My writings can be read here मेरे लेख मेरे विचार, Awarded By ABP News As best Blogger Award-2014 एबीपी न्‍यूज द्वारा हिंदी दिवस पर पर श्रेष्‍ठ ब्‍लाॅग के पुरस्‍कार से सम्‍मानित

गुरुवार, 3 नवंबर 2016

sulfas pesticide which is killing people

सल्फास : कीटनाशक या मनुष्यनाशक

 

पंकज चतुर्वेदी,
एक सेवानिवृत फौजी ने भावनाओं में बह कर या फिर जल्दबाजी में एक निराशाजनक फैसला किया और दिल्ली में इंडिया गेट के पास आत्महत्या कर ली। उसने अपने बेटे को फोन पर बताया उन्होंने सल्फास की तीन गोलियां खाई हैं। पूरे देश में आए रोज किसानों द्वारा आत्महत्या करने की घटनाओं में अधिकांश का माध्यम यही सल्फास होता है। वैसे ‘एल्यूमिनीयम फास्फाइड पेस्टीसाइड एक्ट 1968’ के तहत ‘सल्फास’ की बिक्री का अधिकार केवल सरकारी या अर्ध सरकारी संस्थाओं को ही है। यह बात दीगर है कि यह कीटनाशक प्रदेश के किसी भी कस्बे में सहजता से सस्ते में खरीदा जा सकता है।
एल्यूमिनीयम फास्फाइड एक ऐसा कीटनाशक है, जो गोदामों में रखे अनाज को चूहों, कीड़े-मकोड़ों से बचाने का एकमात्र उपाय माना जाता है। आम बोलचाल की भाषा में उस जहर का नाम ‘सल्फास’ पड़ गया है। लोकप्रिय सल्फास एक्सेल इंडस्ट्रीज लिमिटेड, जोगेश्वरी, मुंबई का उत्पादन है। यूनाइटेड फास्फोरस लिमिटेड, वापी (गुजरात) का ‘क्यूकफास’ भी इसी तरह का है। ऐसा ही एक अन्य उत्पाद सल्फ्यूम है। इन सभी कीटनाशकों में 56 फीसदी एल्यूमिनीयम फास्फाइड और 44 फीसदी एल्यूमिनीयम कार्बोनेट होता है। ये सभी दवाइयां (?) बाजार में सल्फास के नाम से ही बिकती हैं। इनके 10, 30 और 100 गोलियों के पैक मिलते हैं। एक गोली का वजन तीन ग्राम होता है। स्वस्थ व्यक्ति की सुनिश्चित मौत के लिए इसकी एक गोली ही काफी होती है।
एल्यूमिनीयम फास्फाइड हवा में मौजूद आक्सीजन के संपर्क में आ कर जानलेवा ‘फास्जीन’ गैस उत्पन्न करता है। यह गैस यदि किसी भी जीवधारी के रक्त में मिल जाए तो शरीर का लीवर, गुर्दा और दिल बुरी तरह प्रभावित हो जाता है। इंसान की भारी उलटियों, दस्त के कारण मौत हो जाती है। इस कीटनाशक के व्यापक दुरूपयोग के मद्देनज़र सरकार ने इसकी बिक्री पर कई वर्षों पहले पाबंदी लगा दी थी। 1977 से इसकी बिक्री के लाइसेंस ही जारी नहीं हुए है। इसके बावजूद भारत में होने वाली कुल आत्महत्याओं में से एक-तिहाई का साधन यही ‘सल्फास’ है।
सल्फास को बाजार में बेचना गैर कानूनी है। सिर्फ रसद विभाग, वेयर हाउस जैसे महकमों में इसकी सरकारी खरीद की ही अनुमति है। परंतु कृषि उत्पाद बेचने वाली हर दुकान पर इसे आसानी से खरीदा जा सकता है। आम आदमी की पहुंच में सस्ते में उपलब्ध आत्महत्या के साधनों में ‘सल्फास’ सबसे शर्तिया नुस्खा है। बाजार में बिकने वाले सल्फास के पैकेट पर लिखा होता है कि इसका सेवन कर चुके व्यक्ति को पोटेशियम परमेगनेट से गरारे और नसों के जरिए हाइड्रोजन ग्लुकोज देना चाहिए। यह इलाज 10 मिनट के भीतर होना जरूरी है। चूंकि सल्फास खाने वाले व्यक्ति को पहचानना, उसे डॉक्टर तक ले जाना आदि 10 मिनट में संभव नहीं है, सो, बिरले ही ऐसे मामले होते हैं जिनमें किसी की जान बची हो।
इस जानलेवा सल्फास की बिक्री पर कागजी रोक से आम किसान भी खुश नहीं है। किसान का कहना है कि जब बंदूक से हत्याएं होती हैं तो सरकार उसके उत्पादन पर तो रोक नहीं लगाती है। तब उनके कृषि उत्पादों को नष्ट होने से बचाने वाली दवा को ‘आत्महत्या’ का साधन करार दे कर रोक लगाना कहीं तक उचित है। खेतों में बिल बना कर चूहे लाखों टन अनाज चट कर जाते हैं, इसका एकमात्र इलाज सल्फास ही है।
भारत में ‘सल्फास’ पर पाबंदी ‘इनसेक्टीसाइड एक्ट’ के तहत लगी है। यह असंज्ञेय व अहस्तक्षेपणीय अपराध है। यानि पुलिस को सल्फास विक्रेताओं के खिलाफ मामला दर्ज करने या तफ्तीश करने का कतई अधिकार नहीं है। इस तरह के प्रकरण सिर्फ ‘ कीटनाशक इंस्पेक्टर’ ही दर्ज कर सकते हैं। मगर मध्यप्रदेश में कृषि विभाग के पास ऐसे अधिकारी की नियुक्ति का प्रावधान ही नहीं है। वैसे किसी भी प्रतिबंधित वस्तु की बिक्री करना ‘आवश्यक वस्तु अधिनियम’ के तहत दंडनीय अपराध है। रसद या मापतौल विभाग इस पर कार्यवाही करे तो विक्रेता को छह महीने की कैद या दो हजार रूपए जुर्माना हो सकता है। चूंकि ये दवाएं खुले बाजार में बिक्री के लिए होती नहीं हैं, सो इन पर ईसी एक्ट 1977 के तहत पैकेटों पर कर सहित कीमत आदि कई जरूरी सूचनाएं होती ही नहीं हैं। इसे 15 से 20 रूपए प्रति 10 गोली पैकेट की दर से बेचा जाता है । इसका कोई बिल-वाउचर नहीं दिया जाता है। यानि पूरी तरह अवैध रूप से बिक रही ये दवा शासन के कई कायदे-कानूनों को तोड़ रही है।
पूरे देश में आज तक इस गैर कानूनी तिजारत पर एक भी वैधानिक कार्यवाही नहीं हुई है। हमारे नीति निर्धासक यह जानते हैं कि किसानों के पास सल्फास का कोई विकल्प नहीं है। तब इसकी बिक्री की प्रक्रिया में सुधार करना अधिक जरूरी है। सल्फास की बिक्री का कोटा जारी करना, इसके साथ इसकी ‘एंटी डोज’ को बेचना, इसके दुरूपयोग से बचाव कर सकते हैं। यदि इन गोलियों को जालीदार ऐसी कठोर डिब्बियों में बेचा जाए, जिनसे गोली का निकलना संभव ना हो तो खुदकुशी करने वालो से इसे बचाया जा सकता है। चूंकि गोली की गैस ही कारगर कीटनाशक होती है, जालीदार डिब्बी से गैस तो निकलेगी गोली नहीं।
कुछ साल पहले भारत सरकार के कृषि मंत्रालय ने एल्यूमिनीयम फास्फाइड के गलत इस्तेमाल को रोकने और उस पर नियंत्रण के लिए एक समिति का गठन किया था। इस समिति ने अपनी रिपोर्ट 1993 में ही मंत्रालय को सौंप दी थी। इतने साल बीत गए हैं, लेकिन सरकार ने उस रिपोर्ट पर चढ़ गई धूल को झाड़ने की भी सुध नहीं ली है।
पाबंदी के बावजूद सल्फास खा कर मरने वालों की संख्या में बढ़ोतरी होना और इस दवा के अभाव में खेती का भारी नुकसान होना, दोनों ही परस्पर विरोधी व विचारणीय सवाल हैं। जाहिर है कि इस पर पाबंदी महज एक रद्दी टुकड़ा मात्र हैं। अतः जरूरी है कि किसानों के हित में इसकी बिक्री पर कोई नई नीति तैयार की जाए।

