My writings can be read here मेरे लेख मेरे विचार, Awarded By ABP News As best Blogger Award-2014 एबीपी न्‍यूज द्वारा हिंदी दिवस पर पर श्रेष्‍ठ ब्‍लाॅग के पुरस्‍कार से सम्‍मानित

गुरुवार, 10 सितंबर 2015

Our wariors of 71 war will never come back

तो अब कभी भी लौटेंगे हमारे 1971 के जांबाज


                                                                                      पंकज चतुर्वेदी
एक सितंबर 2015 को सुप्रीम कोर्ट में सरकार ने जो जवाब दिया, उससे तो स्पष्ट हो गया है कि इंतजार, उम्मीदों के 44 साल बेकार गए और सन 1971 में पाकिस्तान युद्ध के दौरान देश का इतिहास ही नहीं, विश्व का भूगोल बदलने वाले वे 54 रणबांकुरे कभी लौट कर घर नहीं आऐंगे, जो पाकिस्तानी जेलों में थे। भारत के कई प्रतिनिधिमंडल पाकिस्तान की जेलों में गए, संसद में कम से कम 24 बार सरकार कहती रही कि हमारे बहादुर जवानों के पाकिस्तान में होने की संभावना है। लेकिन अब सरकार ने भी कह दिया कि चूंकि पाकिस्तान अपनी जेलों में किसी भी युद्ध बंदी की मौजूदगी से इनकार करता है, सो उनमें से कोई जीवित नहीं है। जानकर आश्चर्य होगा कि उन 54 में से तीन का कोई सेवा रिकार्ड भी उपलब्ध नहीं है, जाहिर है कि ऐसे में उनके परिवारों को पेंशन व अन्य सुविधाएं मिलना भी मुश्किल होगा। ऐसा नहीं है कि हमारे 54 रणबांकुरों के पाकिस्तानी जेलों में होने की बात महज संभावना के आधार पर उठाई जाती रही हो। उन जवानों के परिवारीजन अपने लोगों के जिंदा होने के सबूत भी देते हैं, लेकिन भारत सरकार महज औपचारिकता निभाने से अधिक कुछ नहीं करती है। इस बीच ऐसे फौजियों की जिंदगी पर बालीवुड में कई फिल्में बन गई हैं और उन्हें दर्शकों ने सराहा भी। लेकिन वे नाम अभी भी गुमनामी के अंधेरे में हैं, जिन्हें न तो शहीद माना जा सकता है और न ही गुमशुदा।उम्मीद के हर कतरे की आस में तिल-दर-तिल घुलते इन जवानों के परिवारीजन अब लिखा-पढ़ी करके थक गए हैं। दिल मानता नहीं है कि उनके अपने भारत की रक्षा वेदी पर शहीद हो गए हैं। 1971 के युद्ध के दौरान जिन 54 फौजियों के पाकिस्तानी गुनाहखानों में होने के दावे हमारे देशवासी करते रहे हैं, उनमें से 40 का पुख्ता विवरण उपलब्ध हैं। इनमें 6 मेजर, 1 कमांडर, 2 फ्लाइंग आफिसर, 5 कैप्टन, 15 फ्लाइट लेफ्टिनेंट, 1 सेकेंड फ्लाइट लेफ्टिनेंट, 3 स्कावर्डन लीडर, 1 नेवी पालयट कमांडर, 3 लांसनायक, और 3 सिपाही हैं।एक लापता फौजी मेजर
MP jansandesh 12-9-15
अशोक कुमार सूरी के पिता डॉ. आरएलएस सूरी के पास तो कई पक्के प्रमाण हैं, जो उनके बेटे के पाकिस्तानी जेल में होने की कहानी कहते हैं। डॉ. सूरी को 1974 व 1975 में उनके बेटे के दो पत्र मिले, जिसमें उसने 20 अन्य भारतीय फौजी अफसरों के साथ, पाकिस्तान जेल में होने की बात लिखी थी। 1979 में डॉ. सूरी को किसी अंजान ने फोन करके बताया कि उनके पुत्र को पाकिस्तान में उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रदेश की किसी भूमिगत जेल में भेज दिया गया है। मेजर सूरी सिर्फ 25 साल की उम्र में ही गुम होने का किस्सा बन गए। पाकिस्तान जेल में कई महीनों तक रहने के बाद लौटे एक भारतीय जासूस मोहन लाल भास्कर ने, लापता विंग कमाडंर एचएस गिल को एक पाक जेल में देखने का दावा किया था। लापता फ्लाईट लैफ्टिनेंट वीवी तांबे को पाकिस्तानी फौज द्वारा जिंदा पकड़ने की खबर ‘संडे पाकिस्तान आब्जर्वर’ के पांच दिसंबर 1971 के अंक में छपी थी। वीर तंाबे का विवाह बैडमिंटन की राष्ट्रीय चैंपियन रहीं दमयंती से हुआ था। शादी के मात्र डेढ़ साल बाद ही लड़ाई छिड़ गई थी। तब से 44 साल हो गए, दमयंती अपने पति की राह देख रही हैं। सेकेंड लेफ्टिनेंट सुधीर मोहन सब्बरवाल जब लड़ाई के लिए घर से निकले थे, तब मात्र 23 साल उम्र के थे। कैप्टर रवींद्र कौरा को अदम्य शौर्य प्रदर्शन के लिए सरकार ने वीर चक्र से सम्मानित किया था, लेकिन वे अब किस हाल में और कहां हैं, इसका जवाब देने में सरकार असफल रही है।पाकिस्तान के मरहूम प्रधानमंत्री जुल्फकार अली भुट्टो को फांसी दिए जाने के तथ्यों पर छपी एक किताब भारतीय युद्धवीरों के पाक जेल में होने का पुख्ता सबूत मानी जा सकती है। बीबीसी संवाददाता विक्टोरिया शोफील्ड की किताब ‘भुट्टो: ट्रायल एंड एक्सीक्यूशन’ के पेज 59 पर भुट्टो को फांसी पर लटकाने से पहले कोट लखपतराय जेल लाहौर में रखे जाने का जिक्र है। किताब में लिखा है कि भुट्टो को पास की बैरक से हृदयविदारक चीख पुकार सुनने को मिलती थीं। भुट्टो के एक वकील ने पता किया था कि वहां 1971 के भारतीय युद्ध बंदी हैं। जो लगातार उत्पीड़न के कारण मानसिक विक्षिप्त हो गए थे। सुप्रीम कोर्ट में सरकार के सालिसिटर जनरल ने यह भी कहा कि यह मामला अंतरराष्ट्रीय अदालत में नहीं ले जाया जा सकता। यहां पता चलता है कि युद्ध के बाबत संयुक्त राष्ट्र संघ के निर्धारित कायदे कानून महज कागजी दस्तावेज हैं। इनका क्रियान्वयन से कोई वास्ता नहीं है। संयुक्त राष्ट्र के विएना समझौते में साफ जिक्र है कि युद्ध के पश्चात, रेडक्रास की देखरेख में तत्काल सैनिक अपने-अपने देश भेज दिए जाएंगे। दोनों देश आपसी सहमति से किसी तीसरे देश को इस निगरानी के लिए नियुक्त कर सकते हैं। इस समझौते में सैनिक बंदियों पर क्रूरता बरतने पर कड़ी पाबंदी है। लेकिन भारत-पाक के मसले में यह कायदा-कानून कहीं दूर-दूर तक नहीं दिखा। 1972 में अतंरराष्ट्रीय रेडक्रास ने भारतीय युद्ध बंदियों की तीन लिस्ट जारी करने की बात कही थी। लेकिन सिर्फ दो सूची ही जारी की गईं।
प्रभात, मेरठ 13 सितंबर 15
एक गुमशुदा फ्लाइंग आफिसर सुधीर त्यागी के पिता आरएस त्यागी का दावा है कि उन्हें खबर मिली थी कि तीसरी सूची में उनके बेटे का नाम था। लेकिन वो सूची अचानक नदारद हो गई।भारत सरकार के कई वरिष्ठ अधिकारी मानते रहे हैं कि हमारी फौज के कई जवान पाक जेलों में नारकीय जीवन भोग रहे हैं। उन्हें शारीरिक यातनाएं दी जा रही हैं। करनाल के करीम बख्श और पंजाब के जागीर सिंह का पाक जेलों में लंबी बीमारी व पागलपन के कारण निधन हो गया। 1971 की लड़ाई में पाकिस्तान द्वारा युद्ध बंदी बनाया गया सिपाही धर्मवीर 1981 में जब वापस आया तो पता लगा कि यातनाओं के कारण उसका मानसिक संतुलन पूरी तरह बिगड़ गया है। लापता फौजियों के परिवारीजनों का दावा है कि कुछ युद्ध बंदी कोट लखपतराय लाहौर, फैसलाबाद, मुलतान, मियांवाली और बहावलपुर जेल में हैं। पर दावों पर राजनीति के दांवपंच हावी हैं।विएना समझौता के तहत सैनिकों के मारे जाने के बाबत जो प्रमाण होने चाहिए, पाकिस्तान सरकार उनमें से एक भी प्रमाण इन 54 जवानों के लिए दे नहीं पाई है। अलबत्ता पाकिस्तान सरकार ने लापता फौजियों को जेल में पहचानने के लिए एक भारतीय प्रतिनिधिमंडल को आने का न्यौता दिया था। पाकिस्तान के मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को भी जेल दिखाने के नाटक किए जाते रहे। लेकिन अपनी एक गलती छिपाने के लिए पकिस्तान सरकार ने भारतीय अभिभावकों के सामने 160 साधारण भारतीय बंदी शिनाख्त के लिए पेश किए। इनमें से एक भी फौजी नहीं था। जेल अधिकारियों ने ही दबी जुबान में कह दिया कि उन्हें गलत जगह भेजा गया है। भारत की सरकार लापता फौजियों के परिवारीजनों को अभी तक सिर्फ आस दे रही थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट में दायर जवाब के बाद वह उम्मीद भी टूट गई है। काश, 1971 की लड़ाई जीतने के बाद भारत ने पाकिस्तान के 93,000 बंदियों को रिहा करने से पहले अपने एक-एक आदमी को वापस लिया होता। पूरे पांच साल तक प्रधानमंत्री रहे पीवी नरसिंहराव भी भूल चुके थे कि उन्होंने जून 90 में बतौर विदेश मंत्री एक वादा किया था कि सरकार अपने बहादुर सैनिक अधिकारियों को वापस लाने के लिए कोई भी कीमत चुकाने को तैयार हैं। लेकिन देश के सर्वोच्च पद पर रहने के दौरान अपनी कुर्सी बचाने के लिए हर कीमत चुकाने की व्यस्तता में उन्हें उन सैनिक परिवारों के आंसुओं की नमी का एहसास तक नहीं हुआ।44 साल के लंबे अंतराल में हमारा लंबा-चौड़ा प्रशासनिक व गुप्तचर तंत्र, उन वीरों की वापसी तो दूर की बात है, वो प्रमाण भी सरकारी तौर पर मुहैया नहीं करवा पाया है, जिसके बूते पर हमारे जवानों के सलामत पाकिस्तानी जेल में होने का दावा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किया जा सकता और अब सभी उम्मीदों के दरवाजे हमेशा के लिए बंद कर दिए गए।


