My writings can be read here मेरे लेख मेरे विचार, Awarded By ABP News As best Blogger Award-2014 एबीपी न्‍यूज द्वारा हिंदी दिवस पर पर श्रेष्‍ठ ब्‍लाॅग के पुरस्‍कार से सम्‍मानित

सोमवार, 16 नवंबर 2015

migration, drought and bundelkhand

पानीदार बुंदेलखंड से प्यास के कारण पलायन

AMAR UJALA 17-11-15
                                                                    पंकज चतुर्वेदी
मध्यप्रदेश की सरकार ने अभी पांच जिलों की 33 तहसीलों को सूखग्रस्त घोषित कर दिया है जिसमें बुंदेलखंड के टीकमगढ़ जिले की सभी तहसीलें हैं। टीकमगढ जिले के जतारा ब्लाक के जल संसाधन विभाग के तहत आने वाले 26 तालबों में अभी एक फुट पानी भी नहीं है। छतरपुर के हालात भी बदतर हैं।लेकिन हालात छतरपुर व पन्ना के भी कम खतरनाक नहीं है।। गांव-गांव में हैंडपंप सूख गए हैं और कस्बों में पानी के लिए आए रोज झगड़े हो रहे हैं। टीकमगढ़ जिले के आधे से ज्यादा गांव वीरान हो गए है। तो रेलवे स्टेशन से सटे कस्बों- खजुराहो, हरपालपुर, मउरानीपुर, बीना आदि के प्लेटफार्म पूरी गृहस्थी पोटली में बांधे हजारों लोगों से पटे पड़े हैं जो पानी के अभाव में गांव छोड़कर पेट पालने के लिए दिल्ली, पंजाब या लखनउ जा रहे हैं। आमतौर पर ऐसा पलायन दीवाली के बाद होता था, लेकिन इस बार खाली पेट व सूखा गला दोनो ने ही मजबूर कर दिया, अपने पुष्तैनी गांव-घरों से दूर दीवाली के दीये जलाने को। आषाढ़ में जो बरसा बस वही था, लगभग पूरा सावन-भादौ निकल गया है और जो छिटपुट बारिष हुई है, उसने बुंदेलखंड फिर से अकाल -सूखा की और जाता दिख रहा है। यहां सामान्य बारिष का तीस फीसदी भी नहीं बरसा, तीन-चैथाई खेत बुवाई से ही रह गए और कोई पैतीस फीसदी ग्रामीण अपनी पोटलियां ले कर दिल्ली-पंजाब की ओर काम की तलाष में निकल गए हैं। मनरेगा में काम करने वाले मजदूर मिल नहीं रहे है।  ग्राम पंचायतों को पिछले छह महीने से किए गए कामों का पैसा नहीं मिला है सो नए काम नहीं हो रहे हैं। सियासतदां इंतजार कर रहे हैं कि कब लोगेंा के पेट से उफन रही भूख-प्यास की आग भड़के और उस पर वे सियासत की हांडी खदबदाएं। हालांकि बुंदेलखंड के लिए यह अप्रत्याषित कतई नहीं है, बीते कई सदियों से यहां हर पांच साल में दो बार अल्प वर्शा होती ही है। गांव का अनपढ़ भले ही इसे जानता हो, लेकिन हमारा पढ़ा-लिखा समाज इस सामाजिक गणित को या तो समझता नहीं है या फिर नासमझाी का फरेब करता है, ताकि हालात बिगड़ने पर ज्यादा बजट की जुगाड़ हो सके। ईमानदारी से तो देश का नेतृत्व बुंदेलखंड की असली समस्या को समझ ही नहीं पा रहे है।
एक स्वयंसेवी संस्था ने पल्स पोलियो व कई ऐसी ही सरकारी संस्थाओं के आंकडज्ञत्रें का विष्लेेशण किया तो पाया कि बीते एक दशक में मप्र व उप्र के बुंदेलखंड के 13 जिलों से 63 लाख से ज्यादा लेाग रोजगार व पानी की कमी से हताश हो कर अपने घर-गांव छोड़ कर सुदूर नगरों को पलायन कर चुके है।। आज बुंदेलखंड के अधिकांश गांवों में केवल बूढे या अक्ष्म लोग ही मिलेंगे।  पिछली केंद्र सरकार ने बुंदेलख्ंाड पैकज के नाम पर साढे सात हजार करोड से ज्यादा की राषि दी थी। इसमें जल संसाधन विकसित करने, रोजगार की संभावना बनाने आदि के कार्य थे। दुर्भाग्य से यह पूरा पैसा कुछ जेबों में चला गया व आम बुंदेलखंडी मजदूरी करने को पलायन के विकल्प पर ही मजबूर रहा। उल्ल्ेखनीय है कि गत 10 सालों के दौरान यहां 3500 से ज्यादा किसान आत्महत्या कर चुके हैं। मरने वाले किसान फसल बर्बाद होने, कर्जा ना चुका पाने से निराष थे।
बुंदेलखंड की असली समस्या अल्प वर्शा नहीं है, वह तो यहां सदियों, पीढि़यों से होता रहा है। पहले यहां के बाषिंदे कम पानी में जीवन जीना जानते थे। आधुनिकता की अंधी आंधी में पारंपरिक जल-प्रबंधन तंत्र नश्ट हो गए और उनकी जगह सूखा और सरकारी राहत जैसे षब्दों ने ले ली। अब सूखा भले ही जनता पर भारी पड़ता हो, लेकिन राहत का इंतजार सभी को होता है- अफसरों, नेताओं-- सभी को। इलाके में पानी के पारंपरिक स्त्रोतों का संरक्षण व पानी की बर्बादी को रोकना, लोगो को पलायन के लिए मजबूर होने से बचाना और कम पानी वाली फसलों को बढ़ावा देना; महज ये तीन उपचार बुंदेलखंड की तकदीर बदल सकते हैं।
बुंदेलखंड में हीरा से ले कर ग्रेनाईट तक जमीन से उलीचा जाता है, लेकिन उससे जुड़े कोई कारखाने यहां नहीं हैं। जंगल तेंदू पत्ता, आंवला से पटे पड़े हैं, लेकिन इसका लाभ स्थानीय लोगों को नहीं मिलता हैं । दिल्ली, लखनऊ और उससे भी आगे पंजाब तक जितने भी बड़े निर्माण कार्य चल रहे हैं उसमें अधिकांश में  ‘‘ गारा-गुम्मा’’(मिट्टी और ईंट)का काम बुंदेलखंडी मजदूर ही करते हैं । शोषण, पलायन और भुखमरी को वे अपनी नियति समझते हैं । जबकि खदानों व अन्य करों के माध्यम से बुंदेलखंड सरकारों को अपेक्ष से अधिक कर उगाह कर देता हैं, लेकिन इलाके के विकास के लिए इस कर का 20 फीसदी भी यहां खर्च नहीं होता हैं ।
बुंदेलखंड के सभी कस्बे, षहर की बसाहट का एक ही पैटर्न रहा है - चारों ओर उंचे-उंचे पहाड, पहाड़ की तलहटी में दर्जनों छोटे-बड़े ताल-तलैयां और उनके किनारों पर बस्ती। टीकमगढ़ जैसे जिले में अभी तीन दषक पहले तक हजार से ज्यादा तालाब थे। पक्के घाटों वाले हरियाली से घिरे व विशाल तालाब बुंदेलखड के हर गांव- कस्बे की सांस्कृतिक पहचान हुआ करते थे । ये तालाब भी इस तरह थे कि एक तालाब के पूरा भरने पर उससे निकला पानी अगले तालाब में अपने आप चला जाता था, यानी बारिष की एक-एक बूंद संरक्षित हो जाती थी। उपेक्षा के षिकार शहरी तालाबों को कंक्रीट के जंगल निगल गए । रहे -बचे तालाब शहरांे की गंदगी को ढोनेे वाले नाबदान बन गए । गांवों की अर्थ व्यवस्था का आधार कहलाने वाले चंदेलकालीन तालाब सामंती मानसिकता के शिकार हो गए । आज के अत्याधुनिक सुविधा संपन्न भूवैज्ञानिकों की सरकारी रिपोर्ट के नतीजों को बुंदेलखंड के बुजुर्गवार सदियों पहले जानते थे कि यहां की ग्रेनाईट संरचना के कारण भूगर्भ जल का प्रयोग असफल रहेगा । तभी हजार साल पहले चंदेलकाल में यहां की हर पहाड़ी के बहाव की ओर तालाब तो बनाए गए, ताकि बारिश का अधिक से अधिक पानी उनमें एकत्र हो, साथ ही तालाब की पाल पर कुंए भी खोदे गए । लेकिन तालाबों से दूर या अपने घर-आंगन में कुंआ खोदने से यहां परहेज होता रहा ।
गत् दो दशकों के दौरान भूगर्भ जल को रिचार्ज करने वाले तालाबों को उजाड़ना और अधिक से अधिक टयूब वेल, हैंडपंपों को रोपना ताबड़तोड़ रहा । सो जल त्रासदी का भीषण रूप तो उभरना ही था । साथ ही साथ नलकूप लगाने में सरकार द्वारा खर्च अरबों रूपये भी पानी में गए । क्योंकि इस क्षेत्र में लगे आधेेेेेेे से अधिक हैंडपंप अब महज ‘शो-पीस’ बनकर रह गए हैं । साथ ही जल स्तर कई मीटर नीचे होता जा रहा है । इससे खेतों की तो दूर, कंठ तर करने के लिए पानी का टोटा हो गया है ।
पलायन, यहां के सामाजिक विग्रह का चरम रूप है । मनरेगा भी यहां कारर नहीं रहा है। स्थानीय स्तर पर रोजगार की संभावनाएं बढ़ाने के साथ-साथ गरीबों का षेाशण रोक कर इस पलायन को रोकना बेहद जरूरी है। यह क्षेत्र जल संकट से निबटने के लिए तो स्वयं समर्थ है, जरूरत इस बात की है कि यहां की भौगोलिक परिस्थितियों के मद्देनजर परियोजनाएं तैयार की जाएं । विशेषकर यहां के पारंपरिक जल स्त्रोतों का भव्य अतीत स्वरूप फिर से लौटाया जाए । यदि पानी को सहेजने व उपभोग की पुश्तैनी प्रणालियों को स्थानीय लोगों की भागीदारी से संचालित किया जाए तो बुंदेलखंड का गला कभी रीता नहीं रहेगा ।
यदि बंुदेलखंड के बारे में ईमानदारी से काम करना है तो सबसे पहले यहां के तालाबों का संरक्षण, उनसे अतिक्रमण हटाना, तालाब को सरकार के बनिस्पत समाज की संपत्ति घोशित करना सबसे जरूरी है। नारों और वादों से हट कर इसके लिए ग्रामीण स्तर पर तकनीकी समझ वाले लोगों के साथ स्थाई संगठन बनाने होंगे। दूसरा इलाके पहाड़ों को अवैध खनन से बचाना, पहाड़ों से बह कर आने वाले पानी को तालाब तक निर्बाध पहंुचाने के लिए उसके रास्ते में आए अवरोधों, अतिक्रमणों को हटाना जरूरी है। बुंदेलखंड में केन, केल, धसान जैसी गहरी नदियां हैं जो एक तो उथली हो गई हैं, दूसरा उनका पानी सीधे यमुना जैसी नदियों में जा रहा है। इन नदियों पर छोटे-छोटे बांध बांध कर पानी रोका जा सकता है। हां, केन-धसान नदियों को जोड़ने की अरबों रूपए की योजना पर फिर से विचार भी करना होगा, क्योंकि इस जोड़ से बंुदेलखंड घाटे में रहेगा। सबसे बड़ी बात, स्थानीय संसाधनों पर स्थानीय लोगों की निर्भरता बढ़ानी होगी।
कुछ जगह हो सकता है कि राहत कार्य चलें, हैंडपंप भी रोपे जाएं, लेकिन हर तीन साल में आने वाले सूखे से निबटने के दीर्घकालीन उपायों के नाम पर सरकार की योजनाएं कंगाल ही नजर आती है। । स्थानीय संसाधनों तथा जनता की क्षमता-वृद्धि, कम पानी की फसलों को बढ़ावा, व्यर्थ जल का संरक्षण जैसे उपायों को ईमानदारी से लागू करे बगैर इस शौर्य-भूमि का तकदीर बदलना नामुमकिन ही है ।


