रमुख आकर्षण का केन्द्र है । ये संरचनायें अत्यंत धीमी गति से बनती है तथा इनका बनना अभी भी जारी है । गुफा के निर्माण में प्रकृति को कितना समय लगा होगा, बता पाना कठिन है । गुफा के कई साइड कम्पार्टमेंट है । गुफा के धरातल में कई छोटे-छोटे पोखर है । जिनमें प्रसिद्ध अंधी मछलियां एवं मेंढक पाये जाते है । इसके अतिरिक्त गुफा में अंधेरे में पलनेवाले झींगुर, सांप, मकडी, चमगादड, दीमक आदि पाये जाते है । गुफा के अंत में स्टेलेग्माइट शिवलिंग है । गुफा में सोलार लेम्प एवं गाइड की सहायता से घूमा जाता है ।
BASTAR MEDICINE द सी एक्सप्रेस आगरा, 19 जनवरी 2014 http://theseaexpress.com/Details.aspx?id=60088&boxid=3936265
समृध्द आदिवासी-चिकित्सा पध्दति पर आधुनिकता की वक्र दृृष्टि
पंकज चतुर्वेदी
पिछले दिनों कोंडागांव में एक आरगेनिक जड़बूटियों उगाने वाले डा. राजाराम त्रिपाठी ने अजीब सा सम्मेलन बुलाया- उन्होंने बस्तर के दूरस्थ अंचलों में काम करने वाले बैद्य, गुनिया, ओझाओं को एकत्र किया और उनसे उन जड़ीबुटियों के बारे में जाना जिनसे वे सदियों से स्थानीय आदिवासियों का इलाज करते रहे हैं। स्थानीय अखबारों में यह प्रयोग एक समाचार के तौर पर जरूर छपा, लेकिन पारंपरिक ाान को सहेजने के इस प्रयास पर सरकारी महकमे व षहरी-समाज बेहद उदास सा ही रहा। कैसी विडंबना है कि जब-तब कहीं नक्सली हमले होते हैं तो सरकार, समाज और मीडिया को आदिवासियों की याद आ जाती है। नीति निर्धारकों को लगने लगता है कि ‘‘पिछड़े’’(?) जनजातीय समाज को विकास की धारा में ले आया जाये, हकीकत में वे इस विशय में लगभग दिशाहीन ही हैं । देश की कुल आबादी के इन 7.16 प्रतिशत बाषिंदों के जीवन जीने का अपना विशिष्ठ अंदाज है, जिसे बारीकी से देखें तो पाएंगें कि इन ‘‘अंगूठा छाप’’ लोगों के ज्ञान के सामने हमारी ‘‘भारी भरकम’’ डिगरियों का ज्ञान, पानी भरता है । ऐसा ही अदभुत है उनका चिकित्सा ज्ञान । ‘‘वनपुत्र’’ अपने चारों ओर फैली हरेक वनस्पति के गुण-दोष भलीभांति जानते हैं, और अपने समाज की अस्मिता पर भारी हरेक शारीरिक विकार का इलाज प्रकृति से ही करने में माहिर हैं। विडंबना है कि बीते दो दषकों के दौरान प्रगति के नाम पर जो कुछ हुआ, उसने ना केवल आदिवासियों के पारंपिरक झाान पर डाका डाला, बल्कि उनके चिकित्सीय-संसाधन पर भी बलात कब्जा कर लिया। इसी कारण उनका चिकित्सा ज्ञान भी अब ‘‘सभ्य’’ समाज द्वारा बाजार में बिकने वाली चीज बनता जा रहा है ।
छत्तीसगढ़ अंचल के आदिवासी इलाके में बस्तर-अबुझमाड़ के बाशिंदों के जीवन के गूढ़ रहस्य आज भी अनबूझ पहेली हैं । अभी कुछ साल पहले तक बस्तर के 95 वर्षीय चमरू राम कैसी भी टूटी हड्डी को 10 दिन में जोड़ दिया करते थे । पूरी तरह अनपढ़ इस आदिवासी के पास हड्डियां जुड़वाने के लिए सुदूर महानगरों के सम्पन्न लोगों का तांता-सा लगा रहता था । चमरू राम कई अन्य जड़ी-बूटियों के भी जानकार थे और मरीज की नब्ज का हाल जानने के लिए पपीते के पेड़ के तने से बना स्टेथिस्कोप प्रयोग में लाते थे। उनके बाद वह पारंपरिक ज्ञान अगली पीढी तक जा नहीं पाया। डोंगरगांव के कुम्हारपारा व अर्जुनी के गड़रिया दंपत्ति बबासीर का शर्तिया इलाज करते हैं । ये लोग अपनी दवा बिही (अमरूद) की छाल से तैयार करते हैं, लेकिन उसका फार्मूला किसी को नहीं बताते हैं । इसी प्रकार बघेरा के दाऊ रामचंद्र देशमुख की प्रसिध्दि का कारण इनकी लकवा की अचूक दवाई है । यहां जानना जरूरी है कि ये सभी ‘‘डाॅक्टर’’ अपने मरीजों से किसी भी तरह से कोई फीस नहीं लेते हैं । बस्तर के जंगलों में ‘‘संधानपर्णी’’ नामक एक ऐसी बूटी पाई गई है, जिससे कैसा भी ताजा घाव 24 घंटे मेें भर जाता है । ग्रामीयों का दावा है कि यही वह बूटी है, जिसके लिए हनुमान पर्वत उठा कर ले गए थे और लक्ष्मण स्वस्थ हुए थे । अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, दिल्ली के रिटयर्ड डाक्टर जगन्नाथ शर्मा ने इस जड़ी-बूटी की पुष्टि भी की ।