Suicide, Army and politics

सुसाइड, सेना और सियासत

 
पूर्व सैनिक रामकिशन ने रक्षा मंत्री से मिलने का प्रयास किया लेकिन उनकी कोठी पर तैनात दरबानों ने पहले से अप्वाइंटमेंट ना होने की बात कर उन्हें टरका दिया। उसके बाद वे इतने भावुक हुए कि सल्फास की तीन गोलियां खा लीं। उन्हें अस्पताल ले जाया गया और उनका देहावसान हो गया। उसके बाद जो सियासत हुई, सामने है।
67 साल के रामकिशन सिंह ग्रेवाल ने कोई 28 साल फौज में नौकरी की। सन 2004 में जब वे सुबेदार के पद से रिटायर हो कर गांव पहुंचे तो उनका उत्साह व हिम्मत कम नहीं थी। वे हरियाणा में भिवानी जिले के अपने गांव बामना के सरपंच बने और स्वच्छता के लिए इतना काम किया कि सन 2008 में तत्कालीन राष्ट्रपति के हाथों उन्हें ‘निर्मल ग्राम पुरस्कार’ भी मिला। शहीद ग्रेवाल सरपंच के काम को दिल से करते थे और गांव की सफाई को पावनकाम समझते थे। जब एक रैंक -एक पेंशन का संघर्ष शुरू हुआ तो व उसमें भी आगे बढ़ कर लड़े। वे इस मसामले में सरकारों के वायदों और आदेशों से इतने व्यथित थे कि दीपावली के अगले दिन नहीं अपने कुछ साथियों के साथ धरना देने पहुंच गए। कहा जाता है कि उन्होंने रक्षा मंत्री से मिलने का प्रयास किया लेकिन उनकी कोठी पर तैनात दरबानों ने पहले से अप्वाइंटमेंट ना होने की बात कर उन्हें टरका दिया। उसके बाद वे इतने भावुक हुए कि सल्फास की तीन गोलियां खा लीं। अपनी अंतिम सांस तक अपने बेटे को फोन पर बात करते रहे। जब तक उनके साथ आए लोगों को सुबेदार ग्रेवाल के इस भावुक निर्णय की जानकारी मिली, देर हो चुकी थी, उन्हें अस्पताल ले जाया गया और उनका देहावसान हो गया। उसके बाद जो सियासत हुई, सामने है। पूर्व सेना प्रमुख वीके सिंह ने सही ही कहा कि शहीद ग्रेवाल की मानसिक स्थिति की जांच होना चाहिए। सही है इस देश में किसान, जवान, बेरोजगार, आदिवासी या जो कोई भी अन्याय के खिलाफ आवाज उठाए, पागल ही होता है। शहीद ग्रेवाल का पागलपन ही था कि 28 साल सीमा पर तैनात रहने के बाद भी अपने गांव को संवारने में लग गए थे।
ओआरओपी पर पिछले दिनों राहुल गांधी ने एक पत्र प्रधानमंत्री को भी लिखा था, लेकिन श्री ग्रेवाल के दिवंगत होने के बाद दिल्ली की सड़कों पर जो तमाशे हुए, वे उनकी जायज मांगों के समर्थन में हो गए होते तो शायद आज यह दिन देखना नहीं पड़ता। ओआरओपी की मांग कोई चार दशक की है। पेंशन में असमानता कम करने के लिए यूपीए के दोनों चरणों में पेंशन में बढोत्तरी भी की गई थी। यह भी सही है कि यूपीए ने अपने अंतिम बजट में पांच सौ करोड़ का प्रावधान ओआरओपी के लिए रखा था, हालांकि यह राशि मांग की तुलना में बहुत कम थी। फिर केंद्र की नई सरकार ने अपने प्रमुख चुनावी वायदे के मुताबिक ओआरओपी की घोषणा भी कर दी। विडंबना थी कि सैनिकों का बड़ा वर्ग चार बिंदुओं को ले कर घोषणा से नाखुश था। एक तो भाजपा सांसद भगत सिंह कोश्यारी कमेटी की सिफारिशों को ही लागू नहीं किया गया है। इनका मानना है सरकार जिस ओआरओपी की बात कर रही है वह अधूरी है, जिसे वे नहीं मानेंगे। उन्होंने सरकार को लगातार पत्र लिखे हैं, लेकिन अभी तक किसी का जवाब नहीं आया। इससे निराश होकर चंडीगढ़ आर्म्ड फोर्स ट्रिब्यूनल में याचिकाएं दायर कर दी गई हैं। हाल में विदेश राज्य मंत्री वीके सिंह ने बताया था कि ओआरओपी का करीब 95 प्रतिशत भुगतान किया जा चुका है। प्रश्न उठता है कि फिर कहां कमी रह गई है कि इन सैनिकों को आंदोलन जारी रखने और याचिकाएं दायर करने के लिए मजबूर होना पड़ा। दोनों पक्षों में समन्वय की कहां कमी रह गई है ?
यह मांग कुछ महीनों की नहीं, बल्कि चार दशकों से की जा रही है। पिछले साल मोदी सरकार ने इसे लागू करने के न्यायिक समिति गठित की थी। पटना हाईकोर्ट के रिटायर्ड चीफ जस्टिस एल नरसिम्हा रेड्डी को इसका अध्यक्ष बनाया था।
गौर करना होगा कि यह व्यवस्था अंग्रेजों के समय से चली आ रही है। पूर्व सैनिकों की पेंशन वेतन की करीब 80 प्रतिशत होती थी जबकि सामान्य सरकारी कर्मचारी की 33 प्रतिशत हुआ करती थी। भारत सरकार ने इसे सही नहीं माना। वर्ष 1957 के बाद से पूर्व सैनिकों की पेंशन कम कर दी गई और अन्य क्षेत्रों की पेंशन बढ़ती रही। देखा जाए तो पूर्व सैनिकों की पेंशन की तुलना सामान्य सरकारी कर्मचारियों से नहीं की जा सकती। सामान्य सरकारी कर्मचारी को 60 साल तक वेतन लेने की सुविधा मिलती है, वहीं सैनिकों को 33 साल में ही रिटायर होना पड़ता है। उनकी सर्विस के हालात भी अधिक कठिन होते हैं। पूर्व सैनिक चाहते हैं कि 1 अप्रैल 2014 से ये योजना छठे वेतन आयोग की सिफरिशों के साथ लागू हो। यदि असली संतुलन लाना है तो उन्हें भी 60 साल की आयु में रिटायर किया जाए। वे 33 साल में ही रिटायर होने के बाद सारा जीवन केवल पेंशन से ही गुजारते हैं। ऐसे में उनकी पेंशन के प्रतिशत को कम नहीं करना चाहिए।
इन सैनिकों की परेशानी यह है कि 1 जनवरी 1973 से पहले जवानों और जेसीओ को वेतन का 70 फीसदी पेंशन के रूप में मिलता था। उस समय सिविल अधिकारियों के वेतन की 30 फीसदी पेंशन मिलती थी। इसे बाद में 50 फीसदी कर दिया गया, जबकि फौज के जवानों की पेंशन वेतन के 70 फीसदी से घटाकर 50 फीसदी कर दी गई। सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि उसने यह कदम क्यों उठाया? इन सैनिकों का कहना है कि 1973 के बाद सशस्त्र सेनाओं पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया गया। सरकार को बताना चाहिए कि वह क्या कर रही है।
रक्षा मंत्रालय की वन रैंक वन पेंशन योजना को चंडीगढ़ आर्म्ड फोर्स ट्रिब्यूनल (एएफटी) में चुनौती दी गई है। एक ही दिन में ओआरओपी के खिलाफ कुल आठ याचिकाएं दायर हुईं। मामले की सुनवाई कर रही बेंच ने रक्षा मंत्रालय को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। केंद्र सरकार की ओर से नोटिफिकेशन जारी होने के बाद यह पहली बार हुआ है जब किसी ट्रिब्यूनल में वन रैंक वन पेंशन को चुनौती दी गई हो। इससे जाहिर होता है कि कहीं न कहीं कमी छूट गई थी जिससे पूर्व सैनिक असंतुष्ट हैं। इनमें से कई पेंशनरों की उम्र करीब 80 से 90 की साल है। उम्र के इस पड़ाव में ये परेशानी के जिस दौर से गुजर रहे हैं उसे समझा जाना चाहिए।
ध्यान देना होगा कि यूपीए सरकार ने फरवरी 2014 में वन रैंक-वन पेंशन योजना की घोषणा की थी। अंतरिम बजट में इसके लिए 500 करोड़ रुपए का प्रावधान भी किया था। इसके बाद लोकसभा चुनाव में वह सत्ता से बाहर हो गई। नरेंद्र मोदी ने भी सितंबर 2013 में अपनी एक रैली में वादा किया था कि अगर उनकी पार्टी की सरकार बनी तो इस योजना पर तुरंत अमल होगा। एनडीए सरकार का जुलाई 2014 में पहला बजट आया। इसमें 1000 करोड़ रुपए इस योजना के लिए रखे गए।
उधर दिवंगत सुबेदार ग्रेवाल के मसले में यह भी बात सामने आ रही है कि उनका मामला बैंक द्वारा गलत गणना करने से कोई छह हजार रूपए कम पेंशन का था, लेकिन यह भी सच है कि उनका अंतिम संदेश उनकी अपनी पेंशन को ले कर नहीं, बल्कि पूरे सैनिक वर्ग के साथ हो रही असमानता को ले कर था।
आज जो भी राजनीतिक दल इस पर राजनीति कर रहे हैं उन्हें सोचना होगा कि क्या किसी की मौत के बाद ही चेतना क्या सही सियासत है ? काश ग्रेवाल के जिंदा रहते उनकी आवाज को व्यापक राजनीतिक समर्थन ही मिला होता तो एक जीवट वाला इंसान हताश हो कर ऐसा कदम नहीं उठाता । यह जान लें कि हमारी सेना को लगातार राजनीति में घसीटा जा रहा है और यह स्वस्थ्य लोकतंत्र के लिए अच्छे लक्षण नहीं हैं।

बुधवार, 2 नवंबर 2016

Who is afraid of peaceful solution of naxalism ?

आखिर कौन नहीं चाहता है नक्सली समस्या का बातचीत से हल ?