flood :Eating growing economy of India

देश को पीछे ढकेलता सैलाब

राष्‍ट्रीय सहारा , 10 सितंबर 15

                                                   पंकज चतुर्वेदी
पिछले कुछ सालों के आंकड़ें देखें तो पाएंगे कि बारिश की मात्रा भले ही कम हुई है, लेकिन बाढ़ से तबाह हुए इलाके में कई गुना बढ़ोतरी हुई है। कुछ दशक पहले जिन इलाकों को बाढ़ से मुक्त क्षेत्र माना जाता था, अब वहां की नदियां भी उफनने लगी हैं। हालांकि मौसम बीतते ही उन इलाकों में फिर पानी का संकट छा जाता है वर्ष 1995-2005 के दशक के दौरान बाढ़ से हुए नुकसान का सरकारी अनुमान 1805 करोड़ था जो अगले दशक यानी 2005-2015 में 4745 करोड़ हो गया है। यह आंकड़ा ही बानगी है कि बाढ़ किस निर्ममता से हमारी अर्थव्यवस्था को चट कर रही है
कड़ों में देखें तो देश के बड़े हिस्से में मानसून नाकाफी रहा है, लेकिन जहां जितना पानी बरसा है, उसने अपनी तबाही का दायरा बढ़ा दिया है। पिछले कुछ सालों के आंकड़ें देखें तो पाएंगे कि बारिश की मात्रा भले कम हुई है, लेकिन बाढ़ से तबाह इलाके में कई गुना बढ़ोतरी हुई है। कुछ दशक पहले जिन इलाकों को बाढ़मुक्त क्षेत्र माना जाता था, अब वहां की नदियां भी उफनने लगी हैं। हालांकि मौसम बीतते ही उन इलाकों में पानी का संकट छा जाता है। असल में बाढ़ महज एक प्राकृतिक आपदा नहीं है, बल्कि देश के गंभीर पर्यावरणीय, सामाजिक और आर्थिक संकट का कारक बन गई है। हमारे पास बाढ़ से निबटने को महज राहत कार्य या यदा-कदा कुछ बांध या जलाशय निर्माण का विकल्प है, जबकि बाढ़ के विकराल होने के पीछे नदियों का उथला होना, जलवायु परिवर्तन, बढ़ती गर्मी, रेत खनन और जमीन का कटाव जैसे कई कारण दिनों-दिन गंभीर होते जा रहे हैं। जिन सड़कों, खेत या इमारतों को बनाने में दशकों लग जाते हैं, उसे बाढ़ का पानी पलक झपकते उजाड़ देता है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि 1951 में भारत की बाढ़ग्रस्त भूमि की माप एक करोड़ हेक्टेयर थी। 1960 में यह ढ़ाई करोड़ हेक्टेयर हो गई। 1978 में बाढ़ से तबाह जमीन 3.4 करोड़ हेक्टेयर थी। आज देश के कुल 329 मिलियन (दस लाख) हेक्टेयर में से चार करोड़ हेक्टेयर इलाका बाढ़ की चपेट में हर साल बर्बाद होता है। 1995-2005 के दशक के दौरान बाढ़ से हुए नुकसान का सरकारी अनुमान 1805 करोड़ था जो अगल दशक यानी 2005-2015 में 4745 करोड़ हो गया है। यह आंकड़ा ही बानगी है कि बाढ़ किस निर्ममता से हमारी अर्थव्यवस्था चट कर रही है। बिहार का 73 प्रतिशत हिस्सा आधे साल बाढ़ और शेष दिन सुखाड़ का दंश झेलता है और यही वहां के पिछड़ेपन, पलायन और परेशानियों का कारण है। यह विडंबना है कि राज्य का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा नदियों के रौद्र रूप से पस्त रहता है। असम में इन दिनों 18 जिलों के कोई साढ़े सात लाख लोग नदियों के रौद्र रूप के चलते घर-गांव से पलायन कर गए है और ऐसा हर साल होता है। अनुमान है कि यहां सालाना कोई 200 करोड़ का नुकसान होता है जिसमें मकान, सड़क, मवेशी, खेत, पुल, स्कूल, बिजली, संचार आदि शामिल हैं। मूलभूत सुविधाएं खड़ा करने में दस साल लगते हैं, जबकि हर साल औसतन इतना नुकसान हो जाता है। यानी असम हर साल विकास की राह पर 19 साल पिछड़ता जाता है। केंद्र हो या राज्य, सरकारों का ध्यान बाढ़ के बाद राहत कायरे व मुआवजे पर होता है। 
lokmat samachar maharashtra
आजादी के 67 साल बाद भी हम बाढ़ नियंतण्रकी कोई मुकम्मल योजना नहीं दे पाए हैं। यदि इस अवधि में राज्य में बाढ़ से हुए नुकसान व बांटी गई राहत राशि को जोड़ें तो पाएंगे कि इतने धन में एक नया सुरक्षित असम खड़ा हो सकता था। देश को सबसे ज्यादा सांसद देने वाले उत्तर प्रदेश की उर्वरा धरती, कर्मठ लोग, अयस्क व अन्य संसाधनों के बावजूद विकास की सही तस्वीर न उभर पाने का एक बड़ा कारण हर साल आने वाली बाढ़ से होने वाला नुकसान भी है। बीते एक दशक के दौरान राज्य में बाढ़ के कारण 45 हजार करोड़ रपए कीमत की तो महज खड़ी फसल नष्ट हुई है। सड़क, सार्वजनिक संपत्ति, इंसान, मवेशी आदि के नुकसान अलग हैं। राज्य सरकार की रपट को भरोसे लायक मानें तो 2013 में राज्य में नदियों के उफान के कारण 3259.53 करोड़ का नुकसान हुआ था जो आजादी के बाद का सबसे बड़ा नुकसान था। अब तो देश के शहरी क्षेत्र भी बाढ़ की चपेट में आ रहे हैं। इसके कारण भौतिक नुकसान के अलावा मानव संसाधन का जाया होना तो असीमित है। सनद रहे कि देश के 800 से ज्यादा शहर नदी किनारे बसे हैं। कई ऐसे कस्बे जो अनियोजित विकास की पैदाइश हैं, शहरी नालों के कारण बाढ़ग्रस्त हो रहे हैं। 1953 से लेकर 2010 तक हम बाढ़ के उदर में 8,12,500 करोड़ रपए फूंक चुके हैं जबकि बाढ़ उन्मूलन के नाम पर व्यय राशि 1,26,000 करोड़ है। यह धनराशि मनरेगा के एक साल के बजट का करीब चार गुना है। आमतौर पर यह धनराशि नदी प्रबंधन, बाढ़ चेतावनी केंद्र बनाने और बैराज बनाने पर खर्च की गई लेकिन सभी उपाय बेअसर ही रहे हैं। आने वाले पांच साल के दौरान बाढ़ उन्मूलन पर होने वाले खर्च का अनुमान 57 हजार करोड़ आंका गया है। सनद रहे कि हम अब तक एक सदी पुराने र्ढे पर बाढ़ को देख रहे हैं, यानी कुछ बांध या तटबंध बनाना, कुछ राहत सामग्री बांट देना, कुछ ऐसे कार्यालय बना देना जो बाढ़ की आशंका की सूचना लोगों को दे सकें। बारिश के बदलते मिजाज, भू-उपयोग के तरीकों में बदलाव ने बाढ़ के संकट को जिस तरह बदला है, उसे देखते हुए तकनीक व योजना में आमूल-चूल परिवर्तन जरूरी है। वैसे शहरीकरण, वन विनाश और खनन तीन प्रमुख कारण बाढ़ विभीषिका में उत्प्रेरक का कार्य कर रहे हैं। प्राकृतिक हरियाली उजाड़ कंक्रीट का जंगल सजाया जाता है तो जमीन की जल सोखने की क्षमता तो कम होती ही है, सतही जल की बहाव क्षमता भी कई गुना बढ़ जाती है। शहरीकरण के कूड़े ने भी समस्या बढ़ायी है। यह कूड़ा नालों से होते हुए नदियों में पहुंचता है। इससे नदी की जल ग्रहण क्षमता कम होती है।पंजाब, हरियाणा, उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश अनियंत्रित शहरीकरण के कारण ही बाढ़ग्रस्त हो रहे हैं। इससे वहां भूस्खलन की घटनाएं बढ़ रही हैं और इसका मलबा भी नदियों में ही जाता है। पहाड़ों पर खनन से दोहरा नुकसान है। इससे वहां की हरियाली उजड़ती है और फिर खदानों से निकली धूल और मलबा नदी-नालों में अवरोध पैदा करता है। हिमालय से निकलने वाली नदियों के मामले में तो मामला और गंभीर हो जाता है। सनद रहे कि हिमालय, पृवी का सबसे कम उम्र का पहाड़ है। इसकी विकास प्रक्रिया जारी है, तभी इसे ‘‘जीवित-पहाड़’ भी कहा जाता है। यहां का बड़ा भाग कठोर-चट्टान न होकर, कोमल मिट्टी है। बारिश या बर्फ के पिघलने पर, जब पानी नीचे की ओर बहता है तो साथ में पर्वतीय मिट्टी भी बहा लाता है। पर्वतीय नदियों में आई बाढ़ के कारण यह मिट्टी नदी के तटों पर फैल जाती है। इनका पानी जिस तेजी से चढ़ता है, उसी तेजी से उतर जाता है। इसके कारण नदियों के तट बेहद उपजाऊ हुआ करते हैं। लेकिन अब नदियों को जगह-जगह बांधा जा रहा है, सो बेशकीमती मिट्टी अब बांधों में ही रुक जाती है और नदियों को उथला बनाती रहती है। साथ ही पहाड़ी नदियों में पानी चढ़ तो जल्दी जाता है, पर उतरता धीरे-धीरे है।मौजूदा हालात में बाढ़ महज प्राकृतिक प्रकोप नहीं, बल्कि मानवजन्य साधनों का त्रासदी है। ऐसे में बाढ़ के बढ़ते सुरसा-मुख पर अंकुश लगाने के लिए शीघ्र कुछ करना होगा। कुछ लोग नदियों को जोड़ने में इसका निराकरण खोज रहे हैं। हकीकत में नदियों के प्राकृतिक बहाव, तरीकों, विभिन्न नदियों के ऊंचाई-स्तर में अंतर जैसे विषयों का हमारे यहां कभी निष्पक्ष अध्ययन नहीं किया गया और इसी का फायदा उठा उछ ठेकेदार, सीमेंट के कारोबारी और भूमाफिया इस तरह की सलाह देते हैं। पानी को स्थानीय स्तर पर रोकना, नदियों को उथला होने से बचाना, बड़े बांध पर पाबंदी, नदियों के करीबी पहाड़ों की खुदाई पर रोक और नदियों के प्राकृतिक मार्ग से छेड़छाड़ रोकना कुछ ऐसे सामान्य प्रयोग हैं जो बाढ़ सरीखी भीषण विभीषिका का वाजिब जवाब हो सकते हैं।