इन आदिवासियों द्वारा सदियों से पीढ़ी-दर-पीढ़ी प्रयुक्त औषधि वनस्पतियों में से अधिकांश का उपयोग अब आयुर्वेदिक व अंग्रेजी दवाईयों के निर्माण में होने लगा है । ‘‘मुस्कानी भाजी’’ याणी मंडूकपर्णी का उपयोग मन की प्रसन्नता हेतु बतौर दवा के होता है । ‘‘पथरिया भाजी’’ के नाम से जंगलों में मिलने वाली पुनर्नवा झाड़ी को पथरी का इलाज माना जाता है । हठजोड (अस्थि संहारक) को हड्डी जाड़ने में, धन बेहेर (अमलतास) को पाचन, अटकपारी (पाठल) को सिर दर्द, जीयापोता को पुत्र प्राप्ति, ऐठी-मुरी (मरोंड़ फली) को पेट दर्द, बेमुची (बागची) को त्वचा रोगों के इलाज में प्रयोग करना आदिवासी भलीभांति जानते हैं । अशोक के वृक्ष से बनी दवाओं को स्त्री-रोग में ठीक माना जाता है तो सांप-चढ़ी से सर्प विष उतार दिया जाता है । आदिवासी लोग परिवार नियोजन के लिए गुड़हल का प्रयोग करते हैं तो सहजन को रक्तचाप में । आज ये सभी बूटियां आधुनिक चिकित्सा तंत्र का अहम हिस्सा बन गई हैं । तेज बुखार आने पर कपुरनि (दुध मंगरी) की जड़ गले में बांध दी जाती है तो डायरिया, मलेरिया का इलाज क्रमशः गोरख मुंडी व पारही कन्दा नामक जंगली झाडि़यों में छिपा है । मुई-कीसम का प्रयोग बच्चों के फोड़े-फुंसी में होता है ।
बस्तर अंचल में पाए जाने वाले मोहलेन की विशेषता है कि उससे निर्मित ‘‘पोटम’’ (प्याले) में दस साल तक चावल खराब नहीं होता है, ना ही उसमें कीड़े घुन लगते हैं । जनजातियों में आदमी के अस्वस्थ होने पर इलाज करने के दो तरीके होते हैं । पहला है- बईघ यानी वैद्य की जड़ी-बूटियां और दूसरा है-मती या ओझा या बैगा जो भूत-प्रेत झाड़ता है । बईघ अपनी जड़ी-बूटियां खुद जंगलों से गोपनीय ढंग से चुनता है । बागर, सरगूजा जिले के घने वन, अमरकंटक, धमतरी, गरियाबंद, आदि के अरण्यों में अदभुत जड़ी-बूटियों का अकूत भंडार है । महानदी, शिवनाथ, खारून नदियों के किनारे-किनारे घृतकुमारी, शंखपुष्पी, ब्राहपी, हरण, पर्णी, गोरख मुंडी आदि 300 से अधिक जड़ी बूटियां नैसर्गिक वातावरण में स्वतः उगती रहती हैं ।
पिछले कुछ वर्षों के दौरान इन आदिवासियों को बाहरी दुनिया की तथाकथित आधुनिकता से अवगत कराने, जनजातियों की जीवन-शैली पर शोध करने और ना जाने किन-किन बहानों से बाहरी लोग उनके बीच में पहुंचे । इन समाज सेवकों के अति उतसाह व अतिरंजित प्रशासन या विकास ने उनके परंपरागत सामाजिक और सांस्कृतिक आवरण को छेड़ने की भी कोशिश की । गौरतलब है कि इन बाहरी पढ़े-लिखे लोगों ने आदिवासियों को भषणों के अलावा कुछ नहीं दिया । बदले में उनके निः स्वार्थ गुरों (जैसे जड़ी बूटियों के प्रयोग) का व्यावसायिक इस्तेमाल शुरू कर में ‘‘चिलाटी’’ नामक पेड़ मिलता है । इसकी छाल कतिपय बाहरी लोग आदिवासियों से मात्र दो रूपए किलों में खरीदते है । बाद में इसके ट्रक भर के आंध्रप्रदेश भेज दिये जाते हैं और इसका कई सौ गुना अधिक दाम वसूला जाता है । सनद रहे चिलाटी की छाल का उपयोग नशीली दवाओं के निर्माण में होता है । लेकिन यह त्रासदी है कि छाल निकालने के बाद चिलाटी का पेड़ सूख रहे हैं, क्योंकि उन फर ड्रग-माफिया की नजर है । ये माफिया भोले-भोले आदिवासियों को इस घृणित कार्य में मोहरा बागर हुए हैं । यही नहीं अब इन जंगलों में जड़ी-बूटियां उखाड़ने का काम चोरी छिपे युुध्द स्तर पर होने लगा है । इससे यहां के हजारों वर्ष पुराने जंगलों का प्राकृतिक संतुलन गड़बड़ा रहो है । साथ ही वनवासियों के अपने दैनिक उपयोग के लिए इन जड़ी बूटियों का अभाव होता जा रहा है ।
जिस विशिष्ठ संस्कृति और जीवन शैली के चलते जनजातिय समाज के लोग हजारों वषों से सरलता व शांति से जीवन पीते आ रहे हैं, उसे समकालीन समाज की तमाम बुराईयां ग्रस रही हैं । आदिवासियों के विकास के नाम पर उन पर अपने विचार या निर्णय थोपना, देश की सामाजिक संरचना के लिए खतरे की घंटी ही है । जनजातिय जड़ी बूटियों को जानने की बाहरी समाज की मंशा निश्चित ही स्वार्थपूर्ण है, और इससे जंगल के स्वशासन में बहुराष्ट्रीय कंपनियों का दखल बढ़ेगा । अतीत गवाह है कि जब-जब वनपुत्रों पर बजारू संस्कृति थेापने का प्रयास किया गया, तब-तब वंश हिंसात्मक प्रतिरोध और अलगाववादी स्वर मुखर हुए है । आदिवासियों की चिकित्सा पध्दति, सभ्य (?) समाज की कसैली नजरों से बची प्राचीनतम भारतीय संस्कृति का दम तोड़ता अवशेष है । इसके संरक्षण के लिए मात्र यही काफी होगा कि समाज और सरकार उनमें अपनी रूचि दिखाना छोड़ दे ।
पंकज चतुर्वेदी