                                                                                                                                             
पंकज चतुर्वेदी
21 अक्तूबर को देश की सर्वोच्च अदालत के सामने सन 2011 के एक मामले में सीबीआई ने रिपोर्ट पेश की कि किस तरह बस्तर में पुलिस निर्दोश ग्रामीणों को मार कर उन्हें फर्जी नक्सली बताती है । न्यायमुर्ति मदन लौकुर और एके गोयल की पीठ ने राज्य सरकार के वकील को सख्त आदेश दिया कि पुलिस कार्यवाही तात्कालिक राहत तो है लेकिन सथाई समाधान के लिए राज्य सरकार को नागालैंड व मिजोरम में आतंकवादियों से बातचीत की ही तरह बस्तर में भी बातचीत कर हिंसा का स्थाई हल निकालना चाहिए। हालांकि सरकारी वकील ने अदालत को आश्वस्त किया है कि वे सुप्रीम कोर्ट की मंशा उच्चतम स्तर तक पहुंचा देंगे। सनद रहे बस्तर से भी समय-समय पर यह आवाज उठती रही है कि नक्सली सुलभ हैं, वे विदेश में नहीं बैठे हैं तो उनसे बातचीत का तार क्यों नहीं जोड़ा जाए। कुछ महीनों पहले  हिंसा से सर्वाधिक प्रभावित दक्षिण बस्तर के दंतेवाड़ा में सर्व आदिवासी समाज का एक जलसा हुआ जिसमें पूर्व केंद्रीय मंत्री अरविंद नेताम, रिटायर्ड आईपीएस एसपी षोरी व नवल सिंह मंडावी, पूर्व सांसद गंगा पोटाई सहित इलाके के कई प्रतिश्ठित आदिवसी षािमल हुए। सभी की चिंता यही थी कि अरण्य मे ंलगातार हो रहे खूनखराबे से आदिवासियों में पलायन बढ़ा है और इसकी की परिणति है कि आदिवासियों की बोली, ंसस्कार, त्योहार, भोजन सभी कुछ खतरे में हैं। बात आई कि किसी भी स्तर पर नक्सलियों से बातचीत कर उन्हें हथियार डाल कर देख्,ा की लोकतांत्रिक मुख्य धारा में षामिल होने के लिए क्यों राजी नहीं किया जा सकता और इसके लिए अभी तक कोई प्रयास क्यों नहीं हुए।
दूसरी तरफ बीते छह महीनों से बस्तर के अखबारों में ऐसी खबरे खूब आ रही है कि अमुक दुर्दांत नक्सलवादी ने आत्मसमर्पण कर दिया, साथ में यह भी होता है कि नक्सलवादी षोशण करते हैं, उनकी ताकत कम हो गई है  सो वे अपने हथियार डाल रहे हैं । किसी नक्सली का विवाह भी करवाया जा रहा है।  ठीक यही हाल झारखंड में भी है, लगभग हर दिन किसी ग्रामीण के साथ पुलिस फोटो ख्ंिाचवाती है और उसे एरिया कमांडर बताया जाता है। इसके बावजूद नक्सली यहां वहां खून खराबा कर रहे हैं। दंतेवाड़ा में नक्सलियों ने बाकायदा एक सूची जारी की जिसमें बताया गया कि किस गांव से पुलिस वालों ने किन आदिवासियों को कब उठाया व बाद में उन्हें नक्सली बता कर आत्मसमर्पण करवा दिया व पुनर्वास की राशि दे दी। जिन गांवों में कोई भी सरकारी या सियासती दल नहीं पहुंच पाता है, वहां नक्सली जुलूस निकाल रहे हैं, आम सभा कर रहे हैं और जनता को बता रहे हैं कि सरकार व पुलिस उन पर अत्याचार करती है । उनकी सभाओं में खासी भीड़ भी पहुंच रही है।  नक्सली इलाकों मे सुरक्षा बलों को ‘‘खुले हाथ‘‘ दिए गए हैं। बंदूकों के सामने बंदूकें गरज रही हैं, लेकिन कोई मांग नहीं कर रहा है कि स्थाई षांति के लिए कहीं से पहल हो। इसके बीच पिस रहे हैं आदिवासी, उनकी संस्कृति, सभ्यता, बोली और मानवता।
यदि अरण्य में नक्सली समस्या को समझना है तो बस्तर अंचल की चार जेलों में निरूद्ध बंदियों के बारे में ‘सूचना के अधिकार’ के तरह मांगी गई जानकारी पर भी गौर करना जरूरी होगा। दंतेवाड़ा जेल की क्षमता 150 बंदियों की है और यहां माओवादी आतंकी होने के आरोपों के साथ 377 बंदी है जो सभी आदिवासी हैं। कुल 629 क्षमता की जगदलपुर जेल में नक्सली होने के आरोप में 546 लोग बंद हैं , इनमें से 512 आदिवासी हैं। इनमें महिलाएं 53 हैं, नौ लोग पांच साल से ज्यादा से बंदी हैं और आठ लोगों को बीते एक साल में कोई भी अदालत में पेशी नहीं हुई। कांकेर में 144 लोग आतंकवादी होने के आरोप में विचाराधीन बंदी हैं इनमें से 134 आदिवासी व छह औरते हैं इसकी कुल बंदी क्षमता 85 है। दुर्ग जेल में 396 बंदी रखे जा सकते हैं और यहां चार औरतों सहित 57 ‘‘नक्सली’’ बंदी हैं, इनमें से 51 आदिवासी हैं।सामने है कि केवल चार जेलों में हजार से ज्यादा आदिवासियों को बंद किया गया है। यदि पूरे राज्य में यह गणना करें तो पांच हजार से पार पहुंचेगी।
इसके साथ ही एक और चौंकाने वाला आंकडा गौरतलब है कि ताजा जनगणना बताती है कि बस्तर अंचल में आदिवासियों की जनसंख्या ना केवल कम हो रही है, बल्कि उनकी प्रजनन क्षमता भी कम हो रही है। सनद 2001 की जनगणना में यहां आबादी वृद्धि की दर 19.30 प्रतिशत थी। सन 2011 में यह घट कर 8.76 रह गई है। चूंकि जनजाति समुदाय में कन्या भ्रूण हत्या जैसी कुरीतियां हैं ही नहीं, सो बस्तर, दंतेवाडा, कांकेर आदि में षेश देश के विपरीत महिला-पुरूश का अनुपात बेहतर है। यह भी कहा जाता है कि आबादी में कमी का कारण हिंसा से ग्रस्त इलाकों से लोगों का बड़ी संख्या में पलायन है। ये आंकडे चीख-चीख कर कह रहे हैं कि आदिवासियांे के नाम पर बने राज्य में आदिवासी की सामाजिक हालत क्या है। यदि सरकार की सभी चार्जशीटों को सही भी मान लिया जाए तो यह हमारे सिस्टम के लिए षोचनीय नहीं है कि आदिवासियों का हमारी व्यवस्था पर भरोसा नहीं है और वे हथियार के बल पर अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए मजबूर हैं। इतने दमन पर सभी दल मौन हैं और यही नक्सलवाद के लिए खाद-पानी है। यह दुखद है कि ििजन अफसरों के बदौलत आदिवासी इलाकों के विकास की योजनाएं बनाई जाती हैं, वे जनजातियों की परंपराओं, मान्यताओं, मानसिकता को समझते ही नहीं है और उनके नजरिये में कोई दोरली, गोंडी, असुरी बोली छोड़कर खड़ी हिंदी बोलने लगे या षर्ट पैंट पहन ले या फिर  अपना जंगल छोड़कर षहर में रिक्शा चलाने लगे तो उसका विकास हो गया। आदिवासियों में पण यानि करेंसी का ज्यादा महत्व नहीं हुआ करता था, लेकिन कथित विकास योजनओं ने उन्हें ‘‘गांधीछाप’’ की ओर ढकेल दिया औक्र अब उसी में गड़बड़झाले के लिए  आदिवासी क्षेत्रों में बवाल होते हैं। इसी का परिणाम है कि अप्रतिम सौंदर्य के धनी अरण्य में बारूद की गंध समा गई है।