बुधवार, 9 सितंबर 2015

Quality of Hindi books must be maintain for Hindi promotion

गुणवत्ता आधारित कृतियों का ही प्रकाशन हो

पंकज चतुर्वेदी

7बात कुछ साल पहले की है। एक छोटे से प्रकाशक ने नई दिल्ली के आईटीओ के करीब हिंदी भवन में पूरे दिन का साहित्यिक कार्यक्रम आयोजित किया। कुछ पुस्तकों का लोकार्पण, कुछ चर्चाएं, कविता पाठ और कुछ राजनेताओं का अभिनंदन भी। नारायण दत्त तिवारी से लेकर डॉ गिरजा व्यास तक अलग- अलग सत्रों में अतिथि थे। हर बार मालाएं पहनाई जातीं, नेताओं की ठकुर सुहाती और फिर चमकीले कागज में लिपटी किताबों को खोला जाता। इतने बड़े हॉल में श्रोता जुटाना प्रत्येक सत्र की समस्या था। कुछ नेताओं के चमचे-कलछी, लोकार्पित पुस्तकों के लेखकों के नाते-रिश्तेदार, प्रकाशक के दूर-करीब के सभी नातेदार (जिनका साहित्य या पठन से दूर-दूर तक वास्ता नहीं था), इस तरह बमुश्किल 100 लोग जुटते थे। चूंकि प्रत्येक सत्र के बाद स्वल्पाहार की व्यवस्था थी, अत: सत्र समाप्त होते-होते हाल भरने लगता। आखिरी सत्र था- हिंदी पर संकट। सत्र में
Peoples Samachar MP 10-9-15
बामुश्किल 20 लोग थे। दिसंबर की सर्दी थी और ढलती शाम में खुले आंगन में गरम-गरम मिक्स पकौड़ों का दौर चलने लगा। भीड़ इतनी कि एक-एक पकौड़े के लिए मारा- मार मची थी। तभी अपनी प्लेट और दूसरे की प्लेट से अपने कपड़े संभालते हुए हिंदी के वरिष्ठ आलोचक डॉ विश्वनाथ त्रिपाठी ने ठहाका लिया, ‘‘जब तक हमारे देश में पकौड़े हैं, हिंदी को कोई संकट नहीं है।’’ कई लोगों की हंसी हवा में गूंजी। लेकिन डॉ त्रिपाठी की बात वैसे ही आई-गई हो गई, जैसे कि पूरे देश में हर साल होने वाली हजारों साहित्यिक गोष्ठियों में लिए गए संकल्प और नारे कुछ ही घंटों में सुप्त हो जाते हैं। आमतौर पर हिंदी के अधिकांश लेखक, प्रकाशक यहां तक कि पाठक भी हिंदी-जगत की दयनीयता का रोना रोते देखे जाते हैं। प्रकाशक कहता है कि हिंदी में किताबें बिकती नहीं हैं, लेकिन वह बड़े-बड़े लोकार्पण समारोहों में खूब पैसा बहाता है। लेखक अपनी गरीबी का रोना रोता दिखता है, लेकिन अपनी गांठ के पैसे से किताब छपवा कर यार-दोस्तों में वितरित करने के लोभ-संभरण से बच नहीं पाता है। पाठक अच्छी किताबों की कमी का रोना रोता है, लेकिन सौ रूपए से अधिक की कितबा खरीदने पर घर का बजट बिगड़ने की दुहाई देने लगता है। हां ! साहित्य से जुड़े तीनों वर्ग यह कहते नहीं अघाते हैं कि वे तो साहित्य-सेवा के लिए प्रतिबद्ध हैं, सो घर फंूक तमाशा देख रहे हैं। लेकिन इस ‘दरिद्रता’ की हकीकत ये आंकड़े उजागर करते हैं- हमारे देश में हर साल लगभग 85 हजार पुस्तकें छप रही हैं, इनमें 25 प्रतिशत हिंदी, 20 प्रतिशत अंग्रेजी और शेष 55 प्रतिशत अन्य भारतीय भाषाओं में हैं। लगभग 16 हजार प्रकाशक सक्रिय रूप से इस कार्य में लगे हैं। प्रकाशक के साथ, टाईप सेंटर, संपादक, प्रूफ रीडर, बाईंडिग, कटिंग, विपणन जैसे कई अन्य कार्य भी जुडेÞ हैं। जाहिर है कि यह समाज के बड़े वर्ग के रोजगार का भी साधन है। विश्व बाजार में भारतीय पुस्तकों का बेहद अहम स्थान है। एक तो हमारी पुस्तकों की गुणवत्ता बेहतरीन है, दूसरा इसकी कीमतें कम हैं। भारतीय पुस्तकें विश्व के 130 से अधिक देशों को निर्यात की जाती हैं। हाल ही में नई दिल्ली में संपन्न पुस्तक मेले में हिंदी के प्रकाशकों को एक साथ एक हॉल में रखा गया था। गिनती के 10 प्रकाशकों के यहां जम कर भीड़ होती थी। वहां नामचीन लेखक सारा-सारा दिन बिताते थे। हर शाम चमकीली पन्नी में लिपटी किताबों के लोकार्पण की औपचारिकता होती थी। ना किताब पर विमर्श, ना ही उसकी विषय-वस्तु पर चर्चा, और ना ही उसकी तुलना। बस लेखक की महानता पर कुछ जुमले और उसके बाद आसपास के सोशलाईट क्लब या होटलों की ओर जाता एक काफिला। शराब, खाना, निंदा-रस का पान और उसी के बीच किताबों की थोक सप्लाई की जुगत। कई बार किसी पाठ्य-पुस्तक में अपनी किताब फंसाने की जोड़- तोड़। ऐसे तो हो गया भाषा व साहित्य का विकास। मेला हो या फिर गोष्ठियां, वातानुकूलित परिवेश में भी पसीने से तर-बतर लोकार्पण करते और पुस्तकें बिकने के लिए सरकार, समाज और टीवी को कोसते इन बुजुर्गवार से जब पूछो कि आप इतनी मेहनत क्यों कर रहे हैं? तत्काल संत बन जाते हैं - ‘‘ हम तो हिंदी की, साहित्य की सेवा कर रहे हैं।’’ तो क्या साहित्य इतना दयनीय हो गया है कि उसे सेवा की जरूरत पड़ रही है? साहित्य तो पहले समाज को दिशा और दशा देने का साधन था। अब क्या साहित्य ही दीन-हीन हो गया है? बीते दो दशकों के दौरान सूचना और ज्ञान का विस्फोट हुआ। इंटरनेट पर करोड़ों अरबों पेज सूचनाएं भरी हुई हैं- इसमें कई करोड़ साहित्य से संबंधित हैं, विश्व साहित्य से संबंधित। युग आ गया तुलना का और उसमें श्रेष्ठ के आगे बढ़ने का। कुछ दशकों पहले तक शिक्षा समाज के एक सीमित वर्ग का हक हुआ करता था। ऐसे मनुवादियों के बोले-लिखे गए शब्द ब्रह्म वाक्य होते थे। वे क्या कह या लिख रहे हैं उसका आकलन करने वाले सामित थे, वैश्विक स्तर पर उसकी तुलना करने वाले तो विरले ही थे। विज्ञान और तकनीकी ने उस ‘ज्ञान के एकाधिकार’ को समाप्त कर दिया है। ऐसे में खुद को बाजार में दिखाने, अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने और अपने लेखन को विशिष्ट बताने के लिए कुछ लेखकों ने गोष्ठियों का सहारा ले रखा है। यदि देशभर की सरकारी गोष्ठियों का आकलन करें तो पाएंगे कि वही 100-50 चेहरे कभी मंचासीन होते हैं तो कहीं सामने कुर्सियों पर और उन्हीं में से कुछ शाल ओढ़ कर नारियल व चैक पकड़ते दिख जाएंगे। कुछ बड़े प्रकाशक बड़े ही शातिर अंदाज में अपनी पुस्तकों के लोकार्पण समारोहों का आयोजन करते हैं। उसमें आमंत्रित एक-एक व्यक्ति उनकी पुस्तकों की थोक बिक्री के माध्यम होते हैं। हाल ही में दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में हिंदी की एक लेखिका के कैलाश मानसरोवर यात्रा के संस्मरणों की पुस्तक का लोकार्पण हुआ। आमंत्रण कार्ड पर बड़े ही सुगठित शब्दों में कार्यक्रम के पश्चात रसरंजन के लिए आमंत्रण का उल्लेख था। कितना निरीह है हिंदी का प्रकाशन जगत और कितनी साहित्य सेवा हो रही है? हिंदी प्रकाशन जगत के साथ सबसे बड़ी समस्या है, प्रकाशक बनने के लिए किसी प्रकार का कोई बंधन या कानून ना होना। कोई भी व्यक्ति कभी-भी अपने नाम से घर के पते से या गुमनाम पते से प्रकाशक बन सकता है। एक ही प्रकाशक कई-कई अलग-अलग नामों से पुस्तकें छाप सकता हैं। ना तो किसी पंजीयन की जरूरत है और ना ही किसी निरीक्षण या नियंत्रण का डर। जिस किसी को भ्रम हो गया कि वह लेखक बन सकता है, अपने माता-पिता, गुरू या प्रेयसी को समर्पित कर एक पुस्तक छाप डालता है। इनमें कवियों की संख्या बहुत बड़ी है। और ऐसे लेखकों की आत्मसंतुष्टि साहित्यिक आयोजन के नाम पर कुछ लोगों को जुटाने व उन्हें खिलाने-पिलाने का जरिया होती है। गोष्ठी में लेखक की तारीफ होती है, रचना का उल्लेख तक नहीं होता। यदि रसरंजन की व्यवस्था हो तो लेखक की तुलना प्रेमचंद या निराला से करने की हिमाकत करने से भी नहीं चूकते हैं। इस तरह के आयोजनों और पुस्तकों के प्रकाशन के कई दूरगामी खतरे हैं: 1.अच्छी पठन सामग्री ऐसी अधकचरा पुस्तकों के बीच कहीं छिप जाती हैं। लगातार स्तरहीन पुस्तकें देखने के बाद आम पाठक का ध्यान पठन से भटक जाता है। 2. गोष्ठियों में उठाए गए मुद्दों पर जब अमल होता नहीं देखते हैं तो नए लेखकों, पाठकों और आम लोगों के मन में पुस्तकें व लेखकों के प्रति अविश्वास का भाव उसी तरह जाग जाता है, जैसा वे राजनेताओं के बारे में सोचते हैं। 3. फिजूलिया प्रकाशनों से कागज का अपव्यय होता है, जोकि सीधे-सीधे पर्यावरणीय संकट को बढ़ावा देता है। इसका विपरीत असर बाजार में कागज के मूल्यों में वृद्धि के रूप में छात्रों व अन्य प्रकाशकों को भी झेलना पड़ता है। 4. स्तरहीन आयोजन समय, श्रम और संसाधन की फिजूलखर्ची होते हैं। कई बार अच्छे पाठक व लेखक ऐसे आयोजनों से केवल इस लिए दूर हो जाते हैं कि ऐसे आयोजनों की कुख्याति होती है।
                                                                                                                                                                    (आलेख में व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं।)
                                              