पिछले दिनों कोंडागांव में एक आरगेनिक जड़बूटियों उगाने वाले डा. राजाराम त्रिपाठी ने अजीब सा सम्मेलन बुलाया- उन्होंने बस्तर के दूरस्थ अंचलों में काम करने वाले बैद्य, गुनिया, ओझाओं को एकत्र किया और उनसे उन जड़ीबुटियों के बारे में जाना जिनसे वे सदियों से स्थानीय आदिवासियों का इलाज करते रहे हैं। स्थानीय अखबारों में यह प्रयोग एक समाचार के तौर पर जरूर छपा, लेकिन पारंपरिक ाान को सहेजने के इस प्रयास पर सरकारी महकमे व षहरी-समाज बेहद उदास सा ही रहा। कैसी विडंबना है कि जब-तब कहीं नक्सली हमले होते हैं तो सरकार, समाज और मीडिया को आदिवासियों की याद आ जाती है। नीति निर्धारकों को लगने लगता है कि ‘‘पिछड़े’’(?) जनजातीय समाज को विकास की धारा में ले आया जाये, हकीकत में वे इस विशय में लगभग दिशाहीन ही हैं । देश की कुल आबादी के इन 7.16 प्रतिशत बाषिंदों के जीवन जीने का अपना विशिष्ठ अंदाज है, जिसे बारीकी से देखें तो पाएंगें कि इन ‘‘अंगूठा छाप’’ लोगों के ज्ञान के सामने हमारी ‘‘भारी भरकम’’ डिगरियों का ज्ञान, पानी भरता है । ऐसा ही अदभुत है उनका चिकित्सा ज्ञान । ‘‘वनपुत्र’’ अपने चारों ओर फैली हरेक वनस्पति के गुण-दोष भलीभांति जानते हैं, और अपने समाज की अस्मिता पर भारी हरेक शारीरिक विकार का इलाज प्रकृति से ही करने में माहिर हैं। विडंबना है कि बीते दो दषकों के दौरान प्रगति के नाम पर जो कुछ हुआ, उसने ना केवल आदिवासियों के पारंपिरक झाान पर डाका डाला, बल्कि उनके चिकित्सीय-संसाधन पर भी बलात कब्जा कर लिया। इसी कारण उनका चिकित्सा ज्ञान भी अब ‘‘सभ्य’’ समाज द्वारा बाजार में बिकने वाली चीज बनता जा रहा है ।
छत्तीसगढ़ अंचल के आदिवासी इलाके में बस्तर-अबुझमाड़ के बाशिंदों के जीवन के गूढ़ रहस्य आज भी अनबूझ पहेली हैं । अभी कुछ साल पहले तक बस्तर के 95 वर्षीय चमरू राम कैसी भी टूटी हड्डी को 10 दिन में जोड़ दिया करते थे । पूरी तरह अनपढ़ इस आदिवासी के पास हड्डियां जुड़वाने के लिए सुदूर महानगरों के सम्पन्न लोगों का तांता-सा लगा रहता था । चमरू राम कई अन्य जड़ी-बूटियों के भी जानकार थे और मरीज की नब्ज का हाल जानने के लिए पपीते के पेड़ के तने से बना स्टेथिस्कोप प्रयोग में लाते थे। उनके बाद वह पारंपरिक ज्ञान अगली पीढी तक जा नहीं पाया। डोंगरगांव के कुम्हारपारा व अर्जुनी के गड़रिया दंपत्ति बबासीर का शर्तिया इलाज करते हैं । ये लोग अपनी दवा बिही (अमरूद) की छाल से तैयार करते हैं, लेकिन उसका फार्मूला किसी को नहीं बताते हैं । इसी प्रकार बघेरा के दाऊ रामचंद्र देशमुख की प्रसिध्दि का कारण इनकी लकवा की अचूक दवाई है । यहां जानना जरूरी है कि ये सभी ‘‘डाॅक्टर’’ अपने मरीजों से किसी भी तरह से कोई फीस नहीं लेते हैं । बस्तर के जंगलों में ‘‘संधानपर्णी’’ नामक एक ऐसी बूटी पाई गई है, जिससे कैसा भी ताजा घाव 24 घंटे मेें भर जाता है । ग्रामीयों का दावा है कि यही वह बूटी है, जिसके लिए हनुमान पर्वत उठा कर ले गए थे और लक्ष्मण स्वस्थ हुए थे । अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, दिल्ली के रिटयर्ड डाक्टर जगन्नाथ शर्मा ने इस जड़ी-बूटी की पुष्टि भी की ।
इन आदिवासियों द्वारा सदियों से पीढ़ी-दर-पीढ़ी प्रयुक्त औषधि वनस्पतियों में से अधिकांश का उपयोग अब आयुर्वेदिक व अंग्रेजी दवाईयों के निर्माण में होने लगा है । ‘‘मुस्कानी भाजी’’ याणी मंडूकपर्णी का उपयोग मन की प्रसन्नता हेतु बतौर दवा के होता है । ‘‘पथरिया भाजी’’ के नाम से जंगलों में मिलने वाली पुनर्नवा झाड़ी को पथरी का इलाज माना जाता है । हठजोड (अस्थि संहारक) को हड्डी जाड़ने में, धन बेहेर (अमलतास) को पाचन, अटकपारी (पाठल) को सिर दर्द, जीयापोता को पुत्र प्राप्ति, ऐठी-मुरी (मरोंड़ फली) को पेट दर्द, बेमुची (बागची) को त्वचा रोगों के इलाज में प्रयोग करना आदिवासी भलीभांति जानते हैं । अशोक के वृक्ष से बनी दवाओं को स्त्री-रोग में ठीक माना जाता है तो सांप-चढ़ी से सर्प विष उतार दिया जाता है । आदिवासी लोग परिवार नियोजन के लिए गुड़हल का प्रयोग करते हैं तो सहजन को रक्तचाप में । आज ये सभी बूटियां आधुनिक चिकित्सा तंत्र का अहम हिस्सा बन गई हैं । तेज बुखार आने पर कपुरनि (दुध मंगरी) की जड़ गले में बांध दी जाती है तो डायरिया, मलेरिया का इलाज क्रमशः गोरख मुंडी व पारही कन्दा नामक जंगली झाडि़यों में छिपा है । मुई-कीसम का प्रयोग बच्चों के फोड़े-फुंसी में होता है ।
