My writings can be read here मेरे लेख मेरे विचार, Awarded By ABP News As best Blogger Award-2014 एबीपी न्‍यूज द्वारा हिंदी दिवस पर पर श्रेष्‍ठ ब्‍लाॅग के पुरस्‍कार से सम्‍मानित

गुरुवार, 13 जुलाई 2017

Annual Flood put asam economy back

बर्बाद होती असम की आर्थिकी

                                 पंकज चतुर्वेदी



अभी तो मॉनसून की शुरु आत ही है और असम के कई जिलों में आई बाढ़ से 95 हजार से अधिक लोग प्रभावित हैं। बुरी तरह पीड़ित दारंग जिले में लगभग 37 हजार लोग बाढ़ की चपेट में हैं। कई इलाकों में कटान से समस्याएं बढ़ी हैं। पूर्वोत्तर के असम राज्य के 14 जिले आने वाले तीन महीने पूरी तरह बाढ़ की चपेट में रहेंगे और कमोबेश यही स्थिति वहां हर साल होती रहती है। हर साल नदियों में आने वाली बाढ़ की विभीषिका की वजह से राज्य का लगभग 40 फीसद हिस्सा पस्त-सा रहता है। एक अनुमान के अनुसार इससे हर साल जान-माल की लगभग 200 करोड़ रु पये की क्षति होती है। राज्य में एक साल के नुकसान के बाद सिर्फ मूलभूत सुविधाएं खड़ी करने में ही दस साल से ज्यादा का समय लग जाता है जबकि नुकसान का सिलसिला हर साल जारी रहता है। केंद्र और राज्य की सरकारें बाढ़ के बाद मुआवजा बांटने में तत्परता दिखाती है। यह दुखद ही है कि आजादी के लगभग 70 साल बाद भी हम राज्य के लिए बाढ़ नियंतण्रकी कोई मुकम्मल योजना नहीं दे पाए हैं। यदि इस अवधि में राज्य में बाढ़ से हुए नुकसान व बांटी गई राहत राशि को जोड़ें तो पाएंगे कि इतनी धनराशि में एक नया और सुरक्षित असम खड़ा किया जा सकता था। 

नीतियां ऐसी बनें कि बाढ़ और असम में हर साल तबाही मचाने वाली ब्रह्मपुत्र और बराक नदियां और उनकी लगभग 48 सहायक नदियां और उनसे जुड़ी असंख्य सरिताओं पर सिंचाई व बिजली उत्पादन परियोजनाओं के अलावा इनके जल प्रवाह को आबादी में घुसने से रोकने की योजनाएं बने। जिसकी मांग लंबे समय से उठती रही है। असम की अर्थव्यवस्था का मूलाधार खेती-किसानी ही है, और बाढ़ का पानी हर साल लाखों हेक्टेयर में खड़ी फसल को नष्ट कर देता है। ऐसे में यहां का किसान कभी भी कर्ज से उबर ही नहीं पाता है। एक बात और यह कि ब्रह्मपुत्र नदी के प्रवाह का अनुमान लगाना भी बेहद कठिन है। इसकी धारा लगातार और तेजी से बदलती रहती है। परिणामस्वरूप भूमि का कटाव, उपजाऊ जमीन के क्षरण से नुकसान बड़े पैमाने पर होता रहता है। यह क्षेत्र भूकंपग्रस्त है और यहां हल्के-फुल्के झटके अक्सर महसूस किए जाते हैं। भूकंप की वजह से जमीन खिसकने की घटनाएं भी यहां की खेती-किसानी को प्रभावित करती है। इस क्षेत्र की मुख्य फसलें धान, जूट, सरसो, दालें व गन्ना हैं। धान व जूट की खेती का समय ठीक बाढ़ के दिनों का ही होता है। यहां धान की खेती का 92 प्रतिशत आहू, साली बाओ और बोडो किस्म की धान का है और इनका बड़ा हिस्सा हर साल बाढ़ में धुल जाता है। असम में मई से लेकर सितम्बर तक बाढ़ रहती है और इसकी चपेट में तीन से पांच लाख हेक्टेयर खेत आते हैं। हालांकि, खेती के तरीकों में बदलाव और जंगलों का बेतरतीब दोहन जैसी मानव-निर्मिंत दुर्घटनाओं ने जमीन के नुकसान के खतरे का दोगुना कर दिया है। दुनिया में नदियों पर बने सबसे बड़े द्वीप माजुली पर नदी के बहाव के कारण जमीन कटान का सबसे अधिक असर पड़ा है। बाढ़ का असर यहां के वनों व वन्य जीवों पर भी पड़ता है। हर साल कांजीरंगा व अन्य संरक्षित वनों में गैंडा जैसे संरक्षित जानवर भी मारे जाते हैं। वहीं दूसरी ओर, इससे पेड़-पौधों को बड़े पैमाने पर नुकसान होता है। राज्य में नदी पर बनाए गए अधिकांश तटबंध व बांध 60 के दशक में बनाए गए थे। अब वे बढ़ते पानी को रोक पाने में असमर्थ हैं। उनमें गाद भी जमा हो गई है, जिसकी नियमित सफाई की कोई व्यवस्था नहीं है। पिछले साल पहली बारिश के दबाव में 50 से अधिक स्थानों पर ये बांध टूटे थे। इस साल पहले ही महीने में 27 जगहों पर मेड़ टूटने से जलनिधि के गांव में फैलने की खबर है। ब्रह्मपुत्र घाटी में तट-कटाव और बाढ़ प्रबंध के उपायों की योजना बनाने और उसे लागू करने के लिए दिसम्बर 1981 में ब्रह्मपुत्र बोर्ड की स्थापना की गई थी। बोर्ड ने ब्रह्मपुत्र व बराक की सहायक नदियों से संबंधित योजना कई साल पहले तैयार भी कर ली थी। केंद्र सरकार के अधीन एक बाढ़ नियंतण्रमहकमा कई सालों से काम कर रहा है और उसके रिकार्ड में ब्रह्मपुत्र घाटी देश के सर्वाधिक बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों में से हैं। इन महकमों ने इस दिशा में अभी तक क्या कुछ किया? असम को सालाना बाढ़ के प्रकोप से बचाने के लिए ब्रह्मपुत्र व उसकी सहायक नदियों की गाद सफाई, पुराने बांध व तटबंधों की सफाई, नये बांधों का निर्माण जरूरी है। लेकिन सियासी खींचतान के चलते जहां जनता ब्रह्मपुत्र के कहर को अपनी नियति मान बैठी है, वहीं नेता एक-दूसरे पर आरोप मंढ़ रहे हैं।

floride making disable in MP

दूषित पानी पीने को अभिशप्त

मध्य प्रदेश के सवा दर्जन से ज्यादा जिलों में ग्रामीण वैसा पानी पीने को मजबूर हैं जिसमें फ्लोरोसिस का आधिक्य है और जिससे विकलांगता बढ़ रही है

