My writings can be read here मेरे लेख मेरे विचार, Awarded By ABP News As best Blogger Award-2014 एबीपी न्‍यूज द्वारा हिंदी दिवस पर पर श्रेष्‍ठ ब्‍लाॅग के पुरस्‍कार से सम्‍मानित

सोमवार, 19 अक्टूबर 2015

Only law can not prevent sexual attacks on women

राज एक्सप्रेस मप्र २० अक्टूबर १५
मोमबत्ती की ऊष्मा वहां तक क्यों नहीं पहुंचती ?
पंकज चतुर्वेदी
यह सप्ताह चन रहा है नारी शक्ति की पूजा का और छोटी बच्चियों को अपने घर बुला कर उनके चरण पखारने का और ऐसे में बीते षुक्रवार को दिल्ली में दो बच्चियों के साथ कुकर्म हुआ- ढाई साल व चार साल की बच्चियां। अभी पिछले सप्ताह ही एक चार साल की बच्ची के साथ दरिंदों ने ना केवल मुंह काला किया था बल्कि उसे कई जगह ब्लैड मार कर घायल कर दिया था। दिल्ली से सटे नोएडा के छिजारसी गांव में उसी ष्ुाक्रवार की रात 12वीं में पढने वाली एक बच्ची ने इस लिए आत्महत्या कर ली, क्योंकि उसे गांव के कुछ षोहदे लगातार छेड़ रहे थे और उनके परिवार द्वारा पुलिस में कई बार गुहार लगाने के बावजूद लफंगों के हौंसल बुलंद ही रहे। चार साल पहले दिल्ली व देष के कई हिस्सों में उस अनाम अंजान ‘‘दामिनी’ के लिए खड़ा हुआ आंदोलन, आक्रोष, नफरत सभी कुछ विस्मृत हो चुका है। अभी दिल्ली के ईद-गिर्द एक सप्तहा में ही जो कुछ हो गया, उस पर महज कुछ सियासी तीरबाजी या स्थानीय गरीब लोगों द्वारा गुस्से का इजहार कहीं ना कहीं इस बात पर तो सवाल खड़े करता ही है कि कहीं विरोध एक नियोजित एकांकी होता है जिसके मंचन के पात्र, संावद, मीडिया आदि सभी कुछ कहीं बुनी जाती है और उसके निर्देषक महज सत्ता तक पुहंचने के लिए बच्चियों के साथ वहषियाना व्यवहार को मौके की तरह इस्तेमाल करते हैं। या फिर जंतर मंतर पर प्रज्जवलित होने वाली मोमबत्तिया केवल उन्ही लोेगों का झकझोर पा रही हैं जो पहले से काफी कुछ संवदेनषील है- समाज का वह वर्ग जिसे इस समस्या को समझना चाहिए -अपने पुराने रंग में ही है - इसमें आम लोग हैं, पुलिस भी है और समूचा तंत्र भी।
अभी हाल के ही दिनों में दिल्ली  कई-कई बार षर्मसार हुई। अगस्त में ओखला में एक सात साल की बच्ची के साथ षारीरिक षोशण कर उसके नाजुक अंगों को चाकू से गोद दिया गया। सितंबर में द्वारका में एक पांच साल की बच्ची के साथ कुछ ऐसा ही हुआ। अभी 11 अक्तूबर को केषवपुरम में एक झुग्गी बस्ती की बच्ची के साथ कुकर्म कर उसे रेल की पटरियों पर मरने को छोड़ दिया गया। यह तो बस फौरी घटनाएं हैं और वह भी महज दिल्ली की। दामिनी कांड में सजा होने के बाद व उससे पहले भी ऐसी दिल दहला देने वाली घटनाएं होती रहीं, उनमें से अधिकांष में पुलिस की लापरवाही चलती रही, वरिश्ठ नेता बलात्कारियों कों बचाने वाले बयान देते रहे । दिल्ली में दामिनी की घटना के बाद हुए देषभर के धरना-प्रदर्षनों में षायद करोड़ो मोमबत्तिया जल कर धुंआ हो गई हों, संसद ने नाबालिक बच्चियों के साथ छेडछाड़ पर कड़ा कानून भी पास कर दिया हो, निर्भया के नाम पर योजनाएं भी हैं लेकिन समाज के बड़े वर्ग पर दिलो-दिमाग पर औरत के साथ हुए दुव्र्यवहार को ले कर जमी भ्रांतियों की कालिख दूर नहीं हो पा रही हे। ग्रामीण समाज में आज भी औरत पर