बस्तर अंचल में पाए जाने वाले मोहलेन की विशेषता है कि उससे निर्मित ‘‘पोटम’’ (प्याले) में दस साल तक चावल खराब नहीं होता है, ना ही उसमें कीड़े घुन लगते हैं । जनजातियों में आदमी के अस्वस्थ होने पर इलाज करने के दो तरीके होते हैं । पहला है- बईघ यानी वैद्य की जड़ी-बूटियां और दूसरा है-मती या ओझा या बैगा जो भूत-प्रेत झाड़ता है । बईघ अपनी जड़ी-बूटियां खुद जंगलों से गोपनीय ढंग से चुनता है । बागर, सरगूजा जिले के घने वन, अमरकंटक, धमतरी, गरियाबंद, आदि के अरण्यों में अदभुत जड़ी-बूटियों का अकूत भंडार है । महानदी, शिवनाथ, खारून नदियों के किनारे-किनारे घृतकुमारी, शंखपुष्पी, ब्राहपी, हरण, पर्णी, गोरख मुंडी आदि 300 से अधिक जड़ी बूटियां नैसर्गिक वातावरण में स्वतः उगती रहती हैं ।
पिछले कुछ वर्षों के दौरान इन आदिवासियों को बाहरी दुनिया की तथाकथित आधुनिकता से अवगत कराने, जनजातियों की जीवन-शैली पर शोध करने और ना जाने किन-किन बहानों से बाहरी लोग उनके बीच में पहुंचे । इन समाज सेवकों के अति उतसाह व अतिरंजित प्रशासन या विकास ने उनके परंपरागत सामाजिक और सांस्कृतिक आवरण को छेड़ने की भी कोशिश की । गौरतलब है कि इन बाहरी पढ़े-लिखे लोगों ने आदिवासियों को भषणों के अलावा कुछ नहीं दिया । बदले में उनके निः स्वार्थ गुरों (जैसे जड़ी बूटियों के प्रयोग) का व्यावसायिक इस्तेमाल शुरू कर में ‘‘चिलाटी’’ नामक पेड़ मिलता है । इसकी छाल कतिपय बाहरी लोग आदिवासियों से मात्र दो रूपए किलों में खरीदते है । बाद में इसके ट्रक भर के आंध्रप्रदेश भेज दिये जाते हैं और इसका कई सौ गुना अधिक दाम वसूला जाता है । सनद रहे चिलाटी की छाल का उपयोग नशीली दवाओं के निर्माण में होता है । लेकिन यह त्रासदी है कि छाल निकालने के बाद चिलाटी का पेड़ सूख रहे हैं, क्योंकि उन फर ड्रग-माफिया की नजर है । ये माफिया भोले-भोले आदिवासियों को इस घृणित कार्य में मोहरा बागर हुए हैं । यही नहीं अब इन जंगलों में जड़ी-बूटियां उखाड़ने का काम चोरी छिपे युुध्द स्तर पर होने लगा है । इससे यहां के हजारों वर्ष पुराने जंगलों का प्राकृतिक संतुलन गड़बड़ा रहो है । साथ ही वनवासियों के अपने दैनिक उपयोग के लिए इन जड़ी बूटियों का अभाव होता जा रहा है ।
जिस विशिष्ठ संस्कृति और जीवन शैली के चलते जनजातिय समाज के लोग हजारों वषों से सरलता व शांति से जीवन पीते आ रहे हैं, उसे समकालीन समाज की तमाम बुराईयां ग्रस रही हैं । आदिवासियों के विकास के नाम पर उन पर अपने विचार या निर्णय थोपना, देश की सामाजिक संरचना के लिए खतरे की घंटी ही है । जनजातिय जड़ी बूटियों को जानने की बाहरी समाज की मंशा निश्चित ही स्वार्थपूर्ण है, और इससे जंगल के स्वशासन में बहुराष्ट्रीय कंपनियों का दखल बढ़ेगा । अतीत गवाह है कि जब-जब वनपुत्रों पर बजारू संस्कृति थेापने का प्रयास किया गया, तब-तब वंश हिंसात्मक प्रतिरोध और अलगाववादी स्वर मुखर हुए है । आदिवासियों की चिकित्सा पध्दति, सभ्य (?) समाज की कसैली नजरों से बची प्राचीनतम भारतीय संस्कृति का दम तोड़ता अवशेष है । इसके संरक्षण के लिए मात्र यही काफी होगा कि समाज और सरकार उनमें अपनी रूचि दिखाना छोड़ दे ।
बुधवार, 15 जनवरी 2014
जनसंदेश टाईम्स उ प्र दिनांक 15 जनवरी 2014
सच पर पर्दा डालते आयोग
पंकज चतुर्वेदी
एक अनाम लड़की के पल-पल की खबर रखने के पीछे ‘‘साहब’’ कौन है, इस पर जांच आयोग बन गया। उधर आदर्ष सोसायटी की जांच रपट को पहले महाराश्ट्र सरकार ने मानने से ही इंकार किया, फिर उसे आधा-अधूरा माना। लोग अब भूल चुके हैं कि अयोध्या में विवावास्पद ढ़ांचा गिराए जाने पर गठित लिब्राहन आयोग की अजीब रपट दी थी - ‘‘आयोग सिफारिष करता है कि उस कांड में अटल बिहारी वाजपेयी सहित कई लोगों की पड़ताल होना चाहिए,’’ जबकि अदालत में आरोप पत्र दाखिल कर चुकी सीबीआई इससे इत्तिफाक नहीं रखती। सन 1992-93 में बम धमाकों के बाद मुंबई में भड़के मुस्लिम-विरोधी दंगों की जांच के लिए गठित श्रीकृष्ण आयोग की अंतिम रिपोर्ट आए अब कई साल बीत चुके हैं, लेकिन एक न्यायाधीश ने जिन लोगों पर उंगलियां उठाई, उनके खिलाफ कानूनी कार्यवाही करने की हिम्मत राज्य सरकार नहीं जुटा पा रही हैं। सनद रहे कि जिस तरह के हथियार रखने के आरोप में फिल्म अभिनेता संजय दत्त को सजा हो चुकी है, ठीक वैसे ही आरोप शिवसेना सांसद मधुकर सरोपदार पर श्रीकृष्ण आयोग ने लगाए व सिद्ध किए हैं । दंगों को भड़काने में बाल ठाकरे की प्रमुख भूमिका होने की बात भी जांच आयोग की रिपोर्ट में थी, लेकिन सरकार मूक है।