अब भारत सरकार के गृहमंत्रालय की आठ साल पुरानी एक रपट की धूल हम ही झाड़ देते हैं - सन 2006 की ‘‘आंतरिक सुरक्षा की स्थिति’’ विषय पर रिपोर्ट में स्पष्ट बताया गया था कि देश का कोई भी हिस्सा नक्सल गतिविधियों से अछूता नहीं है। क्योंकि यह एक जटिल प्रक्रिया है - राजनीतिक गतिविधियां, आम लोगों को प्रेरित करना, शस्त्रों का प्रशिक्षण और कार्यवाहियां। सरकार ने उस रिपोर्ट में स्वीकारा था कि देश के दो-तिहाई हिस्से पर नक्सलियों की पकड़ है। गुजरात, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर में भी कुछ गतिविधियां दिखाई दी हैं। दो प्रमुख औद्योगिक बेल्टों - ‘भिलाई-रांची, धनबाद-कोलकाता’ और ‘मुंबई-पुणे-सूरत-अहमदाबाद’ में इन दिनों नक्सली लोगों को जागरूक करने का अभियान चलाए हुए हैं। इस रपट पर कार्यवाही, खुफिया सूचना, दूरगामी कार्ययाोजना का कहीं अता पता नहीं है। बस जब कोई हादसा होता है तो सशस्त्र बलों को खूनखराबे के लिए जंगल में उतार दिया जाता है, लेकिन इस बात पर कोई जिम्मेदारी नहीं तय की जाती है कि एक हजार नक्सली हथियार ले कर तीन घंटों तक गोलियां चलाते हैं, सड़कों पर लैंड माईन्य लगाई जाती है और मुख्य मार्ग पर हुई इतनी बड़ी योजना की खबर किसी को नहीं लगती है।
भारत सरकार मिजोरम और नगालैंड जैसे छोटे राज्यों में षांति के लिए हाथ में क्लाशनेव रायफल ले कर सरेआम बैठे उग्रवादियों से ना केवल बातचीत करती है, बल्कि लिखित में युद्ध विराम जैसे समझौते करती है। कश्मीर का उग्रवाद सरेआम अलगाववाद का है और तो भी सरकार गाहे-बगाहे हुरीयत व कई बार पाकिस्तान में बैठे आतंकी आकाओं से षांतिपूर्ण हल की गुफ्तगु करती रहती है, फिर नक्सलियों मे ऐसी कौन सी दिक्कत है कि उनसे टेबल पर बैठ कर बात नहीं की जा सकती- वे ना तो मुल्क से अलग होने की बात करते हैं और ना ही वे किसी दूसरे देश से आए हुए है। कभी विचार करें कि सरकार व प्रशासन में बैठे वे कौन लोग है जो हर हाल में जंगल में माओवादियों को सक्रिय रखना चाहते हैं, जब नेपाल में वार्ता के जरिये उनके हथियार रखवाए जा सकते थे तो हमारे यहां इसकी कोशिशें क्यों नहीं की गईं।  याद करें 01 जुलाई 2010 की रात को आंध््राप्रदेश के आदिलाबाद जिले के जंगलों में महाराश्ट्र की सीमा के पास सीपीआई माओवादी की केंद्रीय कमेटी के सदस्य चेरूकुरी राजकुमार उर्फ आजाद और देहरादून के एक पत्रकार हेमचंद्र पांडे को पुलिस ने गोलियों से भून दिया था। पुलिस का दावा था किक यह मौतें मुठभेड में हुई जबकि तथ्य चीख-चीख कर कह रहे थे कि इन दोनों को 30 जून को नागपुर से पुलिस ने उठाया था। उस मामले में सीबीआई जांच के जरिए भले ही मुठभेड़ को असली करार दे दिया गया हो, लेकिन यह बात बड़ी साजिश के साथ छुुपा दी गई कि असल में वे दोनों लोग स्वामी अग्निवेश का एक खत ले कर जा रहे थे, जिसके तहत षीर्श नक्सली नेताओं को केंद्र सरकार से षांति वार्ता करना था। याद करें उन दिनों तत्कालीन गृह मंत्री चिदंबरम ने अपना फैक्स नंबर दे कर खुली अपील की थी कि माओवादी हमसे बात कर सकते हैं। उस धोखें के बाद नक्सली अब किसी भी स्तर पर बातचीत से डरने लगे हैं। इस पर निहायत चुप्पी बड़ी साजिश की ओर इशारा करती है कि वे कौन लोग हैं जो नक्सलियों से षांति वार्ता में अपना घाटा देखते हैं। यदि आंकड़ों को देखें तो सामने आता है कि जिन इलाकेां में लाल-आतंक ज्यादा है, वहां वही राजनीतिक दल जीतता है जो वैचारिक रूप से माओ-लेनिन का सबसे मुखर विरोधी है। यह जान लें कि नक्सली हिंसा बनाए रखने में पुलिस के भी अपने स्वार्थ हैं, कर्मचारी भी उनका वास्ता दे कर आंचलिक इलाकों में सेवा ना करने की जुगत में रहते हैं। विकास कार्य में भ्रश्टाचार पर भी नक्सली हिंसा का पर्दा चढा दिया जाता है। जाहिर है कि सरकारी मशीनरी का बड़ा वर्ग बातचीत  या षांति चाहता नहीं है।
एक तरफ सरकारी लूट व जंगल में घुस कर उस पर कब्जा करने की बेताबी है तो दूसरी ओर आदिवासी क्षेत्रों के सरंक्षण का भरम पाले खून बहाने पर बेताब ‘दादा’ लोग। बीच में फंसी है सभ्यता, संस्कृति, लोकतंत्र की साख। नक्सल आंदोलन के जवाब में ‘सलवा जुड़ुम’ का स्वरूप कितना बदरंग हुआ और इसकी परिणति दरभा घाटी में किस नृशंसता से हुई ; सबके सामने है। बंदूकों को अपनो पर ही दाग कर खून तो बहाया जा सकता है, नफरत तो उगाई जा सकती है, लेकिन देश नहीं बनाया जा सकता। तनिक बंदुकों को नीचे करें, बातचीत के रास्तें निकालें, समस्या की जड़ में जा कर उसके निरापद हल की कोशिश करें- वरना सुकमा की दरभा घाटी या बीजापुर के आर्सपेटा में खून के दरिया ऐसे ही बहते रहेंगे। अब यह साफ होता जा रहा है कि नक्सलवाद सभी के लिए वोट उगाहने या बजट उड़ने का जरिया मात्र है, वरना हजारों लोगों के पलायन, लाखों लोगों के सुरक्षा बलों के कैंप में रहने पर इतनी बेपरवाही नहीं होती।