काबू रखना, उसे अपने इषारे पर नचाना, बदला लेने - अपना आतंक बरकरार रखने के तरीके आदि में औरत के षरीर को रोंदना एक अपराध नहीं बल्कि मर्दानगी से जोड़ कर ही देखा जाता हे। केवल कंुठा दूर करने या दिमागी परेषानियों से ग्रस्त पुरूश का औरत के षरीर पर बलात हमला महज महिला की अस्मत या इज्जत से जोड़ कर देखा जाता हे। यह भाव अभी भी हम लोगों में पैदा नहीं कर पा रहे हैं कि बलात्कार करने वाला मर्द भी अपनी इज्जत ही गंवा रहा है। हालांकि जान कर आष्चर्य होगा कि चाहे दिल्ली की 45 हजार कैदियों वाली तिहाड़ जेल हो या फिर दूरस्थ अंचल की 200 बंदियों वाली जेल ; बलात्कार के आरोप में आए कैदी की , पहले से बंद कैदियों द्वारा दोयम दर्जें का माना जाता है और उसकी पिटाई या टाॅयलेट सफाई या जमीन पर सोने को विवष करने जैसे स्वघोशित नियम लागू हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि जेल जिसे असामाजिक लोगों की बस्ती कहा जाता है, जब वहां बलात्कारी को दोयम माना जाता है तो बिरादरी-पंचायतें- पुलिस इस तरह की धारणा क्यों विकसित नहीं कर पा रही हैं। खाप, जाति बिरादरियां, पंचायतें जिनका गठन कभी समाज के सुचारू संचालन के इरादे से किया गया था अब समानांतर सत्ता या न्याय का अड्डा बन रही है तो इसके पीछे वोट बैंक की सियासत होना सर्वमान्य तथ्य है।
ऐसा नही है कि समय-समय पर  बलात्कार या षोशण के मामले चर्चा में नहीं आते हैं और समाजसेवी संस्थाएं इस पर काम नहीं करती हैं, । इक्कीस साल पहले भटेरी गांव की साथिन भंवरी देवी  को बाल विवाह के खिलाफ माहौल बनाने की सजा सवर्णों द्वारा बलात्कार के रूप में दी गई थीं उस ममाले को कई जन संगठन सुप्रीम कोर्ट तक ले गए थे और उसे न्याय दिलवाया था। लेकिन जान कर आष्चर्य होगा कि वह न्याय अभी भी अधूरा है । हाई कोर्ट से उस पर अंतिम फैसला नहीं आ पाया है । इस बीच भंवरी देवी भी साठ साल की हो रही हैं व दो मुजरिमों की मौत हो चुकी है। ऐसा कुछ तो है ही जिसके चलते लोग इन आंदालनो, विमर्षों, तात्कालिक सरकारी सक्रिताओं को भुला कर गुनाह करने में हिचकिचाते नहीं हैं। आंकडे गवाह हैं कि आजादी के बाद से बलात्कार के दर्ज मामलों में से छह फीसदी में भी सजा नहीं हुई। जो मामले दर्ज नहीं नहीं हुए वे ना जाने कितने होंगे।
फांसी की मांग, नपुंसक बनाने का षोर, सरकार को झुकाने का जोर ; सबकुछ अपने अपने जगह लाजिमी हैं लेकिन जब तक बलात्कार को केवल औरतों की समस्या समझ कर उस पर विचार किया जाएगा, जब तक औररत को समाज की समूची ईकाई ना मान कर उसके विमर्ष पर नीतियां बनाई जाएंगी; परिणा अधूरे ही रहें्रे। फिर जब तक सार्वजनिक रूप से मां-बहन की गाली बकना , धूम्रपान की ही तरह प्रतिबंधित करने जैसे आघारभूत कदम नहीं उठाए जाते  , अपने अहमं की तुश्टि के लिए औरत के षरीर का विमर्ष सहज मानने की मानवीय वत्त्ृिा पर अंकुष नहीं लगाया जा सकेगा। भले ही जस्टिस वर्मा कमेटी सुझाव दे दे, महिला हेल्प लाईन षुरू हो जाए- एक तरफ से कानून और दूसरी ओर से समाज के नजरिये में बदलाव की कोषिष एकसाथ किए बगैर असामनता, कुंठा, असंतुश्टि वाले समाज से ‘‘रंगा-बिल्ला’’ या ‘‘राम सिंह-मुकेष’’ की पैदाईष को रोका नहीं जा सकेगा।

