My writings can be read here मेरे लेख मेरे विचार, Awarded By ABP News As best Blogger Award-2014 एबीपी न्‍यूज द्वारा हिंदी दिवस पर पर श्रेष्‍ठ ब्‍लाॅग के पुरस्‍कार से सम्‍मानित

शुक्रवार, 30 सितंबर 2016

when question answered by mother-sister slang

क्या सवाल खडा करना देशद्रोह होता है ?

जब कभी देश-दुनिया में कुछ ऐसी हलचल होती है जिसमें विचारों और मान्यताओं में विविधता होती है, फेसबुक पर बहुत से लेागों को मुझे अलविदा कहना होता है, कुछ मेरे मित्र सूची में होते हैं , कुछ ऐसे ही आगंतुक। जाहिर है कि यह एक आभासी दुनिया है व कहा जाता है कि इसमें रि्श्‍ते ना तो भावनात्मक है और ना चिरस्थाई और ना ही यहां बने रिश्‍तों का कोई महत्व है। यह सभी मानते हैं कि फेसबुक जैसे सोशल यानि सामाजिक (?) मंच विचारों के निर्वाध प्रवाह के माध्यम हैं लेकिन जब असहमति के विचार असामाजिकता की चरम सीमा तक चले जाएं तो अपने यहां होने की जरूरत पर एक दोराहे पर खड़ा पाता हूं।
हाल का मसला है पाकिस्तान में घुस कर भारतीय सेना की कार्यवाही को ले कर। शुरूआत में जो खबर आई, उससे अच्छा लगा कि भारतीय सेना ने आतंकवादियों पर सीधे कार्यवाही कर एक दृढ संदेश दिया। कहने की जरूरत नहीं है कि देश पर सभी का हक है और देशहित पर सभी एक हैंं। भारतीय सेना किसी दल की नहीं हैं और सरकारे बदलने के साथ सेना का चरित्र नहीं बदलता।
कल शाम पाकिस्तान के अखबारों ने अपना पक्ष रखा और एक खबर लगाई कि भारत का एक जवान उनके कब्जे में है। उसका नाम, पहचान सभी कुछ पाकिस्तान की साईट पर था। यहां से सवाल उठा कि भारतीय फौज दावा कर रही थी कि उसको कोई नुकसान नहीं हुआ, क्या यह संदेहास्पद तो नहीं है? क्योंकि सुबह होते-होते भारतीय सेना का बयान आ गया कि वह जवान मय हथियार के रास्ता भटक कर पाकिस्तान पहुंच गया था।अब तनाव के दिनों में सीमा पर कभ्‍ज्ञी कोई भी फौजी अकेले तो घूमता नहीं है, वह एक चार या ऐसी ही बटालियन में होता हैा उसके बाद जंग के भय के बीच खाली करवाए जा रहे सीमावर्ती गांवों में सामान ढोने, इलाके में पेट्रोल-डीजल की लंबी-लंबी लाईने लगने, कालाबाजारी होने की खबरें भी आईं। मैंने लिखा कि असल में जंग की मांग करने वालें ऐसे कालाबाजारी और मनमाने दाम वसूलने वाले सबसे ज्यादा होते हैं, लेकिन यदि जंग के हालात हों तो पूरा देश एक होता है।
मेरे सवाल थे:-
1. क्या कथित सर्जिकल स्ट्राईक ठीक वैसी ही थी जैसा दावा किया जा रहा है या फिर पाकिस्तान का दावा, जिसमें हमारे कुछ जवानों के शहीद होने की बात है, वह सच है ।
2. सीमावर्ती इलाकों में गांव खाली करवाने में सरकारी गाड़िया क्यों नहीं पुहंच रही कि लोगों को पांच गुना पैसा दे कर लोडर बुक करने पड रहे हैं।
इस पोस्ट के बाद कई एक लेाग मुझे वामपंथी कह रहे थे व गालियां दे रहे थे तो कुछ लोग जिनकी दीवार जयश्रीराम के नारों व संघ के सेवकों के चित्रों से सजी थीं, मां-बहन की गालियां दे रहे थे।
क्या वामपंथी सरकारों का देश के विकास में कोई योगदान नहीं है? क्‍या कथित देशभक्‍तों ने कभी वामपंथियों के सहयोग से सरकारे नहीं चलाईं ,क्या यह कामना करना कि युद्ध को टालना चाहिए, देशद्रोह है? जो युद्धोन्माद फैला रहे हैं उनके घर आाजादी की लड़ाई से ले कर अभी तक कभी तिरंगे में लिपटी लाश आई नहीं। उन्हे पता नहीं कि किसी घर का एक कमाने वाला सदस्य जब शहीद होता है तो उसके बाद उनका जीवन कैेस चलता है। नारेबाजों ने कभी मथुरा जिले में जा कर हेमराज के परिवार को पूछा नहीं कि उस समय किए गए कितने वायदे पूरे हुए। वे तो सम्मान में झुके शस्त्र, हवा में गोली, नारे और मत विरोधियों को मां-बहन की गालियां बक कर अपने देशप्रेम का वजीफा हासिल कर लेते हैं। ये वहीं --नानस्टेट एक्टर’ हें जिनसे पाकिस्तान अपने कुकर्मों का पल्ला झाड़ता रहा है।
जो लेाग सवाल करने से डरते हैं, जो लोकतंत्र के अभिन्न अंग, प्रतिरोध से भयभीत रहते हैं, तो तर्क, तथ्य और तंत्र से बच कर नारों में भरोसा करते हैं, वे सवालों पर मां-बहन की गालियों क्यों देने लगते हैं ?
यदि आप युद्ध समर्थक हैं तो जान लें कि आप देश के विकास के समर्थक तो नहीं हैं। एक बात और यदि युद्ध थोपा जाए तो उसका ताकत से जवाब देना देश का सबसे बड़ा कर्तव्य होता है। इससे पहले हमें अपने प्रतिरक्षा तंत्र को मजबूत करना जरूरी है कि कोई ऐरा-गैरा पठानकोट या उड़ी के सेन्य इलाके में घुस न सके।
सवाल फिर वहीं खड़ा है कि क्या सवाल करना, इतना तकलीफदेह होता है कि प्रश्‍नकर्ता की मां-बहन को गालियां दी जाएं? सवाल इतने गैरजरूरी है कि उसको उठाने वाले को वामपंथी कह कर सवाल को मोथरा कर दो। अभी रिहाई मंच वाली पोस्ट पर मंच के मिश्राजी कह गए कि आप तो छुपे संघी थे, अब खुल कर आ गए, अपने स्वार्थ के कारण और नेकरधारी मेरे सवालों का जवाब मां-बहन की गालियों में तलाश रहे हैं।
क्या हर सवाल को गाली दे कर , किसी दल का लेबल लगा कर, धौंस व धमकी दे कर दबा देने से उसमें निहित देशहित के मसले गौण हो जाते हैं ? क्या यह एक ऐसा अघेाषित आापातकाल है जिसमें लंपटों को जिम्मा दे दिया गया है कि असहमति के स्वरों को गालियों की बौछार, देशप्रेम के नारों से कुचल कर रख दो? याद रखें यह भारत की संस्थाओं, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, लोकतंत्रात्मक मूल्यों को दफन करने का एक कदम है, जब सेकुलर होने को गाली करार दिया जा रहा है, जब सवालों को देशद्रोह कहा जा रहा है। जब मीडिया हिस्‍टीरिया की तरह वह सबकुछ दखिा रहा है जो समाज के मूल सवालों को मोथरा बना कर एक आभ्‍ीसी देशप्रेम के उम्‍नाद को उकसाता है ा