सोमवार, 7 सितंबर 2015

great Indian bustard in great trouble

सोन चिरैया के जंगल में ‘सफेद हाथी’

                                                                                                                   
JAGRAN 7-9-15
                                                                                                                   पंकज चतुर्वेदी
कभी भारत सोने की चिड़िया था, जिसे विदेशियों ने उजाड़ दिया। इस देश मे एक सोन चिरैया है, उसे अब देश के लोग लुप्त करने पर आमदा है। सन 2011 की गणना में इसकी संख्या 250 बताई गई थी पक्षी विशेषज्ञो की आश्ंाका है इस समय यह बामुश्किल 150 बची होगी। दुर्लभ पक्षी सोन चिरैया के अस्तित्व की रक्षा के लिए सरकार ने एक संरक्षित अभ्यारण बनाया।  उसमें सरकारी कर्मचारियां-अफसरों का लंबा-चैड़ा अमला बहाल किया गया। कुछ साल बाद देखा तो वहां केवल सरकारी सफेद हाथी बचे, सोन चिरैया बीते हुए कल की बात बन गए। जब नौकरी पर संकट आया तो कागजी शेर बनाए गए, लेकिन दुर्भाग्य सोन चिरैया नहीं बचीं। यह तथा-कथा है मध्यप्रदेश के ग्वालियर के घाटीगांव और करैरा(शिवपुरी) की। यह भी विडंबना है कि ‘चिड़िया उड़ने’ के बाद इलाके के गांवों को उजाड़ कर चिड़िया को बसाने का शिगूफा छोड़ा जा रहा है।
हिंदुस्‍तान 19 सितंबर 15
‘ओटीडीटी’ कुल का पक्षी सोन चिरैया ग्रेट इंडियन बस्टर्ड या हुकना या तुकदार भी कहलाता है। डीलडौल में गिद्ध के समान, सिर तक ऊंचाई कोई तीन फीट, वजन कोई 13 किलोग्राम - कुछ-कुछ शुतुर्मुग की तरह दिखने वाले इस पक्षी का शरीर बगैर बालों वाली टांगों के समकोण पर टिका होता है।इसे देश का सबसे विशाल पक्षी भी माना गया है।  यह इसकी खास विशेषता भी है। इसे ऊपरी पंख गहरे पीले और उन पर काली धारियों होती हैं।निचला भाग सफेद व छाती के पास नीचे लंबी काली पट्टी होती हैं। सफेद गर्दन, कली खोपड़ी, चैड़े पंखों की नोक के पास सफेद-सा धब्बा और सिर पर कलगी- ये कुछ ऐसी विशेषताएं हैं जिनके कारण सोन चिरैया कुछ अलग ही दिखती है। मध्यप्रदेश में घाटीगांव व करैरा के अलावा राजस्थन के कंडनपुर, सोनखल्या और डेजर्ट नेशनल पार्क, महाराष्ट्र में नानाज, आंध्रप्रदेश में रोल्लापाडू और कनार्टक के रानी बन्नार अभ्यारण में इस दुर्लभ पक्षी की आबादी बामुश्किल 150शेष है। कुछ जगह तो बस नाम के अभ्यारण है वहां पक्षी है ही नहीं।
सोन चिरैया बहुत ही शर्मीला व चैकस परिंदा है, दुर्भाग्य की बात है कि यह पक्षी कभी इंसान की नियत पर संदेह नहीं करता है। यही कारण है कि पिछले कुछ दशकों में इसका इतना शिकार हुआ कि आज यह प्रजाति खतम होने के कगार पर खड़ी है। हालांकि इसका मांस रबर की तरह लचीला और खुरदुरा होता है, इसे आसानी से चबाया नहीं जा सकता है। इसके बावजूद इसकी दीवानगी के पीछे यह भ्रांति है कि इसकी तासीर गरम होती है और इससे पौरुष-शक्ति बढ़ती है।  फिर इसे पंख खूबसूरत होने के कारण सजावट के काम आते हैं। वैसे यह पक्षी काफी कुछ अपनी आदतों के कारण मारा जाता है। अक्सर देखा गया है कि सोन चिरैया गाय, भैंस या बकरियों के झुंड के साथ पैदल चलने लगती है। ऐसे में ग्वाले या शिकारी इसको धर पकड़ते हैं। यहां तक कि लोमड़ी और कुत्ते भी इसको पकड़ लेते हैं, क्योंकि यह अचानक उड़ नहीं पाता है। साथ ही यह पक्षी साल में केवल एक बार और केवल एक ही अंडा देता है। अंडे को सहेजने के लिए अपेक्षित संवेदनशीलता का अभाव भी इसके लुप्त होने का बड़ा कारण है।
सन 1982 में मध्यप्रदेश के ग्वालियर जिले के घाटीगांव का 512 वर्गकिमी और शिवपुरी के करैरा में 202 वर्गकिमी इलाके के जंगल को सौन चिरैया के लिए संरक्षित अभ्यारण घोषित किया गया था। इस क्षेत्र की सिफारिश मशहूर पक्षी वैज्ञानिक डा. सालिम अली ने की थी। बांबे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी के वेज्ञानिक डा. रफीक रहमानी लगातार इन जंगलों में आते रहे। उन्होंने इस अनूठे परिंदे के प्राकृतिक आवास, प्रजनन, आदतों आदि पर गहन शोध किए। डा. रहमानी ने इस पक्षी का अस्त्त्वि बचाने के लिए कई सुझावों के साथ एक रिपोर्ट मध्यप्रदेश शासन को भ्ेाजी थी। डा. रहमानी की रिपोर्ट सरकारी फाईलों के जंगलों में कहीं खो गई और सरकारी कागजों में जंगल संवारने के नाम पर करोड़ो रूपए खर्च किए गए।  बीते पांच सालों में यहां पखी संरक्षण के लिए एक करोड़ 35 लाख रूपए खर्च किए गए। इसके लिए कोई 18 अफसर व कर्मचारी तैनात हैं। चिड़ियों को चुगाने के लिए चने व अन्य दानों की खरीदी और वितरण बाकायदा कागजो पर दर्ज होता है। जबकि अफसर कहते हैं कि केवल आठ सोन चिरैया शेष रह गई हैं। सरकारी रिकार्ड की ही बानगी है कि 1986 में यहां 35, 1987 में 40, 1991 में 12, 1992 में 18 और 1993 में पांच पक्षी देखे गए। उसके बाद कई साल संख्या शून्य रही, लेकिन सरकारी खर्च होता रहा। हालांकि आज भी पक्षी की संख्या तो शून्य ही है, लेकिन अपनी नौकरी और ऊपर की कमाई बचाने के लिए इसकी संख्या आठ बताई जा रही है। यही हालात अन्य कई अभयरणों के भी हैं।
इन जंगलों से सोन चिरैया के लुप्त होने के लिए शिकार के साथ-साथ वहां के प्राकृतिक वृक्षों की संख्या कम होना भी जिम्मेदार है। खेती-योग्य सरकारी जमीन पर नाजायज कब्जा करने की साजिश के तहत चिड़ियों को उजाड़ने की बात कुछ पर्यावरणविद बताते हैं। कतिपय वन अधिकारी और स्थानीय नेता इस साजिश में शािमल बताए जाते हैं। सनद रहे कि इस इलाके के बाशिंदों का जीवकोपार्जन मुख्य रूप से खेती से ही होता है और यहां खेती की जमीन के लिए हत्या व डकैत बनना आम बात है। जब कभी सोन चिरैया लुप्त होने का हल्ला होता है, जंगल महकमे वाले अभ्यारण के तहत आने वाले 32 गांवों को खाली करने की कवायद शुरू कर देते हैं। अपने पुश्तैनी घर-खेत को बचाने के लिए गांव वाले लामबंद होते हैं, सियासत होती है और एक बार फिर सब जस का तस हो जाता है।
यह बात तय है कि इलाके में अब सौन चिरैया को नामोनिशान नहीं बचा है। यह भी बात सत्य है कि प्रकृति की इस अनमोल विरासत को बचाना बेहद जरूरी है । यह भी स्वीकार करना होगा कि चिड़िया को बसाने के लिए हजारों लोगों की बस्ती उजाड़ना एक अव्यावहारिक कदम है। पारिस्थितिकी संतुलन के लिए वन और वन्य प्राणियों का अस्तित्व बेहद जरूरी है, लेकिन सदियों से जंगल और मानव एकदूसरे के पालक रहे हैं। बढ़ती आबादी की जरूरतों के लिए वैकल्पिक व्यवस्था की जाए तो दुर्लभ पक्षी का पर्यावास बचाया जा सकता है। आज सोन चिरैया को सहेजने का कार्य ए-बी-सी-डी से शुरू करने की नौबत आ गई है। चिड़िया के अंडे लाना, उससे बच्चे पैदा करने लायक परिस्थितियां बनाना, बच्चों को बड़ा करना और फिर उनकी संख्या बढ़ाना। लेकिन सबसे ज्यादा जरूरी होगा, स्थानीय लेागों में इस चिड़िया के संरक्षण के प्रति जागरूकता का भाव विकसित करना।
इसके संरक्षण के लिए बहाल लोगों को इस पक्षी के प्राकृतिक पर्यावास की जानकारी होना भी जरूरी है। यह पक्षी झाड़ी या घास के बीच सूखे मैदानों में रहना पसंद करता है। इसे घने जंगल पसंद नहीं है, लेकिन
घनी फसल वाले खेतों में यह अपना अड्डा जरूर बना लेते हैं। इनका भोजन खेतों- घास में मिलने वाले कीड़े-मकोड़े, टिड्डे, गुबरीले आदि होता है। जाहिर है कि यह पक्षी ऐसी जगह पर रहना पसंद करता है जो इंसान की आबादी के करीब हो। सनद रहे कि जंगल महकमे के लोग इसके संरक्षण के नाम पर गांव-बस्तियां उजाड़ने पर आमदा हैं।
पंकज चतुर्वेदी
गाजियाबाद 201005