रविवार, 18 अक्टूबर 2015

pulses away from AAM AADMI

दाल रोटी खाओ प्रभु के गुण गाओ ....?


पीपुल्स समाचार मध्य प्रदेश १९ अक्टूबर १५
इस साल की शुरूआत में ही मौसम विभाग ने कम बारिष की चेतावनी दी थी और उसके बाद बेमौसम बारिश ने देशभर में खेती-किसानी का जो नुकसान हुआ था उसी समय कृषि मंत्रालय ने घोषणा कर दी थी कि इसका असर दाल पर जबरदस्त होगा। यह पहली बार भी नहीं हो रहा है कि मांग की तुलना में दाल की आपूर्ति या उत्पादन कम होने से बाजार में दाल के दामों ने हाहाकार मचाया है। प्रत्येक वर्ष की तरह इस साल भी दाल आयात करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई, लेकिन यहां यह समझना जरूरी है कि विदेशों से दाल मंगवा कर ना तो हम आम आदमी की थाली में दाल की वापसी कर सकते हैं और न ही इसकी कीमतों पर नियंत्रण। जरूरत इस बात की है कि हमारे खेतों में दाल की बुवाई का रबवा बढ़े साथ ही किसान को दाल की उपज के लिए प्रोत्साहन मिले। भारत में दालों की खपत 220 से 230 लाख टन की सालाना, जबकि कृषि मंत्रालय मार्च में कह चुका था कि इस बार दाल का उत्पादन 184.3 लाख टन रह सकता है जो पिछले साल के उत्पादन 197.8 लाख टन से बेहद कम है। दाल की कमी होने से इसके दाम भी बढे, नजीतन आम आदमी प्रोटीन की जरूरतों की पूर्ति के लिए दीगर अनाजों और सब्जियों पर निर्भर होना शुरू कर दिया। जाहिर है अब दूसरे अनाजों व सब्जियों में भी कमी होगी और दाम में उनके दाम बढ़ेंगे।
सनद रहे कि गत 25सालों से हम हर साल दालों का आयात कर रहे हैं, लेकिन दाल के उत्पादन और इसकी खेती में रकबा बढ़ाने की किसी ठोस योजना नहीं बनाई जा रही है। यहां जानना जरूरी है कि भारत दुनियाभर में दाल का सबसे बड़ा खपतकर्ता, पैदा करने वाला और आयात करने वाला देश है। दुनिया में दाल के कुल खेतों का 33 प्रतिशत हमारे यहां है जबकि खपत 22 फीसदी है। इसके बावजूद अब वे दिन सपने हो गए है जब आम-आदमी को ‘‘दाल-रोटी खाओ, प्रभ्ुा के गुण गाओ’’ कह कर कम में ही गुजारा करने की सीख दी जाती थी। आज दाल अलबत्ता तो बाजार में मांग की तुलना में बेहद कम उपलब्ध है, और जो उपलब्ध भी है तो उसकी कीमत चुकाना आम-आदमी के बस के बाहर हो गया है। वर्ष 1965-66 में देश का दलहन उत्पादन 99.4 लाख टन था, जो 2006-07 आते-आते 145.2 लाख टन ही पहुंच पाया। सन 2008-09 में देश के 220.9 लाख हैक्टर खेतों में 145.7 लाख टन दाल पैदा हो सकी। इस अवधि में देश की जनसंख्या में कई-कई गुना वृद्धि हुई है, जाहिर है आबादी के साथ दाल की मांग भी बढ़ी। हरित क्रांति के दौर में दालों की उत्पादकता दर, अन्य फसलों की तुलना में बेहद कम रही है । दलहन फसलों की बुवाई के रकबे में वृद्धि न होना भी चिंता की बात है। सन 1965-66 में देश के 227.2 लाख हेक्टेयर खेतों पर दाल बोई जाती थी, सन 2005-06 आते-आते यह घट कर 223.1 लाख हेक्टेयर रह गया। वर्ष 1985-86 में विश्व में दलहन के कुल उत्पादन में भारत का योगदान 26.01 प्रतिशत था, 1986-87 में यह आंकड़ा 19.97 पर पहुंच गया। सन 2000 आतेआत् ो इसमें कुछ वृद्धि हुई और यह 22.64 फीसदी हुआ। लेकिन ये आंकड़े हकीकत में मांग से बहुत दूर रहे। पिछले साल देश के बाजारों में दालों के रेट बहुत बढ़े थे, तब आम आदमी तो चिल्लाया था, लेकिन आलू-प्याज के लिए कोहराम काटने वाले राजनैतिक दल चुप्पी साधे रहे। पिछले साल सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी एमएमटीसी ने नवंबर तक 18,000 टन अरहर और मसूर की दाल आयात करने के लिए वैश्विक टेंडर को मंजूरी दी थी। माल आया भी, उधर हमारे खेतों ने भी बेहतरीन फसल उगली। एक तरफ आयातित दाल बाजार में थी, सो किसानों को अपनी अपेक्षित रेट नहीं मिला। दाल के उत्पादन को प्रोत्साहित करने के इरादे से केंद्र सरकार ने सन 2004 में इंटीग्रेटेड स्कीम फार आईल सीड, पल्सेज, आईल पाम एंड मेज (आईएसओपीओएम) नामक योजना शुरू की थी । इसके तहत दाल बोने वाले किसानों को सबसिडी के साथ-साथ कई सुविधाएं देने की बात कही गई थी । वास्तव में यह योजना नारा बनकर रह गई। इससे पहले चौथी पंचवर्षीय योजना में ‘‘इंटेंसिव पल्सेस डिस्ट्रीक्ट प्रोग्राम’’ के माध्यम से दालों के उत्पादन को बढ़ावा देने का संकल्प लाल बस्तों से उबर नहीं पाया। सन 1991 में शुरू हुई राष्ट्रीय दलहन विकास परियोजना भी आधे-अधूरे मन से शुरू योजना थी, उसके भी कोई परिणाम नहीं निकले। जहां सन 1950-51 में हमारे देश में दाल की खपत प्रति व्यक्ति/प्रति दिन 61 ग्राम थी, वह 2009-10 आते-आते 36 ग्राम से भी कम हो गई। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) की मानें तो हमारे देश में दलहनों के प्रामाणिक बीजों की सालाना मांग 13 लाख क्विंटल है, जबकि उपलब्धता महज 6.6 लाख क्विंटल। यह तथ्य बानगी है कि सरकार दाल की पैदावार बढ़ाने के लिए कितनी गंभीर है। यह दुख की बात है कि भारत , जिसकी अर्थव्यवस्था का आधार कृषि है, वहां दाल जैसी मूलभूत फसलों की कमी को पूरा करने की कोई ठोस कृषि-नीति नहीं है। कमी हो तो बाहर से मंगवा लो, यह तदर्थवाद देश की परिपक्व कृषि-नीति का परिचायक कतई नहीं है। नेशनल सैंपल सर्वे के एक सर्वेक्षण के मुताबिक आम भारतीयों के खाने में दाल की मात्रा में लगातार हो रही कमी का असर उनके स्वास्थ्य पर दिखने लगा है। इसके बावजूद दाल की कमी कोई राजनैतिक मुद्दा नहीं बन पा रहा है। शायद सभी सियासती पार्टियों की रूचि देश के स्वास्थ्य से कहीं अधिक दालें बाहर से मंगवाने में हैं। तभी तो इतने शोर-शराबे के बावजूद दाल के वायदा कारोबार पर रोक नहीं लगाई जा रही है। इससे भले ही बाजार भाव बढ़े, सटोरियों को बगैर दाल के ही मुनाफा हो रहा है।

शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2015

Import can not fulfil demand of pulses

आयात से नहीं भरेगा दाल का कटोरा

पंकज चतुर्वेदी

वरिष्ठ पत्रकार
लोकमत समाचार,महराष्‍ट्र 17अक्‍तूबर15
साल की शुरुआत में ही मौसम विभाग ने कम बारिश की चेतावनी दी थी और उसके बाद बेमौसम बारिश से देशभर में खेती-किसानी का जो नुकसान हुआ था, उसी समय कृषि मंत्रालय ने घोषणा कर दी थी कि इसका असर दाल पर जबर्दस्त होगा. यह पहली बार नहीं हो रहा है कि मांग की तुलना में दाल की आपूर्ति या उत्पादन कम होने से बाजार में दाल के दामों ने हाहाकार मचाया है. हर बार की तरह इस साल भी दाल आयात करने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी गई लेकिन यहां यह समझना जरूरी है कि विदेशों से दाल मंगवाकर न तो हम आम आदमी की थाली में दाल की वापसी कर सकते हैं और न ही इसकी कीमतों पर नियंत्रण. जरूरत इस बात की है कि हमारे खेतों में दाल की बुवाई का रकबा बढे. व किसान को भी दाल उगाने के लिए प्रोत्साहन मिले. 
भारत में दालों की खपत 220 से 230 लाख टन सालाना है, जबकि कृषि मंत्रालय मार्च में कह चुका था कि इस बार दाल का उत्पादन 184. 3 लाख टन रह सकता है जो पिछले साल के उत्पादन 197. 8 लाख टन से काफी कम है. दाल की कमी होने से इसके दाम भी बढे., नतीजतन आम आदमी ने प्रोटीन की जरूरतों की पूर्ति के लिए दीगर अनाजों और सब्जियों पर निर्भर होना शुरू कर दिया. इस तरह दूसरे अनाजों व सब्जियों की भी कमी और दाम में बढ.ोत्तरी होगी. सनद रहे कि गत 25 सालों से हम हर साल दालों का आयात तो कर रहे हैं लेकिन दाल में आत्मनिर्भर बनने के लिए इसका उत्पादन और रकबा बढ.ाने की कोई ठोस योजना नहीं बन पा रही है. 
यहां जानना जरूरी है कि भारत दुनियाभर में दाल का सबसे बड.ा खपतकर्ता, पैदा करने वाला और आयात करने वाला देश है. दुनिया में दाल के कुल खेतों का 33 प्रतिशत हमारे यहां है जबकि खपत 22 फीसदी है. इसके बावजूद अब वे दिन सपने हो गए हैं जब आम-आदमी को 'दाल-रोटी खाओ, प्रभुा के गुण गाओ' कहकर कम में ही गुजारा करने की सीख दे दी जाती थी. आज दाल बाजार में मांग की तुलना में बेहद कम उपलब्ध है और जो उपलब्ध भी है उसकी कीमत चुकाना आम-आदमी के बस के बाहर है. नेशनल सैंपल सर्वे के एक सर्वेक्षण के मुताबिक आम भारतीयों के खाने में दाल की मात्रा में लगातार हो रही कमी का असर उनके स्वास्थ्य पर दिखने लगा है. इसके बावजूद दाल की कमी राजनैतिक मुद्दा नहीं बन पा रहा है. ल्ल■ आम भारतीयों के खाने में दाल की मात्रा में लगातार हो रही कमी का असर उनके स्वास्थ्य पर दिखने लगा है.








Hindustan 

हिंदुस्‍तान,17अक्‍तूबर15
यह पहली बार भी नहीं हो रहा है कि मांग की तुलना में दाल की आपूर्ति या उत्पादन कम होने से बाजार में दाल के दामों ने हाहाकार मचाया है। हर बार की तरह इस साल भी दाल आयात की प्रक्रिया शुरू हो गई है, लेकिन सच यह है कि विदेश से दाल मंगवाकर न तो हम आम आदमी की थाली में दाल की वापसी कर सकते हैं, और न ही इसकी कीमतों पर नियंत्रण।

समाधान एक ही है कि हमारे खेतों में दाल की बुवाई का रकबा बढ़े व किसान को दाल उगाने के लिए प्रोत्साहन मिले। पिछले 25 साल से हम दालों का आयात कर रहे हैं, लेकिन उनका उत्पादन और रकबा बढ़ाने की कोई ठोस योजना नहीं बना पाए।

भारत में दालों की खपत 220 से 230 लाख टन सालाना है, जबकि कृषि मंत्रालय मार्च में कह चुका था कि इस बार दाल का उत्पादन 184.3 लाख टन रह सकता है, जो पिछले साल के उत्पादन 197.8 लाख टन से काफी कम है। दाल की कमी होने से इसके दाम भी बढ़े, और आम आदमी ने प्रोटीन की जरूरत के लिए दीगर अनाजों व सब्जियों पर निर्भर होना शुरू कर दिया।

इससे इन अनाजों और सब्जियों की भी कमी व दाम में बढ़ोतरी होगी। भारत दुनिया में दाल का सबसे बड़ा खपतकर्ता, पैदा करने वाला और आयात करने वाला देश है। 1965-66 में देश का दलहन उत्पादन 99.4 लाख टन था, जो 2006-07 के आते-आते 145.2 लाख टन ही पहुंच पाया। जबकि इस दौरान आबादी में कई गुना बढ़ोतरी हुई। इस दौरान गेहूं की फसल 104 लाख टन से बढ़कर 725 लाख टन और चावल की पैदावार 305.9 लाख टन से बढ़कर 901.3 लाख टन हो गई।

पिछले साल भी बाजार में दालों के रेट बहुत बढ़े थे, तब आम आदमी तो चिल्लाया था, लेकिन आलू-प्याज के लिए कोहराम काटने वाले राजनीतिक दल चुप्पी साधे रहे। पिछले साल सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी एमएमटीसी ने नवंबर तक 18,000 टन अरहर और मसूर की दाल आयात करने के लिए वैश्विक टेंडर को मंजूरी दी थी। उधर हमारे खेतों ने भी बेहतरीन फसल उगली। आयातित दाल बाजार में थी, सो किसानों को अपेक्षित रेट नहीं मिला। निराशा की हालत में किसानों ने अगली फसल में  दालों से एक बार फिर मुंह मोड़ लिया।