गुरुवार, 29 सितंबर 2016

Urban planning must have be according climate change

शहरों को खुद संभलना होगा


अब तो बरसात वाले बादल धीरे-धीरे विदा हो रहे हैं, लेकिन सावन-भादो के बीते दो महीने प्रत्येक महानगर की चकाचौंध और विकास की पोल जम कर खोल गए। यह पहली बार नहीं हो रहा है, लगभग हर साल बरसात होती है, या बगैर बरसात के भी साल रह जाता है। शहर के वाहन थम जाते हैं। यह भी सच है कि जिस तरह जाम में फंसे आम लोग केवल अपने वाहन के निकलने का रास्ता बना कर इस समस्या से मुंह मोड़ लेते हैं, उसी तरह शहरों के लोग ऐसी कोई भी दिक्कत आने पर हल्ला करना भी मुनासिब नहीं समझते, मीडिया जरूर सक्रिय रहता है और उसके बाद फिर समाज ‘‘नोन-तेल-लकड़ी’ में जीवन व्यस्त कर लेता है। शहरीकरण आधुनिकता की हकीकत है और पलायन इसका मूल, लेकिन नियोजित शहरीकरण ही विकास का पैमाना है। गौर करें कि चमकते-दमकते दिल्ली शहर की डेढ़ करोड़ हो रही आबादी में से कोई चालीस फीसदी झोपड़-झुग्गियों में रहती है, यहां की सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था पूरी तरह जर्जर है। मुंबई या कोलकाता के हालात भी इससे कहीं बेहतर नहीं हैं। आर्थिक उदारीकरण के दौर में जिस तरह खेती-किसानी से लेगों का मोह भ्ांग हुआ और जमीन को बेच कर शहरों में मजदूरी करने का प्रचलन बढ़ा है, उससे गांवों का कस्बा बनना, कस्बों का शहर और शहर का महानगर बनने की प्रक्रिया तेज हुई है। विडंबना है कि हर स्तर पर शहरीकरण की एक ही गति-मति रही, पहले आबादी बढ़ी, फिर खेत में अनाधिकृत कालोनी काट कर या किसी सार्वजनिक पार्क या पहाड़ पर कब्जा कर अधकच्चे, उजड़े से मकान खड़े हुए। कई दशकों तक ना तो नालियां बनीं या सड़क और धीरे-धीरे इलाका ‘‘अरबन-स्लम’ में बदल गया। लोग रहें कहीं भी लेकिन उनके रोजगार, यातायात, शिक्षा व स्वास्य का दबाव तो उसी ‘‘चार दशक पुराने’ नियोजित शहर पर पड़ा, जिस पर अनुमान से दस गुना ज्यादा बोझ हो गया है। परिणाम सामने हैं कि दिल्ली, मुंबई, चैन्नई, कोलकाता जैसे महानगर ही नहीं देश के आधे से ज्यादा शहरी क्षेत्र अब बाढ़ की चपेट में हैं। गौर करने लायक बात यह भी है कि साल में ज्यादा से ज्यादा 25 दिन बरसात के कारण बेहाल हो जाने वाले ये शहरी क्षेत्र पूरे साल में आठ से दस महीने पानी की एक-एक बूंद के लिए तरसते हैं। राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान, पटना के एक शोध में सामने आया है कि नदियों के किनारे बसे लगभग सभी शहर अब थोड़ी-सी बरसात में ही दम तोड़ देते हैं। दिक्कत अकेले बाढ़ की ही नहीं है, इन शहरों की दुरमट मिट्टी में पानी सोखने की क्षमता अच्छी नहीं होती है। चूंकि शहरों में अब गलियों में भी सीमेंट पोत कर आरसीसी सड़कें बनाने का चलन बढ़ गया है, और औसतन बीस फीसदी जगह ही कच्ची बची है, सो पानी सोखने की प्रक्रिया नदी-तट के करीब की जमीन में तेजी से होती है। जाहिर है कि ऐसी बस्तियों की उम्र ज्यादा नहीं है, और लगातार कमजोर हो रही जमीन पर खड़े कंक्रीट के जंगल किसी छोटे से भूकंप से भी ढह सकते हैं। याद करें दिल्ली में यमुना किनारे वाली कई कालोनियां के बेसमेंट में अप्रत्याशित पानी आने और ऐसी कुछ इमारतों के गिर जाने की घटनाएं भी हुई हैं।शहरों में बाढ़ का सबसे बड़ा कारण तो यहां के प्राकृतिक नालों पर अवैध कब्जे, भूमिगत सीवरों की ठीक से सफाई ना होना है। लेकिन इससे बड़ा कारण है हर शहर में हर दिन बढ़ते कूड़े के भंडार व उनके निबटान की माकूल व्यवस्था ना होना। अकेले दिल्ली में नौ लाख टन कचरा हर दिन बगैर उठाए या निबटान के सड़कों पर पड़ा रह जाता है। जाहिर है कि बरसात होने पर यही कूड़ा पानी को नाली तक जाने या फिर सीवर के मुंह को बंद करता है। महानगरों में भूमिगत सीवर जल भराव का सबसे बड़ा कारण हैं। जब हम भूमिगत सीवर के लायक संस्कार नहीं सीख पा रहे हैं, तो फिर खुले नालों से अपना काम क्यों नहीं चला पा रहे हैं? पॉलीथिन, घर से निकलने वाले रसायन और नष्ट न होने वाले कचरे की बढ़ती मात्रा, कुछ ऐसे कारण हैं, जोगहरे सीवरों के दुश्मन हैं। यदि शहरों में कूड़ा कम करने और उसके निबटारे के सही उपाय नहीं हुए तो नालों या सीवर की सफाई के दावे या फिर आरोप बेमानी ही रहेंगे। अब यह तय है कि आने वाले दिन शहरों के लिए सहज नहीं हैं, यह भी तय है कि आने वाले दिन शहरीकरण के विस्तार के हैं, तो फिर किया क्या जाए? आम लोग व सरकार कम से कम कचरा फैलाने पर काम करें। पॉलीथिन पर तो पूरी तरह पाबंदी लगे। शहरों में अधिक से अधिक खाली जगह यानि कच्ची जमीन हो, ढेर सारे पेड़ हों। शहरों में जिन स्थानों पर पानी भरता है, वहां उसे भूमिगत करने के प्रयास हों। तीसरा प्राकृतिक जलाशयों, नदियों को उनके मूल स्वरूप में रखने तथा उनके जलग्रहण क्षेत्र को किसी भी किस्म के निर्माण सेेमुक्त रखने के प्रयास हों। पेड़ तो वातावरण की गर्मी को नियंत्रित करने और बरसात के पानी को जमीन पर गिर कर मिट्टी काटने से बचाते ही हैं।