दो दशक पहले मध्य प्रदेश में मंडला जिले के तिलक्ष्पानी के बाशिंदों का जीवन देश के अन्य हजारों आदिवासी गांवों की ही तरह था। वहां थोड़ी बहुत दिक्कत पानी की जरूर थी, लेकिन अचानक अफसरों को इन आदिवासियों की जल समस्या खटकने लगी। तुरत-फुरत हैंडपंप रोप दिए गए, लेकिन उन्हें क्या पता था कि यह जल जीवनदायी नहीं, जहर है। महज 542 की आबादी वाले इस गांव में 85 बच्चे विकलांग हो गए। सन दो हजार तक की रिपोर्ट बताती है कि यहां तीन से बारह साल के अधिकांश बच्चों के हाथ-पैर टेढ़े हैं। वे घिसट-घिसट कर चलते हैं और उनकी हड्डियों और जोड़ों में असहनीय दर्द रहता है। जब मीडिया में शोर मचा तो हैंडपंप बंद किए गए, लेकिन तब तक हालात बिगड़ चुके थे। अब भले ही आज वहां अंग टेढ़े होने की शिकायत न हो, लेकिन दांतों की खराबी गांव के हर वाशिंदे की त्रसदी है। यह हृदय विदारक कहानी अकेले तिलक्ष्पानी की ही नहीं है। मध्य प्रदेश के 15 जिलों के 80 विकास खंडों के कोई 14 हजार गांवों की सूरत लगभग ऐसे ही है। इनमें 2,286 गांव अत्यधिक प्रभावित और 5,402 संवेदनशील कहे गए हैं। यह बात हाल ही में राज्य के स्वास्थ्य विभाग की ओर से केंद्र सरकार को भेजी रिपोर्ट में स्वीकर की गई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि प्रदेश में फ्लोरोसिस बेकाबू होता जा रहा है। हालांकि इस समस्या को उपजाने में समाज के उन्हीं लोगों का योगदान अधिक रहा है, जो इन दिनों इसके निदान का एकमात्र जरिया भूगर्भ जल दोहन बता रहे हैं। 1टेक्नोलॉजी मिशन नामक करामाती केंद्र सरकार पोषित प्रोजेक्ट के शुरुआती दिनों की बात है। नेता-इंजीनियर की साझा लॉबी गांव-गांव में ट्रक पर लदी बोरिंग मशीनें लिए घूमती थी। जहां जिसने कहा कि पानी की दिक्कत है, तत्काल जमीन की छाती छेद कर नलकूप रोप दिए गए। हां, जनता की वाह-वाही तो मिलती ही, जो वोट की फसल बन कर कटती भी थी यानी एक तीर से दो शिकार-नोट भी और वोट भी। मगर जनता तो जानती नहीं थी और हैंडपंप मंडली जानबूझ कर अनभिज्ञ बनी रही कि इस तीर से दो नहीं तीन शिकार हो रहे हैं। बगैर जांच परख के लगाए गए नलकूपों ने पानी के साथ-साथ वह बीमारियां भी उगलीं, जिनसे लोगों की अगली पीढ़ियां भी अछूती नहीं रहीं। ऐसा ही एक विकार पानी में फ्लोराइड के आधिक्य के कारण उपजा। फ्लोराइड पानी का एक स्वाभाविक-प्राकृतिक अंश है और इसकी 0.5 से 1.5 पीपीएम मात्र मान्य है लेकिन मध्य प्रदेश के हजारों हैंडपंपों से निकले पानी में यह मात्र 4.66 से 10 पीपीएम और उससे भी अधिक है। पाताल का पानी पी-पी कर राज्य के ये 14 जिले अब विकलांगों का जमावड़ा बन चुके हैं। इनमें रतलाम, बैतूल, रायसेन, राजगढ़, मंडला, सीहोर, धार, अलीराजपुर, झाबुआ, खरगौन, छिंदवाड़ा, डिंडोरी, सिवनी, शाजापुर और उज्जैन जैसे जिले शामिल हैं। इसके अलावा भी कई ऐसे जिले हैं जहां कुछ या बहुत से गांव फ्लोराइड के आधिक्य से तंग हैं। समस्या इतनी गंभीर है और राज्य सरकार अपने इस मद के बजट का बड़ा हिस्सा महज सर्वे में खर्च करती है। फिर कुछ गांवों में विटामिन या कैल्शियम बांट दिया जाता है। दुखद है कि समस्याग्रस्त गांवों में पेयजल की वैकल्पिक या सुरक्षित व्यवस्था करने की दिशा में कोई कदम नहीं उठाए जाते।1फ्लोराइड की थोड़ी मात्र दांतों के उचित विकास के लिए आवश्यक हैं। परंतु इसकी मात्र निर्धारित सीमा से अधिक होने पर दांतों में गंदे धब्बे हो जाते हैं। लगातार अधिक फ्लोराइड पानी के साथ शरीर में जाते रहने से रीढ़, टांगों, पसलियों और खोपड़ी की हड्डियां प्रभावित होती हैं। ये हड्डियां बढ़ जाती हैं, जकड़ और झुक जाती हैं। जरा सा दवाब पड़ने पर ये टूट भी सकती हैं। ‘फ्लोरोसिस’ के नाम से पहचाने वाले इस रोग का कोई इलाज नहीं है।1मध्य प्रदेश के झाबुआ, सिवनी, शिवपुरी, छतरपुर, बैतूल, मंडला और उज्जैन व छत्तीसगढ़ के बस्तर जिलों के भूमिगत पानी में फ्लोराइड की मात्र निर्धारित सीमा से बहुत अधिक है। आदिवासी बाहुल्य झाबुआ जिले के 78 गांवों में 178 हैंडपंप फ्लोराइड आधिक्य के कारण बंद किया जाना सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज है, लेकिन उन सभी से पानी खींचा जाना यथावत जारी है। नानपुर कस्बे के सभी हैंडपंपों से निकलने वाले पानी को पीने के अयोग्य घोषित किया गया है। जब सरकारी अमले उन्हें बंद करवाने पहुंचे तो जनता ने उन्हें खदेड़ दिया। ठीक यही बड़ी, राजावट, लक्षमणी, ढोलखेड़ा, सेजगांव और तीती में भी हुआ। चूंकि यहां पेय जल के अन्य कोई स्नोत शेष नहीं बचे हैं। सो हैंडपंप बंद होने पर जनता को नदी-पोखरों का पानी पीना होगा, जिससे हैजा,आंत्रशोथ,पीलिया जैसी बीमारियां होंगी। इससे अच्छा वे फ्लोरोसिस से तिल-तिल मरना मानते हैं। बगैर वैकल्पिक व्यवस्था किए फ्लोराइड वाले हैंडपंपों को बंद करना जनता को रास नहीं आ रहा है। नतीजतन जिले के हर गांव में 20 से 25 फीसदी लोग पीले दांत, टेढ़ी-मेढ़ी हड्डियों वाले हैं। चूंिक कहीं भी पेय जल के लिए और कोई व्यवस्था है नहीं है, सो जनता जान कर भी जहर पी रही है। कई गांवों के हालात तो इतने बदतर हैं कि वहां मवेशी भी फ्लोराइड की चपेट में आ गए हैं। मेडिकल रिपोर्ट बताती है कि गाय-भैंसों के दूध में फ्लोराइड की मात्र बेतहाशा बढ़ी हुई्र है, जिसका सेवन साक्षात विकलांगता को आमंत्रण देना है। ऐसी कई और रिपोटेर्ं भी महज सरकारी लाल बस्तों में धूल खा रही हैं। जहां एक तरफ लाखों लोग फ्लोरोसिस के अभिशाप से घिसट रहे हैं, वहीं प्रदेश के लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग की रुचि अधिक से अधिक ‘फ्लोरोडीशन संयंत्र’ खरीदने में है। यह किसी से छिपा नहीं है कि सरकारी खरीद-फरोख्त में किनके और कैसे वारे-न्यारे होते हैं। इस बात को सभी स्वीकारते हैं कि जहां फ्लोरोसिस का आतंक इतना व्यापक हो, वहां ये इक्का-दुक्का संयंत्र फिजूल ही होते हैं। फ्लोराइड से निबटने में ‘नालगोंडा विधि’ खासी कारगर रही है। इससे दस लीटर प्रति व्यक्ति हर रोज के हिसाब छह सदस्यों के एक परिवार को साल भर तक पानी शुद्ध करने का खर्चा मात्र 15 से 20 रुपये आता है। इसका उपयोग आधे घंटे की ट्रेनिंग के बाद लोग अपने ही घर में कर सकते हैं। काश सरकार ने इस दिशा में कुछ सार्थक प्रयास किए होते।