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शुक्रवार, 13 नवंबर 2015

children, children day and ecology

बाल दिवस, पर्यावरण और बच्चे

बाल दिवस, पर्यावरण और बच्चे [1]

बाल दिवस, 14 नवम्बर 2015 पर विशेष


.हम बच्चे को अधिक-से-अधिक शिक्षा देकर जागरूक बना रहे हैं, बेहतर जिन्दगी जीने की सीख दे रहे हैं या फिर अच्छा पैसा कमाने के लिये तैयारी करवा रहे हैं।

उम्मीदों, सपनों, चुहलताओं और समाज व देश का भविष्य बनने को आतुर बच्चों के लिये यह बाल दिवस महज एक खेल का दिन नहीं है, यह संकट सामने खड़ा है कि वे जब बड़े होंगे या उनका वंश आगे बढ़ेगा तो वे किस दुनिया में साँस लेंगे, किस तरह का पानी पीएँगे, उनकी बौद्धिक क्षमता का इस्तेमाल समाज की खुशहाली के लिये होगा या फिर मानवता को बचाने के लिये संघर्षरत रहेंगे।

हमारी शिक्षा की भाषा, समाजिक विज्ञान व विज्ञान की पुस्तकों का बड़ा हिस्सा अतीती को याद करने का होता है लेकिन आज जरूरत है कि उनमें भविष्य की दुनिया पर विमर्श हो। बाल मन और जिज्ञासा एक-दूसरे के पूरक शब्द ही हैं। वहीं जिज्ञासा का सीधा सम्बन्ध विज्ञान से है।

शिशुकाल में उम्र बढ़ने के साथ ही अपने परिवेश की हर गुत्थी को सुलझाने की जुगत लगाना बाल्यावस्था की मूल-प्रवृत्ति है। भौतिक सुखों व बाजारवाद की बेतहाशा दौड़ के बीच दूषित हो रहे सामाजिक परिवेश और बच्चों की नैसर्गिक जिज्ञासु प्रवृत्ति पर बस्ते के बोझ और इम्तेहानों की बौद्धिक तंगी के कारण एक बोझिल सा माहौल पैदा हो गया है। ऐसे में बच्चों के चारों ओर बिखरे विज्ञान की रोचक जानकारी सही तरीके से देना बच्चों के लिये राहत देने वाला कदम होगा।

यह हमारे नीति निर्धारक लगातार चेता रहे हैं कि हमारे देश में विज्ञान पर नए शोध करने वालों की संख्या लगातार घट रही है। कम्प्यूटर, सूचना तकनीक, अन्तरिक्ष विज्ञान में दुनिया को टक्कर देने वाले देश में भविष्यवाणियाँ करने वाले कारपोरेट बाबा-फकीरों के जलवे चरमोत्कर्ष पर हैं और बच्चे विज्ञान से विमुख हो रहे हैं।

यह अजीब विरोधाभास है और शायद चेतावनी का बिन्दु भी। किसी भी प्रगतिगामी और आधुनिक देश के लिये जरूरी है कि वहाँ के बाशिन्दों की सोच वैज्ञानिक हो। बच्चे के सामने दुनिया के मौजूदा संकट का एक नक्शा हो व उससे जूझने या संकट को कम करने के सपने हों।

यह कतई जरूरी नहीं कि छोटे से बचे को भविष्य की चुनौतियों या पर्यावरणीय संकट के डर से मुस्कुराना भुलाने पर मजबूर कर दिया जाये, लेकिन ऐसा भी नहीं कि वे उससे बेखबर रहें।

एक बात स्पष्ट करना चाहूँगा कि ‘पर्यावरण’ स्वयं कुछ करने का नाम है, ना कि पढ़ने का ; हाँ, यह बात जरूर है कि क्या, क्यों, कैसे, कब, कहाँ जैसे सवालों का जवाब तलाशने में पढ़ना मदद अवश्य कर सकता है। लेकिन पढ़े हुए का आनन्द लेने और उसे अपने व्यावहारिक जीवन में उतारने के लिये उसे स्वयं करना जरूरी है।

घर के बाहर की ज़मीन कच्ची रहे तो किस तरह पानी को ज़मीन में जज्ब कर बचाया जा सकता है, पेड़ लगाने के बाद उसे बड़ा करने के लिये क्या किया जाये, या बिजली का व्यय बचाकर हम कैसा भविष्य बना सकते हैं?.....ऐसे सवाल बच्चे के मन में उपजना जरूरी है।

आज बच्चे जिस दुनिया में आँख खोल रहे हैं वह पूरी तरह विज्ञानमय और पर्यावरण के लिये चुनौतीमय है। उनका मन एक सपाट तख्ती की तरह होता है, वे अपने परिवेश में जो कुछ देखते-सुनते हैं, उनके मन पर अंकित हो जाता है। बड़े होने के साथ ही उनके सामने क्या? क्यों? कैसे? के सवालों का पहाड़ खड़ा हो जाता है।

जब उनको मिलने वाले सवालों के जवाबों में तथ्यों व तर्क का अभाव होता है तो उनमें अन्धविश्वास की ग्रंथि घर कर जाती है। लेकिन यदि जिज्ञासाओं का समाधान विज्ञान-सम्मत होता है तो एक वैज्ञानिक प्रवृत्ति जन्म लेती है, जिसकी हमारे देश को बेहद जरूरत है। पंडित नेहरू ने भी भारत में इसी साइंटिफिक टेंपर या वैज्ञानिक प्रवृत्ति लाने पर जोर दिया था।

सवा सौ करोड़ से अधिक की आबादी वाले इस देश में छह से 17 वर्ष के स्कूल जाने वाले बच्चों की संख्या लगभग 16 करोड़ है। इसके अलावा कई करोड़ ऐसी बच्चियाँ व लड़के भी हैं, जो कि अपने देश, काल और परिस्थितियों के कारण स्कूल नहीं जा पा रहे हैं। पर वे साँस लेते हैं, भोजन, पानी उनकी भी आवश्यकता है, फिर उन्हें पर्यावरण के ज्ञान से वंचित कैसे रखा जा सकता है।

लेकिन इतना बड़ा बाजार और इस मसले पर सकारात्मक पुस्तकें ना के बराबर। अनुमान है कि हमारे देश में सभी भाषाओं में मिलाकर पाठ्येत्तर पर्यावरणीय विज्ञान पुस्तकों का सालाना आँकड़ा मुश्किल से पाँच सौ को पार कर पाता है। यह एक कटु सत्य है कि दूरस्थ अंचलों को छोड़ दें, दिल्ली जैसे महानगर में एक फीसदी बच्चों के पास उनके पाठ्यक्रम के अलावा कोई विज्ञान पुस्तक पहुँच ही नहीं पाती है।

उन बच्चों के लिये विज्ञान के मायने एक उबासी देने वाली, कठिन परिभाषाओं और कठिन कहे जाने वाला विषय मात्र है। लेकिन इन बच्चों को जब कुछ प्रयोग करने को कहा जाता है या फिर यूँ ही अपनी प्रकृति में विचरण के लिये कहा जाता है तो वे उसमें डूब जाते हैं।