बुधवार, 28 सितंबर 2016

Deadly pollution in our houses

हमारे घर में भी रहता है जानलेवा प्रदूषण

पंकज चतुर्वेदी, वरिष्ठ पत्रकार 
हिंदुस्तान २९सितम्बर१६
वह अभी बमुश्किल एक महीने का था। घर से बाहर जाने का सवाल नहीं उठता। फिर भी उसे निमोनिया हो गया। पढ़े-लिखे माता-पिता यही सोचते रहे कि हम तो अच्छी तरह देखभाल करते हैं, फिर निमोनिया कैसे हो गया? घर में कोई बीड़ी-सिगरेट पीता नहीं है, उन्होंने तो मच्छरमार धूपबत्ती लगाना कभी का बंद कर रखा था। पता चला कि उनके घर के पिछले हिस्से में निर्माण-कार्य चल रहा था। जिस तरफ रेत-सीमेंट का काम हो रहा था, वहीं उस कमरे का एयरकंडीशनर लगा था, जिसका एयर फिल्टर साफ नहीं था। यह तस्वीर तो महज बानगी है कि हम घर से बाहर जिस तरह प्रदूषण से जूझ रहे हैं,घर के भीतर भी जाने-अनजाने उसको ले आए हैं।
प्रदूषण का नाम लेते ही हम वाहनों या कारखानों से निकलने वाले काले धुएं की बात करने लगते हैं, लेकिन घर के भीतर का प्रदूषण यानी ‘इनडोर पॉल्यूशन’ उससे ज्यादा घातक हो सकता है। दिल्ली, मुम्बई, चेन्नई, कोलकाता और बेंगलुरु जैसे शहरों में तो स्थिति और खराब है। यहां जनसंख्या घनत्व ज्यादा है, आवास बेहद सटे हुए हैं और हरियाली कम है। बच्चों के मामले में तो यह और खतरनाक होता जा रहा है। पिछले साल पटेल चेस्ट इंस्टिट्यूट ने पाया कि बढ़ते प्रदूषण के कारण अस्थमा के मरीज लगातार बढ़ रहे हैं। कुछ जगह तो घर के अंदर का प्रदूषण इस खतरनाक स्तर तक पहुंच गया है कि वहां के 14 प्रतिशत से भी अधिक बच्चे अस्थमा के रोगी बन चुके हैं। राजधानी दिल्ली के इस अध्ययन में सबसे खतरनाक स्थिति शाहदरा की पाई गई। यहां 394 बच्चों में से 14.2 प्रतिशत अस्थमा के शिकार पाए गए।
एक सच यह भी है कि हमने भौतिक सुखों के लिए जो कुछ भी सामान जोड़ा है, उसमें से बहुत-सा समूचे परिवेश के लिए खतरा बन गया है। नए किस्म के कारपेट, फर्नीचर, परदे सभी कुछ बारीक धूल-कणों का संग्रह स्थल बन रहे हैं और यही कण इंसान की सांस की गति में व्यवधान पैदा करते हैं। सफाई और सुगंध के रसायनों व कीटनाशकों के इस्तेमाल भले ही हमें तात्कालिक आनंद या थोड़ी सी सुविधा देते हों, लेकिन इनका फेफड़ों पर बहुत गंभीर असर होता है। इनमें से कुछ एलर्जी पैदा करते हैं, तो कुछ के नन्हे कण हमारे श्वसन तंत्र में जम जाते हैं। इसी तरह हम अपने बर्तनों को साफ करने के लिए आजकल रासायनिक सोप और लिक्विड इस्तेमाल करने लगे हैं, जो बर्तनों से गंदगी तो हटा देते हैं, लेकिन इन रसायनों के अंश उनमें जरूर छूट जाते हैं। फिर यही रसायन भोजन के साथ हमारे पेट में जा पहुंचते हैं। पिछले कुछ साल में हमारे घर से निकलने वाला कूड़ा दस गुना तक बढ़ गया है। खासकर पैकिंग की वह सामग्री, जिसे हम घर से तो निकाल देते हैं, लेकिन वह सदियों तक नष्ट नहीं होती और हमारे घर के आसपास के वातावरण में हमेशा मौजूद रहती है। घर के प्रदूषण को इन सबसे मुक्ति पाकर ही खत्म किया जा सकता है।

शुक्रवार, 23 सितंबर 2016

Every victim of terrorism is equally like arm forces

आतंकवाद: फिर क्यों ना हो स्थाई निदान !