शनिवार, 5 सितंबर 2015

How can Hindu become minority in India ?

क्या भारत में मुस्लिम आबादी वास्तव में बहुसंख्यक हो जाएगी ?

MP JANSANDESH SATNA 6-9-15
                                                                     पंकज चतुर्वेदी
बीते दिनों सरकार ने जनगणना के ताजा आंकड़े जारी कर उन लोगों को हल्ला-गुल्ल करने का एक अवसर दे दिया है जो दावा करते रहे हैं कि मुसलमानों की जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है और जल्दी ही वे हिंदुओं से अधिक हो जाएगी इसलिए हर हिंदु पांच-पांच बच्चे पैदा करे।’’ एक सांसद महोदय तो बगैर किसी सिर पैर के यह तक कह दिया कि आने वाले 80 साल में हिंदू समाप्त हो जाएगे। कुछ एक ने चार से ज्यादा बच्चे पैदा करने वालों को पारितोशिक देने की घोशणा कर डाली। यह एक ऐसा मिथक है जिसका भय कई-पढ़े लिखे शहरियों को भी है। यह एक बेहद प्रचारित जुमला है कि मुसलमान जानबूझ कर कई-कई शादी करते हैं और साजिशन देश की आबादी बढ़ाते हैं। यदि पिछली कुछ जनगणनाओं के अंाकड़ों पर नजर डालें तो हकीकत सामने आ जाती है। यही नहीं यदि इस्लाम के मूल सिद्धांतों को ठीक से समझा-पढ़ा जाए तो स्पश्ष्ट हो जाता है कि बच्चों की अनियंत्रित संख्या इसकी की मूल भावना के विपरीत है। यह विडंबना है कि समाज को तोड़ने वाले लोग, जो दोनों फिरकों में हैं, ऐसे मिथकों को हवा देते हैं, जबकि कतिपय लोग इस्लाम के नाम  पर ऐसी भ्रांतियों को हवा देते हैं। इसमें कुछ मुल्ला-मौलवी का अधकचरा ज्ञान भी कम दोशी नहीं है।
2011 की जनगणना के मुताबिक देश की आबादी में  मुसलमानों का हिस्सा बढ. गया है। 2001 में कुल आबादी में मुसलमान 13.4 प्रतिशत थे, जो 2011 में बढ. कर 14.2 प्रतिशत हो गए! असम, पश्चिम बंगाल, जम्मू-कश्मीर, केरल, उत्तराखंड, हरियाणा और यहां तक कि दिल्ली की आबादी में भी मुसलमानों का हिस्सा पिछले दस सालों में काफी बढ़ा है। असम में 2001 में करीब 31 प्रतिशत मुसलमान थे, जो 2011 में बढ. कर 34 प्रतिशत के पार हो गए, पश्चिम बंगाल में 25.2 प्रतिशत से बढ. कर 27, केरल में 24.7 प्रतिशत से बढ. कर 26.6, उत्तराखंड में 11.9 प्रतिशत से बढ. कर 13.9, जम्मू-कश्मीर में 67 प्रतिशत से बढ. कर 68.3, हरियाणा में 5.8 प्रतिशत से बढ. कर 7 और दिल्ली की आबादी में मुसलमानों का हिस्सा 11.7 प्रतिशत से बढ. कर 12.9 प्रतिशत हो गया। सन 1961 से 2011 तक की जनगणना के आकड़े आंकड़े बोलते हैं कि गत 50 वर्षों के दौरान भारत में हिंदुओं की आबादी कुछ कम हुई है, जबकि मुसलमानों की कुछ बढ़ी है। यह भीे तथ्य है कि बीते दस सालों के दौरान मुस्लिम और हिंदू आबादी का प्रतिशत स्थिर है। अगर जनसंख्या वृद्धि की यही रफ्तार रही तो मुसलमानों की आबादी को हिंदुओं के बराबर होने में 3626 साल लग जाएंगे। वैसे भी समाजविज्ञानी यह बता चुके हैं कि सन् 2050 तक भारत की आबादी स्थिर हो जाएगी और उसमें मुसलमानों का प्रतिशत 13-14 से अधिक नहीं बनेगा। इन आंकड़ों मे ंयह भी कहा गया है कि जहां हिंदुओं की जनसंख्या वृद्धि दर में गिरावट 3.16 प्रतिषत है तो मुसलमानेंा में इस दर की गिरावट 4.90 प्रतिषत है। साफ है कि मुसलमानेां की आबादी बढ़ने से रही।
एक हल्ला यह भी रहता है कि मुसलमान औरते 10-10 बच्चे पैदा करती हैं। सन 2005 में किया गया एक षोध बानगी है कि ( आर. बी. भगत और पुरुजित प्रहराज) इस बवाल में कितनी हकीकत है और कितना फसाना। उस समय मुसलमानों में जनन दर (एक महिला अपने जीवनकाल में जितने बच्चे पैदा करती है) 3.6 और हिंदुओं में 2.8 बच्चा प्रति महिला थी। यानी औसतन एक मुस्लिम महिला एक हिंदू महिला के मुकाबले अधिक से अधिक एक बच्चे को और जन्म देती है। यानि दस बच्चो ंवाला गणित कहीं भी तथ्य के सामने टिकता नहीं है।
    भारत सरकार की जनगणना के आंकड़ों का विश्लेषण करें तो पाएंगे कि 1971 से 81 के बीच हिंदुओं की जन्मदर में वृद्धि का प्रतिशत 0.45 था, लेकिन मुसलमानों की जन्मदर में 0.64 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई। गत् 20 वर्षों के दौरान मुसलमानों में परिवार नियोजन के लिए नसबंदी का प्रचलन लगभग 11.5 प्रतिशत बढ़ा है, जबकि हिंदुओं में यह 10 प्रतिशत के आसपास रहा है। यहां यह भी जानना जरूरी है कि जनसंख्या वृद्धि की दर को सामाजिक-आर्थिक परिस्थितयां सीधे-सीधे प्रभावित करती हैं। शिक्षित व संपन्न समाज में नियोजित परिवार की बानगी हमारे देश में ईसाई जनसंख्या के आंकड़े हैं । सन् 1950 से 60 के बीच भारत में ईसाईयों की जनसंख्या अपेक्षाकृत तेज रफ्तार से बढ़ी थी। भले ही कतिपय लोग इसे धर्माान्तरण के कारण कहें, लेकिन हकीकत यह है कि उस दशक में स्वास्थ्य और शिक्षाओं में सुधार होने के कारण ईसाईयों की मृत्यु दर कम हो गई थी। परंतु जन्म दर उतनी ही थी। 70 के दशक में ईसाईयों की जनसंख्या में बढ़ोतरी का आंकड़ा लगभग स्थिर हो गया, क्योंकि उस समाज को परिवार नियोजन का महत्व समझ में आ गया था। यह प्रक्रिया हिंदुओं में, ईसाईयों की तुलना में थोड़ी देर से शुरू हुई। मुसलमानों में इसे और भी देर से शुरू होना ही था, क्योंकि आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से मुसलमान समाज बेहद पिछड़ा हुआ है।