पुस्तक मेलों में ही देख लें, जहाँ जादू, मनोरंजक खेल, कम्प्यूटर पर नए प्रयोग सिखाने वाली सी.डी. बिक रही होती है, वहाँ बच्चों की भीड़ होती है। आज भी मानसिक रोग के इलाज के लिये लोग डॉक्टर के बनिस्पत झाड़ फूँक या मजार-मन्दिर पर जाने को प्राथमिकता देते हैं।

इन दिनों विज्ञान-गल्प के नाम पर विज्ञान के चमत्कारों पर ठीक उसी तरह की कहानियों का प्रचलन भी बढ़ा है, जिनमें अन्धविश्वास या अविश्वनीयता की हद तक के प्रयोग होते हैं। किसी अन्य गृह से आये अजीब जन्तु या एलियन या फिर रोबोट के नाम पर विज्ञान को हास्यास्पद बना दिया जाता है। समय से बहुत आगे या फिर बहुत पीछे जाकर कुछ कल्पनाएँ की जाती हैं।

लेकिन ये कल्पनाएँ 140 साल पहले की फ्रांसीसी लेखक ज्यूल वार्न के बाल उपन्यास ‘ट्वेंटी थाउजेंड लीग अंडर दी सी’ जैसी कतई नहीं होती हैं। जान कर आश्चर्य होगा कि लेखक ने उस काल में समुद्र की उर्जा, वहाँ मिलने वाली काई से जीवन जीने की कल्पना करते हुए रोमांचक उपन्यास लिख दिया था।

यह विडम्बना ही है कि आज बाजार पौराणिक, लोक और परी कथाओं से पटा हुआ है, हालांकि इसमें से अधिकांश बाल साहित्य कतई नहीं है। भूत-प्रेत, चुड़ैल के कामिक्स बच्चों को खूब भा रहे हैं।, लेकिन हमारे देश के लेखक एक ऐसा अच्छा विज्ञान-गल्प तैयार करने में असफल रहे हैं, जिसके गर्भ में नव- सृजन के कुछ अंश हों, किसी नई खोज की शुरुआत हो सके।

सवा सौ करोड़ से अधिक की आबादी वाले इस देश में छह से 17 वर्ष के स्कूल जाने वाले बच्चों की संख्या लगभग 16 करोड़ है। इसके अलावा कई करोड़ ऐसी बच्चियाँ व लड़के भी हैं, जो कि अपने देश, काल और परिस्थितियों के कारण स्कूल नहीं जा पा रहे हैं। पर वे साँस लेते हैं, भोजन, पानी उनकी भी आवश्यकता है, फिर उन्हें पर्यावरण के ज्ञान से वंचित कैसे रखा जा सकता है। लेकिन इतना बड़ा बाजार और इस मसले पर सकारात्मक पुस्तकें ना के बराबर। अनुमान है कि हमारे देश में सभी भाषाओं में मिलाकर पाठ्येत्तर पर्यावरणीय विज्ञान पुस्तकों का सालाना आँकड़ा मुश्किल से पाँच सौ को पार कर पाता है। बच्चों के बीच प्रकृति पर केन्द्रित पुस्तकें लोकप्रिय बनाने और उनके ज्ञान के माध्यम से समाज में जागरुकता लाने की यदि ईमानदारी से कोशिश करना है तो पुस्तकों को तैयार करते समय पुस्तकों की भाषा, स्थानीय परिवेश का विज्ञान, वे जो कुछ पढ़ रहे हैं, उसका उनके जीवन में उपयोग कहाँ और कैसे होगा, पुस्तकों के मुद्रण की गुणवत्ता और उनके वाजिब दाम पर ध्यान देने की आवश्यकता है।

याद रखना होगा कि अपने परिवेश को जानने-बूझने का गुण बच्चों में अधिक होता है। बच्चों की इस रुचि को बनाए रखने और इसको विस्तार देने में बालपन की रोमांचक दृष्टि की भूमिका महत्त्वपूर्ण होती है। (जैसे की बचपन में ही बादलों को देख कर उसमें हाथी या अन्य छवि खोजना, घास के हरेपन को महसूस करने जैसे एहसास होते हैं।) जाहिर है कि हर बच्चा नैसर्गिक रूप से वैज्ञानिक नजरिए वाला होता है। जरूरत तो होती है बस उसे अच्छी पुस्तकों व प्रयोगों के माध्यम से तार्किक बनाने की।

पर्यावरण - पठन को लोकप्रिय बनाने के लिये भी कुछ प्रयास करने होंगे। बड़ी संख्या में बच्चे और उनके अभिभावक यह मान लेते हैं कि विज्ञान कुछ जटिल विशय है जोकि कुछ ‘होशियार’ बच्चों के बस की ही बात है। यह भ्रान्ति भी व्यापक है कि विज्ञान वही पढ़े जो कि डॉक्टर, इंजीनियर या वैज्ञानिक बनना चाहता है।

प्रकृति विचरण के नियमित कार्यक्रम, बच्चों से उनकी जिज्ञासाओं को नियमित रूप से डायरी में नोट करने व उसके सम्भावित सिद्धान्तों पर चर्चा करने के लिये प्रेरित करना, जन्तर-मन्तर, तारा मंडल , औषधीय पौधों के बगीचों, चिड़ियाघर, छोटे कारखानों आदि में बच्चों के नियमित भ्रमण आयोजित करना, स्कूल / सामुदायिक पुस्तकालयों में ‘खुद करके देखो’, रोचक तथ्यों जैसे विषयों की पुस्तकों के लिये अलग से स्थान रखना और वहाँ बच्चों के नियमित, मुक्त आवागमन को सुनिश्चित करना जैसे कार्य स्कूलों में करने होंगे।

ग्रहण, मंगल ग्रह अभियान, किसी बीमारी के फैलने, भूकम्प/बाढ़ आदि प्राकृतिक विपदाओं के समय टीवी चैनलों पर आमतौर पर अन्धविश्वास, बाबा-बैरागियों के भयग्रस्त प्रवचन समाज, विशेष तौर पर बच्चों में भय पैदा करते हैं। काश बच्चों के बीच चर्चाओं का आयोजन और उस पर अधिक-से-अधिक सामग्री एकत्र कर पोस्टर/वालपेपर/हस्त लिखित पुस्तक तैयार करने के लिये प्रेरित किया जाये।

एक बात और, हमारे देश में बच्चों के लिये किये जा रहे किसी भी काम को प्रायः धर्मार्थ मान लिया जाता है, जबकि जरूरत इस बात की है कि बच्चों को विज्ञान के करीब लाने के कार्य को सरकार मानव संसाधन विकास की मूलभूत योजनाओं में प्राथमिकता से शामिल करे।

आज हमारा जीवन आये दिन नई-नई तकनीकी खोजों से आलोकित हो रहा है, लेकिन इनकी खोज के पीछे की कहानियाँ, व्यक्ति, संस्था गुमनाम ही हैं। ऐसे अन्वेषणों पर तत्काल पुस्तकें जरूरी हैं ताकि बच्चों का कौतुहल और जागृत हो और वे खुद ऐसी खोजों के लिये प्रेरित हों।

इसमें प्राथमिकता के आधार पर बच्चों के लिये ढेर सारी विज्ञान पुस्तकों का प्रकाशन तथा उनकी बच्चों तक सहजता से पहुँच बनाना बेहद सस्ता और आसान उपाय है। जरूरत बस सशक्त इच्छाशक्ति की है।