उड़ी में सेना के मुख्यालय पर आतंकी हमले के बाद देश में प्रतिहिंसा, बदले के उन्माद के बादल छाए हैं। कई सच्ची-झूठी खबरें उड़ रही हैं लेकिन इस पर कोई गौर नहीं कर रहा कि दुनिया की सबसे ताकतवर सेना के हथिायारों का गोदाम, वह भी पाकिस्तान की सीमा पर , वह भी कश्मीर में कितना लापरवाही से रक्षित किया जा रहा था। यह बानगी है कि हमारे देश में सुरक्षा बल अभी भी मोर्चा लेने में तो अव्वल हैं लेकिन मोर्चें के हालात ही ना बनें इसके लिए तैयार नहीं हैं। इस हमले में तो केवल फौजी मारे गए, लेकिन इसमें 20 से ज्यादा जवान बुरी तरह घायल भी हुए हैं। बीते कई-कई सालों से यह परंपरा रही है कि जब कभी देश में कहीं कोई धमाका, हमला होता है, लोग गिनने लगते हैं कि कितने मरे, सरकार में बैठे लोग आंकड़ों में बताने लगते हैं कि उनके कार्यकाल में यह बहुत कम है, वहीं विपक्ष हमलावर हो जाता है। कुल मिला कर जनता के प्रति जिम्मेदार लोग देश की आतंकवाद से लड़ने की नीति पर एक दूसरे की थुक्का-फजीती में लग जाते हैं।
भले ही आतंकवाद से निबटने की नीति का रास्ता लंबा और जटिल है, लेकिन आतंकवाद के शिकार हुए लोगों के लिए तो एक सशक्त नीति बनाई जा सकती है। हाल के हमले में मारे गए अलग-अलग राज्यों के जवानों को सरकारें द्वारा अलग-अलग मुआवजा देना, पिछले साल मथुरा जिले के शहीद हेमराज के गांव में गए नेताओं के वायदों का अभी तक तक क्रियान्वयन ना होना , बानगी है कि हम अभी तक आतंकवाद से बचाव और उससे पीड़ित लोगों को राहत के मामले में दिशाहिन, नीतिहीन और तथ्दर्थवाद के शिकार हैं। बीते एक दशक के दौरान देश में हुए आतंकवादी हमलों में घायल और मारे गए कई सौ लोगों के परिवारजन मुआवजा पाने के लिए दफ्तर-दर-दफ्तर भटक रहे हैं। एक जगह से मृत्यु प्रमाण पत्र मिलना है तो दूसरी जगह से वारिस का, तीसरी जगह से एफआईआर की कापी तो चौथी जगह से मुआवजे का परवाना। कई लोग स्थाई रूप से विकलांग हो गए और कुछ एक का इलाज कई-कई साल तक चल रहा है। एक बार कहीं कोई घटना घटती है तो सरकार व सियासी नेता तत्काल कुछ मुआवजे और इमदाद की घोषणा कर देते है। फिर राष्ट्रवाद धीरे-धीरे हवा हो जाता है और अपनों को खोए लोगों के सामने समाज-समय की हकीकत उजागर हो जाती है।
आतंकवाद अब अंतरराष्ट्रीय त्रासदी है। देश-दुनिया का कोई भी हिस्सा इससे अछूता नहीं है। भारत में यह अब महानगर ही नहीं छोटे शहर वाले भी महसूस करने लगे हैं कि ना जाने कौन से दिन कोई अनहोनी घट जाए। लेकिन इसके लिए तैयारी के नाम पर हम कागजों से ऊपर नहीं उठ पा रहे हैं। ट्रॉमा सेंटर अभी दिल्ली में भी भली-भांति काम नहीं कर रहे हैं, तो अन्य राज्यों की राजधानी की परवाह कौन करे। क्या यह जरूरी नहीं है कि संवेदनशील इलाकों में सचल अस्पताल, बड़े अस्पतालों में सदैव मुस्तैद विशेषज्ञ हों। आम सर्जन बीमारियों के लिए आपरेशन करने में तो योग्य होते हैं, लेकिन गोली या बम के छर्रे निकालने में उनके हाथ कांपते हैं। बारूद के धुंए या धमाकों की दहशत से बेहोश हो गए लोगों को ठीक करना, डरे-सहमें बच्चों या अपने परिवार के किसी करीबी को खो देने के आतंक से घबराए लोगों को सामान्य बनाना जैसे विषयों को यदि चिकित्सा की पढ़ाई में इस किस्म के मरीजों के त्वरित इलाज के विशेष पाठ्यक्रम को शामिल किया जाए तो बेहतर होगा।
आतंकवादी घटनाओं के शिकार हुए आम लोगों और सुरक्षा बलों के जवानों को आर्थिक मदद और उनके जीवनयापन की स्थाई व्यवस्था या पुनर्वास का काम अभी भी तदर्थवाद का शिकार है। कोई घटना होने के बाद तत्काल स्थानीय या कतिपय संस्थाएं अभियान चलाती हैं, कुछ लोग भाव विभोर हो कर दान देते हैं ओर असमान किस्म की इमदाद लोगों तक पहुंचती है। दिल्ली या मुंबई में हुए धमाके देश पर हमला मान लिए जाते हैं तो उन पर ज्यादा आंसू, ज्यादा बयान और ज्यादा मदद की गुहार होती है। उत्तर-पूर्वी राज्यों या छत्तीसगढ़, उड़ीसा या झारखंड की घटनाएं अखबारों की सुर्खिया ही नहीं बन पाती हैं। ऐसे में वहां के पीड़ितों को आर्थिक मदद की संभावनाएं भी बेहद क्षीण होती हैं। सशस्त्र बलों या अन्य सरकारी कर्मचारियों को सरकारी कायदे-कानून के मुताबिक कुछ मिल जाता है, लेकिन आम लोग इलाज के लिए भी अपने बर्तन-जमीन बेचते दिखते हैं। कुछ साल पहले हैदराबाद के धमाके में घायल हुए 25 साल के अब्दुल वासिफ मिर्जा का मामला गौरतलब है, वह 2007 के मक्का मस्जिद धमाके में घायल हुआ और उसका एक पैस काटना पड़ा,उसके परिवार वालों का सबकुछ बिक गया उसके इलाज में । अब वह एक बार बम धमाके में घायल हो गया।
वैसे तो केंद्र में प्रधानमंत्री और राज्यों में मुख्यमंत्री राहत कोष हैं, जिनसे ऐसी ही आकस्मिक घटनाओं के शिकार हुए लोगों की मदद का कार्य किया जाता है, लेकिन यह तभी संभव होता है जब ऐसी घटनाओं की जानकारी प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री तक जाए और साथ ही पदासीन व्यक्ति संवेदनशील हो। ऐसा हर समय संभव नहीं है, लेकिन आतंकवादी घटनाएं कभी भी कहीं भी संभव हैं। अब यह जरूरी लगता है कि आतंकवादी घटनाओं के शिकार लोगों के मुआवजे, राहत, इलाज, रोजगार के लिए ‘‘सिंगल विंडो’’ की तर्ज पर एक महकमा हो। ऐसी दुर्भाग्यपूुर्ण घटनाएं होने पर जिस तरह पुलिस, सुरक्षा एजंसिया, एंबूलेंस आदि त्वरित काम पर लग जाते हैं, उसी तरह इस महकमे के लोग भी चिकित्सा व अन्य तात्कालिक मदद का आकलन व उसे मुहैया करवाने, मृत लोगों के पोस्टमार्टम, लाशों को ससम्मान संबंधित लोगों के घर तक पहुंचाने, तत्काल दवा या अन्य चिकित्सीय जरूरतों का पता लगाने, गुम हो गए लोगों की सूचना, कौन किस अस्पताल में है इसकी खबर जैसे काम इस विभाग द्वारा किए जाएं। वरना होता यह है कि किसी हादसे की हालत में अस्पतलों और सड़कों पर बदहवास सी बड़ी भीड़ उन लोगों की होती है जो किसी अपने की तलाश कर रहे होते हैं। अस्पताल के लोग तिमारदारी में लगे होते हैं और पुलिसवाले अपराधी की तलाश में। ऐसे में पूछताछ करने वाले असंतुष्ट हो कर नारेबाजी या अन्य व्यवधान खड़ा कर देते हैं। क्या ऐसी घटनाओं के तुरंत बाद जांच करने वाले, सतर्कता बरतने वाले, घायलों के इलाज की व्यवस्था करने और धरपकड़ की जिम्मेदारियां अलग-अलग एजेंसी पर डालने जैसा साधारण काम नहीं किया जा सकता? ऐसे में ना तो पुलिस को घायल की चिंता करना होगा और ना ही एनआईए को सुरक्षा की।
सबसे बड़ी बात कि ऐसे महकमे के लिए दान के दरवाजे सालभर खुले हों, जिस तरह कुछ टीवी चैनल अपने-अपने विशेष फंड बना कर दानदाताओं के नाम अपनी स्क्रीन पर दिखाने की बात क कर राहत सामग्री जोड़ रहे हैं, सरकारी महकमों को भी दानदाताओं को धन्यवाद के लिए विज्ञापनों का सहारा ले कर लोगों को आकर्षित करना होगा। अपने किसी प्रिय के जन्मदिन या स्मृति में ‘‘आतंकवाद प्रकोष्ठ’’ के लिए दान देने के लिए आकर्षित करना कोई बड़ी बात नहीं है। इससे एक तो धन राशि या राहत, जरूरतमंद तक पहुंचाने का केवल एक ही माध्यम तय होगा, जिससे लोगों को भटकना नहीं पड़ेगा, साथ ही यह संस्था आतंकवाद से पीड़ित के आश्रितों को स्थाई रोजगार दिलवाने का कम भी कर सकती है। हो सकता है कि कुछ कंपनियां या विभाग ऐसे लोगों को रोजगार के लिए कुछ आरक्षित सीटें रख दें।
आतंकवाद की अराजक स्थिति में टीवी के चैनल बदल-बदल कर आंसू बहाने वालों के असली राष्ट्रप्रेम की परीक्षा यह विभाग हो सकता है। ऐसी संस्था की निशुल्क सेवा या संकट के समय कुछ समय देने वालों को एकत्र किया जा सकता है, यह नए महकमे के खर्चों को कम करने में सहायक कदम होगा। सबसे बड़ी बात सरकारी सेवा करने वाले सभी लोगों को फौज व राहत अभियान का प्राथमिक प्रशिक्षण देना और समय-समय पर उनके लिए ओरिएंटेशन कैंप आयोजित करना समय की मांग है। लोगों को प्राथमिक उपचार, सामान्य लिखा-पढ़ी के काम भी दिए जा सकते हैं।
क्रिकेट के मैदान पर तिरंगे ले कर उधम मचाने वाले युवाओं का भी देश-प्रेम के प्रति दृष्टिकोण महज नेताओं को गाली देने या पाकिस्तान को मिटा देने तक ही सीमित है। यह हमारी पाठ्य पुस्तकों और उससे उपज रही शिक्षा का खोखला दर्शन नहीं तो और क्या है? बातें युवाओं की लेकिन नीति में दिशाहीन, अनकहे सवालों से जझते युवा ।
यदि सरकार इस विषय में सोचती हैं तो इससे आम आदमी की देश व समाज के प्रति संवेदनशीलता तो बढ़ेगी ही, आतंकवाद के नाम पर राजनीति करने वालों की दुकानें भी बंद हो जाएंगी। मानवता के दुश्मनों के हाथों मारा गया प्रत्येक निर्दोष उसी सम्मान, राहत और सहानुभूति का हकदार है, जितना की वर्दीधारी।