शुक्रवार, 28 अक्टूबर 2016

learn road manners before demanding good roads

कौन सिखाएगा सड़क-संस्कार ?


देश की राजधानी दिल्ली हो या राज्य की जयपुर या भोपाल या फिर दूरस्थ गांवों तक, आम आदमी इस बात से सदैव रूष्ट मिलता है कि उसके यहां की सड़क टूटी है, संकरी है, या काम की ही नहीं है। लेकिन समाज कभी नहीं समझता कि सड़कों की दुर्गति करने में उसकी भी भूमिका कम नहीं है। अब देशभर में बाईस लाख करोड़ खर्च कर सड़कों का जाल बिछाया जा रहा है। श्वेत क्रांति व हरित क्रांति के बाद अब देश सड़क-क्रांति की ओर अग्रसर है। यह तो जान लेना चाहिए कि सड़क निर्माण पर खर्च होने वाली राशि कहीं आसमान से नहीं टपकेगी। यह हमारी-तुम्हारी जेब से ही निकाली जाएगी, टैक्स के नाम पर या और किसी माध्यम से। इतनी बड़ी राशि खर्च कर तैयार सड़कों का रखरखाव भी महंगा होगा। अभी तक देश में बिछी सड़कों के जाल के रखरखाव पर सालाना खर्च इससे भी अधिक होता है।
लेकिन यह नसीहत कौन दे कि लोगों को अब सड़क-इस्तेमाल करने के संस्कार सीखने होंगे। अभिप्राय तो सही तरीके से ड्राइविंग या पैदल चलने वालों को रास्ता देने के शिष्टाचार से होगा। यह एक चिंता का विषय है कि जिस देश में हर साल लगभग एक लाख लोग सड़क हादसों में मारे जा रहे हों, वहां तेज गति के वाहन चलने वाले सुपरफास्ट एक्सप्रेस वे बनाना कहां तक न्यायोचित व प्रासंगिक है ? एक्सप्रेस वे पर चलने के सामान्य शिष्टाचार की धज्जियां उड़ती देखना हो तो राजधानी दिल्ली से 30-40 किमी दूरी पर मथुरा या करनाल हाईवे पर देख सकते हैं। यहां विपरीत दिश में चलते वाहन, बैलगाड़ी या ट्रैक्टर का मनमाने तरीके से संचालन, ‘‘जुगाड़’’ जैसे गैरकानूनी वाहनों में भरी भीड़ व ओवरलोड टैंपो या बसों की भागमभाग, ओवरटक करते वाहन देखे जा सकते हैं। सड़क के व्यस्ततम समय में टोल नाकों पर वाहनों की लंबी लाईन, और वहां पहले निकलने की होड़ में एक दूसरे को धकियाते वाहन और उनको नियंत्रित करने वाली किसी व्यवस्था का न होना दर्शाता है कि हिंदुस्तान के लेाग अभी ऐसी सड़कों पर चलने के लायक नहीं हैं। साथ ही हमारी व्यवस्थाएं भी इतनी चाक चौबंद नहीं हैं कि 100 या 120 किमी प्रतिघंटे की गति से वाहन दौड़ाने वाली सड़कों पर खूनी खेल होने से रोक सके। सुपरफास्ट ट्रैफिक के लिए बनी सड़कों के फ्लाई ओवरों पर साईकल रिक्शा, या रेहड़ी का बीच में ही अटक जाना व उसके पीछे ओटोमोबाईल वाहनों का रेंगना सड़क के साथ-साथ इंधन की भी बर्बादी करता है, लेकिन इस की देखभाल के लिए कोई नहीं है।
कुल मिला कर हमारी सोच बेहद थोथी है। दिल्ली से ग्रेटर नोएडा के बीच सरपट रोड के दोनों ओर अब मकान और दुकान ही देखने लगे हैं। ग्रेटर नोएडा से आगरा के बीच ताज एक्सप्रेस वे पर पांच नए शहर बसाने के लिए बड़े-बड़े प्राईवेट बिल्डरों को ठेका दिया जा रहा है। जाहिर है कि यहां की संभावित लाखों-लाख आबादी अपने दैनिक उपयोग के लिए इसी एक्सप्रेस -वे का इस्तेमाल करेगी। इस पर इक्का-तांगा भी चलेंगे और साईकिल और रिक्शा भी। जाहिर है कि इस सड़क की हालत बहुत-कुछ राजधानी दिल्ली की आउटर रिंग रोड की तरह हो जाएगी। भले ही पाकिस्तान की वित्तीय व प्रशासनिक स्थिति हमसे दोयम हो, लेकिन वहां यूरोप-अमेरिका की तर्ज पर हाईवे पर चप्पे-चप्पे पर कैमरे लगे हैं। हाईवे पर कम स्पीड के वाहन चलने पर पाबंदी है और बेतरतीब गाड़ी पार्क करने का मतलब तत्काल भारी जुर्माना है। यही नहीं निर्धारित स्पीड से अधिक पर गाड़ी चलाने पर कैमरे में कैद हो कर भारी जुर्माना लगाया जाता है। लेकिन हमारे देश में एक भी सड़क ऐसी नहीं है, जिस पर कानून का राज हो। गोपीनाथ मुंडे, राजेश पायलेट, साहिब सिंह वर्मा जैसे कद्दावर नेताओं को हम सड़क की साधारण लापरवाहियों के कारण गंवा चुके हैं। लेकिन सरकार में बैठे लोग माकूल कानूनों के प्रति बेपरवाह हैं।
सड़कों पर इतना खर्च हो रहा है, उसके रखरखाव करने वाले महकमों के वेतन व सुविधाओं पर हर रोज लगभग दो करोड़ रूपए खर्च हो रहे हैं इसके बावजूद सड़कों पर चलना यानी अपने को, सरकार को व उस पर चल रहे वाहनों को कोसने का नाम हो गया है। पहले तो देखें कि सड़क की दुर्गति कैसे होती है। सड़कों के निर्माण में नौसिखियों व ताकतवर नेताओें की मौजूदगी कमजोर सड़क की नींव खोेद देती है। यह विडंबना है कि देशभर में सड़क बनाते समय उसके सुपरवीजन का काम कभी कोई तकनीकी विषेशज्ञ नहीं करता है। सड़क ढ़ालने की मशीन के चालक व एक मुंशी, जो बामुश्किल आठ दर्जा पास होता है, सड़क बना डालता है। यदि कुछ विरले मामलों को छोड़ दिया जाए तो सड़क बनाते समय डाले जाने वाले बोल्डर, रोड़ी, मुरम की सही मात्रा कभी नहीं डाली जाती है। शहरों में तो सड़क किनारे वाली मिट्टी उठा कर ही पत्थरों को दबा दिया जाता है। कच्ची सड़क पर वेक्यूम सकर से पूरी मिट्टी साफ कर ही तारकोल डाला जाना चाहिए, क्योंकि मिट्टी पर गरम तारकोल वैसे तो चिपक जाता है, लेकिन वजनी वाहन चलने पर वहीं से उधड़ जाता है। इस तरह के वेक्यूम-सकर से कच्ची सड़क की सफाई कहीं भी नहीं होती है। हालांकि इसके बिल जरूर फाईलों में होते है। इसी तरह सड़क बनाने से पहले पक्की सड़क के दोनों ओर कच्चे में खरंजा लगाना जरूरी होता है। यह तारकोल को फैलने से रोकता है व इस में रोड़ी मिल कर खरंजे के दबाव में एक सांचे सी ढ़ल जाती है। आमतौर पर ऐसे खरंजे कागजों में ही सिमटे होते हैं। कहीं ईंटें बिछाई भी जाती है तो उन्हें मुरम या सीमेंट से जोड़ने की जगह महज वहां से खोदी मिट्टी पर टिका दिया जाता है। इससे थोड़ा पानी पड़ने पर ही ईंटें ढ़ीली हो कर उखड़ आती हैं। यहां से तारकोल व रोड़ी के फैलाव व फटाव की शुरूआत होती है ।
सही सुपरवीजन नहीं होने के कारण सड़क का ढलाव ठीक न होना भी सड़क कटने का बड़ा कारण है। सड़क बीच में से उठी हुई व सिरों पर दबी होना चाहिए, ताकि उस पर पानी पड़ते ही किनारों की ओर बह जाए। लेकिन शहरी सड़कों का तो कोई लेबल ही नहीं होता है। बारिश का पानी यहां-वहां बेतरतीब जमा होता है और यह जान लेना जरूरी है कि पानी सड़क का सबसे बड़ा दुश्मन है। सड़क किनारे नालियों की ठीक व्यवस्था न होना भी सड़क की दुश्मन है। नालियों का पानी सड़क के किनारों को काटता रहता है। एक बार तारकोल कटा तो वहां से गिट्टी, बोल्डर का निकलना रुकता नहीं है।
सड़कों की दुर्गति में हमारे देश का उत्सव-धर्मी चरित्र भी कम दोषी नहीं है। महानगरों से लेकर सुदूर गांवों तक घर में शादी हो या भगवान की पूजा, किसी राजनैतिक दल का जलसा हो या मुफ्त लगा लंगर; सड़क के बीचों-बीच टेंट लगाने में कोई संकोच नहीं होता है। टेंट लगाने के लिए सड़कों पर चार-छह इंच गोलाई व एक फीट गहराई के कई छेद करे जाते हैं। उत्सव समाप्त होने पर इन्हें बंद करना अपनी शान में गुस्ताखी माना जाता है। इन छेदों में पानी भरता है और सड़क गहरे तक कटती चली जाती है। कुछ दिनों बाद कटी-फटी सड़क के लिए सरकार को कोसने वालों में वे भी शामिल होते हैं, जिनके कुकर्मों का खामियाजा जनता के पैसे से बनी सड़क को उठाना पड़ रहा होता है।
नल, टेलीफोन, सीवर, पाईप गैस जैसे कामों के लिए सरकारी मकहमे भी सड़क को चीरने में कतई दया नहीं दिखाते हैं । सरकारी कानून के मुताबिक इस तरह सड़क को नुकसान पहुंचाने से पहले संबंधित महकमा स्थानीय प्रशासन के पास सड़क की मरम्मत के लिए पैसा जमा करवाता है। लेकिन सड़कों की दुर्गति यथावत रहती है। नया मकान बनाने या मरम्मत करवाने के लिए सड़क पर ईंटें, रेत व लोहे का भंडार करना भी सड़क की आयु घटाता है। हमारे देश की नई कालेानियों में भी पानी की मुख्य लाईन का पाईप एक तरफ ही होता है, यानी जब दूसरी ओर के बाशिंदे को अपने घर तक पाईप लाना है तो उसे सड़क खोदना ही होगा। एक बार खुदी सड़क की मरम्मत लगभग नामुमकिन होती है। सड़क पर घटिया वाहनोें का संचालन भी उसका बड़ा दुश्मन है। यह दुनिया में शायद भारत में ही देखने को मिलेगा कि सरकारी बसें हों या फिर डग्गामारी करती जीपें, निर्धारित से दुगनी तक सवारी भरने पर रोक के कानून महज पैसा कमाने का जरिया मात्र हाते हैं। ओवरलोड वाहन, खराब टायर, दोयम दर्जे का ईंधन ये सभी बातें भी सरकार के चिकनी रोड के सपने को साकार होने में बाधाएं हैं।
सवाल यह खड़ा होता है कि सड़क-संस्कार सिखाएगा कौन ? ये संस्कार सड़क निर्माण में लगे महकमों को भी सीखने होंगे और उसकी योजना बनाने वाले इंजीनियरों को भी। संस्कार से सज्जित होने की जरूरत सड़क पर चलने वालों को भी है और यातायात व्यवस्था को ठीक तरह से चलाने के जिम्मेदार लोगों को भी। सड़क के संस्कार अक्षुण्ण रहें, यह सुनिश्चित करने का जिम्मा उन एजंसियों का भी है जो सड़क से टोल टैक्स उगाह रहे हैं तो उन लोगों पर भी जो अपने रूतबे या भदेसपन का नाजायज फायदा उठा कर सड़क के कानूनों को तोड़ते हैं। सड़क घेर कर उत्सव मनाने वालों या उस पर बिल्डिंग मटैरियल फैलाने वालों पर कड़ी कानूनी कार्यवाही करना महति है, क्योंकि सुंदर सड़कें किसी राष्ट्र की प्रगति की प्रतीक हैं और सड़क पर अनाधिकृत कब्जा करने वाले देश की प्रगति के बाधक हैं।
वैसे तो यह समाज व सरकार दोनों की साझा जिम्मेदारी है कि सड़क को साफ, सुंदर और सपाट रखा जाए। लेकिन हालात देख कर लगता है कि कड़े कानूनों के बगैर यह संस्कार आने से रहे।

गुरुवार, 27 अक्टूबर 2016

Why not to disclose truth of illness of politician ?

बीमारी से पर्दादारी क्यों ?