PRABAHT 6-9-15
एक बात और गौर करने लायक है कि बांग्लादेश  की सीमा से लगे पश्चिम बंगाल के छह, बिहार के चार और असम के 10 जिलों की आबादी के आंकड़ों पर निगाह डालें तो पाएंगे कि गत 30 वर्षों में यहां मुसलमानों की आबादी बहुत तेजी से बढऱ्ी -इतनी तेजी से कि वहां के बहुसंख्यक हिंदू, अब अल्पसंख्यक हो गए। असम और बंगाल के कुछ जिलों में तो मुस्लिम आबादी का उफान 100 फीसदी से अधिक हे। असल में ये अवैध विदेशी घुसपैठिये हैं। जाहिर है कि ये आबादी भी देश की जनगणना में जुड़ी है और यह बात सरकार में बैठे सभी लोग जानते हैं कि इस बढ़ोतरी का कारण गैरकानूनी रूप से हमारे यहां घुस आए बांग्लादेशी हैं। महज वोट की राजनीति और सस्ते श्रम (मजदूरी) के लिए इस घुसपैठ पर रोक नहीं लग पा रही है, और इस बढ़ती आबादी के लिए इस देश के मुसलमानों को कोसा जा रहा है। इस जंनसंख्या में भी स्पश्ट है कि देष में मुस्लिम आबादी की बढ़ोतरी के सबसे ज्यदा जिम्म्ेदार राज्य बंगाल और असम हैं।
एक यह भी खूब हल्ला होता है कि मुसलमान परिवार नियोजन का विरोध करता है - ‘बच्चे तो अल्लाह की नियामत हैं। उन्हें पैदा होने से रोकना अल्लाह की हुक्म उदूली होता है। यह बात इस्लाम  कहता है और तभी मुसलमान खूब-खूब बच्चे पैदा करते हैं।’ इस तरह की धारणा या यकीन देश में बहुत से लोगों को है और वे तथ्यों के बनिस्पत भावनात्मक नारों पर ज्यादा यकीन करने लगते हैं। वैसे तो जनगणना के आंकड़ों का विश्लेषण साक्षी है कि मुसलमानों की आबादी में अप्रत्याशित वृद्धि या उनकी जन्म दर अधिक होने की बात तथ्यों से परे है। साथ ही मुसलमान केवल भारत में तो रहते नहीं है या भारत के मुसलमानों की ‘शरीयत’ या ‘हदीस’ अलग से नहीं है। इंडोनेशिया, इराक, टर्की, पूर्वी यूरोप आदि के मुसलमान नसबंदी और परिवार नियोजन के सभी तरीके अपनाते हैं। भारत में अगर कुछ लोग  इसके खिलाफ है तो इसका कारण धार्मिक नहीं बल्कि अज्ञानता और अशिक्षा है। गांवों में ऐसे हिंदुओं की बड़ी संख्या है जो परिवार नियोजन के पक्ष में नहीं हैं।
यदि धार्मिक आधार पर देखें तो इस्लके का परिवार नियोजन विरोधी होने की बात महज तथ्यों के साथ हेराफेरी है।  फातिमा इमाम गजाली की मशहूर पुस्तक ‘इहया अल उलूम’ में पैगंबर के उस कथन की व्याख्या की है, जिसमें वे छोटे परिवार का संदेश देते हैं। हजरत मुहम्मद की नसीहत र्है -‘छोटा परिवार सुगमता है। उसके बड़े हो जाने का नतीजा र्है -गरीबी।’ दसवीं सदी में रज़ी की किताब ‘हवी’ में गर्भ रोकने के 176 तरीकों का जिक्र है। ये सभी तरीके कोई जादू-टोना नहीं, बल्कि वैज्ञानिक हैं। भारत में सूफियों के चारों इमार्म -हनफी, शाफी, मालिकी और हमबाली समय-समय पर छोटे परिवार की हिमायत पर तकरीर करते रहे हैं।
वैसे तो आज मुसलमानों का बड़ा तबका इस हकीकत को समझने लगा है, लेकिन  दुनियाभर में ‘‘इस्लामिक आतंकवाद’’ के नाम पर खड़े किए गए हौवे ने अल्पसंख्यकों में असुरक्षा की भावना और उसके कारण संगठत होने को मजबूर किया है। इसका फायदा कट्टरपंथी जमातें उठा रही हैं और इस्लाम की गलत तरीके से व्याख्या कर सीमित परिवार की सामाजिक व धार्मिक व्याख्या के विपरीत तरीके से कर रही हैं। यह तय है कि सीमित परिवर, स्वस्थ्य परिवार और षिक्षित परिवार की नीति को अपनाए बगैर भारत में मुसलमानों की व्यापक हालत में सुधार होने से रहा। लेकिन यह भी तय है कि ना तो मुसलमान कभी बहुसंख्यक हो पाएगा और ना ही इस्लाम सीमित परिवार का विरोध करता है।

पंकज चतुर्वेदी
यू जी-1, 3/186 राजेन्द्र नगर, सेक्टर-2
साहिबाबाद, गाजियाबाद
201005


शुक्रवार, 4 सितंबर 2015

Expansion of flood derailing economy of India

गुरुवार, 3 सितंबर 2015

Now they never come back !

आखिर कब लौटेंगे हमारे लापता फौजी!