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की बात पर गौर करें, तो देश में दलहनों के प्रामाणिक बीजों की हर साल मांग 13 लाख कुंतल है, जबकि उपलब्धता महज 6.6 लाख कुंतल। यह बताता है कि सरकार दाल की पैदावार बढ़ाने के लिए कितनी गंभीर है। नेशनल सैंपल सर्वे के के अध्ययन बताते हैं कि आम भारतीयों के खाने में दाल की मात्रा में लगातार हो रही कमी का असर उनके स्वास्थ्य पर भी दिखने लगा है। इसके बावजूद दाल की कमी देश में कोई राजनीतिक मुद्दा नहीं बन पा रही है। शायद सभी सियासी पार्टियों की रुचि देश के स्वास्थ्य से कहीं अधिक दालें बाहर से मंगवाने में है। 

मंगलवार, 13 अक्टूबर 2015

Najafgarh lake: A forbidden Treasure of water

इस प्यास को हमने ही बुलाया है

रविवार, 11 अक्टूबर 2015

Bisahada establish example for t India

·

बिसाहडा ने दिया संदेश दुनिया को बता दो


बिसाहड़ा निवासी हकीमू की दो बेटियों रेशमा और जैतून की बारात आ चुकी हैं। बारात पड़ोसी गांव प्यावली और दूसरी सादुदल्ला पुर से आई है। रेशमा की शादी प्यावली गांव के रहने वाले मोबिन से मुकर्रर हुई है, जबकि जैतून की शादी सदल्लापुर के युवक नाजिम से तय हुई है।
जिस समय सारे टीवी चैनल भारत की कानपुर में दक्षणि अफ्रीका के हाथों हार पर मातम मना रहे थे, ठीक उसी समय दादरी का वह बिसाहडा गांव, जाे अभी एक सप्‍ताह पहले तक दुनिया में भारत के लिए शर्म का कारण बना था, उसने जता दिया कि असली भारत अपसी सौहार्द , समन्‍वय और स्‍नेह का हैा गांव के ही दिवंगत इखलाक के पडोसी मुहम्‍म्‍द हकीम की दो बेटियों का निकाह पूरे गांव ने मिल जुल कर कियाा
गांव में तनाव को देखकर दुल्हों के घर वालों ने बिसाहड़ा में बारात लाने से इंकार कर दिया था। तीनों और के लोगों ने बैठकर तय किया कि दादरी के किसी मैरिज होम में शादी कर ली जाएगी। जब यह बात गांव में पहुंची तो गांव के बुजुर्ग सहमत नहीं हुए। बुजुर्गों ने बीते शुक्रवार को पंचायत की। फैसला दिया कि बेटी हकीमू की नहीं हैं, बिसाहड़ा गांव की हैं। अगर शादी दादरी में हुई तो गांव के माथे पर एक और कलंक लग जाएगा। गांव से ही बेटियों की डोली उठेंगी।
और आज ऐसा हुआ भी पूरे गांव ने बारात का स्‍वागत किया, बारात को सरकारी स्‍कूल में ठहराया गया, हिंदुओं ने तीन हजार लोगों के लिए शाकाहारी खाना बनवाया और बारातियों के साथ साथ सभी ने खाना साथ खाया, प्रशासन और पुलिस के साथ साथ गांव के लगभग हर घर ने बच्चियों को भेंट दी, इस शादी पर आया खर्च और स्‍वागत सत्‍कार पूरी तरह गांव के हिंदुओं ने ही कियाा
गावं के लोग बधाई के पाञ हैं कि उनके कारण हम दुनिया को बता पा रहे हैं कि इखलाक वाला दुखद, शर्मनाक हादसा हो गया, लेकिन हम उससे उबरना भी जानते हैा सच में लगा कि प्रमेचंद की कहानी के ''अलगू चौधरी व शेख जुम्‍मन'' का गांव है बिसाहडा
यही नहीं आज पूरे गांव के हिंदुओं ने चंदा कर गांव में ही मस्जिद बनाने का भी एलान कर दियाा
हां, ऐसा नहीं है कि शैतान किस्‍म के लेाग अभी भी चुप बैठे हैं, वे ''कथित निर्दोश'' लेागों को फंसाने के आरोप में एक जाति वि शेष की पंचायत, आसपास के गांव वलों को जोडने की कवायद भी कर रहे हैं , यदि ऐसे लेाग फिर जमा होते हें तो यह प्रशासन की असफलता होगी, गांव के लोगों ने तो अपना काम कर दिया हैा
मैंने कभी नहीं कहा कि मेरी किसी पोस्‍ट को साझा करें, लेकिन मैं चाहूंगा कि इसे अंग्रेजी, उर्द व अन्‍य भाषाओं में अनुवाद भी करें व साझा करें ताकि दुनिया जान लें कि असलील बिसाहडा कैसेा है
सलाम बिसाहडा

शनिवार, 10 अक्टूबर 2015

A SUCSSESFUL DECADE OF RIGHT TO INFORMATION ACT-2005 11th October 2015

देश को आजादी के बाद सबसे बडी आजादी देने वाले कानून के दस साल हो गए, जिलसके चलते सरकार का लेखा जोखा आम आदमी को उपलब्‍ध होने का जरिया खुला, एक ऐसा कानून जिससे अफसरान व दफतर खौफ खाते हैं और कहा जा सकता है कि देश की दूसरी असली क्रांति का जनक यही कानून है , लंबी लोकतांञिक बहस, विमर्श, पारदर्शिता के बाद 12 अक्‍तूबर 2005 को सूचना का अधिकार अर्थात राईट टू इन्फाॅरमेशन कानून जम्‍मू कश्‍मीर के अलावा पूरे देश में लागू हुआ था, आरटीआई का अर्थ है सूचना का अधिकार और इसे संविधान की धारा 19 (1) के तहत एक मूलभूत अधिकार का दर्जा दिया गया है। धारा 19 (1), जिसके तहत प्रत्‍येक नागरिक को बोलने और अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता दी गई है और उसे यह जानने का अधिकार है कि सरकार कैसे कार्य करती है, इसकी क्‍या भूमिका है, इसके क्‍या कार्य हैं आदि।इसकी सफलता की लाखों कहानियां गांव कस्‍बों तक फैली हैं , इस दिन को याद करें, ''सूचना का अधिकार अर्थात राईट टू इन्फाॅरमेशन'' के एक दशक पूरा होने पर बधाई, शुभकामनाएं
गाय गोबर, दंगों को याद करने वालों जरा कुछ सकारात्‍मक अतीत को भी याद कर लिया करो