How to reduce the weight of school bags, on Childrens' day












आज है बाल दिवस

बस्ते के बोझ से दबा बचपन



उम्र साढ़े आठ साल, कक्षा तीन में पढ़ती है। स्कूल सुबह पौने आठ से है, सो साढ़े छह बजे सो कर उठती है। स्कूल से घर आने में दो बज जाता है। फिर वह खाना खाती है और कुछ देर आराम करती है। पांच बजते-बजते किताबों, कापियों और होम वर्क से जूझने लगती है। यह काम कम से कम तीन घंटे का होता है। उसके बाद अंधेरा हो जाता है। यह अंधेरा बचपन की मधुर यादें कहे जाने वाले खेल, शैतानियां, उधम सभी पर छा जाता है। अजीब सी छटपटाहट है, उसके बालसुलभ मन में। कुछ देर टीवी देखेगी और सो जाएगी, उस खौफ के साथ, जो उसके साथ बस्ते की शक्ल में चिपटा हुआ है। छटपटा तो महान शिक्षाविद प्रो. यशपाल की वह रिपोर्ट भी रही होगी, जिसमें बच्चे के बस्ते का बोझ कम करने के साथ-साथ शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के कई सुझाव आज से बीस साल पहले दिए गए थे।छोटी कक्षाओं में सीखने की प्रक्रिया के लगातार नीरस होते जाने व बच्चों पर पढ़ाई के बढ़ते बोझ को कम करने के इरादे से मार्च 1992 में मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने देश के आठ शिक्षाविदों की एक समिति बनाई थी, जिसकी अगुआई प्रो. यशपाल कर रहे थे। समिति ने देशभर की कई संस्थाओं व लोगों से संपर्क किया व जुलाई 1993 में अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी। उसमें साफ लिखा गया था कि बच्चों के लिए स्कूली बस्ते के बोझ से अधिक बुरा है, न समझ पाने का बोझ। सरकार ने सिफारिशों को स्वीकार भी कर लिया और एकबारगी लगा कि उन्हें लागू करने के लिए भी कदम उठाए जा रहे हैं। फिर देश की राजनीति मंदिर-मस्जिद जैसे विवादों में ऐसी फंसी कि उस रिपोर्ट की सुध ही नहीं रही।वैसे सरकार में बैठे लोगों से बात करें तो वे इस बात को गलत ही बताएंगे कि यशपाल समिति की रिपोर्ट लागू करने की ईमानदार कोशिशें नहीं हुईं। जमीनी हकीकत जानने के लिए उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में चिनहट के पास गणेशपुर गांव के बच्चों का उदाहरण काफी है। कक्षा पांच की विज्ञान की किताब के पहले पाठ के दूसरे पेज पर दर्ज था कि पेड़ कैसे श्वसन किया करते हैं। बच्चों से पूछा गया कि आपमें से कौन-कौन श्वसन क्रिया करता है, सभी बच्चों ने मना कर दिया कि वे ऐसी कोई हरकत करते भी हैं। हां, जब उनसे सांस लेने के बारे में पूछा गया तो वे उसका मतलब जानते थे। बच्चों से पूछा गया कि सहायता का क्या
Prabhat , meerut, 15-11-15
मतलब है तो जवाब था कि पूछना, रूपया, मांगना। उनके किताबी ज्ञान ने उन्हें सिखाया कि दुनिया का अर्थ शहर, जमीन, पृथ्वी या जनता होता है। आंगनबाड़ी केंद्र में चार्ट के सामने रट रहे बच्चों ने न तो कभी अनार देखा था और न ही उन्हें ईख, ऐनक, ऐड़ी और ऋषि के मायने मालूम थे। सामने है कि किताबों ने बच्चों को भले ही ज्ञानवान बना दिया हो, पर कल्पना व समझ के संसार में वे दिनों-दिन कंगाल होते जा रहे हैं ।यशपाल समिति की पहली सिफारिश थी कि बच्चों को निजी सफलता वाली प्रतियोगिताओं से दूर रखा जाए। क्योंकि यह आनंददायक शिक्षा के रास्ते में सबसे बड़ा रोड़ा है। इसके स्थान पर सामूहिक गतिविधियों को प्रोत्साहित व पुरस्कृत किया जाना चाहिए। इसके विपरीत बीते एक दशक में कक्षा में अव्वल आने की गला काट प्रतिस्पर्धा में न जाने कितने बच्चे कुंठा का शिकार होकर मौत को गले लगा चुके हैं। हायर सेकेंडरी के रिजल्ट के बाद ऐसे हादसे सारे देश में होते रहते हैं। अपने बच्चे को पहले नंबर पर लाने के लिए कक्षा एक-दो में ही पालक युद्ध सा लड़ने लगते हैं। कहने को अब कक्षा दस में ग्रेडिंग सिस्टम लागू कर दिया गया है। लेकिन ग्रेड भी तो नंबर-दौड़ का ही दूसरा चेहरा है। समिति की दूसरी सिफारिश पाठ्य पुस्तक के लेखन में शिक्षकों की भागीदारी बढ़ाकर उसे विकेंद्रित करने की थी। सभी स्कूलों को पाठ्य पुस्तकों और अन्य सामग्री के चुनाव सहित नवाचार के लिए बढ़ावा दिए जाने की बात भी इस रपट में थी। अब प्राईवेट स्कूलों को अपनी किताबें चुनने का हक तो मिल गया है, लेकिन यह अच्छा व्यापार बन कर बच्चों के शोषण का जरिया बन गया है। पब्लिक स्कूल अधिक मुनाफा कमाने की फिराक में बच्चों का बस्ता भारी करते जा रहे हैं। उधर सरकारी स्कूलों के लिए पाठ्य पुस्तकें तैयार करने वाला एनसीईआरटी इतने विवादों में है कि वह पुस्तकें लिखने वाले लेखकों का नाम तक गोपनीय रखने लगा है। किताबें किस रंग की हों, इसका फैसला सड़कों पर करने के लिए सियासती दल कमर कस रहे हैं। ऐसे ही हालात विभिन्न राज्यों के पाठ्य पुस्तक निगमों के हैं। दिल्ली सरकार के स्कूलों के लिए एनसीईआरटी द्वारा तैयार पुस्तकें आधा साल गुजरने के बाद भी बच्चों तक नहीं पहुंचती हैं। जाहिर है कि बच्चों को अब पूरे साल का पाठ्यक्रम तीन महीने में पूरा करने की कवायद करनी होगी। ऐसे में उन पर पढ़ाई का बोझ कम होने की बात करना बेमानी ही होगा। पाठ्य पुस्तकों को स्कूल की संपत्ति मानने व उन्हें बच्चों को रोज घर ले जाने की जगह स्कूल में ही रखने के सुझाव न जाने किस लाल बस्ते में बंध कर गुम हो गए।समिति की एक राय यह भी थी कि केंद्रीय स्कूल व नवोदय विद्यालयों के अलावा सभी स्कूलों को उनके राज्य के शिक्षा मंडलों से संबद्ध कर देना चाहिए। लेकिन आज सीबीएसई से संबद्धता स्कूल के स्तर का मानदंड माना जाता है और हर साल खुल रहे नए-नए पब्लिक स्कूलों को अपनी संबद्धता बांटने में सीबीएसई दोनों हाथ खोले हुए है। नतीजा है कि राज्य बोर्ड से पढ़ कर आए बच्चों को दोयम दर्जे का माना जा रहा है। कक्षा दस व बारह के बच्चों को कोर्स रटने की मजबूरी से छुटकारा दिलाने के लिए समिति ने परीक्षाओं के तरीकों में आमूलचूल बदलाव की बात कही थी। पर नतीजा वही ढाक के तीन पात रहा और बोर्ड की परीक्षाओं में अव्वल आने का सबसे बढि़या फंडा रटना ही माना जा रहा है ।शिक्षाविदों की एक और सिफारिश अभी तक मूर्तरूप नहीं ले पाई है, जिसमें सुझाया गया था कि नर्सरी कक्षाओं में दाखिले के लिए होने वाले टेस्ट व इंटरव्यू बंद होने चाहिए। साथ ही गैर सरकारी स्कूलों को मान्यता देने के मानदंड कड़े करने की बात भी कही गई थी। जगह, स्टाफ, पढ़ाई और खेल के सामान के मानदंड सरकारी स्कूलों पर भी लागू हों। यह सर्वविदित है कि आज प्राईवेट स्कूल खोलना कितना सरल हो गया है और दूरस्थ गांवों तक बड़े-बड़े नाम वाले पब्लिक स्कूल खोल कर अभिभावकों की जेब काटने के धंधे पर कहीं कोई अंकुश नहीं है।आज छोटे-छोटे बच्चे होमवर्क के आतंक में दबे पड़े हैं। जबकि यशपाल समिति की सलाह थी कि प्राइमरी क्लासों में बच्चों को गृह कार्य सिर्फ इतना दिया जाना चाहिए कि वे अपने घर के माहौल में नई बात खोजें और उन्हीं बातों को विस्तार से समझें। मिडिल व उससे ऊपर की कक्षाओं में होम वर्क जहां जरूरी हो, वहां भी पाठ्य पुस्तक से नहीं हो। पर आज तो होम वर्क का मतलब ही पाठ्य पुस्तक के सवालों-जवाबों को कापी पर उतारना या उसे रटना रह गया है। कक्षा में 40 बच्चों पर एक टीचर, विशेषरूप से प्राइमरी में 30 बच्चों पर एक टीचर होने की सिफारिश खुद सरकारी स्कूलों में भी लागू नहीं हो पाई है। अब एक ही शिक्षक को एक साथ कई कक्षाएं पढ़ाने की बाकायदा ट्रेनिंग शुरू हो गई है। पत्राचार के जरिए बीएड की उपाधि देने वाले पाठ्यक्रमों की मान्यता समाप्त करने की सिफारिश भी यशपाल कमेटी ने की थी। विडंबना है कि इस रिपोर्ट को सरकार द्वारा स्वीकार कर लेने के बाद करीबन एक दर्जन विश्वविद्यालयों को पत्राचार से बीएड कोर्स की अनुमति सरकार ने ही दी।समिति ने पाठ्यक्रम को तैयार करने में विषयों के चयन, भाषा, प्रस्तुति, बच्चों के लिए अभ्यास आदि पर गहन चिंतन कर कई सुझाव दिए थे। उन सब की चर्चा रिपोर्ट जारी होने के समय खूब हुई। पर धीरे-धीरे शैक्षिक संस्थाओं को दुकान बनाने वाले काकस का पंजा कसा और सबकुछ पहले जैसा ही होने लगा। भाषा के मायने संस्कृतनिष्ठ जटिल वाक्य हो गए, तभी बच्चे कहने में नहीं हिचकिचाते हैं कि वे श्वसन क्रिया तो करते ही नहीं हैं।आज हमारे देश में शिक्षा के नाम पर विदेशी पैसे की बाढ़ आई हुई है। उसे मनमाने तरीके से उड़ाने वाले यह नहीं सोच रहे हैं कि यह धन हमारे देश पर यानी हम सभी पर कर्ज है, जिसे मय सूद के लौटाना है। पैसा विदेशी है तो उससे क्रियान्वित होने वाली अवधारणाएं व प्रक्रियाएं भी सात समंदर पार वाली हैं। ऐसे में स्थानीय देश, काल व परिस्थितियों को ध्यान में रख कर तैयार प्रो. यशपाल व उनके आठ सहयोगियों की रपट अधिक कारगर व सटीक होगी। डीपीईपी, सर्व शिक्षा अभियान, स्कूल चलो या शिक्षा गारंटी योजना जैसे प्रयोग स्कूल में बच्चों के नामांकन को भले ही बढ़ा सकते हैं, शब्द व अंक को पहचानने वाले साक्षरों के आंकड़ों में शायद इजाफा भी हो जाए, पर शिक्षा का मूल उद्देश्य यानी जागरूक नागरिक कहीं नहीं दिखेगा। अपने वजन से अधिक का बस्ता ढोते बच्चों के लिए शिक्षा भी महज एक बोझ बनकर रह गई है। काश, इससे उबरने की सुध कोई लेता!
= पंकज चतुर्वेदी