                                                                                                                                      पंकज चतुर्वेदी;
अभी तक 44 मुकदमें कायम हो चुके हैं। आठ गिरफ्तार हो चुके हैं। सात लोग खुदकुशी कर चुके हैं। लाखों लोगों की जिंदगी की उम्मीद कहे जाने वाले चैन्नई के अपोलो अस्पताल में रहस्यमयी सन्नाटा, तनाव व शंका का माहौल है। दीगर मरीजों को वहां से दूर रखा जा रहा है। अस्पताल के डॉक्टर व अन्य स्टाफ को भीतर मोबाईल ले जाने की इजाजत नहीं हैं। राज्य पुलिस का बड़ा हिस्सा या तो अस्पताल में सुरक्षा ड्यूटी पर है या फिर अस्पताल के कर्मचारियों व रिश्तेदारों के मोबाईल व अन्य इलेक्ट्रॉनिक डिवाईस की निगरानी की ड्यूटी पर मुस्तैद है। अगले साल चैन्नई सहित कई जिलों को तबाह करने वाले उत्तर-पूर्वी मानसून के भी जल्दी आने की संभावना है और इसको लेकर आम नागरिक भयभीत हैं, लेकिन देश की संवेदनशील समुद्री सीमा पर स्थित बड़े व व्यावसायिक तौर पर प्रतिष्ठित राज्य का पूरा प्रशासन बीते लगभग एक महीने से केवल इस काम पर लगा है कि ‘अम्मा’ की बीमारी के बारे में सही खबर किसी को ना लगे। यहां तक कि पिछले महीने कावेरी जलविवाद बाबत एक प्रेसनोट बाकायदा जे. जयललिता, मुख्यमंत्री के नाम से जारी कर दिया गया, जबकि वे अस्पताल के आईसीयू में बेसुध थी। सियासत भी शुरू हुई व शंकाएं भी।
बीते 22 सितंबर से तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जे. जयललिता बीमार हैं। उनकी गैरमौजूदगी में शासन चलाने के लिए संविधान के अनुच्छेद 166 के खंड तीन के तहत, पहले भी उनकी जगह मुख्यमंत्री रहे राज्ये के वित्त मंत्री ओ. पनेरसेल्वम को मुख्यमंत्री के पास मौजूद विभागों का अतिरिक्त चार्ज दे दिया गया है। पिछले दिनों उन्होंने अपने सामने मुख्यमंत्री का बड़ा सा चित्र रख कर कैबिनेट की बैठक की अध्यक्षता भी की, लेकिन फिलहाल राज्य मुख्यमंत्री-विहीन है। जयललिता की बीमारी को लेकर अफवाहें ही राज्य की सबसे बड़ी सूचना का जरिया हैं। मुख्यमंत्री को जल्दी से ठीक करने के लिए दिल्ली में एम्स से लेकर अमेरिका व सिंगापुर तक के डॉक्टर आ चुके हैं। हालांकि आम लेागों, खासकर अन्नाद्रमुक कार्यकर्ताओं को सबसे बड़ा भरोसा भगवान, अनुष्ठान व अंधविश्वास पर है। तभी पिछले कई दिनों से राज्य में तरह-तरह के हवन, पूजा चल रही हैं। मदुरई में तो सिर पर दूध के घड़े ले कर बड़ी यात्रा निकाली गई जोकि तिरूचेंडा मंदिर तक गई व हजरों लीटर दूध भगवान के नाम पर बहा दिया गया। कोई अपने मुंह में गालों से आरपार त्रिशूल किए है तो कोई भूख रह रहा है। कई एक तो खुदकुशी भी कर चुके हैं, लेकिन निष्ठुर शासन सत्ता हाथ से फिसलने के भय से ना तो कुछ कह रहा है ना ही सत्ता के वैकल्पिक केंद के बारे में विचार कर रहा है। अस्पताल का तो कहना है कि उन्हें थोड़ा सा निर्जलीकरण हुआ व बुखार है लेकिन अपुष्ट सूत्र उनके मल्टीपल आर्गन फेल होने की बातें कर रहे हैं। तमिलनाडु में जब लगा कि जनता को समझाना मुश्किल है तो एक बड़ा राजनीतिक ड्रामा रचा गया, सभी राजनीतिक दलों के लोगों को पीछे के दरवाजे से ‘अम्मा ’ को देखने के लिए अस्पतााल बुलाया गया। पड़ेासी राज्य पुदुचेरी के मुख्यमंत्री व कभी पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के करीबी रहे नारायणसमी पहुंचे व उसके तत्काल बाद उप्र की खाट यात्रा समाप्त करने के अगले दिन ही राहुल गांधी पहुंच गए। अमित शाह व वित्त मंत्री भी चैन्नई गए व सभी ने बाहर आ कर कहा कि उनकी तबीयत ठीक है व जल्द ही वे घर आ जाएंगी। इस बीच किसी ने हाई कोर्ट में मुख्यमंत्री की बीमारी का खुलासा करने के लिए जनहित याचिका भी लगा दी। मामले में सियासत भी हो रही है है और राज्य के एक रिटायर्ड आईएएस मुख्यमंत्री की गैरमौजूदगी में ताकत से शासन चला रहे हैं।
कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की बीमारी भी इसका एक उदाहरण है। हालांकि जयललिता लंबे समय से बीमार हैं यह बात किसी से छुपी नहीं है। इस साल 23 मई को जयललिता छठी बार मुख्यमंत्री बनी थीं। उन्होंने तमिलनाड़ु में 32 साल से चली आ रही हर बार सरकार बदलने की परंपरा का राजनीतिक अतीत को धता बताते हुए लगातार दूसरे कार्यकाल के लिए इसी साल 23 मई 2016 को छठी बार मुख्यमंत्री बनीं थीं। कर्नाटक के मंड्या जिले के पांडवपुरा तालुका के मेलुरकोट गांव में 24 फरवरी 1948 को एक ‘अय्यर’ परिवार में जन्मी जयललिता पिछले एक साल में कई बार बीमार रहने के बाद मई 2015 में मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने से पहले भी सात महीने तक सार्वजनिक जीवन से दूर रही थीं। यह कैसी विडंबना है कि राहुल गांधी से लेकर अमित शाह तक को अस्पताल बुलाया गया लेकिन किसी की भी बीमार मुख्यमंत्री से मुलाकात नहीं हुई। उन्हें दूर से आईसीयू में बस उन्हें दिखा दिया गया व बयान दिलवा दिया गया कि वे ठीक हैं।
हालांकि तमिलनाडु में इतिहास स्वंय को दोहरता दिख रहा है। जयललिता को फिल्मों की दुनिया से राजनीति में लाने वाले एमजीआर भी खुद सेलुलाईड की दुनिया से आए थे। उनके मुख्यमंत्री के तौर पर तीसरे कार्यकाल से ठीक पहले वे गंभीर बीमार हुए थे और इस डर से कही उनकी बीमारी की चर्चा से लोकप्रियता पर असर ना पड़े, सबकुछ छुपा कर रखा गया। 1985 में बतौर मुख्यमंत्री तीसरा कार्यकाल ग्रहण करने के बाद उनका स्वास्थ्य लगातार गिरता रहा और इलाज के लिए एमजीआर को बार -बार विदेश जाना पड़ा। तब भी ना तो ठोस जानकारी दी गई ना ही विकल्प। पूरा राज्य अफवाहों व आशंकाओं में झूलता रहा। ऐसे ही बीमार रहते हुए वे तीन साल तक मुख्यमंत्री का पद संभाले रहे और 24 दिसम्बर 1987 को गुर्दे खराब होने, डायबीटिज और हार्ट अटैक के चलते उनका निधन हो गया। उम्मीद व दुआ यही की जाती है कि जयललिता जल्द ही स्वस्थ्य हो जाएंगी।
देश के अधिकांश राजनीतिक दल व्यक्ति केंद्रित होते जा रहे हैं, वहां नेतृत्व की दूसरी पंक्ति को इतना मजबूत नहीं किया जा रहा कि किसी गंभीर हालात में वह तत्काल अपने दल व सरकार का जिम्मा संभाल सके, तभी बीमारी जैसी स्वाभाविक परिस्थिति को भी गोपनीय रखने या उसके बारे में सही जानकारी ना देने की अजीब रवायत शुरू हो गई है। जिन नेताओं पर हजारों -हजार लोग देश या राज्य के संचालन का भरोसा करते हैं, जिनसे लोग उम्मीदें करते हें जिनके लिए लोग जान तक देने की हद तक भावुक होते हैं, उनकी बीमारी की वास्तविकता जानने का लोकतांत्रिक हक उन्हें क्यों नहीं हैं। क्या किसी राज्य को या किसी मंत्रीमंडल को लंबे समय तक बगैर किसी कुशल राजनीतिक नेतृत्व के अदृश्य या प्रशासनिक हाथों में सौंप देना क्या लोकतंत्रात्मक प्रणाली की हत्या नहीं है ? क्या राजनीतिक दलों की नीतियां, उनके करिश्माई चेहरों से कमतर होती है कि उन्हें एक व्यक्ति के सहारे ही सरकार व दल चलाने पर मजबूर होना पड़ता है ? यदि हमारे नेता का इलाज जनता के धन से हो रहा है, यदि उनकी बीमारी से प्रशासन व सरकार अस्त-व्यस्त होती है तो बीमारी की जानकारी देना और पूर्ण स्वस्थ होने तक सुदृढ वैकल्पिक व्यवस्था ना करने के पीछेे क्या सरोकार या स्वार्थ होते हैं ?

शुक्रवार, 21 अक्टूबर 2016

communal riots put country economic down step

विकास का मार्ग अवरूद्ध करते हैं दंगे



                                                                                                                                            पंकज चतुर्वेदी


पिछले एक दशक के दौरान देश में कई जगह सांप्रदायिकता की आग झुलसी। जब आग शांत होती है तो भरोसा, संबंध और शांति तो नष्‍ट हो ही चुकी होती है, देश का विकास भी बेपटरी हो जाता है। लोग ढर से पलायन करते हैं, उनके रेाजगार धंघें चैपट होते हैं और इसका असर देश की अर्थ व्यवस्था तथा गरीबी से लड़ने की सरकारी योजनाओं पर भयंकर रूप् से विपरीत होता है। कई जगह सालों बाद भी अविश्‍वास  की खाई इतनी गहरी है कि वे लोग जो सन 47 में विभाजन के समय ताकत से यह कहते हुए खड़े थे कि हमारा मादरे-वतन यही है और हम वहां क्यों जाएं, वे भी घरों से दूर कहीं चले गए हैं। दंगाईयों का डर और पुलिस का खौफ, देानेां ही टूटे भरोसे की सभी सीमाएं पार कर चुका है। दंगे भड़कने में कौन सियासती रोटी सैंक रहा है और किसकी लापरवाही है, यह सभी जानते हैं लेकिन इस सच को ना तो कोई आयोग और ना ही कोई जांच एजेंसी न्याय की चौौखट तक ले जा पाएगी, क्योंकि हर बार की तरह इन दंगों का भी अपना अर्थशास्त्र है।