Drought and migration become regular feature of Bundelkhand

पानीदार बुन्देलखण्ड सूख रहा है

इंटरनेशनल नेचुरल डिजास्टर रिडक्शन दिवस, 13 अक्टूबर 2015 पर विशेष


.मध्यप्रदेश की सरकार ने अभी पांच जिलों की 33 तहसीलों को सूखग्रस्त घोषित कर दिया है जिसमें बुंदेलखंड के टीकमगढ़ जिले की सभी तहसीलें हैं। टीकमगढ जिले के जतारा ब्लाक के जल संसाधन विभाग के तहत आने वाले 26 तालबों में अभी एक फुट पानी भी नहीं है। छतरपुर के हालात भी बदतर हैं।लेकिन हालात छतरपुर व पन्ना के भी कम खतरनाक नहीं है।। गांव-गांव में हैंडपंप सूख गए हैं
MP Jansandesh 17-10-15
और कस्बों में पानी के लिए आए रोज झगड़े हो रहे हैं। टीकमगढ़ जिले के आधे से ज्यादा गांव वीरान हो गए है। तो रेलवे स्टेषन से सटे कस्बों- खजुराहो, हरपालपुर, मउरानीपुर, बीना आदि के प्लेटफार्म पूरी गृहस्थी पोटली में बांधे हजारों लोगों से पटे पड़े हैं जो पानी के अभाव में गांव छोड़कर पेट पालने के लिए दिल्ली, पंजाब या लखनउ जा रहे हैं। आमतौर पर ऐसा पलायन दीवाली के बाद होता था, लेकिन इस बार खाली पेट व सूखा गला दोना ही मजबूर कर रहा है अपनेद पुष्तैनी घरों से दूर दीवाली के दीये जलाने को। आषाढ़ में जो बरसा बस वही था, लगभग पूरा सावन-भादो निकल गया है और जो छिटपुट बारिश हुई है, उससे बुन्देलखण्ड फिर से अकाल-सूखा की ओर जाता दिख रहा है। यहाँ सामान्य बारिश का तीस फीसदी भी नहीं बरसा, तीन-चौथाई खेत बुवाई से ही रह गए और कोई पैंतीस फीसदी ग्रामीण अपनी पोटलियाँ लेकर दिल्ली-पंजाब की ओर काम की तलाश में निकल गए हैं।

PRABHAT, MEERUT 18-10-15
मनरेगा में काम करने वाले मजदूर मिल नहीं रहे हैं। ग्राम पंचायतों को पिछले छह महीने से किये गए कामों का पैसा नहीं मिला है सो नए काम नहीं हो रहे हैं। सियासतदाँ इन्तजार कर रहे हैं कि कब लोगों के पेट से उफन रही भूख-प्यास की आग भड़के और उस पर वे सियासत की हांडी खदबदाएँ। हालांकि बुन्देलखण्ड के लिये यह अप्रत्याशित कतई नहीं है, बीते कई सदियों से यहाँ हर पाँच साल में दो बार अल्प वर्षा होती ही है। 

गाँव का अनपढ़ भले ही इसे जानता हो, लेकिन हमारा पढ़ा-लिखा समाज इस सामाजिक गणित को या तो समझता नहीं है या फिर नासमझी का फरेब करता है, ताकि हालात बिगड़ने पर ज्यादा बजट की जुगाड़ हो सके। ईमानदारी से तो देश का नेतृत्व बुन्देलखण्ड की असली समस्या को समझ ही नहीं पा रहे हैं।

बुन्देलखण्ड की असली समस्या अल्प वर्षा नहीं है, वह तो यहाँ सदियों, पीढ़ियों से होता रहा है। पहले यहाँ के बाशिन्दे कम पानी में जीवन जीना जानते थे। आधुनिकता की अंधी आँधी में पारम्परिक जल-प्रबन्धन तंत्र नष्ट हो गए और उनकी जगह सूखा और सरकारी राहत जैसे शब्दों ने ले ली। 

अब सूखा भले ही जनता पर भारी पड़ता हो, लेकिन राहत का इन्तजार सभी को होता है- अफसरों, नेताओं सभी को। इलाके में पानी के पारम्परिक स्रोतों का संरक्षण व पानी की बर्बादी को रोकना, लोगों को पलायन के लिये मजबूर होने से बचाना और कम पानी वाली फसलों को बढ़ावा देना; महज ये तीन उपचार बुन्देलखण्ड की तकदीर बदल सकते हैं।

मध्य प्रदेश के सागर सम्भाग के पाँच, दतिया, और जबलपुर, सतना जिलों का कुछ हिस्सा और उत्तर प्रदेश के झाँसी सम्भाग के सभी सात जिले बुन्दलेखण्ड के पारम्परिक भूभाग में आते हैं। बुन्देलखण्ड की विडम्बना है कि एक सांस्कृतिक और सामाजिक एक रूप भौगोलिक क्षेत्र होने के बावजूद यह दो राज्यों- मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में बँटा हुआ है। 