वैसे भी यह कोई पहला मामला नहीं है, जब दंगों की जांच रिपोर्ट को सरकार ने ठंडे बस्ते में डाल दिया है। सरकारी रिकार्ड गवाह है कि सन 1966 से 2002 तक हुए कोई 30 बड़े दंगों की जांच के लिए सरकार ने न्यायिक आयोग गठित किए, लेकिन उनमें से 28 की रिपोर्ट रद्दी की टोकरी के भेंट चढ़ गईं । याद करें 1961 में अलीगढ, जबलपुर, दमोह और नरसिंहगढ़ में, 1967 में रांची,हटिया, सुचेतपुर-गोरखपुर, अहमदनगर, शोलापुर, मालेगांव में; 1969 अहमदाबाद, 1970 भिवंडी, 1971 तेलीचेरी(केरल), 1984 के सिखविरोधी दंगे से ले कर 1999 में उड़ीसा में ग्राहम स्टेन्स की हत्या, नवंरर 201 में मालेगांव और 2002 के गुजरात दंगों सहित 30 नरसंहारों की हकीकत जानने के लिए सरकार ने हाईकोर्ट के जजों की अगुआई में जांच आयोग बनाए। इनमें से 28 की रिपोर्ट आ चुकी है, लेकिन वे गई कहां और उन पर कार्यवाही क्या हुई? इन सवालों पर कोई जवाब नहीं है।
ऐसा नहीं कि हकीकत पर परदा डालने का खेल केवल दंगों की जांच में ही हीेता है; याद करें ंकुछ साल पहले तहलका के कैमरे ने रक्षा खरीद में गोरखधंधे का जो खुलासा किया, उसका सत्य जानने के लिए सरकार ने एक जांच आयोग गठित कर दिया था । हालांकि आयोग किसी निर्णय पर पहुंचता, उससे पहले ही कई फैसले बगैर जांच के ही हो गए ( वैसे जांच आयोगों को फैसला सुनाने का हक नहीं होता है, वह केवल सिफारिषें कर सकता है ) - तहलका के तरूण तेजपाल पर तत्कालीन सरकार के प्रायोजित चैतरफा हमले हुए व उन्हें मानसिक व आर्थिक रूप से तोड़ दिया गया ; बंगारू लक्ष्मण को घर बैठा दिया गया ; रक्षा मंत्री के सरकारी निवास पर नगद नारायण प्राप्त करते हुए दिखीं जया जेतली और उनके सखा जार्ज फर्नाडीज को तब के प्रधानमंत्री ने लोक सभा में ही क्लीन चिट दे दी । जांच आयोग कानूनी पैचिदगियों में उलझा था कि जांच आयोग के न्यायमूर्ति श्री वेंकटस्वामी खुद विवादों में उलझ गए। उनकी जगह नए न्यायविद को जांच में लगाया गया है । पता चला कि नए जांच कमीषन की टीम सेना के विमान से तफरीह करने चली गई । सरकार बदल गई । इस पड़ताल का खर्च करोड़ेां में पहुंच गया है, नतीजों का अंदाजा सभी को है,लेकिन पता नहीं जांच का एकांकी कब तक मंचित होता रहेगा ।
भ्रश्टाचार हो या फिर दंगे या फिर लापरवाही व देष के साथ द्रोह के आरोप या ऐसा कुछ जिसमें सत्ता के षीर्श पर बैठे लोेेेगेंा की गरदन फंसती दिखती है, सच के खिलाफ ढाल के तौर पर एक अदद जांच आयोग का गठन कर दिया जाता है । विडंबना है यह है कि जहां जांच आयोग किसी गैरकानूनी कृत्य के कारणों के छिद्रान्वेषण में व्यस्त रहता है, ठीक उसी समय अन्य जांच एजंसी उसी के समानांतर अदालतों में अपनी जांच की रिपोर्ट पेष कर कतिपय अभियुक्तों पर कानूनी कार्यवाही करने लगती है । कई बार अदालती फैसले आ जाते हैं और न्यायमूर्तियों का काम अधूरा ही रह जाता है । आयोगों की सिफारिषों को नजरअंदाज करना तो जैसे दस्तूर ही बन गया है ।
1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद भड़के दंगों में हजारों निर्दोश सिख मारे गए थे और अरबों रूपए की संपत्ति को लूटा व नश्ट किया गया था । उसके अपराधिक मुकदमों के चलते एचकेएल भगत जैसे कद्दावर नेता के राजनैतिक जीवन पर ग्रहण लग गया और उसकी गुमनामी में उनका इंतकाल हो गया । सज्जन कुमार, जगदीष टायटलर आदि अपनी पुरानी रंगत में नहीं लौट पा रहे हैं । इससे जुड़े कई मामलों में सजा , बरी होने , ऊंची अदालत में अपील आदि की कवायद जारी है । परंतु लोग भूल गए कि एक रंगनाथ मिश्र आयोग भी हुआ करता था । इस आयोग के सहयोग के लिए चार समितियां भी थीं , जिनमें से एक जैन - बनर्जी समिति की वैधता पर तो हाई कोर्ट ने ही सवालिया निषान लगा दिया था । कपूर-मित्तल कमेटी ने 72 पुलिस वालों को दंगे में लिप्त पाते हुए उनके खिलाफ कार्यवाही की सिफारिष की थी । षेश दो समितियों ने क्या किया ? इसका कहीं कोई हिसाब-किताब नहीं मिलता है । हां, इन पर कोई एक करोड़ का सरकारी खर्च होने के बिल-वाउचर जरूर मिल जाएंगे । श्री रंगनाथ मिश्र बाद में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीष बनें, उसके बाद राश्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के मुखिया नियुक्त किए गए । तदुपरांत कांग्रेस की अंगुली पकड़ कर राज्य सभा में आ गए । लेकिन उनके नाम से जुड़े जांच आयोग ने उस अमानवीय सामूहिक नरसंहार में किसे दोशी पाया ? यह जानने की मंषा किसी की भी नहीं रही,यहां तक कि श्री मिश्र की भी नहीं !