शुक्रवार, 7 जुलाई 2017

The smell of rotten system in onion

आफत बन गई प्याज की बंपर फसल

पंकज चतुर्वेदी

बुंदेलखंड के छतरपुर जिले का एक छोटा सा कस्बा है हरपालपुर, जिसकी हर गली-मुहल्ला इन दिनों प्याज के सड़ने की बदबू से तंग है। असल में हुआ यह कि कोई 2700 कुंटल प्याज ले कर एक मालगाड़ी यहां के रेलवे स्टेशन पर आई और माल को खुले में उतार दिया गया। अगली ही रात जमकर पानी बरसा और दो दिन बाद तगड़ी धूप निकल आई। जिला प्रशासन के पास इस माल को लाद कर गंतव्य तक पहुंचाने के लिए ना तो समय था और ना ही ट्रक व मजदूर। अफसरों ने कुछ ट्रकों को जबरदस्ती जब्त भी किया लेकिन तब तक प्रकृति ने अपना खेल दिखा दिया। जब हालात नियंत्रण के बाहर हो गए तो एक बुलडोजर मंगवा कर सड़े प्याज को हटवा दिया गया। यही नहीं प्याज का दरबार आम लेागों के लिए खोल दिया गया कि जो जितना चाहे उठा कर ले जाए। हालांकि यह कोई धर्मार्थ काम नहीं था, प्याज सड़ने का ठीकरा कर्मचारियों पर ना फूटे, उससे बेहतर है कि अज्ञात आदमियों पर चोरी का आरोप लगा दिया जाए । ना तो यह मध्यप्रदेश का एक मात्र ऐसा ‘हरपालपुर’ है और ना ही धरती के आशीश व कियसान के श्रम-फल की ऐसी दुर्गति का पहला उदाहरण।

मध्यपदेश में ऐसे हालात लगभग सभी उपज मंडियो, रेलवे स्टेशन और गोदामों के हैं, जहां सड़कों पर प्याज मारा-मारा घूम रहा है और असली किसान अपना माल बेचने के लिए मंडी के बाहर मारा-मारा।  सरकार आठ रूपए किलो प्याज खरीद रही है और सरकारी राशन की दुकानों पर तीन रूपए किलो बिकवा रही है। उधर बारिश में खराब हो गए प्याज को ग्राहक खरीद नहीं रहे हैं, राशन की दुकान वाले रो रहे हैं कि उन्हें आधे सउ़े प्याज दिए जा रहे हैं जिसका घाटा उनके सिर-माथे होगा। वैसे भी संसाधन इतने सीमित हैं कि ना तो इतना प्याज राशन की दुकानों तक पहुंच पा रहा है और ना ही ग्राहक भी इतना माल खरीद पा रहा है। उधर बरसात की झड़ी षुरू हो गई है और राज्य की बड़ी मंडियों में पांच सौ तक ट्रैक्टर-ट्राली की लाईनें लगी हैं किसान का नंबर दो-तीन दिन में आता है और तब तक यदि बरसात हो गई तो उसका माल सड़ जाता है।  आए रोज मंडियों के बाहर किसान प्रदर्शन कर रहे हैं लेकिन मंडी की भी तो सीमा है ।
अभी छह महीने पहले ही बस्तर में मिर्च की केश क्राप बंपर हुई। जब किसान उसे  बाजार में ले कर गया तो रू. 15 से 20 प्रति किलो वाली हरी मिर्च के दाम पांच-छह रूप्ए भी नहीं मिले हालात यह है कि अब तुड़ाई व परिवहन की कीमत भी नहीं मिल रही है। याद करे कुछ महीनों पहले बाजार में प्याज की कमी इन दिनों समाज से ज्यादा सियासत, लेखन का मसला बन गया था। जब-तब ऐसी दिक्कतें खड़ी होती हैं निर्यात पर रोक, आयात पर जोर, सरकार और विरोधी दलों द्वारा कम कीमत पर स्टॉल लागने जैसे तदर्थ प्रयोग होते रहते हैं ।

इस बात को बेहद षातिर तरीके से छुपाया जाता है कि खेतों मेे पैदा होने वाली उपज की बाजार में कमी की असली वजह उचित भंडारण, बिचौलियों की अफरात और प्रसंस्करण उद्योगों की आंचलिक क्षेत्रों में गैर मौजूदगी है। उ.प्र के इटावा इलाके में कुछ दिनों पहले तक बीस हजार रूपए कुंटल बिकने वाला लहसुन हजार रूपए से नीचे आ गया है। ठीक यही हाल आलू का है। जिन किसानों ने बैंक से कर्ज ले कर उम्मीदों की फसल बोई थी, वह अब हताशा में बदल चुकी है। इसी साल जनवरी-फरवरी में मध्यप्रदेश के मालवा अंचल की पेटलावद इलाके में इस बार कोई पच्चीस सौ हैक्टेयर में टमाटर बोये गए थे, फसल भी बंपर हुई लेकिन जब किसान माल ले कर मंडी पहंुचा तो पया कि वहां मिल रहे दाम से तो उसकी लागत भी नहीं निकलेगी।  हालत यह रहे कि कई सौ एकड़ में पके टमाटरों को किसान तुड़वाया भी नहीं ।