गुरुवार, 22 सितंबर 2016

Merging railway budget with annual : One step ahead for privatisation of railway

रेलवे के निजीकरण की ओर एक और कदम: अलग बजट की
समाप्ति

                                                                   पंकज चतुर्वेदी

यह अचानक नहीं हो गया, इस साल के षुरूआत में ही योजना आयोग को समाप्त कर बने नीति आयोग के  सदस्य विवेक देबरॉय की अध्यक्षता वाली एक कमेटी ने अलग रेल बजट पेश करने की आवश्यकता को समाप्त करने और इसे आम बजट में मिलाने की सिफारिश की थी। पिछले महीने सरकार ने इस मुद्दे पर सुझाव देने के लिए वित्त और रेलवे मंत्रालयों के वरिष्ठ अधिकारियों की पांच सदस्यों कर समिति बनाई थी। जब मंत्री से ले कर सब की राय थी तो जाहिर है कि समिति को महज इसकी प्रक्रिया तय करने का तरीका बतना था।
  अफसरों की समिति ने कहा कि सार्वजनिक क्षेत्र के इस बड़े उपक्रम को 7वें वेतन आयोग की सिफारिशों को अमल में लाने के लिए 40,000 करोड़ रुपए का अतिरिक्त बोझ उठाना होगा। इसके अलावा उसे सबसिडी के रूप में 32,000 करोड़ रुपए सालाना खर्च करना होगा। दोनों बजटों को मिलाने से रेलवे को सालाना लाभांश से छुटकारा मिल जाएगा। रेलवे को हर साल सकल बजट समर्थन के एवज में यह लाभांश सरकार को देना होता है। दोनों बजटों के विलय से किसी तरह का कोई मुद्दा खड़ा होने की आशंका नहीं है। यह मूल रूप से प्रक्रियात्मक ही होगा। इससे सरकार की बजट गणना पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।  21 सितंबर की षाम केंद्रीय मंत्रिमंडल ने आम बजट को रेल बजट में विलय संबंधी प्रस्ताव को मंजूरी दे दी। हो सकता है कि बजट भी एक फरवरी को ही पेश हो जाए।
सनद रहे कि सन 1924 से अभी तक यानि 92 साल पहले रेल को आम बजट से अलग प्रस्तुत करने की षुरूआत हुई थी। साल 1921 में ईस्ट इंडिया रेलवे कमेटी के अध्यक्ष सर विलियम एक्वर्थ ने यह देखा कि पूरे रेलवे सिस्टम को एक बेहतर प्रबंधन की दिशा में ले जाने की ज़रूरत है। साल 1924 में उन्होंने आम बजट से रेल बजट को अलग करने का प्रस्ताव रखा, जिसके बाद से अलग बजट व्यवस्था की नींव रखी गई। उस दौर में पूरे देश के बजट में रेल बजट की हिस्सेदारी 70 प्रतिशत थी। इसी लिए रेल बजट को अलगग बनाने की बात आई। गौर तलब है कि उस समय रेलवे का सार्वजनिक परिवहन में रेलवे की भागीदारी 75 प्रतिशत और माल ढुलाई में 90 प्रतिशत थी। आज माल ढुलाई में ट्रकों की संख्या बढ गई है और इस तरह रेल बजट का वह स्वरूप् नहीं रह गया जो कि आजादी के पहले था। देश के बजट में रेल बजट की इतनी अधिक हिस्सेदारी देखकर रेल बजट को आम बजट से अलग करने का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया गया। उस दौर से लेकर अब तक रेल बजट को आम बजट से अलग पेश किया जाता है। जब रेल बजट को आम बजट से अलग किया गया था, उस समय रेलवे का प्रयोग पब्लिक ट्रांसपोर्ट में 75 फीसदी और माल ढुलाई में 90 फीसदी तक होता था।
तब से आमतौर पर 25 फरवरी को रेल बजट आता है ं। उसके एक या दो दिन बाद वित्त मंत्री आम बजट पेश करते हैं। लेकिन अब एक ही बजट में रेलवे का भ्ी उल्लेख होगा। आम आदमी के लिए ये बदलाव इस लिहाज से खास होगा क्योंकि अब तक रेल किराये बढ़ेंगे या नहीं बढ़ेंगे ये फैसला रेलमंत्री लिया करते थे लेकिन अब इसपर अंतिम मुहर वित्त मंत्री की होगी। हालांकि जनता की अब बजट में कोई रूचि रह नहीं गई है क्योंकि रेल किराये से ले कर आम सामान तक के दाम सारे साल कभी भी बढ़ते रहते हें और बजट तो महज कारपोरेट के लाभ-हानि का आईना मात्र होता है।