कोई 1.60 लाख वर्ग किमी क्षेत्रफल के इस इलाके की आबादी तीन करोड़ से अधिक है। यहाँ हीरा, ग्रेनाईट की बेहतरीन खदानें हैं, जंगल तेंदू पत्ता, आँवला से पटे पड़े हैं, लेकिन इसका लाभ स्थानीय लोगों को नहीं मिलता है। दिल्ली, लखनऊ और उससे भी आगे पंजाब तक जितने भी बड़े निर्माण कार्य चल रहे हैं उसमें अधिकांश में ‘‘गारा-गुम्मा’’ (मिट्टी और ईंट) का काम बुन्देलखण्डी मजदूर ही करते हैं। 

शोषण, पलायन और भुखमरी को वे अपनी नियति समझते हैं। जबकि खदानों व अन्य करों के माध्यम से बुन्देलखण्ड सरकारों को अपेक्षा से अधिक कर उगाह कर देता है, लेकिन इलाके के विकास के लिये इस कर का 20 फीसदी भी यहाँ खर्च नहीं होता है।

बुन्देलखण्ड के पन्ना में हीरे की खदानें हैं, यहाँ का ग्रेनाईट दुनिया भर में धूम मचाए हैं। यहाँ की खदानों में गोरा पत्थर, सीमेंट का पत्थर, रेत-बजरी के भण्डार हैं। इलाके के गाँव-गाँव में तालाब हैं, जहाँ की मछलियाँ कोलकाता के बाजार में आवाज लगा कर बिकती हैं। इस क्षेत्र के जंगलों में मिलने वाले अफरात तेंदू पत्ता को ग्रीन-गोल्ड कहा जाता है। 

आँवला, हर्र जैसे उत्पादों से जंगल लदे हुए हैं। लुटियन की दिल्ली की विशाल इमारतें यहाँ के आदमी की मेहनत की साक्षी हैं। खजुराहो, झाँसी, ओरछा जैसे पर्यटन स्थल साल भर विदेशी घुमक्कड़ों को आकर्षित करते हैं। अनुमान है कि दोनों राज्यों के बुन्देलखण्ड मिलाकर कोई एक हजार करोड़ की आय सरकार के खाते में जमा करवाते हैं, लेकिन इलाके के विकास पर इसका दस फीसदी भी खर्च नहीं होता है।

बुन्देलखण्ड के सभी कस्बे, शहर की बसाहट का एक ही पैटर्न रहा है - चारो ओर ऊँचे-ऊँचे पहाड़, पहाड़ की तलहटी में दर्जनों छोटे-बड़े ताल-तलैया और उनके किनारों पर बस्ती। टीकमगढ़ जैसे जिले में अभी तीन दशक पहले तक हजार से ज्यादा तालाब थे। पक्के घाटों वाले हरियाली से घिरे व विशाल तालाब बुन्देलखड के हर गाँव- कस्बे की सांस्कृतिक पहचान हुआ करते थे। 

ये तालाब भी इस तरह थे कि एक तालाब के पूरा भरने पर उससे निकला पानी अगले तालाब में अपने आप चला जाता था, यानी बारिश की एक-एक बूँद संरक्षित हो जाती थी। चाहे चरखारी को लें या छतरपुर को सौ साल पहले वे वेनिस की तरह तालाबों के बीच बसे दिखते थे। अब उपेक्षा के शिकार शहरी तालाबों को कंक्रीट के जंगल निगल गए। रहे- बचे तालाब शहरों की गन्दगी को ढोनेे वाले नाबदान बन गए।

गाँवों की अर्थ व्यवस्था का आधार कहलाने वाले चन्देलकालीन तालाब सामन्ती मानसिकता के शिकार हो गए। सनद रहे बुन्देलखण्ड देश के सर्वाधिक विपन्न इलाकों में से है। यहाँ ना तो कल-कारखाने हैं और ना ही उद्योग-व्यापार। महज खेती पर यहाँ का जीवनयापन टिका हुआ है। 

कुछ साल पहले ललितपुर जिले में सीटरस फलों जैसे संतरा, मौसम्बी, नीबू को लगाने का सफल प्रयोग हुआ था। वैज्ञानिकों ने भी मान लिया था कि बुन्देलखण्ड की पथरीली व अल्प वर्षा वाली जमीन नागपुर को मात कर सकती है। ना जाने किस साज़िश के तहत उस परियोजना का न तो विस्तार हुआ और ना ही ललितपुर में ही जारी रहा।

कभी पुराने तालाब जीवनरेखा कहलाते थे। समय बदला और गाँवों में हैंडपम्प लगे, नल आये तो लोग इन तालाबों को भूलने लगे। कई तालाब चौरस मैदान हो गए कई के बन्धान टूट गए। तो जो रहे बचे, तो उनकी मछलियों और पानी पर सामन्तों का कब्जा हो गया। तालाबों की व्यवस्था बिगड़ने से ढीमरों की रोटी गई। तालाब से मिलने वाली मछली, कमल-गट्टे, यहाँ का अर्थ-आधार हुआ करते थे। वहीं किसान सिंचाई से वंचित हो गया। कभी तालाब सूखे तो भूगर्भ जल का भण्डार भी गड़बड़ाया।

बुन्देलखण्ड के सभी कस्बे, शहर की बसाहट का एक ही पैटर्न रहा है - चारो ओर ऊँचे-ऊँचे पहाड़, पहाड़ की तलहटी में दर्जनों छोटे-बड़े ताल-तलैया और उनके किनारों पर बस्ती। टीकमगढ़ जैसे जिले में अभी तीन दशक पहले तक हजार से ज्यादा तालाब थे। पक्के घाटों वाले हरियाली से घिरे व विशाल तालाब बुन्देलखड के हर गाँव- कस्बे की सांस्कृतिक पहचान हुआ करते थे। ये तालाब भी इस तरह थे कि एक तालाब के पूरा भरने पर उससे निकला पानी अगले तालाब में अपने आप चला जाता था, यानी बारिश की एक-एक बूँद संरक्षित हो जाती थी।आज के अत्याधुनिक सुविधा सम्पन्न भूवैज्ञानिकों की सरकारी रिपोर्ट के नतीजों को बुन्देलखण्ड के बुजुर्गवार सदियों पहले जानते थे कि यहाँ की ग्रेनाईट संरचना के कारण भूगर्भ जल का प्रयोग असफल रहेगा। तभी हजार साल पहले चन्देलकाल में यहाँ की हर पहाड़ी के बहाव की ओर तालाब तो बनाए गए, ताकि बारिश का अधिक-से-अधिक पानी उनमें एकत्र हो, साथ ही तालाब की पाल पर कुएँ भी खोदे गए। लेकिन तालाबों से दूर या अपने घर-आँगन में कुँआ खोदने से यहाँ परहेज होता रहा।