यह मामला यहीं नहीं रूकता है - केंद्र में गठित वाजपेई सरकार के सहयोगी अकाली दल की संतुश्टि के लिए न्यायाधीष श्री नानावटी की अगुवाई में एक और आयोग गठित कर दिया गया । 27 साल हो चुके हैं ,एक पीढ़ी बीत चुकी है और राजनीति के भंवर में फंसा सत्य न्याय के लिए छटपटा रहा है ।
देष में गणतंत्र की स्थापना के ठीक बाद ही राजनेताओं ने जांच आयोग का कवच इजाद कर लिया था । सन 1952 में जांच आयोग अधिनियम को सर्व सम्मति से लोकसभा में मंजूरी मिल गई थी ं फिर सामने आया हरिदास मूंदड़ा पर 160 करोड़ के घपले का आरोप । इसकी जांच के लिए 1957 में मुहम्मद करीम छागला की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय जांच आयोग गठित किया गया । इस आयोग की रपट की आधार पर मूंदड़ा के खिलाफ पौने दो सौ से अधिक मुकदमें चले और उस समय के वित्त मंत्री कृश्णामाचारी को पद से हटाया गया ।
नैतिकता, सेवा और त्याग जैसे षब्दों का भारतीय राजनीति से धीरे-धीरे ह्मास हाने लगा । पहले जहां राजनीति के अपराधीकरण को ले कर चिंता जातई जाती थी, अब राजनीति के अपराधीकरण पर भी किसी को लज्जा नहीं आती है । ऐसे में जांच आयोग जनता की आंख पर भ्रम का जाल फैलाने में बेहद मदद करते हैं । अब इंदिरा गांधी की हत्या को ही लें, जिसमें एक अभियुक्त को फांसी हो गई । लेकिन प्रधानमंत्री की हत्या के रहस्यमय शडयंत्र को उजागर करने के लिए गठित आयोग की रपट को रहस्यमय तरीके से दबा दी गई । जांच आयोग ने कांग्रेस नेता आर.के.धवन, एक पूर्व प्रधानमंत्री, सी.आई.ए. पर षक की सुई घुमाई थी । कुछ दिन हंगामा हुआ , और तथाकथित दागी लोग फिर षान से अपनी भूमिकाओं में लौट आए । राजीव गांधी की हत्या के अपराधिक मामले मेें अदालती न्याय आ चुका है । वर्मा आयोग अपनी रिर्पोट दे चुका है, लेकिन जैन आयोग की कार्यवाही जारी है , कब तक जारी रहेगी ? पता नहीं !
स्वतंत्र भारत के सबसे घ्रणित अपराधों में से एक अयोध्या के विवादास्पद ढ़ांचे को गिराए जाने की जांच हेतु 1993 में गठित किया गया लिब्राहन कमीषन तो सियासती रंगमंच बन गया है । एक तरफ सीबीआई अदालत में आरोप पत्र दाखिल कर चुकी है, ऐसे में लिब्राहन आयोग की रिपोर्ट (यदि कभी आती है तो) का रद्दी की टोकरी में जाना तय है, फिर भी सरकारी धन को आयोग पर फंूकना कहां तक लाजिमी है ? आम सभाओं में लालकृष्ण आडवाणी, उमा भारती, शिव सैनिकों के बयान देखें-पढ़े तो लगता है कि इतना सबकुछ मालूम होने के बाबजूद न्याय का नाटक क्यों खेला जा रहा है ?
तमिलनाडु में जयललिता और एम करूणानिधि की तनानती में आए रोज आयोग बनते रहते हैं । केरल में हाथी की मौत से ले कर आला अफसर के कटखने कुत्ते तक पर जांच आयोग के गठन के रिकार्ड हैं । आंध््रा प्रदेष में कभी पत्रकार पिटे तो कभी वकील और कभी सेना के हाथों पुलिस वाले भी और सभी के लिए आयोग बना दिया गया ।
उत्तरप्रदेष और बिहार में तो अब ऐसे आयोगों को जनता भी गंभीरता से नहीं लेती है । महाराश्ट्र में ऐसे कई उदाहरण है कि जांच आयोग ने जिसे दोशी पाया, उसे सियासतदाओं ने सम्मानित किया । 1988 में मुंबई के जेजे अस्पताल में जहरीली ग्लीसरीन के कारण 14 मरीजों की मौत हो गई थी । इसकी जांच के लिए उच्च न्यायालन के जज बी लेंटिन की अध्यक्षता में एक आयोग बनाया गया । इस आयोग ने सरकारी दवाओं की खरीद में घूसखोरी का खुलासा करते हुए कई मंत्रियों व अफसरों को इसमें लिप्त पाया था । इस आयोग की रपट में दागदार एक मंत्री बलराम हर्णे पर मुकदमा तो चला नहीं, हां, समाज सेवा के कोटे से उनका मनोनयन राज्यपाल द्वारा विधान परिशद में कर दिया गया । बिहार में तो ऐसे संदिग्ध लोगों का महिमामंडन करने पर किसी को आपत्ति नहीं होती है ।
जांच आयोगों की इस तरह की दुर्गति आम जनता के पैसे का दुरूपयोग तो है ही, लोकतंत्र के सषक्त स्तंभ कहे जाने वाली न्यायपालिका की तोहीन भी है । इसे जनता केे मन में देष की न्याय व्यवस्था के प्रति अविष्वास ही उपजता है । क्या बदलते समय में न्यायीक आयोगों की प्रासंगिकता आंकने के लिए किसी जांच आयोग का गठन करना होगा ?