गुरुवार, 12 नवंबर 2015

Hungry country and wastage of food

भूखी आबादी बनाम अन्न की बर्बादी

                                                      पंकज चतुर्वेदी

देश में हर साल उतना गेहूं बर्बाद होता है, जितना आस्ट्रेलिया की कुल पैदावार है। नष्ट हुए गेहूं की कीमत लगभग 50 हजार करोड़ रु. होती है और इससे 30 करोड़ लोगों को सालभर भरपेट खाना दिया जा सकता है। हमारा 2.1 करोड़ टन अनाज केवल इसलिए बर्बाद हो जाता है क्योंकि उसके लिए हमारे पास माकूल भंडारण की सुविधा नहीं है एक साल में जितना सरकारी खरीदी का धान व गेहूं खुले में पड़े होने के कारण मिट्टी हो जाता है, उससे ग्रामीण अंचलों में पांच हजार वेयरहाउस बनाए जा सकते हैं। यह आंकड़ा किसी से दबा-छुपा नहीं है, बस जरूरत है तो योजनाबद्ध और ईमानदार प्रयास करने की

Rashtriy Sahara 13-11-15

पिछले महीने अस्सी साल बाद जारी किए गए सामाजिक, आर्थिक और जातीय जनगणना के आंकड़े भारत की चमचमाती तस्वीर के पीछे का विद्रूप चेहरा उजागर करने के लिए काफी हैं। देश के 51.14 प्रतिशत परिवारों की आय का जरिया महज अस्थाई मजदूरी है। 4.08 लाख परिवार कूड़ा बीन कर, तो 6.68 लाख परिवार भीख मांग कर अपना गुजारा करते हैं। गांव में रहने वाले 39.39 प्रतिशत परिवारों की औसत मासिक आय दस हजार रुपये से भी कम है। आय और व्यय में असमानता की हर दिन गहरी होती खाई का ही परिणाम है कि कुछ दिनों पहले ही संयुक्त राष्ट्र के खाद्य व कृषि संगठन द्वारा जारी की गई रपट में बताया गया है कि भारत में 19.4 करोड़ लोग भूखे सोते हैं। हालांकि सरकार के प्रयासों से पहले के मुकाबले ऐसे लोगों की संख्या कम हुई है। हमारे यहां बीपीएल यानी गरीबी की रेखा से नीचे जीवनयापन करने वालों की संख्या को ले कर भी गफलत है। हालांकि यह आंकड़ा 29 फीसद के आसपास सर्वमान्य-सा है। भूख, गरीबी, कुपोषण व उससे उपजने वाली स्वास्य, शिक्षा, मानव संसाधन प्रबंधन की दिक्क्तें देश के विकास में सबसे बड़ी बाधक हैं। हमारे यहां न तो अन्न की कमी है और न ही रोजगार के लिए श्रम की। कागजों पर योजनाएं भी हैं, लेकिन कमी है तो उन योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए जिम्मेदार स्थानीय स्तर की मशीनरी में जिम्मेदारी और संवेदना की। जिस देश में नए खरीदे गए अनाज को रखने के लिए गोदामों में जगह नहीं है, जहां सामाजिक जलसों में परोसा जाने वाला आधे से ज्यादा भोजन कूड़ा-घर का पेट भरता है, वहां ऐसे भी लोग हैं, जो अन्न के एक दाने के अभाव में दम तोड़ देते हैं। बंगाल के बंद हो गए चाय बागानों में आए रोज मजूदरों के भूख के कारण दम तोड़ने की बात हो या फिर महाराष्ट्र में अरबपति शिरडी मंदिर के पास ही मेलघाट में हर साल हजारों बच्चों की कुपोषण से मौत की खबर या फिर राजस्थान का बारां जिला हो या मध्यप्रदेश का शिवपुरी जिला, जहां आदिवासियों की बस्ती में पैदा होने वाले कुल बच्चों के अस्सी फीसद के उचित खुराक न मिल पाने के कारण छोटे में ही मर जाने के वाकये
Peoples samachar 16-11-15
इस देश में हर रोज हो रहे हैं। लेकिन विज्ञापन में मुस्कुराते चेहरों, दमकती सुविधाओं के फेर में वास्तविकता से परे उन्मादित भारतवासी तक ऐसी खबरें या तो पहुंच नहीं रही हैं या उनकी संवेदनाओं को झकझोर नहीं रही हैं। देशभर के कस्बे-शहरों से आए रोज गरीबी, कर्ज व भुखमरी के कारण आत्महत्या की खबरें आती हैं, लेकिन वे किसी अखबार की छोटी-सी खबर बन कर समाप्त हो जाती है। इन दिनों बुंदेलखंड की आधी ग्रामीण आबादी सूखे से हताश होकर पेट पालने के लिए अपने घर-गांव से पलायन कर चुकी है।भूख से मौत या पलायन, वह भी उस देश में जहां खाद्य और पोषण सुरक्षा की कई योजनाएं अरबों रुपये की सब्सिडी पर चल रही हैं, जहां मध्याह्न भोजन योजना के तहत हर दिन 12 करोड़ बच्चों को दिन का भरपेट भोजन देने का दावा हो, जहां हर हाथ को काम व हर पेट को भोजन के नाम पर हर दिन करोड़ों का सरकारी फंड खर्च होता हो; दर्शाता है कि योजनाओं व हितग्राहियों के बीच अब भी पर्याप्त दूरी है। वैसे भारत में हर साल पांच साल से कम उम्र के 10 लाख बच्चों के भूख या कुपोषण से मरने के आंकड़े संयुक्त राष्ट्र ने जारी किए हैं। ऐसे में नवरात्रि पर गुजरात के गांधीनगर जिले के एक गांव में माता की पूजा के नाम पर 16 करोड़ रुपये दाम के साढ़े पांच लाख किलो शुद्ध घी को सड़क पर बहाने, मध्य प्रदेश में एक राजनीतिक दल के महासम्मेलन के बाद नगर निगम के सात ट्रकों में भर कर पूड़ी व सब्जी कूड़ेदान में फेंकने की घटनाएं बेहद दुर्भाग्यपूर्ण व शर्मनाक प्रतीत होती हैं।हर दिन कई लाख लोगों के भूखे पेट सोने के गैर सरकारी आंकड़ों वाले भारत देश के ये आंकड़े भी विचारणीय हैं- देश में हर साल उतना गेहूं बर्बाद होता है, जितना आस्ट्रेलिया की कुल पैदावार है। नष्ट हुए गेहूं की कीमत लगभग 50 हजार करोड़ रुपये होती है और इससे 30 करोड़ लोगों को सालभर भरपेट खाना दिया जा सकता है। हमारा 2.1 करोड़ टन अनाज केवल इसलिए बर्बाद हो जाता है, क्योंकि उसे रखने के लिए हमारे पास माकूल भंडारण की सुविधा नहीं है। देश के कुल उत्पादित सब्जी-फल का 40 फीसद समय पर मंडी तक नहीं पहुंच पाने के कारण सड़-गल जाता है। औसतन हर भारतीय एक साल में छह से 11 किलो अन्न बर्बाद करता है। जितना अन्न हम एक साल में बर्बाद करते हैं, उसकी कीमत से ही कई सौ कोल्ड स्टोरेज बनाए जा सकते हैं जो फल-सब्जी को सड़ने से बचा सके। एक साल में जितना सरकारी खरीदी का धान व गेहूं खुले में पड़े होने के कारण मिट्टी हो जाता है, उससे ग्रामीण अंचलों में पांच हजार वेयरहाउस बनाए जा सकते हैं। बस जरूरत है तो एक प्रयास करने की। यदि पंचायत स्तर पर ही एक क्विंटल अनाज का आकस्मिक भंडारण व उसे जरूरतमंद को देने की नीति का पालन हो तो कम से कम कोई भूखा तो नहीं मरेगा। बुंदेलखंड के पिछड़े जिले महोबा के कुछ लोगों ने ‘‘रोटी बैंक’ बनाया है। बैंक से जुड़े लोग भोजन के समय घरों से ताजा बनी रोटियां एकत्र करते हैं और उन्हें अच्छे तरीके से पैक कर भूखों तक पहुंचाते हैं। बगैर किसी सरकारी सहायता के चल रहे इस अनुकरणीय प्रयास से हर दिन 400 लोगों को भोजन मिल रहा है। बैंक वाले बासी या ठंडी रोटी नहीं लेते है ताकि खाने वाले का आत्मसम्मान भी जिंदा रहे। यह बानगी है कि यदि इच्छाशक्ति हो तो छोटे से प्रयास भी भूख पर भारी पड़ सकते हैं। विकास, विज्ञान, संचार व तकनीक में हर दिन कामयाबी की नई ऊंचाई छूने वाले मुल्क में इस तरह बेरोजगारी व खाना न मिलने से होने वाली मौतें मानवता व हमारे ज्ञान के लिए भी कलंक हैं। हर जरूरतमंद को अन्न पहुंचे, इसके लिए सरकारी योजनाओं को तो थोड़ा चुस्त-दुरूस्त होना होगा, समाज को भी थोड़ा संवेदनशील बनना होगा। हो सकता है कि हम इसके लिए पाकिस्तान से कुछ सीख लें, जहां शादी व सार्वजनिक समारोह में पकवान की संख्या, मेहमानों की संख्या तथा खाने की बर्बादी पर सीधे गिरफ्तारी का कानून है। जबकि हमारे यहां होने वाले शादी समारोह में आमतौर पर 30 प्रतिशत खाना बेकार जाता है। गांव स्तर पर अन्न बैंक, प्रत्येक गरीब, बेरोजगार के आंकड़े रखने जैसे कार्य में सरकार से ज्यादा समाज को अग्रणी भूमिका निभानी होगी। बहरहाल, हमें एकमत से स्वीकार करना होगा कि अंबिकापुर जिले में एक आदिवासी बच्चे की ऐसी मौत हम सभी के लिए शर्म की बात है। यह विडंबना है कि मानवता पर इतना बड़ा धब्बा लगा और उस इलाके के एक कर्मचारी या अफसर को सरकार ने दोषी नहीं पाया। भूख व कुपोषण जैसे मसलों पर सरकारी ओहदेदारों की जिम्मेदारी तय करने में कड़ाई, मुफ्त बंटने वाले भोजन की गुणवत्ता से समझौता न करना और ग्रामीण स्तर पर खाद्य सुरक्षा की योजना व क्रियान्वयन हमें भूख से मौत जैसे सामाजिक कलंक से मुक्ति दिलवा सकता है।