पश्चिमी उ.प्र के दंगे हाेंें या बरेली- सहारनपुर , बिसाहडा के या दिल्ली के दंगे के आरोपी जल्दी ही जेल से बाहर होते  हैं और पीड़ित अपने पुश्‍तैनी घर-गांव लौटना नहीं चाहते और शायद दंगाई भी यही चाहते थे। हर दंगाग्रस्त इलाके में बस निराशा, हताशा के बीज पलते हैं उसके मूल में उनका बेराजगार होना ही है। किसी की दुकान जल गई तो किसी के कारखाने या वर्कशाप, कई अपने खेत तक नहीं जा पा रहे हैं तो बहुत से लोग जातिय नफरत के चलते मजदूरी से भी मरहूम हैं। वैसे अतीत का हर जख्म गवाह है कि जब कभी दंगे हुए है हिंदुओं में मेहनतकश वर्ग और मुसलमान बेराजगार हुआ और उसने पलायन किया है ‘‘अपनो’’ के बीच किसी मलिन बस्ती में ।
यह भी तथ्य है कि भारत में हिंदू और मुसलमान गत् 1200 वर्षों से साथ-साथ रह रहे हैं। डेढ़ सदी से अधिक समय तक तो पूरे देश पर मुगल यानी मुसलमान शासक रहे। पूरे देश के हर गांव-कस्बे में 500वीं पूर्व ईस्वी से ले कर आज तक के हजारों-हजार मंदिर हैं। यदि आम मुसलमान इतना की कट्टर मूर्ति भंजक होता तो डेढ़ सौ क्या डेढ़ साल काफी होता पूरे मंदिर ढहाने के लिए। यह ऐतिहासिक तथ्य है कि सबसे कट्टर कहे जाने वाले मुगल बादशाह औरंगजेब ने देशभर में कई मंदिरों को सरकारी इमदाद व जायदाद के पट्टे/सनद बांटे थे।
इस बात को समझना जरूरी है कि 1857 की क्रांति के बाद अंग्रेजों को यह पता चल गया था कि इस मुल्क में हिंदू और मुसलमानों के आपसी ताल्लुक बहुत गहरे हैं और इन दोनों के साथ रहते उनका सत्ता में बना रहना मुश्किल है। एक साजिश के तहत 1857 के विद्रोह के बाद मुसलमानों को सताया गया, अकेले दिल्ली में ही 27 हजार मुसलमानों का कत्लेआम हुआ। अंग्रेज हुक्मरान ने दिखाया कि हिंदू उनके करीब है।। लेकिन जब 1870 के बद हिंदुओं ने विद्रोह के स्वर मुखर किए तो अंग्रेज मुसलमानों को गले लगाने लगे। यही फूट डालो और राज करो की नीति इतिहास लेखन, अफवाह फैलाने में काम आती रही
यह तथ्य भी गौरतलब है कि 1200 साल की सहयात्रा में दंगों का अतीत तो पुराना है नहीं। कहा जाता है कि अहमदाबाद में सन् 1714, 1715, 1716 और 1750 में हिंदू मुसलमानों के बीच झगड़े हुए थे। उसके बाद 1923-26 के बीच कुछ जगहों पर मामूली तनाव हुए । सन् 1931 में कानपुर का दंगा भयानक था, जिसमें गणेश शंकर विद्यार्थी की जान चली गई थी। खूनी दंगों की शुरुआत 16 अगस्त 1946 से कही जा सकती है। दंगें क्यों होते हैं? इस विषय पर प्रो. विपिन चंद्रा, असगर अली इंजीनियर से ले कर सरकार द्वारा बैठाए गए जांच आयोगों की रिपोर्ट तक साक्षी है कि झगड़े ना तो हिंदुत्व के थे ना ही सुन्नत के। कहीं जमीनों पर कब्जे की गाथा है तो कहीं वोट बैंक तो कहीं नाजायज संबंध तो कहीं गैरकानूनी धंधे।
सन् 1931 में कानपुर में हुए दंगों के बाद कांग्रेस ने छह सदस्यों का एक जांच दल गठित किया था। सन् 1933 में जब इस जांच दल की रिपोर्ट सार्वजनिक की जानी थी तो तत्कालीन ब्रितानी सरकार ने उस पर पाबंदी लगा दी थी। उस रिपोर्ट में बताया गया था कि सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और राजनीतिक विविधताओं के बावजूद सदियों से ये दोनों समाज दुर्लभ सांस्कृतिक संयोग प्रस्तुत करते आए हैं। उस रिपोर्ट में दोनों संप्रदायों के बीच तनाव को जड़ से समाप्त करने के उपायों को तीन वर्गों में विभाजित किया गया था -धार्मिक-शैक्षिक, राजनीतिक-आर्थिक और सामाजिक। उस समय तो अंग्रेजी सरकार ने अपनी कुर्सी हिलती देख इस रिपोर्ट पर पाबंदी लगाई थी। आज कतिपय राजनेता अपनी सियासती दांवपेंच को साधने के लिए उस प्रासंगिक रिपोर्ट को भुला चुके हैं।
यह जानना जरूरी है कि वैचारिक या सांप्रदायिक हिंसा केवल भारत की ही समस्या नहीं है, मिश्रित समाज के देशों, विशेषकर तीसरी दुनिया के देशों का यह चरित्र बन गई है।2 पूरा दक्षिण एशिया इस त्रासदी का शिकार है। पाकिस्तान में मुहाजिर, शिया-सुन्नी टकराव है तो श्रीलंका में तमिलों के। मालदीव जैसा देश भी हिंसक टकरावों को झेल रहा है। विकास का पहिया जब तेज घूमता है तो अल्पसंख्यक, गरीब इसकी चपेट में सबसे पहले आते हैं, परिणाम स्वरूप वे कुछ आक्रामक हो जाते हैं। ऐसे में संसाधनों पर कब्जा किए बैठे सभ्रांत वर्ग को इन शोषितों के गुस्से का यदा-कदा सामना करना पड़ता है और यही दंगे या टकरावों का गणित है।
यह भी समझ लेना चाहिए कि दंगों की जड़ धर्म या संप्रदाय नहीं, बल्कि आर्थिक-सामाजिक कारण हैं। उड़ीसा की कुल आबादी (2001 जनगणना) 36,804,660 है, इसमें ईसाई महज 897861 हैं, यानी कुल आबादी का ढ़ाई फीसदी भी नहीं। ज़ाहिर है कि ईसाई इतने कम हैं कि उनसे किसी तरह के खतरे का डर हिंदुओं में नहीं होना चाहिए। लेकिन अगस्त-सितंबर-2008 के दौरान उड़ीसा के कंधमाल जिले में केंद्रीय बलों की मौजूदगी के बावजूद ईसाईयों के घरों, पूजा स्थलों, संपत्तियों को आग के हवाले किया जाता रहा। इस हिंसा में कई लोग मारे गए और हमलों से भयाक्रांत ईसाई लोग जंगलों में छिप कर जीवन काटते दिखे। अखबारी बयानबाजी से तो यही मालूम होता है कि ईसाई मिशनियरियों द्वारा जबरन धर्मांतरण से आक्रोशित कतिपय हिंदुवादी संगठन ये हमले कर रहे हैं। हिंदुवादी संगठनों का दावा है कि यह स्थानीय जनता का ईसाईयों के धार्मिक-दुष्प्रचार के विरोध में गुस्सा है। लेकिन हकीकत और कहीं दबी हुई थी-कंधमाल में ‘पाना’ नामक एक दलित जाति का बाहुल्य है। बेहद गरीब, अशिक्षित और शोषित रहे हैं पाना लोग। कुछ दशकों पहले ‘पाना’ लोगों के ईसाईयत को स्वीकार करना शुरू किया तो उनकी शैक्षिक और आर्थिक हालत सुधरने लगी। इसका सीधा असर उन साहूकारों और सामंतों पर पड़ा, जिनकी तिजोरियां ‘पानाओं’ की अशिक्षा व नादानी से भरती थीं।यह घटना गवाह है कि दंगे के निहितार्थ और कहीं होते हैं। गुजरात के दंगों में योजनाबद्ध तरीके से व्यवसायिक प्रतिद्वंदियों ने मुसलमानों की दुकानें बरबाद की। जरा याद करें 27 फरवरी 2002 को साबरमती एक्सप्रेस में 50 कार सेवकों (25 महिलाएं व 15 बच्चे) को जिंदा जला देने के बाद गुजरात के 25 में से 16 जिलों के 151 शहर और 993 गांवों में मुसलमानों पर योजनाबद्ध हमले हुए। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इन दंगों  में कुल 1044 लोग मारे गए, जिनमें 790 मुसलमान और 254 हिंदू थे। यहां व्यापारी वर्ग के डरपोक कहे जाने वाले ‘बोहरों’ के व्यवसाय-दुकानों का निशाना बना कर फूंका गया। मुसलमानों की होटलांे, वाहनों को बाकायदा नक्षा बना कर नश्ट किया गया, बाद में पता चला कि असल खुन्नस तो व्यापारिक प्रतिद्वंदिता की थी, जिसे  सांप्रदायिक रंग दे दिया गया। यह बात ब और पुख्ता हो गई जब दंगों के बाद गुजरात के गांवों में मुसलमानेां की दुकानों से सामान ना खरीदन जैसे पर्चें बांटे गए। उत्तर प्रदेश में कई बार दंगों की वजह सरकारी संपत्ति पर कब्जा कर रही है। कष्मीर में पंडितो को जबरिया भगाने के पीछे भी अलगावादियों की ऐसी ही व्यापारिक मंषाएं रही हैं।
मुसलमान ना तो नौकरियों में है ना ही औद्योगिक घरानों में, हां हस्तकला में उनका दबदबा जरूर है। लेकिन विडंबना है कि यह हुनरमंद अधिकांश जगह मजदूर ही हैं। यदि देश में दंगों को देखें तो पाएंगे कि प्रत्येक फसाद मुसलमानों के मुंह का निवाला छीनने वाला रहा है। भागलपुर में बुनकर, भिवंडी में पावरलूम, जबलपुर में बीडी, मुरादाबाद में पीतल, अलीगढ़ में ताले, मेरठ में हथकरघा..., जहां कहीं दंगे हुए मजदूरों के घर जलें, उनमे कुटीर उद्योग चैपट हुए। एस. गोपाल की पुस्तक ‘‘द एनोटोमी आॅफ द कन्फ्रंटेशन’’ में अमिया बागछी का लेखन इस कटु सत्य को उजागर करता है कि सांप्रदायिक दंगे मुसलमानों की एक बड़ी तादाद को उन मामूली धंधों से भी उजाड़ रहे हैं जो उनके जीवनयापन का एकमात्रा सहारा है। (प्रिडेटरी कर्मशलाईजेशन एंड कम्यूनिज्म इन इंडिया)। गुजरात में दंगों के दौरान मुसलमानों की दुकानों को आग लगाना, उनका आर्थिक बहिष्कार आदि गवाह है कि दंगे मुसलमानों की आर्थिक गिरावट का सबसे कारण है। पश्चिमी उप्र के दंगां के बाद इलाके में गन्ने की खेती, गुड़ बनाने का काम और तो और किसान आंदंोलनों में नारों की बुलंदी भी गायब हो गई, इसका असर यहां की अर्थ व्यवस्था और सामाजिक ताने-बाने पर गंहरे तक पड़ा है।
दंगे मानवता के नाम पर कलंक हैं। धर्म, भाषा, मान्यताओं, रंग जैसी विषमताओं के साथ मत-विभाजन होना स्वाभाविक है। लेकिन जब सरकार व पुलिस में बैठा एक वर्ग खुद सांप्रदायिक हो जाता है तो उसकी सीधी मार निरपराध, गरीब और अशिक्षित वर्ग पर पड़ती है।