पंकज चतुर्वेदी
एक अनाम लड़की के पल-पल की खबर रखने के पीछे ‘‘साहब’’ कौन है, इस पर जांच आयोग बन गया। उधर आदर्ष सोसायटी की जांच रपट को पहले महाराश्ट्र सरकार ने मानने से ही इंकार किया, फिर उसे आधा-अधूरा माना। लोग अब भूल चुके हैं कि अयोध्या में विवावास्पद ढ़ांचा गिराए जाने पर गठित लिब्राहन आयोग की अजीब रपट दी थी - ‘‘आयोग सिफारिष करता है कि उस कांड में अटल बिहारी वाजपेयी सहित कई लोगों की पड़ताल होना चाहिए,’’ जबकि अदालत में आरोप पत्र दाखिल कर चुकी सीबीआई इससे इत्तिफाक नहीं रखती। सन 1992-93 में बम धमाकों के बाद मुंबई में भड़के मुस्लिम-विरोधी दंगों की जांच के लिए गठित श्रीकृष्ण आयोग की अंतिम रिपोर्ट आए अब कई साल बीत चुके हैं, लेकिन एक न्यायाधीश ने जिन लोगों पर उंगलियां उठाई, उनके खिलाफ कानूनी कार्यवाही करने की हिम्मत राज्य सरकार नहीं जुटा पा रही हैं। सनद रहे कि जिस तरह के हथियार रखने के आरोप में फिल्म अभिनेता संजय दत्त को सजा हो चुकी है, ठीक वैसे ही आरोप शिवसेना सांसद मधुकर सरोपदार पर श्रीकृष्ण आयोग ने लगाए व सिद्ध किए हैं । दंगों को भड़काने में बाल ठाकरे की प्रमुख भूमिका होने की बात भी जांच आयोग की रिपोर्ट में थी, लेकिन सरकार मूक है।
वैसे भी यह कोई पहला मामला नहीं है, जब दंगों की जांच रिपोर्ट को सरकार ने ठंडे बस्ते में डाल दिया है। सरकारी रिकार्ड गवाह है कि सन 1966 से 2002 तक हुए कोई 30 बड़े दंगों की जांच के लिए सरकार ने न्यायिक आयोग गठित किए, लेकिन उनमें से 28 की रिपोर्ट रद्दी की टोकरी के भेंट चढ़ गईं । याद करें 1961 में अलीगढ, जबलपुर, दमोह और नरसिंहगढ़ में, 1967 में रांची,हटिया, सुचेतपुर-गोरखपुर, अहमदनगर, शोलापुर, मालेगांव में; 1969 अहमदाबाद, 1970 भिवंडी, 1971 तेलीचेरी(केरल), 1984 के सिखविरोधी दंगे से ले कर 1999 में उड़ीसा में ग्राहम स्टेन्स की हत्या, नवंरर 201 में मालेगांव और 2002 के गुजरात दंगों सहित 30 नरसंहारों की हकीकत जानने के लिए सरकार ने हाईकोर्ट के जजों की अगुआई में जांच आयोग बनाए। इनमें से 28 की रिपोर्ट आ चुकी है, लेकिन वे गई कहां और उन पर कार्यवाही क्या हुई? इन सवालों पर कोई जवाब नहीं है।
ऐसा नहीं कि हकीकत पर परदा डालने का खेल केवल दंगों की जांच में ही हीेता है; याद करें ंकुछ साल पहले तहलका के कैमरे ने रक्षा खरीद में गोरखधंधे का जो खुलासा किया, उसका सत्य जानने के लिए सरकार ने एक जांच आयोग गठित कर दिया था । हालांकि आयोग किसी निर्णय पर पहुंचता, उससे पहले ही कई फैसले बगैर जांच के ही हो गए ( वैसे जांच आयोगों को फैसला सुनाने का हक नहीं होता है, वह केवल सिफारिषें कर सकता है ) - तहलका के तरूण तेजपाल पर तत्कालीन सरकार के प्रायोजित चैतरफा हमले हुए व उन्हें मानसिक व आर्थिक रूप से तोड़ दिया गया ; बंगारू लक्ष्मण को घर बैठा दिया गया ; रक्षा मंत्री के सरकारी निवास पर नगद नारायण प्राप्त करते हुए दिखीं जया जेतली और उनके सखा जार्ज फर्नाडीज को तब के प्रधानमंत्री ने लोक सभा में ही क्लीन चिट दे दी । जांच आयोग कानूनी पैचिदगियों में उलझा था कि जांच आयोग के न्यायमूर्ति श्री वेंकटस्वामी खुद विवादों में उलझ गए। उनकी जगह नए न्यायविद को जांच में लगाया गया है । पता चला कि नए जांच कमीषन की टीम सेना के विमान से तफरीह करने चली गई । सरकार बदल गई । इस पड़ताल का खर्च करोड़ेां में पहुंच गया है, नतीजों का अंदाजा सभी को है,लेकिन पता नहीं जांच का एकांकी कब तक मंचित होता रहेगा ।
भ्रश्टाचार हो या फिर दंगे या फिर लापरवाही व देष के साथ द्रोह के आरोप या ऐसा कुछ जिसमें सत्ता के षीर्श पर बैठे लोेेेगेंा की गरदन फंसती दिखती है, सच के खिलाफ ढाल के तौर पर एक अदद जांच आयोग का गठन कर दिया जाता है । विडंबना है यह है कि जहां जांच आयोग किसी गैरकानूनी कृत्य के कारणों के छिद्रान्वेषण में व्यस्त रहता है, ठीक उसी समय अन्य जांच एजंसी उसी के समानांतर अदालतों में अपनी जांच की रिपोर्ट पेष कर कतिपय अभियुक्तों पर कानूनी कार्यवाही करने लगती है । कई बार अदालती फैसले आ जाते हैं और न्यायमूर्तियों का काम अधूरा ही रह जाता है । आयोगों की सिफारिषों को नजरअंदाज करना तो जैसे दस्तूर ही बन गया है ।
1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद भड़के दंगों में हजारों निर्दोश सिख मारे गए थे और अरबों रूपए की संपत्ति को लूटा व नश्ट किया गया था । उसके अपराधिक मुकदमों के चलते एचकेएल भगत जैसे कद्दावर नेता के राजनैतिक जीवन पर ग्रहण लग गया और उसकी गुमनामी में उनका इंतकाल हो गया । सज्जन कुमार, जगदीष टायटलर आदि अपनी पुरानी रंगत में नहीं लौट पा रहे हैं । इससे जुड़े कई मामलों में सजा , बरी होने , ऊंची अदालत में अपील आदि की कवायद जारी है । परंतु लोग भूल गए कि एक रंगनाथ मिश्र आयोग भी हुआ करता था । इस आयोग के सहयोग के लिए चार समितियां भी थीं , जिनमें से एक जैन - बनर्जी समिति की वैधता पर तो हाई कोर्ट ने ही सवालिया निषान लगा दिया था । कपूर-मित्तल कमेटी ने 72 पुलिस वालों को दंगे में लिप्त पाते हुए उनके खिलाफ कार्यवाही की सिफारिष की थी । षेश दो समितियों ने क्या किया ? इसका कहीं कोई हिसाब-किताब नहीं मिलता है । हां, इन पर कोई एक करोड़ का सरकारी खर्च होने के बिल-वाउचर जरूर मिल जाएंगे । श्री रंगनाथ मिश्र बाद में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीष बनें, उसके बाद राश्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के मुखिया नियुक्त किए गए । तदुपरांत कांग्रेस की अंगुली पकड़ कर राज्य सभा में आ गए । लेकिन उनके नाम से जुड़े जांच आयोग ने उस अमानवीय सामूहिक नरसंहार में किसे दोशी पाया ? यह जानने की मंषा किसी की भी नहीं रही,यहां तक कि श्री मिश्र की भी नहीं !