शनिवार, 7 नवंबर 2015

Understand the traditions and science of Diwali

दीवाली की मूल भावना को भी समझो

MP Jansandesh, Satna 7-11-15

उत्तर वैदिक काल में शुरू हुई आकाश दीप की परंपरा को कलयुग में दीवाली के रूप में मनाया जाता है।  श्राद्ध पक्ष में भारत में अपने पुरखों को याद करने के बाद जब वे वापस अपने लोकों को लौटते थे तो उनके मार्ग को आलोकित करने के लिए लंबे-लंबे बाँसों पर कंदील जलाने की परंपरा बेहद प्रचीन रही है। फिर द्वापर युग में राजा राम लंका विजय के बाद अयोध्या लौटे तो नगरवासियों ने अपने-अपने घर के दरवाजों पर दीप जला कर उनका स्वागत किया। हो सकता है कि किसी सैनिक परिवार ने कुछ आग्नेय अस्त्र-शस्त्र चलाए हों, लेकिन दीपावली पर आतिशबाजी चलाने की परंपरा के बहुत पुराना होने के कोई प्रमाण मिलते नहीं हैं। हालांकि अब तो देश की सर्वोच्च अदालत ने भी कह दिया कि पूर्व में घोषित दिशा निर्देशों के अनुरूप आतिशबाजी चलाने पर कोई पाबंदी लगाई नहीं जा सकती। लेकिन यह भी जानना जरूरी है कि समाज व संस्कृति का संचालन कानून या अदालतों से नहीं बल्कि लोक कल्याण की व्यापक भावना से होता रहा है और यही इसके सतत पालन व अक्षुण्ण रहे का कारक भी है।
दीपावली की असल भावना को ले कर कई मान्यताएं हैं और कई धार्मिक आख्यान भी। यदि सभी का अध्ययन करें तो उनकी मूल भावना भारतीय समाज का पर्व-प्रेम, उल्लास और सहअस्तित्व की अनिवार्यता है। विडंबना है कि आज की दीपावली दिखावे, परपीड़न, परंपराओं की मूल भावनाओं के हनन और भविष्य के लिए खतरा खड़ा करने की संवेदनशील औजार बन गई हे। अभी दीपावली से दस दिन पहले ही देश की राजधानी दिल्ली की आवोहवा इतनी जहरीली हो गई है कि हजरों ऐसे लेाग जो सांस की बीमारियों से पीडि़त हैं, उन्हें मजबूरी में शहर छोड़कर जाना पड़ रहा है, हालांकि अभी आतिशबाजी शुरू नहीं हुई है। अभी तो बदलते मौसम में भारी होती हवा, वाहनों के प्रदूषण, धूल व कचरे को जलाने से उत्पन्न धुंए के घातक परिणाम ही सामने आए हैं।  भारत का लोक गर्मियों में खुले में,छत पर सोता था,। किसान की फसल तैयार होती थी तो वह खेत में होता था। दीपावली ठंड के दिनों की शुरूआत होता हे। यानि लोक को अब अपने घर के भीरत सोना शुरू करना होता था। पहले बिजली-रोशनी तो थी नहीं। घरों में सांप-बिच्छू या अन्य कीट-मकोड़े होना आम बात थी। सो दीपावली के  पहले घरें की सफई की जाती थी व घर के कूड़े को दूर ले जा कर जलाया जाता था। उस काल में घर के कूउ़े में काष्ठ, कपड़ा या पुरना अनाज ही हेाता था। जबकि आज के घर कागज, प्लास्टिक, धातु व और ना जाने कितने किस्म के जहरीले पदार्थों के कबाड़े से भरे होते हैं। दीवारों पर लगाया गया इनेमल-पैंट भी रसायन ही हेाता है। इसकी गर्द हवा को जबरदस्त तरीके से दूषित करती हे। सनद रहे कि दीपावली से पहले शहर की हवा विषैली होनो के लिए दिल्ली का उदाहरण तो बानगी है, ठीक यही हालात देश के सभी महानगरों, से ले कर कस्बों तक के हैं।
Raj Express Bhopal 11-11-15
दुखद है कि हम साल में एक दिन बिजली बंद कर ‘पृथ्वी दिवस’ मानते हैं व उस दौरान धरती में घुलने से बचाए गए कार्बन की मात्रा का कई सौ गुणा महज दीपावली के चंद घंटों में प्रकृति में जोड़ देते हैं। हम जितनी बिजली बेवजह फूंकते हैं, उसके उत्पादन में प्ररूकुर्त इंधन, तथा उसे इस्तेमाल से निकली उर्जा उतना ही कार्बन प्रकृति में उड़ेल देता हे। कार्बन की बढती मात्रा के कारण जलवायु चक्र परिवर्तन,  धरती का तापमान बढना जैसी कई बड़ी दिक्कतें समाने आ रही हैं। काश हम दीपावली पर बिजली के बनिस्पत दीयों को ही प्राथमिकता दे। इससे कई लोगों को रोजगार मिलता है, प्रदूषण कम होता है और पर्व की मूल भावना जीवंत रहती है।
दीपावली में सबसे ज्यादा जानलेवा भूमिका होती है आतिशबाजी या पटाखों की। खासतौर पर चीनी पटाखों में तो बेहद खतरनाक रसायन होते हैं जो सांस लेने की दिक्कत के साथ-साथ फैंफडों के रोग दीर्घकालिक हो सकते हैं।  दीवाली पर आतिशबाजी के कारण होने वाले वायु प्रदूषण को लेकर अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के डॉक्टरों का यह खुलासा चौंकाने वाला है कि इससे न केवल सांस की बीमारी बढ़ती है, बल्कि गठिया व हड्डियों के दर्द में भी इजाफा हो जाता है। संस्थान द्वारा इस बार शोध किया जाएगा कि दीपावली पर आतिशबाजी जलाने के कारण हवा में प्रदूषण का जो जहर घुलता है, उसका गठिया व हड्डी के मरीजों पर कितना असर पड़ता है। एम्स के विशेषज्ञों का कहना है कि अब तक हुए शोध में यह पाया गया है कि वातावरण में पार्टिकुलेट मैटर 2.5 का स्तर अधिक होने पर गठिया के मरीजों की हालत ज्यादा खराब हो जाती है। चूंकि दीपावली में आतिशबाजी के कारण प्रदूषण का स्तर बहुत बढ़ जाता है, लिहाजा इस बार गठिया के मरीजों पर दीपावली में होने वाले प्रदूषण के असर पर शोध किया जाएगा।
विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण भी गठिया की बीमारी के लिए जिम्मेदार कारक हैं। इस मामले में पिछले दो वर्षो से शोध चल रहा है। केंद्र सरकार के विज्ञान व प्रौद्योगिकी विभाग की मदद से किए जा रहे देश में अपनी तरह के इस अनूठे शोध के तहत गठिया के 400 व 500 सामान्य व्यक्तियों पर अध्ययन किया जा रहा है। यह शोध रिपोर्ट वर्ष 2016 तक आएगी। दिल्ली में दीपावली सबसे ज्यादा धूमधाम से मनाई जाती है। इस त्योहार पर राजधानी सचमुच किसी दुल्हन की तरह सजाई-संवारी जाती है। लेकिन इस साज-सज्जा का एक स्याह पक्ष यह भी है कि दीपों के त्योहार के इस मौके पर दिल्ली में इतनी ज्यादा आतिशबाजी होती है कि कई बार तो दीवाली के अगले दिन तक पूरे वातावरण में प्रदूषण की धुंध सी छाई रहती है। यह प्रदूषण बीमार लोंागें के लिए तो मुसीबत खड़ा करता ही है, स्वस्थ व्यक्ति को बीमार बना देता है।
आतिशबाजी के धुंए, आग, आवाज के शिकार इंसान तो होते ही हैं, पशु-पक्षी, पेड़, जल स्त्रोत भी इसके कुप्रभाव से कई महीनों तक हताश-परेशान रहते हैं। विडंबना है कि आज पढा लिखा व आर्थिक रूप से संपन्न समाज महज दिखावे के लिए हजारों-हजार करोड़ की आतिशबाजी फूंक रहा हे। इससे पैसे की बर्बादी तो होती ही हैं, लेकिन सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचता है पर्यावरण को। ध्वनि और वायु प्रदूषण दीपावली पर बेतहाशा बढ़ जाता है। जो कई बीमारियों का कारण है।
दीवाली के बाद अस्पतालों में अचानक 20 से 25 प्रतिशत ऐसे मरीजों की संख्या में वृद्धि हो जाती है जिसमें अधिकतर लोग सांस संबंधी व अस्थमा जैसी समस्या से पीडि़त होते हैं। हर साल  विश्व में 2 से चार लाख लोगों की मौत वायु प्रदूषण की वजह से होती है। वातावरण में धूल व धुएं के रूप में अति सूक्ष्म पदार्थ मुक्त तत्वों का हिस्सा होता है, जिसका व्यास 10 माइक्रोमीटर होता है, यही वजह है कि यह नाक के छेद में आसानी से प्रवेश कर जाता है, जो सीधे मानव शरीर के श्वसन प्रणाली, हृदय, फेफड़े को प्रभावित करता है। इसका सबसे ज्यादा प्रभाव छोटे बच्चे और अस्थमा के मरीजों पर होता है।  धुंध (स्मॉग) की वजह से शारीरिक परिवर्तन से लेकर सांस फूलना, घबराहट, खांसी, हृदय व फेफड़ा संबंधी दिक्कतें, आंखों में संक्रमण, दमा का अटैक, गले में संक्रमण आदि की परेशानी होती है। केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के अनुसार दिल्ली में पटाखों के कारण दीपावली के बाद वायु प्रदूषण छह से दस गुना और आवाज का स्तर 15 डेसिबल तक बढ़ जाता है। इससे सुनने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। तेज आवाज वाले पटाखों का सबसे ज्यादा असर बच्चों, गर्भवती महिलाओं तथा दिल और सांस के मरीजों पर पड़ता है। मनुष्य के लिए 60 डेसिबल की आवाज सामान्य होती है। इससे 10 डेसिबल अधिक आवाज की तीव्रता दोगुनी हो जाती है, जो मनुष्य के स्वास्थ्य के लिए घातक होती है। दुनिया के कई देशों में रंगारंग आतिशबाजी करने की परंपरा है। आकाश को जगमग करने के लिए बनाए जाने वाले पटाखों में कम से कम 21 तरह के रसायन मिलाए जाते हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि 20 मिनट की आतिशबाजी पर्यावरण को एक लाख कारों से ज्यादा नुकसान पहुंचाती है।
जाहिर है कि दीपावली का मौजूदा स्वरूप ना तो शास्त्र सम्मत है और ना ही लोक परंपराओं के अनूरूप और ना ही प्रकृति, इंसान व जीवजगत के लिए कल्याणाकरी, तो  फिर क्यों ना दीपावली पर लक्ष्मी को घर बुलाएं, सरस्वती का स्थाई वास कराएं ओर एकदंत देव की रिद्धी-सिद्धी का आव्हान करें- दीपावली दीयों के साथ, अपनों के साथ, मुसकान के साथ आतिशबाजी रहित ही मनाएं।