उत्तर प्रदेश में हर दूसरे साल आलू की इतनी अधिक पैदावार हो जाती है कि बामुश्किल तीन सौ रूपए कुंटल का रेट किसान को मिलता है। राज्य के सभी कोल्ड स्टोरेज ठसा-ठस भरे होते हैं और किसान अपी फसल को खेत में सड़ते देखने को मजबूर होता है। उस समय भी आलू का चिप्स 200 रूप्ए किलो से कम नहीं
मध्यप्रदेश में किसानों ने खेत में प्याज के रूप में सोना बोया था, अपने सपनों को पूरा करने का सोना। लेकिन जब बंपर फसल आई तो सपने कांच की किर्च की तरह बिखर गए और सोना सपने के टूटने के मांनिंद बिखर गया। एक महीने पहले मप्र में अपनी फसल के वाजिब दाम की मांग को ले कर हुआ किसान आंदोलन हिंसक कहो गया था और सरकार ने प्याज को आठ रूपए किलो खरीदने की घोशणा कर दी थी। सरकार अब 15 जुलाई तक मंडीे में आने वाला पूरा प्याज खरीदने जा रही है। 30 जून तक प्रदेश की विभिन्न मंडियों में 60,47,764.96 कुंटल यानि लगभग सात लाख टन प्याज की खरीद हो चुकी है। सनद रहे कि राज्य में हर साल लगभ्र 32 लाख टन प्याज होता है और उसके भंडारण की क्षमता महज तीन लाख टन यानि दस फीसदी से भी कम है। एक बात और वैसे तो भारत चीन के बाद दुनिया का बसे बड़ा प्याज उत्पादक देश है और यहां से हर साल 13 हजार करोड़ टन  प्याज का निर्यात होता है, लेकिन मप्र में पैदा होने वाले प्याज की क्वालिटी निर्यात की गुणवत्ता के अनुरूप नहीं होती। सो यहां का उत्पाद केवल स्थानीय बाजार की मांग ही पूरी करता है। ना ही प्याज उत्पादन करने वाले जिलों में प्याज पर आधारित कोई खाद्य प्रसंस्करण कारखाने लगे हैं। अब प्याज को ज्यादा दिन खुले में रखा भी नहीं जा सकता, सो कई बार किसान को अपनी लागत तो दूर, प्याज खुदाई का पैसा भी नहीं मिलता। ऐसे में वह अपनी दिन-रात की मेहनत की फसल सड़क पर यूं ही फैंक देता है। पिछले साल भी राज्य सरकार ने किसान का प्याज छह रूपए किलो में खरीदा था और इसके चलते राजय षासन को कोई सौ करोड़ का घाटा हुआ था। इस बार एक तो आंदोलन का दवाब है, दूसरा प्रदेश की विधान सभा के चुनाव को एक ही साल बचा है, सो सरकार जमकर प्याज खरीद रही है, भले ही उसके पास उसके भंडारण या बिक्री की कोई व्यवस्था नहीं है और अंदाजा है कि इस साल प्याज खरीदी के कारण राज्य सरकार को दो सौ करोड़ की हानि हो सकती है।

सरकार घाटा उठाकर भी प्याज खरीद रही है, उसके बावजूद भी किसान संतुश्ट नहीं है। कहा गया था कि खरीदी गई प्याज के दाम का आधा तत्काल नगद भुगतान होगा और षेश धन बैंक के माध्यम से किसन के खाते में जाएगा। राजधानी भोपाल की करोंद मंडी सहित प्रदेशभर में किसान से माल खरीद कर पर्ची ही तीन-चार दिन बाद दी जा रही है और भुगातन का उसमें कोई उल्लेख नहीं होता। कई किसान पांच दिन तक पंक्तिं खड़े रहे लेकिन उनका नंबर नहीं आ रहा। एक तो ट्रक या ट्राली, जिस पर वह माल लाता है, उसका उतने दिन का किराया हो जाता है, फिर किसान अपने घर गांव से दूर मंडी के सामने खुले में पड़ा रहता है, उसका व्यय और फिर यदि बरसात हो गई तो माल खराब होने का खतरा, ऐसे हालात में किसान मजबूरी में मंडी की जगह स्थानीय व्यापाी को ही चार से पांच रूपए किलोे में माल बेच रहा है।
इसके बावजूद राज्य सरकार के आंकड़ कह रहे हैं कि ग्यारह जिलों- सीहोर, राजगढ़, इंदौर, झाबुआ,उज्जैन, देवास, रतलाम, षाजापुर, आगर-मालवा, शिवपुरी और रीवा में प्याज बुवाई के रकवे से कई गुणा ज्यादा प्याज मंडी में खरीद लिया गया। असल में हो है रहा है कि थोक व्यापारी खुले बाजार से या फिर पिछले साल वेयर हाउस में रखे प्याज को तीन रूपए किलो खरीद रहा है, एक रूपए किलो परिवहन की और एक रूपए किलो रिश्वत लगा कर आठ रूपए में माल बेच रही है और इस तरह उसे बगैर खेती किए तीन रूपए प्रति किलो का मुनाफा हो रहा है। अब इस मामले की जांच भी हो रही है, लेकिन किसान तो खुद को ठगा सा ही महसूस कर रहा है।
यह मामला ना तो केवल मप्र का है और ना ही केवल प्याज का। देश के अलग-अलग हिस्सों में हर साल टमाटर, आलू, मिर्ची या अंगूर और भी अन्य फसलों के साथ ऐसा होता रहता है। भरमार से बंटाधार की इस समस्या के निराकरण के लिए भंडारण की व्यवस्था को बढ़ाना तो जरूरी ही है, साथ ही जिला स्तार पर प्रसंस्करण कारखाने लगाने,  सरकारी खरीदी केंद्र ग्राम स्तर पर स्थापित करने, किसान की फसल को निर्यात के लायक उन्नत बनाने के प्रयास अनिवार्य है। किसान को केवल उसके उत्पाद का वाजिब दाम ही नहीं चाहिए, वह यह भी चाहता है कि उसके उत्पाद का सड़कर या फिंक कर अनादर ना हो और उससे लोगों का पेट भरे।

बुधवार, 5 जुलाई 2017

Depression becoming killing machine for India

मानसिक रोगियों की कौन ले सुध

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के मुताबिक देश में पागलखानों की हालत बदतर है। इन्हेंसुधारने के लिए कुछ साल पहले बेंगलुरु के राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ और चेतना विज्ञान संस्थान में एक परियोजना शुरू की गई थी, लेकिन उसका कोई नतीजा नहीं निकला। 1987 में सुप्रीम कोर्ट भी मानसिक अस्पतालों में बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराने के निर्देश दिए थे। आदेश के बाद दो-चार दिन तो सरकार सक्रिय दिखी, पर हालात तनिक भी नहीं सुधारे

 