गत् दो दशकों के दौरान भूगर्भ जल को रिचार्ज करने वाले तालाबों को उजाड़ना और अधिक-से-अधिक टयूबवेल, हैण्डपम्पों को रोपना ताबड़तोड़ रहा। सो जल त्रासदी का भीषण रूप तो उभरना ही था। साथ-ही-साथ नलकूप लगाने में सरकार द्वारा खर्च अरबों रुपए भी पानी में गए। क्योंकि इस क्षेत्र में लगे आधेेेे से अधिक हैण्डपम्प अब महज ‘शो-पीस’ बनकर रह गए हैं। साथ ही जलस्तर कई मीटर नीचे होता जा रहा है। इससे खेतों की तो दूर, कंठ तर करने के लिये पानी का टोटा हो गया है।

कभी बुन्देलखण्ड के 45 फीसदी हिस्से पर घने जंगल हुआ करते थे। आज यह हरियाली सिमट कर 10 से 13 प्रतिशत रह गई है। यहाँ के जंगलों में रहने वाले आदिवासियों सौर, कौंदर, कौल और गोंडों की यह जिम्मेदारी होती थी कि वे जंगल की हरियाली बरकरार रखे। ये आदिवासी वनोपज से जीवीकोपार्जन चलाते थे, सूखे गिरे पेड़ों को ईंधन के लिये बेचते थे। लेकिन आजादी के बाद जंगलों के स्वामी आदिवासी वनपुत्रों की हालत बंधुआ मजदूर से बदतर हो गई। 

ठेकेदारों ने जमके जंगल उजाड़े और सरकारी महकमों ने कागजों पर पेड़ लगाए। बुन्देलखण्ड में हर पाँच साल में दो बार अल्प वर्षा होना कोई आज की विपदा नहीं है। फिर भी जल, जंगल, जमीन पर समाज की साझी भागीदारी के चलते बुन्देलखण्डी इस त्रासदी को सदियों से सहजता से झेलते आ रहे थे।

पलायन, यहाँ के सामाजिक विग्रह का चरम रूप है। मनरेगा भी यहाँ कारगर नहीं रहा है। स्थानीय स्तर पर रोज़गार की सम्भावनाएँ बढ़ाने के साथ-साथ गरीबों का शोषण रोककर इस पलायन को रोकना बेहद जरूरी है। यह क्षेत्र जल संकट से निबटने के लिये तो स्वयं समर्थ है, जरूरत इस बात की है कि यहाँ की भौगोलिक परिस्थितियों के मद्देनज़र परियोजनाएँ तैयार की जाएँ। विशेषकर यहाँ के पारम्परिक जल स्रोतों का भव्य अतीत स्वरूप फिर से लौटाया जाये। यदि पानी को सहेजने व उपभोग की पुश्तैनी प्रणालियों को स्थानीय लोगों की भागीदारी से संचालित किया जाये तो बुन्देलखण्ड का गला कभी रीता नहीं रहेगा।

यदि बुन्देलखण्ड के बारे में ईमानदारी से काम करना है तो सबसे पहले यहाँ के तालाबों का संरक्षण, उनसे अतिक्रमण हटाना, तालाब को सरकार के बनिस्पत समाज की सम्पत्ति घोषित करना सबसे जरूरी है। नारों और वादों से हटकर इसके लिये ग्रामीण स्तर पर तकनीकी समझ वाले लोगों के साथ स्थायी संगठन बनाने होंगे। 

दूसरा इलाके के पहाड़ों को अवैध खनन से बचाना, पहाड़ों से बहकर आने वाले पानी को तालाब तक निर्बाध पहुँचाने के लिये उसके रास्ते में आये अवरोधों, अतिक्रमणों को हटाना जरूरी है। बुन्देलखण्ड में केन, केल, धसान जैसी गहरी नदियाँ हैं जो एक तो उथली हो गई हैं, दूसरा उनका पानी सीधे यमुना जैसी नदियों में जा रहा है। 

इन नदियों पर छोटे-छोटे बाँध बाँधकर पानी रोका जा सकता है। हाँ, केन-धसान नदियों को जोड़ने की अरबों रुपए की योजना पर फिर से विचार भी करना होगा, क्योंकि इस जोड़ से बुन्देलखण्ड घाटे में रहेगा। सबसे बड़ी बात, स्थानीय संसाधनों पर स्थानीय लोगों की निर्भरता बढ़ानी होगी।

कुछ जगह हो सकता है कि राहत कार्य चले, हैण्डपम्प भी रोपे जाएँ, लेकिन हर तीन साल में आने वाले सूखे से निबटने के दीर्घकालीन उपायों के नाम पर सरकार की योजनाएँ कंगाल ही नजर आती है। स्थानीय संसाधनों तथा जनता की क्षमता-वृद्धि, कम पानी की फसलों को बढ़ावा, व्यर्थ जल का संरक्षण जैसे उपायों को ईमानदारी से लागू करे बगैर इस शौर्य-भूमि का तकदीर बदलना नामुमकिन ही है।

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