भारतीय रेल  एशिया का सबसे बड़ा रेल नेटवर्क है तथा एकल प्रबंधनाधीन यह दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा रेल नेटवर्क है। सबसे अधिक रेाजगार , लगभग 16 लाख लेागों को नौकरी देने वाला रेलवे भारत के परिवहन, अर्थ, सांस्कृतिक एकता, पर्यटन आदि की रीढ़ है। समय  के साथ रेल, रेलवे की ुसविधाएं, यात्री सभी कुछ बढ़ रहे हैं व लेागांे की अपेक्षाओं की पूर्ति के लिए रेलवे में रेल इंडिया टेक्नीकल एवं इकोनॉमिक सर्विसेज़ लिमिटेड (आर आई टी ई एस) इंडियन रेलवे कन्स्ट्रक्शन (आई आर सी ओ एन) अंतरराष्ट्रीय लिमिटेड इंडियन रेलवे फाइनेंस कॉर्पाेरेशन लिमिटेड (आई आर एफ सी) कंटनेर कॉर्पाेरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (सी ओ एन सी ओ आर) कोंकण रेलवे कॉर्पाेरेशन लिमिटेड (के आर सी एल) इंडियन रेलवे कैटरिंग एंड टूरिज्म कॉर्पाेरेशन लिमिटेड (आई आर सी टी आर) रेलटेल कॉर्पाेरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (रेलटेल) मुंबई रेलवे विकास कॉर्पाेरेशन लिमिटेड (एम आर वी सी लिमिटेड.) रेल विकास निगम लिमिटेड (आर वी एन आई) जैसे कई उपक्रम स्थापित किए गए हैं। रेलवे के आधुनिकीकरण, गति, सुविधाओं में  निजी कंपनियों की नजर लंबे समय से रही है। लेकिन रेलवे की यूनियनें बहुत मजबूत हैं  और वे निजीकरण का विरोध करती रही है। हालांकि रेलवे में आ रही नई पीढ़ी तकनीकी  और व्यावसायिक शिक्षा ले कर आ रही है और इससे यूनियन साल दर साल कमजोर हो रही हैं। निजीकरण  का यही अनुकूल माहौल होता है।
चूंिक अब रेलवे बजट आम बजट का ही हिस्सा होगा, जाहिर है कि आम बजट में व्यावसायिक घरानों के लिए स्थापित नीतियों, सुविधाओं का लाभ अब रेलवे के लिए भी खुल जाएगा। नीतिगत निर्णय आम बजट के होंगे व आय-व्यय का हिसाब रेलवे का। ऐसे में रखरखाव, केटरिंग जैसे क्षेत्रों में निजी कंपनियों की संभावनाएं आम बजट की किसी नीति के तहत ही खुल जाएंगी और पूरे बजट के हल्ले में यह पता भी नहीं चलेगा। यही नहीं रलवे से होने वाली आय व व्यय अब आम बजअ में जुड़ जाएगी। इसका सबसे बड़ा नुकसान यह होगा कि रेलवे भीअ न्य सरकारी विभागों की तरह एक महकमा बन जाएगा, जबकि अभी तक रेलवे को एक व्यावसायिक प्रतिष्ठान माना जाता रहा है। जो कि अपने विस्तार, आधुनिकीकरण, शोध व प्रबंधन का कार्य एक कंपनी की तरह करता था।