बुधवार, 19 अक्टूबर 2016

Neglected River confluence of Yamuna and Hindon

हिंडन-यमुना: एक उपेक्षित, नीरस संगम

  
हाल ही में एनजीटी ने आदेश दिया है कि 21 अक्‍तूबर तक पश्चिमी उप्र के 5 जिलों से कई हजार हैंडपंप उखाड़े जाएं क्‍योंकि हिंडन नदी में प्रदूषण के कारण वहां का पूर भूजल जहर हो गया हैा यह दुखद, चिंतनीय और विकास के प्रतिफल की वीभत्स दृश्य राजधानी दिल्ली की चौखट पर है। इसके आसपास देश की सबसे शानदार सड़क, शहरी स्थापत्य , शैक्षिक संस्थान और बाग-बगीचे हैं। दो महान नदियों का संगम, इतना नीरस, उदास करने वाला और उपेक्षित।हाल ही में राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण यानि एनजीटी के आदेश पर हिंडन नदी के किनारे बसे गाजियाबाद, मेरठ, बागपत, शामली, मुजफ्फरनगर, सहारनपुर जनपद के करीब 154 गांवों के 31 हजार हैंडपंपों को 21 अक्तूबर तक उखाड़ने के निर्देश दिए गए हैं। एनजीटी ने अपने एक अध्ययन से पुख्ता किया कि अधिकांश हैंडपंपों का पानी भारी धातुओं से दूषित है और संदेह है कि सहारनपुर, शामली और मेरठ जिले के लगभग 45 तरह के उद्योग नदी के जल में आर्सेनिक, पारा जैसे जानलेवा रसायन डाल रहे हैं।
दूर-दूर तक कोई पेड़ नहीं, कोई पक्षी नहीं, बस बदबू ही बदबू। आसमान को छूती अट्टालिकाओं को अपनी गोद में समाए नोएडा के सेक्टर-150, ग्रेटर नोएडा से सटा हुआ है। यहीं है एक गांव मोमनथाल। उससे आगे कच्ची, रेतीली पगडंडी पर कोई तीन किलोमीटर चलने के बाद, दूर एक धारा दिखाई देती है। कुछ दूर के बाद दुपहिया वाहन भी नहीं जा सकते। अब पगडंडी भी नहीं है, जाहिर है कि सालों से कभी कोई उस तरफ आया ही नहीं होगा। एक महीने पहले आई बरसात के कारण बना दल-दल और फिर बामुश्किल एक फुट की रिपटन से नीचे जाने पर सफेद पड़ चुकी, कटी-फटी धरती। सीधे हाथ से शांत यमुना का प्रवाह और बाईं तरफ से आता गंदा, काला पानी, जिसमें भंवर उठ रही हैं, गति भी तेज है। यह है हिंडन। जहां तक आंखें देख सकती हैं, गाढ़ी हिंडन को खुद में समाने से रोकती दिखती है यमुना। यह दुखद, चिंतनीय और विकास के प्रतिफल की वीभत्स दृश्य राजधानी दिल्ली की चौखट पर है। इसके आसपास देश की सबसे शानदार सड़क, शहरी स्थापत्य , शैक्षिक संस्थान और बाग-बगीचे हैं। दो महान नदियों का संगम, इतना नीरस, उदास करने वाला और उपेक्षित।
कहते हैं कि शहर और उसमें भी ऊंची-ऊंची इमारतों में आमतौर पर शिक्षित, जागरूक लोग रहते हैं। लेकिन गाजियाबाद और नोएडा में पाठ्यपुस्तकों में दशकों से छपे उन शब्दों की प्रामाणिकता पर शक होने लगता है, जिसमें कहा जाता रहा है कि मानव सभ्यता का विकास नदियों के किनारे हुआ और नदियों के संगम स्थल को बेहद पवित्र माना जाता है। धार्मिक आख्यान कहते हैं कि हरनंदी या हिंडन नदी पांच हजार साल पुरानी है। मान्यता है कि इस नदी का अस्तित्व द्वापर युग में भी था और इसी नदी के पानी से पांडवों ने खांडवप्रस्थ को इंद्रप्रस्थ बना दिया था। जिस नदी का पानी कभी लोगों की जिंदगी को खुशहाल करता था, आज उसी नदी का पानी लोगों की जिंदगी के लिए खतरा बन गया है। बीते 20 साल में हिंडन इस कदर प्रदूषित हुई कि उसका वजूद लगभग समाप्त हो गया है। गाजियाबाद जिले के करहेडा गांव से आगे बढ़ते हुए इसमें केवल औद्योगिक उत्सर्जन और विशाल आबादी की गंदगी ही बहती दिखती है। छिजपरसी से आगे पर्थला खंजरपुर के पुल के नीचे ही नदी महज नाला दिखती है। कुलेसरा व लखरावनी गांव पूरी तरह हिंडन के तट पर हैं। इन दो गांवों की आबादी दो लाख पहुंच गई है। अधिकांश सुदूर इलाकों से आए मेहनत-मजदूरी करने वाले। उनको हिंडन घाट की याद केवल दीपाचली के बाद छट पूजा के समय आती है। तब घाट की सफाई होती है, इसमें गंगा का पानी नहर से डाला जाता है। कुछ दिनों बाद फिर यह नाला बन जाती है, पूरा गांव यहीं शौच जाता है, जिनके घर नाली या शौचालय है, उसका निस्तारण भी इसी में है। अपने अंतिम 55 किलोमीटर में सघन आबादी के बीच से गुजरती इस नदी में कोई भी जीव , मछली नहीं है। इसकी आक्सीजन की मात्रा शून्य है और अब इसका प्रवाह इसके किनारों के लिए भी संकट बन गया है।
हिंडन सहारनपुर, बागपत, शामली मेरठ, मुजफ्फरनगर से होते हुए गाजियाबाद के रास्ते नोएडा तक जाती है। कई गांव ऐसे हैं जो हिंडन के प्रदूषित पानी का प्रकोप झेल रहे हैं। कुछ गांव की पहचान तो कैंसर गांव के तौर पर होने लगी है। कोई डेढ सौ गांवों के हर घर में कैंसर और त्वचा के रोगी मौजूद हैं।
यह विडंबना भी है कि हिंडन के तट पर बसा समाज इसके प्रति बेहद उपेक्षित रवैया रखता है। ये अधिकंश लेाग बाहरी है व इस नदी के अस्तित्व से खुद के जीवन को जोड़ कर देख नहीं पा रहे हैं। मोमनाथल, जहां यह यमुना से मिलती है, और जहां इसे नदी कहा ही नहीं जा सकता, ग्रमीणों ने पंप से इसके जहर को अपने खेतों में छोड़ रखा है। अंदाज लगा लें कि इससे उपजने वाला धान और सब्जियों इसका सेवन करने वाले की सेहत के लिए कितना नुकसानदेह होगा।
अभी इसी साल मई में दिल्ली में यमुना नदी को निर्मल बनाने के लिए 1969 करोड़ के एक्शन प्लान को मंजूरी दी गई है, जिसमें यमुना में मिलने वाले सभी सीवरों व नालों पर एसटीपी प्लांट लगाने की बात है। मान भी लिया जाए कि दिल्ली में यह योजना कामयाब हो गई, लेकिन वहां से दो कदम दूर निकल कर ही इसका मिलन जैसे ही हिंडन से होगा, कई हजार करोड़ बर्बाद होते दिखेंगें।
आज जरूरत इस बात की है कि हिंडन के किनरों पर आ कर बस गए लेाग इस नदी को नदी के रूप में पहचानें, इसके जहर होने से उनकी जिंदगी पर होने वाले खतरों के प्रति गंभीर हों, इसके तटों की सफाई व सौंदर्यीकरण पर काम हो। सबसे बड़ी बात जिन दो महान नदियों का संगम बिल्कुल गुमनाम है, वहां कम से कम घाट, पहुंचने का मार्ग, संगम स्थल के दोनों ओर घने पेड़ जैसे तात्कालिक कार्य किए जाए। हिंडन की मौत एक नदी या जल-धारा की नहीं, बल्कि एक प्राचीन सभ्यता, संस्कृति और संस्कार का अवसान होगा।

The right to a dignified farewell and a new standard in medical world

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