1देश की नई पीढ़ी को तो शायद यह भी याद नहीं होगा कि 1971 के पाकिस्तान युद्ध में देश का इतिहास व विश्व का भूगोल बदलने वाले कई रणबांकुरे अभी भी पाकिस्तान की जेलों में नारकीय जीवन बिता रहे है्ं। उन जवानों के परिवारजन अपने लोगों के जिंदा होने के सबूत देते हैं, लेकिन भारत सरकार महज औपचारिकता निभाने से अधिक कुछ नहीं करती है। इस बीच ऐसे फौजियों की जिंदगी पर बालीवुड में कई फिल्में बन गई हैं और उन्हें दर्शकों ने सराहा भी। लेकिन वे नाम अभी भी गुमनामी के अंधेरे में हैं जिन्हें ना तो शहीद माना जा सकता है और ना ही गुमशुदा । भारत-पाक रिश्तों के लिए भारत हर समय ‘शिमला समझौत’ के अनुरूप बगैर किसी मध्यस्थ के बातचीत की दुहाई देता रहा है। यह बिडंबना भी है और शर्मनाक भी कि जिन फौजियों के खून से शिमला समझौते की इबारत लिखी गई थी, उन्हें सरकार और समाज दोनों भुला बैठे हैं। जब कभी भी पाकिस्तान से हमारे मधुर संबंधों की बात आती है, तब सीमा पर घुसपैठ और आतंकवाद या फिर व्यापार बढ़ाने पर जोरशोर से चर्चा होती है,
Peoples Samachar 3-9-15
लेकिन हमारी सरकार उन 70 रणबाकुरों को पूरी तरह बिसरा चुकी है, जिन्होंने 1965 और 1971 में इस देश की एकता-अखंडता का जिम्मा उठाया था व आज तक उनका कोई अता-पता नहीं है। हर साल संसद में यह स्वीकार किया जाता रहा है कि पाकिस्तान की जेलों में हमारे 70 सैनिक लापता हैं। जिनमें से 54 जवान 1971 के युद्ध बंदी हैं । उम्मीद के हर कतरे की आस में तिल-दर-तिल घुलते इन जवानों के परिवारजनए अब लिखा-पढ़ी करके थक गए हैं। 1971 के युद्ध के दौरान जिन 54 फौजियों के पाकिस्तानी गुनाहखानों में होने के दावे हमारे देशवासी करते रहे हैं, उनमें से 40 का पुख्ता विवरण उपलब्ध हैं । इनमें 6-मेजर, 1-कमाडंर, 2 लाइंग आफिसर, 5 कैप्टन, 15 μलाईट लेμिटनेंट, 1 सेकंड ला.लेट, 3 स्क्वाड्रन लीडर, 1 नेवी पालयट कमांडर, 3 लांसनायक, और 3 सिपाही हैं। एक लापता फौजी मेजर अशोक कुमार सूरी के पिता डॉ आरएलएस सूरी के पास तो कई पक्के प्रमाण हैं, जो उनके बेटे के पाकिस्तानी जेल में होने की कहानी कहते हैं। डॉ सूरी को 1974 व 1975 में उनके बेटे के दो पत्र मिले, जिसमें उसने 20 अन्य भारतीय फौजी अफसरों के साथ, पाकिस्तान जेल में होने की बात लिखी थी। 1979 में डॉ सूरी को किसी अंजान ने फोन करके बताया कि उनके पुत्र को पाकिस्तान में उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रदेश की किसी भूमिगत जेल में भेज दिया गया है। पाकिस्तान जेल में कई महीनों तक रहने के बाद लौटे एक भारतीय जासूस मोहन लाल भास्कर ने, लापता विंग कमांडर एचएस गिल को एक पाक जेल में देखने का दावा किया था। लापता μलाईट लैμिटनेंट वीवी तांबे को पाकिस्तानी फौज द्वारा जिंदा पकड़ने की खबर, ‘संडे पाकिस्तान आबजर्वर’ के पांच दिसंबर 1971 के अंक में छपी थी। वीर तांबे का विवाह बेडमिंटन की राष्टÑीय चैंपियन रहीं दमयंती से हुआ था । सेकंड लेμिटनेंट सुधीर मोहन सब्बरवाल जब लड़ाई के लिए घर से निकले थे, तब मात्र 23 वर्ष के थे । कैप्टन रवीन्द्र कौरा को अदभ्य शौर्य प्रदर्शन के लिए सरकार ने ‘वीर चक्र’ से सम्मानित किया था, लेकिन वे अब किस हाल में और कहां हैं, इसका जवाब देने में सरकार असफल रही है । पाकिस्तान के मरहूम प्रधानमंत्री जुल्फकार अली भुट्टो को फांसी दिए जाने के तथ्यों पर छपी एक किताब भारतीय युद्धवीरों के पाक जेल में होने का पुख्ता सबूत मानी जा सकती है। बीबीसी संवाददाता विक्टोरिया शोफील्ड की किताब ‘भुट्टो: ट्रायल एंड एक्सीक्यूशन’ के पेज 59 पर भुट्टो को फांसी पर लटकाने से पहले कोट लखपतराय जेल लाहौर में रखे जाने का जिक्र है। किताब में लिखा है कि भुट्टो को पास की बैरक से हृदयविदारक चीख पुकार सुनने को मिलती थीं । भुट्टो के एक वकील ने पता किया था कि वहां 1971 के भारतीय युद्ध बंदी है। जो लगातार उत्पीड़न के कारण मानसिक विक्षिप्त हो गए थे। संयुक्त राष्ट के विएना समझौते में साफ जिक्र है कि युद्ध के पश्चात, रेडक्रॉस की देखरेख में तत्काल सैनिक अपने-अपने देश भेज दिए जाएंगे । दोनों देश आपसी सहमति से किसी तीसरे देश को इस निगरानी के लिए नियुक्त कर सकते हैं। इस समझौते में सैनिक बंदियों पर क्रूरता बरतने पर कड़ी पाबंदी है। लेकिन भारत-पाक के मसले में यह कायदा-कानून कहीं दूरदूर तक नहीं दिखा । 