मंगलवार, 20 सितंबर 2016

Kavery River : every one wants water but no one care pollution

किसे परवाह है कावेरी की लहर में जहर की

                                                                   
पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने ओदश दिया और कर्नाटक सरकार को हर दिन कावेरी नदी का  12000 क्यूसेक पानी तमिलनाडु के लिए छोड़ना पड़ रहा है। इसके बाद कर्नाटक सुलग रहा है। हर रोज बंद, पथराव, तमिलनाउु के नेातओं के पुतले दहन व उने प्रतिश्ठानों पर हमले की खबरें आ रही हैं। कावेरी को चाहने का दावा करने वालों ने कई हजार करोड़ की संपत्ति फूंक दी है । हकीकत तो यह है कि कावेरी के पानी से ज्यादा उस पर सियासत में लेागों की ज्यादा रूचि है। तभी सन 1837 से चल रहा जल बंटवारे का विवाद आज तक नहीं निबट पाया हे। नदी का पानी कनार्टक , तमिलनाडु, केरल और पुदुचंेरी को कितना मिले, इसको तय करने के लिए सन 1990 में एक प्राधिकरण बना था, सुप्रीम केार्ट में चल रहे मामले अलग हैं, लेकिन जिस नदी को ‘मां’’ माना जाता है, उसके बंटवारे को अंतिम रूप नहीं दिया जा सका है। पानी और ज्यादा से ज्यादा पानी सभी को चाहिए, लेकिन कावेरी में किस तरह प्रदूशण की सडांध घर कर रही है, उस पर चिंता या जिम्मेदारी लेने को ना तो कोई संगठन तैयार है और ना ही सरकार ।
पौराणिक कथाआंे में कुर्गी-अन्नपूर्णा, कर्नाटक की भागरथी और तमिलनाडु में पौन्नई यानी स्वर्ण-सरिता कहलाने वाली कावेरी नदी के पानी के बंटवारे को लेकर विवाद से तो सभी परिचित हैं लेकिन इस बात की किसी को परवाह नहीं है कि यदि इसमेें घुलते जहर पर तत्काल ध्यान नहीं दिया गया तो जल्दी ही हालात काबू से बाहर हो जाएंगे। दक्षिण की जीवन रेखा कही जाने वाली इस नदी में कही कारखानें का रसायनयुक्त पानी मिल रहा है तो कहीं षहरी गंदगी का निस्तार सीधे ही इसमें हो रहा है, कहीं खेतों से बहते जहरीले रसायनयुक्त खाद व कीटनाशक इसमें घुल रहे हैं तो साथ ही नदी हर साल उथली होती जा रही है। बंगलूरू सहित कई विश्वविघालयों में हो रहे षोध समय-समय पर चेता रहे हैं कि यदि कावेरी को बचाना है तो उसमें बढ़ रहे प्रदूशण पर नियंत्रण जरूरी है, लेकिन बात कागजी घोड़ों की दौड़ से आगे बढ़ नहीं पा रही है।
कावेरी नदी कर्नाटक के कुर्ग जिले के पश्चिमी घाट के घने जंगलों में ब्रह्मगिरी पहड़ी पर स्थित तलकावेरी से निकलती है। कोई आठ सौ किलोमीटर की यात्रा के दौरान कई सहायक नदियां इसमें आकर मिलती हैं, लेकिन जब दो लाख घन मीटर से अधिक वार्शिक जल बहाव वाली कावेरी का समागम तमिलनाडु में थंजावरु जिले में बंगाल की खाड़ी में होता है तो यह एक शिथिल सी छोटी सी जल-धारा मात्र रह जाती है।   कावेरी के पानी को लकर दो राज्यों के बीच का विवाद संभवतया दुनिया के सबसे पुराने जल विवादों में से एक है। 17वीं सदी में टीपू सुल्तान के षासनकाल में जब तत्कालीन मैसूर राज्य ने इस पर बांध बनाया था तब मद्रास प्रेसीडंसी ने इस पर आपत्ति की थी। इस झगउ़े का एक पड़ाव सन 1916 में सर विश्वेसरैया की पहल पर बनाया गया कृश्णराज सागर यानी केआरएस बांध था।  पर जब दोनो राज्यों में पानी की मांग बढ़ी तो यह बांध भी विवादों की चपेट में आ गया।
कावेरी की लपटों मे ना जने क्या-क्या झुलसा, लेकिन पानी पर सियासत करने वालों ने इस बात की सुध कभी नहीं ली कि कावेरी का मैला होता पानी अब जहर बनता जा रहा है। कुछ साल पहले बंगलूरू विश्वविद्यालय ने वन और पर्यावरण मंत्रालय तथा राश्ट्रीय नदी संरक्षण निदेशालय-एनआरडीसी की मदद से एक विस्तृत षोध किया था जिसमें बताया गया था कि केआरएस बांध से नीचे आने वाला पानी ऊपरी धारा की तुलना में बेहद दूशित हो गया है। गौरतलब है कि केआर नगर, कौल्लेगल और श्रीरंगपट्टनम नगरों की नालियों का गंदा पानी और नंजनगौडा षहर के कारखानों व सीवर की निकासी बगैर किसी षोधन के काबिनी नदी में मिला दी जाती है। काबिनी नदी आगे चल कर नरसीपुर के पास कावेरी में मिल जाती है। कहने को कोल्लेगल में एक ट्रीटमेंट प्लांट लगा है, लेकिन इसे चलते हुए कभी किसी ने नहीं देखा।
षहरी गंदगी के बाद कावेरी को सबसे बड़ा खतरा इसके डूब क्षेत्र में हो रही अंधाधुंध खेती से है। ज्यादा फसल लेने के लालच में जम कर रासायनिक खाद व कीटनााशकों के इस्तेमाल ने कावेरी का पानी जहर कर दिया है। एक रिपोर्ट के मुताबिक बरसात के दिनों में कावेरी के पानी में हर रोज 1,051 टन सल्फेट, 21 टन फास्फेट और 34.88 टन नाईट्रेट की मात्रा मिलती है।  गर्मी के दिनों में जब पानी का बहाव कम हो जाता है तब सल्फर 79 टन, 2.41 टन फास्फेट और 3.28 टन नाईट्रेट का जहर हर रोज इस पावन कावेरी को दूशित कर रहा है।  याद रहे कि विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक नाईट्रेट के रूप में नाईट्रोजन की इतनी मात्रा वाला पानी बच्चों के लिए जानलेवा है।
कौललागेल क्षेत्र में षहरी सीवर के कारण कावेरी का पानी मवेशियों के लिए भी खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है। यहां पर पानी में केडमियम, एल्यूमिनियम, जस्ता और सीसा की मात्रा निर्धारित स्तर को पार कर जाती हे।  ये नदी किनारे रहने वालों के लिए आए दिन नई-नई बीमारियों की सौगात ले कर आ रहे हैं।  वैसे तो अन्य नदियां की ही तरह कावेरी में भी खुद ब खुद षुद्धीकरण की विशेशता है, लेकिन आधुनिक जीवन षैली के लिए आवश्यक बन गए रासायनों की बढती मात्रा से नदी का यह गुण नाकाम हो गया है। कावेरी के किनारों पर रेत की बेतरतीब खुदाई, षौचकर्म और कपड़ों की ध्ुालाई ने भी नदी का मिजाज बिगाड़ दिया है।
कावेरी के दूशित होने की चेतावनियां 13 साल पहले 1995 में केद्रीय प्रदूशण नियंत्रण बोर्ड की एक रपट में दर्ज थीं। उसमें कहा गया था कि कावेरी का पानी अपने उद्गम  तालकावेरी से मैसूर षहर की सीमा तक सी ग्रेड का है, जबकि यह होना ए ग्रेड का चाहिए। विदित हो कि ए ग्रेड के पानी की 100 मिललीटर मात्रा में कॉलीफार्म बैक्टेरिया की मात्रा 50 होती है, जबकि सी ग्रेड में यह खतरनाक विशाणु छह हजार होता है। पानी की अम्लीयता का पैमाना कहे जाने वाले पीएच वैल्यू में काफी अंतर दर्ज किया गया था। प्रदूशण बोर्ड की उस रिपोर्ट यह भी बताया गया था कि केआर बांध से होगेनेग्गल तक और बंगलूर से ग्रेंड एनीकेट तक और उउसे आगे कुंभकोणम तक पानी की क्वालिटी ई ग्रेड की है। सनद रहे कि इस स्तर का पानी पीने के लिए कतई नहीं होता है।
सिंचाई, सफाई और सियासत के भ्ंावर में फंसी 770 किलामीटर लंबी कावेरी की सबसे ज्यादा दुर्गति कुर्ग  जिले में ही है। यह इलाका काफी उत्पादक हैं, और सरकारी रिकार्ड कहता है कि चार लाख पचहत्तर हजार टन कॉफी का कचरा सीधे नदी में जा रहा है। कुर्ग षहर की एक लाख आबादी का पूरा निस्तार बगैर सफाई के नदी में मिलता है। यह इलाका सुअर के गोश्त के व्यापार के लिए भी जाना जाता है और हजरों बूचड़ खाने का गंदा पानी इसमें सीधे मिलाने में कसिी को कोई संकोच नहीं होता।  पिछले साल प्रख्यात अंतरिक्ष वैज्ञानिक और राज्य ज्ञान आयोग के अध्यक्ष प्रो. के कस्तूरी रंगन ने राज्य षासन को एक रपट सोंपी थी जिसमें कावेरी को प्रदूशण मुक्त करनेे के लिए त्वरित विशेश प्रयास करने व उसके लिए अलग से बजट की बात की थी। रपट में बताया गया था कि कावेरी के किनारे उभर आए कई पर्यटन स्थल नदियों में सीवर की गंदगी बढ़ा रहे हैं, वहीं इससे रेत का अवैध खनन इसके अस्तित्व के लिए खतरा बन रहा है। दुखद है कि अपने पडोसी राजय को पानी देने पर आग लगाने वाले कीज्ञी इस तरह से नदी के क्षण पर सड़कों पर नहीं आते।
राज्य प्रदूशण बोर्ड की रपट को आए 15 साल बीत गए, कावेरी में ना जाने कितना पानी बह गया, उससे ढेर सारे विवाद और हंगामे उपज गए लेकिन उसका प्रदूशण दिन दुगना-रात चौगुना बढता रहा। उस पर राजनीति की बिसात बिछी है। कावेरी गवाह है कि आधुनिक विकास की कितनी बड़ी कीमत नदियां चुका रही हैं। कावेरी में जब तक पानी है , वह जीवनदायिनी है और उस दिन तक उसके पानी को ले कर दो राज्य लड़ते रहेंगे, लेकिन जिस दिन उसमें घुलता जहर खतरे की हद को पार कर जाएगा, उस दिन से यही लोग इस नदी को अपने राज्य की सीमा में घुसने से रोकने का झंडा उठा लेगें।
पंकज चतुर्वेदी
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सेक्टर-2
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पंकज चतुर्वेदी