गुरुवार, 5 नवंबर 2015

Urgent need of Police reforms

क्यों नहीं रहा पुलिस का डर

पंकज चतुर्वेदी


पिछले कुछ महीनों से दिल्ली और करीबी एनसीआर के जिलों- गाजियाबाद, नोएडा, गुडगावं व फरीदाबाद में सरेआम अपराधों की जैसे झड़ी ही लग गई है। भीड़भरे बाजार में जिस तरह से हथियारबंद अपराधी दिनदहाड़े लूटमार करते हैं , महिलाओं की जंजीर व मोबाईल फोन झटक लेते हैं, बैंक में लूट तो ठीक ही है, अब तो एटीएम मषीन उखाड़ कर ले जाते हैं; इससे साफ है कि अपराधी पुलिस से दो कदम आगे हैं और उन्हें कानून या खाकी वर्दी की कतई परवाह नहीं है। पुलिस को मिलने वाला वेतन और कानून व्यवस्था को चलाने के संसाधन जुटाने पर उसी जनता का पैसा खर्च हो रहा है जिसके जानोमाल की रक्षा का जिम्मा उन पर है। दिल्ली और एनसीआर बेहद संवेदनषील इलाका है और यहां की पुलिस से सतर्कता और अपराध नियंत्रण के लिए अतिरिक्त चैकस रहने की उम्मीद की जाती है। विडंबना है कि एनसीआर की पुलिस में कर्मठता और व्यावसायिकता की बेहद कमी है। वैसे यहां पुलिस की दुर्गति का मूल कारण सरकार की पुलिस संबंधी नीतियों का पुराना व अप्रासंगिक होना है।
ऐसा नहीं है कि पुलिस खाली हाथ हैं, आए रोज कथित बाईकर्स गेंग पकड़े जाते हैं, बड़े-बड़े दावे भी होते हैं लेकिन अगले दिन ही उससे भी गंभीर अपराध सुनाई दे जाते हैं। लगता है कि दिल्ली व पड़ोसी इलाकों में दर्जनों बाईकर्स-गैंग काम कर रहे हैं और उन्हें पुलिस का कोई खौफ नहीं हैं। अकेले गाजियाबाद जिले की हिंडन पार की कालोनियों में हर रोज झपटमारी की दर्जनों घटनाएं हो रही हैं और अब पुलिस ने मामले दर्ज करना ही बंद कर दिया है। जिस गति से आबादी बढ़ी उसकी तुलना में पुलिस बल बेहद कम है। मौजूद बल का लगभग 40 प्रतिषत  नेताओं व अन्य महत्वपूर्ण लोगों की सुरक्षा में व्यस्त है। खाकी को सफेद वर्दी पहना कर उन्हीं पर यातायात व्यवस्था का भी भार है। अदालत की पेषियां, अपराधों की तफ्तीष, आए रोज हो रहे दंगे, प्रदर्षनों को झेलना। कई बार तो पुलिस की बेबसी पर दया आने लगती है।
मौजूदा पुलिस व्यवस्था वही है जिसे अंग्रेजों ने 1857 जैसी बगावत की पुनरावृत्ति रोकने के लिए तैयार किया था।  अंग्रेजों को बगैर तार्किक क्षमता वाले आततायियों की जरूरत थी ,इसलिए उन्होंने इसे ऐसे रूप में विकसित किया कि पुलिस का नाम ही लोगों में भय का संचार करने को पर्याप्त हो। आजादी के बाद लोकतांत्रिक सरकारों ने पुलिस को कानून के मातहत जन-हितैषी संगठन बनाने की बातें तो कीं लेकिन इसमें संकल्पबद्धता कम और दिखावा ज्यादा रहा। वास्तव में राजनीतिक दलों को यह समझते देर नहीं लगी कि पुलिस उनके निजी हितों के पोषण में कारगर सहायक हो सकती है और उन्होंने सत्तासीन पार्टी के लिए इसका भरपूर दुरुपयोग किया। परिणामतः आम जनता व पुलिस में अविश्वास की खाई बढ़ती चली गयी और समाज में असुरक्षा और अराजकता का माहौल बन गया। शुरू-शुरू में राजनैतिक हस्तक्षेप का प्रतिरोध भी हुआ। थाना प्रभारियों ने विधायकों व मंत्रियों से सीधे भिड़ने का साहस दिखाया पर जब ऊपर के लोगों ने स्वार्थवश हथियार डाल दिये तब उन्होंने भी दो कदम आगे जाकर राजनेताओं को ही अपना असली आका बना लिया। अन्ततः इसकी परिणति पुलिस-नेता-अपराधी गठजोड़ में हुई जिससे आज पूरा समाज इतना त्रस्त है कि सर्वोच्च न्यायालय तक ने पुलिस में कुछ ढांचागत सुधार तत्काल करने की सिफारिषें कर दीं। लेकिन लोकषाही का षायद यह दुर्भाग्य ही है कि अधिकांष राज्य सरकारें सुप्रीम कोर्ट के इस आदेष को नजरअंदाज कर रही हैं। परिणति सामने है- पुलिस अपराध रोकने में असफल है।
कानून व्यवस्था या वे कार्य जिनका सीधा सरोकार आम जन से होता है, उनमें थाना स्तर की ही मुख्य भूमिका होती है। लेकिन अब हमारे थाने बेहद कमजोर हो गए हैं। वहां बैठे पुलिसकर्मी आमतौर पर अन्य किसी सरकारी दफ्तर की तरह क्लर्क का ही काम करते हैं। थाने आमतौर पर षरीफ लोगों को भयभीत और अपराधियों को निरंकुष बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। आज जरूरत है कि थाने संचार और परिवहन व अन्य अत्याधुनिक तकनीकों से लैस हांे। बदलती परिस्थितियों के अनुसार थानों के सशक्तीकरण महति है। आज अपराधी थानें में घुस कर हत्या तक करने में नहीं डरते। कभी थाने उच्चाधिकारियों और शासन की प्रतिष्ठा की रक्षा के सीमावर्ती किलों की भांति हुआ करते थे। जब ये किले कमजोर हो गये तो अराजक तत्वों का दुस्साहस इतना बढ़ गया कि वे जिला पुलिस अधीक्षक से मारपीट और पुलिस महानिदेशक की गाड़ी तक को रोकने से नहीं डरते हैं।
रही बची कसर जगह-जगह अस्वीकृत चैकियों, पुलिस सहायता बूथों, पिकेटों आदि की स्थापना ने पूरी कर दी है। इससे पुलिस-शक्ति के भारी बिखराव ने भी थानों को कमजोर किया है। थानों में ”स्ट्राइकिंग फोर्स“ नाममात्र की बचती है। इससे किसी समस्या के उत्पन्न होने पर वे त्वरित प्रभावी कार्यवाही नहीं कर पाते हैं । तभी पुलिस थानों के करीब अपराध करने में अब अपराधी कतई नहीं घबराते हैं।
पुलिस सुधारों में अपराध नियंत्रण, घटित अपराधों की विवेचना और दर्ज मुकदमें को अदालत तक ले जाने के लिए अलग-अलग  विभाग घटित करने की भी बात है।  सनद रहे अभी ये तीनों काम  एक ही पुलिस बल के पास है, तभी आज थाने का एक चैथाई स्टाफ हर रोज अदालत के चक्कर लगाता रहता है। नियमित पेट्रोलिंग लगभग ना के बराबर है। यह भी एक दुखद हकीकत है कि पुलिस को गष्त के लिए पेट्रोल बहुत कम या नहीं मिलता है। पुलिसकर्मी अपने स्तर पर इंधन जुटाते हैं, जाहिर है कि इसके लिए गैरकानूनी तरीकों का सहारा लेना ही पड़ता होगा।  दिल्ली एनसीआर में कई थाने ऐसे है, जहां टेलीफोन कनेक्षन कट चुके है। समीपवर्ती गाजियाबाद जिले की पुलिस तो अभी भी सन 65 के माडल की जीप पर गष्त कर रही है, जबकि अपराधी पलक झपकते ही हवा से बातें करने वाली मोटरसाईकल पर सवार होते हैं।  यहं उल्लेखनीय है कि पाकिस्तान के कराचीं में पुलिस विषेश रूप से तैयार किए गए तिपहिया स्कूटरों पर गष्त करती है। एक तो उस पर एक साथ तीन पुलिसवाले सवार हो जाते हैं, फिर इसमें इंधन का खर्च कम है और साथ ही यह तेज गति से गलियों में भी दौड़ लेता है।
इन दिनों पुलिस सुधार का हल्ला चल रहा है । सुप्रीम कोर्ट भी इस बारे में निर्देश दे चुका हैं, लेकिन देश का नेता पुलिस का उपनिवेशिक चेहरे को बदलने में अपना नुकसान महसूस करता है । तभी विवेचना और कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए अलग-अलग एजेंसियों की व्यवस्था पर सरकार सहमत नहीं हो पा रही है ।  वे नहीं चाहते हैं कि थाना प्रभारी जैसे पदों पर बहाली व तबादलों को समयबद्ध किया जाए।  इसी का परिणाम है कि दिल्ली एनसीआर में अपराधी पुलिस की कमजोरियों का भरपूर लाभ उठा रहे हैं। ़
वैसे भी अपराधों में इजाफा महानगरीय अपसंस्कृति का एक अभिन्न हिस्सा है। कोई एक दषक पहले दिल्ली नगर निगम के स्लम विभाग द्वारा करवाए गए एक सर्वेक्षण की रिपोर्ट भले ही कहीं लाल बस्ते में बंध कर गुम हो गई हे, लेकिन वह है आज भी प्रासंगिक। निगम के स्लम तथा जे जे विभाग की रिपोर्ट में कहा गया था कि राजधानी में अपराधों में ताबडतोड बढ़ौतरी के सात मुख्य कारण हैं - अवांछित पर्यावरण, उपेक्षा तथा गरीबी, खुले आवास, बडा परिवार, अनुशासनहीनता व नई पीढी का बुजुर्गों के साथ अंतर्विरोध और नैतिक मूल्यों में गिरावट। पुलिस की मौजूदा व्यवस्था इन कारकों के प्रति कतई संवेदनषील नहीं है। वह तो डंडे और अपराध हो जाने के बाद अपराधी को पकड़ कर जेल भेजने की सदियों पुरानी नीति पर ही चल रही है।
आज जिस तरह समाज बदल रहा है, उसमें संवेदना और आर्थिक सरोकार प्रधान होते जा रहे हैं, ऐसे में सुरक्षा एजेंसियों की जिम्मेदारी, कार्य प्रणाली व चेहरा सभी कुछ बदलना जरूरी है ।  आज जरूरत डंडे का दवाब बढ़ाने की नहीं है, सुरक्षा एजेंसियों को समय के साथ आधुनिक बनाने की है ।