1972 में अंतरराष्टÑीय रेडक्रास ने भारतीय युद्ध बंदियों की तीन लिस्ट जारी करने की बात कही थी । लेकिन सिर्फ दो सूची ही जारी की गई । गुमशुदा μलाइंग आफिसर सुधीर त्यागी के पिता आरएस त्यागी का दावा है कि उन्हें खबर मिली थी कि तीसरी सूची में उनके बेटे का नाम था। लेकिन वो सूची अचानक नदारद हो गई । विएना समझौता के तहत सैनिकों के मारे जाने बाबत जो प्रमाण होने चाहिए,पाकिस्तान सरकार उनमें से एक भी प्रमाण इन 54 जवानों के लिए दे नहीं पाई है। अलबत्ता उनके पाकिस्तान सरकार ने लापता फौजियों को जेल में पहचानने के लिए एक भारतीय प्रतिनिधि मंडल को आने का न्यौता दिया था । पाकिस्तान के मानवाधिकर कार्यकतार्ओं को भी जेल दिखाने के नाटक किए जाते रहे। लेकिन अपनी एक गलती छुपाने के लिए पाकिस्तान सरकार ने भारतीय अभिभावकों के सामने 160 साधारण भारतीय बंदी शिनाख्त के लिए पेश किए गए। इनमें से एक भी फौजी नहीं था। जेल अधिकारियों ने ही दबी जुबान में कह दिया कि उन्हें गलत जगह भेजा गया है। भारत की सरकार लापता फौजियों के परिवारजनों को सिर्फ आस दिए हैं कि उनके बेटे-भाई जीवित हैं । लेकिन कहां है किस हाल में हैं ? कब व कैसे वापस आएंगे? इसकी चिंता ना तो हमारे राजनेताओं को है और ना ही आला फौजी अफसरों को। काश 1971 की लड़ाई जीतने के बाद भारत ने पाकिस्तान के 93,000 बंदियों को रिहा करने से पहले अपने एक-एक आदमी को वापस लिया होता। पूरे पांच साल तक प्रधानमंत्री रहे पीवी नरसिंहराव भी भूल चुके थे कि उन्होंने जून 90 में बतौर विदेश मंत्री एक वादा किया था कि सरकार अपने बहादुर सैनिक अधिकारियों को वापिस लाने के लिए कोई भी कीमत चुकाने को तैयार हैं । लेकिन देश के सर्वोच्च पद पर रहने के दौरान अपनी कुर्सी बचाने के लिए हर कीमत चुकाने की व्यस्तता में उन्हें उन 70 सैनिक परिवारों के आंसुओं की नमी का एहसास नहीं हुआ । भारत सरकार के वरिष्ठ अधिकारी मानते हैं कि हमारी फौज के कई जवान पाक जेलों में नारकीय जीवन भोग रहे हैं। करनाल के करीम बख्श और पंजाब के जागीर सिंह का पाक जेलों में लंबी बीमारी व पागलपन के कारण निधन हो गया। 1971 की लड़ाई में पाकिस्तान द्वारा युद्ध बंदी बनाया गया सिपाही धर्मवीर 1981 में जब वापस आया तो पता लगा कि यातनाओं के कारण उसका मानसिक संतुलन पूरी तरह बिगड़ गया है। सरकार का दावा है कि कुछ युद्ध बंदी कोट लखपतराय लाहौर, फैसलाबाद, मुलतान, मियांवाली और बहावलपुर जेल में है । 39 साल के लंबे अंतराल में हमारा लंबा चौड़ा प्रशासनिक व गुप्तचर-तंत्र, उन वीरों की वापसी तो दूर की बात है, वो प्रमाण भी सरकारी तौर पर मुहैया नहीं करवा पाया है, जिसके बूते पर हमारे जवानों के सलामत पाकिस्तानी जेल में होने का दावा अंतरराष्टय स्तर पर किया जा सके। ऊपर से हर साल संसद में उनके जीवित होने का दावा करके यादों में खोए उनके परिवारजनों को पुन: छटपटाने को मजबूर किया जाता रहा है । या तो सरकार उन जवानों के वीरगति को प्राप्त होने की घोषणा कर दें, ताकि उनके परिवारजन रो- धोकर संतोष कर लें। अपने लाड़लों की आत्मा की शांति हेतु धार्मिक कर्मकांडों से निवृत हो जाएं। या फिर उनको वापिस लाने का कोई समयबद्ध कार्यक्रम तय किया जाए। सरकार को जान लेना चाहिए कि फौजी जवानों को राजनैतिक दांवपेंच का मोहरा बनाना आने वाले दिनों में देश की एकतां अखंडता के लिए घातक हो सकता है। आज जब अमेरिका के दवाब में भारत- पाक संबंधों की मधुरता के लिए मुददे नए सिरे से तय हो रहे हैं, तब हरेक राष्टवादी राजनेता का यह पहला कर्तव्य है कि उन मुददों में हमारे रणबांकुरों की सकुशल वापसी की शर्त को प्राथमिकता से शामिल किया जाए ।

The right to a dignified farewell and a new standard in medical world

  गरिमापूर्ण विदाई का अधिकार और चिकित्सा की नई मर्यादा पंकज चतुर्वेदी लगभग  12 साल असीम और अव्यक्त पीड़ा के साथ  जीवन जी रहे हरीश राणा अं...