बुधवार, 14 सितंबर 2016

Dengue due to paralysis of system

तंत्र की काहिली से बढ़ता मर्ज


                                                                डेंगू का डंक
                                                                                                                                                                                                 पंकज चतुर्वेदी

इस साल 31 अगस्त तक देश में डेंगू के कुल 27889 मामले सामने आए, जिनमें से 60 की मौत हो गई। इसका कुछ कमजोर स्वरूप चिकनगुनिया भी अपने शबाब पर है और वह अभी तक 1255 मरीजों को अपनी चपेट में ले चुका है। राजस्थान के कई जिलों से लेकर बंगाल के दूरस्थ इलाकों तक, राऊरकेला जैसे औद्योगिक शहर से लेकर महाराष्ट्र के कोकण क्षेत्र तक हर इलाके में औसतन हर रोज दस मरीज अस्पताल पहुंच रहे हैं। हालांकि विश्व स्वास्थ्य संगठन पहले ही चेता चुका था कि इस साल दिल्ली में डेंगू महामारी बन सकता है। स्थानीय प्रशासन विभाग इंतजार कर रहा है कि कुछ ठंड पड़े तो समस्या अपने आप खत्म हो जाएगी।
गाजियाबाद जैसे जिलों के अस्पताल तो बुखार-पीड़ितों से पटे पड़े हैं। अब तो इतना खौफ है कि साधारण बुखार का मरीज भी बीस-पच्चीस हजार रुपए दिए बगैर अस्पताल से बाहर नहीं आता है। वहीं डेंगू के मच्छरों से निपटने के लिए दी जा रही दवाएं उलटे उन मच्छरों को ताकतवर बना रही हैं। डेंगू फैलाने वाले एडीज’ मच्छर सन‍् 1953 में अफ्रीका से भारत आए थे। उस समय कोई साढ़े सात करोड़ लोगों को मलेरिया वाला डेंगू हुआ था, जिससे हजारों मौतें हुई थीं। अफ्रीका में इस बुखार को डेंगी कहते हैं। यह तीन प्रकार को होता है। एक वह, जो कि चार-पांच दिनों में अपने आप ठीक हो जाता है, लेकिन मरीज को महीनों तक बेहद कमजोरी रहती है। दूसरे किस्म में मरीज को हेमरेज हो जाता है, जो उसकी मौत का कारण भी बनता है। तीसरे किस्म के डेंगू में हेमरेज के साथ-साथ रोगी का ब्लड प्रेशर बहुत कम हो जाता है।
विशेषज्ञों के मुताबिक डेंगू के वायरस भी चार तरह के होते हैं- सीरो-1,2, 3 और 4। यदि किसी मरीज को इनमें से किन्हीं दो तरह के वायरस लग जाएं तो उसकी मौत लगभग तय होती है। ऐसे मरीजों के शरीर पर पहले लाल-लाल दाने पड़ जाते हैं। इसे बचाने के लिए शरीर के पूरे खून को बदलना पड़ता है। सनद रहे कि डेंगू से पीडि़त मरीज को 104 से 107 डिग्री बुखार आता है। डेंगू का पता लगाने के लिए मरीज के खून की जांच करवाई जाती है, जिसकी रिपोर्ट आने में दो-तीन दिन लग जाते हैं। तब तक मरीज की हालत लाइलाज हो जाती है। यदि इस बीच गलती से भी बुखार उतारने की कोई उलटी-सीधी दवा ले ली तो लेने के देने पड़ जाते हैं।
भारतीय उपमहाद्वीप में मच्छरों की मार बढ़ने का बड़ा कारण यहां बढ़ रहे दलदली क्षेत्र को कहा जा रहा है। यही एडीज’ मच्छर का आश्रय-स्थल बनते हैं। ठीक यही हालत देश के महानगरों की है जहां थोड़ी-सी बारिश के बाद सड़कें भर जाती हैं। ब्रिटिश गवर्नमेंट पब्लिक हेल्थ लेबोरेट्री सर्विस (पीएचएलसी) की एक अप्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया के गर्म होने के कारण भी डेंगू रूपी मलेरिया प्रचंड रूप धारण कर सकता है। जलवायु विशेषज्ञों का कहना है कि गर्म और उमस भरा मौसम खतरनाक और बीमारियों को फैलाने वाले कीटाणुओं और विषाणुओं के लिए संवाहक जीवन-स्थिति का निर्माण कर रहे हैं।
सरकारी लाल बस्तों में दर्ज है कि हर साल करोड़ों रुपए के डीडीटी, बीएचसी, गेमैक्सिन, वीटेकस और वेटनोवेट पाउडर का छिड़काव हर मोहल्ले में हो रहा है। हालात इतने बुरे हैं कि पाइलेथाम’ और मेलाथियान’ दवाएं फिलहाल तो मच्छरों पर कारगर हैं, लेकिन दो-तीन साल में ही ये मच्छरों को और जहरीला बनाने वाली हो जाएंगी। डेंगू के इलाज में प्राइमाक्वीन कुछ हद तक सटीक है, लेकिन इसका इस्तेमाल तभी संभव है, जब रोगी के शरीर में जी-6 पी.डी.”  नामक एंजाइम की कमी ना हो। यह दवा रोगी के यकृत में मौजूद परजीवियों का सफाया कर देती है। इस दवा के इस्तेमाल से डाक्टर भी परहेज करते हैं। इसके अलावा क्वीनाइन ”  नामक एक महंगी दवा भी उपलब्ध है।
यह मान लेना चाहिए कि डेंगू से निपटने के लिए सारे साल तैयारी करनी होगी और प्रयास यह करना होगा कि यह बीमारी कम से कम लोगों को अपनी गिरफ्त में ले। जरूरत इस बात की है कि मच्छरों की पैदावार रोकने, उनकी प्रतिरोध क्षमता का आकलन कर नई दवाएं तैयार करने का काम त्वरित और प्राथमिकता से होना चाहिए।
इस बार बारिश भी ढंग से हुई नहीं। भादौ में गर्मी अपना पूरा रंग दिखा रही है। इतना ज्यादा जलभराव भी नहीं हुआ, लेकिन उमस, गंदगी और लापरवाही के चलते मच्छर और उससे उपजे डेंगू का असर दिनोंदिन गहरा होता जा रहा है। दिल्ली में एक बच्चे की मौत व उसके गम में उसके माता-पिता द्वारा आत्महत्या करने की घटना ने तो पूरे देश को हिला दिया है। अकेले दिल्ली-एनसीआर में बीते एक हफ्ते में कई सौ मरीज सरकारी अस्पताल पहुंचे हैं।

The right to a dignified farewell and a new standard in medical world

  गरिमापूर्ण विदाई का अधिकार और चिकित्सा की नई मर्यादा पंकज चतुर्वेदी लगभग  12 साल असीम और अव्यक्त पीड़ा के साथ  जीवन जी रहे हरीश राणा अं...