पंकज चतुर्वेदी
सहायक संपादक
नेषनल बुक ट्रस्ट इंडिया
 नेहरू भवन, वसंत कुंज इंस्टीट्यूषनल एरिया फेज-2
 वसंत कुंज, नई दिल्ली-110070
 संपर्क- 9891928376




रविवार, 1 नवंबर 2015

Hiamlaya ecology wants glacior development authority


ग्लैशियर विकास प्राधिकरण का गठन हो

                                                                                                                                                               पंकज चतुर्वेदी


वरिष्ठ पत्रकार 
Lokmat samachar 1-11-15
ग्लो बल वार्मिंग या धरती का गरम होना, कार्बन उत्सर्जन, जलवायु परिवर्तन और इसके दुष्परिणाम स्वरूप स्वयं धरती के शीतलीकरण का काम कर रहे ग्लेशियरों पर आ रहे भयंकर संकट व उसके कारण समूची धरती के अस्तित्व के खतरे की बातें अब महज कुछ पर्यावरण-विशेषज्ञों तक सीमित नहीं रह गई हैं. इसका विर्मश बच्चों की पाठ्यपुस्तकों तक में है. कहा जा रहा है कि जल्द ही हिमालय के ग्लेशियर पिघल जाएंगे, जिसके चलते नदियों में पानी बढे.गा और उसके परिणामस्वरूप जहां एक तरफ कई नगर-गांव जलमग्न हो जाएंगे, वहीं धरती के बढ.ते तापमान को थामने वाली छतरी के नष्ट होने से भयानक सूखा, बाढ. व गरमी पडे.गी और जाहिर है कि ऐसे हालात में मानव-जीवन पर भी संकट होगा. 
हिमालय पर्वत के उत्तराख्ांड वाले हिस्से में छोटे-बडे. कोई 1439 ग्लेशियर हैं. राज्य के कुल क्षेत्रफल का बीस फीसदी इन बर्फ-शिलाओं से आच्छादित है. इन ग्लेशियर से निकलने वाला जल पूरे देश की खेती, पेयजल, उद्योग, बिजली, पर्यटन आदि के लिए जीवनदायी स्रोत है. जाहिर है कि ग्लेशियर के साथ हुई कोई भी छेड.छाड. पूरे देश के पर्यावरणीय, सामाजिक, आर्थिक और सामरिक संकट का कारक बन सकती है. इसीलिए सन् 2010 में उत्तरांचल के तत्कालीन मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल 'निशंक' ने राज्य में 'स्नो एंड ग्लेशियर प्राधिकरण' के गठन की पहल की थी. उन्होंने इसरो यानी इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गनाईजेशन के निर्देशन में स्नो एंड अवेलांश स्टडीज इस्टेब्लिशमेंट, चंडीगढ. व देहरादून के वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालय स्टडीज के सहयोग से ऐसे प्राधिकरण के गठन की प्रक्रिया भी प्रारंभ कर दी थी. दुर्भाग्य से वे उसके बाद कुछ ही दिन मुख्यमंत्री रहे व अगले मुख्यमंत्री ने इस महत्वाकांक्षी परियोजना को ठंडे बस्ते में डाल दिया. 
हिमालय की हिमाच्छादित चोटियों पर बर्फ के वे विशाल पिंड जो कि कम-से-कम तीन फुट मोटे व दो किलोमीटर तक लंबे हों, हिमनद, हिमानी या ग्लेशियर कहलाते हैं. ये अपने ही भार के कारण नीचे की ओर सरकते रहते हैं. इनकी गति बेहद धीमी होती है, चौबीस घंटे में बामुश्किल चार या पांच इंच.
कोई एक दशक पहले जलवायु परिवर्तन पर अंतर्राष्ट्रीय पैनल (आईपीसीसी) ने दावा किया कि धरती के बढ.ते तापमान के चलते संभव है कि सन् 2035 तक हिमालय के ग्लेशियरों का नामोनिशान मिट जाए. उदाहरण के तौर पर कश्मीर के कौलहाई हिमनद के आंकडे. देकर बताया गया कि वह एक साल में 20 मीटर सिकुड. गया, जबकि एक अन्य छोटा ग्लेशियर लुप्त हो गया. ठीक इसके विपरीत फ्रांस की एक संस्था ने उपग्रह चित्रों के माध्यम से यह सिद्ध कर दिया है कि हिमालय के ग्लेशियरों पर ग्लोबल वार्मिंग का कोई खास असर नहीं पड.ा है. 
इसमें कोई शक नहीं कि ग्लेशियर हमारे लिए उतने ही जरूरी हैं जितना साफ हवा या पानी, लेकिन यह भी सच है कि अभी तक हम ग्लेशियर की दुनिया के अनंत सत्यों को पहचान ही नहीं पाए हैं. कुछ वैज्ञानिकों का तो यह भी कहना है कि गंगा-जमुना जैसी नदी के जनक ग्लेशियरों की गहराई में स्फटिक जैसी ऐसी संरचनाएं हैं जो सामान्य तापमान में भी लंबे समय तक स्वच्छ पानी का स्रोत हैं. ग्लेशियर हमारे देश के अस्तित्व की पहचान हैं और कुछ देश इस संरचना के रहस्यों को जानने में रुचि केवल इसलिए रखते हैं ताकि भारत की किसी कमजोर कड.ी को तैयार किया जा सके. इसी फिराक में ग्लोबल वार्मिंग व ग्लेशियर पिघलने के शोर होते हैं और ऐसे में शोध के नाम पर अन्य हित साधने का भी अंदेशा बना हुआ है. ऐसे अंतर्विरोधों व आशंकाओं के निर्मूलन का एक ही तरीका है कि राज्य में ग्लेशियर अध्ययन के लिए सर्वसुविधा व अधिकार संपन्न प्राधिकारण का गठन किया जाए जिसका संचालन केंद्र के हाथों में हो. ल्ल■ हिमालय पर्वत के उत्तराख्ांड वाले हिस्से में छोटे-बडे. कोई 1439 ग्लेशियर हैं. राज्य के कुल क्षेत्रफल का बीस फीसदी इन बर्फ-शिलाओं से आच्छादित है.

The right to a dignified farewell and a new standard in medical world

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