विश्व स्वास्थ्य संगठन और अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के एक ताजा शोध से पता चला है कि आज देश में चौथी सबसे बड़ी बीमारी अवसाद या डिप्रेशन है। कोई साढ़े पांच करोड़ लोग इसके शिकार हैं। इनमें से आधे से ज्यादा लोगों को यह पता नहीं होगा कि उन्हें किसी इलाज की जरूरत है। इसकी आशंका है कि 2020 तक देश की सबसे बड़ी दूसरी बीमारी हार्ट अटैक के बाद अवसाद हो सकता है। बढ़ती जरूरतें, जिंदगी में भागदौड़, रिश्तों के बंधन ढीले होना; इस दौर की कुछ ऐसी त्रसदियां हैं जो इंसान को भीतर ही भीतर खाए जा रही है। ये सब ऐसे विकारों को आमंत्रित कर रहा है, जिनके प्रारंभिक लक्षण नजर आते नहीं हैं, जब मर्ज बढ़ जाता है तो बहुत देर हो चुकी होती है। विडंबना है कि सरकार में बैठे नीति-निर्धारक मानसिक बीमारियों को अब भी गंभीरता से नहीं ले रहे हैं। 1इसे हास्यास्पद कहें या शर्म कि ‘जय विझान’ के युग में मनोविकारों को एक रोग के बनिस्पत ऊपरी व्याधि या नियति समझने वालों की संख्या बहुत अधिक है। तभी ऐसे रोगों के इलाज के लिए डॉक्टरों के बजाय पीर-फकीरों, मजार-मंदिरों पर अधिक भीड़ होती है। सामान्य डॉक्टर मानसिक रोगों को पहचानने और रोगियों को मनोचिकित्सक के पास भेजने में असमर्थ रहते हैं। इसके चलते ओझा, पुरोहित, मौलवी, तथाकथित यौन विशेषज्ञ, अवैध रूप से मनोचिकित्सक का दुष्कार्य कर रहे हैं। ‘नंग-धड़ंग, सिर पर कचरे का बोझ, जहां कहीं जगह मिली सो गए, कुछ भी खा लिया, किसी ने छेड़ा तो पत्थर चला दिए ।’ भारत के हर शहर-कस्बे में ऐसे महिला या पुरुष चरित्रों की मौजूदगी लगभग जरूरी है। आम लोगों की निगाह में ये भूत-प्रेत के प्रकोपधारी, मजनू, बदमाश या फिर देशी-विदेशी जासूस होते हैं। यह विडंबना है कि वे जो हैं, उसे न तो उनके अपने स्वीकारते हैं और न ही पराए। केंद्र सरकार ने आजादी के बाद पहली बार राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य नीति की घोषणा की है।

मानसिक रूप से बीमार लोगों की देखभाल के लिए बनाए गए पूर्व कानून जैसे भारतीय पागलखाना अधिनियम, 1858 और भारतीय पागलपन अधिनियम, 1912 में मानवाधिकार के पहलू की उपेक्षा की गई थी और केवल पागलखाने में भर्ती मरीजों पर ही विचार किया गया था। पागलपन कानून 1912 के तहत अदालती प्रमाण पत्र के जरिए मरीजों को केवल पागलखानों में इलाज की सीमा तय की गई थी, लेकिन 1987 में इस कानून में बदलाव किया गया और मरीज को खुद की इच्छा पर भर्ती होने, सामान्य अस्पतालों में भी इलाज कराने जैसी सुविधाएं दी गई हैं। आजादी के बाद भारत में इस संबंध में पहला कानून बनाने में 31 वर्ष का समय लगा और उसके नौ वर्ष के बाद मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम, 1987 अस्तित्व में आया। परंतु इस अधिनियम में कई खामियां होने के कारण इसे कभी किसी राज्य एवं केंद्र शासित प्रदेश में लागू नहीं किया गया। बहरहाल, अवसाद केवल रोगी के परिवार के लिए ही चिंता का विषय नहीं है, यह देश के विकास की गति में भी बाधक है। अनुमान है कि अवसाद के कारण यदि किसी व्यक्ति की कार्य क्षमता प्रभवित होती है तो वह अर्थव्यवस्था को औसतन दस हाजर डॉलर प्रति वर्ष का नुकसान करता है। भारत में 15 साल से कम उम्र के बच्चे भी अवसाद के शिकार हो रहे हैं। वैसे 1982 में मानसिक स्वास्थ कार्यक्रम शुरू हुआ था। एक दस्तावेज के मुताबिक करीब तेरह करोड़ भारतीयों को किसी न किसी रूप में मानसिक चिकित्सा की जरूरत है। इनमें अवसादग्रस्त सबसे ज्यादा हैं। प्रत्येक हजार जनसंख्या में 10 से 20 लोग जटिल मानसिक रोगों से ग्रस्त हैं जबकि दुखदाई और आर्थिक अक्षमता पैदा करने वाले भावुक रोगों के शिकार लोगों की संख्या इसका तीन से पांच गुना है। आम डॉक्टर के पास आने वाले आधे मरीज उदासी,भूख, नींद और सेक्स इच्छा में कमी आना, हस्त मैथुन, स्वप्न दोष जैसी शिकायतें ले कर आते हैं। वास्तव में वे किसी न किसी मानसिक रोग के शिकार होते हैं।1इतने लोगों के इलाज के लिए कोई 32 हजार मनोचिकित्सकों की जरूरत है, जबकि देशभर में इनकी संख्या बामुश्किल साढ़े तीन हजार है और इनमें भी तीन हजार तो चार महानगरों तक ही सिमटे हैं। दिनों दिन बढ़ रही भौतिक लिप्सा और उससे उपजे तनावों व भागमभाग की जिंदगी के चलते भारत में मानसिक रोगियों की संख्या पश्चिमी देशों से भी ऊपर जा रही है। विशेष रूप से महानगरों में ऐसे रोग कुछ अधिक ही गहराई से पैठ कर चुके हैं। दहशत और भय के इस रूप को फोबिया कहा जाता है। इसकी शुरुआत होती है चिड़चिड़ेपन से। बात-बात पर बिगड़ना और फिर जल्द से लाल-पीला हो जाना ऐसे ‘रोगियों’ की आदत बन जाती हैं। काम से जी चुराना, बहस करना और खुद को सच्चा साबित करना इनके प्रारंभिक लक्षण हैं। भय की कल्पनाएं इन लोगों को इतना जकड़ लेती हैं कि उनका व्यवहार बदल जाता है। जहां एक ओर मर्ज बढ़ता जा रहा है, वहीं हमारे देश के मानसिक रोग अस्पताल सौ साल पुराने पागलखाने के खौफनाक रूप से ही जाने जाते हैं। ये जर्जर, डरावनी और संदिग्ध इमारतें मानसिक रोगियों की यंत्रणाओं, उनके प्रति समाज के उपेक्षित रवैये और सरकारी उदासीनता की मूक गवाह हैं। 1कार्यक्रम,1982 में रोगियों के पुनर्वास, इसके कारणों पर नियंत्रण, दूरस्थ अंचलों के डॉक्टरों को विशेष ट्रेनिंग सहित न जाने क्या-क्या लुभावने कार्यक्रम दर्ज हैं लेकिन जमीन पर मानसिक रोगी सरकार व समाज दोनों की हेय दृष्टि से आहत है। देश में केवल 43 सरकारी मानसिक रोग अस्पताल हैं, इनमें से मनोवैज्ञानिक इलाज की व्यवस्था महज तीन जगह ही है। इनमें 21,000 बिस्तर हैं जो जरूरत का एक फीसद भी नहीं है। देशभर में महज 2,219 मानसिक रोग चिकित्सक उपलब्ध हैं जबकि जरूरत है 9,696 की। यहां तक कि जरूरत की पचास फीसद नर्स भी उपलब्ध नहीं हैं। राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ कार्यक्रम की एक रिपोर्ट बताती है कि ऐसे रोगियों की बड़ी संख्या इलाज का खर्च उठाने में असमर्थ है। सरकारी अस्पतालों के नारकीय माहौल में जाना उनकी मजबूरी होता है। अनुमान है कि भारत में कोई सात करोड़ लोग छोटे-बड़े मानसिक रोग के शिकार हैं जबकि देश के स्वास्थ्य बजट का महज 0.06 फीसद ही मानसिक रोग के मद में जाता है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग मानता रहा है कि देश भर के पागलखानों की हालत बदतर है। इसे सुधारने के लिए कुछ साल पहले बेंगलुरु के राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ और चेतना विज्ञान संस्थान (निमहान्स) में एक परियोजना शुरू की गई थी, लेकिन उसके किसी सकारात्मक परिणाम की जानकारी नहीं है। आज भी अधिकांश मानसिक रोगी बगैर इलाज के अपने हाल में अमानवीय हालात में जीने को मजबूर हैं।