यह मामला यहीं नहीं रूकता है - केंद्र में गठित वाजपेई सरकार के सहयोगी अकाली दल की संतुश्टि के लिए न्यायाधीष श्री नानावटी की अगुवाई में एक और आयोग गठित कर दिया गया । 27 साल हो चुके हैं ,एक पीढ़ी बीत चुकी है और राजनीति के भंवर में फंसा सत्य न्याय के लिए छटपटा रहा है ।
देष में गणतंत्र की स्थापना के ठीक बाद ही राजनेताओं ने जांच आयोग का कवच इजाद कर लिया था । सन 1952 में जांच आयोग अधिनियम को सर्व सम्मति से लोकसभा में मंजूरी मिल गई थी ं फिर सामने आया हरिदास मूंदड़ा पर 160 करोड़ के घपले का आरोप । इसकी जांच के लिए 1957 में मुहम्मद करीम छागला की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय जांच आयोग गठित किया गया । इस आयोग की रपट की आधार पर मूंदड़ा के खिलाफ पौने दो सौ से अधिक मुकदमें चले और उस समय के वित्त मंत्री कृश्णामाचारी को पद से हटाया गया ।
नैतिकता, सेवा और त्याग जैसे षब्दों का भारतीय राजनीति से धीरे-धीरे ह्मास हाने लगा । पहले जहां राजनीति के अपराधीकरण को ले कर चिंता जातई जाती थी, अब राजनीति के अपराधीकरण पर भी किसी को लज्जा नहीं आती है । ऐसे में जांच आयोग जनता की आंख पर भ्रम का जाल फैलाने में बेहद मदद करते हैं । अब इंदिरा गांधी की हत्या को ही लें, जिसमें एक अभियुक्त को फांसी हो गई । लेकिन प्रधानमंत्री की हत्या के रहस्यमय शडयंत्र को उजागर करने के लिए गठित आयोग की रपट को रहस्यमय तरीके से दबा दी गई । जांच आयोग ने कांग्रेस नेता आर.के.धवन, एक पूर्व प्रधानमंत्री, सी.आई.ए. पर षक की सुई घुमाई थी । कुछ दिन हंगामा हुआ , और तथाकथित दागी लोग फिर षान से अपनी भूमिकाओं में लौट आए । राजीव गांधी की हत्या के अपराधिक मामले मेें अदालती न्याय आ चुका है । वर्मा आयोग अपनी रिर्पोट दे चुका है, लेकिन जैन आयोग की कार्यवाही जारी है , कब तक जारी रहेगी ? पता नहीं !
स्वतंत्र भारत के सबसे घ्रणित अपराधों में से एक अयोध्या के विवादास्पद ढ़ांचे को गिराए जाने की जांच हेतु 1993 में गठित किया गया लिब्राहन कमीषन तो सियासती रंगमंच बन गया है । एक तरफ सीबीआई अदालत में आरोप पत्र दाखिल कर चुकी है, ऐसे में लिब्राहन आयोग की रिपोर्ट (यदि कभी आती है तो) का रद्दी की टोकरी में जाना तय है, फिर भी सरकारी धन को आयोग पर फंूकना कहां तक लाजिमी है ? आम सभाओं में लालकृष्ण आडवाणी, उमा भारती, शिव सैनिकों के बयान देखें-पढ़े तो लगता है कि इतना सबकुछ मालूम होने के बाबजूद न्याय का नाटक क्यों खेला जा रहा है ?
तमिलनाडु में जयललिता और एम करूणानिधि की तनानती में आए रोज आयोग बनते रहते हैं । केरल में हाथी की मौत से ले कर आला अफसर के कटखने कुत्ते तक पर जांच आयोग के गठन के रिकार्ड हैं । आंध््रा प्रदेष में कभी पत्रकार पिटे तो कभी वकील और कभी सेना के हाथों पुलिस वाले भी और सभी के लिए आयोग बना दिया गया ।
उत्तरप्रदेष और बिहार में तो अब ऐसे आयोगों को जनता भी गंभीरता से नहीं लेती है । महाराश्ट्र में ऐसे कई उदाहरण है कि जांच आयोग ने जिसे दोशी पाया, उसे सियासतदाओं ने सम्मानित किया । 1988 में मुंबई के जेजे अस्पताल में जहरीली ग्लीसरीन के कारण 14 मरीजों की मौत हो गई थी । इसकी जांच के लिए उच्च न्यायालन के जज बी लेंटिन की अध्यक्षता में एक आयोग बनाया गया । इस आयोग ने सरकारी दवाओं की खरीद में घूसखोरी का खुलासा करते हुए कई मंत्रियों व अफसरों को इसमें लिप्त पाया था । इस आयोग की रपट में दागदार एक मंत्री बलराम हर्णे पर मुकदमा तो चला नहीं, हां, समाज सेवा के कोटे से उनका मनोनयन राज्यपाल द्वारा विधान परिशद में कर दिया गया । बिहार में तो ऐसे संदिग्ध लोगों का महिमामंडन करने पर किसी को आपत्ति नहीं होती है ।
जांच आयोगों की इस तरह की दुर्गति आम जनता के पैसे का दुरूपयोग तो है ही, लोकतंत्र के सषक्त स्तंभ कहे जाने वाली न्यायपालिका की तोहीन भी है । इसे जनता केे मन में देष की न्याय व्यवस्था के प्रति अविष्वास ही उपजता है । क्या बदलते समय में न्यायीक आयोगों की प्रासंगिकता आंकने के लिए किसी जांच आयोग का गठन करना होगा ?
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