मंगलवार, 4 जुलाई 2017

Rivers do not have depth to bear a good Mansoon rain

कहर बरपातीं नदियां

देश में इस बात को ले कर हर्ष है कि इस बार मानसून अच्छा होगा-यहां तक कि सदी के सबसे बेहतरीन मानसूनों में शुमार किए जा सकने वाले मानसून की भविष्यवाणी है, मौसम विभाग की। बारिश पानी की बूंदें ही नहीं ले कर आती बल्कि समृद्धि, संपन्नता की दस्तक होती है। लेकिन बरसात औसत से छह फीसदी ज्यादा हो जाए तो हमारी नदियों में इतनी जगह नहीं है कि वे उफान को सहेज पाएं। नतीजतन बाढ़ और तबाही के मंजर उतने ही भयावह हो सकते हैं जितने पानी को तरसते बुंदेलखंड या मराठवाड़ा के मंजर। पिछले साल मद्रास की बाढ़ भी एक बानगी है यह जानने की कि शहर के बीच से बहने वाली नदियों को लोगों ने जब उथला बनाया तो उनका पानी घरों में घुस गया था। सनद रहे कि वृक्षहीन धरती पर बारिश का पानी सीधा गिरता है, और भूमि पर मिट्टी की ऊपरी परत को गहराई तक छेदता है। यह मिट्टी बह कर नदी-नालों को उथला बना देती है, और थोड़ी ही बारिश में ये उफन जाते हैं। 

हाल में दिल्ली में एनजीटी ने मेट्रो कॉरपोरेशन को चताया है कि यमुना किनारे जमा किए गए हजारों ट्रक मलवे को हटवाए। भारतीय नदियों के मार्ग से हर साल 1645 घन किलोलीटर पानी बहता है, जो दुनिया की कुल नदियों का 4.445 प्रतिशत है। आंकडों के आधार पर हम पानी के मामले में पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा समृद्ध हैं, लेकिन चिंता का विषय यह है कि पूरे पानी का कोई 85 फीसदी बारिश के तीन महीनों में समुद्र की ओर बह जाता है, और नदियां सूखी रह जाती हैं। नदियों के सामने खड़े इस संकट ने मानवता के लिए चेतावनी का बिगुल बजा दिया है, जाहिर है कि बगैर जल के जीवन की कल्पना संभव नहीं है। हमारी नदियों के सामने मूल रूप से तीन तरह के संकट हैं-पानी की कमी, मिट्टी का आधिक्य और प्रदूषण। मानसून के तीन महीनों में बामुश्किल चालीस दिन पानी बरसना या फिर एक सप्ताह में ही अंधाधुंध बारिश हो जाना या फिर बेहद कम बरसना, ये सभी परिस्थितियां नदियों के लिए अस्तित्व का संकट पैदा कर रही हैं। सिंचाई व अन्य कायरे के लिए नदियों के अधिक दोहन, बांध आदि के कारण नदियों के प्राकृतिक स्वरूप के साथ भी छेड़छाड़ हुई और इसके चलते नदियों में पानी कम हो रहा है। नदियां अपने साथ अपने रास्ते की मिट्टी, चट्टानों के टुकड़े और बहुत सा खनिज बहा कर लाती हैं। पहाड़ी व नदियों के मार्ग पर अंधाधुंध जंगल कटाई, खनन, पहाड़ों को काटने, विस्फोटकों के इस्तेमाल आदि के चलते थेड़ी सी बारिश में ही बहुत सा मलवा बह कर नदियों में गिर जाता है। परिणामस्वरूप नदियां उथली हो रही हैं, उनके रास्ते बदल रहे हैं और थोड़ा सा पानी आने पर ही वे बाढ़ का रूप ले लेती हैं। यह भी खतरनाक है कि सरकार व समाज इंतजार करता है कि नदी सूखे व हम उसकी छोड़ी हुई जमीन पर कब्जा कर लें। इससे नदियों के पाट संकरे हो रहे हैं, उनके करीब बसावट बढने से प्रदूषण की मात्रा बढ़ रही है। आधुनिक युग में नदियों को सबसे बड़ा खतरा प्रदूषण से है। कल-कारखानों की निकासी, घरों की गंदगी, खेतों में मिलाए जा रहे रासायनिक दवा और खादों का हिस्सा, भूमि कटाव के अलावा अन्य अनेक ऐसे कारक हैं जो नदियों के जल को जहर बना रहे हैं। आज देश की 70 फीसदी नदियां प्रदूषित हैं। इनमें गुजरात की अमलाखेडी, साबरमती और खारी, हरियाणा की मारकंडा, मप्र की खान, उप्र की काली और हिंडन, आंध्र की मुंसी, दिल्ली में यमुना और महाराष्ट्र की भीमा मिलाकर 10 नदियां सबसे ज्यादा प्रदूषित हैं। देश की 27 नदियां नदी के मानक में भी रखने लायक नहीं बची हैं। वैसे गंगा हो या यमुना, गोमती, नर्मदा, ताप्ती, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी, महानदी, ब्रrापुत्र, झेलम, सतलुज, चिनाव, रावी, व्यास, पार्वती, हरदा, कोसी, गंडगोला, मसैहा, वरुणा हो या बेतवा, ढौंक, डेकन, डागरा, रमजान, दामोदर, सुवर्णेखा, सरयू हो या रामगंगा, गौला हो या सरसिया, पुनपुन, बूढ़ी गंडक हो या गंडक, कमला हो या फिर सोन हो या भगीरथी या फिर इनकी सहायक, कमोबेश सभी प्रदूषित हैं। इस कारण से हर साल 600 करोड़ रुपये के बराबर सात करोड़ तीस लाख मानव दिवसों की हानि होती है। जब नदियों के पारंपरिक मार्ग सिकुड़ रहे हैं, जब उनकी गहराई कम हो रही है, जब उनकी अविरल धारा पर बंधन लगाए जा रहे हैं, तो जाहिर है ऐसे में नदियां एक अच्छे मानसून को वहन कर नहीं पाती हैं, शहरों पर कहर बरपाने के साथ ही उफन कर गांव-बस्ती-खेत में तबाही मचा देती हैं।

Onion has become frozen



जहां पर आफत बन गई है प्याज की बंपर फसल

बुंदेलखंड के छतरपुर जिले का एक छोटा सा कस्बा है हरपालपुर, जिसका हर गली-मुहल्ला इन दिनों प्याज के सड़ने की बदबू से तंग है। लगभग 2,700 क्विंटल प्याज लेकर एक मालगाड़ी यहां के रेलवे स्टेशन पर आई और माल को खुले में उतार दिया गया। अगली ही रात जमकर पानी बरसा और दो दिन बाद तगड़ी धूप निकल आई। जिला प्रशासन के पास इस माल को गंतव्य तक पहुंचाने के लिए न तो समय था और न ही ट्रक व मजदूर। अफसरों ने कुछ ट्रकों को जबर्दस्ती जब्त भी किया, पर तब तक प्रकृति ने अपना खेल दिखा दिया। मध्य प्रदेश में ऐसे हालात लगभग सभी कृषि मंडियों, रेलवे स्टेशनों और गोदामों के हैं। सरकार आठ रुपये किलो प्याज खरीद रही है और सरकारी राशन की दुकानों पर तीन रुपये किलो बिकवा रही है। वहां भी खरीदार नहीं हैं। बरसात की झड़ी शुरू हो गई है और राज्य की बड़ी मंडियों में पांच सौ तक ट्रैक्टर-ट्रॉली की लाइनें लगी हैं। किसान का नंबर दो-तीन दिन में आता है और तब तक बरसात हो गइ, तो उसका माल सड़ जाता है। मंडी की भी तो सीमा है ।
मध्य प्रदेश में किसानों ने खेत में प्याज के रूप में सोना बोया था। लेकिन जब बंपर फसल आई, तो सपने कांच की किरचों की तरह बिखर गए। एक महीने पहले फसल के वाजिब दाम की मांग को लेकर हुआ किसान आंदोलन हिंसक हो गया था और सरकार ने प्याज को आठ रुपये किलो खरीदने की घोषणा कर दी थी। 30 जून तक प्रदेश की विभिन्न मंडियों में लगभग सात लाख टन प्याज की खरीद हो चुकी है। राज्य में हर साल तकरीबन 32 लाख टन प्याज होता है और उनके भंडारण की क्षमता दस फीसदी से भी कम है।
यहां पैदा होने वाले प्याज की क्वालिटी ऐसी नहीं कि निर्यात हो सके। इसलिए वह केवल स्थानीय बाजार की मांग ही पूरी करता है। प्याज पर आधारित कोई खाद्य प्रसंस्करण कारखाने भी यहां नहीं हैं। पिछले साल भी राज्य सरकार ने किसान का प्याज छह रुपये किलो में खरीदा था और इसके चलते प्रदेश सरकार को कोई सौ करोड़ रुपये का घाटा हुआ था। इस बार एक तो किसान आंदोलन का दवाब है, दूसरा प्रदेश की विधानसभा के चुनाव को एक ही साल बचा है, ऐसे मौके पर कोई भी सरकार अलोकप्रिय होने का कोई खतरा नहीं लेना चाहेगी, सो जमकर प्याज की खरीद की जा रही है।
इसीलिए सरकार घाटा उठाकर भी प्याज खरीद रही है, लेकिन इसके बावजूद किसान संतुष्ट नहीं हैं। कहा गया था कि खरीदे गए प्याज के दाम का आधा तत्काल नगद मिलेगा और शेष धन बैंक के माध्यम से किसान के खाते में जाएगा। लेकिन ऐसा हो नहीं रहा और  किसान मजबूरी में मंडी की जगह स्थानीय व्यापारी को ही चार से पांच रुपये किलो अपने माल बेच रहा है।
इसके बावजूद राज्य सरकार के आंकड़े कह रहे हैं  कि 11 जिलों- सीहोर, राजगढ़, इंदौर, झाबुआ, उज्जैन, देवास, रतलाम, शाजापुर, आगर-मालवा, शिवपुरी और रीवा में प्याज बुवाई के रकबे से कई गुणा ज्यादा प्याज मंडी में खरीद लिया गया। असल में, हो यह रहा है कि थोक व्यापारी खुले बाजार से या फिर पिछले साल वेयर हाउस में रखे प्याज को तीन रुपये किलो खरीद रहा है, एक रुपये किलो परिवहन और एक रुपये किलो रिश्वत लगाकर आठ रुपये में माल बेच रहा है और इस तरह उसे बगैर खेती किए ही तीन रुपये प्रति किलो का मुनाफा हो रहा है। अब इस मामले की जांच भी हो रही है, लेकिन किसान तो खुद को ठगा-सा ही महसूस कर रहा है।
यह मामला सिर्फ मध्य प्रदेश का नहीं है और न ही केवल प्याज का है। देश के अलग-अलग हिस्सों में हर साल टमाटर, आलू, मिर्ची या अंगूर और भी अन्य फसलों के साथ ऐसा होता रहता है। भरमार से बंटाधार की इस समस्या के निराकरण के लिए भंडारण की व्यवस्था को बढ़ाना तो जरूरी ही है, साथ ही जिला स्तर पर प्रसंस्करण कारखाने लगाने, सरकारी खरीदी केंद्र ग्राम स्तर पर स्थापित करने, किसान की फसल को निर्यात के लायक उन्नत बनाने के प्रयास अनिवार्य हैं। किसान को केवल उसके उत्पाद का वाजिब दाम ही नहीं चाहिए, वह यह भी चाहता है कि उसके उत्पादों का सड़ाकर या फेंककर निरादर न हो और उससे लोगों का पेट भरे।

सोमवार, 3 जुलाई 2017

control on NGO business


एनजीओ के ‘धंघे’ पर अंकुश

पंकज चतुर्वेदी
जरा पिछले साल नवंबर का महीना याद रखं, जब सरकार ने वित्तीय ईमानदारी और पारदर्श्शिता के लिए एक  कड़ा और अप्रत्याशित कदम उठाते हुए पांच सौ और हजार के नोट पर पाबंदी लगा दी थी। नोटबंदी के साथ-साथ देश को कैशलेस बनाने की मुहिम शुरू की गई थीं , वहीं बेनामी संपत्ति को जब्त कर देश में बढ़ रहे अवैध रीयल स्टेट के कारोबार पर लगाम लगाई थी। उसी दौर में एक ऐसा कदम भी उठाया गया था जिसकी कम चर्चा हुई लेकिन उसकी मार गहरी हुई, वह था 20,000 एनजीओ यानि गैर सरकारी संगठनों का लाइसेंस रद्द कर देना। हालांकि देश के सामाजिक विकास में एनजीओ की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता है, लेकिन यह भी सच है कि बहुत से एनजीओ के लिए उनकी संस्था और उसे मिलने वाला दान, समाज से ज्यादा स्वयं के फायदे का जरिया रहा है। कई एक एनजीओ गोपनीय तरीके से देश या सरकार विरोधी आंदोलनों को मदद देते रहे हैं। कई एनजीओ विदेश से मिले धन के दम पर धर्मांतरण जैसी गतिविधियों में भी लिप्त होते हैं। हाल ही में सरकार ने उसी दिशा में एक और कदम उठाते हुए अपने वित्तीय लेन-देन व व्यय का ब्यौरा ना देने वाले 1300 से अधिक एनजीओ को चेतावनी जारी की है।

भारत सरकार के गृह मंत्रालय ने ऐसे 1927 गैरसरकारी स्वयंसेवी संगठनों (एनजीओ) को नोटिस जारी किए है जो अपने विदेशों से मिले दान के खर्च का विवरण दे पाने में विफल रहे हैं। विदेशी सहायता से संबंधित बैंक खातों का ब्यौरा नहीं दे रहे एनजीओ को मंत्रालय की ओर से नोटिस जारी कर कानूनी कारवाई करने की चेतावनी दी गई है । नियमानुसार किसी भी एनजीओ को एक ही बैंक खाते में विदेशी सहायता प्राप्त करनी होती है । इस खाते को प्रमाणित कराना भी अनिवार्य होता है । ऐसे सभी संगठनों का विदेशी सहायता नियमन कानून (एफसीआरए) के तहत भी पंजीकरण कराना जरूरी है । मंत्रालय ने 7 जून को 2025 एनजीओ को 15 दिन के भीतर अपने खाते प्रमाणित कराने को कहा था। इसका पालन करने में नाकाम रहे 1927 एनजीओ को फिर से चेतावनी जारी की गई है। मंत्रालय ने विदेशी सहायता प्राप्त कर रहे संगठनों से अपनी ऑडिट रिपोर्ट भी जमा कराने को कहा है । ऐसे सभी संगठनों को प्रत्येक वित्तीय वर्ष में एक अप्रैल से नौ महीने के भीतर आय व्यय के ब्यौरे के साथ ऑडिट रिपोर्ट देना अनिवार्य होता है.
याद ही होगा कि इस्लामिक प्रवचनकर्ता जाकिर नायक की स्वयं सेवी संस्था इस्लामिक रिसर्च फाउंडेशन(आईआरएफ) की जांच जब राश्ट्रीय जांच एजेंसी ने षुरू की थी तो उसके 78 बैंक खातों में संदिग्ध गतिविधियों पाई गई थीं। पता चला था कि समाज सेवा के लिए एकत्र किए गए पैसे का कोई सौ करोड़ रूप्ए जमीन-जायदाद के धंधे में लगा दिया गया था।  र्प्यावरण केमुद्दों पर काम करने वाले अंतरराश्ट्रीय संगठन ग्रीन पीस इंडिया के विदेशी मदद लेने पर रोक का मसला भी चर्चा में रहा है। सरकार का आरोप है कि यह संगठन विेदश से पैसे ले कर ऐसे आंदोलनों में षामिल है जोकि देश की प्रगति में बाधक हैं।गुजरात दंगा पीड़ितों के लिए संघर्श कर रहीं तीस्ता सितलवाड और जावेद आंनद के एनजीओ पर पाबंदी में सियासती गंध भी चर्चा मं रहा है।
सनद रहे इस समय देश में लगभग 33,000 एनजीओ चल रहे थे जिसमें से सरकार ने 20,000 एनजीओ के लाइसेंस रद्द कर दिए है। इससे एनजीओ को एक कारोबार के रूप में चलाने वाले लोगों को बड़ा झटका लगा है। गृह मंत्रालय की एक रिपोर्ट के मुताबिक मोदी सरकार फेरा नियमों का सख्ती से पालन सुनिश्चित करते हुए पिछले 3 साल में 10 हजार एनजीओ का पंजीकरण रद्द कर चुकी है। ये सभी संगठन फेरा के तहत अपने सालाना आय-व्यय के ब्योरे को सरकार को मुहैया कराने में नाकाम रहे जबकि फेरा के उल्लंघन के दोषी पाए गए 1,300 से अधिक एनजीओ के पंजीकरण का नवीनीकरण आवेदन खारिज कर दिया गया है। इसके अलावा करीब 6,000 एनजीओ को मंत्रालय ने कोर बैंकिंग सुविधा वाले बैंक खाते खुलवाने का निर्देश देते हुए इन्हें बैंक खातों का विवरण देने का निर्देश दिया है। मंत्रालय ने यह कार्रवाई उस रिपोर्ट के आधार पर की है, जिसमें कहा गया है कि अधिकांश संगठनों ने सहकारी या ऐसे सरकारी बैंकों में खाते खुलवाए हैं जिनमें इंटरनेट आधारित कोर बैंकिंग सुविधा नहीं है। रिपोर्ट यह भी बताती है कि वर्ष 2014 से लेकर 2016 तक एनजीओ ने विदेशों से 50944 करोड़ रुपये लिए। लगातार तीन वर्ष तक वित्तीय जानकारी ना देने के कारण वर्ष 2011 में 21 हजार और 2014 में 10343 एनजीओ को नोटिस जारी किए गए। सालभर की वित्तीय जानकारी और नोटिस का जवाब ना देने पर वर्ष 2012 में 4138 एनजीओ और 2015 में 10020 एनजीओ के लाइसेंस रद्द कर दिए गए।
ऐसा नहीं है कि सरकार केवल एनजीओ पर शिकंजा ही कस रही है, हाल ही में उनके लिए एक राहतभरी खबर भी है। विदेशी धन लेने वाली एनजीओ के लिए राहतभरी खबर है. विदेशी अभिदाय विनियमन अधिनियमन (एफसीआरए) के अतंर्गत आने वाले एनजीओ अब अपना पंजीकरण करा सकेंगे।  इनमें वे संस्थाएं भी षािमल हैं जिनके लाईसेंस रद्द किए गए थे। उन्हें 14 जून तक का समय दिया गया था। वे ही एनजीओ संचालक इस योजना में हिस्सा बन पाए थे जिन्होंने वित्तीय वर्ष 2010-11 से लेकर 2014-15 तक का इनकम टैक्स रिटर्न बेवसाइट पर अपलोड किया था।
यह जान लें कि देश में हजारों एनजीओ बेहद सकारात्मक और परिणामकारी कार्य कर रहे हैं। ये सामाजिक उत्थान के साथ-साथ लोगों को रोजगार देने में भी अहम भूमिका निभा रहे हैं। कुछ संस्थाओं के काले कारनामों के चलते सभी संस्थआों को संदिग्ध नहीं माना जा सकता।

The right to a dignified farewell and a new standard in medical world

  गरिमापूर्ण विदाई का अधिकार और चिकित्सा की नई मर्यादा पंकज चतुर्वेदी लगभग  12 साल असीम और अव्यक्त पीड़ा के साथ  जीवन जी रहे हरीश राणा अं...